संदूक का रहस्य

 


पुरानी हवेली में रखा रहस्यमयी खानदानी संदूक और उसके पीछे खड़े तीन वारिस
एक पुरानी हवेली, तीन वारिस और एक ऐसा संदूक जिसे खोलना आसान नहीं था। आखिर उसके अंदर क्या छिपा था?




शहर से करीब पाँच मील दूर, एक ऊँची पहाड़ी के नीचे राजगढ़ की हवेली खड़ी थी।


सड़क से उसका पूरा आकार दिखाई नहीं देता था। पहले पत्थर की ऊँची दीवार आती, फिर लोहे का विशाल फाटक और उसके बाद पेड़ों के बीच से गुजरती लंबी सड़क। बरसों पुराने बरगद की शाखाएँ कई जगह इतनी नीचे झुक आई थीं कि कार को उनके नीचे से गुजरते समय धीमा करना पड़ता।


फाटक के दोनों ओर पत्थर के दो सिंह बने थे।


उनकी आँखों की जगह काले पत्थर जड़े थे।


गाँव के बूढ़े कहते थे कि जब यह हवेली बनी थी, तब आसपास सिर्फ खेत और जंगल हुआ करते थे। शहर बहुत दूर था। मगर सिंह परिवार ने धीरे-धीरे जमीन खरीदी, कारोबार खड़ा किया और देखते ही देखते उनका नाम पूरे इलाके में फैल गया।


तीन पीढ़ियों में धन इतना बढ़ा कि राजगढ़ की गिनती शहर के सबसे रसूखदार परिवारों में होने लगी।


लेकिन धन बढ़ने के साथ रुद्रप्रताप सिंह ने एक चीज कभी नहीं बदली—


अपने खानदान के प्रति उसका आग्रह।


हवेली में नई चीजें आती रहीं, मगर पुरानी चीजें बाहर नहीं गईं।


दादा की तलवार उसी दीवार पर टंगी थी।


परदादा का पीतल का हुक्का उसी कमरे में रखा था।


पुरानी जमीनों के कागज लोहे की अलमारियों में वैसे ही बंद थे।


और मुख्य बरामदे की दीवार पर सिंह परिवार की चार पीढ़ियों के चित्र एक सीध में लगे थे।


हर चित्र के नीचे नाम और तारीख खुदी थी।


सबसे नीचे की जगह खाली थी।


रुद्रप्रताप कई बार वहाँ खड़ा होकर उस खाली जगह को देखता।


अब उसे वहाँ किसी नाम की कल्पना करने में भी डर लगता था।


क्योंकि उसे मालूम था—


उसका नाम उस दीवार पर लगने वाला आखिरी नाम हो सकता है।



रुद्रप्रताप को अपनी बीमारी का नाम सुनकर भी डर नहीं लगा था।


डर उसे उस दिन लगा था, जब डॉक्टर ने उसकी उँगलियाँ देखकर कहा था—


“आप कोशिश कीजिए... इन्हें मुट्ठी में बंद करने की।”


रुद्रप्रताप ने कोशिश की।


उँगलियाँ हिलीं।


मगर पूरी तरह बंद नहीं हो सकीं।


डॉक्टर ने कुछ नहीं कहा।


रुद्रप्रताप ने भी नहीं पूछा।


उस दिन से उसने अपने कमरे में रखी चीजों को नए तरीके से देखना शुरू कर दिया था।


चाँदी का गिलास।


पुरानी घड़ी।


बिस्तर के पास रखी छड़ी।


दीवार पर पिता का चित्र।


और खिड़की के बाहर वह बगीचा, जिसमें उसने अपने हाथों से कई पेड़ लगाए थे।


बीमारी का नाम था—एएलएस।


शरीर धीरे-धीरे अपनी ताकत खोता जाता था।


दिमाग मगर पूरी तरह जागता रहता था।


यही सबसे कठिन बात थी।


रुद्रप्रताप को लगता जैसे उसका शरीर उससे पहले ही विदा लेने की तैयारी कर रहा हो, जबकि उसका मन अभी भी बहुत कुछ तय करना चाहता था।


सुबह नौ बजे डॉक्टर चले गए।


कमरे में फिर वही शांति लौट आई।


नर्स ने दवा मेज पर रखी और पर्दे थोड़ा खोल दिए।


धूप भीतर आई।


सामने बगीचे में माली सूखे पत्ते समेट रहा था।


रुद्रप्रताप की नजर कुछ देर वहाँ रही।


फिर नीचे बरामदे में खड़ी कार पर गई।


विक्रम की कार।


विक्रम सुबह से दो बार अंदर आ चुका था।


एक बार पिता का हाल पूछने।


दूसरी बार वकील के बारे में पूछने।


वह पूछते समय बहुत सहज बना हुआ था।


“पिताजी, डॉक्टर क्या कह रहे हैं?”


और फिर उसी साँस में—


“वकील साहब को कब बुलाना है?”


रुद्रप्रताप ने उस समय सिर्फ उसकी तरफ देखा था।


विक्रम ने नजरें हटा ली थीं।


रुद्रप्रताप उसे समझता था।


विक्रम बुरा आदमी नहीं था।


लेकिन पैसा उसके लिए जरूरत से ज्यादा जरूरी था।


उसे जो मिला था, वह कम लगता था।


और जो नहीं मिला था, वह अपना अधिकार।


उसकी पत्नी माधवी ने इस स्वभाव को और धार दी थी।


माधवी को राजगढ़ की संपत्ति का अंदाजा था।


उसे पता था कौन-सी जमीन किस कीमत की है, कौन-सा गोदाम कितना देता है और शहर के नए इलाके में कौन-सी जमीन आने वाले वर्षों में सोना बन सकती है।


पिछले कुछ दिनों से वह विक्रम से बार-बार एक ही बात कह रही थी—


“समय रहते पिताजी से बात करो।”


विक्रम हर बार चुप हो जाता।


उसे डर था कि पिता की नजरों में लालची दिखाई देगा।


मगर माधवी को डर नहीं था।


उसके लिए पिता की बीमारी एक भावनात्मक घटना नहीं, एक बदलता हुआ हिसाब थी।


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दूसरा बेटा समर अलग था।


वह कभी सीधे कुछ नहीं माँगता।


वह इंतजार करता।


सुनता।


फिर सही समय पर एक ऐसा वाक्य बोलता जिससे सामने वाला वही सोचने लगे जो समर चाहता था।


उसकी पत्नी नैना भी कम चालाक नहीं थी।


दोनों देर रात अपने कमरे में बैठकर पुराने कागजों और संपत्ति की सूची पर चर्चा करते।


“विक्रम को लगता है कि सबसे बड़ा होने से सब कुछ उसका है,” नैना ने एक रात कहा था।


समर मुस्कुराया।


“उसे ऐसा ही सोचने दो।”


“और तुम?”


“मैं सोचता नहीं।”


“फिर?”


समर ने कागज तह किया था।


“देखता हूँ।”


नैना ने पति को कुछ देर देखा।


उसे मालूम था—समर जब ऐसा कहता है, तब उसके दिमाग में कुछ न कुछ चल रहा होता है।


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तीसरा बेटा अर्णव उन दोनों से बिल्कुल अलग था।


उसकी जिंदगी पिछले कुछ वर्षों में कई बार पटरी से उतरी थी।


एक कारोबार शुरू किया—नुकसान हुआ।


दूसरा काम शुरू किया—दोस्त ने धोखा दिया।


तीसरी कोशिश में कर्ज हो गया।


अब वह राजगढ़ में रहते हुए भी इस घर का हिस्सा कम और एक ऐसा आदमी ज्यादा लगता था जो अपने ही परिवार में रास्ता खोज रहा हो।


काव्या उससे नाराज रहती थी।


लेकिन उसकी नाराजगी में माधवी जैसा लालच नहीं था।


वह बस चाहती थी कि अर्णव किसी एक काम पर टिके।


उस शाम जब अर्णव बगीचे में अकेला बैठा था, काव्या उसके पास आई।


कुछ देर दोनों चुप रहे।


फिर उसने कहा—


“पिताजी की तबीयत सच में खराब है।”


अर्णव ने सिर झुका लिया।


“मुझे पता है।”


“तुम उनसे मिले?”


“हाँ।”


“कुछ कहा उन्होंने?”


अर्णव ने सामने देखा।


“बहुत कुछ कहने को था... लेकिन बोले कुछ नहीं।”


काव्या ने उसकी तरफ देखा।


“शायद वह तुम्हें बाकी दोनों से ज्यादा समझते हैं।”


अर्णव हल्का-सा हँसा।


उस हँसी में खुशी नहीं थी।


“पता नहीं।”


वह उठकर चला गया।


काव्या उसे देखती रही।


उसे पहली बार लगा कि अर्णव को पैसों से ज्यादा किसी ऐसी चीज की जरूरत है जो उसे अपने बारे में फिर से विश्वास दिला सके।


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उस रात रुद्रप्रताप ने किसी को अपने कमरे में नहीं बुलाया।


नर्स दवा देकर चली गई।


कमरे की रोशनी मंद कर दी गई।


रुद्रप्रताप ने आँखें बंद कर लीं।


लेकिन नींद नहीं आई।


कुछ देर बाद उन्होंने बहुत धीमे से हाथ उठाने की कोशिश की।


तकिए के नीचे उँगलियाँ गईं।


एक पुराना कपड़ा बाहर आया।


उन्होंने उसे खोला।


अंदर पीतल की एक चाबी थी।


चाबी के सिर पर वही निशान था जो हवेली के मुख्य फाटक पर बने पत्थर के सिंहों के नीचे खुदा हुआ था।


रुद्रप्रताप ने उसे हथेली में रखा।


कुछ क्षण तक देखते रहे।


फिर उनकी आँखों के सामने जैसे कोई बहुत पुराना दृश्य उभर आया।


बारिश।


कीचड़।


उनके पिता का चेहरा।


और एक अंधेरा कमरा।


वह तब मुश्किल से बीस वर्ष के थे।


उनके पिता मृत्युशय्या पर थे।


उन्होंने भी यही चाबी उन्हें दी थी।


और कहा था—


“जिसे यह मिले, जरूरी नहीं कि वह इसका मालिक हो।”


उस समय रुद्रप्रताप ने उस बात का अर्थ नहीं समझा था।


अब समझ में आ रहा था।


उन्होंने चाबी वापस कपड़े में रख दी।


लेकिन हाथ कुछ देर तक उसी पर टिका रहा।


उनकी आँखों में नमी आ गई।


उन्हें अपने पिता की कमी महसूस नहीं हुई।


उन्हें अपने बेटों का भविष्य दिखाई दिया।


एक भविष्य जिसमें तीन भाई एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो सकते थे।


रुद्रप्रताप ने करवट बदलने की कोशिश की।


शरीर ने साथ नहीं दिया।


उन्होंने आँखें बंद कर लीं।


एक आँसू कनपटी की तरफ चला गया।


उन्होंने उसे पोंछने की कोशिश नहीं की।


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अगली सुबह उन्होंने नौकर से कहा—


“तीनों बेटों को शाम को बुलाना।”


नौकर ने पूछा—


“तीनों साहब?”


रुद्रप्रताप ने आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा।


“तीनों।”


शाम तक हवेली का माहौल सामान्य था।


मगर रुद्रप्रताप के कमरे में असामान्य शांति थी।


दीवार पर लगी घड़ी की आवाज साफ सुनाई दे रही थी।


एक-एक करके तीनों बेटे अंदर आए।


विक्रम के चेहरे पर बनावटी स्थिरता थी।


समर शांत था।


अर्णव पिता के चेहरे को देख रहा था।


रुद्रप्रताप ने तीनों को सामने खड़ा रहने दिया।


कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई।


फिर उन्होंने कहा—


“तुम तीनों जानते हो... मैं ज्यादा दिन नहीं हूँ।”


कमरे में किसी ने जवाब नहीं दिया।


रुद्रप्रताप की नजर एक-एक चेहरे पर गई।


“मेरी संपत्ति का हिस्सा तुम्हें मिल जाएगा।”


विक्रम की पलकों में हल्की हरकत हुई।


समर बिल्कुल स्थिर रहा।


अर्णव ने नजरें झुका लीं।


“लेकिन संपत्ति और विरासत... एक चीज नहीं होती।”


यह सुनकर पहली बार तीनों ने उनकी ओर देखा।


रुद्रप्रताप ने तकिए के पास रखी दराज की ओर इशारा किया।


अर्णव आगे बढ़ा।


दराज खोली।


अंदर वही पुराना कपड़ा रखा था।


उसने कपड़ा उठाया।


पीतल की चाबी उसकी हथेली पर आ गई।


विक्रम की नजर तुरंत उस पर टिक गई।


समर ने चाबी को ध्यान से देखा।


रुद्रप्रताप उन्हें देख रहे थे।


“यह हमारे खानदान में मेरे पिता से मुझे मिली थी।”


उन्होंने साँस ली।


“और उनसे पहले... उनके पिता को।”


कमरे में हवा जैसे ठहर गई।


“यह किसकी चाबी है?”


समर ने पूछा।


रुद्रप्रताप ने उसकी तरफ देखा।


“एक संदूक की।”


“कहाँ है वह संदूक?”


विक्रम के मुँह से सवाल निकल गया।


रुद्रप्रताप की आँखों में बहुत हल्की मुस्कान आई।


“यही तो तुम्हें पता लगाना है।”


विक्रम का चेहरा तन गया।


रुद्रप्रताप ने आगे कहा—


“उस संदूक में मेरे पिता ने हमारे खानदान की असली विरासत सुरक्षित रखी थी।”


“क्या है उसमें?”


इस बार समर ने पूछा।


रुद्रप्रताप कुछ क्षण चुप रहे।


फिर बोले—


“मैंने कभी नहीं देखा।”


तीनों भाई एक-दूसरे की ओर देखने लगे।


“तो आपको कैसे पता कि उसमें क्या है?”


अर्णव ने पहली बार पूछा।


रुद्रप्रताप की आँखें उसके चेहरे पर टिक गईं।


“क्योंकि मेरे पिता ने मुझे उस संदूक तक पहुँचने का अधिकार नहीं दिया था।”


उन्होंने चाबी अर्णव की हथेली से वापस ले ली।


“उन्होंने मुझे सिर्फ इतना कहा था कि एक दिन मेरे सामने भी वही परीक्षा आएगी।”


“कौन-सी परीक्षा?”


रुद्रप्रताप ने जवाब देने से पहले आँखें बंद कर लीं।


कमरे में कुछ क्षण सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।


फिर उन्होंने कहा—


“तुम तीनों में से कौन इस खानदान को अपने बाद भी जीवित रख सकता है।”


विक्रम की आँखों में बेचैनी आई।


समर के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।


अर्णव ने पिता की ओर देखा।


रुद्रप्रताप ने धीमे से कहा—


“संदूक उस एक बेटे को मिलेगा।”


उन्होंने तीनों को देखा।


“लेकिन उसे पाने के लिए तुम्हें एक काम करना होगा।”


बाहर अचानक हवा तेज हुई।


खिड़की का एक पल्ला हल्के से काँपा।


रुद्रप्रताप की नजर खिड़की से हटकर तीनों पर आ गई।


“और उस काम में तुम्हें धन नहीं... अपना स्वभाव साथ लेकर जाना होगा।”


कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।


रुद्रप्रताप ने आँखें बंद कर लीं।


जैसे वह अब थक चुका था।


लेकिन जाने से पहले उसने एक बात और कही—


“कल सुबह तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारे दादा ने वह संदूक कहाँ छिपाया था।”


तीनों बेटे चुपचाप बाहर निकल गए।


दरवाजा बंद हुआ।


रुद्रप्रताप ने आँखें खोलीं।


उनकी नजर दरवाजे पर थी।


चेहरे पर थकान थी।


लेकिन उसके पीछे एक गहरी शांति भी।


जैसे वर्षों से जिस क्षण की प्रतीक्षा थी...


वह आखिर आ गया हो।



अगली सुबह राजगढ़ हवेली में रोज की तरह सूरज उगा, मगर घर का वातावरण वैसा नहीं था।


रुद्रप्रताप के कमरे के बाहर दो नौकर खड़े थे। भीतर नर्स दवाइयाँ सजा रही थी। खिड़की से आती धूप बिस्तर के पास तक पहुँच गई थी, लेकिन रुद्रप्रताप की आँखें उस रोशनी पर नहीं थीं।


वह सामने दीवार पर लगे अपने पिता के चित्र को देख रहा था।


चित्र में उसके पिता घोड़े पर बैठे थे।


पीठ सीधी।


चेहरा कठोर।


और हाथ में वही चाँदी की मूठ वाली छड़ी, जिसे रुद्रप्रताप ने आज तक संभालकर रखा था।


चालीस साल पहले उसी आदमी ने उसे वह चाबी दी थी।


रुद्रप्रताप के होंठ हिले।


“अब आपकी बारी खत्म... मेरी भी।”


नर्स ने शायद सुना नहीं।


रुद्रप्रताप ने आँखें बंद कर लीं।


कुछ देर बाद बाहर से कदमों की आवाज आई।


तीनों बेटे फिर कमरे में आए।


इस बार उनके साथ कोई पत्नी नहीं थी।


रुद्रप्रताप ने इशारा करके नौकर से कमरे का दरवाजा बंद करवाया।


उसने बिस्तर के पास रखी मेज से एक पुराना लिफाफा उठाया।


लिफाफा मोटे, पीले पड़ चुके कागज का था।


किनारों पर उम्र के निशान थे।


उस पर लाल मोम की मुहर लगी थी।


वही सिंह परिवार की मुहर।


विक्रम की निगाह उस मुहर पर टिक गई।


“इसे मेरे पिता ने तब बंद किया था,” रुद्रप्रताप ने कहा, “जब मैं तुम्हारी उम्र का था।”


समर ने पूछा—


“इसमें क्या है?”


रुद्रप्रताप ने उसकी ओर देखा।


“तुम्हें पढ़ना है।”


समर ने हाथ बढ़ाया।


लेकिन रुद्रप्रताप ने लिफाफा नहीं दिया।


“तीनों साथ पढ़ोगे।”


उन्होंने चाकू से मोम की सील काटी।


कागज खोलते समय उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।


कागज पर स्याही काफी हल्की पड़ चुकी थी।


ऊपर सिर्फ एक जगह का नाम लिखा था—


“कालीधार।”


अर्णव ने धीरे से पढ़ा।


“कालीधार...”


रुद्रप्रताप ने सिर हिलाया।


“तुम्हारे दादा की पहली जमीन।”


विक्रम ने तुरंत कहा—


“वह जमीन तो बहुत पहले बेच दी गई थी।”


“नहीं।”


रुद्रप्रताप ने उसकी तरफ देखा।


“जो जमीन बेची गई थी... वह कालीधार का सिर्फ सामने वाला हिस्सा था।”


कमरे में खामोशी फैल गई।


उन्होंने कागज आगे किया।


उस पर हाथ से बना एक पुराना नक्शा था।


एक नदी।


उसके किनारे कुछ पेड़।


एक टूटा हुआ मंदिर।


और पहाड़ी के नीचे बने किसी पुराने भवन का निशान।


नक्शे के एक कोने में तीन शब्द लिखे थे—


“जहाँ पानी रुकता है।”


विक्रम ने नक्शा हाथ में ले लिया।


“बस इतना?”


“नहीं।”


रुद्रप्रताप ने उसकी ओर देखा।


“इसके पीछे देखो।”


कागज पलटा गया।


पीछे सिर्फ एक वाक्य था।


“जिसे संदूक चाहिए, उसे पहले वह वापस लाना होगा जो सिंह परिवार ने खो दिया था।”


समर कुछ देर उस वाक्य को देखता रहा।


“क्या खोया था?”


रुद्रप्रताप ने कोई जवाब नहीं दिया।


अर्णव की नजर पिता के चेहरे पर गई।


वहाँ थकान थी।


और उसके पीछे एक पुराना दर्द।


“आप जानते हैं?”


रुद्रप्रताप ने उसकी तरफ देखा।


“हाँ।”


“फिर हमें क्यों नहीं बताते?”


रुद्रप्रताप की आँखों में हल्की उदासी उतर आई।


“क्योंकि अगर मैं बता दूँ... तो परीक्षा मेरी होगी, तुम्हारी नहीं।”


विक्रम ने नक्शा मेज पर रख दिया।


“हमें वहाँ जाना है?”


“हाँ।”


“कालीधार अब जंगल में है।”


“मुझे पता है।”


“वहाँ कोई रहता भी नहीं।”


“मुझे यह भी पता है।”


विक्रम के चेहरे पर झुंझलाहट आई।


“तो फिर वहाँ क्या है?”


रुद्रप्रताप ने उसकी ओर देखा।


बहुत देर तक।


फिर कहा—


“यही तो तुम्हें पता लगाना है।”


---


दोपहर होते-होते बात पूरे घर में फैल गई।


माधवी ने विक्रम को कमरे में अकेले पकड़ा।


“कालीधार?”


विक्रम ने दरवाजा बंद किया।


“हाँ।”


“वहाँ क्या है?”


“पता नहीं।”


माधवी ने कुछ पल उसे देखा।


“पिताजी ने संदूक की बात की?”


विक्रम चुप रहा।


उसकी चुप्पी ही जवाब थी।


माधवी की आँखों में चमक आई।


“अगर सच में खजाना है तो?”


विक्रम ने धीमे स्वर में कहा—


“पता नहीं।”


“तो पता करो।”


“कैसे?”


माधवी उसके पास आई।


“तुम सबसे बड़े हो।”


उसने यह बात ऐसे कही जैसे उसमें कोई तर्क छिपा हो।


विक्रम ने उसकी ओर देखा।


माधवी मुस्कुराई।


“जो चीज सबसे पहले मिल जाए... उसे बाँटना जरूरी नहीं होता।”


विक्रम कुछ नहीं बोला।


लेकिन जाते-जाते उसने मेज पर रखा नक्शा उठा लिया।


पुरानी हवेली में रहस्यमयी संदूक के सामने खड़े तीन भारतीय भाई
तीन भाइयों की नजर एक ही विरासत पर थी। लेकिन उनके पिता ने संपत्ति से पहले उनकी नीयत की परीक्षा लेने का फैसला किया था।



दूसरी ओर नैना को खबर मिलते ही बेचैनी होने लगी।


उसने समर से पूछा—


“तुम्हें लगता है पिताजी सच में संदूक देंगे?”


“हाँ।”


“और अगर उसमें कुछ बहुत बड़ा हुआ?”


समर ने जूते पहनते हुए कहा—


“तो?”


“तो विक्रम को कुछ नहीं मिलना चाहिए।”


समर ने उसकी तरफ देखा।


नैना ने तुरंत नजरें फेर लीं।


“मैं बस कह रही हूँ।”


समर हल्का-सा मुस्कुराया।


“तुम कभी बस नहीं कहती।”


नैना भी मुस्कुरा दी।


लेकिन दोनों जानते थे कि आने वाले दिनों में भाईचारा सिर्फ नाम का रहने वाला है।


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अर्णव के कमरे में माहौल अलग था।


काव्या खिड़की के पास खड़ी थी।


“तुम जाओगे?”


“हाँ।”


“तुम्हें लगता है दोनों भाई तुम्हें बराबर का हिस्सा देंगे?”


अर्णव ने उसकी तरफ देखा।


“मुझे हिस्सा नहीं चाहिए।”


काव्या कुछ पल चुप रही।


“तो?”


अर्णव ने पिता के दिए नक्शे को मेज पर रखा।


“मुझे जानना है कि पिताजी आखिर हमसे चाहते क्या हैं।”


काव्या ने नक्शे को देखा।


उसकी नजर उस वाक्य पर जाकर रुक गई—


जिसे संदूक चाहिए, उसे पहले वह वापस लाना होगा जो सिंह परिवार ने खो दिया था।


“तुम्हें क्या लगता है, क्या खोया था?”


अर्णव ने सिर हिलाया।


“पता नहीं।”


काव्या ने धीरे से कहा—


“शायद जमीन।”


अर्णव ने नक्शे को फिर देखा।


“अगर जमीन होती... तो वह इतना रहस्य क्यों बनाते?”


इस बार काव्या के पास भी जवाब नहीं था।


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शाम ढलते-ढलते रुद्रप्रताप की हालत अचानक बिगड़ गई।


नर्स ने डॉक्टर को फोन किया।


तीनों बेटे दौड़कर कमरे में आए।


रुद्रप्रताप की साँस भारी हो रही थी।


उनकी आँखें खुली थीं।


डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ दीं।


कमरे में तनाव फैल गया।


माधवी और नैना दरवाजे के बाहर खड़ी थीं।


काव्या थोड़ी दूर दीवार से लगी थी।


कुछ देर बाद रुद्रप्रताप की साँस सामान्य हुई।


डॉक्टर ने तीनों बेटों को बाहर बुलाया।


“उन्हें अब ज्यादा तनाव नहीं देना है।”


विक्रम ने पूछा—


“कितना समय...?”


डॉक्टर ने उसकी ओर देखा।


उस सवाल का जवाब उसने नहीं दिया।


बस इतना कहा—


“अब समय का भरोसा मत कीजिए।”


तीनों वापस कमरे में आए।


रुद्रप्रताप आँखें बंद किए पड़े थे।


अर्णव बिस्तर के पास बैठ गया।


उसने पिता का हाथ पकड़ लिया।


पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह हाथ कितना हल्का हो गया है।


कुछ महीने पहले यही हाथ उसके कंधे पर रखकर पिता उसे डाँटते थे।


आज वही हाथ उसकी हथेली में लगभग निष्प्राण पड़ा था।


अर्णव की आँखें भर आईं।


रुद्रप्रताप ने धीरे से आँखें खोलीं।


उन्होंने बेटे की तरफ देखा।


कुछ कहना चाहा।


आवाज नहीं निकली।


अर्णव झुक गया।


“कुछ कहना है?”


रुद्रप्रताप ने बहुत मुश्किल से उसकी उँगलियाँ दबाईं।


फिर फुसफुसाए—


“डरना मत।”


अर्णव ने उनकी ओर देखा।


“किससे?”


रुद्रप्रताप की नजर दरवाजे की ओर चली गई।


जैसे वहाँ कोई खड़ा हो।


लेकिन दरवाजे के बाहर कोई नहीं था।


उन्होंने फिर आँखें बंद कर लीं।


“जो दिखे... उस पर भरोसा मत करना।”


अर्णव के चेहरे पर उलझन आ गई।


वह कुछ पूछ पाता, उससे पहले रुद्रप्रताप थककर फिर शांत हो गए।


---


रात काफी बीत चुकी थी।


हवेली के लंबे गलियारों में रोशनी कम कर दी गई थी।


अधिकतर नौकर अपने कमरों में जा चुके थे।


रुद्रप्रताप अकेले थे।


खिड़की के बाहर हवा में पेड़ों की शाखाएँ हिल रही थीं।


उन्होंने आँखें खोलीं।


कमरे के सामने वाली दीवार पर उनके पिता का चित्र था।


उन्होंने कुछ क्षण उसे देखा।


फिर बहुत धीमे से कहा—


“मैंने कोशिश की।”


उनकी आँखों में आँसू आ गए।


“अब देखना... कौन समझता है।”


मेज की दराज में रखा वह पुराना लिफाफा हल्की हवा से सरका।


उसके नीचे एक और कागज दिखाई दिया।


रुद्रप्रताप ने उसे पहले से तैयार करके रखा था।


उस पर सिर्फ एक पंक्ति थी—


“अगर तीनों कालीधार पहुँच जाएँ, तो दूसरा चरण शुरू करना।”


रुद्रप्रताप ने वह कागज देखा।


फिर आँखें बंद कर लीं।


उस रात करीब दो बजे हवेली में अचानक एक आवाज गूँजी।


पुराने लोहे के फाटक के खुलने की।


नौकर घबराकर बाहर निकले।


फाटक बंद था।


कोई बाहर नहीं था।


लेकिन पत्थर के सिंहों के बीच की सड़क पर...


गीली मिट्टी में तीन अलग-अलग पैरों के निशान बने हुए थे।


वे हवेली की ओर नहीं आ रहे थे।


वे हवेली से बाहर की ओर जा रहे थे।


और सबसे अजीब बात—


उन तीनों के साथ एक चौथा निशान भी था।


बहुत छोटा।


जैसे किसी बच्चे का पैर।


वह निशान कुछ दूर जाकर गायब हो गया।



सुबह सूरज निकलने से पहले रुद्रप्रताप की हालत फिर बिगड़ी।


इस बार डॉक्टर को बुलाने का समय नहीं मिला।


विक्रम सबसे पहले कमरे में पहुँचा।


समर उसके पीछे था।


अर्णव जब तक पहुँचा, पिता की साँस बहुत धीमी हो चुकी थी।


तीनों बिस्तर के आसपास खड़े हो गए।


रुद्रप्रताप ने आँखें खोलीं।


तीनों चेहरों को देखा।


कुछ कहना चाहा।


विक्रम झुक गया।


“पिताजी...”


रुद्रप्रताप के होंठ हिले।


आवाज बहुत हल्की थी।


“काली...”


फिर साँस अटक गई।


“कालीधार...”


यह उनका आखिरी शब्द था।


कमरे में अचानक ऐसी शांति छा गई कि बाहर पक्षियों की आवाज भी साफ सुनाई देने लगी।


विक्रम पीछे हट गया।


समर ने सिर झुका लिया।


अर्णव पिता का हाथ पकड़े बैठा रहा।


कुछ देर बाद उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।


रुद्रप्रताप सिंह चले गए।


लेकिन उनकी मृत्यु के साथ उनका रहस्य खत्म नहीं हुआ।


वास्तव में...


उसी दिन वह शुरू हुआ।


---


अंतिम संस्कार के बाद हवेली में पहली रात अजीब थी।


लोग चले गए।


आँगन खाली हो गया।


दीवारों पर लगी तस्वीरों के सामने रखे दीपक धीरे-धीरे बुझने लगे।


रुद्रप्रताप का कमरा बंद था।


तीनों भाई अपने-अपने कमरों में थे।


तभी आधी रात के करीब अर्णव की नींद खुली।


उसे लगा जैसे बाहर गलियारे में किसी के चलने की आवाज आई हो।


धीमी।


घिसटती हुई।


वह बिस्तर से उठा।


दरवाजा खोला।


गलियारा खाली था।


लेकिन उसके पिता के कमरे का दरवाजा...


खुला हुआ था।


अर्णव कुछ पल वहीं खड़ा रहा।


फिर अंदर गया।


कमरे में पिता की कुर्सी खिड़की के सामने थी।


मेज पर वही पुरानी चाबी पड़ी थी।


अर्णव धीरे से आगे बढ़ा।


उसने चाबी उठाई।


उसके नीचे एक छोटा-सा कागज था।


उस पर रुद्रप्रताप की लिखावट में सिर्फ इतना लिखा था—


“तीनों साथ जाओ। लेकिन लौटकर एक ही आना चाहिए।”


अर्णव ने कागज को देखा।


उसके चेहरे पर डर नहीं था।


सिर्फ एक सवाल था।


पिता ने ऐसा क्यों लिखा था?



रुद्रप्रताप की मृत्यु को सात दिन हो चुके थे।


हवेली में लोगों की आवाजाही कम हो गई थी, लेकिन घर के भीतर की बेचैनी कम नहीं हुई थी।


तीनों भाइयों के सामने अब वही सवाल था—


कालीधार में क्या था?


और उससे भी बड़ा सवाल—


संदूक कहाँ था?


रुद्रप्रताप ने मरने से पहले कोई दूसरा निर्देश नहीं दिया था।


बस वह नक्शा, पीतल की चाबी और एक वाक्य—


“जो सिंह परिवार ने खोया है, उसे वापस लाना होगा।”


सातवें दिन सुबह तीनों भाई निकलने वाले थे।


माधवी ने विक्रम को अलग बुलाया।


“अकेले में कुछ मिला तो?”


विक्रम ने उसकी तरफ देखा।


“क्या?”


“मेरा मतलब है... अगर तुम्हें संदूक मिल गया तो।”


विक्रम ने कुछ जवाब नहीं दिया।


माधवी उसके पास आई।


“तुम सबसे बड़े हो। तुम्हारा अधिकार सबसे ज्यादा है।”


विक्रम के चेहरे पर हल्की कठोरता आई।


“अधिकार और पिता की इच्छा अलग चीजें हैं।”


माधवी मुस्कुराई।


“पिता अब हैं कहाँ?”


विक्रम ने उसकी ओर देखा।


उस सवाल में उसे पहली बार अपनी पत्नी का चेहरा अपरिचित लगा।


---


समर और नैना भी पीछे नहीं थे।


नैना ने रातभर पुरानी जमीनों के कागज देखे थे।


उसने एक जगह उँगली रखी थी।


“कालीधार की जमीन का यह हिस्सा कभी बेचा नहीं गया।”


समर ने कागज देखा।


“कागज में तो सरकारी जंगल दिख रहा है।”


“पुराने नक्शे में नहीं।”


समर ने उसकी ओर देखा।


नैना ने धीरे से कहा—


“कुछ न कुछ पिताजी ने जानबूझकर छिपाया था।”


समर मुस्कुराया।


“यही तो पता लगाना है।”


---


तीनों भाई दो गाड़ियों में कालीधार के लिए निकले।


शहर पीछे छूटता गया।


सड़क धीरे-धीरे खराब होती गई।


फिर पक्की सड़क खत्म हुई और कच्चा रास्ता शुरू हो गया।


करीब दो घंटे बाद सामने पहाड़ी दिखाई दी।


कालीधार।


नक्शे में बनी नदी अब एक पतली, सूखी धारा रह गई थी।


उसके किनारे पुराने पेड़ खड़े थे।


आगे एक टूटा हुआ मंदिर दिखाई दिया।


वह मंदिर इतना पुराना था कि उसकी आधी छत गिर चुकी थी।


गाड़ी रुकते ही तीनों कुछ देर चुप बैठे रहे।


जगह में कुछ ऐसा था जो उन्हें असहज कर रहा था।


कोई स्पष्ट कारण नहीं।


बस एक अजीब-सी खामोशी।


अर्णव सबसे पहले उतरा।


उसने नक्शा निकाला।


मंदिर के पीछे की पहाड़ी।


नदी का सूखा मोड़।


और एक बड़ा पीपल का पेड़।


तीनों निशान एक ही जगह मिल रहे थे।


वे आगे बढ़े।


कुछ दूर जाने पर जमीन थोड़ी धँसी हुई मिली।


समर ने कहा—


“यहाँ कभी पानी रुकता होगा।”


अर्णव नीचे बैठ गया।


मिट्टी हटाई।


नीचे पत्थर था।


पत्थर पर वही निशान था—


सिंह परिवार की मुहर।


तीनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा।


विक्रम ने जल्दी से आसपास देखा।


“खोदना पड़ेगा।”


उन्होंने मजदूरों को बुलाने की बात की।


अर्णव ने मना कर दिया।


“पिताजी ने कहा था हमें खुद करना है।”


विक्रम ने उसे देखा।


“तुम्हें हर बात में उनकी आखिरी इच्छा दिखाई देती है?”


अर्णव ने शांत स्वर में कहा—


“क्योंकि शायद उन्होंने सोची-समझी थी।”


तीनों ने खुद मिट्टी हटानी शुरू की।


कुछ घंटों की मेहनत के बाद पत्थर की एक सीढ़ी दिखाई दी।


सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।


पुरानी।


गीली।


और मिट्टी से ढकी हुई।


नीचे अंधेरा था।


विक्रम ने टॉर्च जलाई।


समर ने धीरे से कहा—


“यही होगा।”


अर्णव ने कुछ नहीं कहा।


तीनों नीचे उतर गए।


---


सीढ़ियाँ एक छोटे कमरे में जाकर खत्म हुईं।


कमरे की दीवारों पर काई जमी थी।


बीच में पत्थर की चौकी थी।


उस पर एक लोहे का संदूक रखा था।


तीनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।


किसी ने उसे छुआ नहीं।


विक्रम की साँस तेज हो गई।


समर की आँखें संदूक पर टिकी थीं।


अर्णव की नजर संदूक से ज्यादा दीवार पर थी।


वहाँ कुछ लिखा था।


मिट्टी साफ करने पर शब्द दिखाई दिए—


“धन उस हाथ में मत देना जो उसे पकड़ने के लिए पैदा हुआ हो।”


विक्रम पीछे हट गया।


“यह क्या मतलब है?”


समर ने जवाब नहीं दिया।


अर्णव ने संदूक के पास जाकर ताला देखा।


ताला बिल्कुल वैसा ही था जैसा पीतल की चाबी का आकार।


विक्रम ने चाबी माँगी।


अर्णव ने जेब से निकालकर उसकी ओर देखा।


कुछ क्षण के लिए उसके मन में भी इच्छा हुई—


चाबी वह खुद लगाए।


लेकिन उसने चाबी विक्रम को दे दी।


“तुम सबसे बड़े हो।”


विक्रम ने चाबी ली।


उसने ताले में डालने की कोशिश की।


चाबी घूमी नहीं।


उसने जोर लगाया।


फिर भी नहीं।


समर ने चाबी उससे ली।


उसने भी कोशिश की।


कुछ नहीं हुआ।


अर्णव ने चाबी वापस ली।


ताले के पास झुककर देखा।


फिर उसे एक बात दिखाई दी।


ताले के नीचे बहुत छोटा-सा निशान बना था।


तीन रेखाएँ।


उसने चाबी को उल्टा किया।


उसके पीछे भी तीन रेखाएँ थीं।


लेकिन चाबी तभी घूम सकती थी जब तीनों रेखाएँ एक सीध में आतीं।


अर्णव ने धीरे से चाबी घुमाई।


टक।


ताला खुल गया।


ढक्कन उठाया गया।


तीनों भाई आगे झुक गए।


अंदर...


सोना नहीं था।


न ही कोई कीमती पत्थर।


न सिक्के।


सिर्फ एक पुरानी लाल कपड़े में लिपटी डायरी।


और उसके ऊपर एक छोटा-सा लिफाफा।


लिफाफे पर लिखा था—


“जिसके हाथ यह संदूक खोले, वह इसे अकेले न पढ़े।”


विक्रम ने लिफाफा उठाया।


“खोलो।”


अर्णव ने उसे रोक दिया।


“तीनों साथ।”


लिफाफा खोला गया।


अंदर रुद्रप्रताप की लिखावट थी।


समर पढ़ने लगा।


---


“मेरे बेटों,


अगर तुम यहाँ तक पहुँच गए हो तो पहली परीक्षा पूरी हो चुकी है।


तुमने शायद सोचा होगा कि इस संदूक में हमारे खानदान का खजाना मिलेगा।


नहीं।


यह संदूक कभी खजाने के लिए बनाया ही नहीं गया था।


मेरे पिता ने भी इसे मेरे लिए इसी कारण बंद रखा था।


इसमें वह चीज है जो किसी भी धन से अधिक मूल्यवान है—सच्चाई।


मैंने तुम्हें कालीधार इसलिए भेजा क्योंकि तुम्हें यहाँ तक पहुँचने के लिए धन नहीं, मेहनत करनी पड़ी।


लेकिन यह सिर्फ पहली परीक्षा थी।


दूसरी परीक्षा उस समय शुरू हुई जब तुम्हें संदूक दिखाई दिया।


मैं जानता था तुम तीनों में से कौन क्या करेगा।


कौन पहले ताला तोड़ना चाहेगा।


कौन दूसरे की प्रतीक्षा करेगा।


और कौन बिना अपना अधिकार जताए दूसरों को मौका देगा।


मगर अंतिम फैसला अभी बाकी है।


संदूक के नीचे देखो।”


---


अर्णव ने संदूक खाली किया।


नीचे लकड़ी की एक पतली तह थी।


उसे उठाया गया।


नीचे एक और कागज था।


उस पर सिर्फ एक पता लिखा था।


राजगढ़ हवेली।


समर का चेहरा बदल गया।


“तो हमें वापस जाना है?”


अर्णव ने सिर हिलाया।


डायरी भी साथ ले ली गई।


---


हवेली लौटते समय तीनों भाइयों के बीच कोई बात नहीं हुई।


मगर उनके भीतर बहुत कुछ बदल चुका था।


विक्रम बार-बार खिड़की के बाहर देखता रहा।


समर डायरी के बारे में सोचता रहा।


अर्णव चुप था।


उसे पिता की आखिरी रात याद आ रही थी।


“डरना मत।”


और फिर—


“जो दिखे... उस पर भरोसा मत करना।”


---


रात को तीनों फिर पिता के कमरे में मिले।


रुद्रप्रताप का कमरा वैसा ही था।


बिस्तर।


चाँदी का गिलास।


पुरानी घड़ी।


दीवार पर पिता का चित्र।


और खिड़की के पास वही कुर्सी।


समर ने डायरी मेज पर रखी।


विक्रम ने कहा—


“इसे पढ़ते हैं।”


डायरी खोली गई।


पहले पन्ने पर रुद्रप्रताप की लिखावट थी।


लेकिन अगला पन्ना पढ़ते ही तीनों ठिठक गए।


उसमें उनके बचपन की बातें थीं।


विक्रम के बारे में।


समर के बारे में।


अर्णव के बारे में।


किसने कब झूठ बोला।


किसने नौकर से गलत व्यवहार किया।


किसने गरीब किसान की जमीन का सौदा अपने फायदे में मोड़ने की कोशिश की।


किसने पिता की बीमारी के दौरान उनके कमरे से बाहर निकलते ही वकील को फोन किया।


किसने चुपचाप पुराने कर्जदार की मदद की।


हर छोटी बात लिखी थी।


वर्षों से।


जैसे रुद्रप्रताप केवल पिता नहीं...


उनका निरीक्षक रहा हो।


अंतिम पन्ने पर लिखा था—


“विरासत उस आदमी की नहीं होनी चाहिए जो उसे पाने के लिए परिवार खो दे।


विरासत उस आदमी की होनी चाहिए जो परिवार बचाने के लिए अपना हिस्सा छोड़ सके।”


विक्रम की आँखें नीचे झुक गईं।


समर पहली बार कुछ नहीं बोल पाया।


अर्णव की आँखों में आँसू आ गए।


डायरी के नीचे एक और दस्तावेज था।


वकील द्वारा तैयार किया हुआ।


तीनों ने पढ़ा।


रुद्रप्रताप ने अपनी मृत्यु से दो महीने पहले ही अपनी सारी संपत्ति का कानूनी प्रबंध कर दिया था।


तीनों बेटों को उनका हिस्सा मिलना था।


लेकिन राजगढ़ की मुख्य हवेली, खानदानी जमीनें और परिवार की पुरानी संपत्ति का प्रबंधन केवल उस बेटे को दिया जाना था जिसे वह “वास्तविक उत्तराधिकारी” मानता था।


नाम खाली था।


वह नाम रुद्रप्रताप ने जानबूझकर नहीं लिखा था।


उसके नीचे एक आखिरी पंक्ति थी—


“नाम वह स्वयं चुनेगा, जिस दिन वह यह समझ जाएगा कि विरासत संपत्ति नहीं, जिम्मेदारी है।”


तीनों भाई एक-दूसरे को देखने लगे।


विक्रम ने अचानक कहा—


“मैं नहीं।”


समर ने उसकी तरफ देखा।


विक्रम की आवाज भर्रा गई थी।


“मैंने हमेशा सोचा कि ज्यादा होना ही जीतना है।”


कुछ देर बाद समर ने भी सिर झुका लिया।


“मैंने लोगों को मोहरे समझा।”


दोनों की नजर अर्णव पर गई।


अर्णव ने कुछ नहीं कहा।


उसने मेज पर पड़ी चाबी उठाई।


फिर उसे दोनों भाइयों के बीच रख दिया।


“पिताजी ने हम तीनों को बुलाया था।”


उसकी आवाज शांत थी।


“शायद इसलिए कि वह जानते थे... अकेला कोई भी इस घर को नहीं संभाल सकता।”


विक्रम ने उसकी तरफ देखा।


पहली बार उसकी आँखों में ईर्ष्या नहीं थी।


सिर्फ थकान थी।


और एक स्वीकार।


---


कुछ महीनों बाद राजगढ़ हवेली का बहुत कुछ बदल गया।


विक्रम ने अपने कारोबार का विस्तार करने के बजाय पिता के पुराने व्यापार को व्यवस्थित करना शुरू किया।


समर ने जमीनों के सारे पुराने कागज दोबारा जाँचे और जिन किसानों के साथ परिवार का पुराना विवाद था, उनके मामले सुलझाए।


माधवी और नैना को भी धीरे-धीरे समझ आया कि जिस संपत्ति को वे बाँटने के लिए लड़ रही थीं, वह उन्हीं के सामने टूट सकती थी।


और अर्णव...


वह हवेली में रहने लगा।


लेकिन उसने पिता की कुर्सी पर बैठना स्वीकार नहीं किया।


उसने उस कुर्सी के पीछे दीवार पर एक नया चित्र लगवाया।


रुद्रप्रताप का।


नीचे वही खाली जगह थी।


जिसे वह वर्षों तक देखता रहा था।


अर्णव ने वहाँ अपना नाम नहीं लिखवाया।


उसने सिर्फ एक छोटा-सा वाक्य लिखवाया—


“विरासत मिली नहीं जाती... निभाई जाती है।”


---


एक साल बाद राजगढ़ हवेली के पुराने हिस्से की सफाई हो रही थी।


एक मजदूर ने दीवार के भीतर से एक छोटी लकड़ी की पट्टी निकाली।


उसके पीछे पत्थर की एक संकरी जगह थी।


अंदर कुछ नहीं था।


सिर्फ एक कागज।


कागज पर रुद्रप्रताप की लिखावट थी।


अर्णव ने उसे खोला।


उस पर लिखा था—


“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझो मेरा सबसे बड़ा डर झूठा साबित हुआ।”


नीचे एक और पंक्ति थी—


“मेरे बाद मेरा खानदान बच गया।”


अर्णव देर तक उस कागज को देखता रहा।


फिर उसने उसे मोड़ा और पिता की तस्वीर के पीछे रख दिया।


उसी शाम हवेली के पुराने गलियारे में तीनों भाई साथ खड़े थे।


दीवार पर लगी चार पीढ़ियों की तस्वीरों के नीचे अब पाँचवीं जगह भी भर चुकी थी।


लेकिन वहाँ किसी एक बेटे का नाम नहीं था।


वहाँ लिखा था—


“सिंह परिवार।”


और हवेली के उस पुराने कमरे में रखा खानदानी संदूक...


अब भी खाली था।


क्योंकि उसका असली खजाना कभी उसके भीतर था ही नहीं।


असली विरासत उस दिन मिल गई थी, जिस दिन तीन भाइयों ने पहली बार उसे बाँटने के बजाय बचाने का फैसला किया।

मौत की आहट

 




कुछ मौतें अचानक नहीं आतीं... उनके आने से पहले कोई हमारे आसपास चलने लगता है।


रात के करीब साढ़े दस बजे थे।





पहाड़ी रास्ते पर चलती जीप की हेडलाइट्स के सामने धुंध की एक मोटी परत तैर रही थी। सड़क इतनी संकरी थी कि एक तरफ पहाड़ की काली चट्टानें थीं और दूसरी तरफ गहरी खाई। कहीं-कहीं पेड़ों की सूखी डालियाँ सड़क के ऊपर इस तरह झुकी थीं, जैसे किसी ने जानबूझकर रास्ता रोक रखा हो।


जीप में बैठे निखिल सावंत ने मोबाइल की स्क्रीन देखी।


नेटवर्क गायब था।


पिछले पैंतालीस मिनट से उसे एक भी गाड़ी नहीं मिली थी। ड्राइवर ने भी रास्ते में बातचीत करना बंद कर दिया था। बस इंजन की घरघराहट और टायरों के नीचे कुचलते पत्थरों की आवाज सुनाई दे रही थी।


निखिल को अगले दिन सुबह एक सरकारी सर्वे के सिलसिले में देवकुंड नाम की जगह पहुंचना था। पहाड़ियों के बीच बसा वह छोटा-सा इलाका उसके लिए बिल्कुल अनजान था। मुख्य सड़क पर भूस्खलन होने के कारण ड्राइवर ने यह पुराना रास्ता चुना था।


अचानक जीप की गति धीमी हो गई।


सामने सड़क के बीचोंबीच कोई खड़ा था।


सफेद कपड़े पहने एक आदमी।


उसका चेहरा हेडलाइट्स की रोशनी में साफ दिखाई नहीं दे रहा था। वह बिल्कुल स्थिर खड़ा था। न हाथ हिला रहा था, न रास्ते से हट रहा था।



ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिए।


निखिल ने शीशे से बाहर देखा।


आदमी के दोनों पैर सड़क पर थे, लेकिन उसका शरीर थोड़ा झुका हुआ था। जैसे वह बहुत देर से किसी का इंतजार कर रहा हो।


ड्राइवर ने हॉर्न बजाया।


कोई प्रतिक्रिया नहीं।


दूसरी बार हॉर्न बजा।


इस बार उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।


और निखिल के शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई।


उस आदमी का चेहरा नहीं था।


सिर्फ एक काली, गहरी जगह थी, जहां चेहरा होना चाहिए था।


निखिल ने तुरंत ड्राइवर की तरफ देखा।


लेकिन ड्राइवर अपनी सीट पर नहीं था।


वह जीप से बाहर खड़ा था।


निखिल को समझ नहीं आया कि वह कब उतरा।


वह कुछ बोल पाता, उससे पहले ड्राइवर ने सड़क के उस पार इशारा किया।


वहां एक पुराना पत्थर का मील का पत्थर था।


उस पर लिखा था—


देवकुंड – 12 किलोमीटर


और उसके ठीक नीचे लाल रंग से कुछ लिखा था।


वापस चले जाओ।


निखिल ने दोबारा सड़क की तरफ देखा।


वह सफेद कपड़ों वाला आदमी गायब था।


लेकिन अब जीप की पिछली सीट पर कोई बैठा था।


निखिल ने गर्दन घुमाई।


एक बूढ़ा आदमी।


उसके कपड़े भीगे हुए थे। सिर नीचे झुका था और दोनों हाथ घुटनों पर रखे थे।


निखिल के मुंह से आवाज तक नहीं निकली।


बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।


उसकी आंखें खुली थीं, लेकिन उनमें पुतलियां नहीं थीं।


फिर उसने निखिल की तरफ देखकर कहा—


"तुम्हें इतनी देर नहीं करनी चाहिए थी।"


अगले ही पल जीप के अंदर की सारी लाइटें बुझ गईं।


और किसी ने निखिल के कान के बिल्कुल पास फुसफुसाया—


"अब तुम्हारी बारी है।"



सुबह करीब चार बजे निखिल की आंख खुली।


वह एक पुराने लकड़ी के बिस्तर पर लेटा था।


कमरे में सीलन की गंध थी। छत पर लकड़ी की काली बल्लियां थीं और खिड़की के बाहर देवदार जैसे ऊंचे पेड़ हवा के बिना भी धीरे-धीरे हिल रहे थे।


उसका सिर भारी था।


कुछ देर तक उसे पिछली रात की घटनाएं याद नहीं आईं। फिर अचानक सफेद कपड़ों वाला आदमी, खाली चेहरा और पिछली सीट पर बैठा बूढ़ा उसकी आंखों के सामने घूम गए।


वह झटके से उठ बैठा।


उसके जूते कमरे के दरवाजे के पास रखे थे। मोबाइल मेज पर पड़ा था। स्क्रीन टूटी हुई थी।


समय सुबह 4:17।


उसने कमरे का दरवाजा खोला।


बाहर एक लंबा बरामदा था। लकड़ी का फर्श जगह-जगह से उखड़ा हुआ था। बरामदे के आखिर में एक पीली रोशनी वाला बल्ब जल रहा था।


वह बाहर निकला।


मुख्य दरवाजे के पास एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था। उसके सामने पुरानी रजिस्टर बुक खुली थी।


निखिल ने पूछा कि वह यहां कैसे पहुंचा।


आदमी ने बिना उसकी तरफ देखे रजिस्टर का पन्ना पलटा।


"रात को लाए थे आपको।"


"कौन लाया था?"


आदमी ने कुछ क्षण उसे देखा।


"आप अकेले आए थे।"


निखिल ने उसे पिछली रात की जीप और ड्राइवर के बारे में बताया।


उस आदमी के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।


उसने सिर्फ रजिस्टर बंद किया और कहा—


"आपका कमरा नंबर सात है। नाश्ता आठ बजे मिलेगा।"


निखिल ने कमरे की चाबी देखी।


उस पर नंबर सात लिखा था।


लेकिन उसके हाथ में जो चाबी थी, उस पर नंबर नौ खुदा हुआ था।


उसने कुछ कहने के लिए सिर उठाया।


आदमी वहां नहीं था।


रजिस्टर मेज पर खुला पड़ा था।


निखिल ने अनायास उसके पन्ने पर नजर डाली।


आखिरी दर्ज नाम के नीचे उसकी अपनी लिखावट में कुछ लिखा था।


निखिल सावंत — आगमन: 2 अक्टूबर।


आज 3 अक्टूबर थी।


उसने कल रात इस जगह कदम भी नहीं रखा था।


फिर रजिस्टर में उसकी एंट्री किसने की?


और सबसे अजीब बात...


उसके नाम के आगे प्रस्थान की तारीख भी लिखी थी।


3 अक्टूबर।


---


दिन निकलने के बाद निखिल ने खुद को समझाया कि रात की थकान, अंधेरा और पहाड़ी रास्ते की घटनाओं ने उसके दिमाग पर असर डाला होगा।


उसने अपना काम शुरू किया।


देवकुंड में उसे एक पुराने जलाशय और उसके आसपास की जमीन का सर्वे करना था। वहां पहुंचने के लिए विश्रामगृह से लगभग दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।


दिनभर काम करने के बाद वह शाम को लौटा।


उसका कमरा नंबर सात था।


दरवाजा खोलते ही उसे कुछ अलग महसूस हुआ।


कमरे की खिड़की अंदर से बंद थी, जबकि सुबह उसने उसे खुला छोड़ा था।


मेज पर रखा पानी का गिलास खाली था।


और बिस्तर की चादर पर किसी के गीले पैरों के निशान थे।


वे निशान दरवाजे से शुरू नहीं होते थे।


वे सीधे कमरे की पिछली दीवार से निकलते थे।


दीवार तक जाते थे।


और वहीं खत्म हो जाते थे।


निखिल कुछ देर उन्हें देखता रहा।


फिर उसने दीवार पर हाथ रखा।


दीवार ठंडी थी।


असामान्य रूप से ठंडी।


रात के खाने के बाद वह सोने की कोशिश करने लगा। बाहर घना अंधेरा था। दूर कहीं किसी जानवर की आवाज सुनाई दे रही थी।


करीब ग्यारह बजे उसकी नींद खुली।


दरवाजे के बाहर किसी के चलने की आवाज आ रही थी।


धीमे कदम।


एक... दो... तीन...


फिर सन्नाटा।


कुछ देर बाद वही कदम दोबारा सुनाई दिए।


इस बार वे दरवाजे के बिल्कुल पास आकर रुक गए।


निखिल ने सांस रोक ली।


दरवाजे के नीचे की पतली जगह से उसे बाहर की रोशनी दिखाई दे रही थी।


उस रोशनी में किसी के पैरों की परछाईं थी।


नंगे पैर।


लेकिन उन पैरों की उंगलियां उल्टी दिशा में थीं।


निखिल का गला सूख गया।


कुछ सेकंड बाद दरवाजे पर तीन हल्की चोटें पड़ीं।


टक...


टक...


टक...


उसने कोई जवाब नहीं दिया।


चौथी चोट नहीं पड़ी।


इसके बजाय दरवाजे के दूसरी तरफ से उसकी अपनी आवाज सुनाई दी।


"निखिल... दरवाजा खोल।"


वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।


उसी का लहजा।


उसी की सांस लेने का तरीका।


फिर बाहर खड़े व्यक्ति ने धीरे से कहा—


"मैं अंदर हूं... तू बाहर क्यों खड़ा है?"


निखिल बिस्तर से पीछे हट गया।


उसने देखा कि कमरे के कोने में रखे आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई नहीं दे रहा था।


आईने में बिस्तर खाली था।


और दरवाजे के पास एक दूसरा निखिल खड़ा था।


उसका चेहरा दीवार की तरफ था।


लेकिन उसके प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।


और मुस्कुराया।


---


अगली सुबह निखिल ने विश्रामगृह छोड़ने का फैसला किया।


लेकिन बाहर निकलते ही उसे पता चला कि रात में भारी बारिश हुई थी। पहाड़ी रास्ते पर मिट्टी और पत्थर गिरने से रास्ता बंद था।


मोबाइल में अब भी नेटवर्क नहीं था।


वह मुख्य कार्यालय में गया और वहां बैठे आदमी से रास्ता खुलने के बारे में पूछा।


आदमी ने बिना कोई जवाब दिए एक पुरानी तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी।


तस्वीर में यही विश्रामगृह था।


लेकिन वह नया बना हुआ दिखाई दे रहा था।


तस्वीर के नीचे साल लिखा था—1989।


निखिल ने तस्वीर पलटी।


पीछे कुछ नाम लिखे थे।


एक नाम पर उसकी नजर रुक गई।


विजय सावंत।


उसे अपने पिता का नाम याद आया।


उसके पिता का नाम विजय था।


निखिल ने पूछा कि तस्वीर में यह कौन है।


आदमी ने तस्वीर वापस ले ली।


"पुराना कर्मचारी था।"


"अब कहां है?"


"यहीं कहीं होगा।"


निखिल को उसका जवाब अजीब लगा।


उसने पूछा कि क्या यहां कोई पुराना रिकॉर्ड रूम है।


आदमी ने बरामदे के आखिरी हिस्से की तरफ इशारा किया।


वहां एक छोटा-सा दरवाजा था, जो बाहर से जंग लगे ताले से बंद था।


निखिल ने ताला हटाया।


अंदर पुराने कागजों, फाइलों और टूटे फर्नीचर का ढेर था।


धूल की मोटी परत के बीच उसे एक रजिस्टर मिला।


उसने पन्ने पलटने शुरू किए।


1989 की एक घटना का विवरण दर्ज था।


उस वर्ष भारी बारिश के दौरान विश्रामगृह में आग लग गई थी। उस रात वहां ठहरे सात लोगों में से छह की मौत हो गई थी।


सातवें व्यक्ति का कोई पता नहीं चला।


उसका नाम था—


विजय सावंत।


निखिल के हाथ कांपने लगे।


उसके पिता की मृत्यु तब हुई थी जब निखिल सिर्फ पांच साल का था।


परिवार को बताया गया था कि उनकी मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई थी।


उसने रजिस्टर के अगले पन्ने पलटे।


वहां कुछ और लिखा था।


आग लगने के बाद विश्रामगृह की मरम्मत कराई गई थी। पुराने कमरे बंद कर दिए गए थे।


कमरा नंबर सात हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।


निखिल ने रजिस्टर से सिर उठाया।


उसकी सांस रुक गई।


वह जिस कमरे में तीन रातों से रह रहा था...


उसका नंबर सात था।



उस रात बारिश फिर शुरू हो गई।


निखिल ने अपने सारे सामान बैग में रख लिए। रास्ता खुलने तक वह किसी तरह जागकर समय बिताना चाहता था।


करीब बारह बजे बिजली चली गई।


उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।


उसी वक्त बरामदे से लकड़ी के फर्श पर घिसटते हुए किसी भारी चीज की आवाज आई।


वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास पहुंचा।


बाहर कोई दिखाई नहीं दिया।


लेकिन बरामदे के अंत में एक दरवाजा खुला हुआ था।


वह दरवाजा सुबह वहां नहीं था।


उसने टॉर्च की रोशनी उस तरफ की।


अंदर सीढ़ियां नीचे की ओर जा रही थीं।


दीवारों पर काले धब्बे थे। हवा में जले हुए लकड़ी और पुराने कपड़ों की गंध थी।


निखिल को नहीं पता कि उसे नीचे जाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।


शायद उस तस्वीर और अपने पिता के नाम ने उसे बेचैन कर दिया था।


वह सीढ़ियां उतरने लगा।


नीचे एक बड़ा कमरा था।


कमरे में सात लोहे के बिस्तर लगे थे।


छह पर जले हुए कंबल पड़े थे।


सातवें बिस्तर पर कोई बैठा था।


एक आदमी।


उसका चेहरा जला हुआ था। हाथों की त्वचा काली पड़ चुकी थी। लेकिन उसकी आंखें बिल्कुल साफ थीं।


निखिल ने टॉर्च नीचे कर ली।


वह आदमी धीरे से खड़ा हुआ।


उसके होंठ हिले।


"बहुत देर कर दी बेटा।"


निखिल के हाथ से मोबाइल गिर गया।


वह आवाज...


वह आवाज उसके पिता की थी।


उसके पिता ने उसे आखिरी बार पांच साल की उम्र में गोद में उठाया था। उसके बाद बस तस्वीरों में ही देखा था।


लेकिन यह आवाज उसके बचपन की यादों में आज भी मौजूद थी।


निखिल की आंखों में आंसू आ गए।


उसने कांपते हुए पूछा—


"आप... यहां कैसे?"


आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसने कमरे के कोने में रखे एक पुराने लकड़ी के संदूक की तरफ इशारा किया।


निखिल ने उसे खोला।


अंदर एक छोटी डायरी थी।


पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।


वह पढ़ने लगा।


उसमें लिखा था कि आग लगने वाली रात सात लोग इस कमरे में बंद हो गए थे। दरवाजा बाहर से बंद था। आग तेजी से फैल रही थी।


छह लोग वहीं मर गए।


लेकिन विजय बाहर निकल आया था।


वह बच गया था।


उसने कई वर्षों तक इस घटना को अपने भीतर दबाए रखा।


डायरी का आखिरी पन्ना अधूरा था।


उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—


"उस रात कमरे में सात लोग नहीं थे। आठवां पहले से मौजूद था।"


निखिल ने डायरी से नजर उठाई।


सामने बिस्तर खाली था।


उसके पिता गायब थे।


और कमरे के छह जले हुए बिस्तरों पर अब छह लोग बैठे थे।


सभी के चेहरे उसकी तरफ थे।


उनमें से एक ने धीरे से हाथ उठाया।


वह ड्राइवर था।


वही ड्राइवर जो उसे पहली रात पहाड़ी रास्ते पर मिला था।


उसके पीछे सफेद कपड़ों वाला चेहराविहीन आदमी खड़ा था।


निखिल पीछे हटने लगा।


तभी कमरे के एकदम पीछे से उसके पिता की आवाज आई।


"निखिल, भाग!"


वह मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।


पीछे से किसी के दौड़ने की आवाज आने लगी।


तेज।


बहुत तेज।


उसने सीढ़ियां चढ़कर बरामदे में कदम रखा।


और सामने देखा।


वही अधेड़ उम्र का कर्मचारी खड़ा था।


उसके हाथ में रजिस्टर था।


उसने रजिस्टर खोला।


निखिल की आंखें उस पन्ने पर टिक गईं।


उसके नाम के सामने प्रस्थान की तारीख थी।


3 अक्टूबर।


और समय था—


रात 12:00 बजे।


जबकि मोबाइल में अभी 11:58 हो रहे थे।


कर्मचारी ने सिर उठाया।


"दो मिनट बाकी हैं।"


निखिल ने दरवाजे की तरफ दौड़ लगाई।


दरवाजा खुला।


बाहर बारिश नहीं थी।


बाहर वही पहाड़ी सड़क थी।


वही जीप खड़ी थी।


और उसके पास वही ड्राइवर।


निखिल दौड़कर जीप तक पहुंचा।


ड्राइवर ने पिछला दरवाजा खोला।


"बैठिए साहब।"


निखिल ने बिना सोचे अंदर कदम रखा।


तभी उसकी नजर सामने लगे रियर-व्यू मिरर पर पड़ी।


ड्राइवर की सीट खाली थी।


लेकिन जीप चल रही थी।


और पीछे की सीट पर...


वह खुद बैठा था।


उसके ठीक बगल में सफेद कपड़ों वाला चेहराविहीन आदमी था।


निखिल ने चीखने की कोशिश की।


उसकी आवाज नहीं निकली।


जीप की हेडलाइट्स बुझ गईं।


अगली सुबह देवकुंड के पुराने विश्रामगृह में एक सफाई कर्मचारी पहुंचा।


मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।


अंदर सब कुछ अपनी जगह पर था।


कमरा नंबर सात के बाहर एक बैग रखा था।


मेज पर मोबाइल पड़ा था।


उसकी स्क्रीन पर एक अधूरी रिकॉर्डिंग चल रही थी।


रिकॉर्डिंग में पहले बारिश की आवाज थी।


फिर किसी के कदमों की।


और आखिर में एक आदमी की फुसफुसाहट—


"पापा... दरवाजा खोलो..."


सफाई कर्मचारी ने मोबाइल बंद कर दिया।


उसे लगा कोई पर्यटक अपना सामान भूल गया होगा।


वह रजिस्टर उठाकर कार्यालय में रख आया।


रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर एक नई एंट्री थी।


निखिल सावंत।


आगमन: 2 अक्टूबर।


प्रस्थान: 3 अक्टूबर।


लेकिन इस बार एक अतिरिक्त टिप्पणी भी थी।


साथ में एक अन्य व्यक्ति आया है।


नाम के आगे कोई अक्षर नहीं था।


सिर्फ एक खाली जगह।


सफाई कर्मचारी ने रजिस्टर बंद किया।


तभी विश्रामगृह के बंद कमरे नंबर सात के अंदर से तीन बार दस्तक सुनाई दी।


टक...


टक...


टक...


और फिर किसी ने अंदर से कहा—


"पापा... इस बार मुझे अकेला मत छोड़ना।"


उसी क्षण रजिस्टर का आखिरी पन्ना अपने आप पलट गया।


उस पर एक नई तारीख उभर रही थी।


4 अक्टूबर।


आगमन का समय: रात 10:30।


नाम: विजय परब।


और उसके नीचे...


प्रस्थान की तारीख खाली थी।


---


कुछ जगहों पर लोग रहने नहीं आते... वे बस अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

सात भूत

 


सुबह की पहली धूप अभी गाँव की कच्ची गलियों तक नहीं पहुँची थी।


गणपत ने दुकान का शटर आधा उठाया और नीचे बैठकर ताला खोलने लगा। सामने चबूतरे पर रात की बारिश का पानी जमा था। उसने हाथ बढ़ाकर उसमें पड़ा नीम का पत्ता हटाया और दुकान के भीतर रखी लकड़ी की पेटी बाहर खींच ली।


“आज फिर देर।”


पीछे से आवाज आई।


गणपत ने मुड़कर देखा। शेखर हाथ में दूध की बाल्टी लिए खड़ा था।


“देर कहाँ हुई? तू जल्दी आ गया।”


शेखर हँसा और बाल्टी दुकान के पास रख दी।


“चाय बना।”


गणपत ने चूल्हा जलाया।


बारिश के बाद गाँव की शांत सुबह में दुकान, स्कूल जाता लड़का और ग्रामीणों का दृश्य
बारिश के बाद गाँव की सुबह बिल्कुल सामान्य थी। दुकान खुल रही थी, बच्चे स्कूल जा रहे थे और लोग अपने रोज़मर्रा के काम में लगे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि इसी सामान्य दिन के पीछे एक भयानक रहस्य छिपा है।



गाँव में सुबह इसी तरह खुलती थी। कोई दूध लेकर निकलता, कोई खेत की तरफ। मंदिर की घंटी दूर से सुनाई देती और मस्जिद से आती अज़ान उसके साथ मिल जाती।



थोड़ी देर बाद रशीद साइकिल से आया। उम्र मुश्किल से सत्रह-अठारह साल। उसने साइकिल दुकान की दीवार से टिकाई।


“गणपत काका, कॉपी है?”


“तेरे पैसे?”


रशीद ने जेब टटोली।


“कल दे दूँगा।”


“कल तू यही बोलता है।”


गणपत ने फिर भी कॉपी निकालकर दे दी।


रशीद मुस्कुराया और स्कूल की तरफ निकल गया।


उधर सड़क के दूसरी तरफ सरस्वतीबाई अपने घर के बाहर झाड़ू लगा रही थीं। उनकी उम्र साठ के करीब थी। पति को गुजरे कई साल हो चुके थे। घर में वह अकेली रहती थीं, लेकिन गाँव में किसी के घर का बच्चा बीमार हो जाए तो सबसे पहले वही पहुँचती थीं।


“बाई!”


उन्होंने सिर उठाया।


रामू खड़ा था।


“आज खेत की तरफ मत जाना।”


“क्यों?”


“नाले में पानी बहुत है।”


रामू ने कंधे उचकाए।


“शाम तक उतर जाएगा।”


वह अपनी साइकिल लेकर आगे बढ़ गया।


रामू का काम खेतों के बीच बकरियाँ चराना था। गाँव में उसे कोई ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था, लेकिन रास्ते, खेत और आसपास का जंगल उससे बेहतर कोई नहीं जानता था।


उसी समय दत्तू पोस्टमन साइकिल पर आता दिखाई दिया।


उसने सरस्वतीबाई के घर के बाहर साइकिल रोकी।


“आपके नाम चिट्ठी है।”


सरस्वतीबाई ने चिट्ठी ली।


“किसकी?”


“पता नहीं। शहर से है।”


उन्होंने चिट्ठी उलट-पलटकर देखी और अंदर चली गईं।


दत्तू आगे बढ़ गया।


गाँव के आखिरी घर के पास माधव काका अपनी चारपाई पर बैठे बीड़ी सुलगा रहे थे। उम्र बहुत ज्यादा थी। आँखें कमजोर थीं, मगर आवाज अभी भी साफ थी।


“दत्तू!”


पोस्टमन रुक गया।


“हाँ?”


“आज स्कूल बंद है क्या?”


“नहीं तो।”


माधव काका ने स्कूल की तरफ देखा।


“आज वहाँ कोई नहीं जाएगा।”


दत्तू हँस पड़ा।


“आपको कैसे पता?”


माधव काका ने कोई जवाब नहीं दिया।


दत्तू आगे चला गया।


उसे क्या पता था कि शाम तक वही बात उसे याद आने वाली थी।



दोपहर में बारिश फिर शुरू हो गई।


रामू अपनी बकरियों को लेकर नाले के किनारे पहुँचा। पानी सचमुच बढ़ गया था। उसने रास्ता बदलने का फैसला किया।


तभी उसे दूसरी तरफ कोई दिखाई दिया।


एक लड़का।


पीठ उसकी तरफ थी।


रामू ने आवाज दी—


“कौन है?”


लड़का मुड़ा।


रशीद था।


“तू इधर क्या कर रहा है?”


रशीद ने कुछ नहीं कहा।


बस नाले की तरफ देखता रहा।


रामू ने सोचा शायद उसकी आवाज नहीं पहुँची।


वह पास गया।


“चल, गाँव चलते हैं।”


रशीद ने धीरे से सिर हिलाया।


दोनों वापस चल पड़े।


रास्ते में रामू ने पूछा—


“स्कूल नहीं गया?”


रशीद चुप रहा।


रामू ने फिर नहीं पूछा।

बारिश से भीगी जमीन पर पुराने घर की ओर जाते सात रहस्यमयी पैरों के निशान
रात की बारिश के बाद मिट्टी पर दिखाई दिए ये सात पैरों के निशान सीधे घर के दरवाज़े तक जा रहे थे। अजीब बात यह थी कि आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था।



शाम को गणपत दुकान बंद कर रहा था, तभी रशीद वहाँ आया।


“काका, एक बिस्कुट का पैकेट।”


“सुबह कॉपी ले गया था।”


“कल पैसे दे दूँगा।”


“तेरा कल कब आएगा?”


रशीद हँस पड़ा।


गणपत ने पैकेट दे दिया।


रशीद चला गया।


गणपत ने दुकान बंद की।


घर पहुँचकर खाना खाया।


रात करीब दस बजे बाहर बारिश की आवाज तेज हो गई।


गणपत सोने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई।


एक बार।


फिर दूसरी बार।


उसने पूछा—


“कौन?”


कोई जवाब नहीं।


उसने दरवाजा खोला।


बाहर कोई नहीं था।


सिर्फ बारिश।


दरवाजे के ठीक सामने मिट्टी में सात गीले पैरों के निशान थे।


गणपत कुछ क्षण उन्हें देखता रहा।


फिर उसने दरवाजा बंद कर लिया।


---


अगली सुबह गाँव में रशीद नहीं था।


उसकी माँ ने कहा कि वह रात में घर नहीं आया।


पहले किसी ने ज्यादा चिंता नहीं की।


लड़का कहीं दोस्तों के यहाँ रुक गया होगा।


दोपहर तक भी वह नहीं लौटा तो दत्तू ने कहा—


“स्कूल में पूछो।”


स्कूल में पता चला कि रशीद कल आया ही नहीं था।


गणपत को यह बात अजीब लगी।


उसे तो वह शाम को दुकान पर आया था।


उसने यह बात सबको बताई।


रामू ने भी कहा—


“मैंने उसे नाले के पास देखा था।”


सबकी नजरें उसकी तरफ उठीं।


“कब?”


“कल दोपहर।”


“फिर?”


“मेरे साथ गाँव तक आया था।”


लेकिन गाँव में किसी और ने उसे नहीं देखा था।


रामू कुछ देर चुप रहा।


“शायद मैं गलत समझा।”


मामला वहीं रुक गया।


लेकिन उसी रात दत्तू को अपने डाकखाने के बाहर एक पैकेट मिला।


उस पर नाम लिखा था—


रशीद।


पता वही गाँव का।


दत्तू ने पैकेट उठाया।


अंदर एक पुरानी घड़ी थी।


पीछे खुदा था—


“रशीद — 14 अगस्त”


दत्तू ने तारीख देखी।


आज 20 अगस्त था।


उसने घड़ी चलाने की कोशिश की।


घड़ी चलने लगी।


सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।


दत्तू ने तुरंत उसे बंद कर दिया।


---


उधर सरस्वतीबाई ने वह चिट्ठी खोली जो दत्तू ने दो दिन पहले दी थी।


अंदर सिर्फ एक कागज था।


उस पर लिखा था—


“आपसे मिलने की बात अधूरी रह गई।”


नीचे नाम नहीं था।


सरस्वतीबाई को अचानक बेचैनी हुई।


उन्होंने चिट्ठी मोड़ी और संदूक में रख दी।


संदूक बंद करते समय उन्हें अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज सुनाई दी।


उन्होंने फिर खोला।


अंदर एक पुरानी फोटो थी।


फोटो में सात लोग खड़े थे।


गणपत।


दत्तू।


रामू।


सरस्वतीबाई।


माधव काका।


लक्ष्मण।


और रशीद।


सरस्वतीबाई ने फोटो हाथ में ले ली।


उन्हें फोटो याद नहीं थी।


फिर भी उसमें खड़े सातों लोग उन्हें ऐसे परिचित लगे जैसे रोज सामने बैठते हों।


फोटो के पीछे तारीख लिखी थी।


14 अगस्त।



उस शाम लक्ष्मण आया।


वह गाँव की किराने की दुकान पर काम करता था। गणपत की दुकान के सामने से गुजरते हुए उसने पूछा—


“रशीद मिला?”


“नहीं।”


“मुझे कल रात दिखाई दिया था।”


गणपत ने उसकी तरफ देखा।


“कहाँ?”


“स्कूल के पास।”


“कितने बजे?”


लक्ष्मण ने सोचकर कहा—


“शायद दस।”


“तू वहाँ क्या कर रहा था?”


“मुझे भी यही पूछना चाहिए।”


गणपत कुछ नहीं बोला।


लक्ष्मण चला गया।


उस रात गणपत ने दुकान जल्दी बंद कर दी।

पुराने स्कूल के कमरे में सात खाली कुर्सियों और सात नामों वाला रहस्यमयी ब्लैकबोर्ड
सुनसान स्कूल के कमरे में सात कुर्सियाँ खाली थीं और ब्लैकबोर्ड पर सात नाम लिखे थे। लेकिन उन नामों के पीछे छिपा सच सामने आते ही पूरी कहानी बदलने वाली थी।



अगली सुबह गाँव के बाहर एक आदमी की चप्पल मिली।


रामू ने पहचान ली।


“रशीद की है।”


पास ही मिट्टी में साइकिल का निशान था।


निशान नदी की तरफ जाता था।


गाँव के दस लोग नदी तक गए।


वहाँ पानी बहुत था।


लेकिन कोई शरीर नहीं मिला।


वापस आते समय माधव काका ने अचानक कहा—


“छह।”


गणपत ने पूछा—


“क्या?”


“हम कितने हैं?”


गणपत ने पीछे देखा।


माधव काका।


दत्तू।


रामू।


सरस्वतीबाई।


लक्ष्मण।


गणपत।


छह।


रशीद गायब था।


माधव काका कुछ देर चुप रहे।


“वह भी होना चाहिए।”


“कहाँ?”


“हमारे साथ।”


किसी ने उनकी बात का अर्थ नहीं समझा।



उस रात सातों की कहानी पहली बार एक जगह आकर जुड़ी।


गणपत दुकान बंद करके लौट रहा था।


रास्ते में उसे दत्तू मिला।


दत्तू के हाथ में वही घड़ी थी।


“चलो,” दत्तू ने कहा।


“कहाँ?”


“स्कूल।”


“इस वक्त?”


दत्तू ने उसकी तरफ देखा।


“मुझे लगता है रशीद वहीं है।”


दोनों स्कूल पहुँचे।


अंदर अंधेरा था।


एक कमरे का दरवाजा खुला था।


अंदर सरस्वतीबाई पहले से बैठी थीं।


रामू खिड़की के पास खड़ा था।


लक्ष्मण जमीन पर बैठा था।


और माधव काका ब्लैकबोर्ड के सामने।


गणपत ने सबको देखा।


“तुम सब यहाँ क्यों हो?”


किसी के पास जवाब नहीं था।


माधव काका ने ब्लैकबोर्ड की तरफ इशारा किया।


वहाँ सात नाम लिखे थे।


गणपत

दत्तू

रामू

सरस्वती

माधव

लक्ष्मण

रशीद


नीचे तारीख थी।


14 अगस्त।


और उसके नीचे—


मृत।


कमरे में सन्नाटा फैल गया।


“ये किसने लिखा?”


किसी ने जवाब नहीं दिया।


अचानक पीछे से आवाज आई।


“मैंने।”


सभी मुड़े।


रशीद दरवाजे पर खड़ा था।


गणपत उसकी तरफ बढ़ा।


“तू कहाँ था?”


रशीद ने उसकी तरफ देखा।


“आपको याद नहीं?”


“क्या?”


रशीद की आँखें भर आईं।


“उस दिन क्या हुआ था?”


कोई बोल नहीं पाया।


फिर जैसे किसी ने भीतर बंद दरवाजा खोल दिया हो, एक साथ सबके चेहरे बदल गए।


बारिश।


तेज बहता नाला।


टूटा हुआ पुल।


सड़क पर फिसलती जीप।


चीख।


अंधेरा।


पानी।


गणपत को याद आया—वह अपनी दुकान से घर लौट रहा था।


दत्तू को याद आया—वह डाक लेकर उसी रास्ते से जा रहा था।


रामू अपनी बकरियों को लेकर लौट रहा था।


सरस्वतीबाई पड़ोस के घर से आ रही थीं।


लक्ष्मण बाजार से।


माधव काका मंदिर से।


और रशीद स्कूल से।


सातों एक ही रास्ते पर थे।


पुल अचानक टूटा था।


सातों पानी में बह गए थे।


उनकी लाशें अगले दिन मिली थीं।


गाँव ने उसी दिन उनका अंतिम संस्कार कर दिया था।


लेकिन उसके बाद से—


वे रोज सुबह उठते रहे।


दुकान खोलते रहे।


डाक बाँटते रहे।


बकरियाँ चराते रहे।


स्कूल जाते रहे।


चाय पीते रहे।


और किसी ने उनसे बात क्यों नहीं की—यह सवाल अब पहली बार उनके सामने था।


गणपत ने खिड़की से बाहर देखा।


गाँव की सड़क पर लोग खड़े थे।


सैकड़ों लोग।


सबकी नजरें स्कूल की तरफ थीं।


लेकिन कोई उन्हें देख नहीं रहा था।


एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—


“माँ, अंदर कौन है?”


माँ ने उसका हाथ खींच लिया।


“चल।”


“लेकिन वहाँ तो सात लोग—”


“वहाँ कोई नहीं है।”


गणपत पीछे हट गया।


उसने अपने हाथों को देखा।


उँगलियाँ हल्की पारदर्शी थीं।


दत्तू ने अपनी डाक की थैली खोली।


अंदर सिर्फ सात कागज थे।


सात मृत्यु प्रमाणपत्र।


रामू ने बाहर देखा।


उसकी बकरियाँ नहीं थीं।


सरस्वतीबाई ने अपने गले को छुआ।


उनकी नाड़ी नहीं चल रही थी।


लक्ष्मण ने जेब से बीड़ी निकाली।


उसने माचिस जलाई।


आग उसकी उँगलियों से होकर निकल गई।


वह डरकर पीछे हट गया।


माधव काका धीरे से मुस्कुराए।


“अब समझ आया।”


“क्या?”


“हम गाँव में लौटे ही नहीं थे।”


सब उनकी तरफ देखने लगे।


“हम हर दिन उसी रास्ते पर जाते रहे…”


उन्होंने खिड़की के बाहर देखा।


“…जहाँ हमारी मौत हुई थी।”


रशीद ने पूछा—


“फिर हम यहाँ क्यों आते रहे?”


माधव काका ने कोई जवाब नहीं दिया।


ब्लैकबोर्ड पर लिखे सात नामों के नीचे अपने आप एक और वाक्य उभरने लगा।


“क्योंकि इन्हें पता नहीं था कि इनकी कहानी खत्म हो चुकी है।”


कुछ क्षणों तक कोई हिला नहीं।


फिर स्कूल की घंटी अपने आप बज उठी।


सातवीं बार घंटी बजते ही कमरे में कोई नहीं था।


सिर्फ सात खाली कुर्सियाँ थीं।


और ब्लैकबोर्ड पर सात नाम।


इस बार उनके आगे एक ही शब्द नहीं था।


हर नाम के आगे अलग-अलग लिखा था—


गणपत — दुकान बंद।


दत्तू — आखिरी डाक।


रामू — रास्ता खत्म।


सरस्वती — घर खाली।


माधव — इंतजार खत्म।


लक्ष्मण — आखिरी बीड़ी।


और सबसे नीचे—


रशीद — स्कूल की छुट्टी।


सुबह गाँव के बच्चों ने स्कूल खोला तो किसी को कुछ असामान्य नहीं लगा।


बस ब्लैकबोर्ड पर लिखे सात नाम देखकर एक बच्चा कुछ देर खड़ा रहा।


फिर उसने चॉक उठाई और उन सातों नामों के ऊपर एक ही शब्द लिख दिया—


“याद।”

आधी रात जागा प्रेत

 




उस घर में रहने का फैसला मैंने किसी मजबूरी में नहीं किया था।


ऑफिस से घर काफी दूर पड़ता था और कुछ दिनों के लिए मेरा काम उसी इलाके में लगा था। एक परिचित ने बताया कि उसका पुराना मकान खाली पड़ा है। किराया भी कम था, इसलिए मैंने ज्यादा सोचा नहीं।


मकान शहर से थोड़ा बाहर था।


एक मंजिल का पुराना मकान। दीवारों पर सीलन के निशान थे और पीछे नीम के कुछ बड़े पेड़ थे। सामने एक सँकरी सड़क थी, जो आगे जाकर मुख्य सड़क से मिलती थी।


ऑफिस से घर आने-जाने में पंद्रह-बीस मिनट लगते थे।


रास्ते में एक पुराना कब्रिस्तान पड़ता था।


दिन में वहाँ से निकलने में कोई परेशानी नहीं थी। आसपास लोग आते-जाते रहते थे। लेकिन शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर अजीब-सी खामोशी हो जाती थी। कब्रिस्तान की टूटी दीवार के पीछे बड़े पेड़ थे और रात में वहाँ कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था।


पास में एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। ऑफिस से लौटते समय मैं अक्सर वहीं रुक जाता था।


पहले कुछ दिन बिल्कुल सामान्य रहे।


सुबह ऑफिस, शाम को चाय, फिर घर। रात को खाना खाकर मोबाइल देखता और सो जाता।


एक शाम चाय की दुकान पर मैं कुछ ज्यादा देर बैठ गया। जब निकला तो अंधेरा हो चुका था।


कब्रिस्तान के पास पहुँचते ही मुझे लगा जैसे मेरे पीछे कोई चल रहा है।


कदमों की आवाज बहुत धीमी थी।


मैंने बाइक धीमी की।


आवाज भी धीमी हो गई।


मैंने पीछे देखा।


सड़क खाली थी।


बारिश में कब्रिस्तान के पास बाइक चलाता व्यक्ति और रहस्यमयी आकृति
तेज बारिश के बीच कब्रिस्तान की दीवार के पास खड़ी वह रहस्यमयी आकृति आखिर किसकी थी?



कुछ सेकंड रुका रहा, फिर मुझे लगा शायद मेरी ही बाइक की आवाज दीवार से टकराकर वापस आ रही होगी।


मैं घर चला गया।


उस बात को मैंने वहीं छोड़ दिया।


अगले दिन ऑफिस में काम ज्यादा था।


शाम को निकलते-निकलते देर हो गई। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। मैंने सोचा था कि रास्ते में चाय पीकर निकल जाऊँगा, लेकिन दुकान बंद करने वाला था, इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया।


कब्रिस्तान के पास पहुँचते-पहुँचते बारिश तेज हो गई।


सड़क लगभग खाली थी।


मैंने बाइक धीमी कर दी। बारिश इतनी तेज थी कि सामने मुश्किल से कुछ दिखाई दे रहा था। कब्रिस्तान की टूटी दीवार के पीछे पेड़ों की परछाइयाँ हिल रही थीं।



उसी समय मेरी बाइक की हेडलाइट एक पल के लिए बुझ गई।


मैंने ब्रेक लगाया।


दो-तीन बार स्विच दबाया।


फिर हेडलाइट जल गई।


मैंने सामने देखा।


सड़क खाली थी।


लेकिन सड़क के किनारे, कब्रिस्तान की दीवार के पास, मुझे लगा जैसे कोई खड़ा है।


बारिश के बीच बस एक धुंधली-सी आकृति।


मैंने बाइक रोकने की सोची, फिर जाने क्यों मन बदल गया।


मैं सीधे घर चला आया।


घर पहुँचते-पहुँचते बिजली भी चली गई थी।


मैंने मोबाइल की रोशनी में कपड़े बदले। कुछ खाने का मन नहीं था, इसलिए बस पानी पिया और बिस्तर पर लेट गया।


बाहर बारिश लगातार हो रही थी।


कुछ देर तक मैं छत पर गिरती बूंदों की आवाज सुनता रहा।


फिर पता नहीं कब नींद आ गई।


आधी रात के बाद मेरी आँख खुली।


बारिश बंद हो चुकी थी।


कमरे में अंधेरा था।


कुछ देर तक मैं वैसे ही पड़ा रहा।


फिर मुझे लगा...


बाहर कोई धीरे-धीरे चल रहा है।


मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की।


एक कदम।


फिर कुछ सेकंड का अंतर।


फिर दूसरा।


आवाज दरवाजे के ठीक सामने आकर रुक गई।


मैं उठकर बैठ गया।


कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।


मैंने मोबाइल उठाया और स्क्रीन जलाई।


उसी क्षण बाहर से बहुत हल्की-सी आवाज आई।


जैसे किसी ने दरवाजे पर अपना हाथ रखा हो।


चर्र...


मैं कुछ सेकंड तक दरवाजे को देखता रहा।


फिर आवाज बंद हो गई।


मैंने दरवाजा नहीं खोला।


उस वक्त मुझे यह भी नहीं लगा कि बाहर कोई भूत या ऐसी कोई चीज हो सकती है।


मुझे बस इतना लगा कि शायद कोई आदमी रास्ता भटककर यहाँ तक आ गया होगा।


मैं वापस लेट गया।


लेकिन उस रात सोने से पहले एक बात मेरे दिमाग में अटक गई थी—


बारिश में मैंने जो आकृति कब्रिस्तान के पास देखी थी...


वह सड़क की तरफ मुँह करके खड़ी थी।


और जब मैं वहाँ से निकला था...


उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं था।


आधी रात पुराने घर के दरवाजे के सामने खड़ा रहस्यमयी साया
आधी रात कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई, लेकिन दरवाजे के बाहर कोई दिखाई नहीं दिया।



अगली सुबह मैं उठकर ऑफिस चला गया।


दिन भर उस बात के बारे में ज्यादा नहीं सोचा।


शाम को दोस्त के साथ चाय पी और देर से घर पहुँचा।


दरवाजा खोलते समय मेरी नजर अपने आप बाहर चली गई।


कुछ नहीं था।


अंदर आया, खाना खाया और सो गया।


उस रात करीब दो बजे मेरी नींद फिर खुली।


इस बार कोई आवाज नहीं थी।


बस ऐसा लग रहा था जैसे कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई हो।


मैंने मोबाइल देखा।


फिर पानी पीने के लिए उठ गया।


गिलास रखते ही बाहर से कुछ घिसटने की आवाज आई।


बहुत हल्की।


मैं कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।


फिर आवाज बंद हो गई।


मैं दरवाजे तक गया।


कुंडी लगी हुई थी।


मैंने हाथ नहीं लगाया।


कुछ देर बाद वापस बिस्तर पर आ गया।


सुबह दरवाजा खोलते समय मैंने फर्श देखा।


दरवाजे के ठीक बाहर गीली मिट्टी का एक छोटा-सा निशान था।


बस इतना।


मैंने सोचा रात में बारिश के कारण किसी के जूते से मिट्टी लगी होगी।


ऑफिस चला गया।


उसके बाद दो-तीन दिन कुछ नहीं हुआ।


और शायद यही वजह थी कि मैंने उस बात को लगभग भूल ही दिया।


फिर एक रात मैं देर से घर लौटा।


उस दिन ऑफिस में एक जरूरी काम था। घर पहुँचते-पहुँचते करीब ग्यारह बज गए।


मैंने खाना गर्म किया और अकेले बैठकर खाया।


सोने से पहले बाहर का दरवाजा बंद करने गया।


कुंडी लगाकर जैसे ही मुड़ा, बाहर से बहुत हल्की-सी आवाज आई।


जैसे कोई सड़क पर धीरे से खाँसा हो।


मैंने दरवाजे के अंदर से ही सुनने की कोशिश की।


कुछ नहीं।


मैंने सोचा कोई राहगीर होगा।


लाइट बंद की और सो गया।


रात में मेरी नींद अचानक खुली।


इस बार मुझे साफ लगा कि बाहर कोई खड़ा है।


कोई आवाज नहीं थी।


बस दरवाजे के नीचे की पतली-सी जगह में अंधेरा बाकी फर्श से थोड़ा अलग दिखाई दे रहा था।


जैसे बाहर कोई दरवाजे के बिल्कुल सामने खड़ा हो।


मैं उठकर बैठ गया।


काफी देर तक उसी जगह देखता रहा।


फिर मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई।


रोशनी दरवाजे के नीचे गई।


वहाँ कुछ नहीं था।


मैंने राहत की साँस ली।


लेकिन उसी वक्त बाहर से फर्श पर कुछ घिसटने की आवाज आई।


बहुत पास से।


मैंने दरवाजा नहीं खोला।


उस रात मैं सो नहीं पाया।


सुबह बाहर निकला तो दरवाजे से गेट तक गीले पैरों के हल्के निशान थे।


मैंने नीचे झुककर देखा।


 पैर जैसे लग रहे थे।


 निशान गेट से मेरे दरवाजे की तरफ आ रहे थे।


मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।


फिर ऑफिस चला गया।


उस दिन पहली बार मैंने अपने दोस्त को फोन करके कहा कि शायद मैं कमरा बदल दूँगा।


उसने मजाक में पूछा—


“क्यों? भूत दिख गया क्या?”


मैंने बस कहा—


“नहीं। बस यहाँ रात को ठीक नहीं लगता।”


उसने ज्यादा पूछा नहीं।


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उसके बाद मैंने कोशिश की कि रात में जल्दी घर पहुँचूँ।


दिन में सब सामान्य था।


यही बात सबसे अजीब थी।


सुबह घर से निकलते समय मुझे कुछ नहीं लगता था।


ऑफिस में पूरा दिन आराम से निकलता।


लेकिन शाम होते ही मेरे मन में एक बात आने लगती—


आज रात क्या होगा?


एक शाम मैं घर पहुँचा तो बाहर का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।


मैंने सोचा शायद मैंने सुबह ठीक से बंद नहीं किया होगा।


अंदर गया।


सब सामान अपनी जगह था।


चोरी जैसी कोई बात नहीं थी।


मैंने दरवाजा बंद किया और कमरे में चला गया।


रात को सोने से पहले अचानक बाहर से बहुत धीमी आवाज आई।


“खोलो।”


मैं बिस्तर पर सीधा बैठ गया।


कुछ सेकंड तक मुझे समझ ही नहीं आया कि आवाज सच में आई थी या नींद में मुझे लगा।


मैं दरवाजे के पास गया।


बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।


मैंने कान दरवाजे के पास लगाया।


मैं वापस आने लगा।


तभी दरवाजे की कुंडी बहुत हल्के से नीचे हुई।


मैं रुक गया।


फिर ऊपर।


फिर नीचे।


जैसे बाहर से कोई उसे समझने की कोशिश कर रहा हो।


मैंने पहली बार दरवाजे से दूर हटकर खड़ा होना पसंद किया।


करीब एक मिनट तक कुंडी नहीं हिली।


फिर सब शांत हो गया।


मैंने उस रात दरवाजा नहीं खोला।


सुबह जब बाहर निकला तो वहाँ कोई निशान नहीं था।


लेकिन दरवाजे की कुंडी पर मिट्टी लगी हुई थी।


मैंने उसे कपड़े से साफ कर दिया।


बस।



कुछ दिनों तक फिर कुछ नहीं हुआ।


मैंने सोचा शायद सच में कोई आदमी आसपास घूमता होगा।


 नशे में।


शायद कोई भिखारी।


मैं खुद को यही समझाता रहा।


फिर एक रात बारिश के बाद मैं जल्दी सो गया।


आधी रात को मेरी नींद खुली।


कमरे में अंधेरा था।


इस बार बाहर से कोई आवाज नहीं थी।


मैं उठकर पानी लेने गया।


वापस आते समय मेरी नजर दरवाजे पर पड़ी।


कुंडी लगी थी।


मैंने उसे देखा और वापस मुड़ गया।


तभी...


दरवाजे के दूसरी तरफ से बहुत हल्की-सी साँस लेने की आवाज आई।


मैं रुक गया।


सिर्फ साँस।


धीमी।


भारी।


मैं दरवाजे के पास नहीं गया।


कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।


मैंने पूरी रात बत्ती जलाकर रखी।


सुबह दरवाजा खोला।


बाहर कोई नहीं था।


लेकिन दरवाजे के ठीक सामने फर्श गीला था।


जैसे कोई काफी देर वहाँ खड़ा रहा हो।


उस दिन मैंने फैसला कर लिया कि अब ज्यादा दिन नहीं रुकूँगा।


पुराने घर के बाहर गीले पैरों के निशान देखते हुए व्यक्ति
बारिश के बाद दरवाजे तक आते गीले पैरों के निशान मिले, लेकिन वापस जाने का एक भी निशान नहीं था।



मुझे छुट्टी मिली तो मैंने सामान बाँधना शुरू कर दिया।


दोपहर तक ज्यादातर सामान निकल चुका था।


कमरे में सिर्फ मेरा बैग और कुछ कपड़े बचे थे।


शाम होने लगी थी।


मैंने सोचा अंधेरा होने से पहले निकल जाऊँ।


बैग उठाया और दरवाजे की तरफ गया।


कुंडी खोली।


दरवाजा खोलने से पहले मैं कुछ पल रुका।


पता नहीं क्यों।


फिर मैंने दरवाजा खोल दिया।


बाहर कोई नहीं था।


सीढ़ियाँ खाली थीं।


मैं नीचे उतरने लगा।


आधा रास्ता ही गया था कि ऊपर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।


धड़ाम।


मैं रुक गया।


मैंने ऊपर देखा।


मेरा कमरा दिखाई दे रहा था।


दरवाजा बंद था।


कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा।


फिर वापस ऊपर गया।


दरवाजा खोला।


कमरा खाली था।


मैंने बैग उठाया और नीचे आने लगा।


मैंने पीछे नहीं देखा।


बाहर निकलकर गेट बंद किया।


सड़क पर पहुँचा तो एक बार अनजाने में कब्रिस्तान की तरफ नजर चली गई।


वही टूटी दीवार।


वही पेड़।


लेकिन इस बार वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया।


मैं सीधा आगे बढ़ गया।


उस रात मैं दोस्त के घर रुका।


सुबह उसने मुझसे पूछा—


“कल रात तू इतनी देर तक दरवाजे के पास क्या कर रहा था?”


मैंने उसकी तरफ देखा।


“मैं तो सो रहा था।”


वह बोला—


“मुझे रात में दो-तीन बार लगा जैसे कोई बाहर से तुझे बुला रहा था।”


मैंने उससे कुछ नहीं कहा।



मैंने उसी दिन उस घर से अपना बाकी का सामान भी मँगवा लिया।


उसके बाद मैं कभी वहाँ नहीं गया।


काफी समय तक मैंने इस घटना के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।


मेरे पास कोई जवाब नहीं है इस्का।


मैंने कोई चेहरा नहीं देखा।


मैंने किसी को नहीं देखा।


बस इतना जानता हूँ कि रात को कोई चीज मेरे दरवाजे के बाहर खड़ी रहती थी।


और वह अंदर आना चाहती थी।


मुझे यह बात उस समय समझ नहीं आई थी।


लेकिन अब पीछे मुड़कर सोचता हूँ तो एक चीज सबसे ज्यादा डराती है।


हर बार...


वह मेरा इंतजार करती रही।


कि शायद किसी रात...


मैं खुद कुंडी खोल दूँ।


और अगर उस रात मैंने वह दरवाजा खोल दिया होता...


तो शायद आज मैं यह कहानी सुनाने के लिए यहाँ नहीं होता।