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| कभी-कभी जो दिखता है, वो उसी समय नहीं होता |
भोपाल में रहने वाला अविनाश एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था।
उसकी पत्नी नीलिमा और दो बच्चे थे।
ज़िंदगी सीधी-सादी थी।
सुबह ऑफिस, शाम घर, बच्चों की पढ़ाई, कभी-कभी बाहर घूमना — बस यही दिनचर्या थी।
एक दिन नीलिमा ने उसे याद दिलाया कि उसके मामा के लड़के की शादी है और सबको जाना है।
शादी शहर से बाहर, दूसरे जिले में थी।
अविनाश पहले जाने के मूड में नहीं था, लेकिन बच्चों की जिद और घर वालों के कहने पर उसने छुट्टी ले ली।
दो दिन बाद सुबह वे लोग कार से निकल पड़े।
रास्ता लंबा था, इसलिए अविनाश धीरे-धीरे गाड़ी चला रहा था।
बच्चे पीछे बैठे आपस में बात कर रहे थे और नीलिमा रास्ते का ध्यान रख रही थी।
करीब दो घंटे बाद आगे सड़क पर गाड़ियों की रफ्तार धीमी हो गई।
कुछ लोग सड़क किनारे खड़े थे।
अविनाश ने भी गाड़ी धीमी कर दी।
सड़क के किनारे एक बाइक पड़ी थी और थोड़ा आगे एक आदमी जमीन पर पड़ा था।
दो-तीन लोग उसके पास खड़े थे।
किसी ने कहा —
“ accident अभी-अभी हुआ है… शायद ये बचा नहीं…”
अविनाश ने बस एक नज़र देखा और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
नीलिमा ने भी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
रास्ते में ऐसे हादसे कभी-कभी दिख ही जाते हैं, इसलिए वह आगे बढ़ गये।
शाम तक वे लोग शादी वाले घर पहुँच गए।
वहाँ कुछ रिश्तेदार पहले से आए हुए थे।
सबसे मिलना-जुलना हुआ,
अगले दिन शादी का काम निपटा के।
वे लोग ज़्यादा देर नहीं रुके और
दोपहर के बाद वापस निकल गए।
रात तक वे लोग भोपाल वापस आ गए।
अगले दिन से वही उनकी रोज़ की ज़िंदगी शुरू हो गई।
अविनाश ऑफिस जाने लगा।
बच्चे का स्कूल।
नीलिमा घर के काम में लग गई।
दो दिन ऐसे ही निकल गए।
तीसरे दिन शाम को अविनाश ऑफिस से घर लौट रहा था।
एक चौराहे पर सिग्नल लाल हुआ तो उसने गाड़ी रोक दी।
उसी समय एक आदमी सड़क पार कर रहा था।
अविनाश की नज़र उस पर गई…
और वहीं टिक गई।
दिल एकदम से तेज धड़कने लगा।
वह आदमी…
उसी जैसा लग रहा था…
जिसे उसने रास्ते में मरा हुआ देखा था।
अविनाश ने ध्यान से देखा।
वही चेहरा…
वही आँखें…
वही उम्र…
सिग्नल हरा हुआ तो पीछे से हॉर्न बजा।
अविनाश ने गाड़ी आगे बढ़ा दी, लेकिन उसका मन वहीं अटका रहा।
घर पहुँचकर भी वह बार-बार उसी के बारे में सोचता रहा।
रात को उसने नीलिमा से कहा —
“मुझे आज वो आदमी दिखा… रास्ते वाला…”
नीलिमा ने कहा —
“कौन आदमी?”
“जिसका एक्सीडेंट हुआ था…”
नीलिमा ने हल्के से कहा —
“अरे… तुम्हें लगा होगा। ऐसे बहुत लोग होते हैं।”
अविनाश ने भी बात फिर वहीं छोड़ दी, लेकिन उसके मन में अब एक अजीब सा डर बैठ गया था।
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| जिसे मरते देखा था, वही सामने चल रहा था |
दो दिन बाद अविनाश बाज़ार गया था।
और भीड़ में चलते-चलते अचानक उसे सामने फिर वही आदमी दिखा।
इस बार वह किसी से बात कर रहा था।
अविनाश वहीं रुक गया।
वह परेशान हो गया,
अगर ये वही है… तो फिर उस दिन रास्ते पर मरा कौन था?
उसने पास जाने की कोशिश की।
लेकिन तभी भीड़ बढ़ी…
और वह आदमी दिखाई देना बंद हो गया।
अविनाश का मन अब बेचैन रहने लगा।
उसे लगने लगा कि शायद उसने उस दिन ठीक से देखा ही नहीं था।
या शायद…
कोई और बात है।
कुछ हफ्ते बाद
ऑफिस का उसे कुछ काम आया।
उसे उसी जिले में जाना था जहाँ वह शादी में गया था।
फाइल देखते ही उसे वही रास्ता याद आ गया।
वही हाईवे…
वही जगह…
वही हादसा…
उसने एक पल सोचा कि किसी और को भेज दे,
लेकिन काम जरूरी था।
उसे खुद जाना पड़ा।
सुबह वह अकेला कार से निकला।
जैसे-जैसे वह उस इलाके के पास पहुँच रहा था,
उसका मन अजीब सा होने लगा।
उसे बिना वजह बेचैनी हो रही थी।
थोड़ी दूर आगे गाड़ियों की लाइन दिखी।
उसने अपने-आप ब्रेक दबा दिया।
दिल जोर से धड़कने लगा।
ठीक वही जगह थी।
इस बार वह गाड़ी से उतर गया।
लोग सड़क किनारे खड़े थे।
एक बाइक गिर पड़ी थी।
और उसी समय…कुछ अजीब हुआ,
उसने अपनी आँखों के सामने एक
तेज़ आती हुई गाड़ी को देखा…
अचानक सामने से आती एक बाइक फिसल गई…
और उसपर बैठा आदमी उछलकर सड़क पर गिर पडा…
उसका सिर ज़मीन से टकराया।
खून बहने लगा।
लोग दौड़े।
किसी ने कहा —
“ लगता है गया…”
अविनाश आगे बढ़ा।
उसने आदमी का चेहरा देखा।
यह वही आदमी था।
ठीक वही।
जिसे वह कई बार ज़िंदा देख चुका था।
उसके दिमाग में जैसे सब कुछ एक साथ घूम गया।
पहली बार…
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| इस बार उसने सब अपनी आँखों से देखा |
जब वह परिवार के साथ आया था…
तब उसने जो देखा था…और आज जो देख रहा है।
असल में वो उस दिन का हादसा नहीं था।
वो आज का हादसा था।
उसने तो भविष्य देख लिया था।
और बाद में उसी आदमी को ज़िंदा देखा…
क्योंकि उस समय वह सच में ज़िंदा था।
अविनाश पीछे हट गया।
उसके हाथ काँप रहे थे।
तभी…
जमीन पर पड़ा आदमी हल्का सा हिला।
उसकी आँखें खुलीं।
सीधा अविनाश की तरफ।
और बहुत धीमे होंठ हिले —
“अब… सही समय है…”
अविनाश का दिमाग सुन्न हो गया।
उसी पल पीछे जोर की आवाज़ हुई।
लोग चिल्लाए —
“अरे… दूसरी गाड़ी… संभालो…!”
अविनाश मुड़ा…
और तेज़ आती कार सीधा उसकी तरफ आई।
टक्कर।
सब कुछ घूम गया।
आवाज़ें दूर चली गईं।
जब लोगों ने उसे उठाया…
सड़क पर दो आदमी पड़े थे।
एक — वही बाइक वाला।
दूसरा — अविनाश।
भीड़ में खड़ा एक आदमी यह सब देख रहा था…
जिसे अभी-अभी यह सब समझ आ गया था…
कि उसने भी यह हादसा पहले भी देखा है…



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