जंगल की परछाई

 


जंगल की परछाई हिंदी हॉरर कहानी का फिल्म स्टाइल पोस्टर, भैरवगढ़ चौकी और तीन मुख्य पात्र
सतपुड़ा के घने जंगल में स्थित भैरवगढ़ चौकी… जहाँ तीन लोगों का सामना ऐसी परछाई से होता है, जो इंसान की शक्ल और आवाज़ दोनों अपना सकती है।



मध्य प्रदेश के सतपुड़ा क्षेत्र में एक जंगल था—कालापानी वन क्षेत्र।


सरकारी नक्शे में उसका नाम बस एक साधारण वन-खंड के रूप में दर्ज था। लेकिन जंगल के भीतर रहने वाले पुराने लोग उसे एक दूसरे नाम से जानते थे—


कालीधार।


कालीधार किसी नक्शे पर नहीं था।


न कोई सड़क वहाँ तक जाती थी, न कोई आधिकारिक रास्ता।


जंगल के पुराने लोग बस इतना जानते थे कि एक जगह ऐसी है जहाँ पेड़ बहुत पुराने हैं, जमीन हमेशा नम रहती है और शाम बाकी जंगल से कुछ पहले उतरती है।


और पिछले कई वर्षों में वहाँ से कुछ लोग गायब हुए थे।


लेकिन अजीब बात यह थी कि किसी का शरीर कभी नहीं मिला।


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अक्टूबर का आखिरी सप्ताह था।


दोपहर ढलने लगी थी जब अर्जुन राठौर की जीप आखिरी पक्की सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते पर उतर गई।


जीप के आगे लाल मिट्टी की संकरी पट्टी थी, जिसके दोनों ओर ऊँची घास और साल के पेड़ खड़े थे।


शुरुआत में जंगल खुला था।


धूप पेड़ों के बीच से जमीन तक पहुँच रही थी।


कहीं-कहीं बंदर पेड़ों की डालियों पर बैठे थे। कुछ चीतल झाड़ियों के पास दिखाई दे रहे थे। दूर से किसी पक्षी की आवाज़ आती और फिर दूसरी दिशा से उसका जवाब मिलता।


लेकिन लगभग आधे घंटे बाद जंगल बदलने लगा।


पेड़ घने होते गए।


आसमान ऊपर से दिखाई देना कम हो गया।


जीप के शीशे पर कभी-कभी सूखी टहनियाँ रगड़ खातीं और एक खुरदरी आवाज़ पैदा करतीं।


अर्जुन ड्राइव कर रहा था।


उसके साथ मीरा सेन बैठी थी। मीरा वन्यजीव फोटोग्राफर थी और पिछले कई महीनों से इस क्षेत्र में कैमरा-ट्रैप से जानवरों की गतिविधियाँ रिकॉर्ड कर रही थी।


पीछली सीट पर रघु बैठा था।


लगभग पचपन साल का।


पतला शरीर, धूप से काली पड़ी त्वचा और आँखें जो जंगल को अर्जुन और मीरा से अलग तरीके से देख रही थीं।


उसे जैसे रास्ता याद था।


एक मोड़ पर उसने अचानक कहा—


“बस अब ज्यादा दूर नहीं।”


अर्जुन ने सामने देखा।


उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।


सिर्फ पेड़ों की एक लंबी दीवार।


फिर कुछ मिनट बाद पेड़ों के बीच से जंग लगा लोहे का बोर्ड दिखाई दिया।


वन विभाग — भैरवगढ़ चौकी

सतपुड़ा के घने जंगल में भैरवगढ़ की सुनसान वन चौकी के बाहर अर्जुन, मीरा और रघु
सतपुड़ा के घने जंगल में मौजूद भैरवगढ़ चौकी… जहाँ शाम ढलते ही जंगल का सन्नाटा कुछ अनजाना सा महसूस होने लगता है।



बोर्ड आधा झुका हुआ था।


उसके पीछे एक छोटी-सी पुरानी इमारत थी।


सीमेंट की दीवारें।


टूटी खिड़कियाँ।


टीन की छत।


और सामने लकड़ी का बरामदा।


चौकी के पीछे जंगल अचानक गहरा हो जाता था।


अर्जुन ने जीप रोक दी।


तीनों कुछ क्षण वहीं बैठे रहे।


रघु सबसे पहले नीचे उतरा।


उसने चौकी का दरवाजा खोला।


दरवाजा खोलते ही अंदर से बंद हवा और पुराने लकड़ी के सामान की गंध बाहर आई।


एक कमरा सोने के लिए था।


दूसरे में पुरानी मेज, कुर्सी और कुछ सरकारी रजिस्टर पड़े थे।


बिजली थी, लेकिन बहुत कमजोर।


बल्ब जलता तो था, मगर उसकी रोशनी कमरे से ज्यादा अंधेरे को उजागर करती थी।


मीरा ने अपना बैग नीचे रखा और बाहर आकर खड़ी हो गई।


सामने जंगल था।


दोपहर की रोशनी अब पेड़ों की चोटियों पर अटक गई थी।


नीचे जमीन पर पहले से अंधेरा जमा होने लगा था।


पेड़ों के बीच इतनी गहराई थी कि कुछ जगह देखने पर ऐसा लगता था जैसे जंगल कुछ मीटर बाद खत्म हो जाता है।


लेकिन वह खत्म नहीं होता था।


वहाँ सिर्फ रोशनी खत्म होती थी।


मीरा ने कैमरा उठाया और सामने की तरफ देखा।


“यहाँ से जंगल काफी डरावना दिखता है।”


रघु ने उसकी तरफ देखा।


“रात को और अच्छा लगेगा।”


मीरा मुस्कुराई।


उन्होंने सामान व्यवस्थित किया।


अर्जुन ने कैमरा-ट्रैप की बैटरियाँ और मेमोरी कार्ड निकाले।


मीरा ने खाना बनाने का सामान निकाला।


रघु चौकी के बाहर खड़ा होकर लगातार जंगल की तरफ देखता रहा।


सूरज धीरे-धीरे पेड़ों के पीछे चला गया।


जंगल की आवाज़ें बदल गईं।


दिन में जो पक्षी लगातार बोल रहे थे, वे अचानक शांत हो गए।


उनकी जगह झींगुरों की आवाज़ ने ले ली।


दूर कहीं कोई रात का पक्षी बोला।


फिर कुछ देर बाद दूसरी दिशा से वैसी ही आवाज़ आई।


अर्जुन ने खाना खाते हुए पूछा,


“रघु, यहाँ रात को जानवर ज्यादा आते हैं?”


रघु ने खाना खाते-खाते जंगल की तरफ देखा।


“जानवर आते हैं।”


“बाघ?”


“कभी-कभी।”


“और कुछ?”


रघु ने जवाब नहीं दिया।


अर्जुन ने दोबारा नहीं पूछा।


रात पूरी तरह उतर चुकी थी।


चौकी से बाहर निकलने पर कुछ दिखाई नहीं देता था।


सिर्फ पेड़ों की काली आकृतियाँ।


और उनके बीच ऐसा अंधेरा, जिसमें आँखें कुछ देर बाद भी अभ्यस्त नहीं हो पा रही थीं।


करीब दस बजे उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया।


रघु ने कुंडी दो बार जाँची।


मीरा ने यह देखा।


“इतना मजबूत तो है नहीं।”


रघु ने कहा,


“दरवाजा मजबूत होने से कोई फायदा नहीं अगर खोलने वाला अंदर का हो।”


मीरा कुछ कहती, उससे पहले रघु अपने बिस्तर पर लेट चुका था।


रात में भैरवगढ़ चौकी के अंदर अपनी आवाज़ सुनकर डरे अर्जुन, मीरा और रघु
आधी रात के सन्नाटे में बाहर से किसी ने अर्जुन का नाम पुकारा… लेकिन आवाज़ बिल्कुल अर्जुन की अपनी थी।



करीब साढ़े ग्यारह बजे तक अर्जुन जागता रहा।


मीरा दूसरी तरफ सो चुकी थी।


रघु की साँसें धीमी और भारी थीं।


अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी में कुछ तस्वीरें देखीं।


बाहर हवा चल रही थी।


टीन की छत पर सूखी पत्तियाँ सरक रही थीं।


कभी कोई टहनी छत से टकराती।


फिर शांत हो जाती।


करीब डेढ़ बजे अर्जुन की आँख लग गई।


उसे पता नहीं चला कि कितनी देर सोया।


अचानक उसकी नींद खुली।


कमरे में अंधेरा था।


पहले उसे समझ नहीं आया कि किस चीज़ ने उसे जगाया।


पर उसने सुनी ।


भारी कदमों की आवाज़।


बहुत धीमी।


सूखी पत्तियों पर।


चौकी के सामने।


अर्जुन उठकर बैठ गया।


उसने मीरा की तरफ देखा।


मीरा भी जाग चुकी थी।


रघु आँखें बंद किए पड़ा था।


कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए।


कुछ सेकंड बीते।


फिर बाहर से बहुत धीमी आवाज़ आई—


“अर्जुन…”


अर्जुन के शरीर में जैसे अचानक ठंड उतर गई।


आवाज़ पहचानने में उसे एक क्षण भी नहीं लगा।


वह उसकी अपनी आवाज़ थी।


मीरा ने उसकी तरफ देखा।


अर्जुन ने होंठों पर उंगली रख दी।


बाहर फिर सन्नाटा हो गया।


कुछ देर बाद वही आवाज़ आई।


इस बार थोड़ी साफ़।


“अर्जुन… दरवाजा खोलो।”


रघु उठ बैठा।


उसने अर्जुन की तरफ देखा और सिर हिला दिया।


नहीं।


अर्जुन की नजर दरवाजे पर थी।


दरवाजे के नीचे लगभग एक इंच की खाली जगह थी।


बाहर अंधेरा था।


कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।


फिर उस खाली जगह के सामने कुछ आकर रुक गया।


जैसे कोई व्यक्ति दरवाजे के ठीक बाहर खड़ा हो।


मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।


काफी देर तक कोई आवाज़ नहीं आई।


करीब दो बजे के आसपास बाहर से एक बार फिर कदमों की आवाज़ सुनाई दी।


इस बार वे दरवाजे से दूर जा रहे थे।


रघु ने पूरी रात किसी को बोलने नहीं दिया।


अर्जुन की आँखों में नींद लौटती रही, लेकिन वह सोने से डर रहा था।


मीरा भी करवट बदलती रही।


कभी बाहर हवा चलती।


कभी पेड़ों से पत्तियाँ गिरतीं।


कभी लगता जैसे कोई चौकी के चारों तरफ घूम रहा है।


रात का बाकी हिस्सा इसी तरह बीता।


सुबह से थोड़ी पहले शायद अर्जुन की आँख लग गई।



सुबह


पहली रोशनी कमरे की टूटी खिड़की से अंदर आई।


अर्जुन की आँख खुली तो कुछ क्षण तक उसे समझ नहीं आया कि रात सच में हुई थी या सपना था।


फिर उसने मीरा को देखा।


वह पहले से जागी हुई थी।


रघु दरवाजे के पास खड़ा था।


कुंडी खोलने से पहले उसने दोनों की तरफ देखा।


“कोई बाहर नहीं जाएगा।”


फिर उसने धीरे से दरवाजा खोला।


सुबह का जंगल रात से बिल्कुल अलग था।


पेड़ों की पत्तियों पर नमी थी।


हवा ठंडी थी।


दूर पक्षियों की आवाज़ फिर लौट आई थी।


कुछ बंदर पेड़ों पर दौड़ रहे थे।


सब कुछ सामान्य लग रहा था।


फिर रघु नीचे देखने लगा।


दरवाजे के सामने पैरों के निशान थे।


नंगे पैर।


एक व्यक्ति चौकी की तरफ आया था।


निशान सीधे दरवाजे तक आते थे।


लेकिन वापस जाने के कोई निशान नहीं थे।


अर्जुन कुछ देर उन निशानों को देखता रहा।


उसने सूखी मिट्टी उठाकर उन निशानों पर डाल दी।


“यहाँ से अब आगे जाना पड़ेगा।”


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दोपहर तक उन्हें चौकी से लगभग दो किलोमीटर दूर एक पुराना अस्थायी कैंप मिला।


यहीं से वनकर्मी देवेंद्र सिंह गायब हुआ था।


उसका बैग अभी भी वहीं था।


एक जंग लगी बंदूक।


पानी की आधी बोतल।


एक जोड़ी जूते।


और लकड़ी के बक्से में रखी डायरी।


अर्जुन ने डायरी खोली।


पहले कुछ पन्नों पर जानवरों के निशान और तारीखें थीं।


फिर लिखावट बदल गई।


एक पन्ने पर केवल एक वाक्य था—


“जानवर इस हिस्से से भाग रहे है।”


अगले पन्ने पर—


“वे किसी चीज से दर रहे हैं।”


और उसके नीचे—


“कल रात उसने मेरी आवाज़ में मुझे बुलाया।”


मीरा ने धीरे से पूछा,


“किसने?”


रघु डायरी से नजर नहीं हटा रहा था।


“पता नहीं।”


लेकिन उसके चेहरे पर साफ था कि वह जानता था।


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अगले दिन वे जंगल के उस हिस्से में पहुँचे जहाँ पेड़ अचानक और घने हो गए थे।


रघु ने कहा,


“यहीं से कालीधार शुरू होता है।”


कोई बोर्ड नहीं था।


कोई ठीक रास्ता भी नहीं था।


बस पेड़ों के बीच एक पुरानी पगडंडी थी।


वे आगे बढ़े।


करीब आधे घंटे बाद अर्जुन ने एक पेड़ देखा।


उसकी छाल पर कई नाम खुदे हुए थे।


नामों के साथ तारीखें भी थीं।


कुछ बहुत पुराने।


कुछ केवल कुछ साल पुराने।


मीरा ने कैमरा निकाला।


तभी उसे जमीन पर कुछ पड़ा दिखाई दिया।


एक पुरानी घड़ी।


उसके पास चाकू।


एक टूटी चप्पल।


फिर थोड़ा आगे एक पुराना कैमरा।


रघु ने किसी चीज़ को छुआ तक नहीं।


अर्जुन ने पूछा,


“ये सब किसके हैं?”


जवाब क्लिक पास नाही था..


फिर आगे बढ़ते हुए मीरा अचानक रुक गई।


उसे किसी ने पुकारा था।


“मीरा…”


वह आवाज़ बहुत पास से आई थी।


मीरा ने पीछे देखा।


कोई नहीं था।


फिर आवाज़ आई—


“मीरा…”


इस बार बिल्कुल उसकी अपनी आवाज़ में।


रघु ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“पीछे मत देखो।”


कुछ क्षण बाद आवाज़ बंद हो गई।


वे आगे बढ़ते रहे।


शाम होने से पहले उन्हें देवेंद्र का दूसरा कैंप मिला।


वहाँ एक छोटा टिन का डिब्बा था।


उसमें कागजों का एक बंडल।


अर्जुन ने एक कागज खोला।


लिखा था—


“वहरूप धारन करता है।”


नीचे दूसरी लाइन—


“पहले आवाज़ सीखता है।”


उसके नीचे—


“फिर चाल।”


और आखिरी लाइन—


“जब यह तुम्हारी परछाई बनाना सीख जाए, तब बहुत देर हो चुकी होती है।”


अर्जुन ने कागज नीचे रख दिया।


कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।



शाम होते-होते उन्हें एक छोटा-सा पत्थर का चबूतरा मिला।


उसके पास पुराना लोहे का बक्सा पड़ा था।


अंदर कुछ सरकारी कागज और एक फोटो थी।


फोटो लगभग पच्चीस साल पुरानी थी।


रघु ने फोटो हाथ में ली।


उसका चेहरा बदल गया।


फोटो में चार लोग खड़े थे।


एक युवा रघु।


उसका भाई नरेश।


एक वनकर्मी।


और उनके बीच एक बच्चा।


अर्जुन ने फोटो को ध्यान से देखा।


बच्चे के कपड़े अजीब तरह से परिचित थे।


उसने फोटो पलटी।


पीछे लिखा था—


“कालीधार — आखिरी रात।”


अर्जुन ने पूछा,


“ये बच्चा कौन है?”


रघु ने तुरंत फोटो वापस ले ली।


“चलो।”


“रघु, कौन है?”


रघु ने जवाब नहीं दिया।


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उस रात वे वापस भैरवगढ़ चौकी पहुँचे।


इस बार तीनों के भीतर रात को लेकर पहले जैसी सहजता नहीं थी।


दरवाजा बंद हुआ।


लालटेन जलाई गई।


बाहर हवा चल रही थी।


करीब बारह बजे 


जंगल में कहीं दूर से एक पक्षी चीखा।


कुछ देर बाद दूसरी तरफ से वही आवाज़ आई।


फिर अचानक सब शांत हो गया।


करीब ढाई बजे अर्जुन की आँख खुली।


उसने देखा—


मीरा सो रही थी।


रघु भी।


वह उठकर पानी पीने लगा।


तभी बाहर से आवाज़ आई।


“अर्जुन…”


इस बार आवाज़ उसकी नहीं थी।


रघु की थी।


अर्जुन ने रघु की तरफ देखा।


रघु गहरी नींद में था।


बाहर फिर आवाज़ आई—


“अर्जुन… बाहर आ।”


रघु अचानक जाग गया।


उसने आवाज़ सुनी।


उसका चेहरा सफेद पड़ गया।


फिर दरवाजे के नीचे कुछ दिखाई दिया।


एक हाथ।


लेकिन वह हाथ सामान्य नहीं था।


उंगलियाँ…


छह थीं।


अर्जुन पीछे हट गया।


मीरा ने चीख दबा ली।


हाथ कुछ क्षण दरवाजे के नीचे रहा।


फिर धीरे-धीरे पीछे चला गया।


उसके बाद पूरी रात कोई आवाज़ नहीं आई।


सुबह दरवाजे के बाहर पेड़ की छाल पर किसी ने कुछ खरोंचा था।


तीन शब्द—


“अब पहचान लिय


भैरवगढ़ चौकी के कमरे में तीन लोगों के बीच दिखाई देती चार रहस्यमय परछाइयाँ
कमरे में सिर्फ तीन लोग थे… फिर फर्श पर चार परछाइयाँ किसकी थीं?



रघु ने उसी सुबह कहा—


“हमें कालीधार वापस जाना होगा।”


अर्जुन ने पूछा,


“क्यों?”


रघु ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।


“क्योंकि अब वह तुम्हें पहचानता है।”


वे तीनों दोबारा जंगल में गए।


दोपहर तक वे उस पुराने जले हुए हिस्से तक पहुँचे।


चारों ओर बड़े पेड़ों के बीच एक गोल खाली जगह थी।


जमीन काली थी।


कुछ पुराने जले हुए तने अभी भी खड़े थे।


रघु काफी देर तक चुप रहा।


फिर उसने कहा—


“पच्चीस साल पहले यहाँ आग लगी थी।”


अर्जुन ने पुरानी तस्वीर याद की।


रघु आगे बोला—


“उस रात मेरा भाई नरेश गायब हुआ था।”


“तीन दिन बाद वापस आया।”


“जिंदा।”


अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।


“फिर?”


रघु की आवाज़ धीमी हो गई।


“उसने कहा था… जंगल में उसके साथ एक आदमी चल रहा था।”


“कौन?”


“वह।”


“कौन वह?”


रघु ने जवाब नहीं दिया।


उसने बस सामने की तरफ देखा।


अर्जुन ने भी देखा।


कुछ नहीं था।


फिर झाड़ियों के पीछे एक आकृति दिखाई दी।


कोई आदमी खड़ा था।


धीरे-धीरे वह आगे आया।


अर्जुन के पैर जैसे जमीन में जम गए।


वह आदमी…


अर्जुन जैसा दिखता था।


वही चेहरा।


वही कपड़े।


वही कद।


मीरा ने कैमरा उठाया।


रघु ने उसका हाथ रोकना चाहा।


लेकिन देर हो चुकी थी।


कैमरे की स्क्रीन पर कुछ और दिखाई दे रहा था।


उस आदमी के पीछे जंगल में दर्जनों आकृतियाँ खड़ी थीं।


वे लोग थे।


पुराने कपड़ों में।


कुछ झुके हुए।


कुछ सीधे।


एक चेहरा देवेंद्र का था।


अर्जुन ने स्क्रीन से नजर हटाकर जंगल की तरफ देखा।


वहाँ कोई नहीं था।


फिर उसने कैमरे में देखा।


वे अभी भी वहाँ थे।


और उसके सामने खड़ा दूसरा अर्जुन…


मुस्कुरा रहा था।


सूरज ढल रहा था।


अर्जुन पीछे हटने लगा।


तभी उसने नीचे देखा।


उसकी अपनी परछाई जमीन पर थी।


लेकिन वह उसके पैरों के साथ नहीं थी।


वह थोड़ी आगे खिसकी हुई थी।


अर्जुन ने पैर पीछे किया।


परछाई वहीं रही।


फिर धीरे-धीरे…


उसकी परछाई उठी।


ऐसा लगा जैसे जमीन पर पड़ा कोई काला आकार इंसान की तरह खड़ा हो रहा हो।


मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।


रघु ने अपनी जेब से माचिस निकाली।


उसने सूखी घास में आग लगा दी।


आग फैलने लगी।


सामने खड़ा दूसरा अर्जुन पहली बार पीछे हटा।


जंगल में खड़ी आकृतियाँ भी पीछे हटने लगीं।


लेकिन वे आग से नहीं डर रही थीं।


वे अपनी परछाइयों से डर रही थीं।


जहाँ आग की रोशनी पड़ती, वहाँ उनके नीचे काली आकृतियाँ दिखाई देतीं।


और उन परछाइयों के भीतर कुछ हिल रहा था।


जैसे वे परछाइयाँ जीवित हों।


रघु चिल्लाया—


“भागो!”


तीनों जंगल की तरफ दौड़ पड़े।


पीछे से कदमों की आवाज़ आने लगी।


लेकिन किसी को पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।



वे रात होने से पहले चौकी पहुँच गए।


दरवाजा बंद किया।


अंदर तीनों हाँफ रहे थे।


काफी देर तक कोई नहीं बोला।


मीरा ने कैमरा निकाला।


उसने तस्वीरें देखनी शुरू कीं।


एक तस्वीर पर उसकी उंगली रुक गई।


उसमें दो अर्जुन खड़े थे।


एक सामने।


दूसरा थोड़ा पीछे।


दोनों बिल्कुल एक जैसे।


लेकिन रोशनी एक ही दिशा से आ रही थी।


फिर भी…


दोनों की परछाइयाँ दो अलग दिशाओं में जा रही थीं।


मीरा ने तस्वीर ज़ूम की।


दूसरे अर्जुन की परछाई के भीतर कुछ था।


दो छोटे सफेद बिंदु।


जैसे…


आँखें।


उसी समय अर्जुन का फोन बजा।


कमरे में किसी ने फोन की उम्मीद नहीं की थी।


अर्जुन ने स्क्रीन देखी।


कॉल उसी के नंबर से आ रही थी।


उसने फोन उठाया।


दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।


फिर उसकी अपनी आवाज़ आई—


“तुमने तस्वीर देख ली?”


अर्जुन ने धीरे-धीरे फोन नीचे किया।


मीरा उसकी तरफ देख रही थी।


रघु भी।


और तभी मीरा की नजर फर्श पर गई।


कमरे में लालटेन की रोशनी पड़ रही थी।


अर्जुन खड़ा था।


उसकी परछाई भी उसके पैरों के नीचे थी।


सब सामान्य था।


फिर…


परछाई ने अपना सिर उठाया।


अर्जुन ने सिर नहीं उठाया था।


मीरा पीछे हट गई।


फोन अभी भी अर्जुन के हाथ में था।


दूसरी तरफ से आवाज़ आई—


“अब तुम समझ गई हो…”


कुछ क्षण का सन्नाटा।


अर्जुन ने अपनी परछाई की तरफ देखा।


वह अब बिल्कुल स्थिर थी।


लेकिन उसकी आँखें…


अर्जुन की आँखों से नहीं मिल रही थीं।


वे मीरा को देख रही थीं।


बाहर जंगल में हवा चल रही थी।


पेड़ों की शाखाएँ चौकी की दीवार से टकरा रही थीं।


और उसी क्षण चौकी के बाहर किसी ने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी।


ठक।


तीनों जम गए।


कुछ सेकंड बाद फिर—


ठक।


फिर बाहर से आवाज़ आई।


बहुत परिचित आवाज़।


मीरा की अपनी आवाज़।


“दरवाजा खोलो…”


अंदर खड़े तीनों लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।


क्योंकि मीरा…


अभी उनके बीच खड़ी थी।


और उस रात भैरवगढ़ चौकी के फर्श पर—


तीन लोगों के लिए चार परछाइयाँ थीं।

तीन दिन

 



रात के दो बज चुके थे।


पूरा शहर सो रहा था।


मुख्य सड़कें खाली थीं। दुकानों के शटर बंद थे और इक्का-दुक्का स्ट्रीट लाइट के नीचे सड़क का एक छोटा-सा हिस्सा दिखाई दे रहा था।


पुलिस की जीप धीरे-धीरे शहर के पुराने औद्योगिक इलाके से गुजर रही थी।


जीप में इंस्पेक्टर काले आगे बैठे थे। पीछे दो कॉन्स्टेबल थे।


काले ने खिड़की से बाहर देखा।


“आगे वाला रास्ता देखना।”


ड्राइवर ने जीप की रफ्तार थोड़ी कम कर दी।


कुछ दूर जाने के बाद अचानक काले की नजर सड़क के किनारे खड़ी एक कार पर पड़ी।

रात में पुलिस काली कार की डिक्की से सिर कटी लाश बरामद करते हुए
रात के सन्नाटे में काली कार की डिक्की से मिली राजन की सिर कटी लाश ने पूरे मामले को रहस्य में बदल दिया।



काली कार।


इंजन बंद।


हेडलाइट बंद।


और सबसे अजीब बात—


उस इलाके में उस समय कोई होना ही नहीं चाहिए था।


“रुको।”


जीप कार से कुछ दूरी पर जाकर रुक गई।


काले नीचे उतरे।


दोनों कॉन्स्टेबल भी उतर आए।


चारों तरफ देखा गया।


कोई नहीं।


न कोई आदमी।


न कोई दूसरी गाड़ी।


न आसपास कोई खुली दुकान।


सिर्फ दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज आ रही थी।


काले कार के पास गए।


उन्होंने पहले नंबर प्लेट देखी।


फिर अंदर झांककर देखा।


ड्राइविंग सीट खाली थी।


सामने की सीट भी खाली।


उन्होंने शीशे पर हाथ रखकर अंदर देखने की कोशिश की।


कुछ खास नजर नहीं आया।


“कार लॉक है?” उन्होंने पूछा।


एक कॉन्स्टेबल ने दरवाजा खींचकर देखा।


“हाँ, साहब।”


काले ने सड़क की तरफ देखा।


“इतनी रात को यहाँ कार कौन छोड़कर गया?”


कोई जवाब नहीं था।


उन्होंने कार के चारों तरफ चक्कर लगाया।


टायर ठीक थे।


कोई एक्सीडेंट के निशान नहीं।


कार पर बाहर से कोई खास नुकसान भी नहीं था।


काले ने फिर ड्राइवर की सीट की तरफ देखा।


“अंदर कोई सामान?”


कॉन्स्टेबल ने शीशे से देखकर कहा,


“कुछ खास नहीं, साहब।”


काले ने हाथ से इशारा किया।


“चेक करो।”


एक कॉन्स्टेबल कार के अगले हिस्से की तलाशी लेने लगा।


दूसरा पीछे चला गया।


कार की पिछली सीट पर एक पुराना बैग पड़ा था।


बैग खाली था।


दरवाजे के नीचे भी कुछ नहीं था।


काले ने घड़ी देखी।


2:17।


“मालिक को ढूंढो।”


एक कॉन्स्टेबल ने आसपास नजर दौड़ाई।


“साहब, अगर मालिक यहीं कहीं गया होगा तो—”


वाक्य पूरा होने से पहले पीछे खड़े कॉन्स्टेबल ने आवाज दी।


“साहब।”


काले उसकी तरफ मुड़े।


कॉन्स्टेबल कार की डिक्की के पास खड़ा था।


“क्या हुआ?”


“डिक्की लॉक है।”


काले उसके पास गए।


“तो?”


“साहब... इसे भी देख लेते हैं।”


काले ने कुछ पल डिक्की को देखा।


फिर बोले,


“खोलो।”


कॉन्स्टेबल ने चाबी से लॉक खोलने की कोशिश की।


लॉक नहीं खुला।


दूसरी चाबी आजमाई गई।


फिर भी नहीं।


काले ने कहा,


“तोड़ दो।”


कॉन्स्टेबल ने लोहे की रॉड निकाली।


रात की खामोशी में पहला वार हुआ।


ठक!


दूसरा वार।


ठक!


तीसरे वार के बाद लॉक टूट गया।


डिक्की का ढक्कन थोड़ा ऊपर उठा।


कॉन्स्टेबल ने हाथ लगाकर उसे पूरा खोल दिया।


और उसी पल उसके हाथ वहीं रुक गए।


चेहरे का रंग बदल गया।


काले ने पूछा,


“क्या हुआ?”


कॉन्स्टेबल पीछे हट गया।


काले आगे बढ़े।


टॉर्च की रोशनी डिक्की के अंदर गई।


कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।


डिक्की में एक आदमी पड़ा था।


उसके हाथ पीछे की तरफ बंधे थे।


पैर रस्सी से बंधे थे।


कपड़े धूल से लगभग साफ थे।


और—


उसका सिर नहीं था।


काले की नजर कुछ क्षण उस शरीर पर टिकी रही।


फिर उन्होंने धीरे से कहा,


“किसी को हाथ मत लगाने देना।”


एक कॉन्स्टेबल ने तुरंत वायरलेस उठाया।


“कंट्रोल... यहाँ एक संदिग्ध वाहन मिला है। डिक्की में एक शव है।”


काले ने शव से नजर नहीं हटाई।


उन्हें अभी एक बात समझ नहीं आ रही थी।


अगर किसी ने हत्या करके शव यहाँ छोड़ा था...


तो वह इतनी सुनसान जगह पर कार छोड़कर गया क्यों?


और अगर कार सिर्फ शव छोड़ने के लिए लाई गई थी...


तो कार का मालिक कहाँ था?


काले ने चारों तरफ देखा।


सड़क खाली थी।



जैसे इस जगह ने रात की उस घटना को अपने भीतर छिपा लिया हो।


उन्हें तब पता नहीं था कि इस डिक्की में पड़ा शव अगले कई दिनों तक पुलिस को सिर्फ एक सवाल का जवाब ढूंढने पर मजबूर करने वाला था—


यह आदमी आखिर था कौन?

सुबह के साढ़े चार बज रहे थे।


अपराध स्थल पर अब पुलिस की गाड़ियाँ बढ़ चुकी थीं।


कार के चारों तरफ बैरिकेड लगा दिया गया था। फॉरेंसिक टीम तस्वीरें ले रही थी। सड़क के दोनों तरफ पुलिसकर्मी खड़े थे।


इंस्पेक्टर काले अब तक वहीं थे।


रात की घटना ने उन्हें परेशान कर रखा था।


तभी पीछे से एक सफेद कार आकर रुकी।


दरवाजा खुला।


एक लंबा, चौड़े कंधों वाला आदमी बाहर उतरा।


साधारण कपड़े।


हाथ में कोई फाइल नहीं।


चेहरे पर न जल्दबाजी, न नींद।


वह कुछ कदम आगे बढ़ा और बिना किसी से कुछ पूछे सीधे कार की तरफ देखने लगा।


अरुण राणे।


क्राइम ब्रांच।


काले ने आगे बढ़कर सलाम किया।


“सर।”


अरुण ने जवाब में सिर्फ सिर हिलाया।


उसकी नजर पहले कार पर गई।


फिर सड़क पर।


फिर कार के टायरों पर।


फिर डिक्की पर।


काले ने कहा,


“सर, रात करीब दो बजे कार मिली। अंदर कोई नहीं था। डिक्की खोलने पर शव मिला।”


अरुण ने पूछा,


“कार किसकी है?”


“अभी पता नहीं चला।”


“चाबी?”


“कार के अंदर नहीं मिली।”


अरुण चुप रहा।


वह कार के चारों तरफ घूमने लगा।


काले उसके पीछे-पीछे चल रहे थे।


अरुण झुका।


सड़क की मिट्टी को देखा।


फिर कार के पिछले टायर को।


“इसे यहाँ कितनी देर से खड़ा होना चाहिए?”


काले ने कहा,


“पता नहीं सर।”


अरुण ने टायर की तरफ इशारा किया।


“कम से कम इतना तो पता है कि कार यहाँ चलाकर लाई गई है।”


काले ने कहा,


“जी।”


अरुण डिक्की के पास गया।


अंदर पड़े शव को कुछ क्षण देखा।


“शव को किसी ने घसीटा नहीं है।”


काले ने चौंककर पूछा,


“आपको कैसे पता?”


अरुण ने रस्सी की तरफ इशारा किया।


“अगर इसे जमीन पर घसीटकर डिक्की तक लाया गया होता, तो कपड़ों के नीचे और पीठ पर मिट्टी होती।”


काले नीचे झुके।


वास्तव में कपड़े लगभग साफ थे।


अरुण ने कहा,


“जिसने इसे यहाँ रखा है, उसने इसे उठाकर रखा है।”


काले ने पूछा,


“एक आदमी ने?”


अरुण ने शव को देखा।


“शायद दो।”


फिर उसकी नजर बंधे हुए हाथों पर गई।


रस्सी को छुआ नहीं।


सिर्फ देखा।


“इसे बाँधने वाला जल्दी में नहीं था।”


काले ने पूछा,


“क्यों?”


अरुण ने कहा,


“गांठ देखो।”


काले ने टॉर्च पास की।


गांठ साफ और मजबूत थी।


अरुण ने कहा,


“घबराया हुआ आदमी ऐसी गांठ नहीं लगाता।”


फिर वह सीधा खड़ा हो गया।


कुछ सेकंड तक वह चुप रहा।


“पोस्टमार्टम जल्दी करवाओ।”


“जी।”


“और कार को अभी थाने मत ले जाना।”


काले ने पूछा,


“क्यों?”


अरुण ने सड़क की तरफ देखा।


“क्योंकि कार हमें यहाँ तक लाई है।”


फिर उसने धीरे से कहा—


“लेकिन जरूरी नहीं कि कातिल भी इसी रास्ते आया हो।”


काले उसकी तरफ देखने लगे।


अरुण ने आसपास नजर दौड़ाई।


“इस सड़क पर रात में आने-जाने वाले हर वाहन का पता करो।”


“जी सर।”


“और एक बात।”


“जी?”


अरुण ने कार की डिक्की की तरफ देखा।


“जिसने इस आदमी का सिर काटा है…”


वह कुछ पल रुका।


“…वह सिर्फ हत्या नहीं छिपाना चाहता था।”


काले ने पूछा,


“तो क्या चाहता था?”


अरुण की नजर शव पर टिक गई।


“पहचान।”


अरुण राणे राजन की हत्या की केस फाइल और सुरागों की जांच करते हुए
अरुण राणे के सामने सवाल सिर्फ हत्या का नहीं था—राजन की मौत से पहले के उन तीन दिनों में आखिर हुआ क्या था?



सुबह तक खबर पूरे शहर में फैल चुकी थी।


सिर कटी लाश।


पुलिस ने मृतक की पहचान के बारे में कुछ नहीं बताया।


अरुण ने उसी दिन से जांच शुरू कर दी।


शहर के सभी थानों में पिछले एक सप्ताह की गुमशुदगी की रिपोर्ट मंगाई गई।


लेकिन कोई ऐसा नाम नहीं मिला जो इस शव से निश्चित रूप से जुड़ सके।


चार दिन हुये।


कुछ नहीं।


लाश की पहचान नहीं हुई।


फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई।


अरुण ने रिपोर्ट पढ़ी।


उसकी आंखें एक जगह रुक गईं।


मृतक की उम्र लगभग 25 वर्ष।


लेकिन अगली लाइन ज्यादा महत्वपूर्ण थी।


मृत्यु से पहले शरीर में जहरीला पदार्थ पाया गया था।


अरुण ने रिपोर्ट मेज पर रख दी।


अभिजीत काले सामने बैठा था।


“पहले जहर…”


अरुण ने कहा।


“फिर सिर काटा गया।”


अभिजीत ने पूछा,


“मतलब?”


अरुण ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,


“मतलब जिसने उसे मारा, उसने उसे कमजोर करने के बाद मारा।”


“क्यों?”


“यही पता करना है।”


उसी शाम एक और खबर आई।


जंगल में एक चरवाहे को इंसानी सिर मिला था।


फॉरेंसिक जांच के बाद पुष्टि हुई—


वह उसी लाश का सिर था।


अब अरुण के पास एक मृत आदमी था।


एक सिर था।


एक कार थी।


लेकिन आदमी की पहचान अभी भी नहीं थी।


फिर अचानक—


25 जुलाई की एक मिसिंग कंप्लेंट सामने आई।


नाम था—


राजन।


उम्र—


25 साल।


अरुण ने फाइल खोली।


और पहली बार इस केस में उसके चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान आई।


“अभिजीत…”


“जी सर?”


“अब हमारे पास एक नाम है।”


उसने फाइल बंद की।


“लेकिन नाम मिलना मतलब केस सुलझना नहीं होता।”


अरुण उठ खड़ा हुआ।


“अब पता लगाओ…”


वह दरवाजे तक गया।


“अब पता लगाओ…”


वह पलटा।


“राजन की मौत के बाद उसके साथ तीन दिन तक क्या हुआ था।”


अभिजीत काले ने उसकी तरफ देखा।


“सर… मौत के बाद?”


अरुण ने सिर हिलाया।


“हाँ।”


“लेकिन पोस्टमार्टम में तो—”


“पोस्टमार्टम हमें यह बताएगा कि वह कैसे मरा।”


अरुण ने मेज पर पड़ी राजन की फाइल उठाई।


“मुझे यह जानना है कि मरने से पहले तीन दिन वह कहाँ था।”


---


राजन की झोपड़ी में पुलिस पहुँची तो वहाँ ऐसा कुछ नहीं मिला जो किसी बड़े रहस्य की ओर इशारा करता।


एक पुराना पंखा।


दो जोड़ी कपड़े।


एक टूटा हुआ मोबाइल चार्जर।


और बिस्तर के नीचे रखा लोहे का छोटा-सा बक्सा।


बक्से में सिर्फ कुछ कागज थे।


अभिजीत ने एक-एक करके उन्हें देखा।


अधिकतर बेकार थे।


पुरानी नौकरी के कागज।


कंपनी का पहचान-पत्र।


कुछ रसीदें।


लेकिन सबसे नीचे एक छोटी-सी पर्ची थी।


उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—


“गोदाम नंबर 17।”


अरुण ने पर्ची हाथ में ली।


“यह कहाँ है?”


अभिजीत ने तुरंत फोन किया।


कुछ देर बाद जवाब मिला।


“देवधर इंडस्ट्रीज का पुराना गोदाम।”


अरुण ने पर्ची मोड़कर जेब में रख ली।


“चलो।”


---


गोदाम नंबर 17 शहर के पुराने औद्योगिक इलाके में था।


कई साल से बंद पड़ा था।


दरवाजा बाहर से बंद था, 


अरुण वहीं रुक गया।


उसने ताले को देखा।


फिर जमीन को।


दरवाजे के नीचे धूल में जूते के हल्के निशान थे।


अभिजीत ने कहा,


“कोई हाल में अंदर गया है।”


अरुण ने जवाब नहीं दिया।


ताला खुलवाया गया।


अंदर अंधेरा था।


पुराने लकड़ी के बक्से दीवार के पास रखे थे।


एक कोने में टूटी मशीनें थीं।


और बीच में एक मेज।


मेज पर धूल जमी थी।


लेकिन धूल के बीच एक जगह साफ थी।


जैसे वहाँ हाल ही में कोई चीज रखी गई हो।


अरुण ने मेज की दराज खोली।


अंदर एक छोटी डायरी मिली।


राजन की।


पहले कुछ पन्ने खाली थे।


फिर तारीखें लिखी थीं।


22 जुलाई।


एक लाइन।


“कुछ गड़बड़ है।”


23 जुलाई—


“जिसे माल समझ रहे हैं, वह माल नहीं है।”


24 जुलाई—


सिर्फ एक शब्द।


“नाम मिल गया।”


और 25 जुलाई के पन्ने पर कुछ नहीं था।


अरुण ने डायरी बंद कर दी।


अभिजीत ने पूछा,


“सर, राजन कंपनी में क्या खोज रहा था?”


अरुण ने कहा,


“यही पता करना है।”



देवधर इंडस्ट्रीज के रिकॉर्ड निकाले गए।


राजन वहाँ छह महीने तक स्टोर सेक्शन में काम कर चुका था।


उसका काम साधारण था।


माल की एंट्री।


बिलों की जांच।


गोदामों का हिसाब।


लेकिन पिछले महीने उसने अचानक नौकरी छोड़ दी थी।


कारण लिखा था—


व्यक्तिगत समस्या।


अरुण ने कंपनी के अकाउंट विभाग से पिछले तीन महीनों के रिकॉर्ड मंगवाए।


कुछ घंटों बाद एक अजीब बात सामने आई।


गोदाम नंबर 17 में दर्ज माल और वास्तविक माल की मात्रा में अंतर था।


छोटी रकम नहीं।


करोड़ों रुपये का माल गायब था।


लेकिन रिकॉर्ड में सब ठीक था।


अभिजीत ने कहा,


“सर, राजन को यह पता चला होगा।”


अरुण ने सिर हिलाया।


“शायद।”


“तो उसने किसी को बताया?”


“अगर बताया होता तो वह जिंदा होता?”


अभिजीत चुप हो गया।


अरुण ने फिर रिकॉर्ड देखा।


“यह चोरी सिर्फ माल की नहीं है।”


“फिर?”


“देखो तारीख।”


अभिजीत ने तारीखें मिलाईं।


माल हर बार कंपनी के रिकॉर्ड में बाहर भेजा गया था।


लेकिन जिस वाहन से माल भेजा गया था…


वे वाहन उस दिन कंपनी से निकले ही नहीं थे।


अरुण की आँखें सिकुड़ गईं।


“नकली बिल।”


अरुण राणे गोदाम नंबर 17 में राजन की डायरी और हत्या के सबूतों की जांच करते हुए
गोदाम नंबर 17 में मिली राजन की डायरी ने हत्या के पीछे छिपे तीन दिनों के रहस्य की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सामने ला दी।



अब करण देवधर से दोबारा पूछताछ जरूरी थी।


करण ने सब सुनने के बाद कहा,


“मुझे इन रिकॉर्ड्स के बारे में कुछ नहीं पता।”


अरुण ने पूछा,


“आप कंपनी के मालिक हैं।”


“हर विभाग की जानकारी मालिक को नहीं होती।”


“राजन को होती थी?”


करण चुप रहा।


“उसने गोदाम नंबर 17 में क्या देखा था?”


करण ने कोई जवाब नहीं दिया।


अरुण ने उसकी ओर देखा।


“आप डर रहे हैं।”


करण ने धीरे से कहा,


“मैं अपने परिवार के लिए डर रहा हूँ।”


“किससे?"


करण ने सामने रखे कागजों की तरफ देखा।


“जिस खेल में राजन फँसा था… उसमें मैं भी पूरी तरह बाहर नहीं था।”


अभिजीत चौकन्ना हो गया।


करण ने आखिरकार बताया कि कंपनी के कुछ वरिष्ठ लोग वर्षों से नकली बिलों के जरिए माल बाहर भेज रहे थे।


करण को शक था।


लेकिन उसने कभी सीधे हस्तक्षेप नहीं किया।


क्योंकि उन लोगों में कंपनी के ऐसे लोग शामिल थे जिन पर वह वर्षों से भरोसा करता आया था।


राजन ने यह खेल पकड़ लिया था।


और उसने सबूत जमा करने शुरू कर दिए।


अरुण ने पूछा,


“क्या राजन आपको ब्लैकमेल कर रहा था?”


करण ने तुरंत कहा,


“नहीं।”


अरुण रुक गया।


यह जवाब बहुत जल्दी आया था।


“फिर वह आपसे क्या चाहता था?”


करण ने कहा,


“सच।”


“किसके बारे में?”


करण ने नजरें झुका लीं।


“वह जानना चाहता था कि कंपनी के अंदर यह सब कौन चला रहा है।”


---


अरुण ने राजन के फोन की पूरी कॉल हिस्ट्री निकलवाई।


22 से 25 जुलाई के बीच राजन ने कई बार एक ही नंबर पर फोन किया था।


नंबर कंपनी के किसी कर्मचारी के नाम पर नहीं था।


सिम किसी दूसरे आदमी के नाम पर था।


लेकिन लोकेशन हर बार देवधर इंडस्ट्रीज के आसपास की थी।


अरुण ने नंबर ट्रेस करवाया।


कुछ देर बाद नाम सामने आया—


रवि मेहरा।


कंपनी का ड्राइवर।


रवि को बुलाया गया।


उसने राजन को पहचानने से इनकार कर दिया।


“मैं उसे जानता ही नहीं।”


अरुण ने सामने उसका फोटो रखा।


“तुम्हारी गाड़ी 23 जुलाई को गोदाम नंबर 17 के बाहर क्यों थी?”


रवि चुप।


“24 जुलाई?”


चुप।


“25 जुलाई?”


इस बार रवि के चेहरे का रंग बदल गया।


अरुण ने फाइल बंद कर दी।


“ठीक है।”


रवि ने राहत की सांस ली।


अरुण उठ गया।


दरवाजे तक गया।


फिर बिना पीछे देखे बोला—


“वैसे राजन ने मरने से पहले तुम्हारा नाम लिखा था।”


रवि तुरंत बोल पड़ा—


“झूठ!”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


अरुण धीरे-धीरे पलटा।


“मैंने कहा ही नहीं था कि राजन ने मरने से पहले कुछ लिखा था।”


रवि समझ चुका था।


वह फँस गया।


---


रवि ने आखिरकार बताया कि वह राजन को 23 जुलाई से मिल रहा था।


राजन ने उससे कंपनी के कुछ पुराने माल की तस्वीरें और वाहन रिकॉर्ड हासिल करने में मदद मांगी थी।


बदले में पैसे देने का वादा किया था।


लेकिन 24 जुलाई को राजन को कुछ और मिल गया।


एक पुराना दस्तावेज।


उस दस्तावेज में एक ऐसे व्यक्ति का नाम था जो नकली बिलों के पूरे नेटवर्क को चला रहा था।


रवि ने कहा—


“राजन ने नाम देखकर कहा था… अब यह आदमी उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”


अरुण ने पूछा,


“नाम क्या था?”


रवि ने सिर झुका लिया।


“मुझे नहीं पता।”


“झूठ।”


“सच कह रहा हूँ।”


अरुण ने कुछ नहीं कहा।


रवि को जाने दिया गया।


अभिजीत ने पूछा,


“सर, उसे छोड़ क्यों दिया?”


अरुण ने कहा,


“क्योंकि वह डर रहा है।”


“किससे?”


अरुण ने जवाब नहीं दिया।


वह सिर्फ राजन की डायरी देख रहा था।


24 जुलाई।


“नाम मिल गया।”


---


25 जुलाई की रात।


राजन की आखिरी लोकेशन देवधर इंडस्ट्रीज नहीं थी।


वह शहर के दूसरे हिस्से में थी।


एक पुराने होटल के पास।


अरुण वहाँ पहुँचा।


होटल के सीसीटीवी रिकॉर्ड में राजन दिखाई दिया।


वह अकेला नहीं था।


उसके सामने एक आदमी बैठा था।


चेहरा कैमरे से साफ नहीं था।


लेकिन बातचीत लगभग चालीस मिनट चली।


फिर राजन उठा।


उस आदमी ने उसका हाथ पकड़ा।


राजन ने हाथ छुड़ाया।


और बाहर चला गया।


अरुण ने फुटेज आगे बढ़ाया।


होटल के बाहर एक कार खड़ी थी।


काली कार।


वही मॉडल…


जिसकी डिक्की से राजन की लाश मिली थी।


अभिजीत ने कहा,


“सर…”


अरुण ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।


वह फुटेज को पीछे ले गया।


फिर आगे।


फिर पीछे।


“कार 25 जुलाई को होटल के बाहर थी।”


“जी।”


“लेकिन हमें मिली 28 जुलाई की रात।”


अरुण स्क्रीन को देखता रहा।


फिर धीरे से बोला—


“तो इन तीन दिनों में कार कहाँ थी?”


---


कार की पूरी यात्रा निकाली गई।


25 जुलाई—


होटल।


26 जुलाई—


कोई रिकॉर्ड नहीं।


27 जुलाई—


एक टोल प्लाजा पर कैमरे में दिखाई दी।


28 जुलाई—


अपराध स्थल।


अरुण ने नक्शा सामने फैलाया।


होटल से टोल प्लाजा तक का रास्ता देखा।


फिर टोल प्लाजा से अपराध स्थल तक।


बीच में एक जगह थी।


देवधर इंडस्ट्रीज का पुराना गोदाम नंबर 17।


अरुण कुछ देर चुप रहा।


“तीन दिन…”


अभिजीत ने कहा,


“सर?”


“राजन की लाश तीन दिन तक गोदाम में थी।”


“लेकिन वहाँ तो सिर्फ खून मिला था।”


अरुण ने उसकी तरफ देखा।


“खून मिला था।”


“लाश नहीं।”


“यही तो।”


---


फॉरेंसिक टीम ने गोदाम नंबर 17 फिर से खंगाला।


बहुत देर खंगालने के बाद एक बड़े लोहे के कंटेनर के नीचे से कपड़े का छोटा टुकड़ा मिला।


डीएनए जांच हुई।


राजन का।


लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण चीज कंटेनर के नीचे मिली—


एक बहुत पतली प्लास्टिक शीट।


उस पर जमे खून के निशान थे।


अरुण ने उसे देखा।


फिर कार की डिक्की की तस्वीर देखी।


उसकी आँखें अचानक रुक गईं।


“अभिजीत।”


“जी?”


“डिक्की में खून इतना कम क्यों था?”


अभिजीत ने तस्वीर देखी।


“क्योंकि लाश पहले कहीं और थी।”


अरुण ने सिर हिलाया।


“और जब लाश कार में रखी गई…”


वह रुका।


“उसे धोया गया था।”


अब तीन दिन का पहला हिस्सा साफ था।


राजन 25 जुलाई को गोदाम नंबर 17 में पहुँचा।


वहाँ उसे जहर दिया गया।


वह तुरंत नहीं मरा।


उसे वहीं बंद करके रखा गया।


अगले दिन उसकी हालत बिगड़ी।


27 जुलाई को उसकी मौत हुई।


और 28 जुलाई की रात उसकी लाश कार में डालकर सड़क किनारे छोड़ दी गई।


लेकिन अभी भी एक सवाल था।


जहर किसने दिया?


और…


राजन का सिर किसने काटा?


---


अरुण ने होटल की फुटेज फिर देखी।


इस बार उसने राजन को नहीं देखा।


उसने सामने बैठे आदमी के हाथ देखे।


बाएँ हाथ में एक अंगूठी थी।


काली पत्थर वाली।


अरुण ने कंपनी के वरिष्ठ कर्मचारियों की तस्वीरें निकलवाईं।


एक-एक करके देखता गया।


फिर अचानक एक तस्वीर पर उंगली रख दी।


करण देवधर का निजी सचिव — नितिन देशमुख।


उसकी उंगली में वही अंगूठी थी।


अभिजीत ने तुरंत कहा—


“सर, यही आदमी?”


अरुण ने कहा,


“अभी नहीं।”


“क्यों?”


“क्योंकि अगर यह इतना आसान होता तो राजन तीन दिन तक जिंदा नहीं रहता।”


---


नितिन को बुलाया गया।


उसने होटल जाने से इनकार किया।


अरुण ने उससे सिर्फ एक सवाल पूछा—


“राजन ने 24 जुलाई को तुम्हें क्या बताया था?”


नितिन की आँखें बदल गईं।


बस एक पल के लिए।


लेकिन अरुण ने देख लिया।


“मैं राजन से नहीं मिला।”


अरुण मुस्कुराया।


“ठीक है।”


उसने फाइल बंद की।


“तुम जा सकते हो।”


नितिन उठकर चला गया।


अभिजीत ने पूछा,


“सर, फिर?”


अरुण ने कहा,


“वह राजन को जानता है।”


“आपको कैसे पता?”


“जिस आदमी को किसी बात की जानकारी नहीं होती, वह सवाल सुनकर सोचता है।”


“नितिन?”


“उसने जवाब देने से पहले डर को छिपाया।”


---


उसी रात अरुण को एक फोन आया।


रवि मेहरा गायब था।


उसका शव शहर के बाहर उसकी कार में मिला।


उसे भी जहर दिया गया था।


लेकिन इस बार अरुण को कोई संदेह नहीं था।


कोई सबूत मिटा रहा था।


और अब वह आदमी घबरा चुका था।


---


अरुण ने करण को फिर बुलाया।


“आपके पास एक आखिरी मौका है।”


करण ने थकी आवाज में पूछा,


“क्या जानना चाहते हैं?”


“आपकी कंपनी में नकली बिलों का खेल कौन चला रहा था?”


करण ने आँखें बंद कर लीं।


कुछ देर बाद बोला—


“नितिन।”


अभिजीत ने तुरंत उसकी तरफ देखा।


करण ने कहा—


“मैंने उसे कभी रोकने की कोशिश नहीं की। वह मेरे पुराने साझेदार का आदमी था। धीरे-धीरे उसने कंपनी के कई लोगों को अपने साथ मिला लिया।”


“राजन को यह पता चला?”


“हाँ।”


“और आपने उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”


करण की आवाज टूट गई।


“मैं डर गया था।”


अरुण ने पूछा,


“25 जुलाई को राजन कहाँ था?”


करण ने जवाब दिया—


“नितिन ने उसे गोदाम में बुलाया था।”


अब सब जुड़ने लगा था।


राजन को वहाँ बुलाया गया।


उसे जहर दिया गया।


लेकिन नितिन ने उसका सिर क्यों काटा?


अरुण ने नितिन के घर की तलाशी का आदेश दिया।


घर से एक पुराना बैग मिला।


बैग के अंदर राजन की डायरी थी।


लेकिन डायरी के बीच से एक पन्ना गायब था।


वही पन्ना…


25 जुलाई वाला।


---


नितिन को गिरफ्तार किया गया।


लेकिन उसने हत्या कबूल नहीं की।


“मैंने उसे जहर नहीं दिया।”


अरुण ने कहा,


“तो किसने दिया?”


नितिन चुप।


“राजन के सिर का क्या किया?”


चुप।


“तीन दिन तक लाश कहाँ थी?”


चुप।


अरुण ने मेज पर एक फोटो रखी।


राजन की डायरी का आखिरी पन्ना।


असल में वह पन्ना पुलिस को गोदाम से मिला था।


उस पर सिर्फ एक वाक्य था—


“अगर मुझे कुछ हुआ, तो असली नाम नितिन नहीं है।”


नितिन के चेहरे से रंग उड़ गया।


अरुण पीछे हट गया।


“अब तुम बताओ।”


काफी देर बाद नितिन बोला—


“मैंने उसे नहीं मारा।”


“फिर?”


“मैं सिर्फ उसे वहाँ लेकर गया था।”


“किसके कहने पर?”


नितिन ने सिर उठाया।


और पहली बार उसके चेहरे पर ऐसा डर था जो अरुण ने पहले नहीं देखा था।


“करण के।”


अभिजीत चौंक गया।


लेकिन अरुण शांत रहा।


“करण ने तुम्हें राजन को बुलाने को कहा?”


“हाँ।”


“जहर?”


“करण ने कहा था उसे डराना है।”


“और फिर?”


नितिन ने आँखें बंद कर लीं।


“राजन ने जहर खुद नहीं लिया था।”


अरुण ने धीरे से पूछा—


“किसने मिलाया?”


नितिन ने जवाब नहीं दिया।


अरुण ने उसके सामने होटल की तस्वीर रखी।


“तुम्हारे हाथ में अंगूठी थी।”


नितिन ने कहा—


“मैं वहाँ था।”


“फिर?”


“राजन ने मुझे पहचान लिया।”


“किस रूप में?”


नितिन चुप रहा।


अरुण समझ गया।


नितिन सिर्फ सचिव नहीं था।


वह उस पूरे नेटवर्क का असली संचालक था।


लेकिन फिर भी जहर उसने नहीं दिया था।


---


अरुण ने करण की बेटी को बुलाया।


इस बार सवाल राजन के बारे में नहीं था।


सवाल था—


“तुम्हारे होने वाले पति को नितिन कब से जानता है?”


लड़की ने हैरानी से कहा—


“वे एक-दूसरे को जानते ही नहीं।”


अरुण ने उसकी तरफ देखा।


“पक्का?”


“हाँ।”


अरुण ने सामने एक तस्वीर रखी।


उसके होने वाले पति की।


फिर दूसरी।


नितिन के पुराने व्यापारिक साझेदार की।


चेहरे अलग थे।


लेकिन एक बात समान थी—


दोनों के पास एक ही दुर्लभ घड़ी थी।


अरुण ने कहा—


“तुम्हारा होने वाला पति असल में नितिन का साझेदार है।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


लेकिन यह भी पूरा सच नहीं था।


नितिन सिर्फ उसका आदमी था।


असली आदमी…


करण की बेटी का होने वाला पति।


उसने राजन को जहर दिया था।


क्योंकि राजन ने उसकी असली पहचान ही नहीं…


बल्कि उसके पूरे अपराधी नेटवर्क का सबूत भी खोज लिया था।


लेकिन वह अकेला नहीं था।


करण सब जानता था।


फिर भी उसने पुलिस को क्यों नहीं बताया?


क्योंकि शादी से सिर्फ एक दिन पहले उसे पता चला कि उसकी बेटी का होने वाला पति वही आदमी है जिसने वर्षों पहले करण के परिवार को बर्बाद करने वाले पुराने साझेदार को धोखा देकर उसकी कंपनी में प्रवेश किया था।


करण अपनी बेटी को बचाना चाहता था।


और इसी डर में उसने सबसे बड़ी गलती की—


राजन की मौत छिपा दी।


---


अब सिर्फ सिर का रहस्य बचा था।


अरुण ने नितिन से पूछा—


“राजन का सिर किसने काटा?”


नितिन ने धीरे से कहा—


“मैंने।”


“क्यों?”


“क्योंकि…”


वह रुक गया।


“क्योंकि उसका चेहरा हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा था।”


अरुण ने उसकी तरफ देखा।


नितिन ने कहा—


“राजन के फोन में उस आदमी की तस्वीर थी।”


“किसकी?”


नितिन चुप रहा।


अरुण ने जवाब खुद दिया—


“करण की बेटी के होने वाले पति की।”


नितिन ने सिर झुका दिया।


“अगर राजन की पहचान हो जाती और उसका फोन पुलिस के हाथ लग जाता, तो सब खत्म हो जाता।”


अब अरुण को समझ आ गया।


राजन का सिर इसलिए नहीं काटा गया था कि पहचान हमेशा के लिए छिप जाए।


बल्कि इसलिए कि पहचान देर से हो।


तीन दिन का समय चाहिए था।


इतना समय…


जिसमें फोन से डेटा मिटाया जा सके।


गवाहों को डराया जा सके।


रिकॉर्ड बदले जा सकें।


और राजन की मौत को एक अनजान लाश बना दिया जाए।


लेकिन एक चीज वे भूल गए थे।


राजन ने अपना सबसे महत्वपूर्ण सबूत फोन में नहीं रखा था।


उसने वह सबूत अपनी डायरी में लिखा था।


और उसी डायरी ने अरुण को तीन दिनों तक पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया।


करण की बेटी का होने वाला पति गिरफ्तार हुआ।


उसके खिलाफ राजन की हत्या, अवैध वित्तीय नेटवर्क और कई पुराने मामलों के सबूत मिले।


नितिन और कुछ अन्य लोग भी गिरफ्तार हुए।


करण पर हत्या का आरोप नहीं लगा।


लेकिन सबूत छिपाने और पुलिस को गुमराह करने के आरोप में उसके खिलाफ मामला दर्ज हुआ।


उसकी बेटी की शादी नहीं हुई।


और तीन दिन तक चलने वाला वह रहस्य आखिर खत्म हो गया।


---


कुछ दिन बाद अभिजीत अरुण के ऑफिस में बैठा था।


उसने पूछा,


“सर, एक बात अभी भी समझ नहीं आई।”


अरुण ने फाइल से नजर उठाई।


“क्या?”


“आपको कब समझ आया कि राजन की हत्या 25 जुलाई को नहीं हुई थी?”


अरुण मुस्कुराया।


“जब मैंने कार के टायर देखे थे।”


“टायर?”


“हाँ।”


“उससे?”


अरुण ने कहा—


“कार सड़क पर 28 जुलाई की रात लाई गई थी। लेकिन शव के कपड़ों पर तीन दिन पुराने गोदाम की धूल और तेल के निशान थे।”


“तो?”


“मतलब लाश कार में बाद में आई।”


अभिजीत कुछ देर सोचता रहा।


“और फिर आपने तीन दिन पर ध्यान दिया।”


अरुण ने सिर हिलाया।


“इस केस में सबसे बड़ा सुराग खून नहीं था।”


“फिर?”


अरुण ने फाइल बंद की।


“समय।”


वह खिड़की के बाहर देखने लगा।


“हत्या छिपाई जा सकती है।”


“सबूत मिटाए जा सकते हैं।”


“लाश भी छिपाई जा सकती है।”


फिर उसने धीरे से कहा—


“लेकिन बीते हुए तीन दिन…”


वह मुस्कुराया।


“उन्हें कोई नहीं छिपा सकता।”


केस बंद।

मम्मी का श्राप


फिल्मी पोस्टर शैली में मम्मी का श्राप, जिसमें विशाल मम्मी, पिरामिड और चार मुख्य पात्र दिखाई दे रहे हैं।
कुछ कब्रें इसलिए नहीं खोली जातीं क्योंकि उनके अंदर खजाना नहीं, बल्कि इंतजार होता है। क्या आप रानी नेफेरु-सा के श्राप का सामना करने के लिए तैयार हैं?



  भाग 1

भूली हुई घाटी


मिस्र की रातें अजीब होती हैं।


दिन में वही रेगिस्तान, जो दूर-दूर तक फैले सुनहरे समुद्र जैसा दिखाई देता है, रात होते ही अपना रूप बदल लेता है। हवा ठंडी हो जाती है, रेत फुसफुसाने लगती है और पुराने खंडहर ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे किसी का इंतजार कर रहे हों।


लक्सर के पुराने बाजार में एक कहावत आज भी सुनाई देती है—


"कुछ कब्रें इसलिए नहीं खोली जातीं क्योंकि उनके अंदर खजाना नहीं, बल्कि इंतजार होता है।"


डॉ. अन्ना मूलर ने यह बात पहली बार एक बूढ़े दुकानदार से सुनी थी।


वह मुस्कुराई और अपनी डायरी में उसे लिख लिया।


अन्ना पिछले पंद्रह वर्षों से मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं का अध्ययन कर रही थी। उसने अनगिनत कब्रें देखी थीं, सैकड़ों शिलालेख पढ़े थे और कई ऐसी कहानियां भी सुनी थीं जिन्हें लोग श्राप का नाम देते थे।


लेकिन वह श्रापों पर विश्वास नहीं करती थी।


कम से कम, तब तक नहीं।


---


तीन सप्ताह पहले, अमेरिका के बोस्टन में एक निजी नीलामी के दौरान एक पुराना चमड़े का नक्शा सामने आया था।


नक्शा अधूरा था।


उसके किनारे जले हुए थे और उस पर बने अधिकांश चिन्ह मिट चुके थे। लेकिन एक नाम अब भी साफ दिखाई देता था—


"नेफेरु-सा"


इतिहास में इस नाम की किसी रानी का कोई उल्लेख नहीं था।


यही बात डॉ. एमिली कार्टर को बेचैन कर रही थी।


"अगर इतिहास ने उसका नाम भुला दिया," एमिली ने कहा था, "तो शायद किसी ने जानबूझकर उसे भुलाया है।"


और इसी एक वाक्य ने इस अभियान को जन्म दिया।


दो हफ्ते बाद, एमिली, जेम्स और अन्ना मिस्र पहुंच चुके थे।


लक्सर हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही उन्हें ऐसा लगा मानो वे किसी दूसरे समय में आ गए हों।


पुरानी इमारतें, बाजारों में जलते पीले लैम्प, दूर दिखाई देते मंदिर और हवा में उड़ती महीन रेत...


जेम्स ने कैमरा निकालते हुए कहा, "अगर मैं यहां मर गया, तो कम से कम मेरी आखिरी तस्वीरें शानदार होंगी।"


"तुम हमेशा मरने की बात क्यों करते हो?" एमिली ने पूछा।


"क्योंकि पुरातत्वविदों की नौकरी में दो ही चीजें मिलती हैं—पुरानी हड्डियां और खराब नींद।"


अन्ना ने हल्की मुस्कान दी।


---


अगली सुबह वे अपने स्थानीय गाइड से मिले।


उसका नाम था—हसन एल-मसरी।


वह चालीस के आसपास का आदमी था। उसकी घनी मूंछें थीं, सिर पर सफेद कपड़ा बंधा रहता था और उसकी आंखों में हमेशा शरारत दिखाई देती थी।


"आप लोग वही हैं जो मरने के लिए सबसे महंगी जगह चुनकर आए हैं?" उसने उनसे मिलते ही पूछा।


जेम्स हंस पड़ा।


"और तुम वही हो जो हमें वहां ले जाने के लिए पैसे ले रहे हो?"


"बिल्कुल!" हसन ने गर्व से कहा। "मिस्र में दो चीजें कभी मुफ्त नहीं मिलतीं—पानी और राज़।"


अगले एक घंटे तक हसन उन्हें लक्सर घुमाता रहा और लगातार मजाक करता रहा।


लेकिन जैसे ही एमिली ने उसे नक्शा दिखाया, उसके चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।


उसने नक्शे को कुछ सेकंड तक देखा।


फिर बिना कुछ कहे उसे वापस कर दिया।


"मैं इस जगह को जानता हूं," उसने धीमी आवाज में कहा।


"तो फिर समस्या क्या है?" अन्ना ने पूछा।


हसन ने जवाब देने से पहले आसपास देखा, मानो यह सुनिश्चित कर रहा हो कि कोई सुन तो नहीं रहा।


"मेरे दादा उस घाटी के बारे में कहानियां सुनाते थे। कहते थे कि वहां एक रानी सोती है, जिसे मौत के बाद भी अकेला नहीं छोड़ा गया।"


जेम्स ने आंखें घुमाईं।


"और मुझे यकीन है कि कहानी के अंत में कोई श्राप भी होगा।"


हसन ने उसकी ओर देखा।


"नहीं।"


"नहीं?"


"क्योंकि यह कहानी कभी खत्म नहीं हुई।"


कुछ क्षणों के लिए वहां सन्नाटा छा गया।


फिर हसन अचानक हंस पड़ा।


"लेकिन अगर आप लोग मुझे पांच हजार डॉलर देंगे, तो मैं आपको वहां ले चलूंगा!"


---



दो दिन बाद, वे रेगिस्तान की ओर निकल पड़े।


उनके साथ चार ऊंट, जरूरी सामान और एक स्थानीय मजदूरों की छोटी टीम भी थी।


पहले दिन की यात्रा सामान्य रही।


लेकिन दूसरे दिन से चीजें बदलने लगीं।


उनका कम्पास ठीक से काम नहीं कर रहा था।


सैटेलाइट फोन बार-बार बंद हो रहा था।


और सबसे अजीब बात...


हर सुबह उन्हें अपने शिविर के चारों ओर किसी के पैरों के निशान दिखाई देते।


"शायद कोई जानवर होगा," जेम्स ने कहा।


लेकिन अन्ना सहमत नहीं थी।


"रेगिस्तान में कोई जानवर सीधे गोल घेरा बनाकर नहीं चलता।"


तीसरी रात, हसन सामान्य से ज्यादा शांत था।


वह आग के पास बैठा हुआ था और पहली बार उसने कोई मजाक नहीं किया।


"क्या हुआ?" एमिली ने पूछा।


हसन कुछ देर चुप रहा।


"जब मैं छोटा था, मेरे दादा ने मुझसे कहा था कि अगर कभी भूली हुई घाटी जाओ और रात में कोई तुम्हारा नाम पुकारे..."


"तो?"


"पीछे मत मुड़ना।"


जेम्स मुस्कुराया।


"और अगर वह मेरा बैंक मैनेजर हुआ तो?"


इस बार हसन नहीं हंसा।


---


मिस्र के लक्सर के पास भूली हुई घाटी के प्रवेश द्वार पर खड़े चार पुरातत्वविद और उनका स्थानीय गाइड।
लक्सर के रेगिस्तान में छिपी एक प्राचीन घाटी, जहां हजारों वर्षों से बंद एक कब्र अपने अगले आगंतुक का इंतजार कर रही थी।



अगली सुबह वे घाटी तक पहुंच गए।


वह जगह किसी कब्रिस्तान से ज्यादा एक घाव जैसी लग रही थी।


दो विशाल चट्टानों के बीच एक लंबा रास्ता था, जिसके अंत में रेत में आधा दबा हुआ एक प्राचीन द्वार खड़ा था।


उस द्वार को देखकर अन्ना की सांसें थम गईं।


उसने पहले भी मिस्र की कई कब्रें देखी थीं, लेकिन ऐसी नहीं।


द्वार के ऊपर उकेरी गई आकृतियां अजीब थीं।


उनमें रानी नेफेरु-सा को दिखाया गया था...


लेकिन हर चित्र में उसकी आंखें खुरचकर मिटा दी गई थीं।


"यह किसने किया होगा?" एमिली ने पूछा।


अन्ना ने सिर हिलाया।


"मुझे नहीं पता। लेकिन मिस्र में आंखें मिटाने का मतलब होता है किसी की आत्मा को इतिहास से मिटा देना।"


हसन धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।


"मुझे यह जगह पसंद नहीं आ रही।"


"तुम तो श्रापों पर विश्वास नहीं करते थे।"


"मैं आज भी नहीं करता," हसन बोला, "लेकिन मैं उन लोगों पर विश्वास करता हूं जिन्होंने इन श्रापों को बनाने में पूरी जिंदगी लगा दी।"


तीन घंटे की मेहनत के बाद आखिरकार द्वार खोला गया।


और जैसे ही वह खुला...


घाटी में अचानक तेज हवा चलने लगी।


रेत का बवंडर उठा।


मजदूरों में से एक घुटनों के बल बैठ गया और अरबी में प्रार्थना करने लगा।


द्वार के भीतर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।


हजारों वर्षों से बंद एक जगह के अंदर इतनी ठंडी हवा नहीं होनी चाहिए थी।


एमिली ने टॉर्च जलाई।


और फिर चारों अंदर चले गए।


उन्हें नहीं पता था कि उस क्षण से उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी थी।


---


उस रात उन्होंने कब्र के बाहर ही शिविर लगाया।


रात के लगभग तीन बजे...


एमिली की आंख अचानक खुल गई।


उसे लगा कि कोई उसके तंबू के बाहर धीरे-धीरे चल रहा है।


खर्र...


खर्र...


जैसे कोई भारी चीज रेत पर घसीटते हुए चल रही हो।


उसने अपनी घड़ी देखी।


3:07 AM.


आवाज फिर आई।


इस बार पहले से ज्यादा पास।


आधी रात को मिस्र के रेगिस्तान में तंबू के बाहर अजीब पैरों के निशान देखते हुए एक महिला पुरातत्वविद।
रात के तीन बजे, रेत पर बने पट्टियों में लिपटे पैरों के निशान और अंधेरे में गूंजती एक रहस्यमयी आवाज—"उसे बता दो... उसने मेरी अंगूठी चुरा ली है।"



एमिली ने धीरे-धीरे टॉर्च उठाई और तंबू का पर्दा हटाया।


बाहर कोई नहीं था।


लेकिन रेत पर बने निशान शिविर के चारों ओर घूमते हुए सीधे उसके तंबू तक आकर खत्म हो रहे थे।


वह झुककर उन्हें देखने लगी।


वे इंसानी पैरों के निशान नहीं थे।


वे किसी ऐसे व्यक्ति के निशान थे जिसके पैर मोटी पट्टियों में लिपटे हुए थे।


तभी...


उसके कान के बिल्कुल पास किसी महिला ने बहुत धीमी आवाज में फुसफुसाया—


"उसे बता दो... उसने मेरी अंगूठी चुरा ली है।"


एमिली का खून जम गया।


क्योंकि वह आवाज उसके पीछे से नहीं...


बल्कि उसके ठीक बगल से आई थी।



मम्मी का श्राप – भाग 2


अगला रक्षक


एमिली का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।


उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।


वहां कोई नहीं था।


रेगिस्तान शांत था। दूर जलती आग की लपटें हवा के साथ हिल रही थीं और बाकी तंबुओं में सन्नाटा पसरा हुआ था।


लेकिन वह आवाज...


वह बिल्कुल साफ थी।


"उसे बता दो... उसने मेरी अंगूठी चुरा ली है।"


एमिली ने खुद को समझाने की कोशिश की। शायद वह थकी हुई थी। पिछले कई दिनों से वे लगातार यात्रा कर रहे थे।


लेकिन तभी उसकी नजर रेत पर पड़े उन निशानों पर गई।


वे निशान शिविर के चारों ओर घूमते हुए सीधे हसन के तंबू तक जा रहे थे।


और वहीं खत्म हो रहे थे।


---


अगली सुबह, एमिली ने सबको रात की घटना बताई।


जेम्स ने पहले तो इसे नींद और तनाव का असर बताया, लेकिन अन्ना चुप रही।


वह हसन को ध्यान से देख रही थी।


उसकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ चुके थे।


"तुम ठीक तो हो?" उसने पूछा।


"मैंने पूरी रात नहीं सोई," हसन ने जवाब दिया।


"क्यों?"


कुछ सेकंड तक वह चुप रहा।


फिर उसने धीमी आवाज में कहा, "क्योंकि पूरी रात कोई मेरे तंबू के बाहर खड़ा रहा।"


शिविर में अचानक सन्नाटा छा गया।


"तुमने देखा उसे?" जेम्स ने पूछा।


हसन ने सिर हिलाया।


"नहीं... लेकिन मैं उसकी सांसें सुन सकता था।"


---


उस दिन वे दोबारा कब्र के अंदर गए।


कब्र पहले से कहीं ज्यादा अंधेरी लग रही थी।


जैसे दीवारों ने रात भर में और भी पुरानी यादें अपने अंदर समेट ली हों।


मुख्य कक्ष में पहुंचकर अन्ना अचानक रुक गई।


"यह असंभव है..."


"क्या हुआ?" एमिली ने पूछा।


अन्ना ने दीवार की ओर इशारा किया।


कल जहां केवल रानी नेफेरु-सा का चित्र बना हुआ था, वहां अब एक और आकृति दिखाई दे रही थी।


एक आदमी...


उसके सिर पर मिस्री रक्षकों जैसा मुकुट था।


और उसके हाथ में एक छोटी-सी अंगूठी बनी हुई थी।


चित्र के नीचे प्राचीन भाषा में एक शब्द लिखा था—


"रक्षक"


"यह कल यहां नहीं था," अन्ना बुदबुदाई।


जेम्स ने तस्वीरें खींचनी शुरू कर दीं।


"शायद हमने ध्यान नहीं दिया होगा।"


"नहीं," अन्ना ने दृढ़ स्वर में कहा। "मैंने इस पूरी दीवार की तस्वीरें ली थीं। यह चित्र यहां नहीं था।"


तभी हसन अचानक घबराकर पीछे हट गया।


उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।


"मुझे यहां से बाहर जाना है।"


"क्यों?"


हसन ने जवाब नहीं दिया।


उसने कांपते हुए अपनी जेब में हाथ डाला।


और एक सोने की अंगूठी बाहर निकाली।


पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।


"तुमने यह कब ली?" एमिली लगभग चिल्ला पड़ी।


"मैं... मैं सिर्फ इसे देखना चाहता था।"


अंगूठी पर बेहद बारीक अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।


अन्ना ने उसे पढ़ने की कोशिश की।


उसका चेहरा सफेद पड़ गया।


"इस पर लिखा है—'जो मुझे जगाएगा, वही मेरी जगह लेगा।'"


---


उसी क्षण, कब्र के अंदर कहीं दूर से खट... खट... खट... की आवाज आने लगी।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई पत्थर पर धीरे-धीरे चल रहा हो।


आवाज पास आती गई।


खट...


खट...


खट...


फिर अचानक बंद हो गई।


कुछ पल बाद, जेम्स ने कांपती आवाज में कहा, "कृपया मुझे बताओ कि यह आवाज तुम सबने भी सुनी है।"


तभी मुख्य कक्ष के बीच रखा पत्थर का ताबूत धीरे-धीरे हिलने लगा।


सदियों पुराना उसका ढक्कन कुछ इंच खिसका।


और कमरे में एक ऐसी गंध फैल गई, जैसे किसी बंद जगह को हजारों साल बाद खोला गया हो।


हसन पीछे हटते हुए दीवार से टकरा गया।


"मैंने जानबूझकर नहीं लिया था!"


ताबूत का ढक्कन और खिसका।


अंदर अंधेरा था।


लेकिन उस अंधेरे में दो आंखें दिखाई दे रही थीं।


वे इंसानी आंखें नहीं थीं।


वे पूरी तरह काली थीं।


और वे सीधे हसन को देख रही थीं।


---


हसन चीख पड़ा और घुटनों के बल बैठ गया।


"मुझे माफ कर दो!"


अचानक उसे कुछ याद आया।


"मेरे दादा ने... उन्होंने मुझे कुछ बताया था।"


"क्या?" एमिली ने पूछा।


"उन्होंने कहा था कि रानी नेफेरु-सा को उसके दुश्मनों ने नहीं मारा था। उसने खुद को जिंदा दफना दिया था।"


"क्या?"


"उसका मानना था कि एक दिन कोई उसका विश्राम भंग करेगा। इसलिए उसने अपनी आत्मा को अपनी कब्र से बांध दिया। लेकिन... लेकिन कोई आत्मा हमेशा के लिए जाग नहीं सकती। उसे समय-समय पर आराम चाहिए।"


अन्ना की आंखें फैल गईं।


"और उस दौरान उसकी जगह कोई और लेता है।"


हसन ने सिर झुका लिया।


"रक्षक।"


---


ताबूत अब पूरी तरह खुल चुका था।


लेकिन अंदर जो था, उसे देखकर सबकी सांसें थम गईं।


ताबूत खाली था।


रानी नेफेरु-सा वहां नहीं थी।


केवल सूखी पट्टियां और धूल बची थी।


तभी कमरे के दूसरे छोर से एक महिला की आवाज गूंजी—


"इतने वर्षों बाद... आखिर कोई आया।"


एमिली ने पीछे मुड़कर देखा।


कमरे के अंधेरे कोने में एक लंबी आकृति खड़ी थी।


उसका शरीर पट्टियों में लिपटा हुआ था।


लेकिन उसका चेहरा...


वह किसी ममी का नहीं, बल्कि एक जीवित महिला का लग रहा था।


उसने हसन की ओर हाथ बढ़ाया।


"मैं थक गई हूं..."


हसन की आंखों से आंसू बहने लगे।


"नहीं..."


"हर श्राप को एक उत्तराधिकारी चाहिए।"


अंगूठी अचानक हसन की उंगली में अपने आप चढ़ गई।


और उसी क्षण, उसके शरीर पर पट्टियां उभरने लगीं।


वह दर्द से चीखने लगा।


प्राचीन मिस्री कब्र के अंदर मम्मी में बदलता हुआ हसन एल-मसरी और पीछे खड़ी रानी नेफेरु-सा की आत्मा।
श्राप का एक उत्तराधिकारी होता है। रानी नेफेरु-सा की सदियों पुरानी नींद आखिरकार टूट चुकी थी, और अब उसे एक नया रक्षक मिल गया था।



एमिली और जेम्स उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़े, लेकिन अन्ना ने उन्हें रोक दिया।


"नहीं! अब बहुत देर हो चुकी है।"


कुछ ही सेकंड में सब खत्म हो गया।


कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।


रानी नेफेरु-सा गायब हो चुकी थी।


और जहां हसन खड़ा था...


वहां अब पट्टियों में लिपटा एक नया रक्षक खड़ा था।


---


टीम किसी तरह वहां से बाहर निकलने में सफल रही।


उन्होंने कभी इस घटना के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।


दुनिया के लिए यह अभियान असफल रहा।


और हसन एल-मसरी इतिहास के पन्नों से गायब हो गया।


---


तीन महीने बाद...


डॉ. अन्ना मूलर को जर्मनी में एक पार्सल मिला।


उसके अंदर केवल एक पुरानी तस्वीर थी।


तस्वीर उसी कब्र की थी।


इस बार ताबूत बंद था।


उसके सामने पट्टियों में लिपटा एक आदमी खड़ा था।


लेकिन सबसे डरावनी बात तस्वीर नहीं थी।


तस्वीर के पीछे हाथ से एक वाक्य लिखा गया था—


«"मैं अब समझ गया हूं कि मेरे दादा कभी उस घाटी का नाम क्यों नहीं लेते थे। और अन्ना... कृपया किसी को यहां मत आने देना। मैं बहुत थक चुका हूं।"»


नीचे एक हस्ताक्षर था।


—हसन एल-मसरी


अन्ना के हाथ कांपने लगे।


क्योंकि तस्वीर के कोने पर तारीख लिखी हुई थी।


और वह तारीख...


तीन दिन बाद की थी।



खुनी खजाना



भाग 1 : सोने का सिक्का

रात के करीब नौ बजे होंगे।


बारिश अभी-अभी रुकी थी। सड़क किनारे बनी छोटी-सी चाय की टपरी पर चार आदमी चुपचाप बैठे थे। उनके कपड़ों पर सीमेंट और मिट्टी लगी हुई थी। दिनभर की मजदूरी के बाद हर चेहरे पर वही थकान थी, जो सालों से उनके साथ घर जाती थी।


"आज कितने मिले?" रघु ने चाय का आखिरी घूंट लेते हुए पूछा।


"चार सौ।"


"मेरे साढ़े तीन सौ।"


"और मेरे तीन सौ पचहत्तर।"


कुछ पल के लिए फिर सन्नाटा छा गया।


टपरी के बाहर बारिश का पानी अभी भी टप-टप करके टीन की छत से गिर रहा था। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।


कोड़ा बस सामने फैले अंधेरे को देखे जा रहा था।


"क्या हुआ?" बबलू ने पूछा।


कोड़ा ने बिना उसकी ओर देखे कहा, "अगर मैं कहूं कि हम चारों कल सुबह तक अमीर हो सकते हैं?"

बारिश भरी रात में सड़क किनारे चाय की टपरी पर बैठे चार मजदूर एक रहस्यमयी सोने के सिक्के को हैरानी से देखते हुए।
जंगल के किनारे खड़ा वह बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था। उसकी एक मुस्कान ने चार जिंदगियों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।



तीनों एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।


फिर मंग्या हंस पड़ा।


"पहले भी तू दो बार अमीर बन चुका है। एक बार लॉटरी से और दूसरी बार सपने में।"


इस बार कोड़ा नहीं हंसा।


उसने धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला और मेज पर एक छोटी-सी चीज रख दी।


वह एक पुराना सोने का सिक्का था।


टपरी के ऊपर लटकता बल्ब अचानक एक बार टिमटिमाया।


तीनों की नजरें सिक्के पर टिक गईं।


"ये नकली होगा," रघु बोला।


"मैं भी यही सोच रहा था।" कोड़ा की आवाज धीमी थी, "लेकिन शहर के सुनार ने इसके बदले पंद्रह हजार रुपये देने की बात कही है।"


मंग्या के चेहरे की हंसी गायब हो गई।


"कहां मिला?"


कोड़ा कुछ पल चुप रहा। उसकी आंखें सड़क के उस पार अंधेरे में टिकी थीं।


"अगर बताऊं... तो शायद तुम लोग आज रात सो नहीं पाओगे।"


अब वहां बैठे चारों आदमियों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज थी।


"तीन रात पहले मैं काम से लौट रहा था। रास्ते में एक बूढ़ा मिला। मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।"


"कैसा बूढ़ा?"


"दुबला-पतला। सफेद धोती। हाथ में लालटेन।"


"फिर?"


"उसने मुझे नाम लेकर बुलाया।"


तीनों चौंक गए।


"नाम लेकर?"


कोड़ा ने सिर हिलाया।


"उसने कहा—'कोड़ा, बहुत मेहनत कर ली। अब वक्त है कि किस्मत तेरे दरवाजे पर आए।'"


"तू उसके साथ चला गया?" बबलू ने पूछा।


"नहीं। पहले तो मुझे लगा कि कोई पागल है। लेकिन फिर उसने ये सिक्का मेरी हथेली पर रख दिया।"


कोड़ा ने सिक्के की ओर इशारा किया।


"और जाने से पहले उसने एक बात कही..."


"क्या?"


कोड़ा की आवाज लगभग फुसफुसाहट में बदल गई।


«"कुछ खजाने जमीन में इसलिए नहीं दबाए जाते कि लोग उन्हें ढूंढ़ लें... बल्कि इसलिए कि वे लोगों को अपने पास बुला सकें।"»


मंग्या ने हंसने की कोशिश की, लेकिन उसकी हंसी गले में ही अटक गई।



"फिर?"


"अगली रात मैं वापस गया।"


"अकेला?"


"हां।"


"और?"


कोड़ा ने गहरी सांस ली।


"मैंने उसे फिर देखा। वह जंगल के किनारे खड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा। बस उंगली से अंदर जाने का इशारा किया।"


अब टपरी वाला भी उनकी बातें सुन रहा था।


"मैं उसके पीछे-पीछे गया। करीब दस मिनट बाद वह अचानक गायब हो गया। जैसे था ही नहीं।"


"झूठ।" रघु बोला, लेकिन उसकी आवाज में पहले जैसा भरोसा नहीं था।


"काश, झूठ होता।"


कोड़ा ने आगे कहा, "और फिर मैंने उसे देखा।"


"किसे?"


"जमीन को।"


"क्या मतलब?"


"जंगल के बीचों-बीच... मिट्टी के नीचे से सुनहरी रोशनी निकल रही थी। बिल्कुल ऐसे, जैसे किसी ने धरती के नीचे सूरज छिपा दिया हो।"


एक पल के लिए किसी ने कुछ नहीं कहा।


गरीबी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है। यहां तक कि वह उन बातों पर भी विश्वास करने लगता है, जिन पर कभी हंसता था।


"अगर वहां और सिक्के हुए तो?" बबलू ने धीरे से पूछा।


कोड़ा ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।


"इसीलिए तो मैं तुम लोगों को बता रहा हूं।"


रघु उठकर खड़ा हो गया।


"मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा।"


"ठीक?" कोड़ा हंसा। "क्या हमारी जिंदगी ठीक है? सुबह से शाम तक मरते हैं और महीने के आखिर में जेब में पांच सौ भी नहीं बचते।"


किसी के पास इसका जवाब नहीं था।


कुछ देर बाद मंग्या बोला, "अगर जाना है... तो आज ही चलते हैं।"


"आज?"


"हां। जितनी देर करेंगे, उतना दिमाग हमें रोकेगा।"


रघु ने मना करने की कोशिश की, लेकिन बाकी तीनों का फैसला हो चुका था।


रात के ग्यारह बजे, चारों हाथों में टॉर्च और फावड़े लिए जंगल की ओर निकल पड़े।


जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, हवा ठंडी होती जा रही थी।


जंगल का रास्ता कीचड़ से भरा था। ऊपर बादल चांद को बार-बार ढक रहे थे।


तभी...


चारों एक साथ रुक गए।


जंगल के ठीक किनारे, एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा था।


उसके हाथ में लालटेन थी।


टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।


वह वही बूढ़ा आदमी था।


लेकिन इस बार...


उसकी आंखों में काली पुतलियां नहीं थीं।


वे पूरी तरह सफेद थीं।


और वह मुस्कुरा रहा था।


भाग 2 : जंगल की फुसफुसाहट


कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।


बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। बूढ़ा पेड़ के नीचे बिल्कुल स्थिर खड़ा था। उसकी सफेद आंखें चारों को ऐसे देख रही थीं, जैसे वह उनके आने का इंतजार कर रहा हो।

आधी रात के घने जंगल में सफेद आंखों वाला बूढ़ा लालटेन लिए चार मजदूरों को अंधेरे की ओर बुलाते हुए।
जंगल के किनारे खड़ा वह बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था। उसकी एक मुस्कान ने चार जिंदगियों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।


"मैंने कहा था न... यही है वो।" कोड़ा की आवाज कांप रही थी।


"चलो यहां से!" रघु लगभग चिल्ला पड़ा।


लेकिन तभी बूढ़ा मुड़ा और बिना कुछ कहे जंगल के अंदर चलने लगा।


उसकी लालटेन की पीली रोशनी अंधेरे में धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी।


"वह हमें बुला रहा है।" बबलू ने कहा।


"और अगर जाल में फंसा रहा हो तो?" रघु ने जवाब दिया।


कोड़ा ने अपनी मुट्ठी में सोने का सिक्का कस लिया।


"अगर वह हमें मारना चाहता, तो तीन दिन पहले ही मार देता।"


यह तर्क कमजोर था, लेकिन लालच अक्सर कमजोर तर्कों को भी मजबूत बना देता है।


कुछ क्षण बाद चारों उसके पीछे चल पड़े।


जंगल के अंदर हवा और ठंडी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे हर कदम के साथ वे किसी और ही दुनिया में प्रवेश कर रहे हों।

चलते-चलते मंग्या अचानक रुक गया।


"ये देखो।"


एक पेड़ के तने पर किसी ने गहरे निशान बनाए हुए थे। वे किसी भाषा के अक्षर नहीं थे, लेकिन उन्हें देखकर अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।


"शायद किसी ने मजाक किया होगा।" बबलू बोला।


तभी उन्हें एहसास हुआ कि बूढ़ा काफी आगे निकल चुका था।


वे जल्दी-जल्दी उसके पीछे बढ़े।


करीब बीस मिनट तक चलने के बाद वे एक पुराने कुएं के पास पहुंचे।


कुएं के चारों ओर घास उगी हुई थी। उसके पत्थरों पर काई जमी थी।


बूढ़ा कुएं के पास खड़ा था।


फिर पहली बार उसने कुछ कहा।


"नीचे मत देखना।"


उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि लगा जैसे हवा बोल रही हो।


"क्यों?" कोड़ा के मुंह से निकल गया।


बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।


और फिर...


वह आगे बढ़ गया।


चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद बबलू खुद को रोक नहीं पाया।


उसने पलटकर कुएं के अंदर झांका।


अगले ही पल उसका चेहरा सफेद पड़ गया।


"क्या हुआ?" मंग्या ने उसका कंधा पकड़कर पूछा।


बबलू के होंठ कांप रहे थे।


"नीचे... नीचे कोई खड़ा है।"


तीनों ने एक साथ कुएं में देखा।


अंदर सिर्फ अंधेरा था।


"वहां कोई नहीं है।"


"था!" बबलू लगभग रोने लगा। "मैंने देखा। उसने ऊपर देखकर मुस्कुराया था।"


रघु ने उसका हाथ पकड़ा।


"बस! बहुत हो गया। हम वापस जा रहे हैं।"


लेकिन उसी समय उन्हें फिर वह लालटेन दिखाई दी।


बूढ़ा अब कुछ दूर एक खंडहर के सामने खड़ा था।


वह एक पुराना मंदिर था।


उसकी आधी छत गिर चुकी थी। टूटी हुई मूर्तियां मिट्टी में दबी थीं। मंदिर के सामने की जमीन बाकी जगहों से अलग दिख रही थी, जैसे उसे कई बार खोदा गया हो।


बूढ़े ने धीरे से अपनी उंगली उस जमीन की ओर कर दी।


"यहीं है।"


"क्या?" कोड़ा ने पूछा।


बूढ़ा मुस्कुराया।


"जिसकी तलाश तुम्हें यहां खींच लाई।"


अचानक लालटेन बुझ गई।


और जब कोड़ा ने टॉर्च की रोशनी आगे की...


वह गायब हो चुका था।


अब वहां सिर्फ चार आदमी और उनके दिलों की धड़कनें थीं।


"हमें जाना चाहिए।" रघु बोला।


लेकिन तभी मंग्या घुटनों के बल बैठ गया और मिट्टी खोदने लगा।


"इतनी दूर आए हैं। खाली हाथ नहीं लौटूंगा।"


कुछ क्षण बाद बाकी तीनों ने भी फावड़े उठा लिए।


पहले दस मिनट तक कुछ नहीं मिला।


फिर...


"टन!"


रघु का फावड़ा किसी कठोर चीज से टकराया।


उसने मिट्टी हटाई।


वह एक सोने का सिक्का था।


फिर दूसरा।


फिर तीसरा।


कुछ ही देर में उनके पैरों के पास सिक्कों का छोटा-सा ढेर लग गया।

खंडहर मंदिर के बीच जमीन से निकला विशाल संदूक, काला धुआं और डरे हुए मजदूरों का भयावह दृश्य।
संदूक में सोना नहीं, बल्कि सदियों पुराना श्राप उनका इंतजार कर रहा था। उस रात खजाने ने अपना नया रखवाला चुन लिया।


"हम सचमुच अमीर हो गए!" मंग्या खुशी से चिल्लाया।


और तभी...


जंगल में फैली हर आवाज अचानक बंद हो गई।


न हवा।


न झींगुर।


न बारिश।


सिर्फ सन्नाटा।


कोड़ा के कान के पास किसी ने बहुत धीरे से फुसफुसाया—


«"और गहरा खोदो..."»


उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।


कोई नहीं था।


"तुमने कुछ कहा?" उसने पूछा।


तीनों ने ना में सिर हिलाया।


फिर वही आवाज आई।


इस बार थोड़ी तेज।


«"और... गहरा... खोदो..."»


अब चारों ने उसे सुना था।


बबलू के हाथ से फावड़ा छूट गया।


"मैं जा रहा हूं।"


लेकिन तभी जमीन के नीचे से कुछ हिलने लगा।


रघु ने कांपते हुए मिट्टी हटाई।


पहले उसे लगा कि यह कोई जड़ है।


फिर वह जड़ मुड़ी।


और उसकी उंगलियां दिखाई दीं।


वह इंसानी हाथ था।


अचानक उस हाथ ने मिट्टी से बाहर आकर कोड़ा की कलाई कसकर पकड़ ली।


जंगल में पहली बार किसी की चीख गूंजी।


और उसी पल...


मंदिर के पीछे से किसी के हंसने की आवाज आई।


भाग 3 : आखिरी रखवाला


कोड़ा दर्द से चीख उठा।


उसने पूरी ताकत से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी से निकला वह हाथ किसी इंसान का नहीं लग रहा था। उसकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी।


"खींचो उसे!" रघु चिल्लाया।


मंग्या और बबलू ने कोड़ा को पीछे खींचना शुरू किया।


कुछ सेकंड बाद वह हाथ अचानक ढीला पड़ गया और वापस मिट्टी के अंदर चला गया।


चारों हांफ रहे थे।


"बस! अब बहुत हो गया!" रघु बोला। "हम अभी के अभी यहां से जा रहे हैं!"


लेकिन कोड़ा की नजर अभी भी जमीन पर बिखरे सोने के सिक्कों पर थी।


"इतना सोना..." उसने फुसफुसाते हुए कहा, "इतना सोना छोड़कर?"


"तुझे अपनी जान प्यारी नहीं है?"


कोड़ा ने कोई जवाब नहीं दिया।


तभी...


धरती हल्के-हल्के कांपने लगी।


मंदिर की टूटी हुई दीवारों से धूल गिरने लगी। कुएं के अंदर से किसी के रोने की आवाज आने लगी।


और फिर, उनके सामने की जमीन धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।


चारों पीछे हट गए।


मिट्टी फट रही थी।


उसके बीचों-बीच एक विशाल लकड़ी का संदूक बाहर आने लगा। उस पर लोहे की जंग लगी पट्टियां थीं और ऐसा लग रहा था, जैसे वह सैकड़ों सालों से जमीन के नीचे दबा हुआ हो।


संदूक के ऊपर किसी ने नुकीली चीज से कुछ लिखा था।


रघु ने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली।


«"जो इसे खोलेगा... वह इसकी रखवाली करेगा।"»


"अब भी नहीं समझे?" बबलू लगभग रोते हुए बोला। "यह खजाना नहीं है!"


लेकिन कोड़ा जैसे उनकी बातें सुन ही नहीं रहा था।


वह धीरे-धीरे संदूक की ओर बढ़ने लगा।


"कोड़ा, रुक जा!"


"पूरी जिंदगी गरीबी में काट दी!" वह पहली बार जोर से चिल्लाया। "भगवान ने पहली बार कुछ दिया है और मैं उसे छोड़ दूं?"


उसने संदूक पर हाथ रखा।


एक पल के लिए हवा पूरी तरह थम गई।


फिर उसने उसे खोल दिया।


चारों ने अंदर देखा।


और उनकी सांसें रुक गईं।


अंदर सोना नहीं था।


सिर्फ खोपड़ियां थीं।


एक...


दो...


तीन...


कुल चौदह।


हर खोपड़ी के माथे पर किसी का नाम खुदा हुआ था।


और सबसे नीचे...


पंद्रहवीं जगह खाली थी।


कोड़ा की टॉर्च कांप रही थी।


"ये... ये क्या है?"


तभी एक खोपड़ी की आंखों के खाली गड्ढों से काला धुआं निकलने लगा।


फिर दूसरी।


फिर तीसरी।


कुछ ही सेकंड में पूरा संदूक काले धुएं से भर गया।


और फिर...


सभी खोपड़ियों के जबड़े एक साथ हिले।


«"हमने भी यही सोचा था..."»


«"बस एक रात..."»


«"बस एक खजाना..."»


«"बस एक मौका..."»


कोड़ा पीछे हट गया।


अचानक उसे कुछ याद आया।


"बूढ़ा..."


वह तेजी से मुड़ा।


वही बूढ़ा मंदिर के दरवाजे पर खड़ा था।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।


"तू कौन है?" कोड़ा चिल्लाया।


बूढ़े ने धीरे से कहा—


«"मैं चौदहवां रखवाला हूं।"»


कोड़ा का शरीर कांप उठा।


"और अब..."


बूढ़े ने अपनी सफेद आंखों से उसकी ओर देखा।


«"तुम पंद्रहवें हो।"»


अगले ही पल, जमीन के नीचे से दर्जनों सड़े हुए हाथ निकले।


उन्होंने कोड़ा के पैर पकड़ लिए।


"नहीं! मुझे बचाओ!"


रघु ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन देर हो चुकी थी।


कुछ ही सेकंड में कोड़ा मिट्टी के अंदर समा चुका था।


और जैसे ही वह गायब हुआ...


संदूक में सबसे नीचे वाली खाली जगह पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभरने लगा।


"कोड़ा"


रघु, मंग्या और बबलू बिना पीछे देखे भागते रहे।


उन्होंने कभी उस रात के बारे में किसी से बात नहीं की।


समय बीत गया।


छह महीने बाद...


एक सुनसान सड़क पर एक ट्रक खराब हो गया।


ड्राइवर और उसका हेल्पर मदद की तलाश में पैदल चलने लगे।


कुछ दूर उन्हें एक आदमी दिखाई दिया।


सफेद धोती।


हाथ में लालटेन।


"भैया, यहां आसपास कोई गांव है?" ड्राइवर ने पूछा।


आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ मुड़ा।


उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं।


उसने मुस्कुराकर अपनी जेब से एक पुराना सोने का सिक्का निकाला और कहा—


«"गांव तो है... लेकिन पहले ये बताओ।"»


«"क्या तुम लोग जल्दी अमीर बनना चाहते हो?"»


और उस रात...


खजाने ने अपना सोलहवां रखवाला चुन लिया।