बंद पड़ी फैक्ट्री

 

रात के समय धुंध में डूबी भारत की एक बंद पड़ी फैक्ट्री का डरावना दृश्य
सालों से बंद पड़ी यह फैक्ट्री बाहर से जितनी सुनसान दिखती है, अंदर उतना ही डर छुपा है।



नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,


जहाँ हम आपको डर और रहस्य से भरपूर कहानियाँ सुनाते हैं।

यहाँ हम ऐसे अनुभव साझा करते हैं

जो कभी ना कभी, किसी के साथ भी हो सकते हैं…

और शायद आपके साथ भी।


आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी कहानी की,

जो एक फैक्ट्री से जुड़ी है। जो सालो से बंद पड़ी है और जहां कोई आता जाता नही

 सोचो कि आप कभी

ऐसी किसी सुनसान जगह के पास से गुज़रे हों

और अचानक आपका मन वहाँ रुकने से डरने लगे…

तो शायद आप समझ पाएँगे कि

क्यों कुछ जगहें वाकई सुनसान होतीं है।


आज की कहानी है राकेश देशमुख नाम के एक शख्स की।

उम्र लगभग 32 साल।

राकेश एक प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता था।

शादीशुदा नहीं था, माँ–पिता गाँव में रहते थे।

वह शहर के बाहर एक छोटे से कमरे में किराए से रहता था।

उसका रोज़ का जीवन बड़ा सीधा-सादा था—

ना ज़्यादा दोस्त, ना ज़्यादा सवाल।

शहर के बाहरी इलाके में एक पुरानी फैक्ट्री थी।

करीब 15 साल से बंद।

कभी वहाँ सैकड़ों मज़दूर काम करते थे,

लेकिन एक बड़े हादसे के बाद

अब फैक्ट्री हमेशा के लिए बंद कर दी गई।

राकेश को उस जगह के बारे में कुछ पता नहीं था।

उस की तो नई नई ड्यूटी

उस फैक्ट्री के गेट पर लगी थी।

उसका बस अपने काम पर 

ध्यान‌ था।

बंद पड़ी फैक्ट्री के बाहर रात में टॉर्च पकड़े डरा हुआ भारतीय सिक्योरिटी गार्ड
जब रात गहरी होती है, तब हर परछाई किसी खतरे का एहसास कराने लगती है।


उस दिन…

सर्दियों की एक ठंडी रात थी।

नवंबर का महीना,

और रात की शिफ्ट उसकी पहली ड्यूटी थी

इस फैक्ट्री में।


फैक्ट्री का गेट भारी लोहे का था।

अंदर अँधेरा,

ऊपर टूटे हुए टीन की छतें,

और चारों तरफ जंग लगी मशीनें।

हवा चलते ही

 अंदर से

“क्रीइइइ…” जैसी आवाज़ आती।


 सब कुछ सामान्य था।

हर तरफ शांती थी

राकेश कुर्सी पर बैठा,

चाय पीते हुए,

मोबाइल देख रहा था।

कभी-कभी बिच मे

कुत्तों के भौंकने की आवाज़

दूर से आ रही थी।

रात करीब 12:40

अचानक हवा तेज़ हो गई।

पेड़ों की परछाइयाँ

फैक्ट्री की दीवारों पर हिलने लगीं।

राकेश थोड़ा असहज हो गया, 

उसे लगा जैसे कोई

उसे अंदर से देख रहा हो।

उसकी गर्दन पर

हल्की सी सिहरन दौड़ गई।


फिर उसे फैक्ट्री

अंदर से हलचल सुनाई दी, उसे लगा और

“शायद चूहा होगा,”

लेकिन आवाज़

चूहे जैसी नहीं थी।

वह भारी कदमों की थी।

जैसे कोई अंदर चल रहा हो।


अचानक

फैक्ट्री के अंदर लगी

एक मशीन अपने आप

चलने लग गई।

राकेश का दिल

तेज़ी से धड़कने लगा।

उसे पसीना आ गया।

हवा अब उसे बडी

भारी लग रही थी।


उसी पल

उसे अंदर की सीढ़ियों पर

एक परछाईं दिखी।

लंबा शरीर…

झुका हुआ सिर…

और आँखों की जगह

काला गड्ढा।

बंद पड़ी फैक्ट्री की सीढ़ियों में दिखाई दिया डरावना और रहस्यमयी साया
वह सिर्फ एक पल के लिए दिखा… लेकिन डर हमेशा के लिए छोड़ गया।


उसे देखते ही राकेश की हालत पतली हो गई,

वह भागने लगा।

लेकिन उसके पैरों में

जैसे जान ही नहीं बची थी।

पीछे से

उसे बड़ी अजीब गुर्राने की आवाज़ आई।

लाइट बंद हो गई।

चारों तरफ अंधेरा।

उसने गेट खोलने की कोशिश की,

लेकिन ताला अटक गया।

पीछे से

साँस लेने की आवाज़

बिल्कुल उसके कान के पास।


किसी तरह

वह गेट खोलकर

बाहर भागा और भागता ही रहा।

पिछे अभी भी उसे लग रहा था

की कोई उसका पिछा कर रहा है।

उसके बाद उसे कुछ पता नही

उसके बाद अस्पताल में ही उसे होश आया।

उसका शरीर ठीक था,

लेकिन दिमाग…

अब भी उस फैक्ट्री के बारे में 

सोच रहा था।

उसके बाद राकेश ने वह नौकरी छोड़ दी।

उस इलाके के पास फिर 

वह कभी नहीं गया।

दोस्तों,

यह कहानी तो यहीं खत्म होती है…

पर आपको क्या लगता है—

अगर फैक्ट्री सच में खाली थी

तो राकेश ने

क्या देखा था?


सो

चिए…

अगर आपके साथ भी

ऐसा कुछ हो जाए

तो आप क्या करेंगे?

कहानी कैसी लगी

नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए।

और हाँ…

सुरक्षित रहिए। 👁️‍🗨️

उस रात घर में कोई और भी था

 


रात के सन्नाटे में डूबा पुराना घर, जहाँ डर धीरे-धीरे जन्म ले रहा है
खामोशी इतनी गहरी थी कि लगता था जैसे घर खुद कुछ छुपा रहा हो…
डर की शुरुआत अक्सर शांति से ही होती है।


नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan में,


जहाँ हम आपको डर और रहस्य से भरी वो कहानियाँ सुनाते हैं

जो सिर्फ कल्पना नहीं होतीं…

बल्कि कभी-कभी किसी की ज़िंदगी का सच भी बन जाती हैं।


आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है…

एक आम-सी रात और‌ एक आम-सा घर…

लेकिन उस रात कुछ ऐसा था

जिसका एहसास बहुत देर बाद हुआ।


 हम बात करने वाले हैं एक ऐसी कहानी की

जो एक परिवार के साथ घटी…

और जिसमें सबसे डरावनी बात ये थी

कि वो चीज़ घर के अंदर ही थी।

अगर आप कभी रात को अपने कमरे में अकेले लेटे हों

और आपको लगे कि कोई आपको देख रहा है…

तो ये कहानी आपको बहुत करीब से महसूस होगी।

ये कहानी है राहुल नाम के एक युवक की।

राहुल अपने माता-पिता और छोटी बहन के साथ

एक पुराने लेकिन शांत से घर में रहता था।


उनका घर शहर के पुराने हिस्से में था।

घर के पीछे एक बंद पड़ी गली,

और सामने पीपल का पुराना पेड़।

रात को जब भी हवा चलती,

तो खिड़कियाँ खुद-ब-खुद हिलने लगतीं,

मानो कोई बाहर से अंदर झाँक रहा हो।


बात उस रात की है...सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।

खाना खाने के बाद राहुल और उसके घरवाले

अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।

घड़ी में उस वक्त करीब 12:40 AM बज रहे थे।

घर में बिल्कुल सन्नाटा था…

सिर्फ पंखे की आवाज़ आ रही थी।


राहुल अभी तक सोया नहीं था, वह अपने कमरे में मोबाइल चला रहा था।

लाइट बंद थी, बस हल्की नीली रोशनी स्क्रीन से आ रही थी।

तभी.... राहुल को लगा

जैसे बाहर वाले कमरे से कोई हल्की सी आहट आई।


राहुल ने पहले ध्यान नहीं दिया।

उसे लगा शायद पापा उठे होंगे या माँ पानी लेने गई होंगी।

लेकिन कुछ सेकंड बाद…

वही आवाज़ फिर आई।

जैसे कोई नंगे पाँव फर्श पर चल रहा हो।

अंधेरे कमरे में महसूस होती एक अनदेखी मौजूदगी
जब कुछ दिखाई नहीं देता,
लेकिन महसूस सब होने लगता है…
यही वो पल होता है जहाँ डर जन्म लेता है।


फिर हवा अचानक ठंडी लगने लगी।

कमरे की हवा भारी सी हो गई।

दरवाज़े के नीचे से

एक परछाईं धीरे-धीरे सरकती हुई दिखने लगी।

राहुल का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।


उसने खुद को समझाया —

“शायद लाइट का एंगल होगा… या मेरा वहम।”

लेकिन तभी…

परछाईं दो पैरों की जगह

चार हिस्सों में बँटी हुई लगने लगी।

उसके गले से आवाज़ तक नहीं निकली।

फिर अचानक बाहर से किसी ने

बहुत हल्की आवाज़ में उसका नाम लिया—

“रा…हुल…”

पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।

पसीना पीठ से बहने लगा।

उसने चादर कसकर पकड़ ली

और आँखें बंद कर लीं।


अचानक से उसे महसूस हुआ

कि कोई उसके बिल्कुल पास खड़ा है।

उसका बदन जैसें जम सा गया

उसने डरते डरते अपनी आँखें खोली   

और आँखें खोलते ही

एक झुका हुआ चेहरा उसके सामने दिखाई दिया—

चेहरे की आकृति अधूरी,

आँखें काली गहराइयों जैसी…

बस एक पल के लिए।

फिर सब अंधेरा।


राहुल चीखते हुए उठा और दरवाज़े की ओर भागा।

उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की,

पर दरवाज़ा खुल ही नहीं रहा था।

मानो जम गया हो

और पीछे से साँसों की आवाज़

उसकी गर्दन के पास महसूस हो रही थी।

पूरी ताकत लगाकर उसने दरवाज़े को धक्का दिया—

दरवाजा झट से खुल गया और राहुल सीधे ड्रॉइंग रूम में गिर पड़ा।

उसके बाद डर के मारे राहुल बेहोश हो गया

पीछे खड़ा वो साया जिसे देखकर रूह कांप उठी
उस पल समझ आया…
डर बाहर नहीं था,
वो तो बहुत पास खड़ा था।


सुबह जब सब उठे,

तब राहुल ज़मीन पर बेसुध पड़ा था।

सब हैरान थे, उसे उठाया गया।

उठते ही राहुल बार-बार बस एक ही बात बोल रहा था—

“घर में कोई है

हमारे घर में कोई है…”

उसकी बातें किसी को समझ नहीं आ रही थी।

उसकी हालत देख उसे डाॅक्टर को दिखाया गया 

 डाॅक्टर ने कहा कोई डरावना सपना देखा होगा 

इसलिए यह डर गया है।

पर राहुल बस एक ही बात बोलता था, 

घर में कोई है.....उस रात के बाद

उसके कमरे का दरवाज़ा हमेशा बंद रहने लगा।

दोस्तों…

आज भी उस घर में रहने वाले कहते हैं

कि रात को किसी के चलने की आवाज़ आती है।

पर सबसे डरावनी बात ये है…

कि घर में रहने वालों की गिनती

हमेशा एक ज़्यादा लगती है।


सोचो अगर तुम्हारे घर में भी

कभी ऐसा महसूस हो…

तो तुम क्या करोगे?

नीचे ज़रूर बताना

और अगर कहानी पसंद आई हो

तो अगली और भी डरावनी कहानी के लिए तैयार रहना… 👁️‍🗨️

रात का पीछा

रात में सुनसान सड़क पर अकेला चलता व्यक्ति, पीली स्ट्रीट लाइट और हल्का कोहरा, सामान्य लेकिन बेचैनी भरा माहौल
सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगता है…
डर अभी दूर है।



 नमस्ते दोस्तों…

आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,


जहाँ डर अचानक नहीं आता…

वो धीरे-धीरे आपके भीतर उतरता है।

यहाँ हम उन अनुभवों की बात करते हैं

जो कहानी लगते हैं…

लेकिन कभी न कभी

किसी के साथ सच में हो सकते हैं।


दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहा हूँ,

जो सुनने में शायद काल्पनिक फिक्शन लगे…

लेकिन अगर आप कभी

अकेले रात में, किसी सुनसान रास्ते से गुज़रे होंगे,

तो यकीन मानिए —

आपको भी लगेगा कि…

“ये मेरे साथ भी हो सकता है।”


कभी-कभी किसी जगह हमें बिना किसी वजह

अजीब सा डर महसूस होने लगता है।

दिल तेज़ धड़कता है,

हम बार-बार पीछे मुड़कर देखते है,

और दिमाग बार-बार समझाता है —

“कुछ नहीं है…

बस वहम है…

लेकिन कुछ डर ऐसे होते हैं दोस्तों…

जो दिमाग से नहीं आते,

वो सीधे महसूस होते हैं।

ये डर हमारे अंदर

बेचैनी और अकेलेपन का एहसास भर देता है।

ऐसा लगता है जैसे

शरीर तो चल रहा है…

लेकिन मन कहीं पीछे छूट गया हो।

और अब…

मैं आपको ऐसी ही एक कहानी बताने जा रहा हूँ

जो आपको ऐसे ही एक डर का एहसास करा देगी।

तो चलीए अब उस कहानी पर

जो रोहन नाम का व्यक्ति खुद आपको बतायेगा।


मेरा नाम रोहन है।

मैं 29 साल का हूं।

और एक प्राइवेट कंपनी में नाइट-शिफ्ट काम करता हूँ।

नाइट-शिफ्ट के कारण

मैं अक्सर देर से ही घर जाता हूं। 

यह हमेशा का था

रोज़ की तरह उस दिन भी

मैं रात करीब 11:45 बजे

ऑफिस से निकलकर

सीधे घर जा रहा था।

लेकिन उस रात ने

सब कुछ बदल दिया।


ऑफिस से घर जाने का एक छोटा रास्ता था,

जो एक पुराने, सुनसान मैदान के किनारे से गुजरता था।

 मैं रोज़ वही रास्ते से घर जाता था।

समय था करीब 12:10 बजे।

हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

आस-पास कोई दुकान, कोई घर नहीं…

बस अंधेरा और सन्नाटा।

सब कुछ… बिल्कुल सुनसान।


मैं चलते हुए

फोन पर समय देख रहा था।

जूतों की आवाज़

खामोश ज़मीन पर साफ सुनाई दे रही थी।

दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।

स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी

आगे-पीछे फैल रही थी।

फिर अचानक…

हवा जैसे रुक सी गई।

जूतों की आवाज़ अब

मुझे थोड़ी भारी लगने लगी।

हर कदम के साथ

दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी।

मुझे लगा

जैसे मेरे पीछे

कोई और भी चल रहा है।

लेकिन जब मैंने रुककर सुना —

सिर्फ मेरी साँसों की आवाज़ थी।


मैंने खुद को समझाया —

“रात है…

दिमाग ज़्यादा सोच रहा है।”

मैं फिर चलने लगा।

लेकिन तभी…

मुझे अपनी चाल के साथ

एक और चाल सुनाई दी।

मैं रुका।

वो आवाज़ भी रुक गई।

मेरे शरीर में 

अजीब सी सिहरन दौड़ गई।


अब माहौल जैसे बदल चुका था।

सन्नाटा चुभने लगा था।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था,

हथेलियाँ ठंडी पड़ गई थीं।

मुझे साफ महसूस हो रहा था —

कोई है…

जो मेरी हर हरकत

कॉपी कर रहा है।

मैं तेज़ चलने लगा।

तो पीछे की आवाज़ भी

तेज़ हो गई।


अचानक

स्ट्रीट लाइट की रोशनी में

मैंने ज़मीन पर

दो परछाइयाँ देखीं।

एक मेरी थी।

दूसरी…

थोड़ी टेढ़ी,

अस्वाभाविक। मैं सहम गया,

मैंने सिर उठाया।

सिर्फ एक पल के लिए

मुझे सामने

किसी का चेहरा दिखा…

आँखें…

बिल्कुल खाली।

और फिर —

सब अंधेरा।

मैं इस कदर डर गया कि 

 बिना सोचे

बस भागने लगा।

मेरी साँसें टूट रही थीं,

पैर भारी हो गए थे।

मेरे पीछे से किसी के

अंधेरी सड़क पर तेज़ चलता व्यक्ति, ज़मीन पर दो परछाइयाँ, एक असामान्य और टेढ़ी, डर और तनाव भरा माहौल
जब कदम तेज़ हों…
और परछाईं एक से ज़्यादा।


घिसटने की आवाज़ लगातार आ रही थी।

जैसे कोई मेरे पिछे ही हो।

मैं गिरते-पड़ते

मैदान पार करके

जैसे तैसे सीधे सड़क पर पहुँचा।

वहा काफ़ी रोशनी थी…

और वो आवाज़ आनी

एकदम बंद हो गई थी।

मैदान की तरफ गहरा 

अंधेरा फैला हुआ था।


उसके बाद मैं घर पहुँचा 

मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।

कपड़े पसीने से भीग चुके थे।

मेरे घरवाले भी मेरी हालत 

देख कर परेशान हो गये थे।

वह पूरी रात

मुझे नींद नहीं आई।

अगले दिन मैं काम पर 

नहीं गया 

मेरे अंदर कुछ टूटा हुआ था।


आज भी…

जब मैं उस रास्ते से गुजरता हूँ,

किसी को

 साथ लेकर जाता हूं 

और अपनी परछाईं

बार बार देखता हूँ।

थका हुआ व्यक्ति सुनसान सड़क के पास खड़ा, ज़मीन की ओर देखता हुआ, पीछे लंबी परछाइयाँ, चेहरे पर डर और भ्रम
कहानी शायद खत्म हो गई…
लेकिन एहसास अब भी यहीं है।


दोस्तो रोहन की कहानी तो यहीं खत्म होती है…

लेकिन डर नहीं।

क्योंकि कभी-कभी…

परछाईं

हमारी नहीं होती।

रात को दरवाज़ा मत खोलना

 

रात के समय बंद लकड़ी का पुराना दरवाज़ा, अंदर से पीली रोशनी हल्की-सी बाहर आती हुई, चारों ओर सन्नाटा और ठंडी हवा का एहसास
रात के सन्नाटे में बंद दरवाज़ा और भीतर से आती हल्की रोशनी, मन में बिना वजह बेचैनी पैदा कर देती है।



नमस्ते दोस्तों,

स्वागत है आपका मेरे Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,


जहाँ हम ऐसी कहानियाँ साझा करते हैं

जो सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं…

बल्कि पढ़ने के बाद भी

कुछ देर तक आपके आसपास महसूस होती रहती हैं।


आज की कहानी

कोई मनगढ़ंत किस्सा नहीं है।

यह मुझे एक ऐसे व्यक्ति ने बताई थी

जो आज भी

रात में सोने से पहले

अपने घर का दरवाज़ा

दो बार चेक करता है।

आज मैं आपको वही कहानी सुनाने जा रहा हूँ।

लेकिन उससे पहले…

ज़रा एक बात सोचिए।

कि, आप गहरी नींद में हों,

और आधी रात को

कोई आपके दरवाज़े पर

आपका ही नाम लेकर

धीरे-धीरे आवाज़ दे…

तो आप क्या करेंगे?

दरवाज़ा खोलेंगे?

या बस चुपचाप 

अंदर ही खड़े रहेंगे?

आज की कहानी भी

कुछ ऐसी ही है।

🌘

यह बात 2019 की है।

सर्दियों का महीना था —

जनवरी का आख़िरी हफ्ता।

यह कहानी राजेश नाम के व्यक्ति की है।

उम्र करीब 32 साल।

आदीलाबाद शहर से थोड़ा बाहर

एक पुराने से मोहल्ले में

 अकेला रहता था।

राजेश की नौकरी

एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में थी।

अक्सर उसे

घर से काम करना पड़ता था,

और कई बार

देर रात तक

लैपटॉप के सामने बैठना उसकी आदत बन चुकी थी।

उसका घर

एक मंज़िला था।

सामने छोटा-सा आंगन,

लोहे का गेट

और अंदर

मोटा लकड़ी का दरवाज़ा।

उसके पड़ोस में दो-तीन घर और थे,


🌑  

उस दिन

राजेश ने देर से खाना खाया।

करीब 11:45 बजे

और सोने की तैयारी करने लगा।

बाहर

हल्की ठंड थी।

हवा नहीं चल रही थी,

फिर भी

कभी-कभी

पेड़ों की शाखाएँ

आपस में टकराने की आवाज़ आ जाती थी।

राजेश ने

दरवाज़ा बंद किया,

अंदर से कुंडी लगाई

और आदतन

एक बार और

दरवाज़े को धक्का देकर देखा।

सब ठीक था।

करीब 12:30 बजे

वह बिस्तर पर लेट गया।

🔔 

कितनी देर बाद

उसे नींद आई —

यह उसे खुद नहीं पता।

लेकिन अचानक

उसे लगा

जैसे किसी ने

बहुत हल्के से

उसका दरवाज़ा खटखटाया हो।

ठक… ठक…

राजेश की आँख खुल गई।

उसने घड़ी देखी —

1:17 AM

पहला ख्याल यही आया —

“शायद वहम होगा।”

उसने करवट बदली

और आँख बंद करने की कोशिश की।

अंधेरे कमरे में खड़ा एक अकेला व्यक्ति, सामने बंद दरवाज़े की ओर देखता हुआ, पीछे कमजोर बल्ब की रोशनी और चेहरे पर तनाव
जब इंसान कमरे में अकेला होता है और सामने बंद दरवाज़ा हो, तब डर किसी आवाज़ का नहीं, इंतज़ार का होता है।


कुछ सेकंड बाद

फिर वही आवाज़।

इस बार

थोड़ी साफ़।

ठक… ठक…

राजेश उठकर बैठ गया।

इतनी रात को

कौन आ सकता है?

पड़ोस में

किसी से

उसकी ज़्यादा जान-पहचान भी नहीं थी।

वह बिस्तर से उठा,

लेकिन दरवाज़े तक नहीं गया।

बस वहीं खड़ा होकर

सुनने लगा।

तभी....

दरवाज़े के बाहर से

एक धीमी आवाज़ आई—

“राजेश…”

उसका नाम।

बिल्कुल सही उच्चारण में।

राजेश का शरीर

एकदम सख़्त हो गया।

उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उसके दिमाग में

कई सवाल एक साथ आने लगे।

कौन हो सकता है?

इतनी रात को?


उसका गला सूखने लगा।

हथेलियों में पसीना आ गया।

वह दरवाज़े की तरफ

दो कदम बढ़ा…

फिर रुक गया।

आवाज़ फिर आई—

“दरवाज़ा खोलो… ठंड लग रही है।”

वह आवाज़

बस…

बिल्कुल सामान्य थी।

और यही बात

उसे सबसे ज़्यादा गलत लग रही थी।


राजेश ने खुद को समझाया—

“शायद कोई पड़ोसी मदद माँग रहा हो।”

लेकिन अगला ही ख्याल आया—

“किसी को मेरा नाम कैसे पता?”

उसने मोबाइल उठाया।

नेटवर्क था।

घड़ी चल रही थी।

सब कुछ

सामान्य था।

सिवाय

दरवाज़े के बाहर खड़ी

उस आवाज़ के।


दरवाज़े पर

अब दस्तक नहीं हो रही थी।

बस आवाज़—

“राजेश…

मुझे अंदर आने दो…”

इस बार

आवाज़

थोड़ी पास लग रही थी।

जैसे

मुंह

दरवाज़े से

लगाकर बोली जा रही हो।

राजेश ने

बिना आवाज़ किए

दरवाज़े के झरोखे से

बाहर झाँकने की कोशिश की।

लेकिन बाहर

अंधेरा था।

इतना गहरा

कि कुछ भी

आकार में नहीं दिख रहा था।


अब वह पूरी तरह

फँस चुका था।

अगर वह दरवाज़ा खोले—

तो क्या होगा?

और अगर नहीं खोले—

तो क्या वह आवाज़

खुद चली जाएगी?

उसके दिमाग में

एक पुरानी बात

अचानक घूम गई।

उसकी दादी

कहती थीं—

“रात को

अगर कोई नाम लेकर बुलाए,

तो दरवाज़ा मत खोलना।”

उस समय

यह सब

अंधविश्वास लगता था।

लेकिन उस रात…


दरवाज़े के नीचे से

अचानक

एक परछाईं

सरकती हुई दिखाई दी।

पूरी नहीं।

बस

जैसे किसी के पैर

वहाँ खड़े हों।

लेकिन

परछाईं

हिल नहीं रही थी।

बस…

मौजूद थी।

राजेश ने

पूरी ताकत से

अंदर की कुंडी पकड़ ली।

उसकी सांस

तेज़ हो गई।

और तभी—

आवाज़ अचानक

बंद हो गई।

ना दस्तक।

ना फुसफुसाहट।

बस

खामोशी।

इतनी गहरी

कि कानों में

सीटी बजने लगी।

सब कुछ जैसे शांत था अंदर और बाहर भी

उसके बाद आवाज आना भी बंद हो गया था

लेकीन राजेश कि हालत खराब ती

वह उस रात सो नहीं सका

रात के अंधेरे में घर के बाहर गीली ज़मीन पर बने पैरों के निशान, जो दरवाज़े के सामने आकर अचानक रुक जाते हैं
कुछ निशान सवाल छोड़ जाते हैं—क्यों आए, और फिर बिना कुछ किए वापस क्यों नहीं गए।


सुबह

करीब 6 बजे

राजेश की आँख खुली।

सब कुछ

सामान्य था।

दरवाज़ा वैसा ही बंद।

उसने हिम्मत करके

दरवाज़ा खोला।

और उसने देखा बाहर

दरवाज़े के ठीक सामने

मिट्टी पर

गीले पैरों के निशान थे।

जो

आकर

वहीं

खत्म हो जाते थे।


उस दिन के बाद

राजेश ने

रात में

हेडफोन लगाकर

काम करना छोड़ दिया।

सोते वक्त

लाइट बंद नहीं करता।

और अगर

कभी भी

रात में

कोई हल्की आवाज़ भी आए—

तो बस

एक ही बात

उसके दिमाग में आती है—

“रात को दरवाज़ा मत खोलना।”


🌑 समापन

दोस्तों,

यह कहानी यहीं समाप्त होती है…

लेकिन सवाल

आज भी वही है—

वह कौन था

जो दरवाजे के खडा था


और अगर

राजेश ने

दरवाज़ा खोल दिया होता…

तो?

आप क्या सोचते हैं?

यह सिर्फ डर था?

या सच में

कुछ ऐसा है

जो रात में

दरवाज़ों के बाहर

इंतज़ार करता है?

सोचिए…

अगर आज रात

आपके दरवाज़े पर

कोई नाम लेकर बुलाए…

तो आप

क्या करेंगे?


मिलते हैं दोस्तों,

अगली Mysterious Kahani में…

अमावस की रात –और वह रास्ता

दिन में सामान्य दिखने वाला खुला मैदान, सूखी घास और पीपल के पेड़ों के साथ, शांत लेकिन हल्का अजीब वातावरण
दिन की रोशनी में जो जगह बिल्कुल सामान्य लगती है, वही जगह अंधेरा होते ही मन में अनजानी बेचैनी पैदा करने लगती है।



 नमस्ते दोस्तों,

स्वागत है आपका मेरे Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,

जहाँ हम ऐसी कहानियाँ साझा करते हैं

जो महसूस की जाती हैं।


आज मैं आप को एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हू

जो आपको शुरुआत में बिल्कुल सामान्य लगेगी,

लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ेगी,

आप इसका डर महसूस करने लगोगे,

यह कहानी मेरे साथ हुई एक घटना पर आधारित है।


अब ज़रा सोचिए…

अगर आप रोज़ जिस रास्ते से आते-जाते हों,

वह दिन में बिल्कुल सुरक्षित लगता हो,

लेकिन रात होते ही

वही रास्ता आपको रोकने लगे…

आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

🌘 कहानी की शुरुआत 

यह बात 2018 की है।

उस समय मैं कस्बे के बाहर स्थित

एक कोल्ड स्टोरेज गोदाम में

नाइट शिफ्ट सुपरवाइज़र की नौकरी करता था।

मेरी ड्यूटी रात 3 बजे खत्म होती थी।

क्योंकि गोदाम शहर से थोड़ा बाहर था,

इसलिए रोज़ देर रात

अकेले ही घर लौटना मेरी मजबूरी थी।

उस रात अमावस थी।

मोबाइल की बैटरी कम थी

और शरीर थकान से बोझिल।


घर पहुँचने के दो रास्ते थे।

एक पक्का, लंबा और रोशनी वाला —

जो बस स्टैंड होकर जाता था

और कम से कम 40 मिनट लेता था।

दूसरा छोटा, कच्चा रास्ता —

जो एक पुराने पीपल के पेड़ों वाले मैदान को काटता हुआ

सीधे मेरे मोहल्ले में निकलता था।

दिन में मैं हमेशा उसी छोटे रास्ते से जाता था।

रात में भी कई बार जा चुका था —

कभी कुछ गलत नहीं हुआ था।

उस दिन

थकान ज़्यादा थी,

और बस घर पहुँचने की जल्दी।

इसीलिए मैंने वही रास्ता चुना।

🌞 

दिन के वक्त वह मैदान

बिल्कुल साधारण लगता था।

सूखी घास,

बीच-बीच में पीपल के पेड़,

एक पुराना बंद कुआँ

और खुला आसमान।

पास के गाँव के लोग

दिन में वहाँ से गुजरते थे।

कभी किसी ने उस जगह को लेकर

कुछ अजीब नहीं कहा था।

लेकिन रात में

वही मैदान

अलग ही तरह से भारी लगता था।

चाँद नहीं था।

रोशनी इतनी कम

कि चीज़ें साफ़ दिखें नहीं,

बस मौजूद होने का एहसास दें।

पेड़ जैसे

सीधे खड़े नहीं,

बल्कि थोड़ा झुके हुए लग रहे थे।

मैंने खुद को समझाया —

“रोज़ का रास्ता है… कुछ नहीं होगा।”

अंधेरी रात में अकेला व्यक्ति कच्चे रास्ते पर चलता हुआ, चारों ओर गहरी परछाइयाँ और सीमित रोशनी
जब चारों ओर सन्नाटा हो और रास्ता जाना-पहचाना हो, तब भी अकेले कदमों के साथ डर धीरे-धीरे साथ चलने लगता है।


मैदान के बीच पहुँचते ही

मुझे लगा

जैसे मेरे पीछे

किसी ने कदम बढ़ाए हों।

मैं रुका।

सब शांत।

मैंने थकान पर डाल दिया

और आगे बढ़ गया।

लेकिन तभी

घास में चलने की

एक अलग-सी आवाज़ आई।

🧠

मुझे डर का एहसास हुआ,

पर मैंने उसे नाम नहीं दिया।

बस गला सूखने लगा।

हाथ भारी हो गए।

और कदम

अपने आप धीमे पड़ गए।

मैंने पीछे देखा।

कुछ नहीं।


मैंने फिर चलना शुरू किया।

तीन कदम…

और वही आवाज़

फिर से।

इस बार

मेरे रुकने से पहले

वह भी रुक गई।

यहीं

मेरे सारे बहाने टूट गए।

👁️

मेरी बाईं ओर

एक अधूरी-सी परछाईं थी।

पूरा शरीर नहीं,

बस कंधे और सिर का अंदाज़ा।

वह मेरी तरफ नहीं देख रही थी।

बस मौजूद थी।

उस पल

मुझे डर लगना

अचानक बंद हो गया।

रात के अंधेरे में पेड़ों के बीच अस्पष्ट परछाई, जो साफ़ दिखाई नहीं देती लेकिन मौजूदगी का एहसास कराती है
कुछ चीज़ें सामने आकर डराती नहीं हैं, बल्कि चुपचाप मौजूद रहकर मन को बेचैन कर देती हैं।

तभी मोबाइल बजा।

घर से कॉल था।

स्क्रीन की रोशनी में

वह परछाईं

गायब हो चुकी थी।

मैं दौड़ पड़ा।

उस रात के बाद

मैंने नाइट शिफ्ट छोड़ दी।

आज भी

अगर उस मैदान के पास से

दिन में भी गुजरता हूँ,

तो कदम तेज़ हो जाते हैं।

और कभी-कभी

रात की खामोशी में

घास की वही आवाज़

आज भी याद आ जाती है।


🌑 समापन

दोस्तों,

यह कहानी यहीं समाप्त होती है…

लेकिन सवाल आज भी वही है —

क्या वह सिर्फ मेरी थकान थी?

या सच में

कुछ कुछ और....


तो मिलते हैं दोस्तों,

अगली Mysterious Kahani में…

क्योंकि कुछ एहसास

समझाए नहीं जाते…

महसूस किए जाते हैं।