आख़री सफ़र

 



रात हमेशा काली नहीं होती...

कुछ रातें यादों से भरी भी होती हैं।

तो कुछ रातें इंतज़ार से।

और कुछ... मौत से।

नवंबर की वह ठंडी हवा पहाड़ियों के बीच से सीटी बजाती हुई गुजर रही थी। सड़क सुनसान थी। दूर-दूर तक कोई रोशनी नहीं, कोई इंसान नहीं, सिर्फ़ धुंध की मोटी चादर और उसके बीच एक पुरानी बस—“विदर्भ ट्रैवल्स”—धीरे-धीरे पहाड़ी रास्ते पर चढ़ रही थी।

बस के ऊपर पीली हेडलाइटें थीं, जो धुंध को चीरने की कोशिश कर रही थीं... मगर धुंध जैसे उन्हें निगल रही थी।

ड्राइवर रामदास ने सिगरेट का आख़िरी कश लिया और शीशे से बाहर झांका।

“ये रास्ता मुझे पसंद नहीं...” उसने बड़बड़ाया।

कंडक्टर नरेश टिकट काटते हुए हँसा।

“रास्ता नहीं... तेरी उम्र हो गई है अब डरने की।”

बस में कुल बारह यात्री थे।

एक नवविवाहित जोड़ा,

एक बूढ़ी औरत जिसकी आँखें बंद थीं,

एक कॉलेज लड़का जो लगातार मोबाइल चला रहा था,

एक सूट पहना आदमी जो हर पाँच मिनट में घड़ी देखता था,

एक औरत अपनी छह साल की बेटी के साथ,

और सबसे पीछे खिड़की के पास बैठा एक आदमी...

काले कोट में।

चेहरा आधा अंधेरे में।

बिना हिले।

बिना पलक झपकाए।

रामदास ने रियर मिरर में उसे देखा।

ना जाने क्यों उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

बस आगे बढ़ी।


पहाड़ी मोड़ पर एक जगह अचानक एक तेज़ झटका लगा।

“धड़ाम!”

बस एकदम से रुक गई।

“क्या हुआ?” यात्रियों में हलचल मच गई।

रामदास नीचे उतरा। नरेश भी साथ गया। धुंध इतनी घनी थी कि बस का पिछला हिस्सा भी साफ़ नहीं दिख रहा था।

नीचे उतरकर देखा—टायर सही था। इंजन भी ठीक था।

“फिर रुकी कैसे?” नरेश ने पूछा।

रामदास ने जवाब नहीं दिया।

उसका ध्यान एक चीज पर था।

क्योंकि बस के नीचे... कीचड़ में... ताज़े पैरों के निशान थे।

नंगे पैर के।

जो बस के नीचे से निकलकर जंगल की तरफ़ जा रहे थे।

“सब लोग अंदर बैठो!” रामदास चिल्लाया भी बस के अंदर आया और उसने जल्दी से बस स्टार्ट की।

पर पहली  बार में इंजन पहली बार में नहीं चला।

दूसरी बार... भी नहीं।

पर तीसरी बार...

“घर्रर्र...”

बस चालू हुई।

जैसे ही बस आगे बढ़ी, पीछे बैठी छोटी बच्ची रोने लगी।

“मम्मी... वो अंकल खिड़की के बाहर चल रहे हैं...”

उसकी माँ ने घबराकर बाहर देखा।

बस तेज़ रफ्तार में थी।

मगर धुंध के बीच... कोई आदमी सचमुच बस के साथ-साथ चल रहा था।

नंगे पैर।

सफेद कपड़ो मे।

झुका हुआ सिर।

और उसकी चाल... किसी इंसानों जैसी नहीं थी।

चीखें गूंज उठीं।

रामदास ने एक्सिलेटर दबाया।

“बैठ जाओ सब!”

बस अब पागलों की तरह भाग रही थी। मोड़ पर टायर चीख रहे थे।

पीछे बैठे काले कोट वाले आदमी ने पहली बार सिर उठाया।

उसका चेहरा पीला था। होंठ सूखे हुए। आँखें गहरी और अजीब शांत।

उसने धीरे से कहा—

“रुको मत... वो चढ़ना चाहता है।”

सबकी सांस रुक गई।

“तुम कौन हो?” नरेश चिल्लाया।

वो आदमी हल्का मुस्कुराया।

“मैं भी यात्री हूँ... पिछले साल से।”

बस में एकदम सन्नाटा जम गया।

रामदास ने रियर मिरर देखा—

पीछे की सीट... जहाँ वो बैठा था... खाली थी।

लेकिन उसकी आवाज़ अभी भी गूंज रही थी।

सब लोग डर गये थे।

फीर अचानक बस की छत पर कुछ गिरा।

ठक... ठक... ठक...

जैसे कोई ऊपर चल रहा हो।

धीरे-धीरे कदम आगे बढा रहा हो।

छत से खरोंचने की आवाज़ आई।

बूढ़ी औरत ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं।

उसकी दोनों आँखें सफेद थीं।

उसने फुसफुसाकर कहा—

“जिसे रास्ते में छोड़ दिया जाता है... वो यही होता है।”

रामदास काँप गया।

“मैंने कुछ नहीं किया...”

नरेश ने उसे देखा।

“क्या मतलब?”

रामदास रोने लगा।

“एक साल पहले... इसी रास्ते पर एक आदमी बस के नीचे आ गया था। रात थी... मैं बहुत डर गया था। मैंने लाश जंगल में फेंक दी... किसी को नहीं बताया...”

सारे यात्री जड़ हो गए।

ऊपर की आवाज़ बंद हो गई।

फिर..



बस का दरवाज़ा अपने आप ही खुल गया।

ठंडी हवा अंदर आई।

और दरवाज़े पर... वही आदमी खड़ा था।

सफेद कपड़े, टूटी गर्दन, चेहरा खून से सना।

उसने अंदर कदम रखा।

हर कदम पर पानी और कीचड़ टपक रहा था।

वो सीधा रामदास की सीट तक आया।

“अब... मेरा टिकट काट।”

रामदास चीख पडा।

बस उसके नियंत्रण से बाहर हो गई।

मोड़ आया

और बस रेलिंग तोड़कर खाई में गिर गई।


सुबह

रेस्क्यू टीम पहुँची।

बस पूरी तरह टूट चुकी थी।

अख़बारों में खबर छपी—

“विदर्भ ट्रैवल्स बस हादसे में 12 लोगों की दर्दनाक मौत।”

लेकिन जब पुलिस ने शव गिने...

तेरह लाशें मिलीं।

तेरहवीं लाश की पहचान कभी नहीं हुई।

उसके हाथ में पुराना बस टिकट था...

जिस पर लिखा था—

Aakhri Safar

Date: One Year Ago....




आज भी उस पहाड़ी रास्ते पर अगर रात के दो बजे कोई वाहन गुज़रे...

तो धुंध में एक पुरानी बस दिखती है।

उसके अंदर बारह यात्री बैठे होते हैं।

और दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा रहता है।

पूछता है—

“सीट खाली है?”

कमरा नं.6

शहर के बाहर सुनसान जगह पर स्थित पुराना डरावना बंगला, टूटा गेट, घास से घिरा हुआ, शाम की नारंगी रोशनी में eerie माहौल।
शांत दिखने वाला यह बंगला अपने अंदर एक ऐसा राज छुपाए बैठा था, जो किसी को वापस नहीं जाने देता।


नागपुर के बाहर, शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर एक पुराना बंगला था…

नाम था — Shantivan Villa।

यह जगह अब बिकने वाली थी।

राहुल, 32 साल का property evaluator, पिछले 6 साल से यही काम कर रहा था — पुराने घरों की कीमत तय करना।

उसके लिए हर घर बस दीवार, प्लास्टर, लकड़ी इससे ज्यादा कुछ नहीं था।

उस दिन वो अकेला ही पहुँचा था।

बंगला बाहर से शांत था… बहुत ज्यादा शांत।

दरवाज़ा जंग लगा था, पर खुल गया।

अंदर सब कुछ वैसा ही था —

पुराना फर्नीचर, धूल, दीवारों पर फीकी तस्वीरें…

और एक अजीब बात — हर चीज़ अपनी जगह पर perfect थी।

जैसे कोई यहाँ रहता था… अभी भी।


राहुल का काम simple था —

हर कमरे की condition check करो, photos लो, report बनाओ।

लेकिन इस property में एक खास बात थी —

अगर ये deal close होती, तो उसे बड़ा commission मिलने वाला था।

उसने तय किया —

आज ही पूरा inspection खत्म करेगा।

ग्राउंड फ्लोर — 3 कमरे

पहली मंजिल — 2 कमरे

सब नोट कर लिया।

पर blueprint में एक और room marked था।

Room No. 6

पर ऊपर जाकर तो…

वहां सिर्फ दीवार थी।

राहुल ने blueprint दुबारा देखा।

कमरा साफ़ दिख रहा था —

सीढ़ियों के ठीक सामने।

पर वहां… कुछ नहीं था।

उसने दीवार पर हाथ रखा।

ठंडी थी… बाकी घर से ज्यादा ठंडी।

उसने हल्के से knock किया।

अंदर से…

घनापन महसूस हुआ।

जैसे दीवार के पीछे कुछ भरा हो।

उसने आसपास देखा।

फर्श पर हल्की-सी लाइन थी…

जैसे कभी यहाँ दरवाज़ा रहा हो।

राहुल का दिमाग अब काम से हट चुका था।

अब ये एक puzzle था उसके लिए 

उसने पूरी दीवार टटोलनी शुरू की…

एक-एक इंच।

और फिर…

एक जगह उंगली दबते ही हल्की-सी आवाज़ आई —

टक...

दीवार थोड़ी-सी अंदर धँसी…

और धीरे-धीरे एक पतली दरार खुली।

अंदर… अंधेरा।

बहुत गहरा।

पुराने घर के धूल भरे hallway में एक आदमी मोबाइल flashlight से दीवार के पीछे छिपे गुप्त कमरे को खोजते हुए। Title:
जब दीवार खुली, तब उसे एहसास हुआ कि कुछ कमरे सिर्फ दिखने के लिए नहीं होते… निगलने के लिए होते हैं।


राहुल ने मोबाइल की flashlight ऑन की।

कमरा छोटा था…

पर खाली था।

कोई खिड़की नहीं, कोई फर्नीचर नहीं।

बस बीच में…

एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी।

और दीवार पर…

किसी ने खरोंच कर कुछ लिखा था।

शब्द साफ़ नहीं दिख रहे थे।

राहुल अंदर चला गया।

जैसे ही वो अंदर गया…

पीछे दीवार…

धीरे से बंद हो गई।

कमरे के अंदर हवा भारी थी।

राहुल ने दीवार पर लिखा पढ़ने की कोशिश की।

धीरे-धीरे शब्द साफ़ हुए —

“यहाँ जितना देर रुकोगे… उतना ....बस इतना ही था बाकी समझ नहीं आ रहा था...

उसने पलटकर देखा।

जहाँ से वो आया था…

वहां अब सिर्फ ठोस दीवार थी।

कोई दरवाज़ा नहीं।

और उसी पल…

उसे एहसास हुआ —

कमरे में वो अकेला नहीं है।


हल्की-सी आवाज़ आई…

जैसे कोई सांस ले रहा हो।

फिर…

उसकी अपनी shadow हिलने लगी।

shadow दीवार से अलग होकर…

धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी।

राहुल पीछे हटने लगा।

दिल तेज़ धड़क रहा था।

जितना वो डर रहा था…

shadow उतनी साफ़ हो रही थी।

जैसे वो उसी के डर से बन रही हो।

उसने आँखें बंद कीं…

पर आवाज़ें बढ़ गईं।

किसी के कदम…

किसी की फुसफुसाहट…

किसी का हँसना…

और फिर अचानक…

उसके दिमाग में memories flash होने लगीं —

उसकी गलती, उसका गुस्सा, उसका झूठ…

सब कुछ।

जैसे कोई उसके अंदर घुसकर…

उसे खोल रहा हो।

उसका शरीर वहीं था…

पर कुछ और उससे अलग हो रहा था।

अगले दिन…

property owner को report मिली।

राहुल की तरफ से।

Report बिल्कुल perfect थी।

हर room detail में लिखा था।

Room No. 6 के बारे में भी

लिखा था —

Owner खुश था।

Deal finalize हो गई।

कुछ दिनों बाद…

नया buyer उस घर में shift हुआ।

अंधेरे कमरे में बीच में रखी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी shadowy figure, दीवारों पर खरोंच के निशान, भयावह माहौल।
उस कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी… सिर्फ इंतज़ार था, अगले शिकार का।


फिर एक रात…

उसे लगा… घर में एक extra room भी है।

सीढ़ियों के सामने।

जहाँ पहले सिर्फ दीवार थी।

अब वहाँ एक दरवाज़ा था।

और अंदर…

एक आदमी कुर्सी पर बैठा था।

बिल्कुल शांत।

उसकी आँखें खाली थीं।

जैसे वो वहाँ फंसा हुआ हो।

और उसके पीछे दीवार पर…

नए खरोंच बने थे —

“अब तुम अगला हो।”


चालवा

 

रात के समय सुनसान गांव का रास्ता, सूखे पेड़ और हल्का कोहरा, डरावना माहौल
एक ऐसा रास्ता जहाँ सब कुछ शांत है… पर यह सन्नाटा ही सबसे बड़ा डर है।


गांव के बाहर, सूखी नदी के पार, एक पुराना रास्ता था…

जिस पर लोग दिन में भी कम ही जाते थे।

कहते थे—

उस रास्ते पर  कोई “चलता” है…

पर उसके पैरों की आवाज नहीं आती।

कुछ साल पहले 

एक आदमी वहां से गुजर रहा था।

सुबह उसका बस्स शरीर मिला—

आंखें खुली हुई… जैसे उसने कुछ देखा हो,

पर चेहरा बिल्कुल खाली।

उसके बाद से ही…

लोग उस रास्ते को “चालवा” कहने लगे।

अक्टूबर की ठंडी रात थी।

हवा में सूखापन था… और खेतों से आती हल्की सड़ी मिट्टी की गंध।

विक्रम अपनी बाइक पर उस रास्ते पर चला रहा था।

शहर से गांव की ओर जाने वाला यही छोटा रास्ता था…

बाकी रास्ता 20 किलोमीटर लंबा पड़ता था।

वह जल्दी में था।

चारों तरफ अंधेरा था…

आसपास कहीं कोई घर नहीं था…

बस सूखे पेड़, जिनकी शाखाएं हवा में हिल भी नहीं रही थीं।

सब कुछ… अजीब तरह से स्थिर था।

रात में बाइक चलाता आदमी, पीछे अदृश्य साया मौजूद, डरावना अनुभव
कभी-कभी डर दिखता नहीं… बस आपके साथ चलने लगता है।


 सब कुछ  सामान्य  था।

बस बाइक की आवाज… और उसकी सांसें।

 अचानक—

उसे ऐसा लगा जैसे उसके पीछे कोई चल रहा है।

उसने रियर व्यू मिरर में देखा।

पर कुछ कुछ नहीं था।

सिर्फ खाली रास्ता था।

वह आगे बढ़ने लगा

पर कुछ सेकंड बाद—

उसे फिर वही एहसास हुआ।

इस बार…

थोड़ा और करीब।

जैसे कोई उसकी बाइक की स्पीड के बराबर चल रहा हो।


विक्रम ने बाइक की स्पीड बढ़ाई।

इंजन की आवाज तेज हुई…

पर उसके साथ-साथ…

वो “मौजूदगी” भी तेज हो गई।

अब उसे साफ महसूस हो रहा था—

कोई है वहां, उसके आसपास।

जो दिख नहीं रहा था।

हवा बडी ठंडी हो गई थी…

और अचानक।

उसके हाथों पर रोंगटे खड़े हो गए।

आगे रास्ते पर एक मोड़ था।

जैसे ही उसने मोड़ लिया—

बाइक अपने आप धीमी हो गई।

उसने एक्सेलरेटर घुमाया…

पर स्पीड नहीं बढ़ी।

इंजन चल रहा था…

पर बाइक जैसे किसी ने पकड़ ली हो।

और तभी—

उसे अपने पीछे…

किसी के बैठने का वजन महसूस हुआ।

उसकी सांस जैसे रुक सी गई।

उसने पीछे देखने की हिम्मत नहीं की।

पर उसकी गर्दन के पास…

उसे ठंडी सांस महसूस हो रही थी।

जैसे कोई बहुत करीब बैठा हो।

विक्रम के हाथ कांप गए।

उसने जोर से एक्सेलरेटर घुमाया।

बाइक झटके से आगे बढ़ी।

और पीछे का वजन…

कुछ सेकंड के लिए जैसे गायब हो गया।

अंधेरे कमरे में बैठा आदमी, पीछे साया और बाहर सुनसान रास्ते पर बाइक, हॉरर सीन
कहानी खत्म नहीं होती… बस अपना अगला शिकार ढूंढ लेती है।


वह बिना पीछे देखे बाइक भगाता रहा।

अब रास्ता खत्म होने वाला था…

आगे गांव की पहली लाइट दिख रही थी।

जैसे ही वह उस रोशनी के करीब पहुंचा—

अचानक सब शांत हो गया।

ना हवा…

ना वो एहसास।

सब कुछ… सामान्य।

वह रुक गया।

कुछ सेकंड…

बस सांस लेता रहा।

फिर धीरे से पीछे मुड़ा—

कुछ नहीं।

खाली सीट।

उसने गहरी सांस ली…

और बाइक स्टार्ट रखकर खड़ा रहा।

वह अपने गांव पहुंच गया।

पर उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

बस अपने कमरे में जाकर चुपचाप बैठ गया।

पर उस रात…

डर के मारे उसे नींद नहीं आई।

हर बार जब वह आंखें बंद करता—

उसे वही एहसास होता…

कोई उसके पीछे बैठा है।

वह बच गया था पर अब डर उसके अंदर 

बस गया था।


अगली रात—

उसी रास्ते पर एक और बाइक जा रही थी।

एक नया आदमी…

जल्दी में।

जैसे ही उसने मोड़ लिया—

उसकी बाइक धीमी हो गई।

और अचानक—

उसे लगा…

पीछे कोई बैठ गया है।



आख़िरी ट्रेन


रात में सुनसान भारतीय रेलवे स्टेशन, टिमटिमाती पीली लाइट, खाली प्लेटफॉर्म पर अकेला आदमी खड़ा, चारों तरफ धुंध और खामोशी
जब पूरा स्टेशन खाली हो… और सिर्फ सन्नाटा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हो।


रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे का समय था।

स्टेशन लगभग खाली हो चुका था।

हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी… और ऊपर लगे पीले बल्ब बीच-बीच में टिमटिमा रहे थे।

घड़ी की टिक-टिक… और कहीं दूर से आती कुत्तों की भौंकने की आवाज़…

बस यही दो आवाज़ें थीं, जो उस सन्नाटे को और गहरा कर रही थीं।

राघव प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर खड़ा था।

उसे इस वक्त यहाँ नहीं होना चाहिए था।

पर काम ऐसा था कि देर हो गई… और अब यही आख़िरी ट्रेन बची थी, जो उसे शहर से उसके गांव तक ले जा सकती थी।

उसने एक बार चारों तरफ नज़र दौड़ाई।

पूरा स्टेशन जैसे किसी ने छोड़ दिया हो।

टिकट खिड़की बंद… चाय की दुकान आधी खुली, पर अंदर कोई नहीं…

एक बेंच पर अखबार पड़ा था, जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो।

राघव ने मोबाइल निकाला।

नेटवर्क कमजोर था… घड़ी में 11:37।

“ट्रेन 11:40 पर है…” उसने मन ही मन दोहराया।

धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म के किनारे खड़े-खड़े उसे महसूस हुआ कि…

कुछ ठीक नहीं है।

हवा पहले जैसी नहीं रही थी।

अब उसमें हल्की सी बासीपन की गंध थी… जैसे किसी बंद कमरे की हवा।

उसने नाक सिकोड़ते हुए इधर-उधर देखा।

कुछ नहीं।

तभी दूर से ट्रेन की हल्की सी आवाज़ सुनाई दी।

पहले बहुत धीमी…

फिर धीरे-धीरे बढ़ती हुई।

राघव थोड़ा सीधा होकर खड़ा हो गया।

अंधेरे में दूर से आती हेडलाइट दिखाई दी।

पर अजीब बात ये थी…

उस रोशनी में कोई गर्माहट नहीं थी।

 थोड़ी फीकी… जैसे धुंध के पीछे से आ रही हो।

ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

पर जैसे ही वो रुकी…

राघव के शरीर में हल्की सी सिहरन दौड़ गई।

कोई आवाज़ नहीं हुई।

न ब्रेक की चीख…

न पहियों की रगड़…

बस… वो आकर खड़ी हो गई।

चुपचाप।

अंधेरे प्लेटफॉर्म पर बिना आवाज़ के आती भूतिया ट्रेन, हल्की रोशनी, घना कोहरा और खुले दरवाज़ों में अंधेरा
 ट्रेन आई… पर उसके आने की कोई आवाज़ नहीं थी।


उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

दरवाज़ा खुला था।

पर अंदर अंधेरा था।

“शायद लाइट खराब है…” उसने खुद को समझाया।

उसने एक गहरी सांस ली और ट्रेन में चढ़ गया।

अंदर कदम रखते ही उसे ठंड का एहसास हुआ।

बाहर जितनी ठंड थी…

अंदर उससे ज्यादा।

जैसे किसी ने AC बहुत नीचे कर दिया हो…

या जैसे ये जगह बहुत समय से बंद हो।

उसने सीट ढूंढी और बैठ गया।

पूरा डिब्बा खाली था।

एक भी आदमी नहीं।

ट्रेन चल पड़ी।

धीरे-धीरे।

राघव ने खिड़की से बाहर देखा।

स्टेशन पीछे छूट रहा था…

पर अजीब बात ये थी कि बाहर का दृश्य साफ नहीं दिख रहा था।

जैसे धुंध हो… या कांच के बाहर कुछ जमा हो।

उसने हाथ बढ़ाकर कांच छुआ।

ठंडा।

बहुत ज्यादा ठंडा।

कुछ मिनट बीते।

फिर उसे महसूस हुआ…

कोई है।

उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

खाली।

सामने देखा।

खाली।

पूरा डिब्बा वैसा ही… सुनसान।

“दिमाग का वहम है…” उसने खुद को समझाया।

पर दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई थी।

ट्रेन की आवाज़ भी अजीब थी।

पहियों की खट-खट नहीं…

बस एक धीमी सी घिसटने की आवाज़…

जैसे ट्रेन पटरी पर नहीं…

किसी और चीज़ पर चल रही हो।

राघव ने सीट से थोड़ा उठकर दूसरे डिब्बे की तरफ देखा।

दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर अंधेरा।

पर…

उसे लगा जैसे अंदर कोई खड़ा है।

बहुत हल्की… एक परछाई।

उसने ध्यान से देखने की कोशिश की।

परछाई हिली नहीं।

बस खड़ी रही।

राघव का गला सूख गया।

“कोई और भी है…”

ये सोचकर उसे थोड़ी राहत मिली।

वो धीरे-धीरे उस दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

हर कदम के साथ ट्रेन की आवाज़ थोड़ी और धीमी होती जा रही थी।

जैसे…

ट्रेन खुद भी उसकी हरकत सुन रही हो।

वो दरवाज़े तक पहुंचा।

अंदर झांका।

कुछ नहीं।

पूरा डिब्बा खाली।

वो वहीं कुछ सेकंड खड़ा रहा।

फिर धीरे से पीछे मुड़ा…

और वहीं जम गया।

जिस डिब्बे में वो अभी बैठा था…

उसकी खिड़की के पास…

कोई बैठा था।

वो धीरे-धीरे वापस उसी तरफ चला।

दिल अब जोर से धड़क रहा था।

जैसे हर धड़कन उस सन्नाटे में गूंज रही हो।

वो पास पहुंचा।

सीट खाली थी।

पर…

खाली ट्रेन के डिब्बे में डरा हुआ आदमी, धूल भरी सीट पर ताज़ा निशान, पीछे हल्की परछाई, नीली ठंडी रोशनी
तुम अकेले नहीं हो… बस तुम्हें अभी दिख नहीं रहा।


सीट पर गड्ढा बना हुआ था।

जैसे अभी-अभी कोई बैठा हो।

राघव ने तुरंत पीछे हटना चाहा।

तभी…

उसके कान के बिल्कुल पास…

बहुत धीमी आवाज़ आई—

“देर हो गई…”

उसका शरीर जैसे सुन्न हो गया।

उसने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

कोई नहीं।

ट्रेन अब रुक रही थी।

पर बाहर कोई स्टेशन नहीं था।

सिर्फ अंधेरा।

गहरा… पूरा अंधेरा।

दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।

राघव वहीं खड़ा रहा।

हिल नहीं पा रहा था।

फिर उसे महसूस हुआ…

कोई उसके पीछे खड़ा है।

बहुत करीब।

इतना करीब कि उसकी सांस गर्दन को छू रही थी।

वो भागना चाहता था।

पर शरीर ने जवाब दे दिया।

धीरे-धीरे…

एक ठंडी उंगली उसके कंधे पर रखी गई।

और वही आवाज़ फिर आई—

“ये… आख़िरी ट्रेन है…”

अगली सुबह…

स्टेशन मास्टर ने प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर एक रिपोर्ट दर्ज की।

रात की आख़िरी ट्रेन…

उस रूट पर सालों पहले बंद हो चुकी थी।

और…

प्लेटफॉर्म के किनारे…

एक पुराना, जंग लगा डिब्बा खड़ा था।

दरवाज़ा खुला हुआ।

अंदर…

एक सीट पर धूल जमी थी।

पर उस धूल में…

एक ताज़ा बैठने का निशान था।


खौफनाक जिन्न

 


रात बिल्कुल साधारण थी…

 बाहर  हवा बस हल्की-सी बह रही थी। पेड़ों के पत्ते भी जैसे थक कर स्थिर हो गए थे। आसमान में चाँद पूरा नहीं था, पर इतना जरूर था कि जमीन पर फीकी सफेदी बिखेर दे।

रात में सुनसान गांव के रास्ते पर साइकिल चलाता एक आदमी, पास में पुराना कुआं और डरावना माहौल
एक साधारण सफर… जो शायद उतना साधारण नहीं था।


रमेश अपनी साइकिल धीरे-धीरे चलाते हुए रास्ता पार कर रहा था।

वह हर रोज इसी रास्ते से गुजरता था। शहर से देर तक काम करके लौटना उसकी आदत बन चुकी थी।

उसके लिए इस रास्ते से… हर रोज की बात थी।

पर वह रात… कुछ अलग होने वाली थी।

 उसने ध्यान नहीं दिया। पर

उस दिन हवा में एक अजीब-सी चुप्पी थी।

ऐसी चुप्पी 

जैसे कोई सुन रहा हो।

साइकिल की चेन की खट-खट भी उसे उस वक्त ज़्यादा साफ सुनाई देने लगी।

उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

 रास्ता… बिल्कुल ही सुनसान था पेड़… पौधे सब शांत थे, अंधेरा गहरा था।

वह आगे बढ़ गया।

थोड़ा आगे जाने पर रास्ते पर एक पुराना कुआं पड़ता था।

गांव के लोग अब उसका इस्तेमाल नहीं करते थे।

रमेश जैसे ही  उस कुएं के पास पहुंचा… उसकी साइकिल खुद-ब-खुद धीमी हो गई।

उसने ब्रेक नहीं लगाया था।

फिर भी… पहिये जैसे भारी हो गए थे।

उसने नीचे झुककर देखा…

कुछ भी नहीं फंसा था।

पर साइकिल चल नहीं रही थी।

आसपास एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था 

और तभी…

कुएं के अंदर से… एक हल्की-सी आवाज उसे सुनाई दी।

रमेश का जैसे गला ही सूख गया।

उसने  कुएं की तरफ देखा।

बहुत होत अंधेरा था।

गहरा… ठंडा अंधेरा।

कुछ दिख नहीं रहा था…

लेकिन एहसास हो रहा था…

कि नीचे कुछ है।

रात के अंधेरे में एक आदमी पुराने कुएं में झांकता हुआ, नीचे से आती रहस्यमयी रोशनी
कुछ चीजें देखनी नहीं चाहिए… फिर भी इंसान देखता है।


रमेश ने तुरंत अपनी साइकिल घुमाई और तेज चलाने लगा।

इस बार साइकिल चल रही थी।

बहुत आसानी से।

घर पहुंचने तक उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


घर में जाते रमेश ने दरवाजा बंद करते ही राहत की सांस ली।

घर में उसकी पत्नी सो रही थी।

सब कुछ सामान्य था।

पर अजीब सा सन्नाटा था।

वही… जो कुएं के पास था।


रात के करीब 2 बजे होंगे…

रमेश की नींद अचानक खुल गई।

कोई आवाज नहीं हुई थी।

फिर भी… उसे लगा… कोई है।

उसने आंखें खोलीं।

कमरा अंधेरे में डूबा था।

पर खिड़की से आती हल्की रोशनी में… उसे कुछ दिखा।

दरवाजे के पास…

कोई खड़ा था।

पहले तो उसे लगा—

“पत्नी होगी…”

पर उसकी पत्नी उसके पास ही सो रही थी।

उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

पत्नी वहीं थी।

और दरवाजे के पास खड़ा वो… अब भी वहीं था।

स्थिर।

बिल्कुल स्थिर।

रमेश का शरीर जड़ हो गया।

वह उठ नहीं पा रहा था।

सिर्फ देख पा रहा था।

कुछ सेकंड…

या शायद मिनट…

फिर वह चीज़… थोड़ा आगे बढ़ी।

उसकी चाल… इंसानी नहीं थी।

पैर जमीन को छू नहीं रहे थे…

बस खिसक रहे थे।

जैसे… उसे चलना याद नहीं।

अब उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखने लगा।

काला।

पूरी तरह काला।

पर आंखें…

आंखें सफेद थीं।

और… सीधा रमेश को देख रही थीं।

रमेश चिल्लाना चाहता था।

पर आवाज नहीं निकली।

उस चीज़ ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया और

कुछ फुसफुसाया।

पर शब्द समझ नहीं आए।

बस एक एहसास आया—

वह उसे पहचानता है।

अगले दिन सुबह…

रमेश उठा… नाश्ता किया…और काम पर चला गया।

उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

वही रास्ता  था।

कुआं भी… वही था।

पर इस बार…

उसने खुद साइकिल रोकी।

वह… कुएं के पास गया और

अंदर झांका।

नीचे…

कुछ नहीं था।

बस पानी था।

स्थिर… बिल्कुल शांत।

पर पानी में…

उसका प्रतिबिंब नहीं था।

उसकी जगह…

कोई और था।

काला।

सफेद आंखों वाला।

जो ऊपर देख रहा था।

रात में घर के बाहर खड़ा आदमी जिसकी जमीन पर दो परछाइयां दिख रही हैं, एक असामान्य
घर तक तो आ गया… पर अब वह अकेला नहीं है।


उस दिन के बाद…

गांव में लोगों ने नोटिस किया…

रमेश के अंदर का बदलाव।

वह कम बोलता था।

ज्यादा देर तक… खाली देखता रहता था।

और रात को…

उसके घर के बाहर…

कभी-कभी…

दो परछाइयाँ दिखती थीं।

एक… जो उसकी थी।

और दूसरी…

जो कभी हिलती ही नहीं थी।

बस… उसके साथ खड़ी रहती थी।

अब धीरे-धीरे…

लोगों ने उस रास्ते से जाना बंद कर दिया।

पर असली वजह… किसी को पता नहीं चली।

क्योंकि…

जो भी उस कुएं के पास रुकता है…

वह वापस तो आ जाता है…

पर…

वह अकेला नहीं आता।