पहली बार मैंने उस बिल्डिंग को देखा तो कुछ भी असामान्य नहीं लगा।
मुंबई जैसे शहर में ऐसी पुरानी रिहायशी इमारतें हर गली में मिल जाती हैं — थोड़ी थकी हुई, थोड़ी जिद्दी, लेकिन अब भी खड़ी। सीमेंट का रंग उखड़ा हुआ, खिड़कियों के ग्रिल जंग खाए हुए, और नीचे पान की पीक से रंगी दीवारें।
लेकिन असली कहानी उस बिल्डिंग की दीवारों में नहीं थी।
असली कहानी थी — चौथी मंज़िल में।
और उस लिफ्ट में…
जो वहाँ कभी नहीं जाती थी।
![]() |
| हर डरावनी कहानी… बिल्कुल सामान्य दिखने वाली जगह से शुरू होती है। |
मैं उस समय फ्रीलांस काम कर रहा था। नाम – आरव। उम्र 29। पेशा – कंटेंट एडिटर। घर से काम करने का रोमांटिक सपना लेकर शहर में आया था, लेकिन हकीकत में हर महीने किराया जुटाने की जद्दोजहद चल रही थी।
एक दोस्त ने कहा,
“भाई, सस्ता फ्लैट चाहिए तो आराम नगर देख। पुराने बिल्डिंग्स हैं, पर किराया manageable है।”
मैंने देखा।
पसंद आया।
कम से कम जेब के हिसाब से।
बिल्डिंग का नाम था — शांतिदीप अपार्टमेंट।
नाम जितना शांत, माहौल उतना ही… अजीब।
मैं पहली बार जब अंदर गया, तो एक हल्की सी सीलन की गंध महसूस हुई। पुरानी बिल्डिंग्स में ये सामान्य बात है, पर यहाँ गंध में कुछ और मिला हुआ था।
जैसे…
बासीपन नहीं,
बल्कि — रुका हुआपन।
वॉचमैन बूढ़ा था। दुबला-पतला, सफेद बाल, आँखें हमेशा थोड़ी झुकी हुई।
“कौन?” उसने पूछा।
“फ्लैट देखने आया हूँ। सेकंड फ्लोर।”
उसने बिना मुस्कुराए सिर हिलाया।
“लिफ्ट उधर है।”
मैं लिफ्ट की तरफ बढ़ा।
पुरानी ऑटोमैटिक लिफ्ट।
बटन हल्के पीले पड़ चुके।
मैंने देखा।
1
2
3
…
5
मैं रुक गया।
“4 कहाँ है?”
पीछे से बूढ़े वॉचमैन की आवाज़ आई —
“लिफ्ट चौथी मंज़िल पर नहीं जाती।”
मैंने सोचा मज़ाक होगा।
“मतलब?”
“मतलब नहीं जाती।”
“खराब है?”
वो कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला —
“सीढ़ियाँ हैं।”
उस जवाब में कुछ ऐसा था जिसने मेरे दिमाग में हल्की सी खरोंच डाल दी।
पर मैंने ज्यादा सोचा नहीं।
फ्लैट ठीक था।
किराया ठीक था।
डील फाइनल।
पहले कुछ दिन बेहद सामान्य रहे।
मुंबई की भागदौड़, काम, रातें, थकान।
बिल्डिंग में लोग कम बोलने वाले थे।
लेकिन एक चीज़ लगातार मेरे दिमाग में अटकती रही —
चौथी मंज़िल।
हर बार जब मैं लिफ्ट में जाता…
उँगली अपने आप बटन पैनल पर रुक जाती।
1
2
3
…
5
एक खाली जगह नहीं थी।
जैसे कभी “4” था ही नहीं।
एक दिन मैंने नीचे किराने वाले से पूछा।
“भाई, इस बिल्डिंग में चौथा फ्लोर है ना?”
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे सवाल अजीब हो।
“हाँ है।”
“फिर लिफ्ट क्यों नहीं जाती?”
वो हँसा नहीं।
बस बोला —
“पुरानी बिल्डिंग है।”
“तो खराब?”
उसने जवाब नहीं दिया।
बस पैसे गिने।
अब जिज्ञासा धीरे-धीरे बेचैनी में बदल रही थी।
पहली अजीब घटना एक रात हुई।
करीब साढ़े ग्यारह बजे।
मैं काम खत्म करके लिफ्ट से ऊपर जा रहा था।
लिफ्ट खाली।
हल्की गुनगुनाहट।
जैसे ही लिफ्ट तीसरी मंज़िल पार कर रही थी…
अचानक झटका लगा।
लिफ्ट रुक गई।
डिस्प्ले पर कोई नंबर नहीं।
बस अंधेरा।
दिल की धड़कन तेज।
मैंने इमरजेंसी बटन दबाया।
कोई आवाज़ नहीं।
और तभी…
मुझे लगा —
लिफ्ट चल नहीं रही थी,
बल्कि…
कोई बाहर चल रहा था।
धीमे कदम।
टक…
टक…
टक…
बिल्कुल लिफ्ट के दरवाज़े के सामने।
मैं जड़ हो गया।
आवाज़ साफ थी।
कोई बाहर था।
लेकिन…
लिफ्ट तो चौथी मंज़िल पर रुकती ही नहीं।
कदमों की आवाज़ कुछ सेकंड चलती रही।
फिर…
दरवाज़े पर हल्की सी थप…
जैसे किसी ने उँगलियों से छुआ हो।
मेरे शरीर में ठंड दौड़ गई।
अचानक लिफ्ट फिर चल पड़ी।
डिस्प्ले – 5
दरवाज़ा खुला।
मैं बाहर निकला।
पसीने से भीगा हुआ।
उस रात मैंने खुद को समझाया —
“मेकैनिकल glitch।”
दिमाग हमेशा लॉजिक ढूँढ लेता है।
लेकिन अब चीज़ें नियमित होने लगीं।
कभी-कभी रात में…
मुझे सीढ़ियों से कदमों की आवाज़ सुनाई देती।
ऊपर…
नीचे…
लेकिन…
चौथी मंज़िल के पास पहुँचकर आवाज़ गायब।
एक दिन मैंने तय किया।
बस।
आज देखना ही है।
दोपहर का समय।
बिल्डिंग शांत।
मैं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगा।
1…
2…
3…
सामान्य।
तीसरी और पाँचवीं मंज़िल के बीच…
एक अजीब सा सन्नाटा था।
जैसे आवाज़ें यहाँ आकर मर जाती हों।
मैं चौथी मंज़िल पर पहुँचा।
और…
मैं वहीं रुक गया।
कॉरिडोर बाकी फ्लोर्स जैसा नहीं था।
यहाँ…
रोशनी धुंधली थी।
बल्ब जल रहा था, लेकिन जैसे पूरा प्रकाश नहीं दे रहा।
दीवारों का रंग ज्यादा उखड़ा हुआ।
हवा भारी।
सबसे अजीब चीज़…
दरवाज़े।
बाकी फ्लोर्स पर हर फ्लैट का दरवाज़ा अलग था।
यहाँ…
सभी दरवाज़े एक जैसे।
सभी बंद।
सभी पर धूल।
जैसे…
यहाँ कोई रहता ही नहीं।
लेकिन…
कॉरिडोर में धूल नहीं थी।
जैसे अभी-अभी कोई चला हो।
मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
और तभी…
मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
बहुत धीमी।
बहुत दूर।
जैसे…
कोई फुसफुसा रहा हो।
मैंने ध्यान लगाया।
आवाज़…
मेरे नाम जैसी लगी।
“आरव…”
मैं जम गया।
“आरव…”
इस बार साफ।
कॉरिडोर के अंत से।
मैंने देखा।
कोई नहीं।
लेकिन…
![]() |
| कभी-कभी डर किसी परछाईं में नहीं… एक गायब बटन में छिपा होता है। |
एक दरवाज़ा…
हल्का सा खुला था।
बस एक इंच।
दिल की धड़कन कानों में गूँजने लगी।
मेरे अंदर दो आवाज़ें लड़ रही थीं —
मत जा।
देख।
मत जा।
देख।
मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
जैसे ही दरवाज़े के पास पहुँचा…
अचानक अंदर से…
हल्की सी हँसी सुनाई दी।
और उसी पल…
दरवाज़ा अपने आप…
धीरे-धीरे…
बंद हो गया।
मैं भागा।
बिना पीछे देखे।
सीढ़ियों से नीचे।
उस दिन के बाद…
सब कुछ बदल गया।
अब लिफ्ट में हर बार…
चौथी मंज़िल के पास…
हल्की सी रुकावट महसूस होती।
जैसे कोई invisible friction।
रात में…
स्पष्ट कदमों की आवाज़।
एक ही पैटर्न।
तीसरी मंज़िल तक।
फिर…
धीमा।
फिर…
ठीक मेरे दरवाज़े के बाहर।
टक…
टक…
टक…
मैं साँस रोककर सुनता।
और हर बार…
आवाज़ वहीं रुक जाती।
लेकिन…
कभी दरवाज़ा नहीं खटखटाया गया।
बस…
खड़ा।
रुका हुआ।
जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो।
एक रात…
मैंने हिम्मत की।
आवाज़ आई।
मैंने तुरंत दरवाज़ा खोला।
कॉरिडोर खाली।
लेकिन…
फर्श पर…
हल्के गीले पैरों के निशान।
जो…
सीधे चौथी मंज़िल की सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।
मेरे शरीर से जैसे खून निकल गया।
अब डर curiosity नहीं था।
अब डर…
हकीकत बन चुका था।
मैंने नीचे वॉचमैन से पूछा।
इस बार सीधे।
“चौथी मंज़िल में क्या है?”
वो लंबे समय तक चुप रहा।
फिर बोला —
“पहले लोग रहते थे।”
“अब?”
“अब नहीं।”
“क्यों?”
उसने मेरी आँखों में देखा।
पहली बार।
“क्योंकि कुछ लोग… नीचे नहीं आए।”
मेरे शरीर में बिजली दौड़ गई।
“मतलब?”
वो बोला —
“लिफ्ट कभी नहीं गई वहाँ।”
“सीढ़ियाँ थीं।”
“पर…”
“सब नीचे नहीं आए।”
मैंने कुछ और पूछना चाहा।
वो उठकर चला गया।
आखिरी घटना…
मेरी ज़िंदगी की सबसे डरावनी रात।
करीब 2:17 AM।
मुझे नींद से झटका लगा।
कमरे में कोई आवाज़ नहीं।
लेकिन…
![]() |
| कुछ गलियारे सिर्फ खाली नहीं होते… वे इंतज़ार करते हैं। |
एक एहसास।
मैं अकेला नहीं था।
धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
और…
मेरी साँस रुक गई।
कमरे के कोने में…
अंधेरे में…
कोई खड़ा था।
शक्ल साफ नहीं।
बस…
सिलुएट।
और फिर…
मुझे एहसास हुआ।
वो…
चलकर आया नहीं था।
वो पहले से ही वहाँ था।
धीरे-धीरे…
वो रोशनी में आया।
और…
मेरे शरीर से जैसे आत्मा निकल गई।
वो…
मैं था।
बिल्कुल मैं।
लेकिन…
मुस्कुरा रहा था।
वही मुस्कान…
जो शीशे में देखी थी।
वही…
जो चौथी मंज़िल पर महसूस हुई थी।
वो धीरे से बोला —
“लिफ्ट यहाँ नहीं आती…”
“…लेकिन हम आते हैं।”
मैं चीखा।
आँखें बंद।
जब खोलीं…
कमरा खाली।
लेकिन…
दरवाज़ा खुला हुआ।
और बाहर…
सीढ़ियों की तरफ…
गीले पैरों के निशान।
जो…
ऊपर जा रहे थे।
चौथी मंज़िल की तरफ।
मैंने अगले ही दिन फ्लैट छोड़ दिया।
आज भी जब किसी बिल्डिंग में लिफ्ट देखता हूँ…
तो अनजाने में बटन पैनल देखता हूँ।
1
2
3
4
5
और हर बार…
दिल में एक सवाल उठता है —
अगर लिफ्ट चौथी मंज़िल पर न जाए…
तो…
वहाँ आखिर कौन जाता है?
और सबसे डरावना सवाल —
क्या वो अब भी वहीं हैं…
या…
नई बिल्डिंग्स में शिफ्ट हो चुके हैं? 😐














