कहते हैं, दुनिया में कुछ जगहें ऐसी होती हैं जो नक्शों में तो दिखाई देती हैं, लेकिन उनका रास्ता हर किसी को नहीं मिलता।
और कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जिनका रास्ता मिल जाए... तो वापस लौटने का रास्ता कभी नहीं मिलता।
महाराष्ट्र के भंडारा जिले के पास फैले घने जंगलों के बारे में भी लोग कुछ ऐसा ही कहते थे कि जंगल ज़िंदा है।
वह सुनता है।
वह देखता है।
और कभी-कभी...
वह बुलाता भी है।
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| राघव को लगा था कि वह सिर्फ एक शॉर्टकट ले रहा है, लेकिन जंगल ने उसके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। |
राघव देशमुख, उम्र लगभग पैंतीस साल, पेशे से एक सर्वे इंजीनियर था। पिछले दस वर्षों से वह अलग-अलग इलाकों में जाकर जमीनों का सर्वे करने का काम करता था। पहाड़, नदियाँ, जंगल और सुनसान इलाके उसके लिए कोई नई बात नहीं थे।
उस दिन भी वह अपने काम से ही निकला था।
उसे भंडारा के पास एक छोटे-से गाँव में सरकारी जमीन के सीमांकन का काम पूरा करना था। काम उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंच गया। जब तक उसने अपनी जीप स्टार्ट की, दोपहर के सवा बारह बज चुके थे।
गाँव के सरपंच ने उसे रोकते हुए कहा था,
"अगर नागपुर जल्दी पहुँचना है, तो पहाड़ी के पीछे वाला कच्चा रास्ता पकड़ लेना। लगभग डेढ़ घंटा बच जाएगा।"
"और अगर नहीं पकड़ूँ?" राघव ने मुस्कुराते हुए पूछा।
बूढ़ा सरपंच कुछ पल उसे देखता रहा।
"तो शायद आज रात अपने घर पहुँच जाओगे।"
"और अगर पकड़ लिया?"
सरपंच ने जवाब नहीं दिया। उसने बस जंगल की तरफ देखा और धीरे से कहा,
"फिर यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जंगल क्या चाहता है।"
राघव ने हँसकर बात टाल दी।
पिछले दस सालों में उसने न जाने कितनी ऐसी कहानियाँ सुनी थीं।
दोपहर के करीब एक बजे उसने अपनी जीप उस कच्चे रास्ते पर मोड़ दी।
शुरुआत में रास्ता बिल्कुल सामान्य था। दोनों ओर सागौन के लंबे पेड़ थे। कहीं-कहीं धूप पत्तों के बीच से छनकर जमीन पर पड़ रही थी। पक्षियों की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं।
राघव गुनगुनाते हुए गाड़ी चलाता रहा।
लेकिन लगभग आधे घंटे बाद उसे महसूस हुआ कि रास्ता पहले से कहीं ज्यादा संकरा हो गया है।
फिर कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ कि उसने पिछले पंद्रह मिनट से किसी पक्षी की आवाज नहीं सुनी।
जंगल अचानक बहुत शांत हो गया था।
उसने घड़ी देखी।
दो बजने वाले थे।
उसे हल्की-सी बेचैनी हुई, लेकिन उसने खुद को समझाया कि शायद वह जरूरत से ज्यादा सोच रहा है।
करीब दस मिनट बाद उसकी नजर रास्ते के किनारे खड़े एक अजीब-से पेड़ पर पड़ी। उसकी आधी शाखाएँ सूखी हुई थीं और तने पर बिजली गिरने का गहरा निशान था।
राघव ने उसे देखते हुए जीप आगे बढ़ा दी।
बीस मिनट बाद...
वह अचानक स्टीयरिंग पर झुक गया।
वही पेड़ फिर उसके सामने खड़ा था।
उसने गाड़ी रोकी।
"नहीं... यह दूसरा पेड़ होगा।"
उसने पीछे मुड़कर देखा। जंगल बिल्कुल वैसा ही था जैसा पहले था।
उसने गाड़ी फिर आगे बढ़ा दी।
लेकिन अगले एक घंटे में उसने उस पेड़ को तीन बार और देखा।
अब उसके माथे पर पसीना था।
उसने मोबाइल निकाला।
कोई नेटवर्क नहीं।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि वह सचमुच रास्ता भटक चुका है।
दोपहर के तीन बज चुके थे।
और तभी...
उसे दूर पगडंडी पर कोई चलता हुआ दिखाई दिया।
एक बूढ़ा आदमी।
उसके कंधे पर सूखी लकड़ियों का गट्ठर था। सिर पर पुरानी टोपी और हाथ में एक लंबी लकड़ी की छड़ी।
राघव ने राहत की साँस ली।
कम से कम वह अकेला तो नहीं था।
वह जल्दी-जल्दी उसकी ओर बढ़ा।
"बाबा! सुनिए!"
बूढ़ा रुका।
उसने धीरे से मुड़कर राघव की ओर देखा और फिर बिना किसी आश्चर्य के मुस्कुरा दिया।
"आखिर मिल ही गए तुम।"
राघव कुछ समझ नहीं पाया।
"क्या मतलब?"
बूढ़े ने बात बदल दी।
"लगता है, रास्ता भूल गए हो।"
"हाँ। क्या यहाँ से हाईवे जाने का रास्ता है?"
बूढ़े ने अपनी छड़ी से जंगल की दूसरी ओर इशारा किया।
"इस पगडंडी पर चलते जाओ। सूरज ढलने से पहले हाईवे पहुँच जाओगे।"
"धन्यवाद!"
राघव वापस जीप में बैठा और उसी दिशा में निकल गया।
करीब डेढ़ घंटे तक वह लगातार चलता रहा।
सूरज अब पेड़ों के पीछे छिपने लगा था।
अचानक उसकी जीप रुक गई।
उसने सामने देखा।
उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।
वही बूढ़ा आदमी।
वही लकड़ियों का गट्ठर।
वही मुस्कान।
वह फिर उसी जगह खड़ा था।
"तुम... यहाँ कैसे?"
बूढ़ा हल्के से हँसा।
"यह सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।"
राघव अब सचमुच डर गया था।
"मैं डेढ़ घंटे तक लगातार गाड़ी चलाता रहा हूँ!"
"मुझे पता है।"
"फिर मैं वापस यहाँ कैसे आ गया?"
बूढ़े ने इस बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"इस जंगल में हर रास्ता कहीं नहीं जाता, बेटा। कुछ रास्ते बस तुम्हें वहीं वापस ले आते हैं, जहाँ से तुमने शुरुआत की थी।"
राघव कुछ पल चुप रहा।
सूरज लगभग डूब चुका था।
जंगल का रंग बदलने लगा था।
"अब क्या करूँ मैं?"
बूढ़े ने लकड़ियों का गट्ठर जमीन पर रखा।
"अगर मेरी मानो, तो आज रात जंगल में मत घूमो। अंधेरा होने के बाद यह जगह और भी जिद्दी हो जाती है।"
"लेकिन..."
"मेरी झोपड़ी यहीं पास में है। रात वहीं रुक जाओ। सुबह मैं खुद तुम्हें हाईवे तक छोड़ दूँगा।"
राघव ने चारों ओर नजर दौड़ाई।
जहाँ तक उसकी आँखें देख सकती थीं, वहाँ केवल जंगल था।
उसके पास अब कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
"ठीक है।"
बूढ़ा मुस्कुराया।
"आ जाओ। रास्ता लंबा नहीं है।"
और दोनों उस पगडंडी पर आगे बढ़ गए...
उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उनमें से केवल एक ही अगली सुबह इस जंगल से आज़ाद होगा।
सूरज अब पूरी तरह पेड़ों के पीछे छिप चुका था।
राघव बूढ़े के पीछे-पीछे चल रहा था। पगडंडी इतनी संकरी थी कि कई जगह उसे झुककर पेड़ों की शाखाओं के नीचे से गुजरना पड़ रहा था। हवा में अचानक ठंडक घुलने लगी थी।
जंगल, जो कुछ देर पहले तक जीवित लगता था, अब धीरे-धीरे मौन हो रहा था।
कुछ दूरी पर किसी जानवर के गुर्राने की आवाज़ आई।
राघव ठिठक गया।
"यह... किसकी आवाज़ थी?"
बूढ़े ने बिना पीछे देखे जवाब दिया, "जंगल में जो रहता है, उसकी।"
"आपको डर नहीं लगता?"
बूढ़ा कुछ क्षण चुप रहा। फिर हल्के से मुस्कुराया।
"डर भी अजीब चीज़ है, बेटा। शुरुआत में बहुत लगता है। फिर धीरे-धीरे उसकी आदत हो जाती है।"
राघव ने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने सोचा, शायद बूढ़ा अपनी उम्र की बात कर रहा है।
लगभग चालीस मिनट तक चलने के बाद उसे पेड़ों के बीच एक हल्की पीली रोशनी दिखाई दी।
वह एक पुरानी झोपड़ी थी।
लकड़ी और मिट्टी से बनी हुई। छत पर पुरानी खपरैलें लगी थीं। बाहर एक लालटेन टंगी हुई थी, जिसकी लौ हवा के बावजूद बिल्कुल स्थिर थी।
झोपड़ी के आसपास का हिस्सा अजीब तरह से शांत था।
राघव ने ध्यान दिया कि यहाँ तक आने के बाद उसने एक भी कीड़ा नहीं देखा था। न झींगुरों की आवाज़, न पत्तों की सरसराहट।
मानो जंगल इस जगह से दूरी बनाए रखता हो।
"आओ।" बूढ़े ने दरवाजा खोलते हुए कहा।
अंदर का दृश्य उम्मीद से बिल्कुल अलग था।
झोपड़ी छोटी जरूर थी, लेकिन बेहद साफ-सुथरी थी। एक तरफ मिट्टी का चूल्हा था, दूसरी तरफ लकड़ी की मेज और उसके पास एक पुरानी कुर्सी। कोने में एक चारपाई बिछी थी, जिस पर सफेद चादर करीने से तह की हुई रखी थी।
"बैठो। मैं खाना बना देता हूँ।"
"आपको तकलीफ़ होगी..."
"मेहमान के लिए तकलीफ़ कैसी?"
बूढ़े की आवाज़ में अजीब-सी आत्मीयता थी।
कुछ ही देर में चूल्हे पर लकड़ियाँ जलने लगीं। कमरे में धुएँ और गरम दाल की खुशबू फैल गई।
राघव को पहली बार लगा कि शायद वह बेवजह डर रहा था।
दोनों चुपचाप खाना खाने लगे।
बाहर जंगल में कभी-कभी किसी जानवर के चिल्लाने की आवाज़ गूँज जाती, फिर सब कुछ पहले से भी ज्यादा शांत हो जाता।
काफी देर बाद राघव ने पूछा, "आप यहाँ अकेले रहते हैं?"
"हाँ।"
"कब से?"
बूढ़े ने दाल का कटोरा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "बहुत समय से।"
"मतलब?"
बूढ़ा मुस्कुराया।
"इतना समय हो गया कि अब याद नहीं।"
राघव भी मुस्कुरा दिया।
"लेकिन इतनी डरावनी जगह पर? आसपास तो कोई इंसान भी नहीं है।"
इस बार बूढ़े की मुस्कान कुछ फीकी पड़ गई।
उसने धीरे से आग की लपटों को देखा।
"पहले था।"
"क्या?"
"गाँव।"
राघव चुप हो गया।
"यहीं, इसी जंगल के बीच। करीब पचास घर थे। शाम को बच्चों की आवाज़ें दूर तक सुनाई देती थीं। लोग एक-दूसरे के घर बिना बताए चले जाते थे।"
"फिर क्या हुआ?"
बूढ़ा कुछ देर तक खामोश रहा।
"समय।"
"मतलब?"
"कुछ लोग मर गए। कुछ यहाँ से चले गए। फिर एक दिन ऐसा आया कि पीछे मुड़कर देखने वाला भी कोई नहीं बचा।"
"और आप?"
बूढ़े ने पहली बार उसकी ओर सीधे देखा।
"मैं रह गया।"
राघव को न जाने क्यों उसके इस जवाब से बेचैनी हुई।
"आपके परिवार वाले?"
"चले गए।"
"कहाँ?"
बूढ़े के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान उभरी।
"जहाँ सब जाते हैं।"
झोपड़ी में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
बाहर अचानक किसी जानवर ने इतनी जोर से चीख मारी कि राघव के हाथ से कटोरा लगभग छूट गया।
बूढ़ा बिल्कुल शांत बैठा रहा।
"आपने कहा था कि यहाँ गाँव था। कितने साल पहले की बात है?"
"डेढ़ सौ साल।"
राघव हँस पड़ा।
"आप मज़ाक अच्छा कर लेते हैं।"
लेकिन बूढ़ा नहीं हँसा।
उसके चेहरे पर वही शांत भाव बने रहे।
राघव की हँसी धीरे-धीरे रुक गई।
"आप... सच कह रहे हैं?"
"तुम्हें क्या लगता है?"
राघव ने पहली बार गौर से बूढ़े को देखा।
उसकी आँखें बहुत थकी हुई थीं।
इतनी थकी हुई कि उनमें उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था।
अचानक उसके मन में एक सवाल आया।
पूरे समय में उसने बूढ़े को एक बार भी खाना खाते नहीं देखा था।
"आप नहीं खाएँगे?"
"भूख नहीं है।"
"सुबह से कुछ नहीं खाया?"
"अब जरूरत नहीं पड़ती।"
राघव के हाथ रुक गए।
उसे याद आया—झोपड़ी तक आने के पूरे रास्ते में उसने बूढ़े के पैरों की आवाज़ तक नहीं सुनी थी।
उसका गला सूखने लगा।
"मैं... जरा बाहर होकर आता हूँ।"
"ज़रूर।"
बूढ़े ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया।
राघव तेजी से झोपड़ी से बाहर निकल आया।
बाहर घना अंधेरा था।
इतना घना कि लालटेन की रोशनी से आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने गहरी साँस ली।
"नहीं... मैं बेवजह सोच रहा हूँ।"
लेकिन उसके मन में एक ही बात बार-बार घूम रही थी—
"डेढ़ सौ साल।"
और फिर...
"अब जरूरत नहीं पड़ती।"
उसने पीछे मुड़कर झोपड़ी की ओर देखा।
दरवाजे पर बूढ़ा खड़ा था।
वह उसे नहीं देख रहा था।
वह जंगल के अंधेरे को देख रहा था।
और उसके चेहरे पर पहली बार मुस्कान नहीं थी।
बस एक थकान थी।
राघव के भीतर अचानक एक अजीब-सा डर जाग उठा।
उसे नहीं पता था क्यों।
लेकिन वह एक बात समझ चुका था।
अगर वह आज रात इस झोपड़ी में रुका...
तो शायद कभी वापस नहीं जा पाएगा।
और अगले ही पल...
वह अंधेरे जंगल की ओर भाग पड़ा।
![]() |
| जंगल के बीचों-बीच एक झोपड़ी, एक दयालु बूढ़ा, और एक ऐसा निमंत्रण जिसे ठुकराना संभव नहीं था। |
राघव पूरी ताकत से भाग रहा था।
पेड़ों की टहनियाँ उसके चेहरे और हाथों को खरोंच रही थीं। कई बार उसका पैर जड़ों में उलझा, लेकिन उसने रुकने की हिम्मत नहीं की।
उसके कानों में अभी भी बूढ़े की आवाज़ गूँज रही थी—
«"अब जरूरत नहीं पड़ती।"»
उसके पीछे कोई कदमों की आवाज़ नहीं थी।
कोई उसका पीछा नहीं कर रहा था।
और यही बात उसे सबसे ज्यादा डरा रही थी।
वह लगभग पंद्रह मिनट तक लगातार भागता रहा। उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं। सीने में दर्द होने लगा था।
आखिरकार वह एक बड़े पत्थर के पास रुक गया।
उसे यकीन था कि अब वह झोपड़ी से काफी दूर निकल आया होगा।
उसने राहत की साँस ली और सिर उठाकर सामने देखा।
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
सामने वही झोपड़ी थी।
बाहर वही लालटेन जल रही थी।
और दरवाजे के पास वही बूढ़ा खड़ा था।
इस बार उसने मुस्कुराकर कहा—
«"मैंने भी यही किया था।"»
राघव का शरीर काँपने लगा।
"नहीं... यह संभव नहीं है!"
वह दूसरी दिशा में भागा।
इस बार और तेज।
काँटे उसके पैरों में चुभ रहे थे। कपड़े कई जगह से फट चुके थे। वह तब तक भागता रहा, जब तक उसकी साँसें जवाब नहीं देने लगीं।
लेकिन जब उसने रुककर सामने देखा...
वही झोपड़ी।
वही लालटेन।
और वही बूढ़ा।
अब उसकी मुस्कान में एक अजीब-सी उदासी थी।
"तुम जितनी बार चाहो कोशिश कर लो, बेटा। मैंने भी की थी।"
राघव अब टूट चुका था।
"तुम हो कौन?"
कुछ क्षणों तक जंगल में केवल हवा की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर बूढ़ा धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।
"आज से ठीक डेढ़ सौ साल पहले... मैं भी तुम्हारी तरह यहाँ आया था।"
उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी।
उसमें एक अजीब-सी थकान थी।
"मुझे भी एक बूढ़ा मिला था। उसने भी मुझे खाना खिलाया था। उसने भी कहा था कि सुबह मुझे जंगल से बाहर छोड़ देगा।"
राघव चुपचाप सुनता रहा।
"मैंने उस पर भरोसा किया। और जब मुझे उसकी सच्चाई पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।"
"क... कैसी सच्चाई?"
बूढ़े ने पहली बार आसमान की ओर देखा।
"यह जंगल खाली नहीं है। यह एक कैदखाना है। और हर कैदखाने को एक कैदी चाहिए।"
राघव धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।
"नहीं..."
"मैं मर चुका हूँ, राघव। बहुत समय पहले। लेकिन यह जंगल मुझे जाने नहीं देता।"
"झूठ!"
बूढ़ा हल्के से मुस्कुराया।
"काश।"
अचानक हवा का एक तेज झोंका आया। लालटेन की लौ बुरी तरह काँप उठी।
राघव ने देखा...
बूढ़े का चेहरा बदलने लगा था।
उसकी त्वचा सिकुड़ रही थी। आँखें और गहरी होती जा रही थीं। उसका शरीर मानो धुएँ की तरह हल्का पड़ता जा रहा था।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह नहीं थी।
सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके चेहरे के पीछे धीरे-धीरे एक दूसरा चेहरा दिखाई देने लगा था।
एक ऐसा चेहरा, जिसे राघव अच्छी तरह पहचानता था।
वह उसका अपना चेहरा था।
बूढ़े की आँखों से आँसू बह निकले।
"डेढ़ सौ साल..."
उसने काँपती आवाज़ में कहा।
"तुम नहीं जानते, किसी का इंतजार करना कितना मुश्किल होता है।"
राघव अब रोने लगा था।
"मुझे जाने दो!"
"अगर यह मेरे हाथ में होता, तो मैं तुम्हें कभी नहीं रोकता।"
"फिर मैं क्या करूँ?"
बूढ़े ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में पहली बार राहत दिखाई दे रही थी।
"वही, जो मैंने किया था। इंतजार।"
इतना कहकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
अगले ही पल उसका शरीर धुएँ की तरह हवा में बिखरने लगा।
कुछ ही सेकंड में वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ उसकी पुरानी लकड़ी की छड़ी जमीन पर पड़ी थी।
और फिर...
जंगल पूरी तरह शांत हो गया।
![]() |
| कुछ अभिशाप खत्म नहीं होते—वे सिर्फ अपना अगला रखवाला चुन लेते हैं। राघव का इंतज़ार आखिरकार शुरू हो चुका था। |
कहते हैं कि उस जंगल से आज तक कोई वापस नहीं लौटा।
लेकिन कभी-कभी, रास्ता भटके हुए लोगों को शाम के करीब तीन बजे एक आदमी दिखाई देता है।
वह पैंतीस-चालीस साल का होता है।
चेहरे पर थकी हुई मुस्कान लिए वह उनसे सिर्फ एक सवाल पूछता है—
«"लगता है... तुम रास्ता भूल गए हो?"»
फिर वह उन्हें एक पगडंडी की ओर इशारा करके कहता है—
«"इस रास्ते पर चलते जाओ। शायद बाहर निकल जाओ।"»
लेकिन वे कभी बाहर नहीं निकलते।
क्योंकि सूरज ढलते-ढलते वे फिर उसी जगह लौट आते हैं।
जहाँ एक पुरानी झोपड़ी उनका इंतजार कर रही होती है।
और उसके बाहर...
एक आदमी लालटेन लिए खड़ा होता है।
उसका नाम राघव देशमुख है।


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