कुछ मौतें अचानक नहीं आतीं... उनके आने से पहले कोई हमारे आसपास चलने लगता है।
रात के करीब साढ़े दस बजे थे।
पहाड़ी रास्ते पर चलती जीप की हेडलाइट्स के सामने धुंध की एक मोटी परत तैर रही थी। सड़क इतनी संकरी थी कि एक तरफ पहाड़ की काली चट्टानें थीं और दूसरी तरफ गहरी खाई। कहीं-कहीं पेड़ों की सूखी डालियाँ सड़क के ऊपर इस तरह झुकी थीं, जैसे किसी ने जानबूझकर रास्ता रोक रखा हो।
जीप में बैठे निखिल सावंत ने मोबाइल की स्क्रीन देखी।
नेटवर्क गायब था।
पिछले पैंतालीस मिनट से उसे एक भी गाड़ी नहीं मिली थी। ड्राइवर ने भी रास्ते में बातचीत करना बंद कर दिया था। बस इंजन की घरघराहट और टायरों के नीचे कुचलते पत्थरों की आवाज सुनाई दे रही थी।
निखिल को अगले दिन सुबह एक सरकारी सर्वे के सिलसिले में देवकुंड नाम की जगह पहुंचना था। पहाड़ियों के बीच बसा वह छोटा-सा इलाका उसके लिए बिल्कुल अनजान था। मुख्य सड़क पर भूस्खलन होने के कारण ड्राइवर ने यह पुराना रास्ता चुना था।
अचानक जीप की गति धीमी हो गई।
सामने सड़क के बीचोंबीच कोई खड़ा था।
सफेद कपड़े पहने एक आदमी।
उसका चेहरा हेडलाइट्स की रोशनी में साफ दिखाई नहीं दे रहा था। वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था। न हाथ हिला रहा था, न रास्ते से हट रहा था।
ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए।
निखिल ने शीशे से बाहर देखा।
आदमी के दोनों पैर सड़क पर थे, लेकिन उसका शरीर थोड़ा झुका हुआ था। जैसे वह बहुत देर से किसी का इंतजार कर रहा हो।
ड्राइवर ने हॉर्न बजाया।
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
दूसरी बार हॉर्न बजा।
इस बार उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
और निखिल के शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई।
उस आदमी का चेहरा नहीं था।
सिर्फ एक काली, गहरी जगह थी, जहां चेहरा होना चाहिए था।
निखिल ने तुरंत ड्राइवर की तरफ देखा।
लेकिन ड्राइवर अपनी सीट पर नहीं था।
वह जीप से बाहर खड़ा था।
निखिल को समझ नहीं आया कि वह कब उतरा।
वह कुछ बोल पाता, उससे पहले ड्राइवर ने सड़क के उस पार इशारा किया।
वहां एक पुराना पत्थर का मील का पत्थर था।
उस पर लिखा था—
देवकुंड – 12 किलोमीटर
और उसके ठीक नीचे लाल रंग से कुछ लिखा था।
वापस चले जाओ।
निखिल ने दोबारा सड़क की तरफ देखा।
वह सफेद कपड़ों वाला आदमी गायब था।
लेकिन अब जीप की पिछली सीट पर कोई बैठा था।
निखिल ने गर्दन घुमाई।
एक बूढ़ा आदमी।
उसके कपड़े भीगे हुए थे। सिर नीचे झुका था और दोनों हाथ घुटनों पर रखे थे।
निखिल के मुंह से आवाज तक नहीं निकली।
बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी आंखें खुली थीं, लेकिन उनमें पुतलियां नहीं थीं।
फिर उसने निखिल की तरफ देखकर कहा—
"तुम्हें इतनी देर नहीं करनी चाहिए थी।"
अगले ही पल जीप के अंदर की सारी लाइटें बुझ गईं।
और किसी ने निखिल के कान के बिल्कुल पास फुसफुसाया—
"अब तुम्हारी बारी है।"
सुबह करीब चार बजे निखिल की आंख खुली।
वह एक पुराने लकड़ी के बिस्तर पर लेटा था।
कमरे में सीलन की गंध थी। छत पर लकड़ी की काली बल्लियां थीं और खिड़की के बाहर देवदार जैसे ऊंचे पेड़ हवा के बिना भी धीरे-धीरे हिल रहे थे।
उसका सिर भारी था।
कुछ देर तक उसे पिछली रात की घटनाएं याद नहीं आईं। फिर अचानक सफेद कपड़ों वाला आदमी, खाली चेहरा और पिछली सीट पर बैठा बूढ़ा उसकी आंखों के सामने घूम गए।
वह झटके से उठ बैठा।
उसके जूते कमरे के दरवाजे के पास रखे थे। मोबाइल मेज पर पड़ा था। स्क्रीन टूटी हुई थी।
समय सुबह 4:17।
उसने कमरे का दरवाजा खोला।
बाहर एक लंबा बरामदा था। लकड़ी का फर्श जगह-जगह से उखड़ा हुआ था। बरामदे के आखिर में एक पीली रोशनी वाला बल्ब जल रहा था।
वह बाहर निकला।
मुख्य दरवाजे के पास एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था। उसके सामने पुरानी रजिस्टर बुक खुली थी।
निखिल ने पूछा कि वह यहां कैसे पहुंचा।
आदमी ने बिना उसकी तरफ देखे रजिस्टर का पन्ना पलटा।
"रात को लाए थे आपको।"
"कौन लाया था?"
आदमी ने कुछ क्षण उसे देखा।
"आप अकेले आए थे।"
निखिल ने उसे पिछली रात की जीप और ड्राइवर के बारे में बताया।
उस आदमी के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।
उसने सिर्फ रजिस्टर बंद किया और कहा—
"आपका कमरा नंबर सात है। नाश्ता आठ बजे मिलेगा।"
निखिल ने कमरे की चाबी देखी।
उस पर नंबर सात लिखा था।
लेकिन उसके हाथ में जो चाबी थी, उस पर नंबर नौ खुदा हुआ था।
उसने कुछ कहने के लिए सिर उठाया।
आदमी वहां नहीं था।
रजिस्टर मेज पर खुला पड़ा था।
निखिल ने अनायास उसके पन्ने पर नजर डाली।
आखिरी दर्ज नाम के नीचे उसकी अपनी लिखावट में कुछ लिखा था।
निखिल सावंत — आगमन: 2 अक्टूबर।
आज 3 अक्टूबर थी।
उसने कल रात इस जगह कदम भी नहीं रखा था।
फिर रजिस्टर में उसकी एंट्री किसने की?
और सबसे अजीब बात...
उसके नाम के आगे प्रस्थान की तारीख भी लिखी थी।
3 अक्टूबर।
---
दिन निकलने के बाद निखिल ने खुद को समझाया कि रात की थकान, अंधेरा और पहाड़ी रास्ते की घटनाओं ने उसके दिमाग पर असर डाला होगा।
उसने अपना काम शुरू किया।
देवकुंड में उसे एक पुराने जलाशय और उसके आसपास की जमीन का सर्वे करना था। वहां पहुंचने के लिए विश्रामगृह से लगभग दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
दिनभर काम करने के बाद वह शाम को लौटा।
उसका कमरा नंबर सात था।
दरवाजा खोलते ही उसे कुछ अलग महसूस हुआ।
कमरे की खिड़की अंदर से बंद थी, जबकि सुबह उसने उसे खुला छोड़ा था।
मेज पर रखा पानी का गिलास खाली था।
और बिस्तर की चादर पर किसी के गीले पैरों के निशान थे।
वे निशान दरवाजे से शुरू नहीं होते थे।
वे सीधे कमरे की पिछली दीवार से निकलते थे।
दीवार तक जाते थे।
और वहीं खत्म हो जाते थे।
निखिल कुछ देर उन्हें देखता रहा।
फिर उसने दीवार पर हाथ रखा।
दीवार ठंडी थी।
असामान्य रूप से ठंडी।
रात के खाने के बाद वह सोने की कोशिश करने लगा। बाहर घना अंधेरा था। दूर कहीं किसी जानवर की आवाज सुनाई दे रही थी।
करीब ग्यारह बजे उसकी नींद खुली।
दरवाजे के बाहर किसी के चलने की आवाज आ रही थी।
धीमे कदम।
एक... दो... तीन...
फिर सन्नाटा।
कुछ देर बाद वही कदम दोबारा सुनाई दिए।
इस बार वे दरवाजे के बिल्कुल पास आकर रुक गए।
निखिल ने सांस रोक ली।
दरवाजे के नीचे की पतली जगह से उसे बाहर की रोशनी दिखाई दे रही थी।
उस रोशनी में किसी के पैरों की परछाईं थी।
नंगे पैर।
लेकिन उन पैरों की उंगलियां उल्टी दिशा में थीं।
निखिल का गला सूख गया।
कुछ सेकंड बाद दरवाजे पर तीन हल्की चोटें पड़ीं।
टक...
टक...
टक...
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
चौथी चोट नहीं पड़ी।
इसके बजाय दरवाजे के दूसरी तरफ से उसकी अपनी आवाज सुनाई दी।
"निखिल... दरवाजा खोल।"
वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।
उसी का लहजा।
उसी की सांस लेने का तरीका।
फिर बाहर खड़े व्यक्ति ने धीरे से कहा—
"मैं अंदर हूं... तू बाहर क्यों खड़ा है?"
निखिल बिस्तर से पीछे हट गया।
उसने देखा कि कमरे के कोने में रखे आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई नहीं दे रहा था।
आईने में बिस्तर खाली था।
और दरवाजे के पास एक दूसरा निखिल खड़ा था।
उसका चेहरा दीवार की तरफ था।
लेकिन उसके प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
और मुस्कुराया।
---
अगली सुबह निखिल ने विश्रामगृह छोड़ने का फैसला किया।
लेकिन बाहर निकलते ही उसे पता चला कि रात में भारी बारिश हुई थी। पहाड़ी रास्ते पर मिट्टी और पत्थर गिरने से रास्ता बंद था।
मोबाइल में अब भी नेटवर्क नहीं था।
वह मुख्य कार्यालय में गया और वहां बैठे आदमी से रास्ता खुलने के बारे में पूछा।
आदमी ने बिना कोई जवाब दिए एक पुरानी तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी।
तस्वीर में यही विश्रामगृह था।
लेकिन वह नया बना हुआ दिखाई दे रहा था।
तस्वीर के नीचे साल लिखा था—1989।
निखिल ने तस्वीर पलटी।
पीछे कुछ नाम लिखे थे।
एक नाम पर उसकी नजर रुक गई।
विजय सावंत।
उसे अपने पिता का नाम याद आया।
उसके पिता का नाम विजय था।
निखिल ने पूछा कि तस्वीर में यह कौन है।
आदमी ने तस्वीर वापस ले ली।
"पुराना कर्मचारी था।"
"अब कहां है?"
"यहीं कहीं होगा।"
निखिल को उसका जवाब अजीब लगा।
उसने पूछा कि क्या यहां कोई पुराना रिकॉर्ड रूम है।
आदमी ने बरामदे के आखिरी हिस्से की तरफ इशारा किया।
वहां एक छोटा-सा दरवाजा था, जो बाहर से जंग लगे ताले से बंद था।
निखिल ने ताला हटाया।
अंदर पुराने कागजों, फाइलों और टूटे फर्नीचर का ढेर था।
धूल की मोटी परत के बीच उसे एक रजिस्टर मिला।
उसने पन्ने पलटने शुरू किए।
1989 की एक घटना का विवरण दर्ज था।
उस वर्ष भारी बारिश के दौरान विश्रामगृह में आग लग गई थी। उस रात वहां ठहरे सात लोगों में से छह की मौत हो गई थी।
सातवें व्यक्ति का कोई पता नहीं चला।
उसका नाम था—
विजय सावंत।
निखिल के हाथ कांपने लगे।
उसके पिता की मृत्यु तब हुई थी जब निखिल सिर्फ पांच साल का था।
परिवार को बताया गया था कि उनकी मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई थी।
उसने रजिस्टर के अगले पन्ने पलटे।
वहां कुछ और लिखा था।
आग लगने के बाद विश्रामगृह की मरम्मत कराई गई थी। पुराने कमरे बंद कर दिए गए थे।
कमरा नंबर सात हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।
निखिल ने रजिस्टर से सिर उठाया।
उसकी सांस रुक गई।
वह जिस कमरे में तीन रातों से रह रहा था...
उसका नंबर सात था।
उस रात बारिश फिर शुरू हो गई।
निखिल ने अपने सारे सामान बैग में रख लिए। रास्ता खुलने तक वह किसी तरह जागकर समय बिताना चाहता था।
करीब बारह बजे बिजली चली गई।
उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
उसी वक्त बरामदे से लकड़ी के फर्श पर घिसटते हुए किसी भारी चीज की आवाज आई।
वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास पहुंचा।
बाहर कोई दिखाई नहीं दिया।
लेकिन बरामदे के अंत में एक दरवाजा खुला हुआ था।
वह दरवाजा सुबह वहां नहीं था।
उसने टॉर्च की रोशनी उस तरफ की।
अंदर सीढ़ियां नीचे की ओर जा रही थीं।
दीवारों पर काले धब्बे थे। हवा में जले हुए लकड़ी और पुराने कपड़ों की गंध थी।
निखिल को नहीं पता कि उसे नीचे जाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।
शायद उस तस्वीर और अपने पिता के नाम ने उसे बेचैन कर दिया था।
वह सीढ़ियां उतरने लगा।
नीचे एक बड़ा कमरा था।
कमरे में सात लोहे के बिस्तर लगे थे।
छह पर जले हुए कंबल पड़े थे।
सातवें बिस्तर पर कोई बैठा था।
एक आदमी।
उसका चेहरा जला हुआ था। हाथों की त्वचा काली पड़ चुकी थी। लेकिन उसकी आंखें बिल्कुल साफ थीं।
निखिल ने टॉर्च नीचे कर ली।
वह आदमी धीरे से खड़ा हुआ।
उसके होंठ हिले।
"बहुत देर कर दी बेटा।"
निखिल के हाथ से मोबाइल गिर गया।
वह आवाज...
वह आवाज उसके पिता की थी।
उसके पिता ने उसे आखिरी बार पांच साल की उम्र में गोद में उठाया था। उसके बाद बस तस्वीरों में ही देखा था।
लेकिन यह आवाज उसके बचपन की यादों में आज भी मौजूद थी।
निखिल की आंखों में आंसू आ गए।
उसने कांपते हुए पूछा—
"आप... यहां कैसे?"
आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने कमरे के कोने में रखे एक पुराने लकड़ी के संदूक की तरफ इशारा किया।
निखिल ने उसे खोला।
अंदर एक छोटी डायरी थी।
पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।
वह पढ़ने लगा।
उसमें लिखा था कि आग लगने वाली रात सात लोग इस कमरे में बंद हो गए थे। दरवाजा बाहर से बंद था। आग तेजी से फैल रही थी।
छह लोग वहीं मर गए।
लेकिन विजय बाहर निकल आया था।
वह बच गया था।
उसने कई वर्षों तक इस घटना को अपने भीतर दबाए रखा।
डायरी का आखिरी पन्ना अधूरा था।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"उस रात कमरे में सात लोग नहीं थे। आठवां पहले से मौजूद था।"
निखिल ने डायरी से नजर उठाई।
सामने बिस्तर खाली था।
उसके पिता गायब थे।
और कमरे के छह जले हुए बिस्तरों पर अब छह लोग बैठे थे।
सभी के चेहरे उसकी तरफ थे।
उनमें से एक ने धीरे से हाथ उठाया।
वह ड्राइवर था।
वही ड्राइवर जो उसे पहली रात पहाड़ी रास्ते पर मिला था।
उसके पीछे सफेद कपड़ों वाला चेहराविहीन आदमी खड़ा था।
निखिल पीछे हटने लगा।
तभी कमरे के एकदम पीछे से उसके पिता की आवाज आई।
"निखिल, भाग!"
वह मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।
पीछे से किसी के दौड़ने की आवाज आने लगी।
तेज।
बहुत तेज।
उसने सीढ़ियां चढ़कर बरामदे में कदम रखा।
और सामने देखा।
वही अधेड़ उम्र का कर्मचारी खड़ा था।
उसके हाथ में रजिस्टर था।
उसने रजिस्टर खोला।
निखिल की आंखें उस पन्ने पर टिक गईं।
उसके नाम के सामने प्रस्थान की तारीख थी।
3 अक्टूबर।
और समय था—
रात 12:00 बजे।
जबकि मोबाइल में अभी 11:58 हो रहे थे।
कर्मचारी ने सिर उठाया।
"दो मिनट बाकी हैं।"
निखिल ने दरवाजे की तरफ दौड़ लगाई।
दरवाजा खुला।
बाहर बारिश नहीं थी।
बाहर वही पहाड़ी सड़क थी।
वही जीप खड़ी थी।
और उसके पास वही ड्राइवर।
निखिल दौड़कर जीप तक पहुंचा।
ड्राइवर ने पिछला दरवाजा खोला।
"बैठिए साहब।"
निखिल ने बिना सोचे अंदर कदम रखा।
तभी उसकी नजर सामने लगे रियर-व्यू मिरर पर पड़ी।
ड्राइवर की सीट खाली थी।
लेकिन जीप चल रही थी।
और पीछे की सीट पर...
वह खुद बैठा था।
उसके ठीक बगल में सफेद कपड़ों वाला चेहराविहीन आदमी था।
निखिल ने चीखने की कोशिश की।
उसकी आवाज नहीं निकली।
जीप की हेडलाइट्स बुझ गईं।
अगली सुबह देवकुंड के पुराने विश्रामगृह में एक सफाई कर्मचारी पहुंचा।
मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।
अंदर सब कुछ अपनी जगह पर था।
कमरा नंबर सात के बाहर एक बैग रखा था।
मेज पर मोबाइल पड़ा था।
उसकी स्क्रीन पर एक अधूरी रिकॉर्डिंग चल रही थी।
रिकॉर्डिंग में पहले बारिश की आवाज थी।
फिर किसी के कदमों की।
और आखिर में एक आदमी की फुसफुसाहट—
"पापा... दरवाजा खोलो..."
सफाई कर्मचारी ने मोबाइल बंद कर दिया।
उसे लगा कोई पर्यटक अपना सामान भूल गया होगा।
वह रजिस्टर उठाकर कार्यालय में रख आया।
रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर एक नई एंट्री थी।
निखिल सावंत।
आगमन: 2 अक्टूबर।
प्रस्थान: 3 अक्टूबर।
लेकिन इस बार एक अतिरिक्त टिप्पणी भी थी।
साथ में एक अन्य व्यक्ति आया है।
नाम के आगे कोई अक्षर नहीं था।
सिर्फ एक खाली जगह।
सफाई कर्मचारी ने रजिस्टर बंद किया।
तभी विश्रामगृह के बंद कमरे नंबर सात के अंदर से तीन बार दस्तक सुनाई दी।
टक...
टक...
टक...
और फिर किसी ने अंदर से कहा—
"पापा... इस बार मुझे अकेला मत छोड़ना।"
उसी क्षण रजिस्टर का आखिरी पन्ना अपने आप पलट गया।
उस पर एक नई तारीख उभर रही थी।
4 अक्टूबर।
आगमन का समय: रात 10:30।
नाम: विजय परब।
और उसके नीचे...
प्रस्थान की तारीख खाली थी।
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कुछ जगहों पर लोग रहने नहीं आते... वे बस अपनी बारी का इंतजार करते हैं।




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