मौत की आहट

 




कुछ मौतें अचानक नहीं आतीं... उनके आने से पहले कोई हमारे आसपास चलने लगता है।


रात के करीब साढ़े दस बजे थे।





पहाड़ी रास्ते पर चलती जीप की हेडलाइट्स के सामने धुंध की एक मोटी परत तैर रही थी। सड़क इतनी संकरी थी कि एक तरफ पहाड़ की काली चट्टानें थीं और दूसरी तरफ गहरी खाई। कहीं-कहीं पेड़ों की सूखी डालियाँ सड़क के ऊपर इस तरह झुकी थीं, जैसे किसी ने जानबूझकर रास्ता रोक रखा हो।


जीप में बैठे निखिल सावंत ने मोबाइल की स्क्रीन देखी।


नेटवर्क गायब था।


पिछले पैंतालीस मिनट से उसे एक भी गाड़ी नहीं मिली थी। ड्राइवर ने भी रास्ते में बातचीत करना बंद कर दिया था। बस इंजन की घरघराहट और टायरों के नीचे कुचलते पत्थरों की आवाज सुनाई दे रही थी।


निखिल को अगले दिन सुबह एक सरकारी सर्वे के सिलसिले में देवकुंड नाम की जगह पहुंचना था। पहाड़ियों के बीच बसा वह छोटा-सा इलाका उसके लिए बिल्कुल अनजान था। मुख्य सड़क पर भूस्खलन होने के कारण ड्राइवर ने यह पुराना रास्ता चुना था।


अचानक जीप की गति धीमी हो गई।


सामने सड़क के बीचोंबीच कोई खड़ा था।


सफेद कपड़े पहने एक आदमी।


उसका चेहरा हेडलाइट्स की रोशनी में साफ दिखाई नहीं दे रहा था। वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था। न हाथ हिला रहा था, न रास्ते से हट रहा था।



ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए।


निखिल ने शीशे से बाहर देखा।


आदमी के दोनों पैर सड़क पर थे, लेकिन उसका शरीर थोड़ा झुका हुआ था। जैसे वह बहुत देर से किसी का इंतजार कर रहा हो।


ड्राइवर ने हॉर्न बजाया।


कोई प्रतिक्रिया नहीं।


दूसरी बार हॉर्न बजा।


इस बार उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।


और निखिल के शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई।


उस आदमी का चेहरा नहीं था।


सिर्फ एक काली, गहरी जगह थी, जहां चेहरा होना चाहिए था।


निखिल ने तुरंत ड्राइवर की तरफ देखा।


लेकिन ड्राइवर अपनी सीट पर नहीं था।


वह जीप से बाहर खड़ा था।


निखिल को समझ नहीं आया कि वह कब उतरा।


वह कुछ बोल पाता, उससे पहले ड्राइवर ने सड़क के उस पार इशारा किया।


वहां एक पुराना पत्थर का मील का पत्थर था।


उस पर लिखा था—


देवकुंड – 12 किलोमीटर


और उसके ठीक नीचे लाल रंग से कुछ लिखा था।


वापस चले जाओ।


निखिल ने दोबारा सड़क की तरफ देखा।


वह सफेद कपड़ों वाला आदमी गायब था।


लेकिन अब जीप की पिछली सीट पर कोई बैठा था।


निखिल ने गर्दन घुमाई।


एक बूढ़ा आदमी।


उसके कपड़े भीगे हुए थे। सिर नीचे झुका था और दोनों हाथ घुटनों पर रखे थे।


निखिल के मुंह से आवाज तक नहीं निकली।


बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।


उसकी आंखें खुली थीं, लेकिन उनमें पुतलियां नहीं थीं।


फिर उसने निखिल की तरफ देखकर कहा—


"तुम्हें इतनी देर नहीं करनी चाहिए थी।"


अगले ही पल जीप के अंदर की सारी लाइटें बुझ गईं।


और किसी ने निखिल के कान के बिल्कुल पास फुसफुसाया—


"अब तुम्हारी बारी है।"



सुबह करीब चार बजे निखिल की आंख खुली।


वह एक पुराने लकड़ी के बिस्तर पर लेटा था।


कमरे में सीलन की गंध थी। छत पर लकड़ी की काली बल्लियां थीं और खिड़की के बाहर देवदार जैसे ऊंचे पेड़ हवा के बिना भी धीरे-धीरे हिल रहे थे।


उसका सिर भारी था।


कुछ देर तक उसे पिछली रात की घटनाएं याद नहीं आईं। फिर अचानक सफेद कपड़ों वाला आदमी, खाली चेहरा और पिछली सीट पर बैठा बूढ़ा उसकी आंखों के सामने घूम गए।


वह झटके से उठ बैठा।


उसके जूते कमरे के दरवाजे के पास रखे थे। मोबाइल मेज पर पड़ा था। स्क्रीन टूटी हुई थी।


समय सुबह 4:17।


उसने कमरे का दरवाजा खोला।


बाहर एक लंबा बरामदा था। लकड़ी का फर्श जगह-जगह से उखड़ा हुआ था। बरामदे के आखिर में एक पीली रोशनी वाला बल्ब जल रहा था।


वह बाहर निकला।


मुख्य दरवाजे के पास एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था। उसके सामने पुरानी रजिस्टर बुक खुली थी।


निखिल ने पूछा कि वह यहां कैसे पहुंचा।


आदमी ने बिना उसकी तरफ देखे रजिस्टर का पन्ना पलटा।


"रात को लाए थे आपको।"


"कौन लाया था?"


आदमी ने कुछ क्षण उसे देखा।


"आप अकेले आए थे।"


निखिल ने उसे पिछली रात की जीप और ड्राइवर के बारे में बताया।


उस आदमी के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।


उसने सिर्फ रजिस्टर बंद किया और कहा—


"आपका कमरा नंबर सात है। नाश्ता आठ बजे मिलेगा।"


निखिल ने कमरे की चाबी देखी।


उस पर नंबर सात लिखा था।


लेकिन उसके हाथ में जो चाबी थी, उस पर नंबर नौ खुदा हुआ था।


उसने कुछ कहने के लिए सिर उठाया।


आदमी वहां नहीं था।


रजिस्टर मेज पर खुला पड़ा था।


निखिल ने अनायास उसके पन्ने पर नजर डाली।


आखिरी दर्ज नाम के नीचे उसकी अपनी लिखावट में कुछ लिखा था।


निखिल सावंत — आगमन: 2 अक्टूबर।


आज 3 अक्टूबर थी।


उसने कल रात इस जगह कदम भी नहीं रखा था।


फिर रजिस्टर में उसकी एंट्री किसने की?


और सबसे अजीब बात...


उसके नाम के आगे प्रस्थान की तारीख भी लिखी थी।


3 अक्टूबर।


---


दिन निकलने के बाद निखिल ने खुद को समझाया कि रात की थकान, अंधेरा और पहाड़ी रास्ते की घटनाओं ने उसके दिमाग पर असर डाला होगा।


उसने अपना काम शुरू किया।


देवकुंड में उसे एक पुराने जलाशय और उसके आसपास की जमीन का सर्वे करना था। वहां पहुंचने के लिए विश्रामगृह से लगभग दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।


दिनभर काम करने के बाद वह शाम को लौटा।


उसका कमरा नंबर सात था।


दरवाजा खोलते ही उसे कुछ अलग महसूस हुआ।


कमरे की खिड़की अंदर से बंद थी, जबकि सुबह उसने उसे खुला छोड़ा था।


मेज पर रखा पानी का गिलास खाली था।


और बिस्तर की चादर पर किसी के गीले पैरों के निशान थे।


वे निशान दरवाजे से शुरू नहीं होते थे।


वे सीधे कमरे की पिछली दीवार से निकलते थे।


दीवार तक जाते थे।


और वहीं खत्म हो जाते थे।


निखिल कुछ देर उन्हें देखता रहा।


फिर उसने दीवार पर हाथ रखा।


दीवार ठंडी थी।


असामान्य रूप से ठंडी।


रात के खाने के बाद वह सोने की कोशिश करने लगा। बाहर घना अंधेरा था। दूर कहीं किसी जानवर की आवाज सुनाई दे रही थी।


करीब ग्यारह बजे उसकी नींद खुली।


दरवाजे के बाहर किसी के चलने की आवाज आ रही थी।


धीमे कदम।


एक... दो... तीन...


फिर सन्नाटा।


कुछ देर बाद वही कदम दोबारा सुनाई दिए।


इस बार वे दरवाजे के बिल्कुल पास आकर रुक गए।


निखिल ने सांस रोक ली।


दरवाजे के नीचे की पतली जगह से उसे बाहर की रोशनी दिखाई दे रही थी।


उस रोशनी में किसी के पैरों की परछाईं थी।


नंगे पैर।


लेकिन उन पैरों की उंगलियां उल्टी दिशा में थीं।


निखिल का गला सूख गया।


कुछ सेकंड बाद दरवाजे पर तीन हल्की चोटें पड़ीं।


टक...


टक...


टक...


उसने कोई जवाब नहीं दिया।


चौथी चोट नहीं पड़ी।


इसके बजाय दरवाजे के दूसरी तरफ से उसकी अपनी आवाज सुनाई दी।


"निखिल... दरवाजा खोल।"


वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।


उसी का लहजा।


उसी की सांस लेने का तरीका।


फिर बाहर खड़े व्यक्ति ने धीरे से कहा—


"मैं अंदर हूं... तू बाहर क्यों खड़ा है?"


निखिल बिस्तर से पीछे हट गया।


उसने देखा कि कमरे के कोने में रखे आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई नहीं दे रहा था।


आईने में बिस्तर खाली था।


और दरवाजे के पास एक दूसरा निखिल खड़ा था।


उसका चेहरा दीवार की तरफ था।


लेकिन उसके प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।


और मुस्कुराया।


---


अगली सुबह निखिल ने विश्रामगृह छोड़ने का फैसला किया।


लेकिन बाहर निकलते ही उसे पता चला कि रात में भारी बारिश हुई थी। पहाड़ी रास्ते पर मिट्टी और पत्थर गिरने से रास्ता बंद था।


मोबाइल में अब भी नेटवर्क नहीं था।


वह मुख्य कार्यालय में गया और वहां बैठे आदमी से रास्ता खुलने के बारे में पूछा।


आदमी ने बिना कोई जवाब दिए एक पुरानी तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी।


तस्वीर में यही विश्रामगृह था।


लेकिन वह नया बना हुआ दिखाई दे रहा था।


तस्वीर के नीचे साल लिखा था—1989।


निखिल ने तस्वीर पलटी।


पीछे कुछ नाम लिखे थे।


एक नाम पर उसकी नजर रुक गई।


विजय सावंत।


उसे अपने पिता का नाम याद आया।


उसके पिता का नाम विजय था।


निखिल ने पूछा कि तस्वीर में यह कौन है।


आदमी ने तस्वीर वापस ले ली।


"पुराना कर्मचारी था।"


"अब कहां है?"


"यहीं कहीं होगा।"


निखिल को उसका जवाब अजीब लगा।


उसने पूछा कि क्या यहां कोई पुराना रिकॉर्ड रूम है।


आदमी ने बरामदे के आखिरी हिस्से की तरफ इशारा किया।


वहां एक छोटा-सा दरवाजा था, जो बाहर से जंग लगे ताले से बंद था।


निखिल ने ताला हटाया।


अंदर पुराने कागजों, फाइलों और टूटे फर्नीचर का ढेर था।


धूल की मोटी परत के बीच उसे एक रजिस्टर मिला।


उसने पन्ने पलटने शुरू किए।


1989 की एक घटना का विवरण दर्ज था।


उस वर्ष भारी बारिश के दौरान विश्रामगृह में आग लग गई थी। उस रात वहां ठहरे सात लोगों में से छह की मौत हो गई थी।


सातवें व्यक्ति का कोई पता नहीं चला।


उसका नाम था—


विजय सावंत।


निखिल के हाथ कांपने लगे।


उसके पिता की मृत्यु तब हुई थी जब निखिल सिर्फ पांच साल का था।


परिवार को बताया गया था कि उनकी मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई थी।


उसने रजिस्टर के अगले पन्ने पलटे।


वहां कुछ और लिखा था।


आग लगने के बाद विश्रामगृह की मरम्मत कराई गई थी। पुराने कमरे बंद कर दिए गए थे।


कमरा नंबर सात हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।


निखिल ने रजिस्टर से सिर उठाया।


उसकी सांस रुक गई।


वह जिस कमरे में तीन रातों से रह रहा था...


उसका नंबर सात था।



उस रात बारिश फिर शुरू हो गई।


निखिल ने अपने सारे सामान बैग में रख लिए। रास्ता खुलने तक वह किसी तरह जागकर समय बिताना चाहता था।


करीब बारह बजे बिजली चली गई।


उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।


उसी वक्त बरामदे से लकड़ी के फर्श पर घिसटते हुए किसी भारी चीज की आवाज आई।


वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास पहुंचा।


बाहर कोई दिखाई नहीं दिया।


लेकिन बरामदे के अंत में एक दरवाजा खुला हुआ था।


वह दरवाजा सुबह वहां नहीं था।


उसने टॉर्च की रोशनी उस तरफ की।


अंदर सीढ़ियां नीचे की ओर जा रही थीं।


दीवारों पर काले धब्बे थे। हवा में जले हुए लकड़ी और पुराने कपड़ों की गंध थी।


निखिल को नहीं पता कि उसे नीचे जाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।


शायद उस तस्वीर और अपने पिता के नाम ने उसे बेचैन कर दिया था।


वह सीढ़ियां उतरने लगा।


नीचे एक बड़ा कमरा था।


कमरे में सात लोहे के बिस्तर लगे थे।


छह पर जले हुए कंबल पड़े थे।


सातवें बिस्तर पर कोई बैठा था।


एक आदमी।


उसका चेहरा जला हुआ था। हाथों की त्वचा काली पड़ चुकी थी। लेकिन उसकी आंखें बिल्कुल साफ थीं।


निखिल ने टॉर्च नीचे कर ली।


वह आदमी धीरे से खड़ा हुआ।


उसके होंठ हिले।


"बहुत देर कर दी बेटा।"


निखिल के हाथ से मोबाइल गिर गया।


वह आवाज...


वह आवाज उसके पिता की थी।


उसके पिता ने उसे आखिरी बार पांच साल की उम्र में गोद में उठाया था। उसके बाद बस तस्वीरों में ही देखा था।


लेकिन यह आवाज उसके बचपन की यादों में आज भी मौजूद थी।


निखिल की आंखों में आंसू आ गए।


उसने कांपते हुए पूछा—


"आप... यहां कैसे?"


आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसने कमरे के कोने में रखे एक पुराने लकड़ी के संदूक की तरफ इशारा किया।


निखिल ने उसे खोला।


अंदर एक छोटी डायरी थी।


पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।


वह पढ़ने लगा।


उसमें लिखा था कि आग लगने वाली रात सात लोग इस कमरे में बंद हो गए थे। दरवाजा बाहर से बंद था। आग तेजी से फैल रही थी।


छह लोग वहीं मर गए।


लेकिन विजय बाहर निकल आया था।


वह बच गया था।


उसने कई वर्षों तक इस घटना को अपने भीतर दबाए रखा।


डायरी का आखिरी पन्ना अधूरा था।


उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—


"उस रात कमरे में सात लोग नहीं थे। आठवां पहले से मौजूद था।"


निखिल ने डायरी से नजर उठाई।


सामने बिस्तर खाली था।


उसके पिता गायब थे।


और कमरे के छह जले हुए बिस्तरों पर अब छह लोग बैठे थे।


सभी के चेहरे उसकी तरफ थे।


उनमें से एक ने धीरे से हाथ उठाया।


वह ड्राइवर था।


वही ड्राइवर जो उसे पहली रात पहाड़ी रास्ते पर मिला था।


उसके पीछे सफेद कपड़ों वाला चेहराविहीन आदमी खड़ा था।


निखिल पीछे हटने लगा।


तभी कमरे के एकदम पीछे से उसके पिता की आवाज आई।


"निखिल, भाग!"


वह मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।


पीछे से किसी के दौड़ने की आवाज आने लगी।


तेज।


बहुत तेज।


उसने सीढ़ियां चढ़कर बरामदे में कदम रखा।


और सामने देखा।


वही अधेड़ उम्र का कर्मचारी खड़ा था।


उसके हाथ में रजिस्टर था।


उसने रजिस्टर खोला।


निखिल की आंखें उस पन्ने पर टिक गईं।


उसके नाम के सामने प्रस्थान की तारीख थी।


3 अक्टूबर।


और समय था—


रात 12:00 बजे।


जबकि मोबाइल में अभी 11:58 हो रहे थे।


कर्मचारी ने सिर उठाया।


"दो मिनट बाकी हैं।"


निखिल ने दरवाजे की तरफ दौड़ लगाई।


दरवाजा खुला।


बाहर बारिश नहीं थी।


बाहर वही पहाड़ी सड़क थी।


वही जीप खड़ी थी।


और उसके पास वही ड्राइवर।


निखिल दौड़कर जीप तक पहुंचा।


ड्राइवर ने पिछला दरवाजा खोला।


"बैठिए साहब।"


निखिल ने बिना सोचे अंदर कदम रखा।


तभी उसकी नजर सामने लगे रियर-व्यू मिरर पर पड़ी।


ड्राइवर की सीट खाली थी।


लेकिन जीप चल रही थी।


और पीछे की सीट पर...


वह खुद बैठा था।


उसके ठीक बगल में सफेद कपड़ों वाला चेहराविहीन आदमी था।


निखिल ने चीखने की कोशिश की।


उसकी आवाज नहीं निकली।


जीप की हेडलाइट्स बुझ गईं।


अगली सुबह देवकुंड के पुराने विश्रामगृह में एक सफाई कर्मचारी पहुंचा।


मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।


अंदर सब कुछ अपनी जगह पर था।


कमरा नंबर सात के बाहर एक बैग रखा था।


मेज पर मोबाइल पड़ा था।


उसकी स्क्रीन पर एक अधूरी रिकॉर्डिंग चल रही थी।


रिकॉर्डिंग में पहले बारिश की आवाज थी।


फिर किसी के कदमों की।


और आखिर में एक आदमी की फुसफुसाहट—


"पापा... दरवाजा खोलो..."


सफाई कर्मचारी ने मोबाइल बंद कर दिया।


उसे लगा कोई पर्यटक अपना सामान भूल गया होगा।


वह रजिस्टर उठाकर कार्यालय में रख आया।


रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर एक नई एंट्री थी।


निखिल सावंत।


आगमन: 2 अक्टूबर।


प्रस्थान: 3 अक्टूबर।


लेकिन इस बार एक अतिरिक्त टिप्पणी भी थी।


साथ में एक अन्य व्यक्ति आया है।


नाम के आगे कोई अक्षर नहीं था।


सिर्फ एक खाली जगह।


सफाई कर्मचारी ने रजिस्टर बंद किया।


तभी विश्रामगृह के बंद कमरे नंबर सात के अंदर से तीन बार दस्तक सुनाई दी।


टक...


टक...


टक...


और फिर किसी ने अंदर से कहा—


"पापा... इस बार मुझे अकेला मत छोड़ना।"


उसी क्षण रजिस्टर का आखिरी पन्ना अपने आप पलट गया।


उस पर एक नई तारीख उभर रही थी।


4 अक्टूबर।


आगमन का समय: रात 10:30।


नाम: विजय परब।


और उसके नीचे...


प्रस्थान की तारीख खाली थी।


---


कुछ जगहों पर लोग रहने नहीं आते... वे बस अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

सात भूत

 


सुबह की पहली धूप अभी गाँव की कच्ची गलियों तक नहीं पहुँची थी।


गणपत ने दुकान का शटर आधा उठाया और नीचे बैठकर ताला खोलने लगा। सामने चबूतरे पर रात की बारिश का पानी जमा था। उसने हाथ बढ़ाकर उसमें पड़ा नीम का पत्ता हटाया और दुकान के भीतर रखी लकड़ी की पेटी बाहर खींच ली।


“आज फिर देर।”


पीछे से आवाज आई।


गणपत ने मुड़कर देखा। शेखर हाथ में दूध की बाल्टी लिए खड़ा था।


“देर कहाँ हुई? तू जल्दी आ गया।”


शेखर हँसा और बाल्टी दुकान के पास रख दी।


“चाय बना।”


गणपत ने चूल्हा जलाया।


बारिश के बाद गाँव की शांत सुबह में दुकान, स्कूल जाता लड़का और ग्रामीणों का दृश्य
बारिश के बाद गाँव की सुबह बिल्कुल सामान्य थी। दुकान खुल रही थी, बच्चे स्कूल जा रहे थे और लोग अपने रोज़मर्रा के काम में लगे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि इसी सामान्य दिन के पीछे एक भयानक रहस्य छिपा है।



गाँव में सुबह इसी तरह खुलती थी। कोई दूध लेकर निकलता, कोई खेत की तरफ। मंदिर की घंटी दूर से सुनाई देती और मस्जिद से आती अज़ान उसके साथ मिल जाती।



थोड़ी देर बाद रशीद साइकिल से आया। उम्र मुश्किल से सत्रह-अठारह साल। उसने साइकिल दुकान की दीवार से टिकाई।


“गणपत काका, कॉपी है?”


“तेरे पैसे?”


रशीद ने जेब टटोली।


“कल दे दूँगा।”


“कल तू यही बोलता है।”


गणपत ने फिर भी कॉपी निकालकर दे दी।


रशीद मुस्कुराया और स्कूल की तरफ निकल गया।


उधर सड़क के दूसरी तरफ सरस्वतीबाई अपने घर के बाहर झाड़ू लगा रही थीं। उनकी उम्र साठ के करीब थी। पति को गुजरे कई साल हो चुके थे। घर में वह अकेली रहती थीं, लेकिन गाँव में किसी के घर का बच्चा बीमार हो जाए तो सबसे पहले वही पहुँचती थीं।


“बाई!”


उन्होंने सिर उठाया।


रामू खड़ा था।


“आज खेत की तरफ मत जाना।”


“क्यों?”


“नाले में पानी बहुत है।”


रामू ने कंधे उचकाए।


“शाम तक उतर जाएगा।”


वह अपनी साइकिल लेकर आगे बढ़ गया।


रामू का काम खेतों के बीच बकरियाँ चराना था। गाँव में उसे कोई ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था, लेकिन रास्ते, खेत और आसपास का जंगल उससे बेहतर कोई नहीं जानता था।


उसी समय दत्तू पोस्टमन साइकिल पर आता दिखाई दिया।


उसने सरस्वतीबाई के घर के बाहर साइकिल रोकी।


“आपके नाम चिट्ठी है।”


सरस्वतीबाई ने चिट्ठी ली।


“किसकी?”


“पता नहीं। शहर से है।”


उन्होंने चिट्ठी उलट-पलटकर देखी और अंदर चली गईं।


दत्तू आगे बढ़ गया।


गाँव के आखिरी घर के पास माधव काका अपनी चारपाई पर बैठे बीड़ी सुलगा रहे थे। उम्र बहुत ज्यादा थी। आँखें कमजोर थीं, मगर आवाज अभी भी साफ थी।


“दत्तू!”


पोस्टमन रुक गया।


“हाँ?”


“आज स्कूल बंद है क्या?”


“नहीं तो।”


माधव काका ने स्कूल की तरफ देखा।


“आज वहाँ कोई नहीं जाएगा।”


दत्तू हँस पड़ा।


“आपको कैसे पता?”


माधव काका ने कोई जवाब नहीं दिया।


दत्तू आगे चला गया।


उसे क्या पता था कि शाम तक वही बात उसे याद आने वाली थी।



दोपहर में बारिश फिर शुरू हो गई।


रामू अपनी बकरियों को लेकर नाले के किनारे पहुँचा। पानी सचमुच बढ़ गया था। उसने रास्ता बदलने का फैसला किया।


तभी उसे दूसरी तरफ कोई दिखाई दिया।


एक लड़का।


पीठ उसकी तरफ थी।


रामू ने आवाज दी—


“कौन है?”


लड़का मुड़ा।


रशीद था।


“तू इधर क्या कर रहा है?”


रशीद ने कुछ नहीं कहा।


बस नाले की तरफ देखता रहा।


रामू ने सोचा शायद उसकी आवाज नहीं पहुँची।


वह पास गया।


“चल, गाँव चलते हैं।”


रशीद ने धीरे से सिर हिलाया।


दोनों वापस चल पड़े।


रास्ते में रामू ने पूछा—


“स्कूल नहीं गया?”


रशीद चुप रहा।


रामू ने फिर नहीं पूछा।

बारिश से भीगी जमीन पर पुराने घर की ओर जाते सात रहस्यमयी पैरों के निशान
रात की बारिश के बाद मिट्टी पर दिखाई दिए ये सात पैरों के निशान सीधे घर के दरवाज़े तक जा रहे थे। अजीब बात यह थी कि आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था।



शाम को गणपत दुकान बंद कर रहा था, तभी रशीद वहाँ आया।


“काका, एक बिस्कुट का पैकेट।”


“सुबह कॉपी ले गया था।”


“कल पैसे दे दूँगा।”


“तेरा कल कब आएगा?”


रशीद हँस पड़ा।


गणपत ने पैकेट दे दिया।


रशीद चला गया।


गणपत ने दुकान बंद की।


घर पहुँचकर खाना खाया।


रात करीब दस बजे बाहर बारिश की आवाज तेज हो गई।


गणपत सोने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई।


एक बार।


फिर दूसरी बार।


उसने पूछा—


“कौन?”


कोई जवाब नहीं।


उसने दरवाजा खोला।


बाहर कोई नहीं था।


सिर्फ बारिश।


दरवाजे के ठीक सामने मिट्टी में सात गीले पैरों के निशान थे।


गणपत कुछ क्षण उन्हें देखता रहा।


फिर उसने दरवाजा बंद कर लिया।


---


अगली सुबह गाँव में रशीद नहीं था।


उसकी माँ ने कहा कि वह रात में घर नहीं आया।


पहले किसी ने ज्यादा चिंता नहीं की।


लड़का कहीं दोस्तों के यहाँ रुक गया होगा।


दोपहर तक भी वह नहीं लौटा तो दत्तू ने कहा—


“स्कूल में पूछो।”


स्कूल में पता चला कि रशीद कल आया ही नहीं था।


गणपत को यह बात अजीब लगी।


उसे तो वह शाम को दुकान पर आया था।


उसने यह बात सबको बताई।


रामू ने भी कहा—


“मैंने उसे नाले के पास देखा था।”


सबकी नजरें उसकी तरफ उठीं।


“कब?”


“कल दोपहर।”


“फिर?”


“मेरे साथ गाँव तक आया था।”


लेकिन गाँव में किसी और ने उसे नहीं देखा था।


रामू कुछ देर चुप रहा।


“शायद मैं गलत समझा।”


मामला वहीं रुक गया।


लेकिन उसी रात दत्तू को अपने डाकखाने के बाहर एक पैकेट मिला।


उस पर नाम लिखा था—


रशीद।


पता वही गाँव का।


दत्तू ने पैकेट उठाया।


अंदर एक पुरानी घड़ी थी।


पीछे खुदा था—


“रशीद — 14 अगस्त”


दत्तू ने तारीख देखी।


आज 20 अगस्त था।


उसने घड़ी चलाने की कोशिश की।


घड़ी चलने लगी।


सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।


दत्तू ने तुरंत उसे बंद कर दिया।


---


उधर सरस्वतीबाई ने वह चिट्ठी खोली जो दत्तू ने दो दिन पहले दी थी।


अंदर सिर्फ एक कागज था।


उस पर लिखा था—


“आपसे मिलने की बात अधूरी रह गई।”


नीचे नाम नहीं था।


सरस्वतीबाई को अचानक बेचैनी हुई।


उन्होंने चिट्ठी मोड़ी और संदूक में रख दी।


संदूक बंद करते समय उन्हें अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज सुनाई दी।


उन्होंने फिर खोला।


अंदर एक पुरानी फोटो थी।


फोटो में सात लोग खड़े थे।


गणपत।


दत्तू।


रामू।


सरस्वतीबाई।


माधव काका।


लक्ष्मण।


और रशीद।


सरस्वतीबाई ने फोटो हाथ में ले ली।


उन्हें फोटो याद नहीं थी।


फिर भी उसमें खड़े सातों लोग उन्हें ऐसे परिचित लगे जैसे रोज सामने बैठते हों।


फोटो के पीछे तारीख लिखी थी।


14 अगस्त।



उस शाम लक्ष्मण आया।


वह गाँव की किराने की दुकान पर काम करता था। गणपत की दुकान के सामने से गुजरते हुए उसने पूछा—


“रशीद मिला?”


“नहीं।”


“मुझे कल रात दिखाई दिया था।”


गणपत ने उसकी तरफ देखा।


“कहाँ?”


“स्कूल के पास।”


“कितने बजे?”


लक्ष्मण ने सोचकर कहा—


“शायद दस।”


“तू वहाँ क्या कर रहा था?”


“मुझे भी यही पूछना चाहिए।”


गणपत कुछ नहीं बोला।


लक्ष्मण चला गया।


उस रात गणपत ने दुकान जल्दी बंद कर दी।

पुराने स्कूल के कमरे में सात खाली कुर्सियों और सात नामों वाला रहस्यमयी ब्लैकबोर्ड
सुनसान स्कूल के कमरे में सात कुर्सियाँ खाली थीं और ब्लैकबोर्ड पर सात नाम लिखे थे। लेकिन उन नामों के पीछे छिपा सच सामने आते ही पूरी कहानी बदलने वाली थी।



अगली सुबह गाँव के बाहर एक आदमी की चप्पल मिली।


रामू ने पहचान ली।


“रशीद की है।”


पास ही मिट्टी में साइकिल का निशान था।


निशान नदी की तरफ जाता था।


गाँव के दस लोग नदी तक गए।


वहाँ पानी बहुत था।


लेकिन कोई शरीर नहीं मिला।


वापस आते समय माधव काका ने अचानक कहा—


“छह।”


गणपत ने पूछा—


“क्या?”


“हम कितने हैं?”


गणपत ने पीछे देखा।


माधव काका।


दत्तू।


रामू।


सरस्वतीबाई।


लक्ष्मण।


गणपत।


छह।


रशीद गायब था।


माधव काका कुछ देर चुप रहे।


“वह भी होना चाहिए।”


“कहाँ?”


“हमारे साथ।”


किसी ने उनकी बात का अर्थ नहीं समझा।



उस रात सातों की कहानी पहली बार एक जगह आकर जुड़ी।


गणपत दुकान बंद करके लौट रहा था।


रास्ते में उसे दत्तू मिला।


दत्तू के हाथ में वही घड़ी थी।


“चलो,” दत्तू ने कहा।


“कहाँ?”


“स्कूल।”


“इस वक्त?”


दत्तू ने उसकी तरफ देखा।


“मुझे लगता है रशीद वहीं है।”


दोनों स्कूल पहुँचे।


अंदर अंधेरा था।


एक कमरे का दरवाजा खुला था।


अंदर सरस्वतीबाई पहले से बैठी थीं।


रामू खिड़की के पास खड़ा था।


लक्ष्मण जमीन पर बैठा था।


और माधव काका ब्लैकबोर्ड के सामने।


गणपत ने सबको देखा।


“तुम सब यहाँ क्यों हो?”


किसी के पास जवाब नहीं था।


माधव काका ने ब्लैकबोर्ड की तरफ इशारा किया।


वहाँ सात नाम लिखे थे।


गणपत

दत्तू

रामू

सरस्वती

माधव

लक्ष्मण

रशीद


नीचे तारीख थी।


14 अगस्त।


और उसके नीचे—


मृत।


कमरे में सन्नाटा फैल गया।


“ये किसने लिखा?”


किसी ने जवाब नहीं दिया।


अचानक पीछे से आवाज आई।


“मैंने।”


सभी मुड़े।


रशीद दरवाजे पर खड़ा था।


गणपत उसकी तरफ बढ़ा।


“तू कहाँ था?”


रशीद ने उसकी तरफ देखा।


“आपको याद नहीं?”


“क्या?”


रशीद की आँखें भर आईं।


“उस दिन क्या हुआ था?”


कोई बोल नहीं पाया।


फिर जैसे किसी ने भीतर बंद दरवाजा खोल दिया हो, एक साथ सबके चेहरे बदल गए।


बारिश।


तेज बहता नाला।


टूटा हुआ पुल।


सड़क पर फिसलती जीप।


चीख।


अंधेरा।


पानी।


गणपत को याद आया—वह अपनी दुकान से घर लौट रहा था।


दत्तू को याद आया—वह डाक लेकर उसी रास्ते से जा रहा था।


रामू अपनी बकरियों को लेकर लौट रहा था।


सरस्वतीबाई पड़ोस के घर से आ रही थीं।


लक्ष्मण बाजार से।


माधव काका मंदिर से।


और रशीद स्कूल से।


सातों एक ही रास्ते पर थे।


पुल अचानक टूटा था।


सातों पानी में बह गए थे।


उनकी लाशें अगले दिन मिली थीं।


गाँव ने उसी दिन उनका अंतिम संस्कार कर दिया था।


लेकिन उसके बाद से—


वे रोज सुबह उठते रहे।


दुकान खोलते रहे।


डाक बाँटते रहे।


बकरियाँ चराते रहे।


स्कूल जाते रहे।


चाय पीते रहे।


और किसी ने उनसे बात क्यों नहीं की—यह सवाल अब पहली बार उनके सामने था।


गणपत ने खिड़की से बाहर देखा।


गाँव की सड़क पर लोग खड़े थे।


सैकड़ों लोग।


सबकी नजरें स्कूल की तरफ थीं।


लेकिन कोई उन्हें देख नहीं रहा था।


एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—


“माँ, अंदर कौन है?”


माँ ने उसका हाथ खींच लिया।


“चल।”


“लेकिन वहाँ तो सात लोग—”


“वहाँ कोई नहीं है।”


गणपत पीछे हट गया।


उसने अपने हाथों को देखा।


उँगलियाँ हल्की पारदर्शी थीं।


दत्तू ने अपनी डाक की थैली खोली।


अंदर सिर्फ सात कागज थे।


सात मृत्यु प्रमाणपत्र।


रामू ने बाहर देखा।


उसकी बकरियाँ नहीं थीं।


सरस्वतीबाई ने अपने गले को छुआ।


उनकी नाड़ी नहीं चल रही थी।


लक्ष्मण ने जेब से बीड़ी निकाली।


उसने माचिस जलाई।


आग उसकी उँगलियों से होकर निकल गई।


वह डरकर पीछे हट गया।


माधव काका धीरे से मुस्कुराए।


“अब समझ आया।”


“क्या?”


“हम गाँव में लौटे ही नहीं थे।”


सब उनकी तरफ देखने लगे।


“हम हर दिन उसी रास्ते पर जाते रहे…”


उन्होंने खिड़की के बाहर देखा।


“…जहाँ हमारी मौत हुई थी।”


रशीद ने पूछा—


“फिर हम यहाँ क्यों आते रहे?”


माधव काका ने कोई जवाब नहीं दिया।


ब्लैकबोर्ड पर लिखे सात नामों के नीचे अपने आप एक और वाक्य उभरने लगा।


“क्योंकि इन्हें पता नहीं था कि इनकी कहानी खत्म हो चुकी है।”


कुछ क्षणों तक कोई हिला नहीं।


फिर स्कूल की घंटी अपने आप बज उठी।


सातवीं बार घंटी बजते ही कमरे में कोई नहीं था।


सिर्फ सात खाली कुर्सियाँ थीं।


और ब्लैकबोर्ड पर सात नाम।


इस बार उनके आगे एक ही शब्द नहीं था।


हर नाम के आगे अलग-अलग लिखा था—


गणपत — दुकान बंद।


दत्तू — आखिरी डाक।


रामू — रास्ता खत्म।


सरस्वती — घर खाली।


माधव — इंतजार खत्म।


लक्ष्मण — आखिरी बीड़ी।


और सबसे नीचे—


रशीद — स्कूल की छुट्टी।


सुबह गाँव के बच्चों ने स्कूल खोला तो किसी को कुछ असामान्य नहीं लगा।


बस ब्लैकबोर्ड पर लिखे सात नाम देखकर एक बच्चा कुछ देर खड़ा रहा।


फिर उसने चॉक उठाई और उन सातों नामों के ऊपर एक ही शब्द लिख दिया—


“याद।”

आधी रात जागा प्रेत

 




उस घर में रहने का फैसला मैंने किसी मजबूरी में नहीं किया था।


ऑफिस से घर काफी दूर पड़ता था और कुछ दिनों के लिए मेरा काम उसी इलाके में लगा था। एक परिचित ने बताया कि उसका पुराना मकान खाली पड़ा है। किराया भी कम था, इसलिए मैंने ज्यादा सोचा नहीं।


मकान शहर से थोड़ा बाहर था।


एक मंजिल का पुराना मकान। दीवारों पर सीलन के निशान थे और पीछे नीम के कुछ बड़े पेड़ थे। सामने एक सँकरी सड़क थी, जो आगे जाकर मुख्य सड़क से मिलती थी।


ऑफिस से घर आने-जाने में पंद्रह-बीस मिनट लगते थे।


रास्ते में एक पुराना कब्रिस्तान पड़ता था।


दिन में वहाँ से निकलने में कोई परेशानी नहीं थी। आसपास लोग आते-जाते रहते थे। लेकिन शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर अजीब-सी खामोशी हो जाती थी। कब्रिस्तान की टूटी दीवार के पीछे बड़े पेड़ थे और रात में वहाँ कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था।


पास में एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। ऑफिस से लौटते समय मैं अक्सर वहीं रुक जाता था।


पहले कुछ दिन बिल्कुल सामान्य रहे।


सुबह ऑफिस, शाम को चाय, फिर घर। रात को खाना खाकर मोबाइल देखता और सो जाता।


एक शाम चाय की दुकान पर मैं कुछ ज्यादा देर बैठ गया। जब निकला तो अंधेरा हो चुका था।


कब्रिस्तान के पास पहुँचते ही मुझे लगा जैसे मेरे पीछे कोई चल रहा है।


कदमों की आवाज बहुत धीमी थी।


मैंने बाइक धीमी की।


आवाज भी धीमी हो गई।


मैंने पीछे देखा।


सड़क खाली थी।


बारिश में कब्रिस्तान के पास बाइक चलाता व्यक्ति और रहस्यमयी आकृति
तेज बारिश के बीच कब्रिस्तान की दीवार के पास खड़ी वह रहस्यमयी आकृति आखिर किसकी थी?



कुछ सेकंड रुका रहा, फिर मुझे लगा शायद मेरी ही बाइक की आवाज दीवार से टकराकर वापस आ रही होगी।


मैं घर चला गया।


उस बात को मैंने वहीं छोड़ दिया।


अगले दिन ऑफिस में काम ज्यादा था।


शाम को निकलते-निकलते देर हो गई। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। मैंने सोचा था कि रास्ते में चाय पीकर निकल जाऊँगा, लेकिन दुकान बंद करने वाला था, इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया।


कब्रिस्तान के पास पहुँचते-पहुँचते बारिश तेज हो गई।


सड़क लगभग खाली थी।


मैंने बाइक धीमी कर दी। बारिश इतनी तेज थी कि सामने मुश्किल से कुछ दिखाई दे रहा था। कब्रिस्तान की टूटी दीवार के पीछे पेड़ों की परछाइयाँ हिल रही थीं।



उसी समय मेरी बाइक की हेडलाइट एक पल के लिए बुझ गई।


मैंने ब्रेक लगाया।


दो-तीन बार स्विच दबाया।


फिर हेडलाइट जल गई।


मैंने सामने देखा।


सड़क खाली थी।


लेकिन सड़क के किनारे, कब्रिस्तान की दीवार के पास, मुझे लगा जैसे कोई खड़ा है।


बारिश के बीच बस एक धुंधली-सी आकृति।


मैंने बाइक रोकने की सोची, फिर जाने क्यों मन बदल गया।


मैं सीधे घर चला आया।


घर पहुँचते-पहुँचते बिजली भी चली गई थी।


मैंने मोबाइल की रोशनी में कपड़े बदले। कुछ खाने का मन नहीं था, इसलिए बस पानी पिया और बिस्तर पर लेट गया।


बाहर बारिश लगातार हो रही थी।


कुछ देर तक मैं छत पर गिरती बूंदों की आवाज सुनता रहा।


फिर पता नहीं कब नींद आ गई।


आधी रात के बाद मेरी आँख खुली।


बारिश बंद हो चुकी थी।


कमरे में अंधेरा था।


कुछ देर तक मैं वैसे ही पड़ा रहा।


फिर मुझे लगा...


बाहर कोई धीरे-धीरे चल रहा है।


मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की।


एक कदम।


फिर कुछ सेकंड का अंतर।


फिर दूसरा।


आवाज दरवाजे के ठीक सामने आकर रुक गई।


मैं उठकर बैठ गया।


कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।


मैंने मोबाइल उठाया और स्क्रीन जलाई।


उसी क्षण बाहर से बहुत हल्की-सी आवाज आई।


जैसे किसी ने दरवाजे पर अपना हाथ रखा हो।


चर्र...


मैं कुछ सेकंड तक दरवाजे को देखता रहा।


फिर आवाज बंद हो गई।


मैंने दरवाजा नहीं खोला।


उस वक्त मुझे यह भी नहीं लगा कि बाहर कोई भूत या ऐसी कोई चीज हो सकती है।


मुझे बस इतना लगा कि शायद कोई आदमी रास्ता भटककर यहाँ तक आ गया होगा।


मैं वापस लेट गया।


लेकिन उस रात सोने से पहले एक बात मेरे दिमाग में अटक गई थी—


बारिश में मैंने जो आकृति कब्रिस्तान के पास देखी थी...


वह सड़क की तरफ मुँह करके खड़ी थी।


और जब मैं वहाँ से निकला था...


उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं था।


आधी रात पुराने घर के दरवाजे के सामने खड़ा रहस्यमयी साया
आधी रात कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई, लेकिन दरवाजे के बाहर कोई दिखाई नहीं दिया।



अगली सुबह मैं उठकर ऑफिस चला गया।


दिन भर उस बात के बारे में ज्यादा नहीं सोचा।


शाम को दोस्त के साथ चाय पी और देर से घर पहुँचा।


दरवाजा खोलते समय मेरी नजर अपने आप बाहर चली गई।


कुछ नहीं था।


अंदर आया, खाना खाया और सो गया।


उस रात करीब दो बजे मेरी नींद फिर खुली।


इस बार कोई आवाज नहीं थी।


बस ऐसा लग रहा था जैसे कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई हो।


मैंने मोबाइल देखा।


फिर पानी पीने के लिए उठ गया।


गिलास रखते ही बाहर से कुछ घिसटने की आवाज आई।


बहुत हल्की।


मैं कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।


फिर आवाज बंद हो गई।


मैं दरवाजे तक गया।


कुंडी लगी हुई थी।


मैंने हाथ नहीं लगाया।


कुछ देर बाद वापस बिस्तर पर आ गया।


सुबह दरवाजा खोलते समय मैंने फर्श देखा।


दरवाजे के ठीक बाहर गीली मिट्टी का एक छोटा-सा निशान था।


बस इतना।


मैंने सोचा रात में बारिश के कारण किसी के जूते से मिट्टी लगी होगी।


ऑफिस चला गया।


उसके बाद दो-तीन दिन कुछ नहीं हुआ।


और शायद यही वजह थी कि मैंने उस बात को लगभग भूल ही दिया।


फिर एक रात मैं देर से घर लौटा।


उस दिन ऑफिस में एक जरूरी काम था। घर पहुँचते-पहुँचते करीब ग्यारह बज गए।


मैंने खाना गर्म किया और अकेले बैठकर खाया।


सोने से पहले बाहर का दरवाजा बंद करने गया।


कुंडी लगाकर जैसे ही मुड़ा, बाहर से बहुत हल्की-सी आवाज आई।


जैसे कोई सड़क पर धीरे से खाँसा हो।


मैंने दरवाजे के अंदर से ही सुनने की कोशिश की।


कुछ नहीं।


मैंने सोचा कोई राहगीर होगा।


लाइट बंद की और सो गया।


रात में मेरी नींद अचानक खुली।


इस बार मुझे साफ लगा कि बाहर कोई खड़ा है।


कोई आवाज नहीं थी।


बस दरवाजे के नीचे की पतली-सी जगह में अंधेरा बाकी फर्श से थोड़ा अलग दिखाई दे रहा था।


जैसे बाहर कोई दरवाजे के बिल्कुल सामने खड़ा हो।


मैं उठकर बैठ गया।


काफी देर तक उसी जगह देखता रहा।


फिर मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई।


रोशनी दरवाजे के नीचे गई।


वहाँ कुछ नहीं था।


मैंने राहत की साँस ली।


लेकिन उसी वक्त बाहर से फर्श पर कुछ घिसटने की आवाज आई।


बहुत पास से।


मैंने दरवाजा नहीं खोला।


उस रात मैं सो नहीं पाया।


सुबह बाहर निकला तो दरवाजे से गेट तक गीले पैरों के हल्के निशान थे।


मैंने नीचे झुककर देखा।


 पैर जैसे लग रहे थे।


 निशान गेट से मेरे दरवाजे की तरफ आ रहे थे।


मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।


फिर ऑफिस चला गया।


उस दिन पहली बार मैंने अपने दोस्त को फोन करके कहा कि शायद मैं कमरा बदल दूँगा।


उसने मजाक में पूछा—


“क्यों? भूत दिख गया क्या?”


मैंने बस कहा—


“नहीं। बस यहाँ रात को ठीक नहीं लगता।”


उसने ज्यादा पूछा नहीं।


---


उसके बाद मैंने कोशिश की कि रात में जल्दी घर पहुँचूँ।


दिन में सब सामान्य था।


यही बात सबसे अजीब थी।


सुबह घर से निकलते समय मुझे कुछ नहीं लगता था।


ऑफिस में पूरा दिन आराम से निकलता।


लेकिन शाम होते ही मेरे मन में एक बात आने लगती—


आज रात क्या होगा?


एक शाम मैं घर पहुँचा तो बाहर का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।


मैंने सोचा शायद मैंने सुबह ठीक से बंद नहीं किया होगा।


अंदर गया।


सब सामान अपनी जगह था।


चोरी जैसी कोई बात नहीं थी।


मैंने दरवाजा बंद किया और कमरे में चला गया।


रात को सोने से पहले अचानक बाहर से बहुत धीमी आवाज आई।


“खोलो।”


मैं बिस्तर पर सीधा बैठ गया।


कुछ सेकंड तक मुझे समझ ही नहीं आया कि आवाज सच में आई थी या नींद में मुझे लगा।


मैं दरवाजे के पास गया।


बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।


मैंने कान दरवाजे के पास लगाया।


मैं वापस आने लगा।


तभी दरवाजे की कुंडी बहुत हल्के से नीचे हुई।


मैं रुक गया।


फिर ऊपर।


फिर नीचे।


जैसे बाहर से कोई उसे समझने की कोशिश कर रहा हो।


मैंने पहली बार दरवाजे से दूर हटकर खड़ा होना पसंद किया।


करीब एक मिनट तक कुंडी नहीं हिली।


फिर सब शांत हो गया।


मैंने उस रात दरवाजा नहीं खोला।


सुबह जब बाहर निकला तो वहाँ कोई निशान नहीं था।


लेकिन दरवाजे की कुंडी पर मिट्टी लगी हुई थी।


मैंने उसे कपड़े से साफ कर दिया।


बस।



कुछ दिनों तक फिर कुछ नहीं हुआ।


मैंने सोचा शायद सच में कोई आदमी आसपास घूमता होगा।


 नशे में।


शायद कोई भिखारी।


मैं खुद को यही समझाता रहा।


फिर एक रात बारिश के बाद मैं जल्दी सो गया।


आधी रात को मेरी नींद खुली।


कमरे में अंधेरा था।


इस बार बाहर से कोई आवाज नहीं थी।


मैं उठकर पानी लेने गया।


वापस आते समय मेरी नजर दरवाजे पर पड़ी।


कुंडी लगी थी।


मैंने उसे देखा और वापस मुड़ गया।


तभी...


दरवाजे के दूसरी तरफ से बहुत हल्की-सी साँस लेने की आवाज आई।


मैं रुक गया।


सिर्फ साँस।


धीमी।


भारी।


मैं दरवाजे के पास नहीं गया।


कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।


मैंने पूरी रात बत्ती जलाकर रखी।


सुबह दरवाजा खोला।


बाहर कोई नहीं था।


लेकिन दरवाजे के ठीक सामने फर्श गीला था।


जैसे कोई काफी देर वहाँ खड़ा रहा हो।


उस दिन मैंने फैसला कर लिया कि अब ज्यादा दिन नहीं रुकूँगा।


पुराने घर के बाहर गीले पैरों के निशान देखते हुए व्यक्ति
बारिश के बाद दरवाजे तक आते गीले पैरों के निशान मिले, लेकिन वापस जाने का एक भी निशान नहीं था।



मुझे छुट्टी मिली तो मैंने सामान बाँधना शुरू कर दिया।


दोपहर तक ज्यादातर सामान निकल चुका था।


कमरे में सिर्फ मेरा बैग और कुछ कपड़े बचे थे।


शाम होने लगी थी।


मैंने सोचा अंधेरा होने से पहले निकल जाऊँ।


बैग उठाया और दरवाजे की तरफ गया।


कुंडी खोली।


दरवाजा खोलने से पहले मैं कुछ पल रुका।


पता नहीं क्यों।


फिर मैंने दरवाजा खोल दिया।


बाहर कोई नहीं था।


सीढ़ियाँ खाली थीं।


मैं नीचे उतरने लगा।


आधा रास्ता ही गया था कि ऊपर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।


धड़ाम।


मैं रुक गया।


मैंने ऊपर देखा।


मेरा कमरा दिखाई दे रहा था।


दरवाजा बंद था।


कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा।


फिर वापस ऊपर गया।


दरवाजा खोला।


कमरा खाली था।


मैंने बैग उठाया और नीचे आने लगा।


मैंने पीछे नहीं देखा।


बाहर निकलकर गेट बंद किया।


सड़क पर पहुँचा तो एक बार अनजाने में कब्रिस्तान की तरफ नजर चली गई।


वही टूटी दीवार।


वही पेड़।


लेकिन इस बार वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया।


मैं सीधा आगे बढ़ गया।


उस रात मैं दोस्त के घर रुका।


सुबह उसने मुझसे पूछा—


“कल रात तू इतनी देर तक दरवाजे के पास क्या कर रहा था?”


मैंने उसकी तरफ देखा।


“मैं तो सो रहा था।”


वह बोला—


“मुझे रात में दो-तीन बार लगा जैसे कोई बाहर से तुझे बुला रहा था।”


मैंने उससे कुछ नहीं कहा।



मैंने उसी दिन उस घर से अपना बाकी का सामान भी मँगवा लिया।


उसके बाद मैं कभी वहाँ नहीं गया।


काफी समय तक मैंने इस घटना के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।


मेरे पास कोई जवाब नहीं है इस्का।


मैंने कोई चेहरा नहीं देखा।


मैंने किसी को नहीं देखा।


बस इतना जानता हूँ कि रात को कोई चीज मेरे दरवाजे के बाहर खड़ी रहती थी।


और वह अंदर आना चाहती थी।


मुझे यह बात उस समय समझ नहीं आई थी।


लेकिन अब पीछे मुड़कर सोचता हूँ तो एक चीज सबसे ज्यादा डराती है।


हर बार...


वह मेरा इंतजार करती रही।


कि शायद किसी रात...


मैं खुद कुंडी खोल दूँ।


और अगर उस रात मैंने वह दरवाजा खोल दिया होता...


तो शायद आज मैं यह कहानी सुनाने के लिए यहाँ नहीं होता।

वह अजीब घुड़सवार

 



अठारहवीं सदी का उत्तर भारत उस समय एक बदलते हुए दौर से गुजर रहा था।


अवध की सत्ता अपने स्थान पर थी, लेकिन उसके चारों ओर राजनीति बदल रही थी। ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार से आगे बढ़कर सैनिक ताकत और राजनीतिक समझौतों के सहारे उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। ऐसे समय में लंबी यात्राएँ केवल दूरी तय करना नहीं थीं—हर रास्ता अपने साथ अनिश्चितता लेकर चलता था।


सड़कें कम थीं और जहाँ रास्ते थे, वहाँ भी उनका कोई भरोसा नहीं था।


दिन में जो रास्ते सामान्य लगते थे, सूरज ढलते ही वही रास्ते अजनबी हो जाते।


उस दिन तीन अंग्रेज सैनिक घोड़ों पर सवार होकर अवध के भीतर एक जरूरी संदेश लेकर जा रहे थे।


उनके पास ईस्ट इंडिया कंपनी के एक महत्वपूर्ण अधिकारी, कैप्टन एडवर्ड हार्डिंग, के लिए कुछ गोपनीय दस्तावेज थे। हार्डिंग बाराबंकी के पास तैनात कंपनी की चौकी और अवध दरबार के बीच होने वाली एक बेहद संवेदनशील सैन्य बातचीत की निगरानी कर रहा था।

अठारहवीं सदी के बाराबंकी जंगल में तीन ब्रिटिश सैनिकों के सामने दिखाई देता रहस्यमय घुड़सवार
घने जंगल में रास्ता भटके तीन ब्रिटिश सैनिकों के सामने अचानक एक रहस्यमय घुड़सवार दिखाई दिया।


दस्तावेजों में सैनिकों की तैनाती और अगले दिन होने वाली कार्रवाई से जुड़ी जानकारी थी।


उन्हें वह संदेश अगली सुबह से पहले पहुँचाना था।


देरी का मतलब था पूरी योजना के बिगड़ने का खतरा।


इसीलिए तीनों सुबह से लगातार घोड़े दौड़ा रहे थे।


आगे जंगल था।


और जंगल के बाद बाराबंकी की तरफ जाने वाला खुला रास्ता।


लेकिन जंगल पार करने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं था।


सूरज तेजी से नीचे जा रहा था।


आगे चल रहा लेफ्टिनेंट विलियम कार्टर बार-बार आसमान की तरफ देख रहा था। पीछे सार्जेंट थॉमस मिलर और कॉर्पोरल जेम्स विल्सन अपने घोड़ों को संभालते हुए उसके पीछे आ रहे थे।


कार्टर ने पीछे देखा।


"हमें रफ्तार बढ़ानी होगी।"


तीनों ने घोड़ों को एड़ी लगाई।


सूखी जमीन पर तीन जोड़ी खुरों की आवाज फैल गई—


ठक... ठक... ठक...


कुछ दूर तक रास्ता खुला रहा।


फिर पेड़ शुरू हो गए।


पहले इक्का-दुक्का।


फिर घने।


और कुछ ही देर में रास्ता जंगल के भीतर खो गया।



जंगल के भीतर आते ही बाहर की दुनिया जैसे पीछे छूट गई। पेड़ों की घनी छाया में शाम जल्दी उतरने लगी थी और घोड़ों की टापें उस सुनसान रास्ते पर असामान्य रूप से साफ सुनाई दे रही थीं।


कार्टर ने घोड़े की रफ्तार कम कर दी।


उसने जेब से छोटा-सा नक्शा निकाला।


मिलर उसके पास आ गया।


"रास्ता सही है?"


कार्टर ने नक्शे पर नजर दौड़ाई।


"हाँ। आगे एक मोड़ आएगा। उसके बाद रास्ता सीधा है।"


विल्सन ने पीछे देखते हुए कहा,


"कितना समय लगेगा?"


"अगर घोड़े साथ रहे तो एक घंटे से ज्यादा नहीं।"


विल्सन ने आसमान की तरफ देखा।


"अंधेरा उससे पहले हो जाएगा।"


कार्टर ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसे भी यही चिंता थी।


तीनों फिर आगे बढ़े।


कुछ देर तक केवल टापों की आवाज उनके साथ चलती रही।


फिर रास्ता अचानक दो हिस्सों में बँट गया।


कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।


वह नीचे उतरा और मिट्टी पर बने निशानों को देखने लगा।


दोनों रास्तों पर घोड़ों के पुराने खुरों के निशान थे।


मिलर ने पूछा,


"कौन-सा?"


कार्टर ने नक्शा देखा।


"दायाँ।"


वह वापस घोड़े पर चढ़ गया।


तीनों दाईं तरफ मुड़ गए।


करीब दस मिनट बाद विल्सन ने पीछे से कहा,


"रुकिए।"


कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।


"क्या हुआ?"


विल्सन अपने घोड़े से नीचे उतरा।


वह सड़क के किनारे झुका और मिट्टी को देखने लगा।


"ये निशान नए हैं।"


मिलर भी नीचे उतरा।


वहाँ घोड़े के खुरों के कई निशान थे।


ताजे।


जैसे कोई घुड़सवार कुछ ही देर पहले इसी रास्ते से गया हो।


कार्टर ने आसपास देखा।


"तो हम अकेले नहीं हैं।"


मिलर ने कहा,


"शायद कोई आगे जा रहा है।"


कार्टर ने निशानों को एक बार फिर देखा।


फिर बोला,


"चलो।"


तीनों आगे बढ़ गए।


शाम अब और गहरी हो चुकी थी।


कार्टर ने पहली बार घोड़े की चाल तेज करने के बजाय उसे संभालकर चलाया।


उसे पता था कि अंधेरे में तेज रफ्तार ज्यादा खतरनाक हो सकती है।


कुछ दूर जाने के बाद हवा का रुख बदला।


पेड़ों के बीच से ठंडी हवा आई और कार्टर के चेहरे से टकराई।


उसने कोट का कॉलर ऊपर कर लिया।


तभी उसके घोड़े ने अचानक कान खड़े कर दिए।


कार्टर ने लगाम खींची।


"क्या हुआ?"


मिलर और विल्सन रुक गए।


कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला।


फिर—


बहुत दूर से घोड़े की टाप सुनाई दी।


ठक...


फिर थोड़ी देर बाद—


ठक... ठक...


तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।


आवाज आगे से आ रही थी।


मिलर ने कहा,


"वही सवार होगा।"


कार्टर ने कोई जवाब नहीं दिया।


टापों की आवाज धीरे-धीरे करीब आने लगी।


ठक... ठक... ठक...


विल्सन ने अपना हाथ पिस्तौल पर रख लिया।


पेड़ों के बीच अंधेरे में कुछ हलचल हुई।


फिर एक घोड़ा दिखाई दिया।


उस पर एक आदमी बैठा था।


वह बहुत धीरे-धीरे उनकी तरफ आ रहा था।


कुछ ही क्षण बाद वह इतना पास आ गया कि उसका चेहरा दिखाई देने लगा।


कार्टर ने हाथ उठाकर उसे रोकने का संकेत किया।


घुड़सवार रुक गया।


तीनों सैनिक उसे देखने लगे।


उसके कपड़े पुराने थे—इतने पुराने कि वे उस इलाके के किसी सामान्य यात्री जैसे नहीं लग रहे थे।


कार्टर ने पूछा,


"कहाँ जा रहे हो?"


घुड़सवार ने कोई जवाब नहीं दिया।


वह बस उन्हें देखता रहा।


फिर उसने अपना हाथ उठाया।


पीछे की तरफ इशारा किया।


जिस रास्ते से वे आए थे।


मिलर ने धीमे स्वर में कहा,


"क्या यह हमें वापस जाने को कह रहा है?"


कार्टर ने घुड़सवार की ओर देखा।


"क्यों?"


इस बार भी कोई उत्तर नहीं मिला।


घुड़सवार ने फिर पीछे की ओर इशारा किया।


उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।


कार्टर ने लगाम सीधी की।


"हमारे पास रुकने का समय नहीं है।"


वह आगे बढ़ने लगा।


मिलर उसके पीछे चल पड़ा।


विल्सन कुछ पल वहीं रुका रहा।


उसे घुड़सवार की आँखों में कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।


फिर उसने घोड़े को एड़ी लगाई।


तीनों आगे निकल गए।


कुछ दूर जाने के बाद मिलर ने पीछे मुड़कर देखा।


घुड़सवार अब भी उसी जगह खड़ा था।


लेकिन अगले ही क्षण…


वह वहाँ नहीं था।


मिलर ने घोड़ा रोक दिया।


कार्टर ने पूछा,


"क्या हुआ?"


मिलर ने पीछे देखा।


"वह आदमी…"


वह वाक्य पूरा नहीं कर पाया।


जहाँ कुछ क्षण पहले घोड़ा और सवार खड़े थे, वहाँ अब केवल खाली रास्ता था।


कार्टर ने घोड़ा मोड़ा।


तीनों वापस उसी जगह पहुँचे।


मिट्टी पर उनके अपने घोड़ों के निशान साफ थे।


लेकिन उस अजनबी घोड़े के…


एक भी निशान नहीं था।


कार्टर कुछ क्षण चुप रहा।


फिर उसने जंगल की ओर देखा।


दूर कहीं से एक बार फिर टाप सुनाई दी।


ठक... ठक...


इस बार आवाज उनके पीछे से आई थी।



कार्टर ने धीरे-धीरे घोड़ा पीछे मोड़ा।


मिलर और विल्सन भी उसके साथ मुड़ गए।


तीनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।


जंगल फिर शांत था।


अभी जो आवाज सुनाई दी थी, उसका कोई निशान नहीं था।


कार्टर ने चारों तरफ देखा।


"चलो।"


वह आगे बढ़ा।


लेकिन इस बार घोड़ों की चाल पहले जैसी नहीं थी।


तीनों घोड़े बार-बार पीछे देखने लगे।


कुछ दूर जाने के बाद टाप फिर सुनाई दी।


ठक... ठक... ठक...


मिलर ने पीछे देखा।


आवाज फिर बंद।


कार्टर ने घोड़ा नहीं रोका।


कुछ ही देर बाद वही टाप दोबारा सुनाई दी।


इस बार बिल्कुल उनके पीछे।


मिलर ने पिस्तौल निकाल ली।


"वह हमारा पीछा कर रहा है।"


कार्टर ने कहा,


"देखो मत। चलते रहो।"


वे आगे बढ़ते रहे।


लेकिन टापों की आवाज भी उनके साथ चलती रही।


वे जितना आगे जाते—


आवाज उतनी ही पीछे रहती।


कभी दूर।


कभी इतनी पास कि लगता जैसे कोई घोड़ा उनके बिल्कुल पीछे दौड़ रहा हो।


फिर अचानक सब शांत हो गया।


विल्सन ने राहत की सांस ली।


"शायद चला गया।"


कार्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया।


उसी समय सामने पेड़ों के बीच हल्की रोशनी दिखाई दी।


मिलर ने कहा,


"आग?"


कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।


दूर एक खुली जगह थी।


वहाँ किसी ने छोटा-सा अलाव जलाया हुआ था।


और उसके पास एक घोड़ा बंधा था।


तीनों ने एक-दूसरे को देखा।


कार्टर ने सावधानी से आगे बढ़ने का फैसला किया।


वे खुले स्थान तक पहुँचे।


अलाव जल रहा था।


लेकिन वहाँ कोई आदमी नहीं था।


मिलर घोड़े के पास गया।


उसने उसे देखा और अचानक पीछे हट गया।


"कार्टर..."


कार्टर आगे आया।


घोड़ा शांत खड़ा था।


उसकी पीठ पर पुरानी काठी बंधी थी।


काठी के चमड़े पर कुछ धब्बे थे।


गहरे भूरे।


कार्टर ने हाथ लगाया।


सूखा हुआ खून।


विल्सन ने तुरंत पीछे देखा।


"यह किसका घोड़ा है?"


किसी ने जवाब नहीं दिया।


अलाव के पास मिट्टी में कुछ पड़ा था।


एक पुरानी धातु की चीज।


कार्टर ने उसे उठाया।


वह एक सैनिक की छोटी-सी पहचान-पट्टी जैसी थी।


उस पर कुछ अक्षर खुदे थे।


कार्टर ने मशाल की रोशनी में उन्हें पढ़ने की कोशिश की।


अचानक मिलर ने कहा,


"यह अंग्रेजी नाम है।"


कार्टर ने फिर देखा।


धातु पर नाम था—


WILLIAM CARTER


कार्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।


उसने पट्टी हाथ से गिरा दी।


मिलर और विल्सन उसे देखते रह गए।


"लेकिन..." विल्सन की आवाज काँप गई।


"आपका नाम भी यही है।"


कार्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया।


उसने अपनी जेब से अपनी पहचान-पट्टी निकाली।


दोनों को पास रखकर देखा।


नाम वही था।


लेकिन पुरानी पट्टी पर नीचे एक तारीख खुदी थी।


कार्टर ने मशाल करीब की।


वह तारीख…


सैंतीस वर्ष पुरानी थी।


अचानक जंगल में घोड़े की तेज हिनहिनाहट गूँजी।


तीनों चौंककर पीछे मुड़े।


वही घोड़ा, जो कुछ क्षण पहले अलाव के पास खड़ा था—


अब वहाँ नहीं था।


रस्सी जमीन पर पड़ी थी।


कार्टर ने तुरंत कहा,


"चलो। अभी।"


तीनों घोड़ों पर सवार हुए।


अब उन्हें बाराबंकी पहुँचना जरूरी नहीं लग रहा था।


अब उन्हें केवल उस जंगल से बाहर निकलना था।


वे पूरी गति से आगे बढ़े।


कुछ मिनट बाद रास्ता फिर दो हिस्सों में बँट गया।


कार्टर ने दाईं तरफ मोड़ लिया।


कुछ देर बाद विल्सन ने कहा,


"सर..."


कार्टर ने उसकी ओर देखा।


"यह वही जगह है।"


कार्टर ने आसपास देखा।


एक पेड़ की जड़ के पास पत्थर पड़ा था।


उस पर चाकू से बनाया गया वही निशान था जो उन्होंने करीब आधे घंटे पहले देखा था।


वे घूमकर फिर उसी जगह आ गए थे।


मिलर ने घबराकर कहा,


"यह संभव नहीं है।"


कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।


उसने नक्शा निकाला।


नक्शे में रास्ता सीधा था।


लेकिन उनके सामने वही दो रास्ते थे।


और तभी…


पीछे से घोड़े की टाप सुनाई दी।


ठक... ठक... ठक...


इस बार आवाज


सीधे उनके पीछे से आई


तीनों ने एक साथ पीछे देखा।


पेड़ों के बीच वही घुड़सवार खड़ा था।


लेकिन अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।


वह आदमी…


कार्टर को घूर रहा था।


कार्टर ने पिस्तौल निकाल ली।


"तुम कौन हो?"


घुड़सवार ने पहली बार अपना मुँह खोला।


उसकी आवाज बहुत धीमी थी।


"तुम्हें… यहाँ नहीं आना चाहिए था।"


कार्टर का चेहरा बदल गया।


क्योंकि वह आवाज…


उसे पहले भी सुनाई दे चुकी थी।


सालों पहले।


जब वह बच्चा था।


अपने पिता के पुराने सैन्य संदूक में उसे एक डायरी मिली थी।


उस डायरी में एक सैनिक का वर्णन था जो इसी इलाके में जंगल के भीतर गायब हो गया था।


उस सैनिक का नाम था—


विलियम कार्टर।


कार्टर ने घुड़सवार की तरफ देखा।


उसके हाथ से पिस्तौल लगभग छूट गई।


"तुम..."


घुड़सवार ने धीरे से सिर उठाया।


अब उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जिसे देखकर मिलर और विल्सन पीछे हट गए।


उसका चेहरा बिल्कुल कार्टर जैसा था—न उम्र में कोई फर्क था, न चेहरे में; वही वर्दी और वही निशान भी उसके चेहरे पर मौजूद था।


जो कार्टर के अपने चेहरे पर था।


घुड़सवार ने कहा—


"मैंने भी यही रास्ता चुना था।"


फिर उसने जंगल की तरफ देखा।


"और मैं भी… अंधेरा होने से पहले बाहर निकलना चाहता था।"


अचानक हवा तेज हो गई।


अलाव की बुझी हुई गंध उनके चारों ओर फैल गई।


कार्टर ने एक कदम पीछे लिया।


"तुम मर चुके हो।"


घुड़सवार ने उसकी तरफ देखा।


"हाँ।"


कुछ पल खामोशी रही।


फिर उसने हाथ उठाकर जंगल के भीतर इशारा किया।


"लेकिन मैं अकेला नहीं मरा था।"


उसके पीछे पेड़ों के बीच…


एक-एक करके तीन और घोड़ों की आकृतियाँ दिखाई देने लगीं।


उन पर बैठे तीन सैनिक।


और उन तीनों के चेहरे…


मृत थे।


विल्सन चीख पड़ा।


घोड़े बेकाबू हो गए।


कार्टर ने लगाम खींची।


उसी क्षण सामने खड़ा घुड़सवार धुंध में घुलने लगा।


उसकी आखिरी आवाज जंगल में गूँजी—


"बाराबंकी जाने वाला रास्ता उधर नहीं है..."


कार्टर ने सामने देखा।


जहाँ कुछ क्षण पहले रास्ता था…


वहाँ अब केवल घना जंगल था।


और दूसरी तरफ—


एक पुराना रास्ता दिखाई दे रहा था।


वही रास्ता…


जिस पर उन्होंने शुरुआत में जाने से इनकार किया था।


कार्टर ने कुछ नहीं सोचा।


उसने घोड़े को उसी दिशा में दौड़ा दिया।


मिलर और विल्सन उसके पीछे थे।


पीछे से फिर टापें सुनाई दीं।


लेकिन इस बार…


वे उनका पीछा नहीं कर रही थीं।


वे उनके साथ दौड़ रही थीं।

सुबह बाराबंकी के जंगल से बाहर निकलते तीन ब्रिटिश सैनिक और पीछे दिखाई देता रहस्यमय घुड़सवार
बाराबंकी पहुँचने के बाद एक पुरानी डायरी ने उस रहस्यमय घुड़सवार से जुड़ा अठारह साल पुराना राज खोल दिया।




कार्टर ने घोड़े को उस पुराने रास्ते पर दौड़ा दिया।

मिलर और विल्सन उसके पीछे थे।

कुछ दूर तक तीनों बिना कुछ बोले चलते रहे।

जंगल अब पहले से भी घना लग रहा था। पेड़ों की छाया सड़क पर इस तरह झुक आई थी कि घोड़ों को रास्ता पहचानने में मुश्किल हो रही थी।

लेकिन अजीब बात यह थी कि इस बार उन्हें रास्ता भटकने का डर नहीं था।

क्योंकि उनके साथ कोई और भी था।

ठक... ठक... ठक...

कहीं बाईं तरफ।

फिर वही आवाज आगे से सुनाई दी।

तीनों ने देखा।

पेड़ों के बीच वही घुड़सवार कुछ दूरी पर चल रहा था।

वह उनकी तरफ नहीं देख रहा था।

बस धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।

जहाँ रास्ता मुड़ता, वह पहले से वहाँ दिखाई देता।

और जैसे ही तीनों उस मोड़ तक पहुँचते—

वह आगे निकल जाता।

लगभग आधे घंटे बाद जंगल की घनता कम होने लगी।

दूर कहीं रोशनी दिखाई दी।

कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।

"वही है..."

मिलर ने नक्शा देखा।

इस बार नक्शे का रास्ता सामने दिखाई दे रहा था।

वे सही दिशा में आ चुके थे।

कार्टर ने पीछे देखा।

घुड़सवार अब वहाँ नहीं था।

सिर्फ खाली रास्ता था।

सुबह होने से पहले तीनों बाराबंकी की चौकी तक पहुँच गए।

कार्टर ने दस्तावेज अधिकारी को सौंप दिए।

काम पूरा हो चुका था।

लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूम रहा था।

वह आदमी कौन था?

उसने अपने दोनों साथियों की तरफ देखा।

मिलर और विल्सन भी चुप थे।

जैसे तीनों एक ही बात सोच रहे हों।

कुछ देर बाद चौकी के अधिकारी ने उनसे यात्रा का हाल पूछा।

तीनों चुप ही रहे।

अधिकारी ने उनके चेहरों को गौर से देखा। उनके उड़े हुए चेहरे और आँखों में छिपी घबराहट देखकर उसने फिर पूछा,

"सफर ठीक था?"

मिलर ने धीरे से सिर हिलाया।

"हाँ।"

लेकिन उसकी आवाज में वह भरोसा नहीं था, जो उसके शब्दों में होना चाहिए था।

अधिकारी ने तीनों को ध्यान से देखा।

तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा, फिर अधिकारी की ओर।

उनके चेहरों पर ऐसा भाव था, जैसे वे कुछ कहना चाहते हों, लेकिन शब्द उनका साथ नहीं दे रहे थे।

अधिकारी ने गंभीर स्वर में पूछा,

"तुम लोगों से रास्ते में कोई मिला था?"

तीनों सैनिक अचानक उसकी तरफ देखने लगे।

उनकी आँखों में साफ अचंभा था।

कुछ क्षण तक कमरे में खामोशी छाई रही।

फिर मिलर ने धीमे स्वर में पूछा,

"आपको कैसे पता?"

अधिकारी ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसने कमरे का दरवाजा बंद किया और तीनों को बैठने का इशारा किया।

"पहले बैठो। तुम लोग बहुत परेशान लग रहे हो।"

तीनों चुपचाप कुर्सियों पर बैठ गए।

अधिकारी ने उन्हें पानी दिया।

कुछ देर तक वह उनके चेहरों को देखता रहा, फिर शांत स्वर में बोला,

"अब जो कुछ हुआ है, वह मुझे शुरू से बताओ। कोई बात मत छिपाना।"

कार्टर ने अपने साथियों की तरफ देखा।

मिलर और विल्सन ने भी सिर हिलाया।

फिर कार्टर ने सारी बात बता दी।

जंगल।

टापों की आवाज।

अलाव।

पुरानी पट्टी।

और वह घुड़सवार।


अधिकारी का चेहरा धीरे-धीरे गंभीर होता गया।

उसने कमरे का दरवाजा बंद किया।

फिर तीनों के सामने बैठ गया।

"तुम लोगों ने उसे देखा?"

कार्टर ने कहा,

"हाँ।"

"चेहरा?"

कार्टर कुछ पल चुप रहा।

"साफ नहीं देख पाया था... लेकिन आखिरी बार—"

वह रुक गया।

अधिकारी ने पूछा,

"क्या हुआ?"

कार्टर ने धीरे से कहा,

"उसने मेरी तरफ देखा था।"

अधिकारी कुछ क्षण उसे घूरता रहा।

फिर उसने पूछा,

"और तुम्हें... उसका चेहरा कैसा लगा?"

कार्टर ने उत्तर देने से पहले मिलर और विल्सन की तरफ देखा।

"मेरे जैसा।"

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

अधिकारी की आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी दिखाई दी।

उसने कुर्सी की पीठ से टिकते हुए धीमे स्वर में कहा—

"तो फिर उसने तुम्हें रास्ता क्यों दिखाया, यह अब समझ में आता है।"

कार्टर ने चौंककर पूछा,

"आप उसे जानते हैं?"

अधिकारी ने सिर हिलाया।

"नहीं।"

फिर वह कुछ क्षण चुप रहा।

"लेकिन मैंने भी उसे देखा है।"

तीनों सैनिक एक साथ उसकी तरफ देखने लगे।

अधिकारी ने अपनी मेज की दराज खोली।

उसमें से एक पुरानी, लगभग काली पड़ चुकी डायरी निकाली।

उसने डायरी खोली और एक पन्ने पर उंगली रख दी।

"लगभग अठारह साल पहले मैं भी इसी रास्ते से बाराबंकी जा रहा था।"

वह रुका।
बाराबंकी की ब्रिटिश सैन्य चौकी में पुरानी डायरी पढ़ते अधिकारी और तीन सैनिक
बाराबंकी पहुँचने के बाद एक पुरानी डायरी ने उस रहस्यमय घुड़सवार से जुड़ा अठारह साल पुराना राज खोल दिया।



"मेरे साथ दो और ब्रिटिश सैनिक थे।"

कार्टर की निगाहें डायरी पर टिक गईं।

अधिकारी आगे बोला—

"तब मैं जवान था। हमें भी जल्दी बाराबंकी पहुँचना था। लेकिन शाम होते-होते हम इसी जंगल में रास्ता भूल गए।"

कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई।

"हमने कई बार रास्ता खोजने की कोशिश की। हर बार घूमकर उसी जगह लौट आते। घोड़े थक चुके थे। अंधेरा बढ़ रहा था।"

उसने डायरी का पन्ना पलटा।

"तभी हमें घोड़े की टाप सुनाई दी।"

मिलर ने धीमे स्वर में पूछा,

"वही घुड़सवार?"

अधिकारी ने उसकी तरफ देखा।

"हाँ।"

कमरे में फिर खामोशी छा गई।

"वह हमारे सामने आया। उसने कुछ नहीं कहा। बस आगे बढ़ता रहा। हम उसके पीछे चल पड़े।"

"फिर?"

"उसने हमें जंगल के बाहर निकाल दिया।"

कार्टर ने राहत की तरह साँस छोड़ी।

लेकिन अधिकारी का चेहरा अब भी गंभीर था।

"हम अगले दिन वापस उसी रास्ते से गए।"

उसने डायरी बंद कर दी।

"तब हमें पता चला कि जिस रास्ते पर हम पहले जा रहे थे, वह आगे जाकर दलदली जमीन में खत्म होता था। बारिश के बाद वहाँ जमीन ऊपर से मजबूत दिखाई देती थी, लेकिन नीचे पानी भरा था।"

विल्सन ने धीरे से पूछा,

"और वह घुड़सवार?"

अधिकारी ने कुछ क्षण कोई उत्तर नहीं दिया।

फिर बोला—

"हमें जंगल के किनारे उसके घोड़े के पुराने लोहे के नाल मिले।"

कार्टर ने उसकी तरफ देखा।

"लेकिन वह कौन था?"

अधिकारी ने सिर झुका लिया।

"कुछ दिनों बाद हमें पता चला कि करीब अठारह साल पहले तीन सैनिक उसी जंगल में गायब हुए थे।"

मिलर ने तुरंत पूछा,

"तीन?"

अधिकारी ने सिर हिलाया।

"हाँ। उनमें से एक घुड़सवार था। बाकी दो उसके साथ थे। वे भी बाराबंकी जा रहे थे।"

कार्टर की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

"तो वह..."

"हाँ," अधिकारी ने कहा, "वह अकेला नहीं था।"

कुछ पल तक कोई नहीं बोला।

फिर अधिकारी ने धीमे स्वर में कहा—

"कहते हैं, उस दिन भी उसने अपने साथियों को सही रास्ता दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन वे गलत रास्ते पर चले गए। जंगल के भीतर घोड़े फिसले और तीनों गहरी दलदली जमीन में जा गिरे।"

कार्टर को अचानक पिछली रात दिखाई दिए तीन घुड़सवार याद आ गए।

उसने पूछा—

"फिर वह ब्रिटिश सैनिकों की मदद क्यों करता है?"

अधिकारी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"शायद इसलिए कि वह अपनी मौत दोबारा किसी और के साथ होते नहीं देखना चाहता।"

कमरे में फिर वही सन्नाटा छा गया।

अधिकारी ने डायरी उठाई।

"तुम तीनों पहले सैनिक नहीं हो जिन्हें उसने रास्ता दिखाया।"

कार्टर ने पूछा,

"और हर बार?"

अधिकारी ने हल्की आवाज में कहा—

"जब भी कोई ब्रिटिश सैनिक उस जंगल में रास्ता भटकता है... कभी-कभी वह दिखाई देता है।"

विल्सन ने पूछा,

"क्या वह हर किसी को बचाता है?"

अधिकारी ने सिर हिलाया।

"नहीं।"

तीनों उसकी तरफ देखने लगे।

"वह सिर्फ उन्हें रास्ता दिखाता है जो समय रहते उसकी बात मान लें।"

कार्टर को अचानक पिछली रात की वह आवाज याद आई—

'बाराबंकी जाने वाला रास्ता उधर नहीं है...'

उसने पूछा,

"लेकिन वह मेरा चेहरा लेकर क्यों आया?"

अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने धीरे से कहा—

"क्योंकि जब उसने मुझे पहली बार रास्ता दिखाया था... तब मैंने भी उसका चेहरा देखा था।"

कार्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

"कैसा चेहरा?"

अधिकारी ने उसकी तरफ देखा।

"मेरे जैसा।"

तीनों सैनिक एक-दूसरे को देखने लगे।

बाहर सुबह हो चुकी थी।

सूरज की हल्की रोशनी चौकी की खिड़की से भीतर आ रही थी।

लेकिन उस कमरे में बैठे चारों लोगों के लिए रात अभी खत्म नहीं हुई थी।

अधिकारी ने डायरी बंद की।

"इस जंगल का एक नियम है।"

कार्टर ने पूछा,

"क्या?"

अधिकारी ने कहा—

"वह घुड़सवार तुम्हें तभी दिखाई देता है जब तुम उसी रास्ते पर जा रहे होते हो जिस रास्ते पर कभी उसकी मौत हुई थी।"

कार्टर ने कुछ नहीं कहा।

उसने खिड़की से बाहर देखा।

दूर सड़क पर एक घोड़ा खड़ा था।

उसकी पीठ पर पुरानी काठी थी।

और उसके पास...

एक आदमी खड़ा था।

कार्टर ने पलक झपकाई।

वहाँ कोई नहीं था।

सिर्फ हवा में एक बहुत हल्की आवाज तैर रही थी—

ठक... ठक... ठक...

और इस बार...

आवाज जंगल की तरफ नहीं जा रही थी।

वह बाराबंकी की तरफ जा रही थी.



वो रास्ता जो सिर्फ रात में दिखाई देता था

 


रहस्यमयी जंगल, पीली रोशनी, रवि का हमशक्ल और पुराने ग्रामीण घर को दर्शाता हॉरर कहानी पोस्टर।
एक ऐसा रास्ता जो दिन में गायब हो जाता है... और रात में इंसान को उसके अपने ही घर तक ले जाता है। 



सितंबर की वह रात बाकी रातों जैसी ही थी।


गाँव के बाहर बने पुराने गोदाम में काम खत्म करते-करते रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे। आसमान में बादल थे और बीच-बीच में ठंडी हवा चल रही थी। गाँव की आखिरी बस्ती से आगे निकलते ही सड़क लगभग सुनसान हो जाती थी।


रवि ने गोदाम का ताला लगाया, जेब से मोबाइल निकाला और समय देखा।


10:37।


उसे घर पहुँचने में मुश्किल से पच्चीस मिनट लगते, लेकिन जैसे ही उसने बाइक स्टार्ट की, इंजन ने दो-तीन बार आवाज की और बंद हो गया।


उसने दोबारा कोशिश की।


कुछ नहीं हुवा।


रवि ने बाइक को सड़क के किनारे लगाया और टॉर्च की रोशनी में नीचे झुककर देखने लगा। पेट्रोल था। बैटरी भी ठीक लग रही थी। लेकिन बाइक स्टार्ट नहीं हो रही थी।


उसने मैकेनिक को फोन लगाया।


पर नेटवर्क नहीं था।


उसने मोबाइल ऊपर उठाकर देखा। एक पल के लिए एक लाइन आई और फिर गायब हो गई।


रवि ने गहरी सांस ली।


मुख्य सड़क से गाँव लगभग चार किलोमीटर दूर था। इतनी रात में किसी गाड़ी के मिलने की संभावना भी कम थी।


तभी उसकी नजर जंगल की तरफ जाने वाले कच्चे रास्ते पर पड़ी।


बचपन से वह उस रास्ते को जानता था। दिन में भी उस रास्ते से बहुत कम लोग जाते थे। रास्ता जंगल के किनारे से घूमते हुए सीधे गाँव के पीछे निकलता था।


लेकिन एक बात अजीब थी।


रात के घने जंगल में रवि रहस्यमयी पीली रोशनी वाले रास्ते पर चलता हुआ।
सुनसान जंगल, अंधेरी रात और पीली रोशनी में दिखाई देती एक ऐसी पगडंडी, जो दिन में कहीं मौजूद ही नहीं होती।



उसे याद था कि उस रास्ते पर लगभग आधे किलोमीटर तक जाने के बाद एक टूटा हुआ पुल आता था, और बारिश के मौसम में वहाँ से आगे जाना मुश्किल हो जाता था।


फिर भी उसने सोचा—


चार किलोमीटर सड़क पर अकेले चलने से अच्छा है, रास्ता छोटा है तो कोशिश कर लेता हूँ।


उसने बाइक वहीं लॉक की, मोबाइल की टॉर्च जलाई और कच्चे रास्ते पर चल पड़ा।


सूखे पत्तों के नीचे उसके जूतों की आवाज आ रही थी। कहीं दूर कोई कुत्ता भौंक रहा था। पेड़ों के बीच हवा सरसराती रही थी।


करीब दस मिनट चलने के बाद उसे अचानक लगा कि रास्ता पहले से ज्यादा चौड़ा हो गया है।


उसने मोबाइल की रोशनी आगे की तरफ की।


सामने मिट्टी की पगडंडी साफ दिखाई दे रही थी।


रवि थोड़ा हैरान हुआ।


उसे यह हिस्सा याद नहीं था।


वह कुछ कदम आगे बढ़ा।


तभी सामने एक बिजली का खंभा दिखाई दिया।


खंभा बिल्कुल नया नहीं था। सीमेंट जगह-जगह से टूटा हुआ था, ऊपर तार भी लटक रहे थे।


लेकिन उस पर लगा बल्ब जल रहा था।


पीली रोशनी में आसपास के पेड़ों की परछाइयाँ जमीन पर अजीब आकार बना रही थीं।


रवि रुक गया।


उसने ऊपर देखा।


फिर मोबाइल की टॉर्च बंद करके देखा।


बल्ब सच में जल रहा था।


उसे अजीब लगा, क्योंकि इस रास्ते पर बिजली की लाइन होने की बात उसने कभी नहीं सुनी थी।


फिर भी वह आगे बढ़ गया।


कुछ दूरी पर उसे एक और खंभा दिखाई दिया।


और हर खंभे के नीचे वही पीली रोशनी।


अब जंगल पीछे छूटता जा रहा था।


सामने कुछ घरों जैसी आकृतियाँ दिखाई देने लगीं।


रवि ने कदम धीमे कर दिए।


उसे लगा शायद वह गाँव के पीछे वाले हिस्से में पहुँच गया है।


लेकिन अगले ही पल उसके कदम वहीं रुक गए।


सामने जो घर था...

वह उसका अपना घर था।


वही नीले रंग का दरवाजा।


वही बरामदे की टूटी कुर्सी।


वही खिड़की, जिसके बाहर उसकी पत्नी अक्सर कपड़े सुखाने के लिए रस्सी लगाती थी।


रवि कुछ सेकंड तक सिर्फ देखता रहा।


उसका दिमाग समझने की कोशिश कर रहा था कि वह यहाँ कैसे पहुँच गया।


फिर उसकी नजर घर के बाहर गई।


वहाँ एक बाइक खड़ी थी।


बिल्कुल उसकी बाइक जैसी।


रवि ने अपनी जेब टटोली


बाइक की चाबी अभी भी उसके पास थी।


वह घर के और करीब गया।


तभी अंदर से हल्की रोशनी दिखाई दी।


खिड़की के पर्दे के पीछे कोई बैठा था।


रवि ने गर्दन आगे की।


अंदर एक आदमी कुर्सी पर बैठा हुआ था।


पीठ उसकी तरफ थी।


रवि ने आवाज लगाने के लिए मुँह खोला—


लेकिन आवाज निकलने से पहले ही उस आदमी ने अपना सिर धीरे से घुमाया।


और रवि के शरीर में जैसे अचानक जान ही नहीं रही।


क्योंकि खिड़की के अंदर बैठा आदमी...


रवि खुद था।


वही चेहरा।


वही कपड़े।


वही घड़ी।


और सबसे डरावनी बात—


खिड़की के अंदर बैठा वह दूसरा रवि भी उसी क्षण उसकी तरफ देख रहा था।


रात में ग्रामीण घर की खिड़की के बाहर खड़ा रवि अंदर बैठे अपने हमशक्ल को देखता हुआ।
खिड़की के उस पार बैठा था रवि का बिल्कुल हूबहू हमशक्ल... लेकिन वह वहाँ पहुँचा कैसे?


रवि खिड़की के सामने खड़ा रहा।


अंदर बैठा दूसरा रवि भी उसे देख रहा था।


दोनों के बीच सिर्फ काँच था।


अचानक अंदर वाले रवि ने अपना हाथ उठाया और खिड़की की तरफ इशारा किया।


रवि की नजर उसके हाथ पर गई।


उसने देखा कि अंदर वाला रवि कुछ लिख रहा था।


फिर उसने कागज खिड़की के पास उठा दिया।


उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—


“भागो मत... देर हो चुकी है।”


रवि पीछे हट गया।


उसी क्षण घर के अंदर से उसकी पत्नी की आवाज आई।


“रवि... इतनी देर क्यों हो गई?”


रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई।


आवाज बिल्कुल उसकी पत्नी की थी।


वह दरवाजे की तरफ बढ़ा, लेकिन अंदर वाला रवि अचानक कुर्सी से उठा और खिड़की से गायब हो गया।


अंदर अंधेरा हो गया।



रवि ने दरवाजे का हैंडल पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।


लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ दरवाजे को छूने वाली थीं, उसके पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—


“इधर मत जाना।”


रवि पलटा।


पीछे कोई नहीं था।


बस वही पीली रोशनी वाला खंभा।


और उसके नीचे जमीन पर एक पुराना कागज पड़ा था।


रवि ने काँपते हाथों से उसे उठाया।


कागज पर कई नाम लिखे थे।


कुछ नाम पुराने थे।


कुछ के आगे तारीखें थीं।


और सबसे नीचे...


रवि का नाम लिखा था।


उसके नाम के सामने आज की तारीख थी।


रवि ने कागज हाथ से गिरा दिया।


तभी दूर कहीं से बाइक का हॉर्न सुनाई दिया।


फिर लगातार हॉर्न बजता रहा।


रवि अचानक जंगल की तरफ दौड़ पड़ा।


अब उसे न रास्ता दिखाई दे रहा था, न खंभे।


वह बस भागता रहा।


कुछ मिनट बाद पेड़ों के बीच से उसे सड़क की रोशनी दिखाई दी।


वह सड़क पर आ गया।


सामने एक ट्रक खड़ा था।


ड्राइवर ने उसे देखते ही आवाज लगाई—


“अरे भाई! इतनी रात में जंगल से कहाँ से आ रहे हो?”


रवि कुछ बोल नहीं पाया।


उसने सिर्फ अपनी बाइक की तरफ देखा।


वही बाइक सड़क के किनारे खड़ी थी।


उसने चाबी लगाई।


इस बार बाइक पहली ही कोशिश में स्टार्ट हो गई।


वह बिना पीछे देखे घर की तरफ निकल गया।


करीब बीस मिनट बाद वह अपने घर के सामने खड़ा था।


दरवाजा बंद था।


उसने घंटी बजाई।


कुछ सेकंड बाद उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला।


रवि उसे देखते ही कुछ पल चुप रहा।


पत्नी ने हैरानी से पूछा—


“क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो?”


रवि ने घर के अंदर देखा।


वही कमरा।


वही कुर्सी।


वही खिड़की।


लेकिन वहाँ कोई नहीं था।


उसने धीरे से पूछा—


“मैं... अभी घर पर आया हूँ ना?”


पत्नी हँस पड़ी।


“और कहाँ से आए होगे?”


रवि ने उस रात की पूरी बात नहीं बताई।


वह सीधे कमरे में गया और कपड़े बदलने लगा।


तभी उसकी नजर मेज पर पड़ी।


वहाँ एक गिलास रखा था।


गिलास के नीचे एक मुड़ा हुआ कागज दबा था।


उसने कागज उठाया।


उसके हाथ ठंडे पड़ गए।


वही कागज।


वही लिखावट।


लेकिन इस बार उस पर सिर्फ एक लाइन थी—


“आज तुम वापस आ गए... अगली बार तुम्हें वापस नहीं आने दुंगा।”


रवि ने कागज तुरंत फाड़ दिया।


उस रात वह सो नहीं पाया।


सुबह होते ही वह अपनी बाइक लेकर उस जगह वापस गया।


लेकिन जंगल के किनारे पहुँचकर उसे कोई कच्चा रास्ता नहीं मिला।


न बिजली के खंभे।


न पीली रोशनी।


न वह घर।


सिर्फ घना जंगल।


रवि ने वहाँ आसपास के लोगों से पूछा।


एक बुजुर्ग ने उसकी बात सुनकर कुछ देर उसे देखा।


फिर पूछा—


“तुमने वो रास्ता देखा था?”


रवि ने सिर हिलाया।


बुजुर्ग ने नजरें झुका लीं।


“वो रास्ता दिन में कभी नहीं होता।”


रवि चुप रहा।


सुबह धुंधले जंगल में रवि अपनी बाइक के पास खड़ा है और बुजुर्ग ग्रामीण से रहस्यमयी रास्ते के बारे में बात कर रहा है।
रात में जिस जगह पगडंडी और बिजली के खंभे दिखाई दिए थे, सुबह वहाँ सिर्फ घना जंगल था।



बुजुर्ग ने आगे कहा—


“बहुत साल पहले वहाँ सड़क बनाने का काम शुरू हुआ था। लेकिन एक रात काम कर रहे कुछ मजदूरों के साथ हादसा हुआ। उसके बाद वो रास्ता बंद कर दिया गया।”


“कितने साल पहले?”


बुजुर्ग ने जवाब दिया—


“लगभग पंद्रह साल।”


पंद्रह साल पहले...


वह इस गाँव में रहता भी नहीं था।


फिर बुजुर्ग ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा—


“तुम्हें वहाँ अपना घर दिखाई दिया था?”


रवि ने कुछ नहीं कहा।


बुजुर्ग समझ गया।


उसने बस इतना कहा—


“जिसे वो रास्ता अपना घर दिखाता है... वह अक्सर किसी और की जगह लेकर वापस आता है।”


रवि ने उस बात को कभी किसी से नहीं कहा।


समय बीतता गया।


उसने उस रास्ते की तरफ जाना भी छोड़ दिया।


लेकिन लगभग छह महीने बाद एक रात उसकी पत्नी ने उसे नींद से उठाया।


“रवि... बाहर कौन है?”


रवि ने उनींदी आँखों से पूछा—


“कौन?”


पत्नी ने खिड़की की तरफ इशारा किया।


रवि उठा।


खिड़की के बाहर अंधेरा था।


लेकिन उसी अंधेरे में...


एक पीली रोशनी जल रही थी।


वही पुराना बिजली का खंभा।


और उसके नीचे कोई आदमी खड़ा था।


रवि ने ध्यान से देखा।


वह आदमी धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठा रहा था।


चेहरा साफ दिखाई दिया।



वह खुद था।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।


वह मुस्कुरा रहा था।


और उसने खिड़की की तरफ देखकर अपने होंठ हिलाए—


“आज रास्ता यहीं तक आया है।”


अगली सुबह रवि घर में नहीं था।


दरवाजा अंदर से बंद था।


उसकी बाइक बरामदे में खड़ी थी।


और उसके कमरे की मेज पर सिर्फ एक पुराना कागज पड़ा था।


उस पर आज की तारीख लिखी थी।


नीचे एक नया नाम था।


उसकी पत्नी का।


उस दिन के बाद उस गाँव के लोगों ने रात में जंगल के किनारे से गुजरना पूरी तरह छोड़ दिया।


लेकिन कभी-कभी...


जब सितंबर की रात में बारिश के बाद हवा बिल्कुल शांत हो जाती है...


जंगल के अंदर से एक पीली रोशनी दिखाई देती है।


एक खंभा।


फिर दूसरा।


और उनके बीच एक पगडंडी...


जो दिन में वहाँ होती ही नहीं।


कहते हैं, अगर कोई उस रास्ते पर रात में चल पड़े...


तो रास्ता उसे कहीं बाहर नहीं ले जाता।


वह उसे उसी जगह ले जाता है जहाँ से किसी और की कहानी शुरू होनी होती है।