“धुक्याच्या पलीकडचा खजिना” एक रहस्य कथा

 

 

कधी कधी काही कथा या फक्त कथा नसतात…

त्या अनुभव असतात.

त्या जाणिवा असतात.

त्या एका अशा दुनियेचं दार असतात,

जिथे वास्तव आणि कल्पना यांची सीमा विरघळते…

तर चला मित्रांनो…

आज तुमच्यासाठी घेऊन आलो आहे एक खास कथा…

ज्यात रहस्य आहे…

रोमांच आहे…

आणि एक अद्भुत प्रवास आहे…

जी तुम्हाला हळूहळू एका वेगळ्याच दुनियेत घेऊन जाईल…

तर चला मग… 🌫️✨


सह्याद्रीच्या कुशीत एक छोटंसं गाव होतं —

शांत… निरागस… जणू काळाने विसरलेलं.

त्या गावात वेद नावाचा मुलगा राहत होता.

वेद थोडासा वेगळाच.

इतर मुलं खेळण्यात रमायची,

पण वेदला जंगल, टेकड्या, जुने भग्नवाडे,

धुक्याने भरलेल्या गूढ जंगलात उघडलेले रहस्यमय दार आणि त्याच्यासमोर उभा असलेला तरुण
धुक्यात लपलेलं दार… आणि एका अद्भुत प्रवासाची सुरुवात…

आणि गूढ जागा यांचं आकर्षण होतं.

त्याला नेहमी वाटायचं —

“या जगात दिसतं त्यापेक्षा खूप काही लपलेलं आहे…”

एक अनोखा दिवस

एके दिवशी सकाळी, गावावर विचित्र धुकं पसरलं होतं.

हे साधं धुकं नव्हतं.

ते दाट होतं.

पांढरं होतं.

आणि थोडंसं… चमकत होतं.

जंगलाच्या दिशेने ते धुकं जास्त गडद दिसत होतं.

वेदच्या मनात कुतूहल जागं झालं.

“आज काहीतरी वेगळं आहे…”

तो हळूच जंगलाच्या दिशेने निघाला.


जंगलात शिरताच वातावरण बदललं.

पक्ष्यांचे आवाज शांत झाले.

वारा थांबला.

सगळीकडे फक्त धुकं…

अचानक…

धुक्यात काहीतरी चमकलं.

जणू हवेत एक वर्तुळ तयार झालं होतं.

धुक्याचं दार.

ते हलकेच फिरत होतं.

वेदचा श्वास अडकला.

भीती होती…

पण त्याहून मोठं होतं आकर्षण.

तो पुढे गेला.

हात पुढे केला.

आणि…


क्षणात सगळं बदललं.

धुकं विरलं.

वेद एका पूर्ण वेगळ्या जागी उभा होता.

आकाश जांभळं.

झाडं चांदीसारखी चमकणारी.

हवा मंद, सुगंधित.

जमिनीवर प्रकाशाच्या रेषा वाहत होत्या.

“हे… कुठे आहे मी?”


“तू इथे कसा आलास?”

वेदने वळून पाहिलं.

त्याच्या समोर एक मुलगी उभी होती.

तिचे डोळे खोल, निळे.

केस जणू प्रकाशाच्या धाग्यांनी विणलेले.

ती साधी नव्हती.

ती त्या जगाची होती.

“मी… मला माहित नाही. धुक्यातून आलो.”

ती हलकेच हसली.

“मग तू निवडलेला आहेस.”

घनदाट धुक्यात हरवलेल्या अंधाऱ्या जंगलात जिज्ञासेने पुढे चालत जाणारा तरुण
भीतीपेक्षा जास्त शक्तिशाली होती त्याची जिज्ञासा…


ती त्याला एका प्राचीन संरचनेकडे घेऊन गेली.

ते मंदिरासारखं होतं…

पण जिवंत वाटत होतं.

भिंती हलकेच धडधडत होत्या.

मध्यभागी एक प्रकाशमान गोळा.

“हा खजिना आहे,” ती म्हणाली.

वेद गोंधळला.

“पण हे सोने नाही… हिरे नाही…”

ती गंभीर झाली.

“कारण हा खजिना आहे इच्छांचा.”


“ज्याला खरंच काही हवं असतं…

ज्याच्या मनात खऱ्या अर्थाने शोध असतो…

फक्त त्यालाच हे दार दिसतं.”

“तू काय शोधतोस, वेद?”

तो शांत झाला.

“मला… मला जाणून घ्यायचं आहे.”

“काय?”

“या जगाच्या पलीकडे काय आहे…”

ती हलकेच स्मितली.

“म्हणूनच तू इथे आहेस.”


“स्पर्श कर.”

वेदने हात पुढे केला.

प्रकाशाने त्याला वेढलं.

क्षणात…

त्याच्या डोळ्यांसमोर असंख्य दृश्यं उमटली.

भूतकाळ.

भविष्य.

अनंत जग.

वेदने विश्व पाहिलं.


प्रकाश शांत झाला.

“हे सगळं… खरं आहे?”

ती म्हणाली,

“जग एकच नाही.”

जंगलात उघडलेला तेजस्वी प्रकाशाने उजळलेला रहस्यमय खजिन्याचा पेटारा आणि आश्चर्यचकित तरुण
काही खजिने सोने नसतात… ते सत्य असतात…


“तुला परत जावं लागेल.”

“मी पुन्हा येऊ शकतो?”

ती हलकेच म्हणाली —

“जर तुझा शोध कधी संपला नाही…”

क्षणात…

वेद पुन्हा जंगलात उभा होता.

साधं धुकं.

साधं जंगल.

पण वेद आता तसाच नव्हता.


काही खजिने हे सोने–नाण्यांचे नसतात…

ते असतात शोधाचे.

ते असतात जाणिवांचे.

ते असतात त्या धुक्याच्या पलीकडच्या सत्याचे…

कदाचित…

आपण सगळेच आयुष्यात एखादं दार शोधत असतो…

जे उघडलं की जग बदलून जातं…

कारण खजिना बाहेर नसतो…

तो आपल्या शोधात दडलेला असतो… 🌫️✨


मैंने उस तस्वीर में अपनी लाश देखी”

 

Shock mein bed ke kinare baitha aadmi, haath mein purani tasveer, realistic
Ek aam raat… ek aam tasveer… lekin jo usne dekha, woh aam nahi tha.



वह तस्वीर बिल्कुल सामान्य थी।

न कोई साया।

न कोई अजीब चेहरा।

न कुछ ऐसा जिसे देखकर तुरंत डर लगे।

फिर भी…

जब मैंने उसे थोड़ी देर तक ध्यान से देखा,

मेरी साँसें जैसे रुक सी गईं।

क्योंकि उस तस्वीर में…

ज़मीन पर पड़ी लाश

मेरी ही थी।

🔹 

हेल्लो, मेरा नाम है अमन कुमार दरभंगा बिहार से

यह घटना लगभग तीन साल पुरानी है।

काम के कारण मैं कुछ महीनों के लिए नागपुर के पास एक छोटे से गाँव में रहने चला गया था।

शहर की भागदौड़ और तनाव से दूर,

बस थोड़ी शांति चाहिए थी।

गाँव बिल्कुल सामान्य था।

सुबह दूध वाले की साइकिल।

दोपहर में सन्नाटा।

शाम को बच्चों का शोर।

रात को गहरी खामोशी।

कुछ भी असामान्य नहीं।

मैं जिस घर में रह रहा था,

वह एक पुराना मिट्टी का मकान था।

बहुत बड़ा नहीं,

पर रहने लायक ठीक-ठाक।

दीवारों पर पुरानी दरारें,

लकड़ी का दरवाज़ा,

और आँगन में एक पुराना पीपल का पेड़।

पहले दिन से ही सब कुछ बिल्कुल सामान्य लग रहा था।

और सच कहूँ…

मैं उन लोगों में से हूँ जो भूत-प्रेत जैसी बातों पर कभी विश्वास नहीं करते।


🔹रहस्यमयी गुफा

एक दिन घर की सफ़ाई करते समय

मुझे स्टोर रूम में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी मिली।

अलमारी के अंदर थे:

कुछ पुराने कपड़े

कुछ धूल भरे कागज़

और एक फोटो फ्रेम।

फ्रेम में एक ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीर लगी थी।

थोड़ी फीकी।

थोड़ी पुरानी।

तस्वीर में गाँव जैसा ही दृश्य था।

एक घर।

एक पेड़।

और ज़मीन पर कोई व्यक्ति पड़ा हुआ।

मैंने बिना ज़्यादा सोचे देखा।

सामान्य सी तस्वीर लगी।

मैंने फ्रेम वापस रख दिया।


रात को काम करते समय

अचानक वही तस्वीर मेरे दिमाग में आ गई।

बिना किसी कारण।

बस जैसे कोई याद दिला रहा हो।

मैं उठकर स्टोर रूम गया।

फ्रेम निकाला।

तस्वीर को ध्यान से देखा।

सब कुछ वही।

पर इस बार…

ज़मीन पर पड़ा व्यक्ति

मुझे थोड़ा परिचित सा लगा।

चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।

फिर भी…

एक हल्का सा असहज एहसास हुआ।


🔹 

Lakdi ki mez par rakhi purani printed photograph, paas mein chashma, disturbing blurred image, hyper-realistic scene
Kabhi-kabhi sabse darawni cheez woh hoti hai… jo saaf dikh rahi hoti hai.


अगली रात।

फिर वही।

काम करते-करते अचानक तस्वीर याद आना।

मैं फिर गया।

फिर देखा।

इस बार…

वह परिचितपन और गहरा था।

जैसे दिमाग पहचानने की कोशिश कर रहा हो

पर स्वीकार नहीं कर रहा हो।


🔹


मैंने खुद को समझाया:

“गाँव के लोग एक जैसे ही दिखते हैं।”

“कोई संयोग होगा।”

“कुछ नहीं है।”

फ्रेम वापस रख दिया।

🔹 छोटी-छोटी बेचैनियाँ

कुछ दिनों बाद…

घर में कोई बड़ी डरावनी घटना नहीं हुई।

बस…

कुछ छोटी-छोटी बातें।

👉 बिना वजह बेचैनी

👉 रात को अजीब सा भारीपन

👉 कभी-कभी ऐसा लगना कि कोई देख रहा है

पर सब कुछ इतना सामान्य था

कि उसे नज़रअंदाज़ करना आसान था।


🔹 


लगभग 10-12 दिन बाद

मैंने एक अजीब चीज़ नोटिस की।

तस्वीर में ज़मीन पर पड़े व्यक्ति का चेहरा

पहले से थोड़ा ज़्यादा स्पष्ट लग रहा था।

मैंने खुद से कहा:

“शायद भ्रम है।”

पर सच में…

डिटेल्स बढ़ती हुई महसूस हो रही थीं।


🔹 


अब स्थिति यह हो गई कि

मैं रोज़ तस्वीर देखने लगा।

कभी सुबह।

कभी रात।

और हर बार…

वह असहज परिचितपन

थोड़ा और गहरा होता गया।


🔹 


एक रात…

लगभग 2 बजे का समय था।

पूरा घर शांत।

हवा तक की आवाज़ नहीं।

अचानक मेरे मन में एक विचार आया:

“तस्वीर को बाहर ले जाओ।”

“चाँदनी में देखो।”

वह विचार मेरा नहीं लगा।

फिर भी…

मैं फ्रेम लेकर आँगन में चला गया।

कमज़ोर चाँदनी थी।

पर देखने लायक रोशनी थी।

और तभी…

सब कुछ जैसे थम गया।

तस्वीर में पड़ा हुआ व्यक्ति

अब पूरी तरह साफ़ दिख रहा था।

और वह…

मैं था।

मेरा चेहरा।

मेरी काया।

मेरी शर्ट।

ज़मीन पर पड़ी हुई।

निर्जीव।

उस पल डर नहीं लगा।

सिर्फ़ एक सुन्न कर देने वाला झटका।

जैसे शरीर ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया हो।

मैं तस्वीर और अपने हाथों को बारी-बारी से देख रहा था।

दिमाग मानने से इंकार कर रहा था।


🔹  मौत का दरवाजा

पर असली डर अभी शुरू हुआ।

तस्वीर का बैकग्राउंड…

मेरे घर का वही आँगन था।

वही पीपल का पेड़।

वही दीवार।

वही जगह।

और तस्वीर में मेरी लाश

ठीक उसी स्थान पर पड़ी थी

जहाँ मैं खड़ा था।

मेरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।


🔹 


मैं तुरंत अंदर भागा।

आईने के सामने खड़ा हुआ।

चेहरा देखा।

फिर तस्वीर।

फिर आईना।

कोई शक नहीं।

कोई समानता नहीं।

सटीक मिलान।


🔹 


अगली सुबह

मैं गाँव के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के पास गया।

मैंने उनसे पूछा:

“इस घर में पहले कौन रहता था?”

उनका चेहरा गंभीर हो गया।

उन्होंने धीरे से कहा:

“बहुत साल पहले एक लड़का रहता था।”

“एक दिन अचानक मर गया।”

मैंने पूछा:

“कैसे?”

उन्होंने कहा:

“सुबह लोग आए तो वह आँगन में पड़ा था।”

मैंने पूछा:

“यहीं?”

उन्होंने बस मेरे घर की ओर इशारा कर दिया।


🔹 


मैं कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाया।

फिर धीरे से पूछा:

“कोई वजह?”

उन्होंने कहा:

“कोई नहीं जान पाया।”


🔹 

Subah ki roshni mein khali bed, zameen par padi tasveer, aadha khula darwaza, unsettling Indian house interior
Raat khatam ho chuki thi… lekin kahani nahi.


घर लौटकर मैंने तस्वीर निकाली।

इस बार…

चेहरा थोड़ा अलग था।

पर फिर भी…

वह मैं ही था।

जैसे तस्वीर

धीरे-धीरे बदल रही हो।


🔹 आख़री बस नहीं आई


उस रात मैं घर में नहीं रुका।

अगले दिन ही मकान बदल दिया।

फ्रेम वहीं छोड़ दिया।

उसे छूने की भी हिम्मत नहीं हुई।

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

लगभग दो महीने बाद…

मेरे फोन पर एक अनजान इमेज आई।

कोई नंबर नहीं।

कोई नाम नहीं।

बस एक तस्वीर।

मैंने खोली।

और…

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

वह वही तस्वीर थी।

पर इस बार…

लाश का चेहरा

मेरे वर्तमान चेहरे जैसा था।

जैसा मैं उस समय दिखता था।

और सबसे भयावह बात…

तस्वीर के नीचे एक हल्का सा प्रतिबिंब था।

जैसे किसी ने मोबाइल स्क्रीन की फोटो ली हो।

और उस प्रतिबिंब में…

एक हाथ दिखाई दे रहा था।

मोबाइल पकड़े हुए।

और वह हाथ…

मेरा ही लग रहा था।


🔹 


आज तक मुझे समझ नहीं आया:

👉 क्या तस्वीर पहले से बनी हुई थी?

👉 या वह धीरे-धीरे बदल रही थी?

👉 क्या वह लड़का

किसी और को “replace” कर रहा था?

👉 या…

👉 क्या तस्वीर कभी मेरे फोन पर आई ही नहीं…

और मैंने खुद ही क्लिक की?

अगर तुम मेरी जगह होते तो क्या करते?


वह दुल्हन नहीं… डायन थी

 



रात के समय भारतीय गांव का आंगन, कमजोर पीली बल्ब की रोशनी और सामने खड़ा पीपल का पेड़, बिना किसी इंसान के अजीब सन्नाटा
सब कुछ सामान्य था… लेकिन उस रात गांव का सन्नाटा कुछ और ही कह रहा था।


ये बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि अब चुप रहना मुश्किल हो गया है।

जिस घर में शादी की शहनाइयाँ बजी थीं, वहाँ आज कोई रात को रुकता नहीं।

गाँव वाले कहते हैं—सब वहम था।

लेकिन जो मैंने देखा, जो मैंने सुना…

उसके बाद मुझे फर्क समझ में आ गया कि डर और वहम में एक बहुत पतली रेखा होती है।🔹 

हमारा गाँव सेमरी ज़्यादा बड़ा नहीं है।

करीब 70–80 घर होंगे।

खेती, मवेशी, शाम को चौपाल—बस इतना ही जीवन है।

मैं महेश हूँ।

उम्र 38 साल।

गाँव में ही किराना की छोटी दुकान चलाता हूँ।

ज्यादातर बातें मैं बढ़ा-चढ़ाकर नहीं करता, क्योंकि गाँव में बात फैलते देर नहीं लगती।

ये सब शुरू हुआ पिछले साल, जब रमेश की शादी हुई।

रमेश मेरे घर के सामने रहता है।

सीधा लड़का, थोड़ा कम बोलने वाला।

उसकी शादी पास के इलाके से तय हुई थी।

लड़की का नाम सबको बाद में पता चला, पहले कोई खास चर्चा नहीं थी।

शादी के दिन सब कुछ सामान्य था।

लड़की सुंदर थी—इतना जरूर कहूँगा।

पर एक बात मैंने नोटिस की थी, जिसे मैंने उसी वक्त नजरअंदाज कर दिया।

वो बार-बार जमीन की तरफ देख रही थी,

जैसे लोगों को नहीं, उनके पैरों को पहचान रही हो।

पहले हफ्ते सब ठीक रहा।

रमेश रोज़ सुबह खेत जाता,

लड़की घर में रहती।

लेकिन तीसरी रात, मेरी नींद टूटी।

कारण कोई आवाज़ नहीं थी।

बस… ऐसा लगा जैसे कोई आँगन में खड़ा है।

हमारे यहाँ अक्सर जानवर आ जाते हैं,

तो मैंने खिड़की से देखा।

कुछ नहीं।

लेकिन उसी रात,

सुबह उठते ही मेरी पत्नी ने कहा—

“कल रात किसी औरत के चलने की आवाज़ आ रही थी… नंगे पाँव।”

मैंने हँसकर टाल दिया।

दो दिन बाद वही बात रामलाल काका ने कही।

फिर अगले दिन मंजू चाची ने।

सबका कहना एक जैसा था—

रात के करीब ढाई बजे,

किसी के आँगन में

धीमे-धीमे कदमों की आवाज़।

कोई चिल्लाहट नहीं।

कोई तेज़ शोर नहीं।

बस… चलना।

रमेश के घर से।

मैंने एक दिन खुद नोटिस किया।

रमेश की पत्नी

दिन में बहुत कम बोलती थी।

गाँव की औरतों में घुलती नहीं थी।

एक और अजीब बात—

वो कभी भी

अपने पैर धोकर घर में नहीं घुसती थी।

सीधे अंदर चली जाती।

गाँव में ऐसी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता,

लेकिन जब चीज़ें दोहराने लगें,

तो दिमाग खुद जोड़ने लगता है।

अब आवाज़ के साथ

एक और चीज़ जुड़ गई।

एक ही जगह से आती हँसी।

न बहुत तेज़।

न साफ़।

जैसे कोई मुँह बंद करके हँस रहा हो।

हर बार,

उसी समय।

ढाई बजे।

🔹 नौ बजे के बाद

आधी रात गांव का सुनसान आंगन, मिट्टी पर नंगे पैरों के निशान और आधा खुला दरवाज़ा, डरावना सन्नाटा
हर रात वही निशान… वही रास्ता… सवाल बस बढ़ते जा रहे थे।



एक रात रमेश मेरी दुकान पर आया।

उसकी हालत ठीक नहीं थी।

उसने बस इतना कहा—

“भैया, तुम्हें लगता है इंसान नींद में भी…

चल सकता है?”

मैंने पूछा क्या हुआ।

वो बोला—

“मैं रोज़ रात को उठता हूँ…

और वो बिस्तर पर नहीं होती।”

मैंने कहा—

“शौच वगैरह?”

उसने सिर हिलाया—

“नहीं। वो बाहर होती है।”

मैंने पूछा—

“देखा?”

उसने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—

“पीपल के पेड़ के नीचे।”

हम दोनों चुप हो गए।

उसी हफ्ते,

गाँव का एक लड़का—सुरेश—

रात में खेत से भागता हुआ आया।

वो रो रहा था।

कह रहा था—

“मैंने किसी औरत को देखा…

उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े थे।”

अब बात फैल चुकी थी।

एक रात,

हम पाँच लोग रमेश के घर के बाहर रुके।

छुपकर नहीं—

बस चुपचाप।

ढाई बजे।

दरवाज़ा खुला।

वो बाहर आई।

धीरे।

सीधे पीपल के पेड़ तक गई।

उसने कुछ बोला नहीं।

बस… पेड़ को छूकर खड़ी रही।

तभी मैंने देखा—

उसके पैर

सच में

सामान्य नहीं थे।

घुटने आगे की तरफ थे,

लेकिन एड़ियाँ

पीछे की ओर।

किसी ने कुछ नहीं कहा।

हम बस वापस लौट आए।

🔹 अंधा कुआं

अगली सुबह रमेश का घर खाली था।

वो चला गया।

कहता है—

“मैं जिंदा रहना चाहता हूँ।”

उस घर में आज भी ताला लगा है।

पीपल का पेड़ अब सूख चुका है।

लेकिन कुछ रातों में,

जब गाँव बहुत शांत होता है—

ढाई बजे…

नंगे पाँव चलने की आवाज़

अब भी सुनाई देती है।

सुबह की रोशनी में बंद पड़ा गांव का घर, जंग लगी जंजीर और सूखा पीपल का पेड़, भारी और डरावना माहौल
दिन निकल आया था… पर उस घर के अंदर क्या हुआ, कोई आज तक नहीं जान पाया।


❓ अब सवाल:

अगर तुम उस गाँव में रहते…

और हर रात

एक ही आवाज़

एक ही समय पर सुनते—

तो क्या तुम उसे वहम कहकर

सो जाते?

या सच जानने की हिम्मत करते…

भले उसकी कीमत कुछ भी हो?

रेलवे स्टेशन का बंद कमरा

 

रात के समय सुनसान भारतीय रेलवे स्टेशन, पीली लाइटों की झिलमिलाहट और घना सन्नाटा, डरावना माहौल
रात का वो स्टेशन, जहाँ सन्नाटा इतना भारी था कि हर परछाईं डराने लगी।



मेरा नाम अमित देशमुख है।

उस समय मेरी उम्र 32 साल थी और मैं नागपुर की एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में साइट सुपरवाइज़र के तौर पर काम करता था।

काम की वजह से मुझे अक्सर छोटे शहरों और कस्बों में जाना पड़ता था,

जहाँ ट्रेनें कम रुकती हैं और सुविधाएँ उससे भी कम होती हैं।

ये घटना उसी दौर की है,

जब एक साइट मीटिंग के लिए

मुझे अकेले रात में सफ़र करना पड़ा

और एक अनजान रेलवे स्टेशन पर रुकना मेरी मजबूरी बन गई।

उस दिन मुझे भंडारा ज़िले के पास एक छोटे कस्बे में पहुँचना था।

सीधी ट्रेन नहीं थी,

बीच में एक स्टेशन पर उतरकर

सुबह की पैसेंजर ट्रेन पकड़नी थी।

मेरी ट्रेन रात 12:20 पर उस स्टेशन पर रुकी।

स्टेशन छोटा था,

नाम का बोर्ड आधा टूटा हुआ,

और चारों तरफ़ अजीब-सी ख़ामोशी।

प्लेटफॉर्म पर

दो कुली सो रहे थे,

एक चाय की दुकान बंद पड़ी थी,

और स्टेशन मास्टर का कमरा ही रोशन दिख रहा था।

मैंने स्टेशन मास्टर से कहा,

“सुबह की ट्रेन यहीं से पकड़नी है,

रुकने की कोई जगह होगी क्या?”

वो कुछ सेकंड मुझे देखता रहा,

फिर बोला,

“Waiting room तो सालों से बंद है…

पर एक पुराना कमरा है।

अगर चाहो तो वहीं बैठ सकते हो।”

उसके बोलने के लहजे में

एक झिझक थी।

मैं थका हुआ था।

सुबह की मीटिंग दिमाग़ में घूम रही थी।

मैंने ज़्यादा सवाल नहीं किए।

🔸 

रेलवे प्लेटफॉर्म के आख़िरी छोर पर बना बंद और पुराना कमरा, आधा खुला जंग लगा दरवाज़ा और अंदर अंधेरा
प्लेटफॉर्म के आख़िर में मौजूद वो कमरा, जिसे रात में कोई खोलने की हिम्मत नहीं करता।

वो कमरा

प्लेटफॉर्म के बिलकुल आख़िरी सिरे पर था।

वहाँ पहुँचते ही लगा

जैसे स्टेशन वहीं खत्म हो जाता हो।

दरवाज़ा खोलते ही

सीलन और पुराने लकड़ी की गंध आई।

अंदर —

एक लंबी लकड़ी की बेंच

दीवार पर पीले दाग

एक पंखा, जो सालों से नहीं चला होगा

और एक बल्ब, जिसकी रोशनी डर को छुपाने के लिए काफी नहीं थी

स्टेशन मास्टर ने कहा,

“अंदर से कुंडी लगा लेना।”

मैंने दरवाज़ा बंद किया।

कुंडी पहले से लगी हुई थी।

मैंने सोचा —

शायद पहले किसी ने लगा दी होगी।

🔸 वह रेडियो अब भी बजता है

करीब 1:10 बजे

मैं बेंच पर लेटा था।

तभी

मुझे लगा जैसे

दीवार के अंदर से

कोई बहुत धीमी आवाज़ आ रही हो।

ठक… ठक… ठक…

ऐसी आवाज़

जैसे कोई

बंद जगह में

कुछ कहने की कोशिश कर रहा हो।

मैं उठा।

दीवार पर कान लगाया।

आवाज़ रुक गई।

मैंने खुद को समझाया —

पुरानी बिल्डिंग है,

रात में आवाज़ें आती हैं।

पर कुछ देर बाद

वही आवाज़

फिर उसी जगह से।

🔸 

करीब 2 बजे

पंखा अचानक चल पड़ा।

मैं झटके से उठा।

स्विच OFF था।

पंखा कुछ सेकंड चला

फिर रुक गया।

उसी पल

बाहर से

किसी के सीटी बजाने की आवाज़ आई।

ट्रेन नहीं थी।

कोई प्लेटफॉर्म पर नहीं था।

अब बेचैनी साफ़ थी।

🔸 

अंधेरे रेलवे कमरे की दीवार पर इंसानी आकृति जैसी अजीब परछाईं, जो किसी की नहीं लगती
वो परछाईं… जो किसी इंसान की नहीं थी, लेकिन साफ़ दिखाई दे रही थी।

जब मैं वापस अंदर आया

तो दीवार पर

एक परछाईं दिखी।

मैं हिला।

परछाईं नहीं हिली।

मैंने लाइट जलाई।

परछाईं गायब।

लाइट बंद की।

परछाईं फिर वहीं।

अब ये भ्रम नहीं लग रहा था।

🔹 

सुबह 4 बजे

मैं बाहर निकला।

प्लेटफॉर्म पर

एक बुज़ुर्ग कुली बैठा था — रामू काका।

मैंने पूछा,

“काका, ये कमरा रात को इस्तेमाल क्यों नहीं होता?”

उसने मेरी तरफ़ देखा,

फिर कमरे की तरफ़।

धीरे बोला,

“तू रात वहीं था?”

मैंने हाँ कहा।

उसने जेब से

एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी फोटो निकाली।

“बीस साल पहले

इसी कमरे में

एक कर्मचारी

नाइट ड्यूटी में

बंद हो गया था।”

“दरवाज़ा बाहर से बंद था।

आग लग गई।”

“सुबह

जब खोला गया

तो…

दीवारों पर

नाखूनों के निशान थे।”

फोटो में

वही निशान साफ़ दिख रहे थे।

🔹नौ बजे के बाद

मैं ट्रेन में बैठ गया।

घर पहुँचकर

फोन चेक किया।

रात की एक audio recording

अपने-आप सेव हो गई थी।

उसमें

मेरी साँसों के बीच

एक आवाज़ थी —

“दरवाज़ा… बाहर से बंद था…”

आज भी

मैं छोटे स्टेशनों पर

रात रुकने से बचता हूँ।

क्योंकि कुछ जगहें

सिर्फ़ इमारत नहीं होतीं —

वो यादें सँभाल कर रखती हैं।


❓अब सवाल

अगर तुम अमित की जगह होते,

तो क्या उस कमरे में रुकते?

या तुम भी मानते हो

कि ये सब सिर्फ़ संयोग था?


“वह अस्पताल वार्ड, जहाँ हर मंगलवार किसी की मौत होती है”

 

यह बात मैं आज भी किसी को ठीक से बता नहीं पाता।

क्योंकि जब भी “Tuesday” का नाम आता है, मुझे उस अस्पताल की गंध महसूस होने लगती है।

यह कहानी मेरे साथ सीधे नहीं हुई…

लेकिन मेरे अपने घर के एक सदस्य ने जो देखा, उसके बाद हमारे परिवार में कोई भी मंगलवार को अस्पताल का नाम नहीं लेता।

अगर आपको लगता है कि मौत अचानक होती है…

तो शायद आपने Ward नंबर 7 के बारे में नहीं सुना।

🔹 

अंधेरे अस्पताल के गलियारे में जली हुई ट्यूब लाइट, खाली व्हीलचेयर और सन्नाटा, जो किसी अनहोनी का संकेत देता है।
जहाँ खामोशी भी कुछ छुपा रही हो, वहाँ कहानी की पहली साँस डर से भरी होती है।

मेरा बड़ा भाई, अमित, शहर के एक सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स था।

सरल स्वभाव, काम से काम रखने वाला इंसान।

उसने कभी भूत-प्रेत जैसी बातों पर भरोसा नहीं किया।

अस्पताल भी सामान्य था।

दिन में शोर, रिश्तेदारों की भीड़, स्ट्रेचर की आवाज़ें।

रात में मशीनों की लगातार बीप… और दवाइयों की तीखी गंध।

अमित की ड्यूटी ज़्यादातर Ward नंबर 7 में लगती थी।

एक पुराना वार्ड, लेकिन चालू।

पहले कुछ महीनों तक सब ठीक रहा।

फिर एक दिन उसने घर आकर यूँ ही कहा—

“अजीब बात है… Tuesday को इस वार्ड में माहौल अलग हो जाता है।”

हमने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन फिर यह बात हर हफ्ते दोहराई जाने लगी।

🔸 उस रात घर में कोई और भी था

हर Tuesday रात को Ward 7 में ठंड ज़्यादा लगने लगती

मरीज बिना वजह बेचैन हो जाते

Heart monitor एक पल के लिए same tone में अटक जाता

और ठीक रात 3:15 से 3:35 के बीच कुछ न कुछ गड़बड़ होती

पहले डॉक्टर कहते—

“Critical patients हैं, coincidence है।”

अमित भी यही मानता रहा।

लेकिन दिक्कत यह थी कि

👉 हर Tuesday कोई न कोई मर ही जाता था।

बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार— कुछ नहीं।

सिर्फ़ Tuesday।

🔸 

एक Tuesday अमित ने मुझे फोन किया।

आवाज़ अजीब तरह से धीमी थी।

“आज फिर वही हुआ,” उसने कहा।

“Bed नंबर 4… बिल्कुल stable था।

और 3:32पर… सब खत्म।”

मैंने पूछा—

“शायद हालत बिगड़ गई होगी?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस इतना बोला—

“अगर तुम यहाँ होते… तो तुम्हें भी अजीब लगता।”

उस रात के बाद उसने Tuesday को ड्यूटी बदलवाने की कोशिश की।

लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से वही वार्ड मिल जाता।

जैसे…

कोई नहीं चाहता था कि वह वहाँ से जाए।

🔹 रात का पिछा

एक Tuesday, Ward में एक बुज़ुर्ग मरीज भर्ती हुआ।

हालत stable थी।

Doctor ने खुद कहा—

“24 घंटे में discharge.”

अमित निश्चिंत था।

रात 3:16 AM

सब सामान्य।

3:32AM

Ward की tube-light एक सेकंड के लिए flicker हुई।

अमित ने बताया—

उसी पल उसे लगा जैसे

किसी ने उसके कान के पास साँस ली।

वह पलटकर Bed नंबर 7 की तरफ देखता है।

वहाँ…

परित्यक्त अस्पताल वार्ड में तीन खाली बेड, बिखरी सफेद चादरें, फ्लैटलाइन दिखाता मॉनिटर और काँच में उभरती रहस्यमयी परछाईं।
जब डर महसूस नहीं, बल्कि दिखाई देने लगे — तब समझो सच सामने आ चुका है।


👉 कोई खड़ा था।

न पूरा इंसान,

न पूरा साया।

अमित की टाँगें सुन्न हो गईं।

अगले ही पल—

Heart monitor flat।

मरीज मर चुका था।

🔸 सन्नाटा

अगले दिन अमित ने हिम्मत करके

CCTV footage देखी।

Ward खाली दिख रहा था।

लेकिन ठीक 3:32 AM पर

Screen में एक dark shape उभरी।

कोई इंसानी चाल नहीं।

कोई साफ़ चेहरा नहीं।

बस…

एक मौजूदगी।

Footage वहीं glitch होकर रुक जाती है।

Hospital records खंगाले गए।

👉 पिछले 12 सालों में

👉 हर Tuesday

👉 Ward नंबर 7 में

👉 कम से कम एक मौत

चाहे मरीज मामूली ही क्यों न हो।

यह अब coincidence नहीं था।

🔹 

अंधेरे अस्पताल कमरे में बिस्तर पर रखा चमकता स्मार्टफोन, 3:17 AM का समय दिखाता हुआ, बिना नाम की मिस्ड कॉल के साथ।
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं… वो बस 3:17 पर दोबारा कॉल करती हैं।

अमित ने अगले Tuesday से नौकरी छोड़ दी।

पूरी तरह।

हम सबने राहत की साँस ली।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

पिछले Tuesday रात

3:32 AM पर

अमित के फोन पर एक missed call आई।

Number private था।

Call log में सिर्फ़ एक नाम लिखा था—

“Ward 7”

आज अमित किसी से बात नहीं करता।

Tuesday को कमरे से बाहर नहीं निकलता।

और कभी-कभी

वह नींद में बस एक ही बात बुदबुदाता है—

“मैं वहाँ नहीं था…

तो फिर मुझे क्यों बुलाया?”

❓ Tum hote to kya karte?

❓ Kya 12 saalon tak har Tuesday ek hi ward me maut sirf coincidence ho sakti hai?

👇 Comment karke बताओ…

क्योंकि कुछ जगहें

छोड़ देने से नहीं…

छोड़ने नहीं देतीं। 😈