आख़िरी ट्रेन


रात में सुनसान भारतीय रेलवे स्टेशन, टिमटिमाती पीली लाइट, खाली प्लेटफॉर्म पर अकेला आदमी खड़ा, चारों तरफ धुंध और खामोशी
जब पूरा स्टेशन खाली हो… और सिर्फ सन्नाटा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हो।


रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे का समय था।

स्टेशन लगभग खाली हो चुका था।

हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी… और ऊपर लगे पीले बल्ब बीच-बीच में टिमटिमा रहे थे।

घड़ी की टिक-टिक… और कहीं दूर से आती कुत्तों की भौंकने की आवाज़…

बस यही दो आवाज़ें थीं, जो उस सन्नाटे को और गहरा कर रही थीं।

राघव प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर खड़ा था।

उसे इस वक्त यहाँ नहीं होना चाहिए था।

पर काम ऐसा था कि देर हो गई… और अब यही आख़िरी ट्रेन बची थी, जो उसे शहर से उसके गांव तक ले जा सकती थी।

उसने एक बार चारों तरफ नज़र दौड़ाई।

पूरा स्टेशन जैसे किसी ने छोड़ दिया हो।

टिकट खिड़की बंद… चाय की दुकान आधी खुली, पर अंदर कोई नहीं…

एक बेंच पर अखबार पड़ा था, जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो।

राघव ने मोबाइल निकाला।

नेटवर्क कमजोर था… घड़ी में 11:37।

“ट्रेन 11:40 पर है…” उसने मन ही मन दोहराया।

धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म के किनारे खड़े-खड़े उसे महसूस हुआ कि…

कुछ ठीक नहीं है।

हवा पहले जैसी नहीं रही थी।

अब उसमें हल्की सी बासीपन की गंध थी… जैसे किसी बंद कमरे की हवा।

उसने नाक सिकोड़ते हुए इधर-उधर देखा।

कुछ नहीं।

तभी दूर से ट्रेन की हल्की सी आवाज़ सुनाई दी।

पहले बहुत धीमी…

फिर धीरे-धीरे बढ़ती हुई।

राघव थोड़ा सीधा होकर खड़ा हो गया।

अंधेरे में दूर से आती हेडलाइट दिखाई दी।

पर अजीब बात ये थी…

उस रोशनी में कोई गर्माहट नहीं थी।

 थोड़ी फीकी… जैसे धुंध के पीछे से आ रही हो।

ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

पर जैसे ही वो रुकी…

राघव के शरीर में हल्की सी सिहरन दौड़ गई।

कोई आवाज़ नहीं हुई।

न ब्रेक की चीख…

न पहियों की रगड़…

बस… वो आकर खड़ी हो गई।

चुपचाप।

अंधेरे प्लेटफॉर्म पर बिना आवाज़ के आती भूतिया ट्रेन, हल्की रोशनी, घना कोहरा और खुले दरवाज़ों में अंधेरा
 ट्रेन आई… पर उसके आने की कोई आवाज़ नहीं थी।


उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

दरवाज़ा खुला था।

पर अंदर अंधेरा था।

“शायद लाइट खराब है…” उसने खुद को समझाया।

उसने एक गहरी सांस ली और ट्रेन में चढ़ गया।

अंदर कदम रखते ही उसे ठंड का एहसास हुआ।

बाहर जितनी ठंड थी…

अंदर उससे ज्यादा।

जैसे किसी ने AC बहुत नीचे कर दिया हो…

या जैसे ये जगह बहुत समय से बंद हो।

उसने सीट ढूंढी और बैठ गया।

पूरा डिब्बा खाली था।

एक भी आदमी नहीं।

ट्रेन चल पड़ी।

धीरे-धीरे।

राघव ने खिड़की से बाहर देखा।

स्टेशन पीछे छूट रहा था…

पर अजीब बात ये थी कि बाहर का दृश्य साफ नहीं दिख रहा था।

जैसे धुंध हो… या कांच के बाहर कुछ जमा हो।

उसने हाथ बढ़ाकर कांच छुआ।

ठंडा।

बहुत ज्यादा ठंडा।

कुछ मिनट बीते।

फिर उसे महसूस हुआ…

कोई है।

उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

खाली।

सामने देखा।

खाली।

पूरा डिब्बा वैसा ही… सुनसान।

“दिमाग का वहम है…” उसने खुद को समझाया।

पर दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई थी।

ट्रेन की आवाज़ भी अजीब थी।

पहियों की खट-खट नहीं…

बस एक धीमी सी घिसटने की आवाज़…

जैसे ट्रेन पटरी पर नहीं…

किसी और चीज़ पर चल रही हो।

राघव ने सीट से थोड़ा उठकर दूसरे डिब्बे की तरफ देखा।

दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर अंधेरा।

पर…

उसे लगा जैसे अंदर कोई खड़ा है।

बहुत हल्की… एक परछाई।

उसने ध्यान से देखने की कोशिश की।

परछाई हिली नहीं।

बस खड़ी रही।

राघव का गला सूख गया।

“कोई और भी है…”

ये सोचकर उसे थोड़ी राहत मिली।

वो धीरे-धीरे उस दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

हर कदम के साथ ट्रेन की आवाज़ थोड़ी और धीमी होती जा रही थी।

जैसे…

ट्रेन खुद भी उसकी हरकत सुन रही हो।

वो दरवाज़े तक पहुंचा।

अंदर झांका।

कुछ नहीं।

पूरा डिब्बा खाली।

वो वहीं कुछ सेकंड खड़ा रहा।

फिर धीरे से पीछे मुड़ा…

और वहीं जम गया।

जिस डिब्बे में वो अभी बैठा था…

उसकी खिड़की के पास…

कोई बैठा था।

वो धीरे-धीरे वापस उसी तरफ चला।

दिल अब जोर से धड़क रहा था।

जैसे हर धड़कन उस सन्नाटे में गूंज रही हो।

वो पास पहुंचा।

सीट खाली थी।

पर…

खाली ट्रेन के डिब्बे में डरा हुआ आदमी, धूल भरी सीट पर ताज़ा निशान, पीछे हल्की परछाई, नीली ठंडी रोशनी
तुम अकेले नहीं हो… बस तुम्हें अभी दिख नहीं रहा।


सीट पर गड्ढा बना हुआ था।

जैसे अभी-अभी कोई बैठा हो।

राघव ने तुरंत पीछे हटना चाहा।

तभी…

उसके कान के बिल्कुल पास…

बहुत धीमी आवाज़ आई—

“देर हो गई…”

उसका शरीर जैसे सुन्न हो गया।

उसने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

कोई नहीं।

ट्रेन अब रुक रही थी।

पर बाहर कोई स्टेशन नहीं था।

सिर्फ अंधेरा।

गहरा… पूरा अंधेरा।

दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।

राघव वहीं खड़ा रहा।

हिल नहीं पा रहा था।

फिर उसे महसूस हुआ…

कोई उसके पीछे खड़ा है।

बहुत करीब।

इतना करीब कि उसकी सांस गर्दन को छू रही थी।

वो भागना चाहता था।

पर शरीर ने जवाब दे दिया।

धीरे-धीरे…

एक ठंडी उंगली उसके कंधे पर रखी गई।

और वही आवाज़ फिर आई—

“ये… आख़िरी ट्रेन है…”

अगली सुबह…

स्टेशन मास्टर ने प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर एक रिपोर्ट दर्ज की।

रात की आख़िरी ट्रेन…

उस रूट पर सालों पहले बंद हो चुकी थी।

और…

प्लेटफॉर्म के किनारे…

एक पुराना, जंग लगा डिब्बा खड़ा था।

दरवाज़ा खुला हुआ।

अंदर…

एक सीट पर धूल जमी थी।

पर उस धूल में…

एक ताज़ा बैठने का निशान था।


खौफनाक जिन्न

 


रात बिल्कुल साधारण थी…

 बाहर  हवा बस हल्की-सी बह रही थी। पेड़ों के पत्ते भी जैसे थक कर स्थिर हो गए थे। आसमान में चाँद पूरा नहीं था, पर इतना जरूर था कि जमीन पर फीकी सफेदी बिखेर दे।

रात में सुनसान गांव के रास्ते पर साइकिल चलाता एक आदमी, पास में पुराना कुआं और डरावना माहौल
एक साधारण सफर… जो शायद उतना साधारण नहीं था।


रमेश अपनी साइकिल धीरे-धीरे चलाते हुए रास्ता पार कर रहा था।

वह हर रोज इसी रास्ते से गुजरता था। शहर से देर तक काम करके लौटना उसकी आदत बन चुकी थी।

उसके लिए इस रास्ते से… हर रोज की बात थी।

पर वह रात… कुछ अलग होने वाली थी।

 उसने ध्यान नहीं दिया। पर

उस दिन हवा में एक अजीब-सी चुप्पी थी।

ऐसी चुप्पी 

जैसे कोई सुन रहा हो।

साइकिल की चेन की खट-खट भी उसे उस वक्त ज़्यादा साफ सुनाई देने लगी।

उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

 रास्ता… बिल्कुल ही सुनसान था पेड़… पौधे सब शांत थे, अंधेरा गहरा था।

वह आगे बढ़ गया।

थोड़ा आगे जाने पर रास्ते पर एक पुराना कुआं पड़ता था।

गांव के लोग अब उसका इस्तेमाल नहीं करते थे।

रमेश जैसे ही  उस कुएं के पास पहुंचा… उसकी साइकिल खुद-ब-खुद धीमी हो गई।

उसने ब्रेक नहीं लगाया था।

फिर भी… पहिये जैसे भारी हो गए थे।

उसने नीचे झुककर देखा…

कुछ भी नहीं फंसा था।

पर साइकिल चल नहीं रही थी।

आसपास एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था 

और तभी…

कुएं के अंदर से… एक हल्की-सी आवाज उसे सुनाई दी।

रमेश का जैसे गला ही सूख गया।

उसने  कुएं की तरफ देखा।

बहुत होत अंधेरा था।

गहरा… ठंडा अंधेरा।

कुछ दिख नहीं रहा था…

लेकिन एहसास हो रहा था…

कि नीचे कुछ है।

रात के अंधेरे में एक आदमी पुराने कुएं में झांकता हुआ, नीचे से आती रहस्यमयी रोशनी
कुछ चीजें देखनी नहीं चाहिए… फिर भी इंसान देखता है।


रमेश ने तुरंत अपनी साइकिल घुमाई और तेज चलाने लगा।

इस बार साइकिल चल रही थी।

बहुत आसानी से।

घर पहुंचने तक उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


घर में जाते रमेश ने दरवाजा बंद करते ही राहत की सांस ली।

घर में उसकी पत्नी सो रही थी।

सब कुछ सामान्य था।

पर अजीब सा सन्नाटा था।

वही… जो कुएं के पास था।


रात के करीब 2 बजे होंगे…

रमेश की नींद अचानक खुल गई।

कोई आवाज नहीं हुई थी।

फिर भी… उसे लगा… कोई है।

उसने आंखें खोलीं।

कमरा अंधेरे में डूबा था।

पर खिड़की से आती हल्की रोशनी में… उसे कुछ दिखा।

दरवाजे के पास…

कोई खड़ा था।

पहले तो उसे लगा—

“पत्नी होगी…”

पर उसकी पत्नी उसके पास ही सो रही थी।

उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

पत्नी वहीं थी।

और दरवाजे के पास खड़ा वो… अब भी वहीं था।

स्थिर।

बिल्कुल स्थिर।

रमेश का शरीर जड़ हो गया।

वह उठ नहीं पा रहा था।

सिर्फ देख पा रहा था।

कुछ सेकंड…

या शायद मिनट…

फिर वह चीज़… थोड़ा आगे बढ़ी।

उसकी चाल… इंसानी नहीं थी।

पैर जमीन को छू नहीं रहे थे…

बस खिसक रहे थे।

जैसे… उसे चलना याद नहीं।

अब उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखने लगा।

काला।

पूरी तरह काला।

पर आंखें…

आंखें सफेद थीं।

और… सीधा रमेश को देख रही थीं।

रमेश चिल्लाना चाहता था।

पर आवाज नहीं निकली।

उस चीज़ ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया और

कुछ फुसफुसाया।

पर शब्द समझ नहीं आए।

बस एक एहसास आया—

वह उसे पहचानता है।

अगले दिन सुबह…

रमेश उठा… नाश्ता किया…और काम पर चला गया।

उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

वही रास्ता  था।

कुआं भी… वही था।

पर इस बार…

उसने खुद साइकिल रोकी।

वह… कुएं के पास गया और

अंदर झांका।

नीचे…

कुछ नहीं था।

बस पानी था।

स्थिर… बिल्कुल शांत।

पर पानी में…

उसका प्रतिबिंब नहीं था।

उसकी जगह…

कोई और था।

काला।

सफेद आंखों वाला।

जो ऊपर देख रहा था।

रात में घर के बाहर खड़ा आदमी जिसकी जमीन पर दो परछाइयां दिख रही हैं, एक असामान्य
घर तक तो आ गया… पर अब वह अकेला नहीं है।


उस दिन के बाद…

गांव में लोगों ने नोटिस किया…

रमेश के अंदर का बदलाव।

वह कम बोलता था।

ज्यादा देर तक… खाली देखता रहता था।

और रात को…

उसके घर के बाहर…

कभी-कभी…

दो परछाइयाँ दिखती थीं।

एक… जो उसकी थी।

और दूसरी…

जो कभी हिलती ही नहीं थी।

बस… उसके साथ खड़ी रहती थी।

अब धीरे-धीरे…

लोगों ने उस रास्ते से जाना बंद कर दिया।

पर असली वजह… किसी को पता नहीं चली।

क्योंकि…

जो भी उस कुएं के पास रुकता है…

वह वापस तो आ जाता है…

पर…

वह अकेला नहीं आता।

पुराना कब्रिस्तान

 रात के साढ़े बारह बजे थे।

आसमान में चाँद पूरा नहीं था, लेकिन उसकी फीकी रोशनी बादलों के पीछे से छनकर जमीन पर गिर रही थी। गाँव के बाहर फैला पुराना कब्रिस्तान उसी रोशनी में धुँधला-सा चमक रहा था। टूटी हुई पत्थर की चहारदीवारी, लोहे का जंग लगा फाटक जो वर्षों से आधा खुला और आधा टेढ़ा लटका हुआ था। भीतर पुरानी कब्रों की अनगिनत कतारें — कुछ पर नाम मिट चुके, कुछ पर तारीखें आधी घिसी हुई।

रात में ग्रामीण इलाके का पुराना सुनसान कब्रिस्तान, टूटी और तिरछी कब्रें, जंग लगा फाटक और जमीन पर फैला धुंध।
गाँव के बाहर खामोश खड़ा यह कब्रिस्तान सिर्फ मिट्टी और पत्थर नहीं… यहाँ की जमीन में दबी हैं अधूरी कहानियाँ।


यह कब्रिस्तान अंग्रेज़ों के समय का बताया जाता था। करीब तीस साल पहले यहाँ ज़मीन धँसने की घटना हुई थी। बरसात की एक रात कई पुरानी कब्रें भीतर से खाली मिली थीं, जैसे मिट्टी अंदर की तरफ खिसक गई हो। उसी साल गाँव के चार लोग रहस्यमय तरीके से गायब हुए। बाद में उनकी लाशें कब्रिस्तान की अलग-अलग जगहों पर मिलीं — बिना किसी चोट के, पर चेहरे पर असहनीय भय के निशान। पुलिस ने मामला “प्राकृतिक कारण” कहकर बंद कर दिया। लेकिन तब से हर कुछ समय बाद कोई न कोई इस जगह से जुड़ा हादसा सामने आता रहा।

मोहन।

छोटी मोटी चोरिया करनेवाला लालच से भरा इंसान। उसे खबर मिली थी कि गाँव के बड़े सेठ का घर दो रात खाली रहेगा। अंदर लाखों का माल था। अगर हाथ लगा तो यह उसका आख़िरी हाथ हो सकता था। उसने ठान लिया की रात को ही हाथ साफ कर लेगा और कहीं दुर चला जायेगा।

रात गहरी हुई तो वह उस घर की पिछली दीवार फांदकर भीतर घुसा। ताले पहले से देखे हुए थे। उसने अलमारी खोली और सारी नकदी, जेवर, छोटे बक्से। सब बैग में भर लिए।

पर तभी बाहर जीप के ब्रेक की आवाज़ आई।

गश्त पर पुलिस थी।

टॉर्च की किरणें खिड़कियों से भीतर फिसलने लगीं। किसी पड़ोसी ने शक में फोन कर दिया था। उन्होने पहले दरवाजे पर दस्तक दी , फिर ज़ोर से धक्का दिया।

मोहन पिछली तरफ भागा। दीवार कूदकर अँधेरी गली में उतरा। पीछे सीटी और चिल्लाहट। “रुको!”

और वह भागता गया। कंधे पर भारी बैग। वह दो बार फिसला। घुटने छिल गए। पीछे टॉर्च की रोशनी कभी पास आती, तो कभी दूर जाती।

भागते-भागते उसे सामने पुरानी दीवार दिखी।

कब्रिस्तान की।

उसने बिना सोचे दीवार पकड़कर खुद को ऊपर खींचा और भीतर कूद गया।

अंदर उतरते ही बाहर की हलचल जैसे दीवार के उस पार ही रह गई हो और अंदर गहरी, भारी चुप्पी।

वह झुककर एक बड़ी, झुकी हुई कब्र के पीछे छिप गया। कुछ देर बाद पुलिस की रोशनी दीवार तक आई, फिर लौट गई। कदमों की आहट दूर चली गई।

एक आदमी टूटी कब्र के पीछे छिपा हुआ है जबकि बाहर पुलिस टॉर्च की रोशनी से अंधेरे में तलाश कर रही है।
पुलिस दीवार के उस पार थी…
लेकिन मोहन को नहीं पता था कि असली खतरा दीवार के अंदर इंतज़ार कर रहा है।


मोहन ने राहत की साँस ली।

लेकिन वह ज़्यादा देर नहीं रुका। उसे लगा, यहाँ रुकना सही नहीं। जैसे ही वह फाटक की दिशा में बढ़ा, उसे अजीब बात महसूस हुई — जिस तरफ से वह कूदा था, वहाँ वैसी दीवार दिख ही नहीं रही थी। सामने सिर्फ कब्रों की अंतहीन कतार।

उसने दिशा बदली। चलते-चलते अचानक उसका पैर धँसी हुई मिट्टी में चला गया। वह गिर पड़ा। हाथ मिट्टी में धँस गए।

मिट्टी ठंडी थी… असामान्य रूप से ठंडी।

वह उठकर आगे बढ़ा। हर दो कदम पर उसे लगता जैसे जमीन हल्की-सी नीचे खिसक रही हो। कुछ पुरानी कब्रों के पत्थर तिरछे हो चुके थे। एक जगह उसने देखा — मिट्टी हल्की-हल्की काँप रही थी, जैसे भीतर कुछ हिल रहा हो।

उसने खुद को समझाया कि यह डर है।

वह तेज़ कदमों से दीवार खोजने लगा। अचानक उसे लगा पीछे से किसी ने दौड़कर कदम बढ़ाए हों। वह मुड़ा — कुछ नहीं। फिर सामने देखा — दो कब्रों के बीच का रास्ता, जो अभी खुला था, अब तंग लग रहा था।

उसने दौड़ना शुरू किया।

दौड़ते-दौड़ते उसका बैग एक पत्थर से अटककर गिर गया। जेवर मिट्टी में बिखर गए। वह झुका उठाने, तभी उसकी नज़र पड़ी — मिट्टी पर सिर्फ उसके ही नहीं, और भी पैरों के निशान थे।

नंगे पैर।

छोटे-बड़े।

ताज़ा।

वे निशान उसके चारों तरफ गोल घेरा बनाते जा रहे थे।

मोहन का गला सूख गया। उसने बैग वहीं छोड़ा और भागा।

अचानक उसके सामने दीवार दिखी। उसने राहत की साँस ली और चढ़ने को हाथ बढ़ाया — पर उँगलियाँ पत्थर में धँस गईं। जैसे दीवार ठोस नहीं, गीली मिट्टी हो। उसका संतुलन बिगड़ा और वह पीछे गिर पड़ा।

गिरते ही उसे साफ़ महसूस हुआ — किसी ने उसके टखने को पकड़ लिया है।

पकड़ इतनी ठंडी कि जैसे बर्फ।

उसने लात मारी, छूट गया। वह घिसटकर दूर हुआ। चारों तरफ देखा — जमीन पर उभरे हुए उभार, जैसे कई जगहों से मिट्टी अंदर से धकेली जा रही हो।

एक कब्र का पत्थर धीरे-धीरे एक तरफ खिसका।

मिट्टी ऊपर उठी।

उसने उठकर आख़िरी बार दौड़ लगाने की कोशिश की। लेकिन हर दिशा में वही — कब्रें, धँसी हुई ज़मीन, बदलती कतारें। साँस उखड़ चुकी थी। सीना फटने को था।

अचानक उसके सामने जमीन पूरी तरह धँस गई।

वह घुटनों के बल गिरा। नीचे खोखलापन था। जैसे खाली गड्ढा।

उसने उठने की कोशिश की, पर पीछे से जोर का खिंचाव हुआ। उसका शरीर पीछे की तरफ गिरा और आधा धँस गया। उसने मिट्टी पकड़ने की कोशिश की, पर मिट्टी मुट्ठी में रुकती नहीं थी — जैसे भीतर खिंचती जा रही हो।

कुछ ही सेकंड में उसका शरीर कमर तक जमीन में समा गया।

उसकी आँखें फैल गईं।

आख़िरी बार उसने ऊपर देखा — धुँधला चाँद, टेढ़े पेड़, और चारों तरफ मिट्टी के उभरे हुए गोल घेरे।

फिर सब शांत।

सुबह गाँव वालों ने देखा — कब्रिस्तान के बीच एक नई धँसी हुई जगह थी।

रात के अंधेरे में पुरानी कब्र के पास आधा जमीन में धँसा हुआ डरा हुआ आदमी, आसपास धुंध और टूटी कब्रें।
सुबह उसकी लाश मिली।
कोई घाव नहीं… बस धँसी हुई मिट्टी और टखनों पर काले निशान।


मोहान की लाश आधी मिट्टी के ऊपर पड़ी थी। चेहरा ऊपर, आँखें पूरी खुली। शरीर पर कोई गहरा घाव नहीं। सिर्फ टखनों के पास काली उँगलियों जैसे निशान।

पास में बिखरे जेवर मिट्टी में आधे दबे हुए थे।

और उसके चारों तरफ गीली जमीन पर दर्जनों नंगे पैरों के निशान थे — जो कुछ दूर जाकर अचानक खत्म हो जाते थे।

पुलिस ने रिपोर्ट में लिखा — “संभवतः घबराहट में गिरकर दम घुटने से मृत्यु।”

पर गाव वालो को सब पता था।

कब्रिस्तान उसे निगल गया था।

और बरसात की रातों में, उस जगह की मिट्टी अब भी  धँसती रहती है।

देवधर आणि वनदेवीचा करार

 

विदर्भाच्या टोकाला,  एक लहानसं गाव होतं — वडगाव खुर्द.

मातीची घरं, कच्चे रस्ते, उन्हाने भाजलेली शेती… आणि प्रत्येक घरात थोडंफार दु:ख.

पण त्या सगळ्या दु:खांमध्येही एक दु:ख सगळ्यांत खोल होतं —

देवधरचं.

गरीब अनाथ मुलगा देवधर जुन्या मंदिरात एकटा बसलेला
मंदिराच्या थंड दगडावर बसलेला देवधर… ज्याच्याकडे कुणीच नव्हतं


देवधर कोणाचा नव्हता.

ना आई, ना वडील, ना नातेवाईक.

तो एका पावसाळी रात्री गावाबाहेरच्या जुन्या मंदिराच्या पायऱ्यांवर सापडला होता.

कुणीतरी ठेवून गेलेलं मूल.

गावाने त्याला आसरा दिला नाही…

फक्त जगू दिलं.

लहानपणापासून तो काम करत होता.

कोणाच्या शेतात पाणी भरायचं, कोणाच्या घरात लाकूड फोडायचं, कधी जनावरं हाकायची.

काम झालं की थोडं अन्न मिळायचं.

नाहीतर उपास.

रात्री तो मंदिरात झोपायचा.

थंड दगडावर, अंगावर फाटकी चादर.

कधी कधी तो देवासमोर बसून शांतपणे रडत राहायचा.

त्याच्या रडण्याचा आवाज बाहेर येत नसे, पण त्याच्या डोळ्यात साठलेलं पाणी खूप काही सांगत असे.

त्याच्या मनात नेहमी एकच प्रश्न घुमत राहायचा —

“माझं आयुष्य असंच का आहे…?”

गावातला सर्वात श्रीमंत माणूस होता — भोसले सावकार.

एके रात्री त्याच्या घरात चोरी झाली.

सोनं, रोकड, सगळं गायब.

गावात खळबळ उडाली.

लोक जमले. चर्चा सुरू झाली.

आणि मग कुणीतरी म्हणालं —

“काल रात्री देवधर सावकाराच्या घराजवळ दिसला होता.”

ते खरं होतं.

देवधर तिथे गेला होता…

कारण त्याला दोन दिवसांपासून काही खायला मिळालं नव्हतं.

तो मागच्या दारातून उरलेलं अन्न मिळतं का ते पाहायला गेला होता.

पण त्या क्षणाला…

त्याच्या भुकेचा अर्थ कोणी समजून घेतला नाही.

लोकांनी एकच गोष्ट ठरवली —

“चोरी त्यानेच केली आहे.”

त्याला ओढून आणलं गेलं.

लोकांनी मारायला सुरुवात केली.

तो ओरडत होता…

“मी नाही केलं… मी नाही केलं…”

पण त्या वेळी सत्याला किंमत नव्हती.

रात्र वाढत गेली…


त्या रात्री, जखमी अवस्थेत, देवधर कसाबसा सुटला.

तो पळत राहिला.

रस्ता दिसत नव्हता, दिशा कळत नव्हती, पण तो थांबला नाही.

त्याच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहत होते, श्वास तुटत होता, शरीर दुखत होतं…

पण त्याच्या मनात एकच गोष्ट होती —

“इथून दूर जायचं आहे…”

आणि तो शिरला…

चिखलवाडीच्या जंगलात.


रात्र गडद झाली होती.

जंगलात अंधार इतका होता की हातासमोर हात दिसत नव्हता.

थंड वारा झाडांच्या फांद्यांमधून फिरत होता.

कुठेतरी दूर पानं हलल्याचा आवाज येत होता… पण तो आवाज नैसर्गिक वाटत नव्हता.

देवधर एका मोठ्या झाडाखाली थांबला.

त्याच्या अंगावर थंडी वाजत होती.

शरीर थकून गेलं होतं.

तो खाली बसला… आणि शांतपणे रडू लागला.

त्याच्या रडण्याचा आवाज हळूहळू जंगलात पसरला… आणि मग पुन्हा सगळीकडे शांतता पसरली.

काही वेळाने तो उठला.

त्याने झाडाची एक मजबूत फांदी पाहिली.

त्याने कापडाचा तुकडा काढला, फांदीला बांधला, आणि गाठ घट्ट केली.

तो त्या फासाखाली उभा राहिला.

डोळे बंद केले.

अंधाऱ्या जंगलात झाडातून प्रकट होणारी वनदेवी आणि घाबरलेला देवधर
त्या रात्री जंगलात काहीतरी जागं झालं… आणि देवधरचं आयुष्य कायमचं बदललं


अचानक…

वारा थांबला.

जंगलातली प्रत्येक हालचाल थांबली.

पानांचा आवाज बंद झाला.

हवा जड झाली… आणि सगळीकडे एक भयानक शांतता पसरली.

देवधरने डोळे उघडले.

झाडाच्या खोडावरून सावल्या सरकायला लागल्या.

त्या सावल्या एकत्र आल्या… आणि हळूहळू एक आकृती तयार झाली.

ती उभी होती.

पांढरट त्वचा…

लांब केस…

डोळे खोल… पण चमकणारे.

देवधर घाबरून मागे सरकला.

ती आकृती त्याच्याकडे स्थिर नजरेने पाहत होती.

जंगल तिच्या उपस्थितीत वेगळं वाटत होतं —

जणू प्रत्येक झाड, प्रत्येक पान तिचं ऐकत होतं.

ती हळू आवाजात बोलली —

“मरायला आला आहेस का…?”

तिचा आवाज वाऱ्यासारखा नव्हता…

तो जणू थेट मनात घुमत होता.

देवधर काही बोलू शकला नाही.

ती पुढे आली.

“तुला आयुष्य नकोय ...असं नाही…

तुला असं आयुष्य नकोय…”

देवधरच्या डोळ्यातून अश्रू ओघळले.


ती म्हणाली —

“मी तुला सगळं देऊ शकते…

संपत्ती, नाव, मान…

पण बदल्यात तुला काहीतरी द्यावं लागेल.”

देवधर थरथरत होता.

तो हळू आवाजात म्हणाला —

“काय…?”

वनदेवीच्या चेहऱ्यावर हलकं स्मित आलं.

“दर वर्षी एक रात्र…

तुला परत इथे यावं लागेल…

आणि जंगलाला त्याचं हवं ते द्यावं लागेल.”

त्या वाक्यानंतर काही क्षण पूर्ण शांतता पसरली.

देवधरच्या मनात भीती होती…

पण त्याच्या भुकेपेक्षा, अपमानापेक्षा ती भीती छोटी होती.

त्याने डोळे बंद केले.

“मंजूर आहे.”


त्या क्षणी जमीन हलली.

झाडांच्या मुळांनी जणू त्याला स्पर्श केला.

वनदेवीने त्याच्या कपाळावर हात ठेवला.

तो स्पर्श थंड, खोल आणि अस्वस्थ करणारा होता.

आणि मग सगळं काळोखात गेलं.


सकाळी…

देवधर गावाच्या रस्त्यावर पडलेला होता.

त्याच्या हातात एक पिशवी होती.

त्याने ती उघडली.

सोनं होतं.

खरं.

भरपूर.


काही वर्षांत…

वडगाव खुर्द बदललं.

रस्ते झाले.

शाळा उभ्या राहिल्या.

पाण्याची सोय झाली.

आणि त्या सगळ्याच्या मागे एक नाव होतं —

देवधर सेठ.

लोकांच्या नजरेत —

देवधर आता दानवीर होता.

तो गरीबांना मदत करत होता.

अनाथांना आश्रय देत होता.

पण…

त्याच्या चेहऱ्यावर कधीच पूर्ण आनंद दिसत नव्हता.

दर वर्षी एक रात्र…

तो गायब व्हायचा.

एकदा…

गावातला एक माणूस, शंकर, त्याचा पाठलाग करत जंगलात गेला.

त्या रात्री जंगलातून काहीतरी ओढल्याचा आवाज येत होता.

जणू एखाद्या जड वस्तूला जमिनीवरून खेचत नेलं जात होतं.

त्यासोबत कुणाचातरी दाबलेला ओरडण्याचा आवाजही ऐकू येत होता… आणि मग हळूहळू सगळीकडे पुन्हा शांतता पसरली.

शंकर परत आला नाही.

श्रीमंत झालेला देवधर गावात लोकांच्या आदराने उभा
ज्याला कधी काही नव्हतं… तोच आज सगळ्यांसाठी आधार बनला


दुसऱ्या दिवशी…

देवधर परत गावात आला.

नेहमीसारखा शांत..

दान करत राहिला.

पण आता काही लोक हळू आवाजात म्हणत —

“तो जे देतो… त्याच्या बदल्यात काहीतरी घेतलं जातं…”

आणि चिखलवाडीचं जंगल अजूनही तिथेच आहे.

जिथे कधी कधी…

रात्री…

काहीतरी ओढल्याचा आवाज येत राहतो.


“नीले पानी के नीचे”

 


समंदर उस रात बिल्कुल शांत था।

इतना शांत कि उसकी खामोशी सुनाई दे रही थी।

राघव अपनी लकड़ी की नाव में बैठा दूर तक निकल आया था।

उसके पास जाल था, एक पुराना लालटेन, और एक छोटा सा बैग।

लेकिन आज वो मछली पकड़ने नहीं आया था।

आज वो बस भागकर आया था…

खुद से।

दिनभर लोगों के बीच रहने के बाद भी उसके अंदर एक खालीपन था, जो हर रात और गहरा हो जाता था।

घर में दीवारें उसे घूरती थीं… और नींद आते-आते कोई पुरानी याद उसे जगा देती थी।

समंदर उसे हमेशा सुकून देता था।

जैसे उसकी हर बात सुनता हो… बिना जवाब दिए।

रात में समंदर के बीच अकेला मछुआरा नाव चलाते हुए, शांत पानी और चांदनी का दृश्य
एक शांत रात… और एक अकेला आदमी, जो समंदर की गहराई में अपने आप से मिलने निकला है।


नाव लहरों के साथ धीरे-धीरे झूल रही थी।

राघव ने आसमान की तरफ देखा — आसमान आधा चाँद था ।

उसने लालटेन जलाई और जाल तैयार करने लगा।

सब कुछ सामान्य था।

बहुत साधारण।

बहुत शांत।

कुछ देर बाद उसने जाल पानी में डाल दिया।

रस्सी उसके हाथ में थी… और वो धीरे-धीरे खिंचाव महसूस कर रहा था।

लहरों का, पानी का… वही पुराना, जाना-पहचाना एहसास।

वो चुपचाप बैठा रहा।

समय का अंदाजा खत्म हो गया था।

सिर्फ पानी…

और उसकी सांसों की आवाज।

फिर…

रस्सी थोड़ी भारी लगने लगी।

राघव ने ध्यान दिया।

“कुछ फँसा है…” उसने सोचा।

उसने धीरे-धीरे रस्सी खींचनी शुरू की।

वजन बढ़ता जा रहा था।

पर ये मछलियों जैसा नहीं था।

कोई झटका नहीं…

कोई हलचल नहीं…

बस एक अजीब सा, स्थिर वजन।

जैसे कुछ खुद से ऊपर आना नहीं चाहता।

राघव ने जोर लगाया।

रस्सी गीली होकर उसके हाथों में फिसल रही थी।

आखिरकार जाल पानी के ऊपर आने लगा।

और जैसे ही जाल पूरी तरह बाहर आया…

राघव रुक गया।

जाल में मछलियां नहीं थीं।

बस…

एक पुरानी, फटी हुई कपड़े की गठरी।

काले, गीले कपड़े में लिपटी हुई।

उसने कुछ पल उसे देखा।

फिर धीरे से उसे नाव में खींच लिया।

गठरी भारी थी।

और ठंडी।

अजीब तरह से ठंडी।

जैसे उसमें से ठंड निकल रही हो।

राघव ने झुककर उसे खोला।

अंदर…

कुछ नहीं था।

बस गीला कपड़ा।

उसने भौंहें सिकोड़ लीं।

“इतना वजन… सिर्फ कपड़ा?”

उसे समझ नहीं आया।

उसने कपड़े को किनारे फेंक दिया।

मछुआरा रात में नाव से जाल खींचते हुए, जाल में कुछ रहस्यमयी फंसा हुआ
जब साधारण शिकार की जगह कुछ अजीब फंस जाए… तभी असली डर शुरू होता है।

राघव ने फिर से जाल डाल दिया…

पर अब उसका ध्यान बार-बार पीछे जा रहा था — उस फटे कपड़े की तरफ।

कुछ मिनट बीते।

फिर अचानक—

रस्सी फिर से भारी हो गई।

इस बार और ज्यादा।

राघव चौंका।

“इतनी जल्दी?” उसने सोचा।

उसने तुरंत खींचना शुरू किया।

वजन इस बार बहुत ज्यादा था।

उसकी सांस तेज हो गई।

माथे पर पसीना आ गया।

जैसे वो कुछ बड़ा खींच रहा हो।

बहुत बड़ा।

जाल धीरे-धीरे पानी से बाहर आया।

राघव की नजर जाल पर गई…

और उसकी सांस अटक गई।

जाल मे कुछ था।

कुछ ऐसा… जो हिल नहीं रहा था।

जो खुद को छिपा रहा था।

जाल पूरी तरह बाहर आया।

और राघव ने देखा—

एक इंसानी हाथ।

सफेद… सूजा हुआ… पानी में सड़ा हुआ।

उसकी उंगलियां जाल में उलझी हुई थीं।

राघव पीछे हट गया।

उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे खुद सुनाई दे रहा था।

“ये… ये क्या है…”

उसकी आवाज निकल नहीं रही थी।

और तभी…

उस हाथ की उंगलियां हल्की सी हिलीं।

बहुत धीरे।

राघव जम गया।

उसने अपनी आंखों पर जोर दिया —

“नहीं… ये नहीं हो सकता…”

पर वो हुआ।

उंगलियां फिर हिलीं।

इस बार थोड़ा ज्यादा।

अचानक—

जाल के अंदर से पूरा शरीर हिला।

पानी टपकता हुआ…

धीरे-धीरे उठता हुआ…

एक चेहरा।

गीला।

सूजा हुआ।

आंखें बंद।

राघव पीछे सरक गया।

नाव डगमगाने लगी।

और फिर…

उसकी आंखें खुलीं।

पूरी सफेद।

कोई पुतली नहीं।

बस सफेद।

राघव की सांस रुक गई।

वो कुछ बोल नहीं पाया।

बस देखता रहा।

जैसे शरीर ने काम करना बंद कर दिया हो।

वो चीज़ धीरे-धीरे जाल से खुद को निकालने लगी।

उसकी हर हरकत के साथ पानी की बूंदें गिर रही थीं।

और फिर…

वो नाव के अंदर आ गया।

राघव पीछे हटता गया…

जब तक कि उसकी पीठ नाव की किनारी से नहीं लग गई।


अब कहीं जाने की जगह नहीं थी।

वो चीज़ उसके सामने खड़ी थी।…

बस खामोशीसे।

फिर उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया।

और बहुत धीरे, बहुत गहरी आवाज में कहा—

“तू… ऊपर क्यों आया…”

राघव का दिमाग सुन्न हो गया।

“मैं… मैं तो…”

वो बोल नहीं पाया।

और तभी—

नाव के नीचे कुछ टकराया।

जोर से।

धड़ाम!

पूरा नाव हिल गया।

राघव गिर पड़ा।

उसने नीचे झांककर देखा—

और उसका खून जम गया।

पानी के अंदर…

दर्जनों चेहरे।

सब उसी जैसे।

सफेद आंखें।

खुले हुए मुंह।

और वो सब ऊपर देख रहे थे।

सीधे उसकी तरफ।

अचानक—

सारे हाथ ऊपर उठे।

और नाव को पकड़ लिया।

समंदर से निकलते हाथ नाव को नीचे खींचते हुए, डरा हुआ आदमी नाव में
कभी-कभी समंदर सिर्फ पानी नहीं होता… उसके नीचे कुछ और भी जिंदा होता है।


राघव चिल्लाया।

पर आवाज गले में ही अटक गई।

नाव धीरे-धीरे नीचे जाने लगी।

वो चीज़ जो नाव पर था…

अब उसके बिल्कुल पास झुका।

उसकी सांस ठंडी थी।

और उसने फुसफुसाया—

“नीचे… सब खाली है…”

अगले ही पल—

नाव पानी के अंदर खिंच गई।

सब कुछ अंधेरा।

शांत।

खामोश।

सुबह…

समंदर वैसे ही शांत था।

जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

बस पानी के नीचे…

थोड़ा और गहराई में…

अब एक और चेहरा था।

सफेद आंखों वाला।

स्थिर।

ऊपर देखता हुआ।

इंतज़ार करता हुआ।