वह दुल्हन नहीं… डायन थी

 



रात के समय भारतीय गांव का आंगन, कमजोर पीली बल्ब की रोशनी और सामने खड़ा पीपल का पेड़, बिना किसी इंसान के अजीब सन्नाटा
सब कुछ सामान्य था… लेकिन उस रात गांव का सन्नाटा कुछ और ही कह रहा था।


ये बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि अब चुप रहना मुश्किल हो गया है।

जिस घर में शादी की शहनाइयाँ बजी थीं, वहाँ आज कोई रात को रुकता नहीं।

गाँव वाले कहते हैं—सब वहम था।

लेकिन जो मैंने देखा, जो मैंने सुना…

उसके बाद मुझे फर्क समझ में आ गया कि डर और वहम में एक बहुत पतली रेखा होती है।🔹 

हमारा गाँव सेमरी ज़्यादा बड़ा नहीं है।

करीब 70–80 घर होंगे।

खेती, मवेशी, शाम को चौपाल—बस इतना ही जीवन है।

मैं महेश हूँ।

उम्र 38 साल।

गाँव में ही किराना की छोटी दुकान चलाता हूँ।

ज्यादातर बातें मैं बढ़ा-चढ़ाकर नहीं करता, क्योंकि गाँव में बात फैलते देर नहीं लगती।

ये सब शुरू हुआ पिछले साल, जब रमेश की शादी हुई।

रमेश मेरे घर के सामने रहता है।

सीधा लड़का, थोड़ा कम बोलने वाला।

उसकी शादी पास के इलाके से तय हुई थी।

लड़की का नाम सबको बाद में पता चला, पहले कोई खास चर्चा नहीं थी।

शादी के दिन सब कुछ सामान्य था।

लड़की सुंदर थी—इतना जरूर कहूँगा।

पर एक बात मैंने नोटिस की थी, जिसे मैंने उसी वक्त नजरअंदाज कर दिया।

वो बार-बार जमीन की तरफ देख रही थी,

जैसे लोगों को नहीं, उनके पैरों को पहचान रही हो।

पहले हफ्ते सब ठीक रहा।

रमेश रोज़ सुबह खेत जाता,

लड़की घर में रहती।

लेकिन तीसरी रात, मेरी नींद टूटी।

कारण कोई आवाज़ नहीं थी।

बस… ऐसा लगा जैसे कोई आँगन में खड़ा है।

हमारे यहाँ अक्सर जानवर आ जाते हैं,

तो मैंने खिड़की से देखा।

कुछ नहीं।

लेकिन उसी रात,

सुबह उठते ही मेरी पत्नी ने कहा—

“कल रात किसी औरत के चलने की आवाज़ आ रही थी… नंगे पाँव।”

मैंने हँसकर टाल दिया।

दो दिन बाद वही बात रामलाल काका ने कही।

फिर अगले दिन मंजू चाची ने।

सबका कहना एक जैसा था—

रात के करीब ढाई बजे,

किसी के आँगन में

धीमे-धीमे कदमों की आवाज़।

कोई चिल्लाहट नहीं।

कोई तेज़ शोर नहीं।

बस… चलना।

रमेश के घर से।

मैंने एक दिन खुद नोटिस किया।

रमेश की पत्नी

दिन में बहुत कम बोलती थी।

गाँव की औरतों में घुलती नहीं थी।

एक और अजीब बात—

वो कभी भी

अपने पैर धोकर घर में नहीं घुसती थी।

सीधे अंदर चली जाती।

गाँव में ऐसी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता,

लेकिन जब चीज़ें दोहराने लगें,

तो दिमाग खुद जोड़ने लगता है।

अब आवाज़ के साथ

एक और चीज़ जुड़ गई।

एक ही जगह से आती हँसी।

न बहुत तेज़।

न साफ़।

जैसे कोई मुँह बंद करके हँस रहा हो।

हर बार,

उसी समय।

ढाई बजे।

🔹 नौ बजे के बाद

आधी रात गांव का सुनसान आंगन, मिट्टी पर नंगे पैरों के निशान और आधा खुला दरवाज़ा, डरावना सन्नाटा
हर रात वही निशान… वही रास्ता… सवाल बस बढ़ते जा रहे थे।



एक रात रमेश मेरी दुकान पर आया।

उसकी हालत ठीक नहीं थी।

उसने बस इतना कहा—

“भैया, तुम्हें लगता है इंसान नींद में भी…

चल सकता है?”

मैंने पूछा क्या हुआ।

वो बोला—

“मैं रोज़ रात को उठता हूँ…

और वो बिस्तर पर नहीं होती।”

मैंने कहा—

“शौच वगैरह?”

उसने सिर हिलाया—

“नहीं। वो बाहर होती है।”

मैंने पूछा—

“देखा?”

उसने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—

“पीपल के पेड़ के नीचे।”

हम दोनों चुप हो गए।

उसी हफ्ते,

गाँव का एक लड़का—सुरेश—

रात में खेत से भागता हुआ आया।

वो रो रहा था।

कह रहा था—

“मैंने किसी औरत को देखा…

उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े थे।”

अब बात फैल चुकी थी।

एक रात,

हम पाँच लोग रमेश के घर के बाहर रुके।

छुपकर नहीं—

बस चुपचाप।

ढाई बजे।

दरवाज़ा खुला।

वो बाहर आई।

धीरे।

सीधे पीपल के पेड़ तक गई।

उसने कुछ बोला नहीं।

बस… पेड़ को छूकर खड़ी रही।

तभी मैंने देखा—

उसके पैर

सच में

सामान्य नहीं थे।

घुटने आगे की तरफ थे,

लेकिन एड़ियाँ

पीछे की ओर।

किसी ने कुछ नहीं कहा।

हम बस वापस लौट आए।

🔹 अंधा कुआं

अगली सुबह रमेश का घर खाली था।

वो चला गया।

कहता है—

“मैं जिंदा रहना चाहता हूँ।”

उस घर में आज भी ताला लगा है।

पीपल का पेड़ अब सूख चुका है।

लेकिन कुछ रातों में,

जब गाँव बहुत शांत होता है—

ढाई बजे…

नंगे पाँव चलने की आवाज़

अब भी सुनाई देती है।

सुबह की रोशनी में बंद पड़ा गांव का घर, जंग लगी जंजीर और सूखा पीपल का पेड़, भारी और डरावना माहौल
दिन निकल आया था… पर उस घर के अंदर क्या हुआ, कोई आज तक नहीं जान पाया।


❓ अब सवाल:

अगर तुम उस गाँव में रहते…

और हर रात

एक ही आवाज़

एक ही समय पर सुनते—

तो क्या तुम उसे वहम कहकर

सो जाते?

या सच जानने की हिम्मत करते…

भले उसकी कीमत कुछ भी हो?

रेलवे स्टेशन का बंद कमरा

 

रात के समय सुनसान भारतीय रेलवे स्टेशन, पीली लाइटों की झिलमिलाहट और घना सन्नाटा, डरावना माहौल
रात का वो स्टेशन, जहाँ सन्नाटा इतना भारी था कि हर परछाईं डराने लगी।



मेरा नाम अमित देशमुख है।

उस समय मेरी उम्र 32 साल थी और मैं नागपुर की एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में साइट सुपरवाइज़र के तौर पर काम करता था।

काम की वजह से मुझे अक्सर छोटे शहरों और कस्बों में जाना पड़ता था,

जहाँ ट्रेनें कम रुकती हैं और सुविधाएँ उससे भी कम होती हैं।

ये घटना उसी दौर की है,

जब एक साइट मीटिंग के लिए

मुझे अकेले रात में सफ़र करना पड़ा

और एक अनजान रेलवे स्टेशन पर रुकना मेरी मजबूरी बन गई।

उस दिन मुझे भंडारा ज़िले के पास एक छोटे कस्बे में पहुँचना था।

सीधी ट्रेन नहीं थी,

बीच में एक स्टेशन पर उतरकर

सुबह की पैसेंजर ट्रेन पकड़नी थी।

मेरी ट्रेन रात 12:20 पर उस स्टेशन पर रुकी।

स्टेशन छोटा था,

नाम का बोर्ड आधा टूटा हुआ,

और चारों तरफ़ अजीब-सी ख़ामोशी।

प्लेटफॉर्म पर

दो कुली सो रहे थे,

एक चाय की दुकान बंद पड़ी थी,

और स्टेशन मास्टर का कमरा ही रोशन दिख रहा था।

मैंने स्टेशन मास्टर से कहा,

“सुबह की ट्रेन यहीं से पकड़नी है,

रुकने की कोई जगह होगी क्या?”

वो कुछ सेकंड मुझे देखता रहा,

फिर बोला,

“Waiting room तो सालों से बंद है…

पर एक पुराना कमरा है।

अगर चाहो तो वहीं बैठ सकते हो।”

उसके बोलने के लहजे में

एक झिझक थी।

मैं थका हुआ था।

सुबह की मीटिंग दिमाग़ में घूम रही थी।

मैंने ज़्यादा सवाल नहीं किए।

🔸 

रेलवे प्लेटफॉर्म के आख़िरी छोर पर बना बंद और पुराना कमरा, आधा खुला जंग लगा दरवाज़ा और अंदर अंधेरा
प्लेटफॉर्म के आख़िर में मौजूद वो कमरा, जिसे रात में कोई खोलने की हिम्मत नहीं करता।

वो कमरा

प्लेटफॉर्म के बिलकुल आख़िरी सिरे पर था।

वहाँ पहुँचते ही लगा

जैसे स्टेशन वहीं खत्म हो जाता हो।

दरवाज़ा खोलते ही

सीलन और पुराने लकड़ी की गंध आई।

अंदर —

एक लंबी लकड़ी की बेंच

दीवार पर पीले दाग

एक पंखा, जो सालों से नहीं चला होगा

और एक बल्ब, जिसकी रोशनी डर को छुपाने के लिए काफी नहीं थी

स्टेशन मास्टर ने कहा,

“अंदर से कुंडी लगा लेना।”

मैंने दरवाज़ा बंद किया।

कुंडी पहले से लगी हुई थी।

मैंने सोचा —

शायद पहले किसी ने लगा दी होगी।

🔸 वह रेडियो अब भी बजता है

करीब 1:10 बजे

मैं बेंच पर लेटा था।

तभी

मुझे लगा जैसे

दीवार के अंदर से

कोई बहुत धीमी आवाज़ आ रही हो।

ठक… ठक… ठक…

ऐसी आवाज़

जैसे कोई

बंद जगह में

कुछ कहने की कोशिश कर रहा हो।

मैं उठा।

दीवार पर कान लगाया।

आवाज़ रुक गई।

मैंने खुद को समझाया —

पुरानी बिल्डिंग है,

रात में आवाज़ें आती हैं।

पर कुछ देर बाद

वही आवाज़

फिर उसी जगह से।

🔸 

करीब 2 बजे

पंखा अचानक चल पड़ा।

मैं झटके से उठा।

स्विच OFF था।

पंखा कुछ सेकंड चला

फिर रुक गया।

उसी पल

बाहर से

किसी के सीटी बजाने की आवाज़ आई।

ट्रेन नहीं थी।

कोई प्लेटफॉर्म पर नहीं था।

अब बेचैनी साफ़ थी।

🔸 

अंधेरे रेलवे कमरे की दीवार पर इंसानी आकृति जैसी अजीब परछाईं, जो किसी की नहीं लगती
वो परछाईं… जो किसी इंसान की नहीं थी, लेकिन साफ़ दिखाई दे रही थी।

जब मैं वापस अंदर आया

तो दीवार पर

एक परछाईं दिखी।

मैं हिला।

परछाईं नहीं हिली।

मैंने लाइट जलाई।

परछाईं गायब।

लाइट बंद की।

परछाईं फिर वहीं।

अब ये भ्रम नहीं लग रहा था।

🔹 

सुबह 4 बजे

मैं बाहर निकला।

प्लेटफॉर्म पर

एक बुज़ुर्ग कुली बैठा था — रामू काका।

मैंने पूछा,

“काका, ये कमरा रात को इस्तेमाल क्यों नहीं होता?”

उसने मेरी तरफ़ देखा,

फिर कमरे की तरफ़।

धीरे बोला,

“तू रात वहीं था?”

मैंने हाँ कहा।

उसने जेब से

एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी फोटो निकाली।

“बीस साल पहले

इसी कमरे में

एक कर्मचारी

नाइट ड्यूटी में

बंद हो गया था।”

“दरवाज़ा बाहर से बंद था।

आग लग गई।”

“सुबह

जब खोला गया

तो…

दीवारों पर

नाखूनों के निशान थे।”

फोटो में

वही निशान साफ़ दिख रहे थे।

🔹नौ बजे के बाद

मैं ट्रेन में बैठ गया।

घर पहुँचकर

फोन चेक किया।

रात की एक audio recording

अपने-आप सेव हो गई थी।

उसमें

मेरी साँसों के बीच

एक आवाज़ थी —

“दरवाज़ा… बाहर से बंद था…”

आज भी

मैं छोटे स्टेशनों पर

रात रुकने से बचता हूँ।

क्योंकि कुछ जगहें

सिर्फ़ इमारत नहीं होतीं —

वो यादें सँभाल कर रखती हैं।


❓अब सवाल

अगर तुम अमित की जगह होते,

तो क्या उस कमरे में रुकते?

या तुम भी मानते हो

कि ये सब सिर्फ़ संयोग था?


“वह अस्पताल वार्ड, जहाँ हर मंगलवार किसी की मौत होती है”

 

यह बात मैं आज भी किसी को ठीक से बता नहीं पाता।

क्योंकि जब भी “Tuesday” का नाम आता है, मुझे उस अस्पताल की गंध महसूस होने लगती है।

यह कहानी मेरे साथ सीधे नहीं हुई…

लेकिन मेरे अपने घर के एक सदस्य ने जो देखा, उसके बाद हमारे परिवार में कोई भी मंगलवार को अस्पताल का नाम नहीं लेता।

अगर आपको लगता है कि मौत अचानक होती है…

तो शायद आपने Ward नंबर 7 के बारे में नहीं सुना।

🔹 

अंधेरे अस्पताल के गलियारे में जली हुई ट्यूब लाइट, खाली व्हीलचेयर और सन्नाटा, जो किसी अनहोनी का संकेत देता है।
जहाँ खामोशी भी कुछ छुपा रही हो, वहाँ कहानी की पहली साँस डर से भरी होती है।

मेरा बड़ा भाई, अमित, शहर के एक सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स था।

सरल स्वभाव, काम से काम रखने वाला इंसान।

उसने कभी भूत-प्रेत जैसी बातों पर भरोसा नहीं किया।

अस्पताल भी सामान्य था।

दिन में शोर, रिश्तेदारों की भीड़, स्ट्रेचर की आवाज़ें।

रात में मशीनों की लगातार बीप… और दवाइयों की तीखी गंध।

अमित की ड्यूटी ज़्यादातर Ward नंबर 7 में लगती थी।

एक पुराना वार्ड, लेकिन चालू।

पहले कुछ महीनों तक सब ठीक रहा।

फिर एक दिन उसने घर आकर यूँ ही कहा—

“अजीब बात है… Tuesday को इस वार्ड में माहौल अलग हो जाता है।”

हमने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन फिर यह बात हर हफ्ते दोहराई जाने लगी।

🔸 उस रात घर में कोई और भी था

हर Tuesday रात को Ward 7 में ठंड ज़्यादा लगने लगती

मरीज बिना वजह बेचैन हो जाते

Heart monitor एक पल के लिए same tone में अटक जाता

और ठीक रात 3:15 से 3:35 के बीच कुछ न कुछ गड़बड़ होती

पहले डॉक्टर कहते—

“Critical patients हैं, coincidence है।”

अमित भी यही मानता रहा।

लेकिन दिक्कत यह थी कि

👉 हर Tuesday कोई न कोई मर ही जाता था।

बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार— कुछ नहीं।

सिर्फ़ Tuesday।

🔸 

एक Tuesday अमित ने मुझे फोन किया।

आवाज़ अजीब तरह से धीमी थी।

“आज फिर वही हुआ,” उसने कहा।

“Bed नंबर 4… बिल्कुल stable था।

और 3:32पर… सब खत्म।”

मैंने पूछा—

“शायद हालत बिगड़ गई होगी?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस इतना बोला—

“अगर तुम यहाँ होते… तो तुम्हें भी अजीब लगता।”

उस रात के बाद उसने Tuesday को ड्यूटी बदलवाने की कोशिश की।

लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से वही वार्ड मिल जाता।

जैसे…

कोई नहीं चाहता था कि वह वहाँ से जाए।

🔹 रात का पिछा

एक Tuesday, Ward में एक बुज़ुर्ग मरीज भर्ती हुआ।

हालत stable थी।

Doctor ने खुद कहा—

“24 घंटे में discharge.”

अमित निश्चिंत था।

रात 3:16 AM

सब सामान्य।

3:32AM

Ward की tube-light एक सेकंड के लिए flicker हुई।

अमित ने बताया—

उसी पल उसे लगा जैसे

किसी ने उसके कान के पास साँस ली।

वह पलटकर Bed नंबर 7 की तरफ देखता है।

वहाँ…

परित्यक्त अस्पताल वार्ड में तीन खाली बेड, बिखरी सफेद चादरें, फ्लैटलाइन दिखाता मॉनिटर और काँच में उभरती रहस्यमयी परछाईं।
जब डर महसूस नहीं, बल्कि दिखाई देने लगे — तब समझो सच सामने आ चुका है।


👉 कोई खड़ा था।

न पूरा इंसान,

न पूरा साया।

अमित की टाँगें सुन्न हो गईं।

अगले ही पल—

Heart monitor flat।

मरीज मर चुका था।

🔸 सन्नाटा

अगले दिन अमित ने हिम्मत करके

CCTV footage देखी।

Ward खाली दिख रहा था।

लेकिन ठीक 3:32 AM पर

Screen में एक dark shape उभरी।

कोई इंसानी चाल नहीं।

कोई साफ़ चेहरा नहीं।

बस…

एक मौजूदगी।

Footage वहीं glitch होकर रुक जाती है।

Hospital records खंगाले गए।

👉 पिछले 12 सालों में

👉 हर Tuesday

👉 Ward नंबर 7 में

👉 कम से कम एक मौत

चाहे मरीज मामूली ही क्यों न हो।

यह अब coincidence नहीं था।

🔹 

अंधेरे अस्पताल कमरे में बिस्तर पर रखा चमकता स्मार्टफोन, 3:17 AM का समय दिखाता हुआ, बिना नाम की मिस्ड कॉल के साथ।
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं… वो बस 3:17 पर दोबारा कॉल करती हैं।

अमित ने अगले Tuesday से नौकरी छोड़ दी।

पूरी तरह।

हम सबने राहत की साँस ली।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

पिछले Tuesday रात

3:32 AM पर

अमित के फोन पर एक missed call आई।

Number private था।

Call log में सिर्फ़ एक नाम लिखा था—

“Ward 7”

आज अमित किसी से बात नहीं करता।

Tuesday को कमरे से बाहर नहीं निकलता।

और कभी-कभी

वह नींद में बस एक ही बात बुदबुदाता है—

“मैं वहाँ नहीं था…

तो फिर मुझे क्यों बुलाया?”

❓ Tum hote to kya karte?

❓ Kya 12 saalon tak har Tuesday ek hi ward me maut sirf coincidence ho sakti hai?

👇 Comment karke बताओ…

क्योंकि कुछ जगहें

छोड़ देने से नहीं…

छोड़ने नहीं देतीं। 😈

“रात 2:17 बजे दरवाज़ा खुला… और मैं अकेला नहीं था”

 


इस कहानी को लिखते समय मेरे हाथ काँप रहे हैं।

आज भी जब घड़ी में रात 2:17 बजते हैं, मेरी साँसें अपने-आप तेज़ हो जाती हैं।

मुझे नहीं पता यह सब सच था या मेरे मन का वहम।

लेकिन जो कुछ भी था…

उस रात के बाद मैं फिर कभी अकेला नहीं रहा।

पुरानी, सुनसान अपार्टमेंट बिल्डिंग का धुंधला कॉरिडोर, टूटी लाइट और अजीब सन्नाटा, जहाँ से डर की शुरुआत होती है।
कुछ जगहें पहली नज़र में ही बता देती हैं कि यहाँ कुछ ठीक नहीं है।


मैं उस शहर में नया-नया आया था।

नौकरी के कारण एक पुरानी सी इमारत में सस्ता कमरा मिल गया।

कमरा ठीक-ठाक था, लेकिन इमारत में एक अजीब-सी उदासी भरी रहती थी।

दीवारों पर सीलन थी।

सीढ़ियों में हमेशा एक अजीब बदबू।

और रात को ऐसी ख़ामोशी, जैसे पूरी दुनिया साँस रोककर बैठी हो।

पहली रात सब सामान्य था।

दूसरी रात…

नींद के बीच मुझे लगा जैसे किसी ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया हो।

टक… टक…

मैं चौंककर उठ बैठा।

घड़ी देखी — 2:17 AM।

दरवाज़ा बंद था।

मैंने सोचा, शायद ऊपर वाले कमरे से आवाज़ आई होगी।

लेकिन यही बात रोज़ होने लगी।

हर रात।

सिर्फ़ 2:17 बजे।

कभी दरवाज़े से,

कभी खिड़की से,

और कभी ऐसा लगता जैसे कोई मेरे कान के पास खड़ा साँस ले रहा हो।

एक हफ्ते बाद मैं लगातार थका-सा रहने लगा।

बिना वजह सिर दर्द।

आँखों के नीचे गहरे काले घेरे।

सपने भी बदलने लगे।

हर सपने में मैं अपने ही कमरे में होता…

और कमरे के एक कोने में कोई खड़ा मुझे देख रहा होता।

उसका चेहरा साफ़ नहीं दिखता था।

बस एक एहसास —

जैसे वह मुझे अच्छी तरह जानता हो।

पहला सबूत

एक रात मैंने तय किया —

आज पूरी रात जागकर देखूँगा।

लाइट बंद।

मोबाइल साइलेंट।

नज़रें घड़ी पर टिकी हुई।

2:16…

2:17…

टक…

अंधेरे कमरे का डरावना दृश्य, हल्की रोशनी में उभरती अनजान परछाईं, जो किसी अदृश्य मौजूदगी का संकेत देती है।
जब एहसास होता है कि कमरे में कोई और भी है… तब डर असली रूप लेता है।


इस बार आवाज़ बहुत पास से आई।

दरवाज़े का हैंडल हल्का-सा हिला।

मेरी साँस रुक गई।

मैं बिस्तर पर बैठा रहा।

फिर दरवाज़ा अपने-आप आधा खुल गया।

बाहर कोई नहीं था।

लेकिन कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

इतनी ठंडी, जैसे किसी ने फ्रिज खोल दिया हो।

और तभी मैंने देखा —

दीवार पर एक अतिरिक्त परछाईं।

वह मेरी नहीं थी।


अगली सुबह मैंने पड़ोसी से पूछा।

वह बूढ़ा आदमी कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,

“तुम उसी कमरे में रहते हो न… जहाँ पहले राघव रहता था?”

“कौन राघव?” मैंने पूछा।

उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

“नाइट शिफ्ट करता था…

एक रात ठीक 2:17 बजे…

उसका कमरा अंदर से बंद था।”

पुलिस ने कहा — हार्ट अटैक।

लेकिन जो सफ़ाई करने गया था, उसने बताया…

राघव का चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसकी साँस खींच ली हो।

उस रात मैं कमरा छोड़कर भाग जाना चाहता था।

लेकिन मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।

2:17 AM।

दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।

इस बार वह सामने था।

वही परछाईं…

अब कुछ-कुछ इंसानी आकार में।

आँखें नहीं थीं,

लेकिन मैं महसूस कर सकता था —

वह मुझे देख रहा था।

उसकी आवाज़ सीधे मेरे दिमाग में गूँजी:

“तुम मेरी जगह हो…”

मेरा सिर फटने लगा।

कमरा घूमने लगा।

फिर अंधेरा।


होश आने पर मैं अस्पताल में था।

डॉक्टर ने कहा — अत्यधिक तनाव और भ्रम।

मैं उसी दिन वह कमरा छोड़कर चला आया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

आज भी…

चाहे मैं किसी भी शहर में होऊँ…

किसी भी कमरे में…

रात 2:17 बजे

रात के अंधेरे में अकेला चमकता स्मार्टफोन, लॉक स्क्रीन पर 2:17 AM का समय, ठंडी नीली रोशनी और अनकही मौजूदगी का एहसास।
कहानी खत्म हो चुकी थी…
लेकिन डर अब भी जाग रहा था।


मेरा मोबाइल अपने-आप जल उठता है।

और लॉक-स्क्रीन पर लिखा होता है —

“तुम मेरी जगह हो।”

मैंने घड़ी पहनना छोड़ दिया है।

लेकिन समय…

समय आज भी मुझे ढूँढ लेता है।

 एक सवाल

क्या यह मेरा वहम था..अगर यह सिर्फ़ मेरा वहम था…

तो फिर हर बार 2:17 ही क्यों?


👉 कमेंट में ज़रूर लिखिए।

क्योंकि कुछ चीज़ें पढ़ी नहीं जातीं…

महसूस की जाती हैं। 😈

बंद पड़ी फैक्ट्री

 

रात के समय धुंध में डूबी भारत की एक बंद पड़ी फैक्ट्री का डरावना दृश्य
सालों से बंद पड़ी यह फैक्ट्री बाहर से जितनी सुनसान दिखती है, अंदर उतना ही डर छुपा है।



नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,


जहाँ हम आपको डर और रहस्य से भरपूर कहानियाँ सुनाते हैं।

यहाँ हम ऐसे अनुभव साझा करते हैं

जो कभी ना कभी, किसी के साथ भी हो सकते हैं…

और शायद आपके साथ भी।


आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी कहानी की,

जो एक फैक्ट्री से जुड़ी है। जो सालो से बंद पड़ी है और जहां कोई आता जाता नही

 सोचो कि आप कभी

ऐसी किसी सुनसान जगह के पास से गुज़रे हों

और अचानक आपका मन वहाँ रुकने से डरने लगे…

तो शायद आप समझ पाएँगे कि

क्यों कुछ जगहें वाकई सुनसान होतीं है।


आज की कहानी है राकेश देशमुख नाम के एक शख्स की।

उम्र लगभग 32 साल।

राकेश एक प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता था।

शादीशुदा नहीं था, माँ–पिता गाँव में रहते थे।

वह शहर के बाहर एक छोटे से कमरे में किराए से रहता था।

उसका रोज़ का जीवन बड़ा सीधा-सादा था—

ना ज़्यादा दोस्त, ना ज़्यादा सवाल।

शहर के बाहरी इलाके में एक पुरानी फैक्ट्री थी।

करीब 15 साल से बंद।

कभी वहाँ सैकड़ों मज़दूर काम करते थे,

लेकिन एक बड़े हादसे के बाद

अब फैक्ट्री हमेशा के लिए बंद कर दी गई।

राकेश को उस जगह के बारे में कुछ पता नहीं था।

उस की तो नई नई ड्यूटी

उस फैक्ट्री के गेट पर लगी थी।

उसका बस अपने काम पर 

ध्यान‌ था।

बंद पड़ी फैक्ट्री के बाहर रात में टॉर्च पकड़े डरा हुआ भारतीय सिक्योरिटी गार्ड
जब रात गहरी होती है, तब हर परछाई किसी खतरे का एहसास कराने लगती है।


उस दिन…

सर्दियों की एक ठंडी रात थी।

नवंबर का महीना,

और रात की शिफ्ट उसकी पहली ड्यूटी थी

इस फैक्ट्री में।


फैक्ट्री का गेट भारी लोहे का था।

अंदर अँधेरा,

ऊपर टूटे हुए टीन की छतें,

और चारों तरफ जंग लगी मशीनें।

हवा चलते ही

 अंदर से

“क्रीइइइ…” जैसी आवाज़ आती।


 सब कुछ सामान्य था।

हर तरफ शांती थी

राकेश कुर्सी पर बैठा,

चाय पीते हुए,

मोबाइल देख रहा था।

कभी-कभी बिच मे

कुत्तों के भौंकने की आवाज़

दूर से आ रही थी।

रात करीब 12:40

अचानक हवा तेज़ हो गई।

पेड़ों की परछाइयाँ

फैक्ट्री की दीवारों पर हिलने लगीं।

राकेश थोड़ा असहज हो गया, 

उसे लगा जैसे कोई

उसे अंदर से देख रहा हो।

उसकी गर्दन पर

हल्की सी सिहरन दौड़ गई।


फिर उसे फैक्ट्री

अंदर से हलचल सुनाई दी, उसे लगा और

“शायद चूहा होगा,”

लेकिन आवाज़

चूहे जैसी नहीं थी।

वह भारी कदमों की थी।

जैसे कोई अंदर चल रहा हो।


अचानक

फैक्ट्री के अंदर लगी

एक मशीन अपने आप

चलने लग गई।

राकेश का दिल

तेज़ी से धड़कने लगा।

उसे पसीना आ गया।

हवा अब उसे बडी

भारी लग रही थी।


उसी पल

उसे अंदर की सीढ़ियों पर

एक परछाईं दिखी।

लंबा शरीर…

झुका हुआ सिर…

और आँखों की जगह

काला गड्ढा।

बंद पड़ी फैक्ट्री की सीढ़ियों में दिखाई दिया डरावना और रहस्यमयी साया
वह सिर्फ एक पल के लिए दिखा… लेकिन डर हमेशा के लिए छोड़ गया।


उसे देखते ही राकेश की हालत पतली हो गई,

वह भागने लगा।

लेकिन उसके पैरों में

जैसे जान ही नहीं बची थी।

पीछे से

उसे बड़ी अजीब गुर्राने की आवाज़ आई।

लाइट बंद हो गई।

चारों तरफ अंधेरा।

उसने गेट खोलने की कोशिश की,

लेकिन ताला अटक गया।

पीछे से

साँस लेने की आवाज़

बिल्कुल उसके कान के पास।


किसी तरह

वह गेट खोलकर

बाहर भागा और भागता ही रहा।

पिछे अभी भी उसे लग रहा था

की कोई उसका पिछा कर रहा है।

उसके बाद उसे कुछ पता नही

उसके बाद अस्पताल में ही उसे होश आया।

उसका शरीर ठीक था,

लेकिन दिमाग…

अब भी उस फैक्ट्री के बारे में 

सोच रहा था।

उसके बाद राकेश ने वह नौकरी छोड़ दी।

उस इलाके के पास फिर 

वह कभी नहीं गया।

दोस्तों,

यह कहानी तो यहीं खत्म होती है…

पर आपको क्या लगता है—

अगर फैक्ट्री सच में खाली थी

तो राकेश ने

क्या देखा था?


सो

चिए…

अगर आपके साथ भी

ऐसा कुछ हो जाए

तो आप क्या करेंगे?

कहानी कैसी लगी

नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए।

और हाँ…

सुरक्षित रहिए। 👁️‍🗨️