मम्मी का श्राप


फिल्मी पोस्टर शैली में मम्मी का श्राप, जिसमें विशाल मम्मी, पिरामिड और चार मुख्य पात्र दिखाई दे रहे हैं।
कुछ कब्रें इसलिए नहीं खोली जातीं क्योंकि उनके अंदर खजाना नहीं, बल्कि इंतजार होता है। क्या आप रानी नेफेरु-सा के श्राप का सामना करने के लिए तैयार हैं?



  भाग 1

भूली हुई घाटी


मिस्र की रातें अजीब होती हैं।


दिन में वही रेगिस्तान, जो दूर-दूर तक फैले सुनहरे समुद्र जैसा दिखाई देता है, रात होते ही अपना रूप बदल लेता है। हवा ठंडी हो जाती है, रेत फुसफुसाने लगती है और पुराने खंडहर ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे किसी का इंतजार कर रहे हों।


लक्सर के पुराने बाजार में एक कहावत आज भी सुनाई देती है—


"कुछ कब्रें इसलिए नहीं खोली जातीं क्योंकि उनके अंदर खजाना नहीं, बल्कि इंतजार होता है।"


डॉ. अन्ना मूलर ने यह बात पहली बार एक बूढ़े दुकानदार से सुनी थी।


वह मुस्कुराई और अपनी डायरी में उसे लिख लिया।


अन्ना पिछले पंद्रह वर्षों से मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं का अध्ययन कर रही थी। उसने अनगिनत कब्रें देखी थीं, सैकड़ों शिलालेख पढ़े थे और कई ऐसी कहानियां भी सुनी थीं जिन्हें लोग श्राप का नाम देते थे।


लेकिन वह श्रापों पर विश्वास नहीं करती थी।


कम से कम, तब तक नहीं।


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तीन सप्ताह पहले, अमेरिका के बोस्टन में एक निजी नीलामी के दौरान एक पुराना चमड़े का नक्शा सामने आया था।


नक्शा अधूरा था।


उसके किनारे जले हुए थे और उस पर बने अधिकांश चिन्ह मिट चुके थे। लेकिन एक नाम अब भी साफ दिखाई देता था—


"नेफेरु-सा"


इतिहास में इस नाम की किसी रानी का कोई उल्लेख नहीं था।


यही बात डॉ. एमिली कार्टर को बेचैन कर रही थी।


"अगर इतिहास ने उसका नाम भुला दिया," एमिली ने कहा था, "तो शायद किसी ने जानबूझकर उसे भुलाया है।"


और इसी एक वाक्य ने इस अभियान को जन्म दिया।


दो हफ्ते बाद, एमिली, जेम्स और अन्ना मिस्र पहुंच चुके थे।


लक्सर हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही उन्हें ऐसा लगा मानो वे किसी दूसरे समय में आ गए हों।


पुरानी इमारतें, बाजारों में जलते पीले लैम्प, दूर दिखाई देते मंदिर और हवा में उड़ती महीन रेत...


जेम्स ने कैमरा निकालते हुए कहा, "अगर मैं यहां मर गया, तो कम से कम मेरी आखिरी तस्वीरें शानदार होंगी।"


"तुम हमेशा मरने की बात क्यों करते हो?" एमिली ने पूछा।


"क्योंकि पुरातत्वविदों की नौकरी में दो ही चीजें मिलती हैं—पुरानी हड्डियां और खराब नींद।"


अन्ना ने हल्की मुस्कान दी।


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अगली सुबह वे अपने स्थानीय गाइड से मिले।


उसका नाम था—हसन एल-मसरी।


वह चालीस के आसपास का आदमी था। उसकी घनी मूंछें थीं, सिर पर सफेद कपड़ा बंधा रहता था और उसकी आंखों में हमेशा शरारत दिखाई देती थी।


"आप लोग वही हैं जो मरने के लिए सबसे महंगी जगह चुनकर आए हैं?" उसने उनसे मिलते ही पूछा।


जेम्स हंस पड़ा।


"और तुम वही हो जो हमें वहां ले जाने के लिए पैसे ले रहे हो?"


"बिल्कुल!" हसन ने गर्व से कहा। "मिस्र में दो चीजें कभी मुफ्त नहीं मिलतीं—पानी और राज़।"


अगले एक घंटे तक हसन उन्हें लक्सर घुमाता रहा और लगातार मजाक करता रहा।


लेकिन जैसे ही एमिली ने उसे नक्शा दिखाया, उसके चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।


उसने नक्शे को कुछ सेकंड तक देखा।


फिर बिना कुछ कहे उसे वापस कर दिया।


"मैं इस जगह को जानता हूं," उसने धीमी आवाज में कहा।


"तो फिर समस्या क्या है?" अन्ना ने पूछा।


हसन ने जवाब देने से पहले आसपास देखा, मानो यह सुनिश्चित कर रहा हो कि कोई सुन तो नहीं रहा।


"मेरे दादा उस घाटी के बारे में कहानियां सुनाते थे। कहते थे कि वहां एक रानी सोती है, जिसे मौत के बाद भी अकेला नहीं छोड़ा गया।"


जेम्स ने आंखें घुमाईं।


"और मुझे यकीन है कि कहानी के अंत में कोई श्राप भी होगा।"


हसन ने उसकी ओर देखा।


"नहीं।"


"नहीं?"


"क्योंकि यह कहानी कभी खत्म नहीं हुई।"


कुछ क्षणों के लिए वहां सन्नाटा छा गया।


फिर हसन अचानक हंस पड़ा।


"लेकिन अगर आप लोग मुझे पांच हजार डॉलर देंगे, तो मैं आपको वहां ले चलूंगा!"


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दो दिन बाद, वे रेगिस्तान की ओर निकल पड़े।


उनके साथ चार ऊंट, जरूरी सामान और एक स्थानीय मजदूरों की छोटी टीम भी थी।


पहले दिन की यात्रा सामान्य रही।


लेकिन दूसरे दिन से चीजें बदलने लगीं।


उनका कम्पास ठीक से काम नहीं कर रहा था।


सैटेलाइट फोन बार-बार बंद हो रहा था।


और सबसे अजीब बात...


हर सुबह उन्हें अपने शिविर के चारों ओर किसी के पैरों के निशान दिखाई देते।


"शायद कोई जानवर होगा," जेम्स ने कहा।


लेकिन अन्ना सहमत नहीं थी।


"रेगिस्तान में कोई जानवर सीधे गोल घेरा बनाकर नहीं चलता।"


तीसरी रात, हसन सामान्य से ज्यादा शांत था।


वह आग के पास बैठा हुआ था और पहली बार उसने कोई मजाक नहीं किया।


"क्या हुआ?" एमिली ने पूछा।


हसन कुछ देर चुप रहा।


"जब मैं छोटा था, मेरे दादा ने मुझसे कहा था कि अगर कभी भूली हुई घाटी जाओ और रात में कोई तुम्हारा नाम पुकारे..."


"तो?"


"पीछे मत मुड़ना।"


जेम्स मुस्कुराया।


"और अगर वह मेरा बैंक मैनेजर हुआ तो?"


इस बार हसन नहीं हंसा।


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मिस्र के लक्सर के पास भूली हुई घाटी के प्रवेश द्वार पर खड़े चार पुरातत्वविद और उनका स्थानीय गाइड।
लक्सर के रेगिस्तान में छिपी एक प्राचीन घाटी, जहां हजारों वर्षों से बंद एक कब्र अपने अगले आगंतुक का इंतजार कर रही थी।



अगली सुबह वे घाटी तक पहुंच गए।


वह जगह किसी कब्रिस्तान से ज्यादा एक घाव जैसी लग रही थी।


दो विशाल चट्टानों के बीच एक लंबा रास्ता था, जिसके अंत में रेत में आधा दबा हुआ एक प्राचीन द्वार खड़ा था।


उस द्वार को देखकर अन्ना की सांसें थम गईं।


उसने पहले भी मिस्र की कई कब्रें देखी थीं, लेकिन ऐसी नहीं।


द्वार के ऊपर उकेरी गई आकृतियां अजीब थीं।


उनमें रानी नेफेरु-सा को दिखाया गया था...


लेकिन हर चित्र में उसकी आंखें खुरचकर मिटा दी गई थीं।


"यह किसने किया होगा?" एमिली ने पूछा।


अन्ना ने सिर हिलाया।


"मुझे नहीं पता। लेकिन मिस्र में आंखें मिटाने का मतलब होता है किसी की आत्मा को इतिहास से मिटा देना।"


हसन धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।


"मुझे यह जगह पसंद नहीं आ रही।"


"तुम तो श्रापों पर विश्वास नहीं करते थे।"


"मैं आज भी नहीं करता," हसन बोला, "लेकिन मैं उन लोगों पर विश्वास करता हूं जिन्होंने इन श्रापों को बनाने में पूरी जिंदगी लगा दी।"


तीन घंटे की मेहनत के बाद आखिरकार द्वार खोला गया।


और जैसे ही वह खुला...


घाटी में अचानक तेज हवा चलने लगी।


रेत का बवंडर उठा।


मजदूरों में से एक घुटनों के बल बैठ गया और अरबी में प्रार्थना करने लगा।


द्वार के भीतर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।


हजारों वर्षों से बंद एक जगह के अंदर इतनी ठंडी हवा नहीं होनी चाहिए थी।


एमिली ने टॉर्च जलाई।


और फिर चारों अंदर चले गए।


उन्हें नहीं पता था कि उस क्षण से उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी थी।


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उस रात उन्होंने कब्र के बाहर ही शिविर लगाया।


रात के लगभग तीन बजे...


एमिली की आंख अचानक खुल गई।


उसे लगा कि कोई उसके तंबू के बाहर धीरे-धीरे चल रहा है।


खर्र...


खर्र...


जैसे कोई भारी चीज रेत पर घसीटते हुए चल रही हो।


उसने अपनी घड़ी देखी।


3:07 AM.


आवाज फिर आई।


इस बार पहले से ज्यादा पास।


आधी रात को मिस्र के रेगिस्तान में तंबू के बाहर अजीब पैरों के निशान देखते हुए एक महिला पुरातत्वविद।
रात के तीन बजे, रेत पर बने पट्टियों में लिपटे पैरों के निशान और अंधेरे में गूंजती एक रहस्यमयी आवाज—"उसे बता दो... उसने मेरी अंगूठी चुरा ली है।"



एमिली ने धीरे-धीरे टॉर्च उठाई और तंबू का पर्दा हटाया।


बाहर कोई नहीं था।


लेकिन रेत पर बने निशान शिविर के चारों ओर घूमते हुए सीधे उसके तंबू तक आकर खत्म हो रहे थे।


वह झुककर उन्हें देखने लगी।


वे इंसानी पैरों के निशान नहीं थे।


वे किसी ऐसे व्यक्ति के निशान थे जिसके पैर मोटी पट्टियों में लिपटे हुए थे।


तभी...


उसके कान के बिल्कुल पास किसी महिला ने बहुत धीमी आवाज में फुसफुसाया—


"उसे बता दो... उसने मेरी अंगूठी चुरा ली है।"


एमिली का खून जम गया।


क्योंकि वह आवाज उसके पीछे से नहीं...


बल्कि उसके ठीक बगल से आई थी।



मम्मी का श्राप – भाग 2


अगला रक्षक


एमिली का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।


उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।


वहां कोई नहीं था।


रेगिस्तान शांत था। दूर जलती आग की लपटें हवा के साथ हिल रही थीं और बाकी तंबुओं में सन्नाटा पसरा हुआ था।


लेकिन वह आवाज...


वह बिल्कुल साफ थी।


"उसे बता दो... उसने मेरी अंगूठी चुरा ली है।"


एमिली ने खुद को समझाने की कोशिश की। शायद वह थकी हुई थी। पिछले कई दिनों से वे लगातार यात्रा कर रहे थे।


लेकिन तभी उसकी नजर रेत पर पड़े उन निशानों पर गई।


वे निशान शिविर के चारों ओर घूमते हुए सीधे हसन के तंबू तक जा रहे थे।


और वहीं खत्म हो रहे थे।


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अगली सुबह, एमिली ने सबको रात की घटना बताई।


जेम्स ने पहले तो इसे नींद और तनाव का असर बताया, लेकिन अन्ना चुप रही।


वह हसन को ध्यान से देख रही थी।


उसकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ चुके थे।


"तुम ठीक तो हो?" उसने पूछा।


"मैंने पूरी रात नहीं सोई," हसन ने जवाब दिया।


"क्यों?"


कुछ सेकंड तक वह चुप रहा।


फिर उसने धीमी आवाज में कहा, "क्योंकि पूरी रात कोई मेरे तंबू के बाहर खड़ा रहा।"


शिविर में अचानक सन्नाटा छा गया।


"तुमने देखा उसे?" जेम्स ने पूछा।


हसन ने सिर हिलाया।


"नहीं... लेकिन मैं उसकी सांसें सुन सकता था।"


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उस दिन वे दोबारा कब्र के अंदर गए।


कब्र पहले से कहीं ज्यादा अंधेरी लग रही थी।


जैसे दीवारों ने रात भर में और भी पुरानी यादें अपने अंदर समेट ली हों।


मुख्य कक्ष में पहुंचकर अन्ना अचानक रुक गई।


"यह असंभव है..."


"क्या हुआ?" एमिली ने पूछा।


अन्ना ने दीवार की ओर इशारा किया।


कल जहां केवल रानी नेफेरु-सा का चित्र बना हुआ था, वहां अब एक और आकृति दिखाई दे रही थी।


एक आदमी...


उसके सिर पर मिस्री रक्षकों जैसा मुकुट था।


और उसके हाथ में एक छोटी-सी अंगूठी बनी हुई थी।


चित्र के नीचे प्राचीन भाषा में एक शब्द लिखा था—


"रक्षक"


"यह कल यहां नहीं था," अन्ना बुदबुदाई।


जेम्स ने तस्वीरें खींचनी शुरू कर दीं।


"शायद हमने ध्यान नहीं दिया होगा।"


"नहीं," अन्ना ने दृढ़ स्वर में कहा। "मैंने इस पूरी दीवार की तस्वीरें ली थीं। यह चित्र यहां नहीं था।"


तभी हसन अचानक घबराकर पीछे हट गया।


उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।


"मुझे यहां से बाहर जाना है।"


"क्यों?"


हसन ने जवाब नहीं दिया।


उसने कांपते हुए अपनी जेब में हाथ डाला।


और एक सोने की अंगूठी बाहर निकाली।


पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।


"तुमने यह कब ली?" एमिली लगभग चिल्ला पड़ी।


"मैं... मैं सिर्फ इसे देखना चाहता था।"


अंगूठी पर बेहद बारीक अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।


अन्ना ने उसे पढ़ने की कोशिश की।


उसका चेहरा सफेद पड़ गया।


"इस पर लिखा है—'जो मुझे जगाएगा, वही मेरी जगह लेगा।'"


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उसी क्षण, कब्र के अंदर कहीं दूर से खट... खट... खट... की आवाज आने लगी।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई पत्थर पर धीरे-धीरे चल रहा हो।


आवाज पास आती गई।


खट...


खट...


खट...


फिर अचानक बंद हो गई।


कुछ पल बाद, जेम्स ने कांपती आवाज में कहा, "कृपया मुझे बताओ कि यह आवाज तुम सबने भी सुनी है।"


तभी मुख्य कक्ष के बीच रखा पत्थर का ताबूत धीरे-धीरे हिलने लगा।


सदियों पुराना उसका ढक्कन कुछ इंच खिसका।


और कमरे में एक ऐसी गंध फैल गई, जैसे किसी बंद जगह को हजारों साल बाद खोला गया हो।


हसन पीछे हटते हुए दीवार से टकरा गया।


"मैंने जानबूझकर नहीं लिया था!"


ताबूत का ढक्कन और खिसका।


अंदर अंधेरा था।


लेकिन उस अंधेरे में दो आंखें दिखाई दे रही थीं।


वे इंसानी आंखें नहीं थीं।


वे पूरी तरह काली थीं।


और वे सीधे हसन को देख रही थीं।


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हसन चीख पड़ा और घुटनों के बल बैठ गया।


"मुझे माफ कर दो!"


अचानक उसे कुछ याद आया।


"मेरे दादा ने... उन्होंने मुझे कुछ बताया था।"


"क्या?" एमिली ने पूछा।


"उन्होंने कहा था कि रानी नेफेरु-सा को उसके दुश्मनों ने नहीं मारा था। उसने खुद को जिंदा दफना दिया था।"


"क्या?"


"उसका मानना था कि एक दिन कोई उसका विश्राम भंग करेगा। इसलिए उसने अपनी आत्मा को अपनी कब्र से बांध दिया। लेकिन... लेकिन कोई आत्मा हमेशा के लिए जाग नहीं सकती। उसे समय-समय पर आराम चाहिए।"


अन्ना की आंखें फैल गईं।


"और उस दौरान उसकी जगह कोई और लेता है।"


हसन ने सिर झुका लिया।


"रक्षक।"


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ताबूत अब पूरी तरह खुल चुका था।


लेकिन अंदर जो था, उसे देखकर सबकी सांसें थम गईं।


ताबूत खाली था।


रानी नेफेरु-सा वहां नहीं थी।


केवल सूखी पट्टियां और धूल बची थी।


तभी कमरे के दूसरे छोर से एक महिला की आवाज गूंजी—


"इतने वर्षों बाद... आखिर कोई आया।"


एमिली ने पीछे मुड़कर देखा।


कमरे के अंधेरे कोने में एक लंबी आकृति खड़ी थी।


उसका शरीर पट्टियों में लिपटा हुआ था।


लेकिन उसका चेहरा...


वह किसी ममी का नहीं, बल्कि एक जीवित महिला का लग रहा था।


उसने हसन की ओर हाथ बढ़ाया।


"मैं थक गई हूं..."


हसन की आंखों से आंसू बहने लगे।


"नहीं..."


"हर श्राप को एक उत्तराधिकारी चाहिए।"


अंगूठी अचानक हसन की उंगली में अपने आप चढ़ गई।


और उसी क्षण, उसके शरीर पर पट्टियां उभरने लगीं।


वह दर्द से चीखने लगा।


प्राचीन मिस्री कब्र के अंदर मम्मी में बदलता हुआ हसन एल-मसरी और पीछे खड़ी रानी नेफेरु-सा की आत्मा।
श्राप का एक उत्तराधिकारी होता है। रानी नेफेरु-सा की सदियों पुरानी नींद आखिरकार टूट चुकी थी, और अब उसे एक नया रक्षक मिल गया था।



एमिली और जेम्स उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़े, लेकिन अन्ना ने उन्हें रोक दिया।


"नहीं! अब बहुत देर हो चुकी है।"


कुछ ही सेकंड में सब खत्म हो गया।


कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।


रानी नेफेरु-सा गायब हो चुकी थी।


और जहां हसन खड़ा था...


वहां अब पट्टियों में लिपटा एक नया रक्षक खड़ा था।


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टीम किसी तरह वहां से बाहर निकलने में सफल रही।


उन्होंने कभी इस घटना के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।


दुनिया के लिए यह अभियान असफल रहा।


और हसन एल-मसरी इतिहास के पन्नों से गायब हो गया।


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तीन महीने बाद...


डॉ. अन्ना मूलर को जर्मनी में एक पार्सल मिला।


उसके अंदर केवल एक पुरानी तस्वीर थी।


तस्वीर उसी कब्र की थी।


इस बार ताबूत बंद था।


उसके सामने पट्टियों में लिपटा एक आदमी खड़ा था।


लेकिन सबसे डरावनी बात तस्वीर नहीं थी।


तस्वीर के पीछे हाथ से एक वाक्य लिखा गया था—


«"मैं अब समझ गया हूं कि मेरे दादा कभी उस घाटी का नाम क्यों नहीं लेते थे। और अन्ना... कृपया किसी को यहां मत आने देना। मैं बहुत थक चुका हूं।"»


नीचे एक हस्ताक्षर था।


—हसन एल-मसरी


अन्ना के हाथ कांपने लगे।


क्योंकि तस्वीर के कोने पर तारीख लिखी हुई थी।


और वह तारीख...


तीन दिन बाद की थी।



खुनी खजाना



भाग 1 : सोने का सिक्का

रात के करीब नौ बजे होंगे।


बारिश अभी-अभी रुकी थी। सड़क किनारे बनी छोटी-सी चाय की टपरी पर चार आदमी चुपचाप बैठे थे। उनके कपड़ों पर सीमेंट और मिट्टी लगी हुई थी। दिनभर की मजदूरी के बाद हर चेहरे पर वही थकान थी, जो सालों से उनके साथ घर जाती थी।


"आज कितने मिले?" रघु ने चाय का आखिरी घूंट लेते हुए पूछा।


"चार सौ।"


"मेरे साढ़े तीन सौ।"


"और मेरे तीन सौ पचहत्तर।"


कुछ पल के लिए फिर सन्नाटा छा गया।


टपरी के बाहर बारिश का पानी अभी भी टप-टप करके टीन की छत से गिर रहा था। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।


कोड़ा बस सामने फैले अंधेरे को देखे जा रहा था।


"क्या हुआ?" बबलू ने पूछा।


कोड़ा ने बिना उसकी ओर देखे कहा, "अगर मैं कहूं कि हम चारों कल सुबह तक अमीर हो सकते हैं?"

बारिश भरी रात में सड़क किनारे चाय की टपरी पर बैठे चार मजदूर एक रहस्यमयी सोने के सिक्के को हैरानी से देखते हुए।
जंगल के किनारे खड़ा वह बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था। उसकी एक मुस्कान ने चार जिंदगियों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।



तीनों एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।


फिर मंग्या हंस पड़ा।


"पहले भी तू दो बार अमीर बन चुका है। एक बार लॉटरी से और दूसरी बार सपने में।"


इस बार कोड़ा नहीं हंसा।


उसने धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला और मेज पर एक छोटी-सी चीज रख दी।


वह एक पुराना सोने का सिक्का था।


टपरी के ऊपर लटकता बल्ब अचानक एक बार टिमटिमाया।


तीनों की नजरें सिक्के पर टिक गईं।


"ये नकली होगा," रघु बोला।


"मैं भी यही सोच रहा था।" कोड़ा की आवाज धीमी थी, "लेकिन शहर के सुनार ने इसके बदले पंद्रह हजार रुपये देने की बात कही है।"


मंग्या के चेहरे की हंसी गायब हो गई।


"कहां मिला?"


कोड़ा कुछ पल चुप रहा। उसकी आंखें सड़क के उस पार अंधेरे में टिकी थीं।


"अगर बताऊं... तो शायद तुम लोग आज रात सो नहीं पाओगे।"


अब वहां बैठे चारों आदमियों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज थी।


"तीन रात पहले मैं काम से लौट रहा था। रास्ते में एक बूढ़ा मिला। मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।"


"कैसा बूढ़ा?"


"दुबला-पतला। सफेद धोती। हाथ में लालटेन।"


"फिर?"


"उसने मुझे नाम लेकर बुलाया।"


तीनों चौंक गए।


"नाम लेकर?"


कोड़ा ने सिर हिलाया।


"उसने कहा—'कोड़ा, बहुत मेहनत कर ली। अब वक्त है कि किस्मत तेरे दरवाजे पर आए।'"


"तू उसके साथ चला गया?" बबलू ने पूछा।


"नहीं। पहले तो मुझे लगा कि कोई पागल है। लेकिन फिर उसने ये सिक्का मेरी हथेली पर रख दिया।"


कोड़ा ने सिक्के की ओर इशारा किया।


"और जाने से पहले उसने एक बात कही..."


"क्या?"


कोड़ा की आवाज लगभग फुसफुसाहट में बदल गई।


«"कुछ खजाने जमीन में इसलिए नहीं दबाए जाते कि लोग उन्हें ढूंढ़ लें... बल्कि इसलिए कि वे लोगों को अपने पास बुला सकें।"»


मंग्या ने हंसने की कोशिश की, लेकिन उसकी हंसी गले में ही अटक गई।



"फिर?"


"अगली रात मैं वापस गया।"


"अकेला?"


"हां।"


"और?"


कोड़ा ने गहरी सांस ली।


"मैंने उसे फिर देखा। वह जंगल के किनारे खड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा। बस उंगली से अंदर जाने का इशारा किया।"


अब टपरी वाला भी उनकी बातें सुन रहा था।


"मैं उसके पीछे-पीछे गया। करीब दस मिनट बाद वह अचानक गायब हो गया। जैसे था ही नहीं।"


"झूठ।" रघु बोला, लेकिन उसकी आवाज में पहले जैसा भरोसा नहीं था।


"काश, झूठ होता।"


कोड़ा ने आगे कहा, "और फिर मैंने उसे देखा।"


"किसे?"


"जमीन को।"


"क्या मतलब?"


"जंगल के बीचों-बीच... मिट्टी के नीचे से सुनहरी रोशनी निकल रही थी। बिल्कुल ऐसे, जैसे किसी ने धरती के नीचे सूरज छिपा दिया हो।"


एक पल के लिए किसी ने कुछ नहीं कहा।


गरीबी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है। यहां तक कि वह उन बातों पर भी विश्वास करने लगता है, जिन पर कभी हंसता था।


"अगर वहां और सिक्के हुए तो?" बबलू ने धीरे से पूछा।


कोड़ा ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।


"इसीलिए तो मैं तुम लोगों को बता रहा हूं।"


रघु उठकर खड़ा हो गया।


"मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा।"


"ठीक?" कोड़ा हंसा। "क्या हमारी जिंदगी ठीक है? सुबह से शाम तक मरते हैं और महीने के आखिर में जेब में पांच सौ भी नहीं बचते।"


किसी के पास इसका जवाब नहीं था।


कुछ देर बाद मंग्या बोला, "अगर जाना है... तो आज ही चलते हैं।"


"आज?"


"हां। जितनी देर करेंगे, उतना दिमाग हमें रोकेगा।"


रघु ने मना करने की कोशिश की, लेकिन बाकी तीनों का फैसला हो चुका था।


रात के ग्यारह बजे, चारों हाथों में टॉर्च और फावड़े लिए जंगल की ओर निकल पड़े।


जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, हवा ठंडी होती जा रही थी।


जंगल का रास्ता कीचड़ से भरा था। ऊपर बादल चांद को बार-बार ढक रहे थे।


तभी...


चारों एक साथ रुक गए।


जंगल के ठीक किनारे, एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा था।


उसके हाथ में लालटेन थी।


टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।


वह वही बूढ़ा आदमी था।


लेकिन इस बार...


उसकी आंखों में काली पुतलियां नहीं थीं।


वे पूरी तरह सफेद थीं।


और वह मुस्कुरा रहा था।


भाग 2 : जंगल की फुसफुसाहट


कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।


बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। बूढ़ा पेड़ के नीचे बिल्कुल स्थिर खड़ा था। उसकी सफेद आंखें चारों को ऐसे देख रही थीं, जैसे वह उनके आने का इंतजार कर रहा हो।

आधी रात के घने जंगल में सफेद आंखों वाला बूढ़ा लालटेन लिए चार मजदूरों को अंधेरे की ओर बुलाते हुए।
जंगल के किनारे खड़ा वह बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था। उसकी एक मुस्कान ने चार जिंदगियों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।


"मैंने कहा था न... यही है वो।" कोड़ा की आवाज कांप रही थी।


"चलो यहां से!" रघु लगभग चिल्ला पड़ा।


लेकिन तभी बूढ़ा मुड़ा और बिना कुछ कहे जंगल के अंदर चलने लगा।


उसकी लालटेन की पीली रोशनी अंधेरे में धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी।


"वह हमें बुला रहा है।" बबलू ने कहा।


"और अगर जाल में फंसा रहा हो तो?" रघु ने जवाब दिया।


कोड़ा ने अपनी मुट्ठी में सोने का सिक्का कस लिया।


"अगर वह हमें मारना चाहता, तो तीन दिन पहले ही मार देता।"


यह तर्क कमजोर था, लेकिन लालच अक्सर कमजोर तर्कों को भी मजबूत बना देता है।


कुछ क्षण बाद चारों उसके पीछे चल पड़े।


जंगल के अंदर हवा और ठंडी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे हर कदम के साथ वे किसी और ही दुनिया में प्रवेश कर रहे हों।

चलते-चलते मंग्या अचानक रुक गया।


"ये देखो।"


एक पेड़ के तने पर किसी ने गहरे निशान बनाए हुए थे। वे किसी भाषा के अक्षर नहीं थे, लेकिन उन्हें देखकर अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।


"शायद किसी ने मजाक किया होगा।" बबलू बोला।


तभी उन्हें एहसास हुआ कि बूढ़ा काफी आगे निकल चुका था।


वे जल्दी-जल्दी उसके पीछे बढ़े।


करीब बीस मिनट तक चलने के बाद वे एक पुराने कुएं के पास पहुंचे।


कुएं के चारों ओर घास उगी हुई थी। उसके पत्थरों पर काई जमी थी।


बूढ़ा कुएं के पास खड़ा था।


फिर पहली बार उसने कुछ कहा।


"नीचे मत देखना।"


उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि लगा जैसे हवा बोल रही हो।


"क्यों?" कोड़ा के मुंह से निकल गया।


बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।


और फिर...


वह आगे बढ़ गया।


चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद बबलू खुद को रोक नहीं पाया।


उसने पलटकर कुएं के अंदर झांका।


अगले ही पल उसका चेहरा सफेद पड़ गया।


"क्या हुआ?" मंग्या ने उसका कंधा पकड़कर पूछा।


बबलू के होंठ कांप रहे थे।


"नीचे... नीचे कोई खड़ा है।"


तीनों ने एक साथ कुएं में देखा।


अंदर सिर्फ अंधेरा था।


"वहां कोई नहीं है।"


"था!" बबलू लगभग रोने लगा। "मैंने देखा। उसने ऊपर देखकर मुस्कुराया था।"


रघु ने उसका हाथ पकड़ा।


"बस! बहुत हो गया। हम वापस जा रहे हैं।"


लेकिन उसी समय उन्हें फिर वह लालटेन दिखाई दी।


बूढ़ा अब कुछ दूर एक खंडहर के सामने खड़ा था।


वह एक पुराना मंदिर था।


उसकी आधी छत गिर चुकी थी। टूटी हुई मूर्तियां मिट्टी में दबी थीं। मंदिर के सामने की जमीन बाकी जगहों से अलग दिख रही थी, जैसे उसे कई बार खोदा गया हो।


बूढ़े ने धीरे से अपनी उंगली उस जमीन की ओर कर दी।


"यहीं है।"


"क्या?" कोड़ा ने पूछा।


बूढ़ा मुस्कुराया।


"जिसकी तलाश तुम्हें यहां खींच लाई।"


अचानक लालटेन बुझ गई।


और जब कोड़ा ने टॉर्च की रोशनी आगे की...


वह गायब हो चुका था।


अब वहां सिर्फ चार आदमी और उनके दिलों की धड़कनें थीं।


"हमें जाना चाहिए।" रघु बोला।


लेकिन तभी मंग्या घुटनों के बल बैठ गया और मिट्टी खोदने लगा।


"इतनी दूर आए हैं। खाली हाथ नहीं लौटूंगा।"


कुछ क्षण बाद बाकी तीनों ने भी फावड़े उठा लिए।


पहले दस मिनट तक कुछ नहीं मिला।


फिर...


"टन!"


रघु का फावड़ा किसी कठोर चीज से टकराया।


उसने मिट्टी हटाई।


वह एक सोने का सिक्का था।


फिर दूसरा।


फिर तीसरा।


कुछ ही देर में उनके पैरों के पास सिक्कों का छोटा-सा ढेर लग गया।

खंडहर मंदिर के बीच जमीन से निकला विशाल संदूक, काला धुआं और डरे हुए मजदूरों का भयावह दृश्य।
संदूक में सोना नहीं, बल्कि सदियों पुराना श्राप उनका इंतजार कर रहा था। उस रात खजाने ने अपना नया रखवाला चुन लिया।


"हम सचमुच अमीर हो गए!" मंग्या खुशी से चिल्लाया।


और तभी...


जंगल में फैली हर आवाज अचानक बंद हो गई।


न हवा।


न झींगुर।


न बारिश।


सिर्फ सन्नाटा।


कोड़ा के कान के पास किसी ने बहुत धीरे से फुसफुसाया—


«"और गहरा खोदो..."»


उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।


कोई नहीं था।


"तुमने कुछ कहा?" उसने पूछा।


तीनों ने ना में सिर हिलाया।


फिर वही आवाज आई।


इस बार थोड़ी तेज।


«"और... गहरा... खोदो..."»


अब चारों ने उसे सुना था।


बबलू के हाथ से फावड़ा छूट गया।


"मैं जा रहा हूं।"


लेकिन तभी जमीन के नीचे से कुछ हिलने लगा।


रघु ने कांपते हुए मिट्टी हटाई।


पहले उसे लगा कि यह कोई जड़ है।


फिर वह जड़ मुड़ी।


और उसकी उंगलियां दिखाई दीं।


वह इंसानी हाथ था।


अचानक उस हाथ ने मिट्टी से बाहर आकर कोड़ा की कलाई कसकर पकड़ ली।


जंगल में पहली बार किसी की चीख गूंजी।


और उसी पल...


मंदिर के पीछे से किसी के हंसने की आवाज आई।


भाग 3 : आखिरी रखवाला


कोड़ा दर्द से चीख उठा।


उसने पूरी ताकत से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी से निकला वह हाथ किसी इंसान का नहीं लग रहा था। उसकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी।


"खींचो उसे!" रघु चिल्लाया।


मंग्या और बबलू ने कोड़ा को पीछे खींचना शुरू किया।


कुछ सेकंड बाद वह हाथ अचानक ढीला पड़ गया और वापस मिट्टी के अंदर चला गया।


चारों हांफ रहे थे।


"बस! अब बहुत हो गया!" रघु बोला। "हम अभी के अभी यहां से जा रहे हैं!"


लेकिन कोड़ा की नजर अभी भी जमीन पर बिखरे सोने के सिक्कों पर थी।


"इतना सोना..." उसने फुसफुसाते हुए कहा, "इतना सोना छोड़कर?"


"तुझे अपनी जान प्यारी नहीं है?"


कोड़ा ने कोई जवाब नहीं दिया।


तभी...


धरती हल्के-हल्के कांपने लगी।


मंदिर की टूटी हुई दीवारों से धूल गिरने लगी। कुएं के अंदर से किसी के रोने की आवाज आने लगी।


और फिर, उनके सामने की जमीन धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।


चारों पीछे हट गए।


मिट्टी फट रही थी।


उसके बीचों-बीच एक विशाल लकड़ी का संदूक बाहर आने लगा। उस पर लोहे की जंग लगी पट्टियां थीं और ऐसा लग रहा था, जैसे वह सैकड़ों सालों से जमीन के नीचे दबा हुआ हो।


संदूक के ऊपर किसी ने नुकीली चीज से कुछ लिखा था।


रघु ने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली।


«"जो इसे खोलेगा... वह इसकी रखवाली करेगा।"»


"अब भी नहीं समझे?" बबलू लगभग रोते हुए बोला। "यह खजाना नहीं है!"


लेकिन कोड़ा जैसे उनकी बातें सुन ही नहीं रहा था।


वह धीरे-धीरे संदूक की ओर बढ़ने लगा।


"कोड़ा, रुक जा!"


"पूरी जिंदगी गरीबी में काट दी!" वह पहली बार जोर से चिल्लाया। "भगवान ने पहली बार कुछ दिया है और मैं उसे छोड़ दूं?"


उसने संदूक पर हाथ रखा।


एक पल के लिए हवा पूरी तरह थम गई।


फिर उसने उसे खोल दिया।


चारों ने अंदर देखा।


और उनकी सांसें रुक गईं।


अंदर सोना नहीं था।


सिर्फ खोपड़ियां थीं।


एक...


दो...


तीन...


कुल चौदह।


हर खोपड़ी के माथे पर किसी का नाम खुदा हुआ था।


और सबसे नीचे...


पंद्रहवीं जगह खाली थी।


कोड़ा की टॉर्च कांप रही थी।


"ये... ये क्या है?"


तभी एक खोपड़ी की आंखों के खाली गड्ढों से काला धुआं निकलने लगा।


फिर दूसरी।


फिर तीसरी।


कुछ ही सेकंड में पूरा संदूक काले धुएं से भर गया।


और फिर...


सभी खोपड़ियों के जबड़े एक साथ हिले।


«"हमने भी यही सोचा था..."»


«"बस एक रात..."»


«"बस एक खजाना..."»


«"बस एक मौका..."»


कोड़ा पीछे हट गया।


अचानक उसे कुछ याद आया।


"बूढ़ा..."


वह तेजी से मुड़ा।


वही बूढ़ा मंदिर के दरवाजे पर खड़ा था।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।


"तू कौन है?" कोड़ा चिल्लाया।


बूढ़े ने धीरे से कहा—


«"मैं चौदहवां रखवाला हूं।"»


कोड़ा का शरीर कांप उठा।


"और अब..."


बूढ़े ने अपनी सफेद आंखों से उसकी ओर देखा।


«"तुम पंद्रहवें हो।"»


अगले ही पल, जमीन के नीचे से दर्जनों सड़े हुए हाथ निकले।


उन्होंने कोड़ा के पैर पकड़ लिए।


"नहीं! मुझे बचाओ!"


रघु ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन देर हो चुकी थी।


कुछ ही सेकंड में कोड़ा मिट्टी के अंदर समा चुका था।


और जैसे ही वह गायब हुआ...


संदूक में सबसे नीचे वाली खाली जगह पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभरने लगा।


"कोड़ा"


रघु, मंग्या और बबलू बिना पीछे देखे भागते रहे।


उन्होंने कभी उस रात के बारे में किसी से बात नहीं की।


समय बीत गया।


छह महीने बाद...


एक सुनसान सड़क पर एक ट्रक खराब हो गया।


ड्राइवर और उसका हेल्पर मदद की तलाश में पैदल चलने लगे।


कुछ दूर उन्हें एक आदमी दिखाई दिया।


सफेद धोती।


हाथ में लालटेन।


"भैया, यहां आसपास कोई गांव है?" ड्राइवर ने पूछा।


आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ मुड़ा।


उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं।


उसने मुस्कुराकर अपनी जेब से एक पुराना सोने का सिक्का निकाला और कहा—


«"गांव तो है... लेकिन पहले ये बताओ।"»


«"क्या तुम लोग जल्दी अमीर बनना चाहते हो?"»


और उस रात...


खजाने ने अपना सोलहवां रखवाला चुन लिया।

"मेरी डरावनी रात"

 मेरा नाम वृंदा है। आज मैं आपको जो बताने जा रही हूँ, वह कोई कहानी नहीं है। यह मेरे जीवन का एक ऐसा अनुभव है, जिसके बारे में सोचते ही आज भी मेरे हाथ ठंडे पड़ जाते हैं।


मैं यह नहीं कहूँगी कि जो मैंने देखा वह भूत था, क्योंकि सच कहूँ तो मैं आज तक नहीं जानती कि वह क्या था।


लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि उस रात, उस घर में, मैं और मेरी पाँच साल की बेटी अकेले नहीं थे।


यह घटना लगभग पाँच साल पुरानी है।


मेरे पति लोक निर्माण विभाग (PWD) में इंजीनियर हैं। उन दिनों उनका तबादला जळगाँव से नाशिक हो गया था। विभाग की तरफ़ से हमें एक सरकारी क्वार्टर मिला था, लेकिन वह शहर से काफ़ी दूर था और उसकी हालत भी अच्छी नहीं थी। इसलिए हमने किराए पर घर लेने का फैसला किया।

नाशिक में किराए के नए घर के बाहर अपनी बेटी के साथ खड़ी वृंदा, जिसके चेहरे पर हल्की बेचैनी दिखाई दे रही है।
नाशिक पहुँचने के बाद यह घर पहली नज़र में सामान्य लगा, लेकिन न जाने क्यों इसे देखते ही मन में एक अजीब-सी घबराहट पैदा हुई।


कई घर देखने के बाद हमें एक घर पसंद आ गया।


घर अच्छा था। किराया भी हमारी पहुँच में था और मेरे पति के ऑफिस से भी ज़्यादा दूर नहीं था। लेकिन न जाने क्यों, उस घर को देखते ही मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी हुई थी।


वह घर बाकी घरों से थोड़ा हटकर बना हुआ था। सामने एक संकरी गली थी, और पीछे एक खाली मैदान, जिसमें शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था। घर के दोनों तरफ़ मकान तो थे, लेकिन उसके आसपास हमेशा एक अजीब-सी ख़ामोशी महसूस होती थी।


घर के मालिक ने बस इतना कहा था, "दो साल से घर खाली पड़ा था। अब आप लोग आ रहे हैं, अच्छा लग रहा है।"


उस समय हमने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।


शिफ्ट होने के शुरुआती कुछ दिन बिल्कुल सामान्य रहे।

मेरे पति सुबह ऑफिस चले जाते और मैं अपनी पाँच साल की बेटी के साथ घर पर रहती। धीरे-धीरे मेरी पहचान दो घर छोड़कर रहने वाली शोभा चाची से हो गई। वे बहुत अच्छी थीं। लेकिन एक बात मैंने कई बार नोटिस की—जब भी हमारे घर का ज़िक्र होता, उनके चेहरे पर एक पल के लिए अजीब-सा भाव आ जाता।


घर में आए लगभग एक हफ्ता हुआ होगा, जब मैंने कुछ अजीब बातें महसूस करनी शुरू कीं।


कई बार मैं रसोई में काम कर रही होती और अचानक देखती कि मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ है। जबकि मुझे पूरा यकीन होता था कि मैंने उसे अंदर से बंद किया था।


एक दिन मैं छत पर कपड़े सुखा रही थी। अचानक मुझे लगा कि कोई मेरे पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया है।


मुझे लगा की मेरे पती जल्दी आ गये है..


मैंने बिना पीछे देखे कहा, "इतनी जल्दी आ गए आज?"


लेकिन जब मैं पलटी...


वहाँ कोई नहीं था।


कुछ सेकंड तक मैं सीढ़ियों को देखती रही। हवा चल रही थी। कपड़े हिल रहे थे। लेकिन वहाँ मेरे अलावा कोई नहीं था।


उस शाम मैंने यह बात शोभा चाची को बताई।


उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, जैसे कुछ कहना चाहती हों।


लेकिन फिर मुस्कुराकर बोलीं, "नया घर है बेटी, थोड़ा समय लगेगा आदत होने में।"


उनकी आवाज़ सामान्य थी।


लेकिन उनकी आँखें नहीं।


दिन बीतते गए और घर का माहौल बदलने लगा।


कभी पंखा अपने आप बंद हो जाता।


कभी रात में रसोई से बर्तनों के खनकने की आवाज़ आती।


कभी ऐसा लगता कि कोई ड्रॉइंग रूम में टहल रहा है।


मैंने इन सब बातों को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। मैंने अपने पति को कुछ नहीं बताया। मुझे लगा, वे मेरी बात का मज़ाक उड़ा देंगे।


लेकिन फिर एक दिन ऐसा हुआ, जिसने पहली बार मुझे भीतर तक डरा दिया।


मैंने बेटी को दोपहर में सुला दिया था और रसोई में खाना बना रही थी।


अचानक मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा है।


यह सिर्फ़ एहसास नहीं था।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई लगातार मुझे देख रहा हो।


मेरे हाथ रुक गए।


मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।


मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।


वहाँ कोई नहीं था।


मैंने राहत की साँस ली ही थी कि उसी समय बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आने लगी।


बिल्कुल ऐसे...


जैसे कोई बाल्टी से पानी डालकर नहा रहा हो।


रसोई में खाना बनाते समय पीछे किसी की मौजूदगी महसूस करती हुई डरी हुई भारतीय महिला, जबकि बाथरूम का फर्श गीला दिखाई दे रहा है।
उस दोपहर पहली बार मुझे ऐसा महसूस हुआ कि घर में कोई मुझे लगातार देख रहा है—लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर वहाँ कोई नहीं था।



मुझे आज भी याद है, उस समय मेरे हाथ काँपने लगे थे।


मैंने हिम्मत जुटाई और बाथरूम का दरवाज़ा खोला।


अंदर कोई नहीं था।


लेकिन फर्श गीला था।


उस रात मैंने पहली बार अपने पति को सब कुछ बताया।


उन्होंने मेरी बातें सुनीं और फिर हँसते हुए कहा, "तुम दिन भर अकेली रहती हो, इसलिए ज़्यादा सोचने लगी हो।"


मैं चुप हो गई।


लेकिन उस दिन के बाद मुझे लगने लगा था कि उस घर में कुछ तो था।


फिर वह रात आई...


जिसे मैं चाहकर भी कभी नहीं भूल सकती।

उस दिन मेरे पति को अचानक काम से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने फोन करके बताया कि वे रात को घर नहीं आएँगे।


यह सुनकर मेरा मन और भी बेचैन हो गया।


मैंने घर के सारे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर दीं। बेटी को अपने पास सुलाया ....कमरे की लाइट बंद करने की हिम्मत नहीं हुई।


मुझे पता था...


उस रात मुझे नींद नहीं आने वाली।


पता नहीं रात के कितने बजे होंगे कि अचानक कुछ आहट हुई।


कमरे में इतनी ख़ामोशी थी कि मुझे अपनी साँसों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।


मैंने मोबाइल उठाकर देखा।


रात के 12 बजकर 37 मिनट हो रहे थे।


तभी मुझे घर के बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दी।


और फिर...


ऐसा लगा जैसे कोई नंगे पैर घर में चल रहा हो।


मैंने खुद को समझाया कि यह मेरा वहम है।


लेकिन तभी मुझे ध्यान आया...


बेडरूम का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।


मुझे पूरा यकीन था कि मैंने उसे बंद किया था।


मेरा गला सूख चुका था।


मैं धीरे-धीरे उठी और दरवाज़े तक गई।


ड्रॉइंग रूम की लाइट अभी भी जल रही थी।


लेकिन रसोई की तरफ़ कुछ ऐसा था, जिसने मेरे शरीर का सारा खून जैसे जमा दिया।


पहले मुझे लगा, शायद कोई कपड़ा टँगा हुआ है।


फिर वह हल्का-सा हिला।


वह एक औरत थी।


लाल साड़ी में।


वह रसोई के बीचों-बीच खड़ी थी। उसके लंबे बाल उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे और उसका सिर नीचे झुका हुआ था।


मैं चाहकर भी अपनी नज़रें उससे नहीं हटा पा रही थी।


फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।


आज भी मैं नहीं कह सकती कि मैंने उसका चेहरा साफ़ देखा था या नहीं।


लेकिन उसकी आँखें...


वे मुझे आज भी याद हैं।


वह सीधे मुझे देख रही थी।


और फिर मुझे एक बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी।


जैसे कोई रो रहा हो।


या शायद...


हँस रहा हो।


मैं आज तक नहीं समझ पाई।

आधी रात को अपनी बेटी को सीने से लगाए खड़ी वृंदा, जबकि रसोई में लाल साड़ी पहने एक रहस्यमयी महिला पीठ किए खड़ी है।
रात के 12:37 बजे थे। मैं और मेरी बेटी अकेले थे... या कम-से-कम मुझे ऐसा ही लगता था।



बस, उसके बाद मैं पूरी ताकत से भागी, बेटी को उठाया और बेडरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया।


कुछ ही सेकंड बाद...


ठक...


दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।


ठक...


ठक...


ठक...


अब दस्तक लगातार होने लगी थी।


मेरी बेटी डर के मारे रोने लगी थी और मैं उसे सीने से लगाए भगवान का नाम ले रही थी।


फिर अचानक...


सब कुछ शांत हो गया।


इतनी शांति कि मेरे कानों में सिर्फ़ मेरे दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।


मैंने सोचा, शायद सब खत्म हो गया।


और तभी...


मेरी नज़र दरवाज़े के ऊपर बने छोटे से वेंटिलेशन पर गई।

आज भी काश मैं उस तरफ़ न देखती।


वहाँ कोई था।


मुझे सिर्फ़ दो आँखें दिखाई दे रही थीं।


वे बिना पलक झपकाए लगातार मुझे देख रही थीं।


उसके बाद मुझमें वहाँ एक पल भी रुकने की हिम्मत नहीं बची।


मैंने बेटी को उठाया, दरवाज़ा खोला और घर से बाहर भाग गई।


उस रात मैं सीधे शोभा चाची के घर पहुँची।


मैं इतनी बुरी तरह काँप रही थी कि मुझसे ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था।


उन्होंने मुझे पानी दिया और सारी रात मेरे पास बैठी रही।


उसके बाद हमने वह घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।


लेकिन जाने से पहले शोभा चाची ने मुझे एक ऐसी बात बताई, जिसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


उन्होंने बताया कि दो साल पहले उसी घर में एक विवाहित महिला की मौत हुई थी।


लोगों से कहा गया था कि उसने आत्महत्या की थी।


लेकिन मोहल्ले में लोग दबे स्वर में कहते थे कि उसे उसके ससुराल वालों ने बहुत प्रताड़ित किया था, और उसकी मौत एक हादसा नहीं थी।


उसकी मौत के कुछ दिनों बाद उसकी सास सीढ़ियों से गिरकर मर गई।


ससुर को लकवा मार गया।


और उसका पति वह घर छोड़कर कहीं और चला गया।


तब से वह घर बंद पड़ा था।


शोभा चाची ने मुझसे कहा, "मैं तुम्हें कई बार बताना चाहती थी, लेकिन फिर लगा कि तुम लोग पढ़े-लिखे हो। शायद मेरी बात पर विश्वास नहीं करोगी।"


आज इस घटना को पाँच साल हो चुके हैं।


मैं नहीं जानती कि उस रात मैंने जो देखा, वह क्या था।


डर?


मेरा वहम?


या फिर...

आधी रात का खौफ

 

दिसंबर का महीना था। सुबह की ठंड अब धीरे-धीरे हड्डियों तक उतरने लगी थी।


गोविंद ने आँगन में रखे लोटे से हाथ-मुँह धोया और अंदर चला आया। सरला चूल्हे के पास बैठी रोटियाँ सेंक रही थी। उसने बिना कुछ कहे एक कपड़े में दो रोटियाँ, थोड़ा अचार और गुड़ बाँधकर उसके थैले में रख दिया।


"शॉल रख ली?" उसने पूछा।


"हाँ, रख ली।"


"और सुनो, पहुँचकर खबर भिजवा देना।"


गोविंद ने सिर हिला दिया।


दो महीने पहले ही उसकी बेटी सुमन की शादी राजूरवाड़ी में हुई थी। कई दिनों से वह उसके पास आने के लिए कहलवा रही थी। खेती-बाड़ी के कामों में समय ही नहीं निकल पाया था। आखिर आज उसने जाने का मन बना लिया।

मामदापुर बस स्टैंड पर रहस्यमयी रिक्शावाला और किसान गोविंद
कुछ ही क्षण पहले यहाँ एक जीप खड़ी थी। अब चारों ओर सिर्फ धुंध, अंधेरा और ऐसा सन्नाटा था, जैसे उस जगह से सारी आवाज़ें गायब हो चुकी हों।


दरवाजे से निकलते हुए उसने अंदर एक नजर डाली। मोहन और राकेश अभी सो रहे थे।


"चलता हूँ।"


"हाँ, और देखना, देर मत करना।"


गोविंद हल्का-सा मुस्कुराया और घर से बाहर निकल आया।


राजूरवाड़ी उसके गाँव से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर था। वहाँ पहुँचने के लिए तीन बसें बदलनी पड़ती थीं।


सुबह की पहली बस उसे आसानी से मिल गई।

दोपहर होते-होते वह दूसरे कस्बे पहुँच गया। वहाँ दूसरी बस के लिए उसे लगभग चालीस मिनट इंतजार करना पड़ा। उसने सड़क किनारे बैठकर रोटी खाई और पानी पिया।


"कहाँ जाओगे काका?" पास बैठे एक आदमी ने पूछा।


"राजूरवाड़ी।"


"इतनी दूर? फिर तो रात हो जाएगी।"


गोविंद हँस दिया।


"हो जाए, बेटी के घर ही तो जाना है।"


दूसरी बस काफी पुरानी थी। खिड़कियाँ ठीक से बंद नहीं होती थीं। ठंडी हवा पूरे रास्ते अंदर आती रही। शाम ढलने लगी तो उसने शॉल निकालकर कंधों पर डाल ली।


करीब साढ़े सात बजे बस मामदापुर पहुँची।


"मामदापुर! मामदापुर!" कंडक्टर ने आवाज़ लगाई।


गोविंद ने थैला उठाया और नीचे उतर गया।


बस धूल उड़ाती हुई आगे निकल गई।


उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई।


मामदापुर एक छोटा-सा गाँव था। सड़क के किनारे कुछ दुकानें थीं, जिनमें से आधी बंद हो चुकी थीं। थोड़ी दूर पर एक चाय की दुकान खुली थी, जहाँ दो-तीन आदमी अंगीठी के पास बैठे हाथ सेंक रहे थे।


गोविंद सीधे उसी तरफ बढ़ गया।


"भैया, राजूरवाड़ी की बस कितने बजे आएगी?"


चाय वाले ने उसकी तरफ देखा।


"आपको किसी ने बताया नहीं?"


"क्या?"


"आज बस नहीं आएगी।"


गोविंद कुछ पल उसे देखता रहा।


"नहीं आएगी मतलब?"


"मतलब नहीं आएगी। दोपहर के बाद से उधर कोई बस नहीं गई।"


"तो अब?"


चाय वाले ने कंधे उचकाए।


"कल सुबह देख लेना।"


गोविंद ने तुरंत जेब से घड़ी निकाली।


सात बजकर चालीस मिनट।


उसने मन ही मन हिसाब लगाया। अगर अभी कोई गाड़ी मिल जाए, तो दस-साढ़े दस तक राजूरवाड़ी पहुँचा जा सकता था।


"और कोई साधन मिलेगा क्या?"


"इस समय?" चाय वाले ने अंगीठी में लकड़ी सरकाते हुए कहा, "मुश्किल है।"


गोविंद दुकान के बाहर आकर खड़ा हो गया।


ठंडी हवा अब पहले से तेज लग रही थी। उसने सड़क के दोनों ओर देखा। दूर-दूर तक कोई वाहन दिखाई नहीं दे रहा था।


उसी समय एक पुराना हरा रिक्शा धीरे-धीरे आकर उसके सामने रुका।


"कहाँ जाना है, चाचा?"


गोविंद ने उसकी तरफ देखा।


करीब पैंतालीस साल का आदमी था। हल्की दाढ़ी, सिर पर टोपी और चेहरे पर एक अजीब-सी गंभीरता।


"राजूरवाड़ी।"


आदमी कुछ क्षण चुप रहा।


"अकेले हो?"


"हाँ।"


"वहाँ कौन रहता है?"


"बेटी।"


उसने एक बार सिर हिलाया।


"बैठ जाओ।"


गोविंद के चेहरे पर राहत आ गई।


"अरे, भगवान तुम्हारा भला करे बेटा। मैं तो सोच रहा था कि आज यहीं अटक जाऊँगा।"


रिक्शा धीरे-धीरे सड़क पर आगे बढ़ने लगा।


कुछ मिनट तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।


फिर उस आदमी ने पूछा, "घर में और कौन-कौन है?"


"पत्नी है। दो लड़के हैं।"


"हूँ..."


इसके बाद वह फिर चुप हो गया।


गोविंद ने कई बार उससे उसका नाम पूछना चाहा, लेकिन पता नहीं क्यों, उसने पूछा नहीं।


करीब पंद्रह मिनट बाद रिक्शा अचानक रुक गया।


गोविंद ने सिर उठाकर देखा।


सामने खेतों के बीच से गुजरती एक संकरी सड़क अंधेरे में दूर तक चली गई थी।


"क्या हुआ?" उसने पूछा।


"उतर जाओ।"


गोविंद चौंक गया।


"क्यों?"


"मैं आगे नहीं जाऊँगा।"


"अरे, लेकिन अभी तो—"


"उतर जाओ, चाचा।"


इस बार उसकी आवाज़ पहले से ज्यादा सख्त थी।


गोविंद नीचे उतरा।


वह आदमी कुछ क्षण सामने फैले अंधेरे को देखता रहा। फिर बोला—


"ध्यान से सुनो।"


गोविंद चुप रहा।


"आज रात अगर कोई तुम्हें इस रास्ते से राजूरवाड़ी छोड़ने की बात करे... तो मत जाना।"


"क्यों?"


"बस मत जाना।"


"लेकिन मुझे तो वहीं—"


"मेरी बात याद रखना। चाहे वह आदमी तुम्हें मुफ्त में छोड़ने की बात करे... तब भी नहीं।"


गोविंद अब पूरी तरह उलझ चुका था।


"आखिर बात क्या है?"


पहली बार उस आदमी ने उसकी आँखों में देखा।


"कुछ रास्ते रात होने के बाद रास्ते नहीं रहते, चाचा।"


गोविंद उसके जवाब का मतलब समझ पाता, उससे पहले ही उसने रिक्शा मोड़ लिया।


और फिर वह अंधेरे में गायब हो गया।


गोविंद देर तक वहीं खड़ा रहा।


उसे समझ नहीं आ रहा था कि अभी जो हुआ, वह क्या था।


तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी—


"काका... राजूरवाड़ी जाना है क्या?"


गोविंद ने मुड़कर देखा।


सड़क के दूसरी ओर एक आदमी कंबल ओढ़े खड़ा था।


उसका चेहरा धुंध और अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था।


"हाँ..."


"तो चलो। मैं भी उधर ही जा रहा हूँ।"


गोविंद कुछ क्षण चुप खड़ा रहा।


दोनों बिना कुछ बोले कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ने लगे।


रास्ते के दोनों ओर ऊँची-ऊँची फसलें खड़ी थीं। ठंडी हवा उनके बीच से गुजरती हुई एक धीमी-सी सरसराहट पैदा कर रही थी।


"तुम राजूरवाड़ी में रहते हो?" गोविंद ने चलते-चलते पूछा।


"नहीं।"


"फिर?"


"काम से आया था।"


उसने इतना कहा और फिर चुप हो गया।


गोविंद ने दोबारा कुछ नहीं पूछा।


करीब दस मिनट बाद उन्हें सड़क किनारे एक पुरानी जीप खड़ी दिखाई दी।


"आ जाओ, काका। पैदल जाएँगे तो देर हो जाएगी।"


गोविंद जीप में बैठ गया। अंदर हल्की मिट्टी और पुराने डीजल की गंध थी। आदमी ने इंजन चालू किया और जीप धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।


गोविंद ने जेब से घड़ी निकाली।


नौ बजकर पच्चीस मिनट।


उसने खिड़की से बाहर देखा। अब सड़क पहले से कहीं ज्यादा सुनसान हो चुकी थी। कई मिनट बीत गए, लेकिन सामने से एक भी गाड़ी नहीं आई।


"और कितनी दूर है?" उसने पूछा।


"बस... थोड़ी।"


गोविंद ने गर्दन घुमाकर उसकी तरफ देखा।


अभी तक उसने उस आदमी का चेहरा ठीक से नहीं देखा था। कंबल उसके कंधों और आधे चेहरे को ढके हुए था।


कुछ देर बाद गोविंद को लघुशंका लगी।


"जरा गाड़ी रोकना बेटा।"


जीप धीरे से रुक गई।


"जल्दी आना।"


गोविंद सड़क से थोड़ा हटकर खेतों की तरफ चला गया।


ठंडी हवा अब पहले से ज्यादा तेज महसूस हो रही थी। उसने काम खत्म किया और शॉल को थोड़ा कसकर लपेट लिया।


उसे अचानक याद आया कि सुबह घर से निकलते समय सरला ने कहा था—"देर मत करना।"

वह हल्का-सा मुस्कुराया।


फिर मुड़कर वापस सड़क की तरफ देखा।


और उसी क्षण...


उसकी मुस्कुराहट गायब हो गई।


सड़क खाली थी।


जीप वहाँ नहीं थी।


वह आदमी भी नहीं था।


गोविंद कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा। उसे लगा शायद वह गलत दिशा में देख रहा है।


वह दो कदम आगे बढ़ा।


फिर चारों तरफ नजर दौड़ाई।


कुछ नहीं।


बस दूर-दूर तक फैला अंधेरा और खेत।


"अरे बेटा!"


उसने आवाज़ लगाई।


कोई जवाब नहीं मिला।


"ओ बेटा!"

आधी रात के अंधेरे में मंडराती अनजानी मौजूदगी
कुछ ही क्षण पहले यहाँ एक जीप खड़ी थी। अब चारों ओर सिर्फ धुंध, अंधेरा और ऐसा सन्नाटा था, जैसे उस जगह से सारी आवाज़ें गायब हो चुकी हों।


इस बार उसकी आवाज़ पहले से ऊँची थी।


लेकिन जवाब में सिर्फ उसकी अपनी आवाज़ लौटी, जो खेतों से टकराकर धीरे-धीरे खो गई।


गोविंद का गला सूखने लगा।


यह कैसे हो सकता है?


अभी मुश्किल से एक मिनट ही तो हुआ था।


वह जल्दी-जल्दी सड़क तक आया।


मिट्टी नरम थी।


फिर उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।


पहली बार उसे महसूस हुआ...


कि उसके आसपास का सन्नाटा सामान्य नहीं था।


इतनी देर में उसे किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुननी चाहिए थी।


कहीं कोई झींगुर।


लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था।


ऐसा लग रहा था, जैसे उस जगह से सारी आवाज़ें किसी ने खींचकर निकाल ली हों।


ठंडी हवा अचानक थम गई।


गोविंद ने अनजाने में अपने दोनों हाथ आपस में रगड़े।


तभी...


उसके बाईं ओर, खेतों के अंदर कहीं से किसी के चलने की आवाज़ आई।


चर्र...


चर्र...


जैसे कोई सूखी घास पर धीरे-धीरे कदम रख रहा हो।


गोविंद ने गर्दन घुमाई।


अंधेरे के अलावा वहाँ कुछ नहीं था।


आवाज फिर आई।


इस बार थोड़ी और पास से।


चर्र...


चर्र...


गोविंद का दिल अब पहले से तेज धड़कने लगा था।


"कौन है?" उसने हिम्मत करके पूछा।


आवाज अचानक बंद हो गई।


और फिर...


उसके दाईं ओर, सड़क के उस पार खड़े एक पेड़ के पीछे से किसी के बहुत धीमे-धीमे रोने की आवाज़ आने लगी।


फिर न जाने क्यों, उसे जाते-जाते उस रिक्शेवाले की आखिरी बात याद आ गई—


«"चाहे कोई मुफ्त में भी छोड़ने की बात करे... तब भी मत जाना।"»


लेकिन उस समय गोविंद को राजूरवाड़ी पहुँचने की जल्दी थी।


उसने थैले की पट्टी कंधे पर ठीक की...


...और उस आदमी के पीछे चल पड़ा।


गोविंद का पूरा शरीर जैसे एक पल के लिए जड़ हो गया।


रोने की आवाज़ बहुत धीमी थी।


जैसे कोई अपना रोना दबाने की कोशिश कर रहा हो।


उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की।


आवाज फिर आई।


इस बार थोड़ी लंबी।


गोविंद ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। उसके मन ने कई तर्क दिए—शायद कोई औरत होगी, शायद कोई राहगीर, शायद कोई मुसीबत में हो।


लेकिन उसके पैर वहीं जमे रहे।


रोने की आवाज़ अचानक बंद हो गई।


सन्नाटा।


इतना गहरा सन्नाटा कि उसे अपनी धड़कन तक सुनाई देने लगी।


धक...


धक...


धक...


गोविंद ने काँपते हाथों से जेब से घड़ी निकाली।


नौ बजकर छब्बीस मिनट।


उसने घड़ी वापस जेब में रखी और सड़क पर आगे बढ़ने लगा।


उसे बस किसी तरह मुख्य सड़क तक पहुँचना था।


वह मुश्किल से दस-पंद्रह कदम ही चला होगा कि पीछे से किसी के तेज़ी से खेतों के बीच दौड़ने की आवाज़ आई।


सरररर...


सरररर...


जैसे कोई चीज़ पूरी रफ्तार से उसकी दिशा में भाग रही हो।


गोविंद एकदम रुक गया।


आवाज अचानक उसके पीछे आकर थम गई।


उसने मुड़ने की हिम्मत नहीं की।


उसकी साँसें अब बेकाबू हो चुकी थीं।


धीरे-धीरे उसने भगवान का नाम लेना शुरू किया।


"राम... राम... राम..."


उसी समय उसे महसूस हुआ कि उसके ठीक पीछे कोई खड़ा है।


इतना पास...


कि अगर वह एक कदम पीछे हटे, तो शायद उससे टकरा जाए।


लेकिन वहाँ साँस लेने की कोई आवाज़ नहीं थी।


गोविंद की आँखों से आँसू निकलने लगे।


उसने काँपती आवाज़ में कहा—


"क... कौन है?"


कोई जवाब नहीं।


कुछ सेकंड बाद उसे अपने दाहिने कान के पास बहुत ठंडी हवा का एक झोंका महसूस हुआ।


जैसे किसी ने उसके बिल्कुल पास आकर धीरे से साँस छोड़ी हो।


अब उससे और सहा नहीं गया।


वह पूरी ताकत से सड़क पर भागने लगा।


थैला उसके कंधे से टकरा रहा था। शॉल आधी उतरकर पीछे लटक गई थी।


उसे नहीं पता था कि वह कहाँ भाग रहा है।


उसे सिर्फ इतना पता था—


कि उसके पीछे कुछ था।


और वह उसके साथ-साथ चल रहा था।


अचानक उसका पैर किसी पत्थर से टकराया और वह सड़क पर गिर पड़ा।


उसके हाथ छिल गए।


घुटनों में तेज दर्द उठा।


तभी...


उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।


घस्स...


घस्स...


घस्स...


जैसे कोई चीज़ मिट्टी पर रेंग रही हो।


आवाज खेतों के भीतर से आ रही थी।


धीरे-धीरे।


लेकिन लगातार उसकी तरफ बढ़ती हुई।


गोविंद ने काँपते हुए सिर उठाया।


खेतों के बीच खड़ी फसलें अपने आप दो हिस्सों में बँटती चली आ रही थीं।


जैसे उनके बीच से कुछ गुजर रहा हो।


घस्स...


घस्स...


घस्स...


गोविंद अब रो रहा था।


"हे राम... हे राम... मुझे बचा लो..."


आवाज अब सड़क तक पहुँच चुकी थी।


और फिर...


पहली बार उसने उसे देखा।


धुंध और अंधेरे के बीच...


कुछ मिट्टी पर रेंगता हुआ उसकी तरफ आ रहा था।


उसे उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।


बस लंबे उलझे हुए बाल...


कीचड़ से सने हाथ...


और ऐसी हरकतें, जो किसी इंसान की नहीं हो सकती थीं।


वह चीज़ अचानक रुक गई।


कुछ क्षण तक उसने अपना सिर नीचे झुकाए रखा।


फिर बहुत धीरे-धीरे...


उसने अपना सिर ऊपर उठाया।


गोविंद की चीख निकल गई।


उसी क्षण पीछे से एक आवाज़ गूँजी—


"आँखें बंद करो, चाचा!"


गोविंद ने मुड़कर देखा।


अंधेरे में वही रिक्शावाला खड़ा था।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वैसी शांति नहीं थी।


वह तेजी से गोविंद की तरफ बढ़ा और उसका हाथ पकड़कर खड़ा कर दिया।


"भागो!"


दोनों पूरी ताकत से सड़क पर दौड़ने लगे।


गोविंद ने एक बार पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की।


"पीछे मत देखो!" रिक्शावाले ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

आधी रात के अंधेरे में मंडराती अनजानी मौजूदगी
खेत अपने आप दो हिस्सों में बँट रहे थे। धुंध के पीछे कुछ था—कुछ ऐसा, जिसे गोविंद मरते दम तक शब्दों में बयां नहीं कर पाया।


कुछ देर बाद दूर उन्हें मुख्य सड़क दिखाई देने लगी।


और जैसे ही दोनों सड़क पर पहुँचे...


गोविंद ने महसूस किया कि उसके पीछे चल रही वह घिसटने की आवाज़ अचानक बंद हो गई थी।


वह हाँफता हुआ सड़क किनारे बैठ गया।


कई मिनट तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला।


आखिरकार गोविंद ने काँपती आवाज़ में पूछा—


"व... वह क्या था?"


रिक्शावाले ने उसकी तरफ देखा।


"जिसके बारे में मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी।"


"और... और वह आदमी?"


कुछ क्षणों तक वह चुप रहा।


फिर बोला—

"जिसके साथ तुम आए थे... उसे मैंने पंद्रह साल पहले इसी रास्ते पर दफन होते देखा था।"


गोविंद के हाथ से उसकी शॉल छूटकर जमीन पर गिर पड़ी।


उस रात के बाद वह कभी राजूरवाड़ी नहीं गया।


उसने अपनी बेटी से मिलने के लिए बाद में दूसरा रास्ता चुन लिया था।


लेकिन एक बात उसने मरते दम तक किसी को नहीं बताई—


उसने उस रात आखिर देखा क्या था।


बस, कभी-कभी सर्दियों की रात में, जब कोई उससे मामदापुर के पुराने रास्ते के बारे में पूछता...


तो उसके हाथ काँपने लगते।


और वह सिर्फ इतना कहता—


"अगर कोई तुम्हें मुफ्त में छोड़ने की बात करे...


तो मत जाना।"




पुराना बंगला--एक अधूरे वादे की खौफनाक कहानी

 


रात के साढ़े दस बज रहे थे।


"बस, एक चाल और।" गंगाधर ने मुस्कुराते हुए शतरंज का घोड़ा आगे बढ़ाया।


"तू हर बार यही बोलता है। पिछली बार भी यही कहा था, फिर आधे घंटे तक हार नहीं मानी थी।" अविनाश ने चाय का कप उठाते हुए जवाब दिया।


बाहर हल्की बारिश हो रही थी। सड़क लगभग खाली हो चुकी थी। दुकान के बाहर लगी पीली बत्ती पर छोटे-छोटे कीड़े मंडरा रहे थे।


तभी बाहर किसी के दौड़ने की आवाज आई।


दोनों ने एक साथ दरवाजे की तरफ देखा।


एक आदमी बारिश में भीगा हुआ तेजी से उनकी दुकान की तरफ आ रहा था। उसकी सांसें बुरी तरह फूल रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह काफी दूर से भागता हुआ आया हो।

बरसात भरी रात में पहाड़ी पर स्थित 100 साल पुराने सावंत बंगले के सामने गंगाधर कांबले, अविनाश देशमुख और दीनू काका खड़े हैं।
आधी रात, घना कोहरा और 100 साल पुराना सावंत बंगला—यहीं से शुरू होती है एक ऐसे रहस्य की कहानी, जो हर 35 साल बाद लौटता है।


"गंगाधर बाबू...!" उसने दरवाजे पर पहुंचते ही कहा, "मुझे आपकी मदद चाहिए।"


अविनाश हंस पड़ा।


"अगर किसी ने उधार नहीं लौटाया है, तो उसके लिए हम कुछ नहीं कर सकते।"


लेकिन आदमी के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। उसके होंठ सूख चुके थे और आंखें बार-बार दरवाजे के बाहर देख रही थीं, जैसे उसे डर हो कि कोई उसके पीछे-पीछे यहां तक आ गया हो।


"मेरी बात मजाक नहीं है साहब..." उसने कांपती आवाज में कहा, "वो... वो फिर से आ गई है।"


गंगाधर ने शतरंज की बिसात से नजर हटाकर पहली बार उसे गौर से देखा।


"बैठ जाइए। पहले सांस तो ठीक कर लीजिए।"


आदमी कुर्सी पर बैठा, लेकिन उसकी नजरें अब भी बाहर सड़क पर टिकी हुई थीं।


अविनाश ने उसके सामने चाय का कप रख दिया।


"नाम?"


"दीनू... लोग दीनू काका कहते हैं।"


"और कौन आ गया है?" अविनाश ने पूछा।


दीनू काका ने चाय के कप को हाथ लगाया, लेकिन उसे उठाया नहीं।


"वो... सफेद कपड़ों वाली औरत।"


कुछ पल तक दुकान में सिर्फ बारिश की आवाज सुनाई देती रही।


अविनाश ने गंगाधर की तरफ देखा और धीरे से बोला, "लगता है आज शतरंज पूरी नहीं होगी।"


गंगाधर ने कोई जवाब नहीं दिया।


"कहां दिखाई देती है?" उसने पूछा।


"सावंत बंगले में।"


गंगाधर के हाथ वहीं रुक गए।


"पहाड़ी वाला बंगला?" अविनाश ने पूछा।


दीनू काका ने सिर हिला दिया।


"मैं वहां पिछले तीस साल से काम कर रहा था। पहले मालिक दीनानाथ सावंत के यहां... अब उनकी बहू और पोती के साथ रहता हूं।"


"और यह औरत सिर्फ तुम्हें दिखाई देती है?"


"नहीं साहब।"


दीनू काका की आवाज और धीमी हो गई।


"जानवी भी उसे देखती है।"


"जानवी?"


"मालिक की पोती। छह साल की है।"


बाहर अचानक बिजली चमकी। दुकान के अंदर एक पल के लिए तेज सफेद रोशनी फैल गई।


दीनू काका ने अपनी जेब से एक छोटी-सी गुलाबी चप्पल निकाली और मेज पर रख दी।


"यह उसकी है।"


गंगाधर ने चप्पल उठाकर देखी। उस पर मिट्टी लगी हुई थी। लेकिन मिट्टी के ऊपर कुछ और भी था।


जैसे किसी ने गीले हाथों से उसे पकड़ रखा हो।


"यह मुझे आज सुबह उसके बिस्तर के नीचे मिली।"


"तो?" अविनाश ने पूछा।


दीनू काका ने धीरे-धीरे उनकी तरफ देखा।


"कल रात जानवी अपने कमरे में सो रही थी। उसकी मां उसके बगल में थी। रात के बारह बजकर तेरह मिनट पर उसकी चीख सुनाई दी।"


दुकान के बाहर हवा तेज हो गई।


"जब हम कमरे में पहुंचे, तो खिड़की खुली हुई थी। जानवी बिस्तर पर बैठी रो रही थी।"


"उसने क्या कहा?"


दीनू काका के हाथ कांपने लगे।


"उसने कहा, 'दीनू काका, वो आंटी फिर आई थी। उसने कहा कि इस बार मैं छिप नहीं पाऊंगी।'"


अविनाश की मुस्कान गायब हो चुकी थी।


"बच्चे सपने भी देखते हैं।"


"मैं भी यही सोचता था साहब।"


दीनू काका ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।


तस्वीर में एक बड़ा बंगला था। सामने दीनानाथ सावंत अपने परिवार के साथ खड़े थे।


"यह देखिए।"


गंगाधर तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।


अचानक उसकी नजर तस्वीर के सबसे ऊपर, दूसरी मंजिल की खिड़की पर गई।


वहां कोई खड़ा था।


एक धुंधली-सी आकृति।


लंबे बाल।


सफेद कपड़े।


"यह कौन है?" उसने पूछा।


दीनू काका ने धीरे से सिर हिलाया।


"जब यह तस्वीर खींची गई थी... उस दिन दूसरी मंजिल पर कोई नहीं था।"


दुकान में सन्नाटा छा गया।


"और एक बात और है।"


"क्या?"


"पिछले दो साल में तीन लोग उस बंगले में गए थे।"


"फिर?"


"वापस नहीं आए।"


अविनाश ने गहरी सांस ली।


"पुलिस?"


"तीनों को ढूंढा गया। जंगल, कुएं, आसपास के गांव... सब जगह। लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला।"


तभी दुकान के बाहर से किसी बच्चे के हंसने की आवाज आई।


तीनों एकदम चुप हो गए।


आवाज फिर आई।


इस बार बिल्कुल दरवाजे के पास से।


अविनाश तुरंत उठकर बाहर गया।


सड़क खाली थी।


बारिश पहले की तरह गिर रही थी।


लेकिन दरवाजे के ठीक सामने, पानी से भीगी मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने हुए थे।


नंगे पैर।


वे निशान सड़क से दुकान तक आए थे।


और फिर...


वहीं से वापस मुड़ने के बजाय, दुकान की दीवार की तरफ चले गए थे।


अविनाश कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रहा।


"गंगाधर..."


"हूं?"


"मुझे लगता है, हमारी शतरंज सच में पूरी नहीं होगी।"


गंगाधर धीरे-धीरे दरवाजे तक आया।


उसने नीचे झुककर निशानों को देखा।


फिर बिना कुछ कहे दीनू काका की तरफ मुड़ा।


"सावंत बंगला यहां से कितनी दूर है?"


"करीब पैंतालीस मिनट।"


"ठीक है।"


"आप... आप चलेंगे?"


गंगाधर ने मेज पर पड़ी तस्वीर उठाई और दूसरी मंजिल की खिड़की में खड़ी उस धुंधली आकृति को एक बार फिर देखा।


"नहीं।"


दीनू काका का चेहरा उतर गया।


गंगाधर ने अपनी टॉर्च उठाई और मुस्कुराया।


"हम अभी चलेंगे।"


दीनू काका की पुरानी जीप पहाड़ी रास्ते पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।


रात अब पूरी तरह उतर चुकी थी।


बारिश रुक गई थी, लेकिन पेड़ों से गिरती बूंदें अब भी शीशे पर टकरा रही थीं। जीप की हेडलाइट्स के अलावा चारों तरफ सिर्फ अंधेरा था।


"एक बात पूछूं?" अविनाश ने पीछे बैठे दीनू काका से कहा।


"जी?"


"अगर बंगला इतना ही खतरनाक है, तो आप लोग वहां से चले क्यों नहीं जाते?"


दीनू काका कुछ क्षण चुप रहे।


"क्योंकि हम वहां नहीं रहते।"


"मतलब?"


"पैंतीस साल पहले मालिक ने नया बंगला बनवा लिया था। तब से पुराना बंगला खाली है।"


"तो फिर जानवी को उससे क्या लेना-देना?"


दीनू काका ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, "यही तो मैं समझ नहीं पा रहा हूं।"


करीब आधे घंटे बाद जीप एक लोहे के पुराने फाटक के सामने आकर रुक गई।


गंगाधर ने बाहर उतरकर टॉर्च जलाई।


उनके सामने खड़ा था—सावंत बंगला।


वह उम्मीद से कहीं बड़ा था।


दो मंजिला इमारत। जगह-जगह से उखड़ा हुआ प्लास्टर। बेलों ने दीवारों को लगभग निगल लिया था। दूसरी मंजिल की टूटी खिड़कियां हवा के साथ धीरे-धीरे हिल रही थीं।


और सबसे अजीब बात...


बंगले के ऊपर बैठे कुछ नौवे कौवे बैठे थे जो बिल्कुल बिल्कुल एकदम शांत थे।


"इतनी रात को कौवे?" अविनाश बुदबुदाया।


दीनू काका ने कोई जवाब नहीं दिया।


फाटक खोलते ही उसकी चरमराहट रात के सन्नाटे में बहुत दूर तक गूंज गई।


तीनों अंदर पहुंचे।


मुख्य दरवाजा आधा खुला हुआ था।


"तुमने इसे खुला छोड़ा था?" गंगाधर ने पूछा।


"नहीं साहब। मैं तो पिछले छह महीने से यहां आया भी नहीं।"


अविनाश ने हंसने की कोशिश की।


"अच्छा है। कम से कम हमें दरवाजा तोड़ने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।"


दरवाजा धक्का देते ही खुल गया।


अंदर बासी हवा का एक झोंका आया।


फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी। दीवारों पर अंग्रेजी जमाने की पेंटिंग्स टंगी थीं। एक कोने में खड़ी बड़ी घड़ी बंद पड़ी थी।


गंगाधर ने अपनी टॉर्च की रोशनी घुमाई।


"देख।"


अविनाश ने नीचे देखा।


धूल पर पैरों के निशान थे।


छोटे-छोटे।


जैसे किसी छह-सात साल के बच्चे ने अभी-अभी वहां से होकर गुजरा हो।


"यह मजाक अच्छा नहीं है, दीनू काका।"


"मैं कसम खाता हूं साहब, मैं यहां नहीं आया!"


गंगाधर उन निशानों के पीछे-पीछे चल पड़ा।


वे सीढ़ियों तक गए।


फिर दूसरी मंजिल की ओर मुड़ गए।


अचानक...


ऊपर से किसी चीज के गिरने की जोरदार आवाज आई।


धड़ाम!


दीनू काका डरकर पीछे हट गए।


"साहब, हमें वापस चलना चाहिए।"


"अभी तो आए हैं।" अविनाश ने कहा। "कम से कम मेजबान से मिल तो लें।"


तीनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।


दूसरी मंजिल पर पहुंचते ही गंगाधर रुक गया।


गलियारे के अंत में एक दरवाजा आधा खुला था।


उसके पीछे से हल्की पीली रोशनी बाहर आ रही थी।


"यह कैसे संभव है?" दीनू काका की आवाज कांप रही थी। "यहां तो बिजली भी नहीं है!"


कमरे तक पहुंचकर गंगाधर ने धीरे से दरवाजा खोला।


अंदर एक पुराना बच्चों का कमरा था।


लकड़ी का घोड़ा।


टूटी हुई गुड़िया।


और कमरे के बीचों-बीच एक लालटेन जल रही थी।


"किसी ने अभी इसे जलाया है।" गंगाधर ने कहा।


तभी अविनाश की नजर दीवार पर गई।


वहां दर्जनों तस्वीरें टंगी थीं।


हर तस्वीर में सावंत परिवार था।


लेकिन एक चीज हर तस्वीर में समान थी।


दूसरी मंजिल की खिड़की में खड़ी वही सफेद आकृति।


"गंगाधर..."


"हूं?"


"मुझे लगता है, यह औरत कैमरे की बहुत शौकीन थी।"


तभी...


पीछे से एक बच्ची की आवाज आई।


"आप लोग देर से आए।"


तीनों एक साथ मुड़े।


कमरे के कोने में करीब छह साल की एक बच्ची खड़ी थी।

एक पुराने बंगले के बच्चों के कमरे में जलती लालटेन, लकड़ी का घोड़ा और एक रहस्यमयी बच्ची को देखकर गंगाधर, अविनाश और दीनू काका स्तब्ध खड़े हैं।
दूसरी मंजिल पर मौजूद यह कमरा वर्षों से बंद था, लेकिन उस रात वहां कोई उनका इंतजार कर रहा था।



गीले बाल।


गुलाबी फ्रॉक।


और हाथ में वही चप्पल, जो दीनू काका अपनी जेब में लेकर आए थे।


दीनू काका के मुंह से चीख निकल गई।


"ज... जानवी!"


बच्ची ने धीरे-धीरे सिर टेढ़ा किया।


"मैं जानवी नहीं हूं।"


कमरे की लालटेन अचानक बुझ गई।


पूरा बंगला अंधेरे में डूब गया।


और उसी अंधेरे में किसी औरत की धीमी हंसी गूंजने लगी।


"अब... कोई वापस नहीं जाएगा।"



गंगाधर ने तुरंत टॉर्च जलाई।


कमरा खाली था।


न बच्ची।


न लालटेन।


सिर्फ दीवार पर उंगली से लिखा एक वाक्य—


«"35 साल बाद तुम वापस आ ही गए, गंगाधर।"»


अविनाश ने वह पढ़ा और धीरे से पूछा, "तूने पहले कभी इस जगह के बारे में मुझसे कुछ छिपाया है?"


गंगाधर जवाब देने ही वाला था कि दीनू काका अचानक जमीन पर बैठ गए।


उनकी नजर कमरे के एक पुराने संदूक पर टिक गई थी।


"नहीं..." वह बुदबुदाए, "यह यहां नहीं हो सकता..."


संदूक के ऊपर एक पुरानी तस्वीर रखी थी।


तस्वीर लगभग सत्तर साल पुरानी लग रही थी।


उसमें सावंत बंगले के सामने पांच लोग खड़े थे।


दीनानाथ सावंत।


उनकी पत्नी।


दो नौकर।


और उनके बीच खड़ा एक दस-बारह साल का लड़का।


अविनाश ने तस्वीर उठाई।


"यह बच्चा कौन है?"


दीनू काका की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।


"मुझे नहीं पता..."


"लेकिन इसके नीचे नाम तो लिखा है।"


अविनाश ने तस्वीर के नीचे जमी धूल साफ की।


और जैसे ही उसने नाम पढ़ा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।


तस्वीर के नीचे लिखा था—


«"गंगाधर कांबले - 1951"»


कमरे में कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।


फिर...


गंगाधर ने पहली बार तस्वीर को ध्यान से देखा।


और बहुत धीरे से कहा—


«"यह संभव नहीं है... क्योंकि मेरा जन्म 1978 में हुआ था।"»


उसी समय पूरे बंगले में एक साथ सभी दरवाजे बंद होने की आवाज गूंज उठी।


और दूसरी मंजिल के गलियारे से किसी बच्चे की आवाज आई—


«"दादाजी... आपने आने में बहुत देर कर दी।"»

आवाज गलियारे के बिल्कुल अंत से आई थी।


दीनू काका का शरीर कांप रहा था। अविनाश ने धीरे-से टॉर्च उस तरफ घुमाई।


वहां वही बच्ची खड़ी थी।


गुलाबी फ्रॉक।


गीले बाल।


लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।


वह जानवी नहीं थी।


उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं।


"मैंने कहा था न..." उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम लोग बहुत देर से आए हो।"


गंगाधर कुछ कदम आगे बढ़ा।


"तुम कौन हो?"


बच्ची की मुस्कान और चौड़ी हो गई।


"तुम मुझे भूल गए?"


इतना कहकर उसने अपना हाथ उठाया और गलियारे के आखिर में लगी सबसे बड़ी पेंटिंग की तरफ इशारा किया।


गंगाधर ने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली।


पेंटिंग में सावंत बंगला बना हुआ था। सामने अंग्रेजी कपड़ों में एक आदमी खड़ा था और उसके बगल में एक छोटी बच्ची।


पेंटिंग के नीचे अंग्रेजी में कुछ लिखा था।


"एलिजा मॉर्गन और उसके पिता - 1926"


"1926..." अविनाश बुदबुदाया, "यानी पूरे सौ साल पहले।"


"करीब-करीब।" पीछे से एक भारी आवाज आई।


तीनों ने पलटकर देखा।


दीनू काका संदूक के पास बैठे थे। उनके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।


"यह दीनानाथ साहब की डायरी है।"


उन्होंने कांपते हाथों से पन्ने पलटे।


«"1926... इस बंगले में अंग्रेज अफसर एडवर्ड मॉर्गन अपनी बेटी एलिजा के साथ रहता था। एक रात एलिजा अचानक गायब हो गई। तीन दिन बाद उसकी लाश बंगले के पीछे वाले पुराने कुएं से मिली।"»


गलियारे में अचानक किसी बच्ची के रोने की आवाज गूंजने लगी।


दीनू काका ने आगे पढ़ा।


«"लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एलिजा की मौत के बाद बंगले में बच्चों के गायब होने का सिलसिला शुरू हो गया। हर पैंतीस साल बाद, वह एक बच्चे को अपने साथ ले जाती थी।"»


अविनाश ने तुरंत गिनती की।


"1926... फिर 1961... फिर 1996..."


"और अब 2031 से पहले उसे अगला बच्चा चाहिए।" गंगाधर ने धीरे से कहा।


"जानवी..." दीनू काका के मुंह से निकला।


तभी बच्ची फिर हंसने लगी।


"जानवी मेरी है। जैसे तुम मेरे थे।"


पूरा गलियारा एकदम शांत हो गया।


गंगाधर ने पहली बार अपना सिर उठाकर उसकी तरफ देखा।


"मैं?"


बच्ची धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी।


"1951 में तुम भी यहां आए थे। तुम्हारी उम्र दस साल थी। तुम कुएं के पास खेल रहे थे। मैंने तुम्हें बुलाया था।"


अचानक गंगाधर के सिर में तेज दर्द उठने लगा।


कुछ धुंधली तस्वीरें उसकी आंखों के सामने आने लगीं।


एक बड़ा कुआं।


बारिश।


एक छोटी लड़की उसका हाथ पकड़े हुए।


और फिर...


एक आदमी उसे गोद में उठाकर भाग रहा था।


"नहीं..." गंगाधर लड़खड़ा गया।


दीनू काका ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला।


«"15 अगस्त 1951। आज मैंने एक बच्चे को बचा लिया। उसका नाम गंगाधर कांबले है। लेकिन एलिजा उसे कभी नहीं छोड़ेगी। जिस दिन वह वापस बंगले में कदम रखेगा, वह अपना अधूरा वादा पूरा करने आएगी।"»


अविनाश ने धीरे-धीरे दीनू काका की तरफ देखा।


"यह किसने लिखा है?"


दीनू काका की आंखों में आंसू आ गए।


"मेरे पिता ने।"


"क्या?"


"वह उस समय इस बंगले में नौकर थे। उन्होंने ही गंगाधर को यहां से बाहर निकाला था।"


गंगाधर अब भी पेंटिंग को घूर रहा था।


उसे सब याद आने लगा था।


वह सचमुच यहां आया था।


और एलिजा ने सचमुच उसका हाथ पकड़ा था।


"तुमने मुझसे झूठ बोला।" एलिजा की आवाज अब पूरे बंगले में गूंज रही थी। "तुमने कहा था कि तुम मेरे साथ खेलोगे... हमेशा।"


अचानक दूसरी मंजिल की सारी खिड़कियां एक साथ खुल गईं।


बाहर तूफान शुरू हो चुका था।


नीचे आंगन में खड़े सभी कौवे एक साथ जोर-जोर से कांव-कांव करने लगे।


"गंगाधर!" अविनाश चिल्लाया। "हमें अभी यहां से निकलना होगा!"


लेकिन गंगाधर वहीं खड़ा रहा।


उसने बहुत धीरे से पूछा—


"अगर मैं तुम्हारे साथ चलूं... तो क्या तुम जानवी को छोड़ दोगी?"


पूरा बंगला शांत हो गया।


कुछ सेकंड बाद...


"हां।"


"नहीं!" अविनाश चीख पड़ा। "तू पागल हो गया है क्या?"


गंगाधर मुस्कुराया।


"तुझे याद है? तू हमेशा कहता था कि मैं शतरंज में आखिरी चाल सबसे देर से चलता हूं।"


उसने अपनी टॉर्च अविनाश के हाथ में थमा दी।


"इस बार भी वही कर रहा हूं।"


एलिजा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।


गंगाधर ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।


उसी क्षण पूरे बंगले में इतनी तेज रोशनी फैली कि अविनाश को अपनी आंखें बंद करनी पड़ीं।


और जब उसने आंखें खोलीं...


गलियारा खाली था।


गंगाधर जा चुका था।


तूफानी रात में प्राचीन बंगले के गलियारे में गंगाधर कांबले एलिजा मॉर्गन का हाथ थामे खड़ा है, जबकि अविनाश और दीनू काका भयभीत होकर यह दृश्य देख रहे हैं।
कुछ वादे समय से बड़े होते हैं। और कुछ आत्माएं... उन्हें पूरा होने तक इंतजार करती हैं।



तीन दिन बाद।


जानवी ने आधी रात को चीखना बंद कर दिया।


उसने फिर कभी उस सफेद कपड़ों वाली औरत का नाम नहीं लिया।


और सावंत बंगले के ऊपर मंडराते कौवे भी अचानक गायब हो गए।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।


एक महीने बाद, अविनाश अकेले अपनी दुकान में बैठा था।


उसने आदत से मजबूर होकर सामने वाली कुर्सी पर दूसरा चाय का कप रख दिया।


फिर खुद ही हल्का-सा मुस्कुरा दिया।


उसी समय उसकी नजर शतरंज की बिसात पर पड़ी।


गंगाधर का घोड़ा अपनी जगह से हिला हुआ था।


अविनाश का चेहरा सख्त हो गया।


वह धीरे-धीरे उठा।


दुकान का दरवाजा अंदर से बंद था।


वह वापस बिसात के पास आया।


घोड़े के नीचे एक छोटा-सा कागज रखा था।


उस पर सिर्फ पांच शब्द लिखे थे—


«"मैं हारा नहीं हूं, दोस्त।"»


और उसी पल...


दुकान के बाहर, बारिश में खड़ा एक आदमी दिखाई दिया।


उसने पुराना कोट पहन रखा था।


चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।


लेकिन उसकी आवाज अविनाश अच्छी तरह पहचानता था।


«"अवि... एक नई पहेली हमारा इंतजार कर रही है।"»


जब तक वह दरवाजे तक पहुंचा...


बाहर कोई नहीं था।