“वह अस्पताल वार्ड, जहाँ हर मंगलवार किसी की मौत होती है”

 

यह बात मैं आज भी किसी को ठीक से बता नहीं पाता।

क्योंकि जब भी “Tuesday” का नाम आता है, मुझे उस अस्पताल की गंध महसूस होने लगती है।

यह कहानी मेरे साथ सीधे नहीं हुई…

लेकिन मेरे अपने घर के एक सदस्य ने जो देखा, उसके बाद हमारे परिवार में कोई भी मंगलवार को अस्पताल का नाम नहीं लेता।

अगर आपको लगता है कि मौत अचानक होती है…

तो शायद आपने Ward नंबर 7 के बारे में नहीं सुना।

🔹 

अंधेरे अस्पताल के गलियारे में जली हुई ट्यूब लाइट, खाली व्हीलचेयर और सन्नाटा, जो किसी अनहोनी का संकेत देता है।
जहाँ खामोशी भी कुछ छुपा रही हो, वहाँ कहानी की पहली साँस डर से भरी होती है।

मेरा बड़ा भाई, अमित, शहर के एक सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स था।

सरल स्वभाव, काम से काम रखने वाला इंसान।

उसने कभी भूत-प्रेत जैसी बातों पर भरोसा नहीं किया।

अस्पताल भी सामान्य था।

दिन में शोर, रिश्तेदारों की भीड़, स्ट्रेचर की आवाज़ें।

रात में मशीनों की लगातार बीप… और दवाइयों की तीखी गंध।

अमित की ड्यूटी ज़्यादातर Ward नंबर 7 में लगती थी।

एक पुराना वार्ड, लेकिन चालू।

पहले कुछ महीनों तक सब ठीक रहा।

फिर एक दिन उसने घर आकर यूँ ही कहा—

“अजीब बात है… Tuesday को इस वार्ड में माहौल अलग हो जाता है।”

हमने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन फिर यह बात हर हफ्ते दोहराई जाने लगी।

🔸 उस रात घर में कोई और भी था

हर Tuesday रात को Ward 7 में ठंड ज़्यादा लगने लगती

मरीज बिना वजह बेचैन हो जाते

Heart monitor एक पल के लिए same tone में अटक जाता

और ठीक रात 3:15 से 3:35 के बीच कुछ न कुछ गड़बड़ होती

पहले डॉक्टर कहते—

“Critical patients हैं, coincidence है।”

अमित भी यही मानता रहा।

लेकिन दिक्कत यह थी कि

👉 हर Tuesday कोई न कोई मर ही जाता था।

बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार— कुछ नहीं।

सिर्फ़ Tuesday।

🔸 

एक Tuesday अमित ने मुझे फोन किया।

आवाज़ अजीब तरह से धीमी थी।

“आज फिर वही हुआ,” उसने कहा।

“Bed नंबर 4… बिल्कुल stable था।

और 3:32पर… सब खत्म।”

मैंने पूछा—

“शायद हालत बिगड़ गई होगी?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस इतना बोला—

“अगर तुम यहाँ होते… तो तुम्हें भी अजीब लगता।”

उस रात के बाद उसने Tuesday को ड्यूटी बदलवाने की कोशिश की।

लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से वही वार्ड मिल जाता।

जैसे…

कोई नहीं चाहता था कि वह वहाँ से जाए।

🔹 रात का पिछा

एक Tuesday, Ward में एक बुज़ुर्ग मरीज भर्ती हुआ।

हालत stable थी।

Doctor ने खुद कहा—

“24 घंटे में discharge.”

अमित निश्चिंत था।

रात 3:16 AM

सब सामान्य।

3:32AM

Ward की tube-light एक सेकंड के लिए flicker हुई।

अमित ने बताया—

उसी पल उसे लगा जैसे

किसी ने उसके कान के पास साँस ली।

वह पलटकर Bed नंबर 7 की तरफ देखता है।

वहाँ…

परित्यक्त अस्पताल वार्ड में तीन खाली बेड, बिखरी सफेद चादरें, फ्लैटलाइन दिखाता मॉनिटर और काँच में उभरती रहस्यमयी परछाईं।
जब डर महसूस नहीं, बल्कि दिखाई देने लगे — तब समझो सच सामने आ चुका है।


👉 कोई खड़ा था।

न पूरा इंसान,

न पूरा साया।

अमित की टाँगें सुन्न हो गईं।

अगले ही पल—

Heart monitor flat।

मरीज मर चुका था।

🔸 सन्नाटा

अगले दिन अमित ने हिम्मत करके

CCTV footage देखी।

Ward खाली दिख रहा था।

लेकिन ठीक 3:32 AM पर

Screen में एक dark shape उभरी।

कोई इंसानी चाल नहीं।

कोई साफ़ चेहरा नहीं।

बस…

एक मौजूदगी।

Footage वहीं glitch होकर रुक जाती है।

Hospital records खंगाले गए।

👉 पिछले 12 सालों में

👉 हर Tuesday

👉 Ward नंबर 7 में

👉 कम से कम एक मौत

चाहे मरीज मामूली ही क्यों न हो।

यह अब coincidence नहीं था।

🔹 

अंधेरे अस्पताल कमरे में बिस्तर पर रखा चमकता स्मार्टफोन, 3:17 AM का समय दिखाता हुआ, बिना नाम की मिस्ड कॉल के साथ।
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं… वो बस 3:17 पर दोबारा कॉल करती हैं।

अमित ने अगले Tuesday से नौकरी छोड़ दी।

पूरी तरह।

हम सबने राहत की साँस ली।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

पिछले Tuesday रात

3:32 AM पर

अमित के फोन पर एक missed call आई।

Number private था।

Call log में सिर्फ़ एक नाम लिखा था—

“Ward 7”

आज अमित किसी से बात नहीं करता।

Tuesday को कमरे से बाहर नहीं निकलता।

और कभी-कभी

वह नींद में बस एक ही बात बुदबुदाता है—

“मैं वहाँ नहीं था…

तो फिर मुझे क्यों बुलाया?”

❓ Tum hote to kya karte?

❓ Kya 12 saalon tak har Tuesday ek hi ward me maut sirf coincidence ho sakti hai?

👇 Comment karke बताओ…

क्योंकि कुछ जगहें

छोड़ देने से नहीं…

छोड़ने नहीं देतीं। 😈

“रात 2:17 बजे दरवाज़ा खुला… और मैं अकेला नहीं था”

 


इस कहानी को लिखते समय मेरे हाथ काँप रहे हैं।

आज भी जब घड़ी में रात 2:17 बजते हैं, मेरी साँसें अपने-आप तेज़ हो जाती हैं।

मुझे नहीं पता यह सब सच था या मेरे मन का वहम।

लेकिन जो कुछ भी था…

उस रात के बाद मैं फिर कभी अकेला नहीं रहा।

पुरानी, सुनसान अपार्टमेंट बिल्डिंग का धुंधला कॉरिडोर, टूटी लाइट और अजीब सन्नाटा, जहाँ से डर की शुरुआत होती है।
कुछ जगहें पहली नज़र में ही बता देती हैं कि यहाँ कुछ ठीक नहीं है।


मैं उस शहर में नया-नया आया था।

नौकरी के कारण एक पुरानी सी इमारत में सस्ता कमरा मिल गया।

कमरा ठीक-ठाक था, लेकिन इमारत में एक अजीब-सी उदासी भरी रहती थी।

दीवारों पर सीलन थी।

सीढ़ियों में हमेशा एक अजीब बदबू।

और रात को ऐसी ख़ामोशी, जैसे पूरी दुनिया साँस रोककर बैठी हो।

पहली रात सब सामान्य था।

दूसरी रात…

नींद के बीच मुझे लगा जैसे किसी ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया हो।

टक… टक…

मैं चौंककर उठ बैठा।

घड़ी देखी — 2:17 AM।

दरवाज़ा बंद था।

मैंने सोचा, शायद ऊपर वाले कमरे से आवाज़ आई होगी।

लेकिन यही बात रोज़ होने लगी।

हर रात।

सिर्फ़ 2:17 बजे।

कभी दरवाज़े से,

कभी खिड़की से,

और कभी ऐसा लगता जैसे कोई मेरे कान के पास खड़ा साँस ले रहा हो।

एक हफ्ते बाद मैं लगातार थका-सा रहने लगा।

बिना वजह सिर दर्द।

आँखों के नीचे गहरे काले घेरे।

सपने भी बदलने लगे।

हर सपने में मैं अपने ही कमरे में होता…

और कमरे के एक कोने में कोई खड़ा मुझे देख रहा होता।

उसका चेहरा साफ़ नहीं दिखता था।

बस एक एहसास —

जैसे वह मुझे अच्छी तरह जानता हो।

पहला सबूत

एक रात मैंने तय किया —

आज पूरी रात जागकर देखूँगा।

लाइट बंद।

मोबाइल साइलेंट।

नज़रें घड़ी पर टिकी हुई।

2:16…

2:17…

टक…

अंधेरे कमरे का डरावना दृश्य, हल्की रोशनी में उभरती अनजान परछाईं, जो किसी अदृश्य मौजूदगी का संकेत देती है।
जब एहसास होता है कि कमरे में कोई और भी है… तब डर असली रूप लेता है।


इस बार आवाज़ बहुत पास से आई।

दरवाज़े का हैंडल हल्का-सा हिला।

मेरी साँस रुक गई।

मैं बिस्तर पर बैठा रहा।

फिर दरवाज़ा अपने-आप आधा खुल गया।

बाहर कोई नहीं था।

लेकिन कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

इतनी ठंडी, जैसे किसी ने फ्रिज खोल दिया हो।

और तभी मैंने देखा —

दीवार पर एक अतिरिक्त परछाईं।

वह मेरी नहीं थी।


अगली सुबह मैंने पड़ोसी से पूछा।

वह बूढ़ा आदमी कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,

“तुम उसी कमरे में रहते हो न… जहाँ पहले राघव रहता था?”

“कौन राघव?” मैंने पूछा।

उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

“नाइट शिफ्ट करता था…

एक रात ठीक 2:17 बजे…

उसका कमरा अंदर से बंद था।”

पुलिस ने कहा — हार्ट अटैक।

लेकिन जो सफ़ाई करने गया था, उसने बताया…

राघव का चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसकी साँस खींच ली हो।

उस रात मैं कमरा छोड़कर भाग जाना चाहता था।

लेकिन मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।

2:17 AM।

दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।

इस बार वह सामने था।

वही परछाईं…

अब कुछ-कुछ इंसानी आकार में।

आँखें नहीं थीं,

लेकिन मैं महसूस कर सकता था —

वह मुझे देख रहा था।

उसकी आवाज़ सीधे मेरे दिमाग में गूँजी:

“तुम मेरी जगह हो…”

मेरा सिर फटने लगा।

कमरा घूमने लगा।

फिर अंधेरा।


होश आने पर मैं अस्पताल में था।

डॉक्टर ने कहा — अत्यधिक तनाव और भ्रम।

मैं उसी दिन वह कमरा छोड़कर चला आया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

आज भी…

चाहे मैं किसी भी शहर में होऊँ…

किसी भी कमरे में…

रात 2:17 बजे

रात के अंधेरे में अकेला चमकता स्मार्टफोन, लॉक स्क्रीन पर 2:17 AM का समय, ठंडी नीली रोशनी और अनकही मौजूदगी का एहसास।
कहानी खत्म हो चुकी थी…
लेकिन डर अब भी जाग रहा था।


मेरा मोबाइल अपने-आप जल उठता है।

और लॉक-स्क्रीन पर लिखा होता है —

“तुम मेरी जगह हो।”

मैंने घड़ी पहनना छोड़ दिया है।

लेकिन समय…

समय आज भी मुझे ढूँढ लेता है।

 एक सवाल

क्या यह मेरा वहम था..अगर यह सिर्फ़ मेरा वहम था…

तो फिर हर बार 2:17 ही क्यों?


👉 कमेंट में ज़रूर लिखिए।

क्योंकि कुछ चीज़ें पढ़ी नहीं जातीं…

महसूस की जाती हैं। 😈

बंद पड़ी फैक्ट्री

 

रात के समय धुंध में डूबी भारत की एक बंद पड़ी फैक्ट्री का डरावना दृश्य
सालों से बंद पड़ी यह फैक्ट्री बाहर से जितनी सुनसान दिखती है, अंदर उतना ही डर छुपा है।



नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,


जहाँ हम आपको डर और रहस्य से भरपूर कहानियाँ सुनाते हैं।

यहाँ हम ऐसे अनुभव साझा करते हैं

जो कभी ना कभी, किसी के साथ भी हो सकते हैं…

और शायद आपके साथ भी।


आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी कहानी की,

जो एक फैक्ट्री से जुड़ी है। जो सालो से बंद पड़ी है और जहां कोई आता जाता नही

 सोचो कि आप कभी

ऐसी किसी सुनसान जगह के पास से गुज़रे हों

और अचानक आपका मन वहाँ रुकने से डरने लगे…

तो शायद आप समझ पाएँगे कि

क्यों कुछ जगहें वाकई सुनसान होतीं है।


आज की कहानी है राकेश देशमुख नाम के एक शख्स की।

उम्र लगभग 32 साल।

राकेश एक प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता था।

शादीशुदा नहीं था, माँ–पिता गाँव में रहते थे।

वह शहर के बाहर एक छोटे से कमरे में किराए से रहता था।

उसका रोज़ का जीवन बड़ा सीधा-सादा था—

ना ज़्यादा दोस्त, ना ज़्यादा सवाल।

शहर के बाहरी इलाके में एक पुरानी फैक्ट्री थी।

करीब 15 साल से बंद।

कभी वहाँ सैकड़ों मज़दूर काम करते थे,

लेकिन एक बड़े हादसे के बाद

अब फैक्ट्री हमेशा के लिए बंद कर दी गई।

राकेश को उस जगह के बारे में कुछ पता नहीं था।

उस की तो नई नई ड्यूटी

उस फैक्ट्री के गेट पर लगी थी।

उसका बस अपने काम पर 

ध्यान‌ था।

बंद पड़ी फैक्ट्री के बाहर रात में टॉर्च पकड़े डरा हुआ भारतीय सिक्योरिटी गार्ड
जब रात गहरी होती है, तब हर परछाई किसी खतरे का एहसास कराने लगती है।


उस दिन…

सर्दियों की एक ठंडी रात थी।

नवंबर का महीना,

और रात की शिफ्ट उसकी पहली ड्यूटी थी

इस फैक्ट्री में।


फैक्ट्री का गेट भारी लोहे का था।

अंदर अँधेरा,

ऊपर टूटे हुए टीन की छतें,

और चारों तरफ जंग लगी मशीनें।

हवा चलते ही

 अंदर से

“क्रीइइइ…” जैसी आवाज़ आती।


 सब कुछ सामान्य था।

हर तरफ शांती थी

राकेश कुर्सी पर बैठा,

चाय पीते हुए,

मोबाइल देख रहा था।

कभी-कभी बिच मे

कुत्तों के भौंकने की आवाज़

दूर से आ रही थी।

रात करीब 12:40

अचानक हवा तेज़ हो गई।

पेड़ों की परछाइयाँ

फैक्ट्री की दीवारों पर हिलने लगीं।

राकेश थोड़ा असहज हो गया, 

उसे लगा जैसे कोई

उसे अंदर से देख रहा हो।

उसकी गर्दन पर

हल्की सी सिहरन दौड़ गई।


फिर उसे फैक्ट्री

अंदर से हलचल सुनाई दी, उसे लगा और

“शायद चूहा होगा,”

लेकिन आवाज़

चूहे जैसी नहीं थी।

वह भारी कदमों की थी।

जैसे कोई अंदर चल रहा हो।


अचानक

फैक्ट्री के अंदर लगी

एक मशीन अपने आप

चलने लग गई।

राकेश का दिल

तेज़ी से धड़कने लगा।

उसे पसीना आ गया।

हवा अब उसे बडी

भारी लग रही थी।


उसी पल

उसे अंदर की सीढ़ियों पर

एक परछाईं दिखी।

लंबा शरीर…

झुका हुआ सिर…

और आँखों की जगह

काला गड्ढा।

बंद पड़ी फैक्ट्री की सीढ़ियों में दिखाई दिया डरावना और रहस्यमयी साया
वह सिर्फ एक पल के लिए दिखा… लेकिन डर हमेशा के लिए छोड़ गया।


उसे देखते ही राकेश की हालत पतली हो गई,

वह भागने लगा।

लेकिन उसके पैरों में

जैसे जान ही नहीं बची थी।

पीछे से

उसे बड़ी अजीब गुर्राने की आवाज़ आई।

लाइट बंद हो गई।

चारों तरफ अंधेरा।

उसने गेट खोलने की कोशिश की,

लेकिन ताला अटक गया।

पीछे से

साँस लेने की आवाज़

बिल्कुल उसके कान के पास।


किसी तरह

वह गेट खोलकर

बाहर भागा और भागता ही रहा।

पिछे अभी भी उसे लग रहा था

की कोई उसका पिछा कर रहा है।

उसके बाद उसे कुछ पता नही

उसके बाद अस्पताल में ही उसे होश आया।

उसका शरीर ठीक था,

लेकिन दिमाग…

अब भी उस फैक्ट्री के बारे में 

सोच रहा था।

उसके बाद राकेश ने वह नौकरी छोड़ दी।

उस इलाके के पास फिर 

वह कभी नहीं गया।

दोस्तों,

यह कहानी तो यहीं खत्म होती है…

पर आपको क्या लगता है—

अगर फैक्ट्री सच में खाली थी

तो राकेश ने

क्या देखा था?


सो

चिए…

अगर आपके साथ भी

ऐसा कुछ हो जाए

तो आप क्या करेंगे?

कहानी कैसी लगी

नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए।

और हाँ…

सुरक्षित रहिए। 👁️‍🗨️

उस रात घर में कोई और भी था

 


रात के सन्नाटे में डूबा पुराना घर, जहाँ डर धीरे-धीरे जन्म ले रहा है
खामोशी इतनी गहरी थी कि लगता था जैसे घर खुद कुछ छुपा रहा हो…
डर की शुरुआत अक्सर शांति से ही होती है।


नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan में,


जहाँ हम आपको डर और रहस्य से भरी वो कहानियाँ सुनाते हैं

जो सिर्फ कल्पना नहीं होतीं…

बल्कि कभी-कभी किसी की ज़िंदगी का सच भी बन जाती हैं।


आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है…

एक आम-सी रात और‌ एक आम-सा घर…

लेकिन उस रात कुछ ऐसा था

जिसका एहसास बहुत देर बाद हुआ।


 हम बात करने वाले हैं एक ऐसी कहानी की

जो एक परिवार के साथ घटी…

और जिसमें सबसे डरावनी बात ये थी

कि वो चीज़ घर के अंदर ही थी।

अगर आप कभी रात को अपने कमरे में अकेले लेटे हों

और आपको लगे कि कोई आपको देख रहा है…

तो ये कहानी आपको बहुत करीब से महसूस होगी।

ये कहानी है राहुल नाम के एक युवक की।

राहुल अपने माता-पिता और छोटी बहन के साथ

एक पुराने लेकिन शांत से घर में रहता था।


उनका घर शहर के पुराने हिस्से में था।

घर के पीछे एक बंद पड़ी गली,

और सामने पीपल का पुराना पेड़।

रात को जब भी हवा चलती,

तो खिड़कियाँ खुद-ब-खुद हिलने लगतीं,

मानो कोई बाहर से अंदर झाँक रहा हो।


बात उस रात की है...सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।

खाना खाने के बाद राहुल और उसके घरवाले

अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।

घड़ी में उस वक्त करीब 12:40 AM बज रहे थे।

घर में बिल्कुल सन्नाटा था…

सिर्फ पंखे की आवाज़ आ रही थी।


राहुल अभी तक सोया नहीं था, वह अपने कमरे में मोबाइल चला रहा था।

लाइट बंद थी, बस हल्की नीली रोशनी स्क्रीन से आ रही थी।

तभी.... राहुल को लगा

जैसे बाहर वाले कमरे से कोई हल्की सी आहट आई।


राहुल ने पहले ध्यान नहीं दिया।

उसे लगा शायद पापा उठे होंगे या माँ पानी लेने गई होंगी।

लेकिन कुछ सेकंड बाद…

वही आवाज़ फिर आई।

जैसे कोई नंगे पाँव फर्श पर चल रहा हो।

अंधेरे कमरे में महसूस होती एक अनदेखी मौजूदगी
जब कुछ दिखाई नहीं देता,
लेकिन महसूस सब होने लगता है…
यही वो पल होता है जहाँ डर जन्म लेता है।


फिर हवा अचानक ठंडी लगने लगी।

कमरे की हवा भारी सी हो गई।

दरवाज़े के नीचे से

एक परछाईं धीरे-धीरे सरकती हुई दिखने लगी।

राहुल का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।


उसने खुद को समझाया —

“शायद लाइट का एंगल होगा… या मेरा वहम।”

लेकिन तभी…

परछाईं दो पैरों की जगह

चार हिस्सों में बँटी हुई लगने लगी।

उसके गले से आवाज़ तक नहीं निकली।

फिर अचानक बाहर से किसी ने

बहुत हल्की आवाज़ में उसका नाम लिया—

“रा…हुल…”

पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।

पसीना पीठ से बहने लगा।

उसने चादर कसकर पकड़ ली

और आँखें बंद कर लीं।


अचानक से उसे महसूस हुआ

कि कोई उसके बिल्कुल पास खड़ा है।

उसका बदन जैसें जम सा गया

उसने डरते डरते अपनी आँखें खोली   

और आँखें खोलते ही

एक झुका हुआ चेहरा उसके सामने दिखाई दिया—

चेहरे की आकृति अधूरी,

आँखें काली गहराइयों जैसी…

बस एक पल के लिए।

फिर सब अंधेरा।


राहुल चीखते हुए उठा और दरवाज़े की ओर भागा।

उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की,

पर दरवाज़ा खुल ही नहीं रहा था।

मानो जम गया हो

और पीछे से साँसों की आवाज़

उसकी गर्दन के पास महसूस हो रही थी।

पूरी ताकत लगाकर उसने दरवाज़े को धक्का दिया—

दरवाजा झट से खुल गया और राहुल सीधे ड्रॉइंग रूम में गिर पड़ा।

उसके बाद डर के मारे राहुल बेहोश हो गया

पीछे खड़ा वो साया जिसे देखकर रूह कांप उठी
उस पल समझ आया…
डर बाहर नहीं था,
वो तो बहुत पास खड़ा था।


सुबह जब सब उठे,

तब राहुल ज़मीन पर बेसुध पड़ा था।

सब हैरान थे, उसे उठाया गया।

उठते ही राहुल बार-बार बस एक ही बात बोल रहा था—

“घर में कोई है

हमारे घर में कोई है…”

उसकी बातें किसी को समझ नहीं आ रही थी।

उसकी हालत देख उसे डाॅक्टर को दिखाया गया 

 डाॅक्टर ने कहा कोई डरावना सपना देखा होगा 

इसलिए यह डर गया है।

पर राहुल बस एक ही बात बोलता था, 

घर में कोई है.....उस रात के बाद

उसके कमरे का दरवाज़ा हमेशा बंद रहने लगा।

दोस्तों…

आज भी उस घर में रहने वाले कहते हैं

कि रात को किसी के चलने की आवाज़ आती है।

पर सबसे डरावनी बात ये है…

कि घर में रहने वालों की गिनती

हमेशा एक ज़्यादा लगती है।


सोचो अगर तुम्हारे घर में भी

कभी ऐसा महसूस हो…

तो तुम क्या करोगे?

नीचे ज़रूर बताना

और अगर कहानी पसंद आई हो

तो अगली और भी डरावनी कहानी के लिए तैयार रहना… 👁️‍🗨️

रात का पीछा

रात में सुनसान सड़क पर अकेला चलता व्यक्ति, पीली स्ट्रीट लाइट और हल्का कोहरा, सामान्य लेकिन बेचैनी भरा माहौल
सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगता है…
डर अभी दूर है।



 नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,


जहाँ डर अचानक नहीं आता…

वो धीरे-धीरे आपके भीतर उतरता है।

यहाँ हम उन अनुभवों की बात करते हैं

जो कहानी लगते हैं…

लेकिन कभी न कभी

किसी के साथ सच में हो सकते हैं।


दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहा हूँ,

जो सुनने में शायद काल्पनिक फिक्शन लगे…

लेकिन अगर आप कभी

अकेले रात में, किसी सुनसान रास्ते से गुज़रे होंगे,

तो यकीन मानिए —

आपको भी लगेगा कि…

“ये मेरे साथ भी हो सकता है।”


कभी-कभी किसी जगह हमें बिना किसी वजह

अजीब सा डर महसूस होने लगता है।

दिल तेज़ धड़कता है,

हम बार-बार पीछे मुड़कर देखते है,

और दिमाग बार-बार समझाता है —

“कुछ नहीं है…

बस वहम है…

लेकिन कुछ डर ऐसे होते हैं दोस्तों…

जो दिमाग से नहीं आते,

वो सीधे महसूस होते हैं।

ये डर हमारे अंदर

बेचैनी और अकेलेपन का एहसास भर देता है।

ऐसा लगता है जैसे

शरीर तो चल रहा है…

लेकिन मन कहीं पीछे छूट गया हो।

और अब…

मैं आपको ऐसी ही एक कहानी बताने जा रहा हूँ

जो आपको ऐसे ही एक डर का एहसास करा देगी।

तो चलीए अब उस कहानी पर

जो रोहन नाम का व्यक्ति खुद आपको बतायेगा।


मेरा नाम रोहन है।

मैं 29 साल का हूं।

और एक प्राइवेट कंपनी में नाइट-शिफ्ट काम करता हूँ।

नाइट-शिफ्ट के कारण

मैं अक्सर देर से ही घर जाता हूं। 

यह हमेशा का था

रोज़ की तरह उस दिन भी

मैं रात करीब 11:45 बजे

ऑफिस से निकलकर

सीधे घर जा रहा था।

लेकिन उस रात ने

सब कुछ बदल दिया।


ऑफिस से घर जाने का एक छोटा रास्ता था,

जो एक पुराने, सुनसान मैदान के किनारे से गुजरता था।

 मैं रोज़ वही रास्ते से घर जाता था।

समय था करीब 12:10 बजे।

हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

आस-पास कोई दुकान, कोई घर नहीं…

बस अंधेरा और सन्नाटा।

सब कुछ… बिल्कुल सुनसान।


मैं चलते हुए

फोन पर समय देख रहा था।

जूतों की आवाज़

खामोश ज़मीन पर साफ सुनाई दे रही थी।

दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।

स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी

आगे-पीछे फैल रही थी।

फिर अचानक…

हवा जैसे रुक सी गई।

जूतों की आवाज़ अब

मुझे थोड़ी भारी लगने लगी।

हर कदम के साथ

दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी।

मुझे लगा

जैसे मेरे पीछे

कोई और भी चल रहा है।

लेकिन जब मैंने रुककर सुना —

सिर्फ मेरी साँसों की आवाज़ थी।


मैंने खुद को समझाया —

“रात है…

दिमाग ज़्यादा सोच रहा है।”

मैं फिर चलने लगा।

लेकिन तभी…

मुझे अपनी चाल के साथ

एक और चाल सुनाई दी।

मैं रुका।

वो आवाज़ भी रुक गई।

मेरे शरीर में 

अजीब सी सिहरन दौड़ गई।


अब माहौल जैसे बदल चुका था।

सन्नाटा चुभने लगा था।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था,

हथेलियाँ ठंडी पड़ गई थीं।

मुझे साफ महसूस हो रहा था —

कोई है…

जो मेरी हर हरकत

कॉपी कर रहा है।

मैं तेज़ चलने लगा।

तो पीछे की आवाज़ भी

तेज़ हो गई।


अचानक

स्ट्रीट लाइट की रोशनी में

मैंने ज़मीन पर

दो परछाइयाँ देखीं।

एक मेरी थी।

दूसरी…

थोड़ी टेढ़ी,

अस्वाभाविक। मैं सहम गया,

मैंने सिर उठाया।

सिर्फ एक पल के लिए

मुझे सामने

किसी का चेहरा दिखा…

आँखें…

बिल्कुल खाली।

और फिर —

सब अंधेरा।

मैं इस कदर डर गया कि 

 बिना सोचे

बस भागने लगा।

मेरी साँसें टूट रही थीं,

पैर भारी हो गए थे।

मेरे पीछे से किसी के

अंधेरी सड़क पर तेज़ चलता व्यक्ति, ज़मीन पर दो परछाइयाँ, एक असामान्य और टेढ़ी, डर और तनाव भरा माहौल
जब कदम तेज़ हों…
और परछाईं एक से ज़्यादा।


घिसटने की आवाज़ लगातार आ रही थी।

जैसे कोई मेरे पिछे ही हो।

मैं गिरते-पड़ते

मैदान पार करके

जैसे तैसे सीधे सड़क पर पहुँचा।

वहा काफ़ी रोशनी थी…

और वो आवाज़ आनी

एकदम बंद हो गई थी।

मैदान की तरफ गहरा 

अंधेरा फैला हुआ था।


उसके बाद मैं घर पहुँचा 

मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।

कपड़े पसीने से भीग चुके थे।

मेरे घरवाले भी मेरी हालत 

देख कर परेशान हो गये थे।

वह पूरी रात

मुझे नींद नहीं आई।

अगले दिन मैं काम पर 

नहीं गया 

मेरे अंदर कुछ टूटा हुआ था।


आज भी…

जब मैं उस रास्ते से गुजरता हूँ,

किसी को

 साथ लेकर जाता हूं 

और अपनी परछाईं

बार बार देखता हूँ।

थका हुआ व्यक्ति सुनसान सड़क के पास खड़ा, ज़मीन की ओर देखता हुआ, पीछे लंबी परछाइयाँ, चेहरे पर डर और भ्रम
कहानी शायद खत्म हो गई…
लेकिन एहसास अब भी यहीं है।


दोस्तो रोहन की कहानी तो यहीं खत्म होती है…

लेकिन डर नहीं।

क्योंकि कभी-कभी…

परछाईं

हमारी नहीं होती।