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| सब कुछ सामान्य था… लेकिन उस रात गांव का सन्नाटा कुछ और ही कह रहा था। |
ये बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि अब चुप रहना मुश्किल हो गया है।
जिस घर में शादी की शहनाइयाँ बजी थीं, वहाँ आज कोई रात को रुकता नहीं।
गाँव वाले कहते हैं—सब वहम था।
लेकिन जो मैंने देखा, जो मैंने सुना…
उसके बाद मुझे फर्क समझ में आ गया कि डर और वहम में एक बहुत पतली रेखा होती है।🔹
हमारा गाँव सेमरी ज़्यादा बड़ा नहीं है।
करीब 70–80 घर होंगे।
खेती, मवेशी, शाम को चौपाल—बस इतना ही जीवन है।
मैं महेश हूँ।
उम्र 38 साल।
गाँव में ही किराना की छोटी दुकान चलाता हूँ।
ज्यादातर बातें मैं बढ़ा-चढ़ाकर नहीं करता, क्योंकि गाँव में बात फैलते देर नहीं लगती।
ये सब शुरू हुआ पिछले साल, जब रमेश की शादी हुई।
रमेश मेरे घर के सामने रहता है।
सीधा लड़का, थोड़ा कम बोलने वाला।
उसकी शादी पास के इलाके से तय हुई थी।
लड़की का नाम सबको बाद में पता चला, पहले कोई खास चर्चा नहीं थी।
शादी के दिन सब कुछ सामान्य था।
लड़की सुंदर थी—इतना जरूर कहूँगा।
पर एक बात मैंने नोटिस की थी, जिसे मैंने उसी वक्त नजरअंदाज कर दिया।
वो बार-बार जमीन की तरफ देख रही थी,
जैसे लोगों को नहीं, उनके पैरों को पहचान रही हो।
पहले हफ्ते सब ठीक रहा।
रमेश रोज़ सुबह खेत जाता,
लड़की घर में रहती।
लेकिन तीसरी रात, मेरी नींद टूटी।
कारण कोई आवाज़ नहीं थी।
बस… ऐसा लगा जैसे कोई आँगन में खड़ा है।
हमारे यहाँ अक्सर जानवर आ जाते हैं,
तो मैंने खिड़की से देखा।
कुछ नहीं।
लेकिन उसी रात,
सुबह उठते ही मेरी पत्नी ने कहा—
“कल रात किसी औरत के चलने की आवाज़ आ रही थी… नंगे पाँव।”
मैंने हँसकर टाल दिया।
दो दिन बाद वही बात रामलाल काका ने कही।
फिर अगले दिन मंजू चाची ने।
सबका कहना एक जैसा था—
रात के करीब ढाई बजे,
किसी के आँगन में
धीमे-धीमे कदमों की आवाज़।
कोई चिल्लाहट नहीं।
कोई तेज़ शोर नहीं।
बस… चलना।
रमेश के घर से।
मैंने एक दिन खुद नोटिस किया।
रमेश की पत्नी
दिन में बहुत कम बोलती थी।
गाँव की औरतों में घुलती नहीं थी।
एक और अजीब बात—
वो कभी भी
अपने पैर धोकर घर में नहीं घुसती थी।
सीधे अंदर चली जाती।
गाँव में ऐसी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता,
लेकिन जब चीज़ें दोहराने लगें,
तो दिमाग खुद जोड़ने लगता है।
अब आवाज़ के साथ
एक और चीज़ जुड़ गई।
एक ही जगह से आती हँसी।
न बहुत तेज़।
न साफ़।
जैसे कोई मुँह बंद करके हँस रहा हो।
हर बार,
उसी समय।
ढाई बजे।
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| हर रात वही निशान… वही रास्ता… सवाल बस बढ़ते जा रहे थे। |
एक रात रमेश मेरी दुकान पर आया।
उसकी हालत ठीक नहीं थी।
उसने बस इतना कहा—
“भैया, तुम्हें लगता है इंसान नींद में भी…
चल सकता है?”
मैंने पूछा क्या हुआ।
वो बोला—
“मैं रोज़ रात को उठता हूँ…
और वो बिस्तर पर नहीं होती।”
मैंने कहा—
“शौच वगैरह?”
उसने सिर हिलाया—
“नहीं। वो बाहर होती है।”
मैंने पूछा—
“देखा?”
उसने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—
“पीपल के पेड़ के नीचे।”
हम दोनों चुप हो गए।
उसी हफ्ते,
गाँव का एक लड़का—सुरेश—
रात में खेत से भागता हुआ आया।
वो रो रहा था।
कह रहा था—
“मैंने किसी औरत को देखा…
उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े थे।”
अब बात फैल चुकी थी।
एक रात,
हम पाँच लोग रमेश के घर के बाहर रुके।
छुपकर नहीं—
बस चुपचाप।
ढाई बजे।
दरवाज़ा खुला।
वो बाहर आई।
धीरे।
सीधे पीपल के पेड़ तक गई।
उसने कुछ बोला नहीं।
बस… पेड़ को छूकर खड़ी रही।
तभी मैंने देखा—
उसके पैर
सच में
सामान्य नहीं थे।
घुटने आगे की तरफ थे,
लेकिन एड़ियाँ
पीछे की ओर।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
हम बस वापस लौट आए।
अगली सुबह रमेश का घर खाली था।
वो चला गया।
कहता है—
“मैं जिंदा रहना चाहता हूँ।”
उस घर में आज भी ताला लगा है।
पीपल का पेड़ अब सूख चुका है।
लेकिन कुछ रातों में,
जब गाँव बहुत शांत होता है—
ढाई बजे…
नंगे पाँव चलने की आवाज़
अब भी सुनाई देती है।
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| दिन निकल आया था… पर उस घर के अंदर क्या हुआ, कोई आज तक नहीं जान पाया। |
❓ अब सवाल:
अगर तुम उस गाँव में रहते…
और हर रात
एक ही आवाज़
एक ही समय पर सुनते—
तो क्या तुम उसे वहम कहकर
सो जाते?
या सच जानने की हिम्मत करते…
भले उसकी कीमत कुछ भी हो?

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