रुद्रकोट की परछाइयाँ


   सह्याद्रि की ऊँची पहाड़ियों के बीच बसा था रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र। चारों ओर घना जंगल, सामने शांत झील और पीछे धुंध में खोई पहाड़ियाँ। वर्षों पहले यह जगह देश के सबसे प्रसिद्ध मानसिक चिकित्सालयों में गिनी जाती थी। दूर-दूर से लोग इलाज के लिए यहाँ आते थे। सुबह पक्षियों की आवाज़ें, गलियारों में डॉक्टरों की चहल-पहल और बगीचों में टहलते मरीज—यह सब कभी इस जगह की पहचान था। लेकिन एक ही रात के बाद सब कुछ बदल गया। कहा जाता है कि उस रात अस्पताल के पूरे एक विंग से अचानक चीखें उठीं और अगली सुबह वहाँ मौजूद कई लोग रहस्यमय परिस्थितियों में मृत मिले। सरकारी जाँच हुई, पर सच कभी सामने नहीं आया। अस्पताल हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। मुख्य फाटक पर बड़ा-सा बोर्ड लगा दिया गया—"प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित।" तब से वर्षों बीत गए। अब वहाँ केवल टूटी खिड़कियाँ, जंग लगे दरवाज़े, हवा में हिलते पेड़ और ऐसा सन्नाटा था जो किसी के भी भीतर बेचैनी भर देता था।

रुद्रकोट में स्थित सह्याद्रि के जंगलों के बीच बना वीरान मानसिक अस्पताल, बंद जंग लगा मुख्य गेट और "ENTRY STRICTLY PROHIBITED" का चेतावनी बोर्ड।
सह्याद्रि की पहाड़ियों में छिपा रुद्रकोट मानसिक अस्पताल... जहाँ वर्षों से कोई नहीं गया, क्योंकि कुछ दरवाज़े हमेशा के लिए बंद ही रहने चाहिए।


   आदित्य देवधर बिल्कुल अलग स्वभाव का था। ज़िंदगी को खुलकर जीने वाला, हर रहस्य को अपनी आँखों से देखने वाला और डर को केवल इंसान के दिमाग की उपज मानने वाला। पुराने किले, वीरान हवेलियाँ और बंद इमारतें उसकी सबसे बड़ी दिलचस्पी थीं। एक शाम दोस्तों के साथ बैठा था, तभी बातों-बातों में रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र का ज़िक्र छिड़ गया। कबीर ने गंभीर होकर कहा, "वहाँ जाने वाले कई लोग वापस नहीं लौटे।" रिया ने भी उसे रोकते हुए कहा कि सरकार ने आज तक वह जगह नहीं खोली, उसके पीछे कोई वजह होगी। लेकिन आदित्य हँस पड़ा। "डर इंसान पैदा करता है, जगह नहीं। लोग कहानियाँ बना-बनाकर अंधविश्वास फैलाते हैं।" दोस्तों ने बहुत समझाया, मगर उसने उसी समय मन बना लिया कि वह खुद वहाँ जाकर देखेगा। उसके लिए यह किसी भूत की तलाश नहीं, बल्कि अफवाहों की सच्चाई जानने की चुनौती थी।

   दो रात बाद आधी रात के करीब आदित्य बिना किसी को बताए अपनी बाइक लेकर रुद्रकोट पहुँच गया। दूर से ही जंग लगे लोहे का विशाल फाटक दिखाई दे रहा था। उस पर टंगा चेतावनी बोर्ड हवा के साथ चरमराकर हिल रहा था। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था कि अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। उसने टॉर्च जलाई, टूटी हुई दीवार के रास्ते अंदर घुस गया। लंबी अंधेरी गलियाँ, बिखरे हुए स्ट्रेचर, धूल से ढकी व्हीलचेयर और दीवारों पर उखड़ा हुआ पेंट—सब कुछ किसी भूले हुए समय की तरह खामोश पड़ा था। वह एक-एक कमरे में गया, तस्वीरें लीं और मुस्कुराते हुए बोला, "यही है लोगों का भूत?" लगभग दो घंटे तक वह पूरे परिसर में घूमता रहा। लौटने ही वाला था कि अस्पताल के पुराने महिला वार्ड के सामने उसके कदम अचानक रुक गए। बिना किसी वजह उसकी धड़कन तेज हो गई। उसे साफ महसूस हुआ कि कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है... उसकी चाल के साथ कोई और भी चल रहा है। उसने तुरंत पलटकर टॉर्च घुमाई। वहाँ कोई नहीं था। उसने खुद को समझाया, "बस वहम है," और वापस घर लौट आया।

आधी रात को रुद्रकोट मानसिक अस्पताल के अंधेरे गलियारे में टॉर्च लिए खड़ा आदित्य देवधर, दूर सफेद साड़ी में रहस्यमयी महिला की परछाईं दिखाई देती हुई।
आदित्य को पहली बार एहसास हुआ कि वह अस्पताल में अकेला नहीं था... कोई चुपचाप उसके हर कदम के साथ चल रहा था।


   अगली सुबह आदित्य ने पूरी बात दोस्तों को बताई। सबके चेहरों का रंग उड़ गया। कबीर गुस्से में बोला, "तू पागल है! अकेला चला गया?" लेकिन आदित्य हँसते हुए बोला, "कुछ नहीं था वहाँ। लोग बेवजह डरते हैं।" उसने मोबाइल में ली गई तस्वीरें भी दिखाईं। उनमें बस वीरानी थी। दोस्तों ने राहत की साँस ली, मगर रिया अब भी बेचैन थी। उसी रात आदित्य अपने कमरे में सो गया। आधी रात के बाद उसकी अचानक आँख खुली। ऐसा लगा जैसे नीचे हॉल में कोई धीरे-धीरे चल रहा हो। लकड़ी के फ़र्श पर कदमों की धीमी आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। उसने उठकर पूरा घर देखा। हर कमरा खाली था। वापस बिस्तर पर लेटा ही था कि इस बार किसी के फुसफुसाने जैसी बेहद हल्की आवाज़ उसके कानों तक पहुँची। वह घबरा गया, मगर आवाज़ अगले ही पल गायब हो गई। उसने खुद को समझाया कि शायद थकान की वजह से ऐसा लग रहा है। लेकिन उसके भीतर पहली बार एक अनजाना डर जन्म ले चुका था।

   अगले कुछ दिनों में सब कुछ बदलने लगा। कभी बिना हवा के दरवाज़ा अपने आप खुल जाता, कभी सीढ़ियों से किसी के उतरने की आहट आती। रात को लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर देर तक खड़ा है। एक शाम दफ़्तर से लौटते समय उसने अनायास घर की छत की ओर देखा। वहाँ सफेद साड़ी पहने एक औरत की धुँधली आकृति बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसने दोबारा देखा... छत खाली थी। उसने इसे भ्रम समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया। लेकिन उसी रात अचानक किसी आवाज़ से उसकी नींद खुली। कमरे के बाहर सीढ़ियों पर वही आकृति खड़ी थी। इस बार वह पहले से कहीं ज़्यादा साफ दिखाई दे रही थी। लंबे बिखरे बाल, झुका हुआ सिर और बिल्कुल अस्वाभाविक खामोशी। आदित्य का गला सूख गया। वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा... तभी वह आकृति बिना एक भी कदम उठाए उसकी ओर सरकने लगी।



आदित्य का शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। वह आकृति बिना कोई आवाज़ किए उसकी ओर बढ़ती चली आ रही थी। डर के मारे उसने पूरी ताकत से मुख्य दरवाज़ा खोला और घर से बाहर भाग निकला। उसे लग रहा था कि बस सड़क तक पहुँच जाए, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जहाँ भी वह मुड़ता, वही सफेद साया कुछ दूरी पर खड़ा दिखाई देता। कभी गली के मोड़ पर, कभी बिजली के खंभे के नीचे, तो कभी सामने वाली छत पर। उसने आँखें कसकर बंद कीं, फिर खोलीं... वह फिर वहीं थी। अगले कई दिनों तक आदित्य की ज़िंदगी एक डरावने सपने में बदल गई। वह ठीक से सो नहीं पाता, खाना छोड़ दिया और किसी से मिलना भी बंद कर दिया। उसने दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए। पड़ोसियों ने बताया कि रात में उसके घर से किसी औरत के धीमे रोने की आवाज़ें आती थीं, जबकि घर में वह अकेला रहता था। और फिर... एक सुबह सब कुछ अचानक शांत हो गया। आदित्य का फोन हमेशा के लिए बंद हो चुका था।

जब तीन दिन तक आदित्य का कोई पता नहीं चला, तो कबीर, रिया, निखिल और समीर उसके घर पहुँचे। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था। अंदर का नज़ारा देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। घर की सारी लाइटें जल रही थीं, लेकिन कहीं कोई नहीं था। कमरे अस्त-व्यस्त पड़े थे, कुर्सी उलटी गिरी थी और आदित्य का मोबाइल ज़मीन पर टूटा हुआ मिला। पूरे घर की तलाशी ली गई—छत, स्टोर रूम, पिछवाड़ा, हर कोना। लेकिन आदित्य जैसे हवा में गायब हो चुका था। उसी दिन पुलिस में शिकायत दर्ज हुई। पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी और आसपास के इलाकों की जाँच की। जंगल भी छान मारे गए, झील में खोज अभियान चला, मगर कोई सुराग नहीं मिला। दिन हफ्तों में बदल गए। धीरे-धीरे सबने ने मान लिया कि शायद आदित्य अब कभी वापस नहीं आएगा। 

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रुद्रकोट मानसिक अस्पताल के महिला वार्ड में तूफानी रात के दौरान फर्श पर पड़े आदित्य देवधर का निर्जीव शरीर और दूर खड़ी सफेद साड़ी वाली रहस्यमयी आकृति।
जब लोग आदित्य को हर जगह खोज रहे थे, तब रुद्रकोट ने उसका सबसे भयावह सच अपने अंधेरे गलियारों में छिपा रखा था।


करीब दो हफ्तों बाद बरसात की एक अँधेरी रात थी। रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र के आसपास फिर वही घना कोहरा छाया हुआ था। हवा टूटी खिड़कियों से गुजरते हुए सीटी जैसी आवाज़ पैदा कर रही थी। अस्पताल के महिला वार्ड के सामने वही पुराना गलियारा पूरी तरह अंधेरे में डूबा था—ठीक वही जगह जहाँ आदित्य ने पहली बार महसूस किया था कि कोई उसके साथ चल रहा है। बिजली चमकी। एक पल के लिए पूरा गलियारा सफेद रोशनी से भर गया... और फर्श पर एक इंसानी शरीर दिखाई दिया। अगले ही क्षण फिर अंधेरा छा गया। दूसरी बिजली चमकी तो चेहरा साफ दिखाई दिया—वह आदित्य देवधर था। उसकी निर्जीव आँखें छत की ओर खुली हुई थीं, मानो मरने से पहले उसने किसी ऐसी चीज़ को देखा हो जिसे शब्दों में बयान करना संभव नहीं था। उसके शरीर पर किसी हमले का कोई स्पष्ट निशान नहीं था। बस उसके चेहरे पर जमी हुई दहशत बता रही थी कि मौत आने से पहले उसने ऐसा भय देखा था, जो किसी इंसान की कल्पना से भी परे था।




समाप्त।

बारिश की वो रात

 

आज से कई दशक पहले...

जब गाँवों तक पक्की सड़कें भी नहीं पहुँची थीं...

तब ज़िंदगी बिल्कुल अलग हुआ करती थी।

उस समय न  कस्बे में अस्पताल होते थे...

न गाँव में डॉक्टर।

बच्चे का जन्म घर के एक  कमरे में होता था।

परिवार के लोग बाहर बेचैनी से इंतज़ार करते...

और भीतर...

एक ही औरत नई ज़िंदगी को इस दुनिया में लाने की ज़िम्मेदारी संभालती।

उसे लोग "दाई" कहते थे।

दाई सिर्फ़ बच्चे की डिलीवरी नहीं कराती थी...

वह पूरे गाँव का भरोसा होती थी।

उसके अनुभव पर लोगों को डॉक्टर से भी ज़्यादा विश्वास होता था।

आँधी-तूफ़ान हो...

या मूसलाधार बारिश...

अगर किसी घर से खबर आती कि प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है...

तो दाई बिना एक पल की देरी किए निकल पड़ती।

क्योंकि उस दौर में...

एक छोटी-सी देर...

माँ और बच्चे...

दोनों की जान ले सकती थी।

ऐसी ही एक दाई थी...

सुमन दाई।

पूरे इलाके में उसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था।

उम्र साठ के आसपास...

चेहरे पर झुर्रियाँ...

लेकिन आँखों में गज़ब का आत्मविश्वास।

" इलाके में जितने बच्चे दौड़ते-भागते दिखाई देते हैं... उनमें से आधे से ज़्यादा ने पहली साँस सुमन दाई की हथेलियों में ली है।"

पास के कई गाँवों से भी लोग उसे बुलाने आते थे।

कोई कभी भी  बुलाने आ जाता  

आधी रात को...

कई बार तेज़ बारिश में...

तो कभी घने जंगल पार करके भी।

लेकिन उसने कभी किसी को मना नहीं किया।

उसके लिए हर जन्म...

भगवान का काम था।

और शायद...

इसी फ़र्ज़ ने एक रात...

उसे ऐसी जगह पहुँचा दिया...

जहाँ जाने की हिम्मत कोई इंसान नहीं कर सकता..

Amavasya ki raat mein Suman Dai apni jhopdi ka darwaza kholkar rahasyamayi aadmi aur bailgadi ko dekhti hui.
आधी रात... मूसलाधार बारिश... और एक दस्तक जिसने सुमन दाई की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।


वह अमावस्या की रात थी।

काले बादलों ने पूरे आकाश को निगल लिया था।

बारिश लगातार बरस रही थी...

ऐसी कि छप्पर पर गिरती हर बूँद किसी ढोल की चोट जैसी सुनाई दे रही थी।

हवा इतनी तेज़ थी कि मिट्टी की झोपड़ियों के दरवाज़े अपने आप काँप उठते।

दूर कहीं बिजली चमकती...

और एक पल के लिए पूरा गाँव दूधिया रोशनी में नहा जाता।

फिर...

सब कुछ पहले से भी गहरे अँधेरे में डूब जाता।

ऐसा अँधेरा...

जिसमें अपने ही हाथ दिखाई न दें।

पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा था।

कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़..

भी नहीं आ रही थी..

मानो इस रात ने हर जीव की आवाज़ छीन ली हो।

सिर्फ़ बारिश...

और गरजते बादल।

उसी सन्नाटे को चीरती हुई...

ठक... ठक... ठक...

सुमन दाई की झोपड़ी का दरवाज़ा काँप उठा।

दस्तक इतनी अचानक थी...

कि गहरी नींद में सोई सुमन दाई भी घबराकर उठ बैठी।

उसने दीवार पर टंगी लालटेन जलाई।

पीली लौ काँप रही थी...

मानो उसे भी बाहर खड़ी चीज़ का डर हो।

दस्तक फिर हुई...

इस बार पहले से ज़्यादा ज़ोर से।

धड़... धड़... धड़...

सुमन धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँची।

एक पल के लिए उसके हाथ कुंडी पर ही रुक गए।

इतनी रात...

इस तूफ़ान में...

कौन हो सकता है?

उसने भगवान का नाम लिया...

और कुंडी खोल दी।

उसी क्षण...

आकाश में एक तेज़ बिजली चमकी।

उस एक पल की रोशनी में उसने सामने खड़े आदमी को देखा।

लंबा कद...

भारी शरीर...

घनी, नीचे की ओर झुकी हुई काली मूँछें...

सिर से पाँव तक भीगा हुआ।

उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था...

लेकिन अजीब बात यह थी...

इतनी तेज़ बारिश के बावजूद...

उसके पैरों के पास की मिट्टी पर एक भी पदचिह्न नहीं था।

"दाई..."

उसने भारी, थकी हुई आवाज़ में कहा,

"मेरी बहू की जान खतरे में है... दर्द शुरू हुए कई घंटे हो गए हैं।"

"जल्दी चलो... देर हुई तो दोनों नहीं बचेंगे।"

सुमन ने बिना देर किए अपना पुराना थैला उठाया।

फिर पूछा,

"कौन-से गाँव से आए हो बेटा?"

आदमी ने एक पल उसकी आँखों में देखा...

फिर धीरे से बोला—

"रामपुर..."

सुमन ने माथे पर हल्की शिकन डाली।

रामपुर...

उसने नाम तो सुना था...

लेकिन कभी वहाँ गई नहीं थी।

"इतनी दूर इस मौसम में कैसे आए?"

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस मुड़कर चलने लगा।

बाहर...

एक पुरानी बैलगाड़ी खड़ी थी।

दो सफेद बैल...

बारिश में बिल्कुल स्थिर।

न सिर हिला रहे थे...

न पूँछ।

बस अँधेरे में बिना पलक झपकाए सामने देख रहे थे।

सुमन का मन एक पल को जाने क्यों घबरा उठा...

लेकिन किसी प्रसूता की जान का सवाल था।

वह बैलगाड़ी में बैठ गई।

बैलगाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

पहले कच्चा रास्ता आया...

फिर खेत...

और कुछ ही देर में...

गाँव की आख़िरी झोपड़ी भी पीछे छूट गई।

अब चारों ओर सिर्फ़ घना जंगल था।

बरसात से भीगे पेड़ों की डालियाँ हवा में ऐसे झूल रही थीं जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें हिला रहा हो।

कभी बिजली चमकती...

तो सूखे तनों की परछाइयाँ इंसानों जैसी लगतीं।

फिर सब कुछ फिर से अँधेरे में डूब जाता।

सुमन दाई ने कई बार पूछा,

"बेटा... तुम्हारा गाँव अभी कितना दूर है?"

हर बार वही जवाब मिलता...

"बस... पहुँच गए।"

लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

उसका दिल अब धीरे-धीरे घबराने लगा।

करीब एक घंटे बाद बैलगाड़ी एक पुराने, जर्जर मकान के सामने रुकी।

चारों तरफ़ जंगल...

दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं।

बस बारिश...

और उस टूटे हुए मकान की चरमराती लकड़ियाँ।

घर के भीतर कदम रखते ही सुमन ठिठक गई।

कमरे में सीलन की ऐसी गंध थी...

मानो बरसों से वहाँ धूप ही न आई हो।

दीवारों का पलस्तर उखड़ा हुआ था।

छत से जगह-जगह पानी टपक रहा था।

एक कोने में मिट्टी का दिया टिमटिमा रहा था।

उसकी काँपती लौ से दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बन रही थीं।

सामने...

एक पुरानी खाट पर...

एक औरत प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी।

उसका चेहरा आधे घूँघट में छिपा था।

वह दर्द से कराह रही थी...

लेकिन उसकी आवाज़...

जाने क्यों...

कमरे में गूँजती नहीं थी।

जैसे कोई आवाज़...

दीवारें अपने भीतर ही निगल लेती हों।

सुमन अपने काम में लग गई।

समय बीतता गया।

बाहर बारिश लगातार बरसती रही।

कभी उसे लगा...

कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है।

वह पलटी...

कोई नहीं।

फिर लगा...

खिड़की से कई चेहरे उसे घूर रहे हैं।

बिजली चमकी...

खिड़की खाली थी।

उसने खुद को समझाया,

"डर मत सुमन... तू अपना काम कर।"

कई घंटों की कोशिश के बाद...

आख़िर बच्चे के रोने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।

Ghane jungle ke beech purane sunsaan ghar mein Suman Dai prasav karati hui aur andhere mein khada rahasyamayi aadmi.
जहाँ हर दीवार एक राज़ छुपाए बैठी थी... और हर परछाई किसी अनजानी मौजूदगी का एहसास करा रही थी।


पहली बार उस आदमी के चेहरे पर मुस्कान आई।

उसने बच्चे को दोनों हाथों से उठाया...

उसकी आँखें भर आईं।

धीरे से बोला,

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

सुमन ने राहत की साँस ली।

कुच डेर बच्चे का सब करने के बाद

सुमन दाई 

"अब चलती हूँ... मेहनताना दे दो।"

आदमी कुछ देर चुप रहा।

फिर बिना कुछ कहे अंदर चला गया।

थोड़ी देर बाद लौटा...

उसके हाथ में कोयले के कुछ काले टुकड़े थे।

"मेरे पास देने के लिए यही है।"

सुमन हैरान रह गई।

"अरे... इसका मैं क्या करूँ?"

आदमी बस मुस्कुराया।

"कभी-कभी...

जो कोयला दिखाई देता है...

वह कोयला नहीं होता।"

उसकी बात सुमन की समझ में नहीं आई।

वह उसे बैलगाड़ी में बैठाकर वापस छोड़ गया।

घर पहुँचते ही सुमन झुँझलाकर बोली,

"अजीब आदमी था...

रातभर जान खपा दी...

और बदले में मुट्ठीभर कोयले दे गया।"

उसने वे सारे कोयले घर के एक कोने में फेंक दिए...

और थककर सो गई।

सुबह...

बारिश थम चुकी थी।

सूरज की हल्की किरणें झोपड़ी में उतर रही थीं।

सुमन झाड़ू लगा रही थी कि अचानक...

टन...!

झाड़ू किसी धातु से टकराई।

उसने नीचे देखा।

मिट्टी में...

एक चमचमाता हुआ...

सोने का सिक्का।

वह हैरान रह गई।

कुछ कदम आगे...

दूसरा सिक्का।

फिर तीसरा...

फिर चौथा।

उसे अचानक रात वाले कोयले याद आए।

वह दौड़कर उसी कोने में पहुँची...

जहाँ उसने उन्हें फेंका था।

लेकिन वहाँ अब कोयले नहीं थे।

पूरा कोना...

सोने के पुराने सिक्कों से भरा पड़ा था।

सुमन की साँसें तेज़ हो गईं।

Subah Suman Dai mitti ke ghar mein koylon ki jagah chamakte sone ke sikke dekhkar hairan hoti hui
रात को मिले साधारण कोयले... सुबह बन चुके थे सोने के सिक्के। लेकिन क्या सचमुच यह किसी इनाम की शुरुआत थी... या एक भयावह रहस्य की?


उसी समय...

दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ लगाई।

"दाई... सुना है रात तुम रामपुर गई थीं?"

"हाँ..."

सुमन ने जवाब दिया।

सामने खड़ा बूढ़ा आदमी एकदम सन्न रह गया।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

काँपती आवाज़ में बोला...

"रामपुर...? .. रामपुर तो पच्चीस साल पहले भूस्खलन में पूरा दब गया था। वहाँ का एक भी आदमी ज़िंदा नहीं बचा था..."

सुमन के हाथ से सोने का सिक्का गिर पड़ा।

उसके कानों में रात वाले आदमी की आख़िरी बात गूँजने लगी—

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

उस दिन के बाद...

सुमन ने कभी उन सिक्कों को हाथ नहीं लगाया 

वह सोना आज भी उसके पुराने संदूक में रखा है।

और हर अमावस्या की बरसाती रात...

जब घड़ी में डेढ़ बजते हैं...

तो उसी जंगल की तरफ़ से...

बैलगाड़ी के पहियों की धीमी चरमराहट सुनाई देती है।

जैसे...

कोई फिर किसी दाई को लेने आया हो।

समाप्त।



जो भी हो जाए, बाहर मत उतरना

 

रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे थे।

आसमान पर काले बादलों की मोटी चादर फैली हुई थी। कहीं-कहीं दूर बिजली चमकती और फिर सब कुछ पहले से भी ज्यादा अंधेरे में डूब जाता।

रोहित अपनी कार चलाते हुए शहर लौट रहा था।

उसके मोबाइल का स्पीकर ऑन था।

"हाँ सुनो, बस दो-तीन घंटे और लगेंगे... फिर घर पहुँच जाऊँगा।"

दूसरी तरफ उसकी पत्नी ने कहा, "इतनी रात को मत चलो। किसी होटल में रुक जाओ।"

रोहित हँस पड़ा।

"अरे चिंता मत करो। बस रास्ता नया है तो क्या, जल्दी पाहुच जा

पत्नी ने कुछ और कहा, लेकिन तभी फोन कट गया।

नेटवर्क गायब हो चुका था।

रोहित ने चारों तरफ देखा।

सड़क के दोनों ओर घना जंगल था।

न कोई वाहन।

न कोई घर।

न कोई रोशनी।

बस उसकी कार की हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थीं।

उसे थोड़ा अजीब लग रहा था।

लेकिन वह चलता रहा।

तभी...

आधी रात में घने जंगल के बीच सफेद कार चलाता एक भारतीय व्यक्ति, सड़क किनारे खड़ी रहस्यमयी बूढ़ी औरत, भयावह वातावरण।
उस रात जंगल में मिली एक बूढ़ी औरत ने सिर्फ एक चेतावनी दी थी—"जो भी हो जाए, बाहर मत उतरना।"


हेडलाइट्स की रोशनी में सड़क के किनारे कोई आकृति दिखाई दी।

एक बूढ़ी औरत।

सफेद बाल।

पुरानी साड़ी।

हाथ में लकड़ी की लाठी।

वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

इतनी रात में...

इतने सुनसान जंगल में...

उसे देखकर रोहित के मन में अजीब-सा डर पैदा हुआ।

फिर उसने सोचा शायद किसी गाँव की होगी।

उसने कार रोक दी।

"माँजी, कहाँ जाना है?"

बूढ़ी औरत धीरे से मुस्कुराई।

"बेटा, आगे तक छोड़ देगा?"

रोहित ने दरवाजा खोल दिया।

वह पीछे की सीट पर बैठ गई।

कार फिर चल पड़ी।

कुछ मिनट तक खामोशी रही।

फिर बूढ़ी औरत ने पूछा,

"कहाँ जा रहे हो बेटा?"

"शहर... ।"

"अच्छा "

उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ममता थी।

जैसे कोई अपनी संतान से बात कर रहा हो।

कुछ देर बाद बूढ़ी औरत अचानक बोली,

"रास्ता भूल गए हो न?"

रोहित चौंका।

"हाँ... आपको कैसे पता?"

वह बस हल्का-सा मुस्कुराई।

कोई जवाब नहीं दिया।

कार आगे बढ़ती रही।

फिर लगभग पंद्रह मिनट बाद बूढ़ी औरत ने कहा,

"बस यहीं रोक दो।"

रोहित ने ब्रेक लगा दिए।

और अगले ही पल उसका दिल बैठ गया।

चारों तरफ घना जंगल था।

इतना घना कि हेडलाइट्स की रोशनी भी निगल ली जाए।

दूर-दूर तक कोई घर नहीं।

कोई रास्ता नहीं।

कुछ भी नहीं।

"माँजी... यहाँ?"

बूढ़ी औरत कार से उतर गई।

फिर खिड़की के पास आकर बोली,

"मेरी चिंता मत करो।"

रोहित कुछ समझ पाता, उससे पहले उसने अगली बात कही—

"लेकिन ध्यान से सुनो..."

उसकी आँखें अचानक बहुत गंभीर हो गईं।

"अब आगे चाहे कुछ भी दिखे... कोई भी आवाज़ दे... कोई भी मदद माँगे..."

वह एक पल रुकी।

"कार से बाहर मत उतरना।"

"क्यों?"

बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

बस दोबारा बोली—

"जो भी हो जाए... बाहर मत उतरना।"

फिर वह अंधेरे में चली गई।

और कुछ ही सेकंड में गायब हो गई।

रोहित देर तक उसे देखता रहा।

फिर सिर झटककर आगे बढ़ गया।

करीब दस मिनट बाद...

उसे सड़क के बीचोंबीच एक आदमी दिखाई दिया।

वह हाथ हिलाकर मदद माँग रहा था।

उसके कपड़े खून से सने हुए लग रहे थे।

रोहित का दिल पसीज गया।

उसने ब्रेक लगा दिए।

फिर अचानक उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

"कार से बाहर मत उतरना..."

उसने काँच के पार देखा।

वह आदमी सिर झुकाए खड़ा था।

फिर धीरे-धीरे उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

रोहित का खून जम गया।

उसकी आँखें नहीं थीं।

सिर्फ काले गहरे गड्ढे।

रोहित ने तुरंत एक्सीलेरेटर दबा दिया।

कार तेजी से आगे निकल गई।

सुनसान जंगल की सड़क पर कार के अंदर बैठा डरा हुआ व्यक्ति, सामने खड़ी भयानक प्रेतात्मा, चारों ओर घना अंधेरा और कोहरा।
बस एक पल के लिए उसने कार का दरवाजा खोलने का सोचा... लेकिन वही फैसला उसकी जान बचा गया।


उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं।

लेकिन असली डर अभी बाकी था।

कुछ देर बाद उसे पीछे से बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

एकदम साफ।

जैसे कोई छोटा बच्चा कार की डिक्की में बंद हो।

रोहित घबरा गया।

आवाज़ लगातार बढ़ रही थी।

"मम्मी... बचाओ..."

"मुझे बाहर निकालो..."

रोहित ने कार रोक दी।

उसका हाथ दरवाजे पर चला गया।

वह बाहर निकलकर डिक्की देखने ही वाला था।

उंगलियाँ लॉक तक पहुँच चुकी थीं।

तभी...

उसे बूढ़ी औरत की  याद आई।

"चाहे कुछ भी हो जाए..."

उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

वह फिर आगे बढ़ गया।

और तभी...

रोने की आवाज़ अचानक राक्षसी हँसी में बदल गई।

ऐसी हँसी...

जिसे सुनकर उसकी रीढ़ में बर्फ उतर गई।

रात और गहरी होती जा रही थी।

जंगल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।

फिर अचानक कार के सामने एक औरत दिखाई दी।

लंबे काले बाल।

सफेद कपड़े।

सड़क के बीचोंबीच खड़ी।

रोहित ने जोर से ब्रेक लगाए।

औरत धीरे-धीरे उसकी कार की ओर बढ़ने लगी।

उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।

फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

और अगले ही पल...

उसका चेहरा दिखाई दिया।

चेहरा नहीं...

सिर्फ सड़ा हुआ मांस।

काले दाँत।

खून से भरी आँखें।

रोहित चीख पड़ा।

उसने कार मोड़ी और पूरी रफ्तार से आगे निकल गया।

पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।

लगभग आधे घंटे बाद...

उसे दूर कहीं रोशनी दिखाई दी।

एक गाँव।

रोहित की जान में जान आई।

वह तेजी से वहाँ पहुँचा।

गाँव के किनारे एक पुराने घर का दरवाजा खटखटाया।

कुछ देर बाद एक अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला।

रोहित की हालत देखकर वह उसे तुरंत अंदर ले गया।

पानी दिया।

बैठाया।

जब रोहित सामान्य हुआ तो उसने पूरी कहानी सुना दी।

सब कुछ।

बूढ़ी औरत से लेकर जंगल की भयानक घटनाओं तक।

सुनकर उस आदमी का चेहरा गंभीर हो गया।

"तुम बहुत भाग्यशाली हो।"

"क्यों?"

"उस जंगल में रात को लोग नहीं जाते।"

"क्यों?"

"क्योंकि वहाँ जो दिखता है... वह इंसान नहीं होता।"

रोहित की रूह काँप गई।

"लेकिन मैं बच कैसे गया?"

आदमी कुछ पल चुप रहा।

फिर उसकी नजर दीवार पर लगी एक तस्वीर पर गई।

"शायद... इसकी वजह से।"

रोहित ने तस्वीर की तरफ देखा।

और उसकी साँस रुक गई।

वह कुर्सी से लगभग उछल पड़ा।

तस्वीर में वही बूढ़ी औरत थी।

वही चेहरा।

वही मुस्कान।

वही आँखें।

"ये... ये तो वही है!"

आदमी की आँखें भर आईं।

"ये मेरी माँ थीं।"

"क्या?"

"दो साल पहले इसी जंगल में लापता हो गई थीं। बहुत खोजा... लेकिन कभी नहीं मिलीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर आदमी धीमी आवाज़ में बोला—

"लेकिन गाँव वाले कहते हैं कि उनकी आत्मा आज भी उस जंगल में भटकती है।"

"भटकती है?"

"हाँ... मगर किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं।"

उसने तस्वीर की तरफ देखा।

गांव के घर में दीवार पर लगी बूढ़ी औरत की तस्वीर को हैरानी से देखता यात्री, पास खड़ा घर का मालिक रहस्य बताता हुआ।
जब उसने तस्वीर देखी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई—जिस बूढ़ी औरत ने उसकी जान बचाई थी, वह दो साल पहले मर चुकी थी।


"मुसीबत में फँसे लोगों को बचाने के लिए।"

रोहित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

अगली सुबह...

सूरज निकल चुका था।

रोहित ने उस आदमी का धन्यवाद किया और घर के लिए निकल पड़ा।

कुछ देर बाद जंगल खत्म हो गया।

सामने चौड़ा हाईवे था।

उसे लगा अब सब खत्म हो चुका है।

अब वह सुरक्षित है।

खौफनाक जिन्न

उसने राहत की लंबी साँस ली।

फिर आदतन रियर-व्यू मिरर में देखा।

और उसका दिल एक पल के लिए थम गया।

बहुत दूर...

जंगल की शुरुआत पर...

वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

सुबह की धूप में।

शांत मुस्कान के साथ।

वह उसे देख रही थी।

जैसे विदा दे रही हो।

रोहित की आँखें नम हो गईं।

उसने हल्का-सा सिर झुकाया।

और जब दोबारा आईने में देखा...

वहाँ कोई नहीं था।

सिर्फ खाली सड़क।

और दूर खड़ा वह रहस्यमय जंगल...

जहाँ शायद आज भी एक माँ की आत्मा, अजनबियों को अपना बेटा समझकर उनकी जान बचाती है।

समाप्त.

देवगढ़: एक अधूरी दास्तान

 रात...

एक ऐसी चीज़ जिसे हम सिर्फ अंधेरा समझते हैं।

लेकिन कुछ रातें ऐसी होती हैं...

जो अंधेरे से नहीं...

यादों से भरी होती हैं।

ऐसी यादें...

जो मरने के बाद भी मिटती नहीं।

भारत के पश्चिमी हिस्से में एक शहर है...

या यूँ कहिए...

उसके अवशेष हैं।

नाम है...

देवगढ़।

आज वहाँ सिर्फ खंडहर हैं।

टूटी हुई हवेलियाँ...

धूल से ढकी गलियाँ...

और सैकड़ों साल पुरानी दीवारें...

जो अब भी कुछ छिपा रही हैं।

लोग कहते हैं...

दिन के उजाले में भी वहाँ जाने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती।

क्योंकि देवगढ़ सिर्फ एक उजड़ा हुआ शहर नहीं...

एक जिंदा कब्र है।

आधी रात में खंडहर बन चुके प्राचीन देवगढ़ की वीरान सड़क, टूटी हवेलियाँ, घना कोहरा और टॉर्च लिए चलता एक पुलिस अधिकारी।
तीन सौ साल से वीरान पड़ा देवगढ़... जहाँ हर गली एक रहस्य छुपाए बैठी है और हर साया किसी अनकही कहानी का गवाह है।


रात के साढ़े ग्यारह बजे।

आसमान पर बादल ऐसे छाए थे मानो चाँद को किसी ने कैद कर लिया हो।

नए देवगढ़ शहर की सड़कें बारिश से चमक रही थीं।

पुलिस कंट्रोल रूम में अचानक वायरलेस चीखा—

"सर... पुरानी ज्वेलरी दुकान में बड़ी चोरी हुई है... चार आदमी... हथियारबंद... शहर से बाहर भाग रहे हैं!"

इंस्पेक्टर देवधर कांबले ने अपनी कुर्सी से उठते हुए सिर्फ एक बात कही—

"भाग सकते हैं... बच नहीं सकते।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

देवधर का नाम सुनकर बड़े-बड़े अपराधियों के चेहरे का रंग उड़ जाता था।

वह सिर्फ पुलिस अफसर नहीं था...

शिकार पर निकला हुआ शिकारी था।

बारिश तेज हो चुकी थी।

चोरी करने वाले चारों अपराधी जीप छोड़कर भाग रहे थे।

उनके पीछे पुलिस की गाड़ियाँ थीं।

अचानक उनमें से एक चिल्लाया—

"उधर चलो!"

सबकी नजर सामने गई।

दूर अंधेरे में टूटी हुई हवेलियों और काले खंडहरों का विशाल जंगल दिखाई दे रहा था।

पुराना देवगढ़।

तीनों के कदम वहीं रुक गए।

एक ने कांपते हुए कहा—

"पागल हो गया है क्या? वहाँ नहीं जाते..."

दूसरा फुसफुसाया—

"मेरे दादा कहते थे... वहाँ रात में इंसान नहीं रहते..."

पीछे पुलिस की सायरन गूंज रही थी।

उनके पास कोई और रास्ता नहीं था।

और वे दौड़ पड़े...

सीधे उस मृत शहर की तरफ।

देवधर ने जब उन्हें उस ओर भागते देखा तो उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

पुराना देवगढ़।

सैकड़ों साल पुराना शहर।

कभी मुगलों के दौर का सबसे रौनकदार ठिकाना।

रातें यहाँ सोने से नहीं...

शराब, संगीत और तवायफों के नाच से जगमगाती थीं।

दूर-दूर के नवाब...

व्यापारी...

सरदार...

यहाँ आते थे।

लेकिन तीन सौ साल पहले...

एक रात...

कुछ ऐसा हुआ कि पूरा शहर धीरे-धीरे उजड़ गया।

लोग गायब होने लगे।

मौतें होने लगीं।

और फिर...

शहर मर गया।

देवधर ने जीप रोकी।

सामने टूटा हुआ पत्थर का फाटक खड़ा था।

उस पर धूल जमी थी।

लिखा था—

"देवगढ़"

जैसे ही उसने भीतर कदम रखा...

एक अजीब ठंडी हवा उसके शरीर से टकराई।

उसके रोंगटे खड़े हो गए।

दिल ने पहली बार कहा—

"वापस लौट जाओ..."

लेकिन देवधर लौटने वालों में से नहीं था।

मूसलाधार बारिश में देवगढ़ के जर्जर प्रवेश द्वार पर खड़ा इंस्पेक्टर देवधर कांबले, हाथ में टॉर्च और पीछे दिखाई देता उजड़ा हुआ शहर।
चोरों का पीछा करते-करते देवधर उस शहर में प्रवेश कर चुका था, जहाँ लोग दिन के उजाले में भी जाने से डरते थे।


शहर के भीतर अजीब खामोशी थी।

इतनी गहरी कि अपनी साँस भी डरावनी लग रही थी।

टूटी हुई हवेलियाँ...

काले पड़े दरवाजे...

खाली खिड़कियाँ...

ऐसा लगता था जैसे हर खिड़की के पीछे कोई खड़ा उसे देख रहा हो।

बारिश की बूंदें गिर रही थीं।

लेकिन...

देवधर को अचानक एहसास हुआ—

बूंदों की आवाज गायब हो गई है।

पूरा शहर मौन था।

पूरी तरह।

तभी...

कहीं दूर से घुंघरुओं की आवाज आई।

छन्न... छन्न... छन्न...

देवधर रुक गया।

उसने टॉर्च घुमाई।

कोई नहीं।

आवाज बंद।

फिर शुरू।

और इस बार थोड़ा पास।

छन्न...

छन्न...

छन्न...

उसके साथ आए दो कांस्टेबल घबराने लगे।

एक बोला—

"सर... वापस चलते हैं..."

तभी...

सामने वाली हवेली की दूसरी मंजिल पर एक औरत दिखाई दी।

सफेद लिबास।

लंबे बाल।

और लाल आँखें।

पलक झपकते ही...

वह गायब।

कांस्टेबल चीख पड़ा।

देवधर दौड़कर ऊपर पहुँचा।

लेकिन वहाँ सिर्फ धूल थी।

और फर्श पर पड़े थे...

ताजे पैरों के निशान।

नंगे पैर।

जैसे कोई अभी-अभी वहाँ खड़ा था।

देवधर को पुराने शहर के बीचोंबीच एक विशाल कोठा मिला।

टूटा हुआ।

लेकिन अजीब तरह से बाकी जगहों से बेहतर हालत में।

दरवाजे पर उर्दू में कुछ लिखा था।

धूल हटाने पर शब्द उभरे—

"जमनाबाई महल"

देवधर भीतर गया।

और अचानक...

उसे लगा जैसे समय पीछे घूम गया हो।

उसके सामने पूरा कोठा जीवित हो उठा।

हजारों दीये जल रहे थे।

संगीत बज रहा था।

शराब की महक थी।

हँसी थी।

शोर था।

नवाब बैठे थे।

सरदार बैठे थे।

और फिर...

सीढ़ियों से एक स्त्री उतरी।

जमनाबाई।

इतनी सुंदर कि जैसे चाँद ने इंसानी रूप ले लिया हो।

बड़ी आँखें।

माथे पर झूमर।

लाल लहंगा।

पायल।

घुंघरू।

और मुस्कान...

जिसमें कोई गहरा दर्द छुपा था।

देवधर समझ गया।

वह अतीत देख रहा था।

तीन सौ साल पुराना अतीत।


देवधर ने देखा...

जमनाबाई सिर्फ तवायफ नहीं थी।

वह एक गुप्त प्रेम कहानी की नायिका थी।

वह एक युवा सैनिक से प्रेम करती थी।

नाम था—

वीरेंद्र।

दोनों भागकर शादी करना चाहते थे।

लेकिन देवगढ़ के लालची सरदारों को यह मंजूर नहीं था।

क्योंकि जमनाबाई उनकी सबसे कीमती संपत्ति थी।

एक रात...

जमनाबाई और वीरेंद्र भागने वाले थे।

लेकिन विश्वासघात हुआ।

उनके ही किसी करीबी ने उन्हें धोखा दिया।

कोठे के तहखाने में...

वीरेंद्र को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया।

और जमनाबाई...

उसका गला काटकर मार दी गई।

फिर उन‌ दोनों की मौत जैसें उस कहर बन गई 

उस रात के बाद...

देवगढ़ पर मौत का साया छा गया।

जैसे ही देवधर को सच पता चला...

पूरा कोठा कांप उठा।

दीवारें हिलने लगीं।

अंधेरे से चीखें आने लगीं।

सैकड़ों भूतिया चेहरे दिखाई देने लगे।

उसी समय चोरी करने वाले चारों अपराधी बाहर आ गए।

वे डर के मारे रो रहे थे।

तभी...

जमनाबाई का असली रूप प्रकट हुआ।

लंबे बिखरे बाल।

खून से सना चेहरा।

कटी हुई गर्दन।

जलती आँखें।

पूरा महल उसकी चीख से गूंज उठा।

देवधर भी डर गया पर वह भागा नहीं।

फिर जमनाबाई का चेहरा बदल गया।

भयानक रूप गायब हो गया।

वह फिर वैसी ही सुंदर दिखाई दी जैसी कभी थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

उसकी आवाज हवा में घुल गई।

और फिर...

वह प्रकाश बनकर आसमान में विलीन हो गई।

खंडहर बने मुगलकालीन कोठे की सीढ़ियों पर खड़ी लाल परिधान में रहस्यमयी जमनाबाई, चारों ओर धुंध और भयावह सन्नाटा।
वह भूत नहीं थी... वह तीन सौ साल पुरानी एक अधूरी दास्तान थी, जो अब भी अपने सच के उजागर होने का इंतज़ार कर रही थी।


सुबह होने लगी।

पुराने देवगढ़ पर पहली बार सूरज की किरणें अलग लग रही थीं।

मानो किसी भारी बोझ से मुक्ति मिली हो।

देवधर चोरी के आरोपियों को लेकर शहर लौटा।

उसकी बहादुरी की चर्चा पूरे राज्य में होने लगी।

लोग, मीडिया ने उसकी बड़ी तारीफ की।

लेकिन देवधर जानता था...

उस रात जो हुआ...

उसे कोई कभी नहीं समझ पाएगा।

कुछ महीनों बाद...

पुराने देवगढ़ में खुदाई हुई।

जींस में जमनाबाई और वीरेंद्र की कहानी का सच सामने आया।

और उसी रात...

जब देवधर अपनी बालकनी में खड़ा था...

हवा का एक झोंका आया।

बहुत हल्की...

बहुत दूर से...

घुंघरुओं की आवाज सुनाई दी।

छन्न...

छन्न...

छन्न...

लेकिन उस आवाज में अब कोई डर नहीं था।

सिर्फ विदाई थी।


वह फिर वापस आया

 


बरसात का मौसम था।

रात के लगभग ग्यारह बजे थे।

राजापुर गांव के बाहर फैले खेतों पर धुंध की पतली चादर बिछी हुई थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें अंधेरे को और भयावह बना रही थीं। आसमान में बादल इस तरह छाए थे कि चांद का नामोनिशान नहीं था।

गांव के बीचोंबीच एक विशाल पुराना वाड़ा खड़ा था।

सौ साल पुराना।

ऊंची दीवारें... लकड़ी के भारी दरवाजे... और अनगिनत रहस्य अपने भीतर दबाए हुए।

उस वाड़े में देशमुख परिवार रहता था।

 बड़ा परिवार था। घर में बुजुर्ग, बेटे, बहुएं, बच्चे—सब साथ रहते थे।

लेकिन अब पिछले कुछ महीनों से उस घर में कुछ ऐसा हो रहा था जिसने सबकी नींद छीन ली थी।

राजापुर गांव के एक पुराने वाड़े के बाहर खड़ा लाल आंखों वाला रहस्यमयी मृत व्यक्ति, चारों ओर घना कोहरा और डरे हुए ग्रामीण।
जिसे पंद्रह साल पहले दफना दिया गया था... वह फिर लौट आया। राजापुर की सबसे भयावह रात की शुरुआत।


शुरूवात आवाजों से हुईं थीं।

एक रात  ऊपर वाली मंजिल से किसी के चलने की आवाज आई।

ठक...

ठक...

ठक...

जैसे कोई नंगे पैर लकड़ी के फर्श पर टहल रहा हो।

लेकिन जब कोई वहां देखने गया...

तो वहां कोई नहीं था।

फिर कभी रसोई में रखे बर्तन अपने आप गिरने लगे।

कभी पानी के नल खुल जाते।

कभी घर का मुख्य दरवाजा रात में अपने आप खुला मिल जाता।

इस बात से महिलाएं सबसे ज्यादा डर गई थीं।

खासकर बड़ी बहू, सविता।

उसे कई बार ऐसा लगता कि कोई उसे देख रहा है।

किसी की निगाहें उसके पीछे हैं।

लेकिन पीछे मुड़ने पर हमेशा उसे खाली अंधेरा मिलता था।

एक रात सविता रसोई में पानी पिने गई थी।

घर के बाकी लोग ऊपर सो रहे थे।

घड़ी में साढ़े बारह बज रहे थे।

अचानक उसे महसूस हुआ कि आंगन में कोई खड़ा है।

उसने खिड़की से बाहर झांका।

और उसके शरीर का खून जम गया।

आंगन के बीचोंबीच...

एक आदमी खड़ा था।

उसके कपड़े मिट्टी से सने हुए थे।

चेहरा सड़ा हुआ।

आंखें...

खून जैसी लाल।

वह बिना पलक झपकाए सविता को देख रहा था।

उसके होंठ धीरे-धीरे फैलने लगे।

एक भयानक मुस्कान।

सविता चीख भी नहीं पाई।

उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया।

और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी।

आधी रात को खिड़की के पास खड़ी डरी हुई बड़ी बहू, बाहर आंगन में लाल आंखों वाला मृत आदमी उसे घूरता हुआ।
एक नजर... और उसकी दुनिया बदल गई। खिड़की के बाहर खड़ा वह चेहरा किसी जीवित इंसान का नहीं था।


अगले दिन पूरे गांव में खबर फैल गई।

एक पुजारी बुलाया गया।

घर में हवन किया गया।

पुरे घर में गंगाजल छिड़का गया।

उसके कुछ दिन तक तो सब सामान्य रहा।

सबको लगा समस्या खत्म अब हो गई।

लेकिन असली भय तो अभी शुरू हुआ था।

एक रात में बच्चों के कमरे से खिलौनों के चलने की आवाजें आने लगीं।

दीवारों पर खरोंचों के निशान दिखाई दिए।


एक दिन परिवार की बुजुर्ग रिश्तेदार...

गोदावरी काकी...

कई वर्षों बाद घर आईं।

उनकी उम्र अस्सी साल के आसपास थी।

उन्होंने जीवन में बहुत कुछ देखा था।

उन्हें अंधविश्वासों पर विश्वास नहीं था।

लेकिन उस शाम जब वह आंगन में बैठी थीं...

उन्होंने उसे देखा।

बस एक पल के लिए।

बरगद के पेड़ के पीछे।

एक आदमी।

सड़ा हुआ चेहरा।

खूनी आंखें।

और गर्दन अजीब तरह से एक ओर झुकी हुई।

गोदावरी काकी का चेहरा पीला पड़ गया।

उन्होंने कांपते हुए कहा—

"ये... ये तो मोहन है..."

पूरा परिवार सन्न रह गया।

मोहन।

यह नाम वर्षों से किसी ने नहीं लिया था।

करीब पंद्रह साल पहले मोहन देशमुख 

परिवार का सबसे छोटा भाई।

जिद्दी लेकिन दिल का अच्छा।

खानदानी जमीन के विवाद को लेकर एक दिन घर में भयंकर झगड़ा हुआ था।

झगड़ा इतना बढ़ गया कि फिर हाथापाई हो गई।

और उसी दौरान...

मोहन सीढ़ियों से गिर पड़ा।

उसका सिर पत्थर से टकराया।

और उसकी मौत वहीं हो गई।

यह सब अचानक हो गया था।

लेकिन...

परिवार की बदनामी के डर से सब चुप रहे, सच छिपा दिया गया।

अचानक तबीयत खराब होने की वजह से

उसकी प्राकृतिक मृत्यु हुई है।

ऐसा कहा गया।

सच्चाई दफना दी गई।

और मोहन भी।


अब सब समझ आने लगा था।

मोहन की आत्मा वापस आ चुकी थी।

और वह शांत नहीं थी।

उस रात पूरे घर ने वह दृश्य देखा जिसे कोई कभी नहीं भूल सका।

आधी रात को

अचानक घर की सारी लाइटें बुझ गईं थीं।

बच्चों के रोने की आवाजें आने लगीं।

दीवारों पर किसी ने खून से लिखा—

"झूठ..."

फिर दूसरी दीवार पर—

"हत्यारे..."

और फिर पूरे घर में एक ही आवाज गूंजने लगी।

भारी।

टूटी हुई।

गुस्से से भरी।

"मैं... किसी... को... नहीं... छोड़ूंगा..."

महिलाएं रोने लगीं।

पुरुषों की भी हिम्मत जवाब देने लगी।


उस दिन के बाद कई तांत्रिक बुलाए गए।

कई पुजारी आए।

पर कोई टिक नहीं पाया।

एक तांत्रिक तो आधी रात को भाग गया।

उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—

"ये साधारण आत्मा नहीं है... ये क्रोध में जल रही है..."

हर बीतते दिन के साथ मोहन अब और शक्तिशाली होता जा रहा था।

आखिरकार परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य ने निर्णय लिया।

और वह दूर पहाड़ों में रहने वाले प्रसिद्ध तांत्रिक...

भैरवनाथ को लेकर आए।

कहा जाता था कि उन्होंने कई खतरनाक आत्माओं को बांधा था।

अमावस्या की रात चुनी गई।

पूरे वाड़े में मंत्रों की गूंज फैल गई।

आंगन में अग्निकुंड जलाया गया।

घड़ी ने बारह बजाए।

और तभी...

तापमान अचानक गिर गया।

सभी की सांसें धुएं जैसी दिखाई देने लगीं।

बरगद का पेड़ जोर-जोर से हिलने लगा।

और उसके नीचे...

मोहन प्रकट हुआ।

पहले से भी ज्यादा भयानक।

उसकी आंखों से खून बह रहा था।

उसकी चीख सुनकर बच्चों ने कान बंद कर लिए।

तांत्रिक और मोहन के बीच घंटों संघर्ष चला।

पर अंत में...

प्राचीन वाड़े के आंगन में अग्निकुंड के सामने तांत्रिक और क्रोधित आत्मा के बीच अलौकिक संघर्ष, चारों ओर डरा हुआ परिवार।
मंत्रों की गूंज, आग की लपटें और बदले से भरी आत्मा... फैसला होना था कि उस रात कौन बचेगा और कौन हमेशा के लिए कैद होगा।


भैरवनाथ ने अपनी शक्ती और अनुभव से एक प्राचीन तांबे के कलश में उस आत्मा को कैद कर दिया।

मोहन की अंतिम चीख पूरे गांव में गूंज उठी।

फिर...

सब शांत हो गया।

उपसंहार

कुछ महीनों बाद देशमुख परिवार की जिंदगी सामान्य हो गई।

डर खत्म हो गया।

लोग फिर हंसने लगे।

कलश को गांव से दूर एक प्राचीन मंदिर में दफना दिया गया।

सबको लगा...

कहानी समाप्त हो चुकी है।

लेकिन...

एक बरसाती रात...

मंदिर का वृद्ध पुजारी वहां से गुजर रहा था।

उसे जमीन के नीचे से...

ठक...

ठक...

ठक...

की आवाज सुनाई दी।

जैसे कोई अंदर से कलश पर दस्तक दे रहा हो।

पुजारी का चेहरा सफेद पड़ गया।

और तभी...

अंधेरे में दो लाल आंखें चमकीं।