जंगल की रात

 






कहते हैं, दुनिया में कुछ जगहें ऐसी होती हैं जो नक्शों में तो दिखाई देती हैं, लेकिन उनका रास्ता हर किसी को नहीं मिलता।


और कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जिनका रास्ता मिल जाए... तो वापस लौटने का रास्ता कभी नहीं मिलता।


महाराष्ट्र के भंडारा जिले के पास फैले घने जंगलों के बारे में भी लोग कुछ ऐसा ही कहते थे कि जंगल ज़िंदा है।


वह सुनता है।


वह देखता है।


और कभी-कभी...


वह बुलाता भी है।


महाराष्ट्र के घने जंगल में अपनी जीप के पास खड़ा एक सर्वे इंजीनियर, जिसके पीछे बिजली से जला हुआ रहस्यमयी पेड़ दिखाई दे रहा है।
राघव को लगा था कि वह सिर्फ एक शॉर्टकट ले रहा है, लेकिन जंगल ने उसके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।



राघव देशमुख, उम्र लगभग पैंतीस साल, पेशे से एक सर्वे इंजीनियर था। पिछले दस वर्षों से वह अलग-अलग इलाकों में जाकर जमीनों का सर्वे करने का काम करता था। पहाड़, नदियाँ, जंगल और सुनसान इलाके उसके लिए कोई नई बात नहीं थे।


उस दिन भी वह अपने काम से ही निकला था।


उसे भंडारा के पास एक छोटे-से गाँव में सरकारी जमीन के सीमांकन का काम पूरा करना था। काम उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंच गया। जब तक उसने अपनी जीप स्टार्ट की, दोपहर के सवा बारह बज चुके थे।


गाँव के सरपंच ने उसे रोकते हुए कहा था,


"अगर नागपुर जल्दी पहुँचना है, तो पहाड़ी के पीछे वाला कच्चा रास्ता पकड़ लेना। लगभग डेढ़ घंटा बच जाएगा।"


"और अगर नहीं पकड़ूँ?" राघव ने मुस्कुराते हुए पूछा।


बूढ़ा सरपंच कुछ पल उसे देखता रहा।


"तो शायद आज रात अपने घर पहुँच जाओगे।"


"और अगर पकड़ लिया?"


सरपंच ने जवाब नहीं दिया। उसने बस जंगल की तरफ देखा और धीरे से कहा,


"फिर यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जंगल क्या चाहता है।"


राघव ने हँसकर बात टाल दी।


पिछले दस सालों में उसने न जाने कितनी ऐसी कहानियाँ सुनी थीं।


दोपहर के करीब एक बजे उसने अपनी जीप उस कच्चे रास्ते पर मोड़ दी।

शुरुआत में रास्ता बिल्कुल सामान्य था। दोनों ओर सागौन के लंबे पेड़ थे। कहीं-कहीं धूप पत्तों के बीच से छनकर जमीन पर पड़ रही थी। पक्षियों की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं।


राघव गुनगुनाते हुए गाड़ी चलाता रहा।


लेकिन लगभग आधे घंटे बाद उसे महसूस हुआ कि रास्ता पहले से कहीं ज्यादा संकरा हो गया है।


फिर कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ कि उसने पिछले पंद्रह मिनट से किसी पक्षी की आवाज नहीं सुनी।


जंगल अचानक बहुत शांत हो गया था।


उसने घड़ी देखी।


दो बजने वाले थे।


उसे हल्की-सी बेचैनी हुई, लेकिन उसने खुद को समझाया कि शायद वह जरूरत से ज्यादा सोच रहा है।


करीब दस मिनट बाद उसकी नजर रास्ते के किनारे खड़े एक अजीब-से पेड़ पर पड़ी। उसकी आधी शाखाएँ सूखी हुई थीं और तने पर बिजली गिरने का गहरा निशान था।


राघव ने उसे देखते हुए जीप आगे बढ़ा दी।


बीस मिनट बाद...


वह अचानक स्टीयरिंग पर झुक गया।


वही पेड़ फिर उसके सामने खड़ा था।


उसने गाड़ी रोकी।


"नहीं... यह दूसरा पेड़ होगा।"


उसने पीछे मुड़कर देखा। जंगल बिल्कुल वैसा ही था जैसा पहले था।


उसने गाड़ी फिर आगे बढ़ा दी।


लेकिन अगले एक घंटे में उसने उस पेड़ को तीन बार और देखा।


अब उसके माथे पर पसीना था।


उसने मोबाइल निकाला।


कोई नेटवर्क नहीं।



पहली बार उसे एहसास हुआ कि वह सचमुच रास्ता भटक चुका है।


दोपहर के तीन बज चुके थे।


और तभी...


उसे दूर पगडंडी पर कोई चलता हुआ दिखाई दिया।


एक बूढ़ा आदमी।


उसके कंधे पर सूखी लकड़ियों का गट्ठर था। सिर पर पुरानी टोपी और हाथ में एक लंबी लकड़ी की छड़ी।


राघव ने राहत की साँस ली।


कम से कम वह अकेला तो नहीं था।


वह जल्दी-जल्दी उसकी ओर बढ़ा।


"बाबा! सुनिए!"


बूढ़ा रुका।


उसने धीरे से मुड़कर राघव की ओर देखा और फिर बिना किसी आश्चर्य के मुस्कुरा दिया।


"आखिर मिल ही गए तुम।"


राघव कुछ समझ नहीं पाया।


"क्या मतलब?"


बूढ़े ने बात बदल दी।


"लगता है, रास्ता भूल गए हो।"


"हाँ। क्या यहाँ से हाईवे जाने का रास्ता है?"


बूढ़े ने अपनी छड़ी से जंगल की दूसरी ओर इशारा किया।


"इस पगडंडी पर चलते जाओ। सूरज ढलने से पहले हाईवे पहुँच जाओगे।"


"धन्यवाद!"


राघव वापस जीप में बैठा और उसी दिशा में निकल गया।


करीब डेढ़ घंटे तक वह लगातार चलता रहा।


सूरज अब पेड़ों के पीछे छिपने लगा था।


अचानक उसकी जीप रुक गई।


उसने सामने देखा।


उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।


वही बूढ़ा आदमी।


वही लकड़ियों का गट्ठर।


वही मुस्कान।


वह फिर उसी जगह खड़ा था।


"तुम... यहाँ कैसे?"


बूढ़ा हल्के से हँसा।


"यह सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।"


राघव अब सचमुच डर गया था।


"मैं डेढ़ घंटे तक लगातार गाड़ी चलाता रहा हूँ!"


"मुझे पता है।"


"फिर मैं वापस यहाँ कैसे आ गया?"


बूढ़े ने इस बार उसकी आँखों में देखते हुए कहा,


"इस जंगल में हर रास्ता कहीं नहीं जाता, बेटा। कुछ रास्ते बस तुम्हें वहीं वापस ले आते हैं, जहाँ से तुमने शुरुआत की थी।"


राघव कुछ पल चुप रहा।


सूरज लगभग डूब चुका था।


जंगल का रंग बदलने लगा था।


"अब क्या करूँ मैं?"


बूढ़े ने लकड़ियों का गट्ठर जमीन पर रखा।


"अगर मेरी मानो, तो आज रात जंगल में मत घूमो। अंधेरा होने के बाद यह जगह और भी जिद्दी हो जाती है।"


"लेकिन..."


"मेरी झोपड़ी यहीं पास में है। रात वहीं रुक जाओ। सुबह मैं खुद तुम्हें हाईवे तक छोड़ दूँगा।"


राघव ने चारों ओर नजर दौड़ाई।


जहाँ तक उसकी आँखें देख सकती थीं, वहाँ केवल जंगल था।


उसके पास अब कोई दूसरा विकल्प नहीं था।


"ठीक है।"


बूढ़ा मुस्कुराया।


"आ जाओ। रास्ता लंबा नहीं है।"


और दोनों उस पगडंडी पर आगे बढ़ गए...


उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उनमें से केवल एक ही अगली सुबह इस जंगल से आज़ाद होगा।


सूरज अब पूरी तरह पेड़ों के पीछे छिप चुका था।


राघव बूढ़े के पीछे-पीछे चल रहा था। पगडंडी इतनी संकरी थी कि कई जगह उसे झुककर पेड़ों की शाखाओं के नीचे से गुजरना पड़ रहा था। हवा में अचानक ठंडक घुलने लगी थी।


जंगल, जो कुछ देर पहले तक जीवित लगता था, अब धीरे-धीरे मौन हो रहा था।


कुछ दूरी पर किसी जानवर के गुर्राने की आवाज़ आई।


राघव ठिठक गया।


"यह... किसकी आवाज़ थी?"


बूढ़े ने बिना पीछे देखे जवाब दिया, "जंगल में जो रहता है, उसकी।"


"आपको डर नहीं लगता?"


बूढ़ा कुछ क्षण चुप रहा। फिर हल्के से मुस्कुराया।


"डर भी अजीब चीज़ है, बेटा। शुरुआत में बहुत लगता है। फिर धीरे-धीरे उसकी आदत हो जाती है।"


राघव ने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने सोचा, शायद बूढ़ा अपनी उम्र की बात कर रहा है।


लगभग चालीस मिनट तक चलने के बाद उसे पेड़ों के बीच एक हल्की पीली रोशनी दिखाई दी।


वह एक पुरानी झोपड़ी थी।


लकड़ी और मिट्टी से बनी हुई। छत पर पुरानी खपरैलें लगी थीं। बाहर एक लालटेन टंगी हुई थी, जिसकी लौ हवा के बावजूद बिल्कुल स्थिर थी।


झोपड़ी के आसपास का हिस्सा अजीब तरह से शांत था।


राघव ने ध्यान दिया कि यहाँ तक आने के बाद उसने एक भी कीड़ा नहीं देखा था। न झींगुरों की आवाज़, न पत्तों की सरसराहट।


मानो जंगल इस जगह से दूरी बनाए रखता हो।


"आओ।" बूढ़े ने दरवाजा खोलते हुए कहा।


अंदर का दृश्य उम्मीद से बिल्कुल अलग था।


झोपड़ी छोटी जरूर थी, लेकिन बेहद साफ-सुथरी थी। एक तरफ मिट्टी का चूल्हा था, दूसरी तरफ लकड़ी की मेज और उसके पास एक पुरानी कुर्सी। कोने में एक चारपाई बिछी थी, जिस पर सफेद चादर करीने से तह की हुई रखी थी।


"बैठो। मैं खाना बना देता हूँ।"


"आपको तकलीफ़ होगी..."


"मेहमान के लिए तकलीफ़ कैसी?"


बूढ़े की आवाज़ में अजीब-सी आत्मीयता थी।


कुछ ही देर में चूल्हे पर लकड़ियाँ जलने लगीं। कमरे में धुएँ और गरम दाल की खुशबू फैल गई।


राघव को पहली बार लगा कि शायद वह बेवजह डर रहा था।


दोनों चुपचाप खाना खाने लगे।


बाहर जंगल में कभी-कभी किसी जानवर के चिल्लाने की आवाज़ गूँज जाती, फिर सब कुछ पहले से भी ज्यादा शांत हो जाता।


काफी देर बाद राघव ने पूछा, "आप यहाँ अकेले रहते हैं?"


"हाँ।"


"कब से?"


बूढ़े ने दाल का कटोरा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "बहुत समय से।"


"मतलब?"


बूढ़ा मुस्कुराया।


"इतना समय हो गया कि अब याद नहीं।"


राघव भी मुस्कुरा दिया।


"लेकिन इतनी डरावनी जगह पर? आसपास तो कोई इंसान भी नहीं है।"


इस बार बूढ़े की मुस्कान कुछ फीकी पड़ गई।


उसने धीरे से आग की लपटों को देखा।


"पहले था।"


"क्या?"


"गाँव।"


राघव चुप हो गया।


"यहीं, इसी जंगल के बीच। करीब पचास घर थे। शाम को बच्चों की आवाज़ें दूर तक सुनाई देती थीं। लोग एक-दूसरे के घर बिना बताए चले जाते थे।"


"फिर क्या हुआ?"


बूढ़ा कुछ देर तक खामोश रहा।


"समय।"


"मतलब?"


"कुछ लोग मर गए। कुछ यहाँ से चले गए। फिर एक दिन ऐसा आया कि पीछे मुड़कर देखने वाला भी कोई नहीं बचा।"


"और आप?"


बूढ़े ने पहली बार उसकी ओर सीधे देखा।


"मैं रह गया।"


राघव को न जाने क्यों उसके इस जवाब से बेचैनी हुई।


"आपके परिवार वाले?"


"चले गए।"


"कहाँ?"


बूढ़े के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान उभरी।


"जहाँ सब जाते हैं।"


झोपड़ी में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।


बाहर अचानक किसी जानवर ने इतनी जोर से चीख मारी कि राघव के हाथ से कटोरा लगभग छूट गया।


बूढ़ा बिल्कुल शांत बैठा रहा।


"आपने कहा था कि यहाँ गाँव था। कितने साल पहले की बात है?"


"डेढ़ सौ साल।"


राघव हँस पड़ा।


"आप मज़ाक अच्छा कर लेते हैं।"


लेकिन बूढ़ा नहीं हँसा।


उसके चेहरे पर वही शांत भाव बने रहे।


राघव की हँसी धीरे-धीरे रुक गई।


"आप... सच कह रहे हैं?"


"तुम्हें क्या लगता है?"


राघव ने पहली बार गौर से बूढ़े को देखा।


उसकी आँखें बहुत थकी हुई थीं।


इतनी थकी हुई कि उनमें उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था।


अचानक उसके मन में एक सवाल आया।


पूरे समय में उसने बूढ़े को एक बार भी खाना खाते नहीं देखा था।


"आप नहीं खाएँगे?"


"भूख नहीं है।"


"सुबह से कुछ नहीं खाया?"


"अब जरूरत नहीं पड़ती।"


राघव के हाथ रुक गए।


उसे याद आया—झोपड़ी तक आने के पूरे रास्ते में उसने बूढ़े के पैरों की आवाज़ तक नहीं सुनी थी।


उसका गला सूखने लगा।


"मैं... जरा बाहर होकर आता हूँ।"


"ज़रूर।"


बूढ़े ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया।


राघव तेजी से झोपड़ी से बाहर निकल आया।


बाहर घना अंधेरा था।


इतना घना कि लालटेन की रोशनी से आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।


उसने गहरी साँस ली।


"नहीं... मैं बेवजह सोच रहा हूँ।"


लेकिन उसके मन में एक ही बात बार-बार घूम रही थी—


"डेढ़ सौ साल।"


और फिर...


"अब जरूरत नहीं पड़ती।"


उसने पीछे मुड़कर झोपड़ी की ओर देखा।


दरवाजे पर बूढ़ा खड़ा था।


वह उसे नहीं देख रहा था।


वह जंगल के अंधेरे को देख रहा था।


और उसके चेहरे पर पहली बार मुस्कान नहीं थी।


बस एक थकान थी।


राघव के भीतर अचानक एक अजीब-सा डर जाग उठा।


उसे नहीं पता था क्यों।


लेकिन वह एक बात समझ चुका था।


अगर वह आज रात इस झोपड़ी में रुका...


तो शायद कभी वापस नहीं जा पाएगा।


और अगले ही पल...


वह अंधेरे जंगल की ओर भाग पड़ा।



अंधेरे जंगल के बीच लालटेन की रोशनी में एक बूढ़ा आदमी अपनी पुरानी झोपड़ी के बाहर एक थके हुए यात्री का स्वागत करता हुआ।
जंगल के बीचों-बीच एक झोपड़ी, एक दयालु बूढ़ा, और एक ऐसा निमंत्रण जिसे ठुकराना संभव नहीं था।



राघव पूरी ताकत से भाग रहा था।


पेड़ों की टहनियाँ उसके चेहरे और हाथों को खरोंच रही थीं। कई बार उसका पैर जड़ों में उलझा, लेकिन उसने रुकने की हिम्मत नहीं की।


उसके कानों में अभी भी बूढ़े की आवाज़ गूँज रही थी—


«"अब जरूरत नहीं पड़ती।"»


उसके पीछे कोई कदमों की आवाज़ नहीं थी।


कोई उसका पीछा नहीं कर रहा था।


और यही बात उसे सबसे ज्यादा डरा रही थी।


वह लगभग पंद्रह मिनट तक लगातार भागता रहा। उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं। सीने में दर्द होने लगा था।


आखिरकार वह एक बड़े पत्थर के पास रुक गया।


उसे यकीन था कि अब वह झोपड़ी से काफी दूर निकल आया होगा।


उसने राहत की साँस ली और सिर उठाकर सामने देखा।


उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।


सामने वही झोपड़ी थी।


बाहर वही लालटेन जल रही थी।


और दरवाजे के पास वही बूढ़ा खड़ा था।


इस बार उसने मुस्कुराकर कहा—


«"मैंने भी यही किया था।"»


राघव का शरीर काँपने लगा।


"नहीं... यह संभव नहीं है!"


वह दूसरी दिशा में भागा।


इस बार और तेज।


काँटे उसके पैरों में चुभ रहे थे। कपड़े कई जगह से फट चुके थे। वह तब तक भागता रहा, जब तक उसकी साँसें जवाब नहीं देने लगीं।


लेकिन जब उसने रुककर सामने देखा...


वही झोपड़ी।


वही लालटेन।


और वही बूढ़ा।


अब उसकी मुस्कान में एक अजीब-सी उदासी थी।


"तुम जितनी बार चाहो कोशिश कर लो, बेटा। मैंने भी की थी।"


राघव अब टूट चुका था।


"तुम हो कौन?"


कुछ क्षणों तक जंगल में केवल हवा की आवाज़ सुनाई देती रही।


फिर बूढ़ा धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।


"आज से ठीक डेढ़ सौ साल पहले... मैं भी तुम्हारी तरह यहाँ आया था।"


उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी।


उसमें एक अजीब-सी थकान थी।


"मुझे भी एक बूढ़ा मिला था। उसने भी मुझे खाना खिलाया था। उसने भी कहा था कि सुबह मुझे जंगल से बाहर छोड़ देगा।"


राघव चुपचाप सुनता रहा।


"मैंने उस पर भरोसा किया। और जब मुझे उसकी सच्चाई पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।"


"क... कैसी सच्चाई?"


बूढ़े ने पहली बार आसमान की ओर देखा।


"यह जंगल खाली नहीं है। यह एक कैदखाना है। और हर कैदखाने को एक कैदी चाहिए।"


राघव धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।


"नहीं..."


"मैं मर चुका हूँ, राघव। बहुत समय पहले। लेकिन यह जंगल मुझे जाने नहीं देता।"


"झूठ!"


बूढ़ा हल्के से मुस्कुराया।


"काश।"


अचानक हवा का एक तेज झोंका आया। लालटेन की लौ बुरी तरह काँप उठी।


राघव ने देखा...


बूढ़े का चेहरा बदलने लगा था।


उसकी त्वचा सिकुड़ रही थी। आँखें और गहरी होती जा रही थीं। उसका शरीर मानो धुएँ की तरह हल्का पड़ता जा रहा था।


लेकिन सबसे डरावनी बात यह नहीं थी।

सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके चेहरे के पीछे धीरे-धीरे एक दूसरा चेहरा दिखाई देने लगा था।


एक ऐसा चेहरा, जिसे राघव अच्छी तरह पहचानता था।


वह उसका अपना चेहरा था।


बूढ़े की आँखों से आँसू बह निकले।


"डेढ़ सौ साल..."


उसने काँपती आवाज़ में कहा।


"तुम नहीं जानते, किसी का इंतजार करना कितना मुश्किल होता है।"


राघव अब रोने लगा था।


"मुझे जाने दो!"


"अगर यह मेरे हाथ में होता, तो मैं तुम्हें कभी नहीं रोकता।"


"फिर मैं क्या करूँ?"


बूढ़े ने उसकी ओर देखा।


उसकी आँखों में पहली बार राहत दिखाई दे रही थी।


"वही, जो मैंने किया था। इंतजार।"


इतना कहकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।


अगले ही पल उसका शरीर धुएँ की तरह हवा में बिखरने लगा।


कुछ ही सेकंड में वहाँ कोई नहीं था।


सिर्फ उसकी पुरानी लकड़ी की छड़ी जमीन पर पड़ी थी।


और फिर...


जंगल पूरी तरह शांत हो गया।


आधी रात के अंधेरे में पुरानी झोपड़ी के बाहर लालटेन लिए खड़ा वृद्ध राघव, जबकि दूर जंगल में एक नया यात्री उसकी ओर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
कुछ अभिशाप खत्म नहीं होते—वे सिर्फ अपना अगला रखवाला चुन लेते हैं। राघव का इंतज़ार आखिरकार शुरू हो चुका था।



कहते हैं कि उस जंगल से आज तक कोई वापस नहीं लौटा।


लेकिन कभी-कभी, रास्ता भटके हुए लोगों को शाम के करीब तीन बजे एक आदमी दिखाई देता है।


वह पैंतीस-चालीस साल का होता है।


चेहरे पर थकी हुई मुस्कान लिए वह उनसे सिर्फ एक सवाल पूछता है—


«"लगता है... तुम रास्ता भूल गए हो?"»


फिर वह उन्हें एक पगडंडी की ओर इशारा करके कहता है—


«"इस रास्ते पर चलते जाओ। शायद बाहर निकल जाओ।"»


लेकिन वे कभी बाहर नहीं निकलते।


क्योंकि सूरज ढलते-ढलते वे फिर उसी जगह लौट आते हैं।


जहाँ एक पुरानी झोपड़ी उनका इंतजार कर रही होती है।


और उसके बाहर...


एक आदमी लालटेन लिए खड़ा होता है।


उसका नाम राघव देशमुख है।



खौफनाक शिकारी

 



फैक्ट्री की छुट्टी के बाद शाम के समय अपने बेटे के लिए किताब खरीदता हुआ मजदूर सुभाष।
अंधेरा होने से पहले हर कोई घर पहुंचना चाहता था, लेकिन सुभाष को अपने बेटे से किया वादा निभाना था।



शाम के छह बजते ही फैक्ट्री का सायरन गूंज उठा। मशीनों का शोर थम गया और सभी मजदूर जल्दी-जल्दी बाहर निकल पड़े। हर किसी के चेहरे पर घर पहुंचने की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। रात होने से पहले जो सामान लेना था, लोग फुर्ती से खरीद रहे थे और बिना रुके अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। इन दिनों अंधेरा होते ही बाहर रुकने से हर कोई डरता था। लेकिन सुभाष रुक गया। उसने अपने चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे से वादा किया था कि आज उसकी नई स्कूल की किताब जरूर लाएगा। दुकान पर भीड़ और देर के कारण उसका समय निकलता जा रहा था। वह बार-बार घड़ी देखता और मन ही मन झुंझला उठता। आखिर जैसे-तैसे किताब लेकर वह अपनी पुरानी साइकिल पर सवार हुआ। तब तक सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। दूर-दूर तक सन्नाटा फैलने लगा था। अंधेरा तेजी से उतर रहा था। जिस समय तक पूरा गांव अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर चुका था, उसी समय सुभाष अकेला सुनसान रास्ते पर घर लौट रहा था।

सुभाष साइकिल चलाते-चलाते खुद से ही बड़बड़ा रहा था। उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था। "थोड़ा पहले निकल जाता तो ये नौबत ही नहीं आती…" उसने होंठ भींचते हुए कहा। गांव जाने वाली कच्ची सड़क पर उसके अलावा कोई नहीं था। हर पैडल के साथ अंधेरा और गहरा होता जा रहा था। झींगुरों और कीड़ों की लगातार आती आवाजें सन्नाटे को और डरावना बना रही थीं। सड़क के दोनों ओर फैले खेतों में खड़े ऊंचे गन्ने हवा के साथ हिल रहे थे, मानो कोई उनमें छिपकर उसे देख रहा हो। हर छोटी-सी आहट पर सुभाष की नजरें घबराकर इधर-उधर दौड़ जातीं और उसका दिल तेजी से धड़कने लगता।

उसके डर की वजह भी थी। मार्च का महीना शुरू हो चुका था, और इसी समय वह लौटता है... वह आदमखोर। कोई नहीं जानता था कि वह इंसान था, जंगली जानवर या कोई और भयावह चीज़। क्योंकि जिसने भी उसे देखा, वह कभी जिंदा वापस नहीं आया। कुछ दिनों बाद जंगल में केवल उसकी बेरहमी से चीरी-फाड़ी हुई लाश मिलती थी। हां, उसकी रूह कंपा देने वाली चीख कई लोगों ने जरूर सुनी थी। हर साल वह कुछ दिनों तक आतंक मचाता, चार-पांच लोगों की जान लेता और फिर अचानक गायब हो जाता। यही कारण था कि गांव वाले दिन में चाहे जितना घूम लें, लेकिन रात ढलते ही अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। आज सुभाष उसी डर के बीच अकेला उस सुनसान रास्ते पर आगे बढ़ रहा था।


गांव की टिमटिमाती रोशनी अब दूर से दिखाई देने लगी थी। उसे देखकर सुभाष ने राहत की सांस ली, लेकिन मन का डर अभी भी कम नहीं हुआ था। तभी अचानक उसकी साइकिल की चेन उतर गई। वह झुंझलाकर बोला, "अभी ही निकलनी थी?" उसने जल्दी-जल्दी साइकिल पलटी और कांपते हाथों से चेन चढ़ाने लगा। तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ। हवा जैसे एकदम थम गई थी। मार्च का महीना होने के बावजूद ठंड अचानक बढ़ गई। चारों ओर ऐसा सन्नाटा छा गया कि झींगुरों और कीड़ों की आवाजें भी पूरी तरह गायब हो गईं। मानो प्रकृति ने खुद सांस रोक ली हो।

सुभाष का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे लगा जैसे यह किसी अनहोनी का संकेत हो... कोई उसके बहुत पास मौजूद था। उसने बिना समय गंवाए चेन चढ़ाई, साइकिल उठाई और तेजी से पैडल मारने लगा। तभी सामने वाले जंगल की दिशा से भेड़िए की लंबी, डरावनी हुआं-हुआं रात के सन्नाटे को चीरती हुई गूंज उठी। उसकी रफ्तार और बढ़ गई। तभी रास्ते के किनारे वाले खेत में अचानक जोर से सरसराहट हुई। सुभाष की सांस गले में अटक गई। वह कांपते हुए भगवान का नाम जपने लगा। अगले ही पल खेत से एक लोमड़ी छलांग लगाकर बाहर निकली। उसे देखकर सुभाष ने राहत की सांस ली। लेकिन उसी क्षण वह लोमड़ी जैसे किसी अनदेखी चीज़ से बुरी तरह डर गई और चीखती हुई उल्टी दिशा में पागलों की तरह भाग निकली। सुभाष का दिल फिर से बैठ गया।

सुभाष जैसे ही दोबारा साइकिल पर बैठकर आगे बढ़ने लगा, उसकी नजर सड़क के बीचों-बीच खड़ी एक विशाल काली आकृति पर पड़ी। वह लगभग आठ फुट ऊंची थी। उसके पूरे शरीर पर घने काले बाल थे और अंधेरे में उसकी लाल चमकती आंखें साफ दिखाई दे रही थीं। सुभाष का पूरा शरीर वहीं का वहीं जम गया। अगले ही पल उस जीव ने ऐसी भयावह दहाड़ मारी कि पूरा इलाका कांप उठा। पेड़ों पर बैठे पक्षी घबराकर उड़ गए और सुभाष के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए।

उसने बिना एक पल गंवाए साइकिल वहीं छोड़ दी और बगल के गन्ने के खेत में जान बचाकर भाग गया। वह जीव भी उसी रफ्तार से उसके पीछे दौड़ा। गन्नों के बीच घुसते ही सुभाष ने अपना मुंह कसकर दबा लिया। अब उसकी हल्की-सी सांस की आवाज भी उसकी मौत बन सकती थी। बाहर वह राक्षसी जीव लगातार गुर्रा रहा था। वह गन्ने जड़ से उखाड़कर फेंक रहा था और पागलों की तरह उसकी तलाश कर रहा था। उसकी हर गुर्राहट से सुभाष का पूरा शरीर कांप रहा था।

रात के समय गन्ने के खेत में एक रहस्यमयी काले जीव से छिपता हुआ सुभाष।
गन्नों के बीच छिपा सुभाष अपनी सांसें थामे बैठा था, जबकि खौफनाक शिकारी उसे ढूंढ रहा था।


कुछ देर तक छिपे रहने के बाद उस जीव को उसकी गंध मिल गई। लेकिन घने गन्नों के कारण वह पूरी रफ्तार से अंदर नहीं घुस पा रहा था। मौका मिलते ही सुभाष दूसरी दिशा में भाग निकला। वह जानता था कि खुले रास्ते पर गया तो बचना असंभव है। इसलिए वह खेतों के बीच छिपते, झुकते और दौड़ते हुए आगे बढ़ता रहा, जबकि वह खूंखार जीव उसके पीछे पागलों की तरह लगातार उसका पीछा कर रहा था।


देखते ही देखते भागता हुआ सुभाष खेत के बिल्कुल बीचों-बीच पहुंच गया। वहां एक पुराना कुआं था। उसके पास सोचने का भी समय नहीं था। वह समझ चुका था कि चाहे जितना दौड़ ले, खुले मैदान में उस भयानक जीव से बचना असंभव है। पीछे से उसकी गुर्राहट हर पल और करीब आती जा रही थी। बिना एक क्षण गंवाए सुभाष कुएं में कूद गया और पानी के भीतर पूरी तरह डूबकर खुद को छिपा लिया।

कुछ ही पलों बाद वह राक्षसी जीव भी वहां पहुंच गया। वह हिंसक जानवर की तरह कुएं के चारों ओर चक्कर काटने लगा। उसकी नथुने तेजी से फड़क रहे थे। वह हवा को सूंघकर सुभाष की गंध तलाश रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि शिकार यहीं कहीं है, लेकिन गंध अचानक गायब हो जाने से वह बुरी तरह उलझ गया था।

वह गुर्राता हुआ कुएं के बिल्कुल किनारे आया और अंदर झांकने लगा। नीचे उसे सिर्फ काला पानी दिखाई दिया। उसी पानी के भीतर सुभाष अपनी सांस रोके डूबा हुआ था। उसके फेफड़े जलने लगे थे। अब वह कुछ ही क्षण और सांस रोक सकता था। लेकिन अगर उसने सिर पानी से बाहर निकाला, तो अगले ही पल वह जीव उसे चीर-फाड़ देता।

तभी वह दानव अचानक भयानक दहाड़ मारकर पलटा, जैसे उसे कहीं और कोई आहट सुनाई दी हो। अगले ही पल वह बिजली की रफ्तार से दूसरी दिशा में दौड़ गया। पानी के भीतर डूबा सुभाष अभी भी हिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

गन्ने के खेत के बीच पुराने कुएं में छिपकर अपनी जान बचाने की कोशिश करता सुभाष।
पूरी रात ठंडे पानी में छिपा सुभाष सिर्फ एक प्रार्थना कर रहा था—सुबह होने तक वह जीव वापस न लौटे।


उसके बाद सुभाष में कुएं से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं बची। डर ने जैसे उसके शरीर की हर हड्डी जमा दी थी। वह जीव जा चुका था, लेकिन उसकी दहशत अब भी हर तरफ महसूस हो रही थी। सुभाष को बार-बार लगता, अगर वह अभी ऊपर निकला और वह दानव फिर लौट आया, तो इस बार बचना नामुमकिन होगा। इसी डर से वह पूरी रात ठंडे पानी में ही छिपा रहा। कांपते हुए वह लगातार भगवान का नाम जपता रहा और हर छोटी-सी आहट पर आंखें बंद कर लेता।

सुबह हुई, सूरज काफी ऊपर चढ़ आया, लेकिन फिर भी वह बाहर नहीं निकला। कुछ देर बाद खेत का मालिक वहां पहुंचा। कुएं में झांकते ही उसने सुभाष को देखा। गांव वालों की मदद से उसे बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला गया। उसकी हालत बेहद खराब थी। ठंड, डर और पूरी रात पानी में रहने से उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था। उसे तुरंत घर पहुंचाया गया। वहां उसकी पत्नी और छोटा बेटा रो-रोकर बेहाल थे। पूरी रात उन्होंने उसकी राह देखी थी।

कुछ ही देर में पूरे गांव में यह खबर फैल गई। हर कोई उसे देखने पहुंचा, क्योंकि वह पहला इंसान था जो उस रहस्यमय दानव के चंगुल से जिंदा बचकर लौटा था। उसे पूरी तरह संभलने में कई दिन लग गए। लेकिन उस घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत और बढ़ गई। अब फैक्ट्री की छुट्टी होते ही मजदूर बिना कहीं रुके सीधे अपने घर लौट आते। अंधेरा होने से पहले सड़कें पूरी तरह सूनी हो जाती थीं।

अभिशप्त खज़ाना

 



श्रीरामपुर गांव वैसे तो बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसकी पहचान दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह था गांव का लगभग सात सौ साल पुराना महादेव मंदिर। मंदिर के ठीक पास से बहने वाली दमोदर नदी पूरे वातावरण को एक रहस्यमय शांति देती थी। पुराने समय की पत्थर की नक्काशियाँ, घिसी हुई सीढ़ियाँ और टूटी हुई दीवारें आज भी इतिहास की गवाही देती थीं। यहां आने वाला हर व्यक्ति महसूस करता कि इस जगह में कोई अनकहा रहस्य छिपा है।


लेकिन मंदिर की सबसे रहस्यमयी चीज़ थी उसके गर्भगृह के भीतर बना एक प्राचीन पत्थर का दरवाज़ा। कहा जाता था कि उस दरवाज़े के पीछे बेशकीमती खज़ाना छिपा है, जिसे सदियों पहले सुरक्षित कर दिया गया था। आश्चर्य की बात यह थी कि आज तक कोई भी उस दरवाज़े को खोल नहीं पाया। गांव के बुज़ुर्गों के अनुसार उसके पीछे सिर्फ खज़ाना नहीं, बल्कि एक भयानक अभिशाप भी कैद है।


लोककथाओं में बताया जाता है कि जिसने भी उस दरवाज़े को खोलने की कोशिश की, उसकी कुछ ही समय बाद रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। अब तक दो लोगों के साथ ऐसा होने की बातें गांव में मशहूर थीं। हालांकि इन घटनाओं का सच क्या था और अफ़वाह क्या, इसका कोई पक्का प्रमाण किसी के पास नहीं था। लेकिन इतना ज़रूर था कि उस बंद दरवाज़े का नाम सुनते ही आज भी गांव के लोगों के चेहरे पर डर साफ़ दिखाई देता था।

वार्षिक मेले के दौरान 700 साल पुराने महादेव मंदिर की गुप्त रूप से शूटिंग करते रवि और मनोज।
आखिरकार उन्हें वह मिल गया जिसके लिए वे आए थे—सोना, हीरे, जवाहरात और अनगिनत दौलत... लेकिन इसकी कीमत अभी बाकी थी।


इन दिनों श्रीरामपुर गांव अपने वार्षिक मेले की रौनक में डूबा हुआ था। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस उत्सव में दूर-दूर से लोग उमड़ रहे थे। झूले, लोकनृत्य, मंदिर की पूजा और रंग-बिरंगी दुकानों से पूरा गांव जीवंत हो उठा था। इसी भीड़ में शहर से आया एक युवक, रवि, अपने दोस्त मनोज के साथ कैमरा लेकर हर पल की शूटिंग करता दिखाई देता था। उसने इस मेले के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, इसलिए यहां तीन दिन रुकने का फैसला किया। मिलनसार स्वभाव के कारण वह जल्दी ही गांव वालों से घुल-मिल गया और सबका चहेता बन गया। उधर मेला हर गुजरते दिन के साथ और भी भव्य होता जा रहा था।


पूजा का दिन अब बिल्कुल करीब था। पूरे गांव में तैयारियां जोरों पर चल रही थीं। दो दिन बाद भव्य शोभायात्रा निकलने वाली थी और उसी दिन महादेव मंदिर के शिखर पर नया कलश चढ़ाया जाना था। हर गली रंग-बिरंगी सजावट से सजी थी और मंदिर में सुबह से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती थी।

इसी बीच रवि और मनोज मौका देखकर चुपके से मंदिर के अंदर की शूटिंग करने लगे। कैमरा चलाते-चलाते वे उस हिस्से तक पहुंच गए, जहां सदियों पुराना रहस्यमय पत्थर का दरवाज़ा मौजूद था। दोनों उत्सुकता से उसे ध्यान से देखने लगे। दरवाज़े की बनावट, ताले और आसपास की दीवारों को वे ऐसे देख रहे थे, मानो हर छोटी-सी बात अपने दिमाग में दर्ज कर रहे हों। तभी किसी के आने की आहट सुनाई दी। दोनों तुरंत सामान्य होने का अभिनय करते हुए वहां से निकल गए और वापस मेले की भीड़ में जाकर बाकी कार्यक्रमों की शूटिंग करने लगे।


लेकिन उनकी असली पहचान किसी को नहीं पता थी। रवि और मनोज साधारण पर्यटक नहीं, बल्कि बेहद शातिर और हाई-टेक चोर थे। मंदिर के पीछे छिपे खजाने की कहानी सुनकर ही वे श्रीरामपुर आए थे। उनका पूरा प्लान तैयार था—कलश स्थापना और पूजा संपन्न होने के बाद, जब पूरा गांव उत्सव की थकान में सो जाएगा, उसी रात वे उस रहस्यमय दरवाज़े को खोलकर सदियों पुराने खजाने तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।


इस रात का इंतज़ार रवि और मनोज कई महीनों से कर रहे थे। उन्होंने बार-बार मंदिर के उस हिस्से की गुप्त रूप से रेकी की थी और हर रास्ता, हर कोना और हर संभावना अच्छी तरह समझ ली थी। अब उनके प्लान को अंजाम देने का समय आ चुका था।


उत्सव समाप्त होने के बाद पूरा गांव गहरी नींद में डूब चुका था। आधी रात के सन्नाटे में दोनों चुपचाप अपने ठिकाने से निकले और मंदिर की ओर बढ़ गए। उस रात का अंधेरा कुछ अलग ही था—हवा तक जैसे थम गई हो। विशाल महादेव मंदिर निस्तब्ध खड़ा था। भीतर अब भी कुछ दीपक टिमटिमा रहे थे। पुजारी गर्भगृह के बाहर वाले कक्ष में सो चुका था। दोनों ने सावधानी से ताला खोला और बिना कोई आवाज़ किए भीतर प्रवेश कर गए।


वे सीधे उस रहस्यमयी पत्थर के दरवाज़े के सामने पहुँचे। गांव वालों से मिली जानकारी के अनुसार, उसका गुप्त पत्थर वाला लॉक पास ही कहीं छिपा था। काफी खोजने के बाद उन्हें वह मिल भी गया। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद तंत्र खुल नहीं रहा था। शायद सदियों से बंद होने के कारण वह पूरी तरह जाम हो चुका था। आधा घंटा बीत गया। दोनों थक चुके थे और लगने लगा कि उनकी महीनों की योजना यहीं खत्म हो जाएगी। उन्होंने आख़िरी बार पूरी ताकत से कोशिश की… तभी अचानक बिना किसी आवाज़ के वह पत्थर का लॉक अपने आप खुल गया। दोनों एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगे।



अब सोचने का समय नहीं था। मौका हाथ से निकलने से पहले रवि और मनोज फुर्ती से उस दरवाज़े के भीतर चले गए। अंदर कदम रखते ही उनके सामने धूल, जाले और सदियों पुराना खंडहर दिखाई दिया। हवा इतनी बासी थी कि दोनों ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगे। चारों ओर एक जैसे संकरे रास्ते और टूटे हुए पत्थर के गलियारे थे। पूरा स्थान किसी रहस्यमयी भूलभुलैया जैसा लग रहा था। वहां ऐसा सन्नाटा था कि उनके कदमों की हल्की-सी आहट भी कई बार गूंजकर लौट रही थी।


दोनों ने अपने साथ लाई हुई मशाल जलाई और सावधानी से आगे बढ़ने लगे। वे एक-एक कोना, हर दीवार और हर रास्ता ध्यान से देखते रहे, लेकिन काफी देर तक उन्हें कुछ भी नहीं मिला। हर जगह सिर्फ खाली कमरे, टूटी दीवारें और बिखरे पत्थर ही दिखाई दे रहे थे।

थककर मनोज ने निराश होकर कहा, "इतनी मेहनत बेकार गई। लगता है खजाने की सारी कहानियां सिर्फ अफवाह थीं। यहां कुछ भी नहीं है।"


लेकिन रवि अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ना चाहता था। उसने आगे बढ़ने का फैसला किया। तभी उनकी नजर एक छोटे-से पत्थर के दरवाज़े पर पड़ी, जो बाकी दीवारों में लगभग छिपा हुआ था। बिना ज्यादा उम्मीद के उन्होंने उसे खोला... और अगले ही पल दोनों की आंखें हैरानी से फैल गईं। अंदर दूर तक चमचमाता हुआ सोना, गहने और अनगिनत खजाना मशाल की रोशनी में चमक रहा था।

भूमिगत खंडहर में सदियों पुराने खजाने को देखकर हैरान रवि और मनोज।
आखिरकार उन्हें वह मिल गया जिसके लिए वे आए थे—सोना, हीरे, जवाहरात और अनगिनत दौलत... लेकिन इसकी कीमत अभी बाकी थी।


खजाना देखकर रवि और मनोज खुशी से झूम उठे। उनकी आंखों के सामने सोने की ईंटें, कीमती गहने, प्राचीन मूर्तियां, हीरे, जवाहरात, मोती और न जाने कितनी अनमोल वस्तुएं बिखरी पड़ी थीं। ऐसा वैभव उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखा था। कुछ पल तक दोनों बिना कुछ बोले सिर्फ उस खजाने को छूते रहे, मानो यकीन ही न हो कि यह सब सच है।


फिर उन्हें होश आया। उन्होंने अपने साथ लाए बड़े बैग खोले और जितना संभव था, उतना खजाना उनमें भर लिया। बैग इतने भारी हो गए कि उन्हें उठाना भी मुश्किल हो रहा था, लेकिन लालच के आगे उन्हें उसका एहसास भी नहीं था।


अब दोनों तेजी से बाहर निकलने के लिए उसी रास्ते की ओर बढ़े, जहां से अंदर आए थे। लेकिन कुछ दूर चलने के बाद वे ठिठक गए। सामने कोई पहचान का रास्ता नहीं था। उन्होंने एक के बाद एक कई गलियारों में खोजा, मगर बाहर जाने वाला दरवाज़ा कहीं दिखाई नहीं दिया। जितना वे तलाश करते, भूलभुलैया उतनी ही उलझती जाती। दोनों के चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई देने लगी।


तभी अचानक पूरे खंडहर में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। न हवा की सरसराहट, न उनके कदमों की गूंज। उसी सन्नाटे में मनोज की नज़र एक गहरे अंधेरे कोने पर पड़ी... वहां दो चमकती हुई आंखें उन्हें घूर रही थीं। अगले ही पल वे आंखें धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगीं।


दोनों डर के मारे वहीं जड़ हो गए। धीरे-धीरे पीछे हटने लगे। तभी मशाल की लौ उस अंधेरे कोने तक पहुंची और वहां खड़ी आकृति साफ़ दिखाई देने लगी। उसे देखते ही दोनों की सांस जैसे थम गई। उनके सामने एक विशालकाय काला साँप फन फैलाए खड़ा था। उसकी आंखें अंगारों की तरह चमक रही थीं और उसकी गहरी, भयावह फुफकार पूरे खंडहर में गूंज रही थी।

विशाल काले नाग से जान बचाकर भूलभुलैया में भागते रवि और मनोज।
खज़ाना मिलते ही जाग उठा उसका असली रक्षक। अब दौलत नहीं, सिर्फ़ जान बचाना ही उनका लक्ष्य था।


अगले ही पल दोनों जोर से चीखे और जान बचाकर भाग खड़े हुए। लेकिन वह भयानक साँप भी बिजली की रफ्तार से उनके पीछे दौड़ पड़ा। उसकी फुफकार हर पल उनके और करीब आती जा रही थी। भूलभुलैया जैसे उनके खिलाफ हो गई थी। वे जिस रास्ते पर मुड़ते, साँप मानो पहले से वहीं उनका इंतज़ार कर रहा होता। ऐसा लग रहा था कि उससे बच निकलना असंभव है।


भाग-दौड़ की अफरातफरी में रवि और मनोज एक-दूसरे से बिछड़ गए। रवि घबराहट में बिना दिशा के दौड़ता रहा। तभी अचानक पूरे खंडहर में मनोज की एक दिल दहला देने वाली चीख गूंजी। वह चीख सुनकर रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका शरीर कांपने लगा। उसे लगा कि साँप ने मनोज को पकड़ लिया है। लेकिन उसके साथ आखिर हुआ क्या... यह सोचने की भी हिम्मत रवि में नहीं बची थी। मौत के डर से वह पागलों की तरह अंधेरे गलियारों में भागता रहा, बस किसी तरह बाहर निकलने का रास्ता खोजता हुआ।


चारों तरफ सिर्फ घना अंधेरा था... और उसके पीछे मौत। रवि कभी किसी टूटी दीवार के पीछे छिपता, तो कभी किसी संकरे गलियारे में भाग निकलता। हर दिशा से विशाल साँप की सरसराहट और उसकी भयानक फुफकार सुनाई दे रही थी। अब उसे समझ आ चुका था कि शायद वह ज़िंदा बाहर नहीं निकल पाएगा। डर से कांपते हुए वह बार-बार भगवान का नाम ले रहा था, अपनी गलती के लिए माफी मांग रहा था और जान बख्श देने की गुहार लगा रहा था।


भागते-भागते वह खंडहर के एक ऐसे हिस्से में पहुंचा, जहां ऊपर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियां बनी थीं। उसके मन में उम्मीद जगी कि शायद यही बाहर निकलने का रास्ता हो। वह पूरी ताकत से सीढ़ियां चढ़ गया, लेकिन ऊपर पहुंचते ही उसकी उम्मीद टूट गई। वहां एक विशाल प्राचीन पेड़ उगा हुआ था, जिसकी मोटी जड़ें पूरे खंडहर की दीवारों और फर्श में दूर-दूर तक फैली हुई थीं।


उसी समय पीछे से फिर साँप की तेज फुफकार गूंजी। रवि घबराकर पेड़ की ओर दौड़ा और छिपने की जगह तलाशने लगा। तभी उसकी नजर दीवार में बनी एक छोटी-सी खिड़की जैसी खुली जगह पर पड़ी। उसके भीतर फिर उम्मीद जाग उठी। साँप की आवाज़ अब बेहद करीब आ चुकी थी। बिना एक पल गंवाए उसने पेड़ से लटकती मोटी लता को पकड़ लिया, तेजी से ऊपर चढ़ा और उस संकरी खुली जगह से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करने लगा।


उसी क्षण वह विशाल साँप भी पेड़ की ओर लपका और लताओं के सहारे ऊपर चढ़ने लगा। रवि के हाथ-पांव घबराहट से कांप रहे थे। उसने पूरी ताकत लगाकर खुद को उस संकरी खुली जगह की ओर धकेला। जैसे ही साँप उसके बिल्कुल करीब पहुंचने वाला था, रवि किसी तरह बाहर निकल गया।

लेकिन वह विशालकाय साँप उस छोटे से रास्ते से बाहर नहीं आ सकता था। वह वहीं रुक गया और अपनी भयानक पीली आंखों से रवि को घूरने लगा। पहली बार रवि ने उसे इतने करीब से देखा था। उसका विशाल फन, काले चमकते शल्क और आंखों में जलती हुई पीली चमक किसी दुःस्वप्न से कम नहीं थी। एक पल के लिए रवि के मन में ख्याल आया—अगर उनके बीच वह पत्थर की दीवार न होती, तो शायद वह अब तक ज़िंदा नहीं बचता।


कुछ देर तक साँप उसे घूरता रहा, फिर धीरे-धीरे अंधेरे में वापस लौट गया। उधर रवि बिना पीछे देखे उस संकरे रास्ते से भाग निकला। वह रास्ता सीधे नदी के किनारे बाहर निकलता था। आश्चर्य की बात यह थी कि उस गुप्त मार्ग के बारे में आज तक गांव वालों को भी पता नहीं था।


जैसे ही उसे यकीन हुआ कि उसकी जान बच गई है, वह वहीं घुटनों के बल बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसका साथी मनोज अब शायद इस दुनिया में नहीं था। उसका पूरा शरीर अब भी डर से कांप रहा था। उसने कुछ ही घंटों में ऐसा भय देखा था, जिसे वह शायद जिंदगी भर कभी भूल नहीं पाएगा।

दमोदर नदी किनारे सोने का हार फेंकता हुआ दुखी और घायल रवि।
दोस्त खो दिया, लालच टूट गया... और अंत में रवि ने समझ लिया कि कुछ खज़ाने इंसानों के लिए नहीं होते।


सुबह होने से पहले, गांव के जागने से पहले ही रवि अपने ठिकाने पर गया, अपना सारा सामान उठाया और अंधेरे में श्रीरामपुर छोड़कर निकल गया। सूरज उगते-उगते वह गांव से काफी दूर पहुंच चुका था, लेकिन उसका मन अब भी उस भयावह रात में अटका हुआ था। तभी उसे अपनी पैंट की जेब में कुछ महसूस हुआ। उसने निकालकर देखा—वह सोने का एक कीमती हार था। खजाना देखकर खुशी में उसने अनजाने में उसे जेब में रख लिया था। कुछ पल वह उसे देखता रहा। फिर मनोज की याद आंखों के सामने तैर गई। उसकी सारी लालसा उसी पल खत्म हो गई। उसने वह हार दूर फेंक दिया और बिना पीछे देखे अपनी राह पर चल पड़ा।

रुद्रकोट की परछाइयाँ


   सह्याद्रि की ऊँची पहाड़ियों के बीच बसा था रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र। चारों ओर घना जंगल, सामने शांत झील और पीछे धुंध में खोई पहाड़ियाँ। वर्षों पहले यह जगह देश के सबसे प्रसिद्ध मानसिक चिकित्सालयों में गिनी जाती थी। दूर-दूर से लोग इलाज के लिए यहाँ आते थे। सुबह पक्षियों की आवाज़ें, गलियारों में डॉक्टरों की चहल-पहल और बगीचों में टहलते मरीज—यह सब कभी इस जगह की पहचान था। लेकिन एक ही रात के बाद सब कुछ बदल गया। कहा जाता है कि उस रात अस्पताल के पूरे एक विंग से अचानक चीखें उठीं और अगली सुबह वहाँ मौजूद कई लोग रहस्यमय परिस्थितियों में मृत मिले। सरकारी जाँच हुई, पर सच कभी सामने नहीं आया। अस्पताल हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। मुख्य फाटक पर बड़ा-सा बोर्ड लगा दिया गया—"प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित।" तब से वर्षों बीत गए। अब वहाँ केवल टूटी खिड़कियाँ, जंग लगे दरवाज़े, हवा में हिलते पेड़ और ऐसा सन्नाटा था जो किसी के भी भीतर बेचैनी भर देता था।

रुद्रकोट में स्थित सह्याद्रि के जंगलों के बीच बना वीरान मानसिक अस्पताल, बंद जंग लगा मुख्य गेट और "ENTRY STRICTLY PROHIBITED" का चेतावनी बोर्ड।
सह्याद्रि की पहाड़ियों में छिपा रुद्रकोट मानसिक अस्पताल... जहाँ वर्षों से कोई नहीं गया, क्योंकि कुछ दरवाज़े हमेशा के लिए बंद ही रहने चाहिए।


   आदित्य देवधर बिल्कुल अलग स्वभाव का था। ज़िंदगी को खुलकर जीने वाला, हर रहस्य को अपनी आँखों से देखने वाला और डर को केवल इंसान के दिमाग की उपज मानने वाला। पुराने किले, वीरान हवेलियाँ और बंद इमारतें उसकी सबसे बड़ी दिलचस्पी थीं। एक शाम दोस्तों के साथ बैठा था, तभी बातों-बातों में रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र का ज़िक्र छिड़ गया। कबीर ने गंभीर होकर कहा, "वहाँ जाने वाले कई लोग वापस नहीं लौटे।" रिया ने भी उसे रोकते हुए कहा कि सरकार ने आज तक वह जगह नहीं खोली, उसके पीछे कोई वजह होगी। लेकिन आदित्य हँस पड़ा। "डर इंसान पैदा करता है, जगह नहीं। लोग कहानियाँ बना-बनाकर अंधविश्वास फैलाते हैं।" दोस्तों ने बहुत समझाया, मगर उसने उसी समय मन बना लिया कि वह खुद वहाँ जाकर देखेगा। उसके लिए यह किसी भूत की तलाश नहीं, बल्कि अफवाहों की सच्चाई जानने की चुनौती थी।

   दो रात बाद आधी रात के करीब आदित्य बिना किसी को बताए अपनी बाइक लेकर रुद्रकोट पहुँच गया। दूर से ही जंग लगे लोहे का विशाल फाटक दिखाई दे रहा था। उस पर टंगा चेतावनी बोर्ड हवा के साथ चरमराकर हिल रहा था। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था कि अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। उसने टॉर्च जलाई, टूटी हुई दीवार के रास्ते अंदर घुस गया। लंबी अंधेरी गलियाँ, बिखरे हुए स्ट्रेचर, धूल से ढकी व्हीलचेयर और दीवारों पर उखड़ा हुआ पेंट—सब कुछ किसी भूले हुए समय की तरह खामोश पड़ा था। वह एक-एक कमरे में गया, तस्वीरें लीं और मुस्कुराते हुए बोला, "यही है लोगों का भूत?" लगभग दो घंटे तक वह पूरे परिसर में घूमता रहा। लौटने ही वाला था कि अस्पताल के पुराने महिला वार्ड के सामने उसके कदम अचानक रुक गए। बिना किसी वजह उसकी धड़कन तेज हो गई। उसे साफ महसूस हुआ कि कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है... उसकी चाल के साथ कोई और भी चल रहा है। उसने तुरंत पलटकर टॉर्च घुमाई। वहाँ कोई नहीं था। उसने खुद को समझाया, "बस वहम है," और वापस घर लौट आया।

आधी रात को रुद्रकोट मानसिक अस्पताल के अंधेरे गलियारे में टॉर्च लिए खड़ा आदित्य देवधर, दूर सफेद साड़ी में रहस्यमयी महिला की परछाईं दिखाई देती हुई।
आदित्य को पहली बार एहसास हुआ कि वह अस्पताल में अकेला नहीं था... कोई चुपचाप उसके हर कदम के साथ चल रहा था।


   अगली सुबह आदित्य ने पूरी बात दोस्तों को बताई। सबके चेहरों का रंग उड़ गया। कबीर गुस्से में बोला, "तू पागल है! अकेला चला गया?" लेकिन आदित्य हँसते हुए बोला, "कुछ नहीं था वहाँ। लोग बेवजह डरते हैं।" उसने मोबाइल में ली गई तस्वीरें भी दिखाईं। उनमें बस वीरानी थी। दोस्तों ने राहत की साँस ली, मगर रिया अब भी बेचैन थी। उसी रात आदित्य अपने कमरे में सो गया। आधी रात के बाद उसकी अचानक आँख खुली। ऐसा लगा जैसे नीचे हॉल में कोई धीरे-धीरे चल रहा हो। लकड़ी के फ़र्श पर कदमों की धीमी आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। उसने उठकर पूरा घर देखा। हर कमरा खाली था। वापस बिस्तर पर लेटा ही था कि इस बार किसी के फुसफुसाने जैसी बेहद हल्की आवाज़ उसके कानों तक पहुँची। वह घबरा गया, मगर आवाज़ अगले ही पल गायब हो गई। उसने खुद को समझाया कि शायद थकान की वजह से ऐसा लग रहा है। लेकिन उसके भीतर पहली बार एक अनजाना डर जन्म ले चुका था।

   अगले कुछ दिनों में सब कुछ बदलने लगा। कभी बिना हवा के दरवाज़ा अपने आप खुल जाता, कभी सीढ़ियों से किसी के उतरने की आहट आती। रात को लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर देर तक खड़ा है। एक शाम दफ़्तर से लौटते समय उसने अनायास घर की छत की ओर देखा। वहाँ सफेद साड़ी पहने एक औरत की धुँधली आकृति बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसने दोबारा देखा... छत खाली थी। उसने इसे भ्रम समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया। लेकिन उसी रात अचानक किसी आवाज़ से उसकी नींद खुली। कमरे के बाहर सीढ़ियों पर वही आकृति खड़ी थी। इस बार वह पहले से कहीं ज़्यादा साफ दिखाई दे रही थी। लंबे बिखरे बाल, झुका हुआ सिर और बिल्कुल अस्वाभाविक खामोशी। आदित्य का गला सूख गया। वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा... तभी वह आकृति बिना एक भी कदम उठाए उसकी ओर सरकने लगी।



आदित्य का शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। वह आकृति बिना कोई आवाज़ किए उसकी ओर बढ़ती चली आ रही थी। डर के मारे उसने पूरी ताकत से मुख्य दरवाज़ा खोला और घर से बाहर भाग निकला। उसे लग रहा था कि बस सड़क तक पहुँच जाए, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जहाँ भी वह मुड़ता, वही सफेद साया कुछ दूरी पर खड़ा दिखाई देता। कभी गली के मोड़ पर, कभी बिजली के खंभे के नीचे, तो कभी सामने वाली छत पर। उसने आँखें कसकर बंद कीं, फिर खोलीं... वह फिर वहीं थी। अगले कई दिनों तक आदित्य की ज़िंदगी एक डरावने सपने में बदल गई। वह ठीक से सो नहीं पाता, खाना छोड़ दिया और किसी से मिलना भी बंद कर दिया। उसने दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए। पड़ोसियों ने बताया कि रात में उसके घर से किसी औरत के धीमे रोने की आवाज़ें आती थीं, जबकि घर में वह अकेला रहता था। और फिर... एक सुबह सब कुछ अचानक शांत हो गया। आदित्य का फोन हमेशा के लिए बंद हो चुका था।

जब तीन दिन तक आदित्य का कोई पता नहीं चला, तो कबीर, रिया, निखिल और समीर उसके घर पहुँचे। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था। अंदर का नज़ारा देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। घर की सारी लाइटें जल रही थीं, लेकिन कहीं कोई नहीं था। कमरे अस्त-व्यस्त पड़े थे, कुर्सी उलटी गिरी थी और आदित्य का मोबाइल ज़मीन पर टूटा हुआ मिला। पूरे घर की तलाशी ली गई—छत, स्टोर रूम, पिछवाड़ा, हर कोना। लेकिन आदित्य जैसे हवा में गायब हो चुका था। उसी दिन पुलिस में शिकायत दर्ज हुई। पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी और आसपास के इलाकों की जाँच की। जंगल भी छान मारे गए, झील में खोज अभियान चला, मगर कोई सुराग नहीं मिला। दिन हफ्तों में बदल गए। धीरे-धीरे सबने ने मान लिया कि शायद आदित्य अब कभी वापस नहीं आएगा। 

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रुद्रकोट मानसिक अस्पताल के महिला वार्ड में तूफानी रात के दौरान फर्श पर पड़े आदित्य देवधर का निर्जीव शरीर और दूर खड़ी सफेद साड़ी वाली रहस्यमयी आकृति।
जब लोग आदित्य को हर जगह खोज रहे थे, तब रुद्रकोट ने उसका सबसे भयावह सच अपने अंधेरे गलियारों में छिपा रखा था।


करीब दो हफ्तों बाद बरसात की एक अँधेरी रात थी। रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र के आसपास फिर वही घना कोहरा छाया हुआ था। हवा टूटी खिड़कियों से गुजरते हुए सीटी जैसी आवाज़ पैदा कर रही थी। अस्पताल के महिला वार्ड के सामने वही पुराना गलियारा पूरी तरह अंधेरे में डूबा था—ठीक वही जगह जहाँ आदित्य ने पहली बार महसूस किया था कि कोई उसके साथ चल रहा है। बिजली चमकी। एक पल के लिए पूरा गलियारा सफेद रोशनी से भर गया... और फर्श पर एक इंसानी शरीर दिखाई दिया। अगले ही क्षण फिर अंधेरा छा गया। दूसरी बिजली चमकी तो चेहरा साफ दिखाई दिया—वह आदित्य देवधर था। उसकी निर्जीव आँखें छत की ओर खुली हुई थीं, मानो मरने से पहले उसने किसी ऐसी चीज़ को देखा हो जिसे शब्दों में बयान करना संभव नहीं था। उसके शरीर पर किसी हमले का कोई स्पष्ट निशान नहीं था। बस उसके चेहरे पर जमी हुई दहशत बता रही थी कि मौत आने से पहले उसने ऐसा भय देखा था, जो किसी इंसान की कल्पना से भी परे था।




समाप्त।

बारिश की वो रात

 

आज से कई दशक पहले...

जब गाँवों तक पक्की सड़कें भी नहीं पहुँची थीं...

तब ज़िंदगी बिल्कुल अलग हुआ करती थी।

उस समय न  कस्बे में अस्पताल होते थे...

न गाँव में डॉक्टर।

बच्चे का जन्म घर के एक  कमरे में होता था।

परिवार के लोग बाहर बेचैनी से इंतज़ार करते...

और भीतर...

एक ही औरत नई ज़िंदगी को इस दुनिया में लाने की ज़िम्मेदारी संभालती।

उसे लोग "दाई" कहते थे।

दाई सिर्फ़ बच्चे की डिलीवरी नहीं कराती थी...

वह पूरे गाँव का भरोसा होती थी।

उसके अनुभव पर लोगों को डॉक्टर से भी ज़्यादा विश्वास होता था।

आँधी-तूफ़ान हो...

या मूसलाधार बारिश...

अगर किसी घर से खबर आती कि प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है...

तो दाई बिना एक पल की देरी किए निकल पड़ती।

क्योंकि उस दौर में...

एक छोटी-सी देर...

माँ और बच्चे...

दोनों की जान ले सकती थी।

ऐसी ही एक दाई थी...

सुमन दाई।

पूरे इलाके में उसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था।

उम्र साठ के आसपास...

चेहरे पर झुर्रियाँ...

लेकिन आँखों में गज़ब का आत्मविश्वास।

" इलाके में जितने बच्चे दौड़ते-भागते दिखाई देते हैं... उनमें से आधे से ज़्यादा ने पहली साँस सुमन दाई की हथेलियों में ली है।"

पास के कई गाँवों से भी लोग उसे बुलाने आते थे।

कोई कभी भी  बुलाने आ जाता  

आधी रात को...

कई बार तेज़ बारिश में...

तो कभी घने जंगल पार करके भी।

लेकिन उसने कभी किसी को मना नहीं किया।

उसके लिए हर जन्म...

भगवान का काम था।

और शायद...

इसी फ़र्ज़ ने एक रात...

उसे ऐसी जगह पहुँचा दिया...

जहाँ जाने की हिम्मत कोई इंसान नहीं कर सकता..

Amavasya ki raat mein Suman Dai apni jhopdi ka darwaza kholkar rahasyamayi aadmi aur bailgadi ko dekhti hui.
आधी रात... मूसलाधार बारिश... और एक दस्तक जिसने सुमन दाई की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।


वह अमावस्या की रात थी।

काले बादलों ने पूरे आकाश को निगल लिया था।

बारिश लगातार बरस रही थी...

ऐसी कि छप्पर पर गिरती हर बूँद किसी ढोल की चोट जैसी सुनाई दे रही थी।

हवा इतनी तेज़ थी कि मिट्टी की झोपड़ियों के दरवाज़े अपने आप काँप उठते।

दूर कहीं बिजली चमकती...

और एक पल के लिए पूरा गाँव दूधिया रोशनी में नहा जाता।

फिर...

सब कुछ पहले से भी गहरे अँधेरे में डूब जाता।

ऐसा अँधेरा...

जिसमें अपने ही हाथ दिखाई न दें।

पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा था।

कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़..

भी नहीं आ रही थी..

मानो इस रात ने हर जीव की आवाज़ छीन ली हो।

सिर्फ़ बारिश...

और गरजते बादल।

उसी सन्नाटे को चीरती हुई...

ठक... ठक... ठक...

सुमन दाई की झोपड़ी का दरवाज़ा काँप उठा।

दस्तक इतनी अचानक थी...

कि गहरी नींद में सोई सुमन दाई भी घबराकर उठ बैठी।

उसने दीवार पर टंगी लालटेन जलाई।

पीली लौ काँप रही थी...

मानो उसे भी बाहर खड़ी चीज़ का डर हो।

दस्तक फिर हुई...

इस बार पहले से ज़्यादा ज़ोर से।

धड़... धड़... धड़...

सुमन धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँची।

एक पल के लिए उसके हाथ कुंडी पर ही रुक गए।

इतनी रात...

इस तूफ़ान में...

कौन हो सकता है?

उसने भगवान का नाम लिया...

और कुंडी खोल दी।

उसी क्षण...

आकाश में एक तेज़ बिजली चमकी।

उस एक पल की रोशनी में उसने सामने खड़े आदमी को देखा।

लंबा कद...

भारी शरीर...

घनी, नीचे की ओर झुकी हुई काली मूँछें...

सिर से पाँव तक भीगा हुआ।

उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था...

लेकिन अजीब बात यह थी...

इतनी तेज़ बारिश के बावजूद...

उसके पैरों के पास की मिट्टी पर एक भी पदचिह्न नहीं था।

"दाई..."

उसने भारी, थकी हुई आवाज़ में कहा,

"मेरी बहू की जान खतरे में है... दर्द शुरू हुए कई घंटे हो गए हैं।"

"जल्दी चलो... देर हुई तो दोनों नहीं बचेंगे।"

सुमन ने बिना देर किए अपना पुराना थैला उठाया।

फिर पूछा,

"कौन-से गाँव से आए हो बेटा?"

आदमी ने एक पल उसकी आँखों में देखा...

फिर धीरे से बोला—

"रामपुर..."

सुमन ने माथे पर हल्की शिकन डाली।

रामपुर...

उसने नाम तो सुना था...

लेकिन कभी वहाँ गई नहीं थी।

"इतनी दूर इस मौसम में कैसे आए?"

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस मुड़कर चलने लगा।

बाहर...

एक पुरानी बैलगाड़ी खड़ी थी।

दो सफेद बैल...

बारिश में बिल्कुल स्थिर।

न सिर हिला रहे थे...

न पूँछ।

बस अँधेरे में बिना पलक झपकाए सामने देख रहे थे।

सुमन का मन एक पल को जाने क्यों घबरा उठा...

लेकिन किसी प्रसूता की जान का सवाल था।

वह बैलगाड़ी में बैठ गई।

बैलगाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

पहले कच्चा रास्ता आया...

फिर खेत...

और कुछ ही देर में...

गाँव की आख़िरी झोपड़ी भी पीछे छूट गई।

अब चारों ओर सिर्फ़ घना जंगल था।

बरसात से भीगे पेड़ों की डालियाँ हवा में ऐसे झूल रही थीं जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें हिला रहा हो।

कभी बिजली चमकती...

तो सूखे तनों की परछाइयाँ इंसानों जैसी लगतीं।

फिर सब कुछ फिर से अँधेरे में डूब जाता।

सुमन दाई ने कई बार पूछा,

"बेटा... तुम्हारा गाँव अभी कितना दूर है?"

हर बार वही जवाब मिलता...

"बस... पहुँच गए।"

लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

उसका दिल अब धीरे-धीरे घबराने लगा।

करीब एक घंटे बाद बैलगाड़ी एक पुराने, जर्जर मकान के सामने रुकी।

चारों तरफ़ जंगल...

दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं।

बस बारिश...

और उस टूटे हुए मकान की चरमराती लकड़ियाँ।

घर के भीतर कदम रखते ही सुमन ठिठक गई।

कमरे में सीलन की ऐसी गंध थी...

मानो बरसों से वहाँ धूप ही न आई हो।

दीवारों का पलस्तर उखड़ा हुआ था।

छत से जगह-जगह पानी टपक रहा था।

एक कोने में मिट्टी का दिया टिमटिमा रहा था।

उसकी काँपती लौ से दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बन रही थीं।

सामने...

एक पुरानी खाट पर...

एक औरत प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी।

उसका चेहरा आधे घूँघट में छिपा था।

वह दर्द से कराह रही थी...

लेकिन उसकी आवाज़...

जाने क्यों...

कमरे में गूँजती नहीं थी।

जैसे कोई आवाज़...

दीवारें अपने भीतर ही निगल लेती हों।

सुमन अपने काम में लग गई।

समय बीतता गया।

बाहर बारिश लगातार बरसती रही।

कभी उसे लगा...

कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है।

वह पलटी...

कोई नहीं।

फिर लगा...

खिड़की से कई चेहरे उसे घूर रहे हैं।

बिजली चमकी...

खिड़की खाली थी।

उसने खुद को समझाया,

"डर मत सुमन... तू अपना काम कर।"

कई घंटों की कोशिश के बाद...

आख़िर बच्चे के रोने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।

Ghane jungle ke beech purane sunsaan ghar mein Suman Dai prasav karati hui aur andhere mein khada rahasyamayi aadmi.
जहाँ हर दीवार एक राज़ छुपाए बैठी थी... और हर परछाई किसी अनजानी मौजूदगी का एहसास करा रही थी।


पहली बार उस आदमी के चेहरे पर मुस्कान आई।

उसने बच्चे को दोनों हाथों से उठाया...

उसकी आँखें भर आईं।

धीरे से बोला,

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

सुमन ने राहत की साँस ली।

कुच डेर बच्चे का सब करने के बाद

सुमन दाई 

"अब चलती हूँ... मेहनताना दे दो।"

आदमी कुछ देर चुप रहा।

फिर बिना कुछ कहे अंदर चला गया।

थोड़ी देर बाद लौटा...

उसके हाथ में कोयले के कुछ काले टुकड़े थे।

"मेरे पास देने के लिए यही है।"

सुमन हैरान रह गई।

"अरे... इसका मैं क्या करूँ?"

आदमी बस मुस्कुराया।

"कभी-कभी...

जो कोयला दिखाई देता है...

वह कोयला नहीं होता।"

उसकी बात सुमन की समझ में नहीं आई।

वह उसे बैलगाड़ी में बैठाकर वापस छोड़ गया।

घर पहुँचते ही सुमन झुँझलाकर बोली,

"अजीब आदमी था...

रातभर जान खपा दी...

और बदले में मुट्ठीभर कोयले दे गया।"

उसने वे सारे कोयले घर के एक कोने में फेंक दिए...

और थककर सो गई।

सुबह...

बारिश थम चुकी थी।

सूरज की हल्की किरणें झोपड़ी में उतर रही थीं।

सुमन झाड़ू लगा रही थी कि अचानक...

टन...!

झाड़ू किसी धातु से टकराई।

उसने नीचे देखा।

मिट्टी में...

एक चमचमाता हुआ...

सोने का सिक्का।

वह हैरान रह गई।

कुछ कदम आगे...

दूसरा सिक्का।

फिर तीसरा...

फिर चौथा।

उसे अचानक रात वाले कोयले याद आए।

वह दौड़कर उसी कोने में पहुँची...

जहाँ उसने उन्हें फेंका था।

लेकिन वहाँ अब कोयले नहीं थे।

पूरा कोना...

सोने के पुराने सिक्कों से भरा पड़ा था।

सुमन की साँसें तेज़ हो गईं।

Subah Suman Dai mitti ke ghar mein koylon ki jagah chamakte sone ke sikke dekhkar hairan hoti hui
रात को मिले साधारण कोयले... सुबह बन चुके थे सोने के सिक्के। लेकिन क्या सचमुच यह किसी इनाम की शुरुआत थी... या एक भयावह रहस्य की?


उसी समय...

दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ लगाई।

"दाई... सुना है रात तुम रामपुर गई थीं?"

"हाँ..."

सुमन ने जवाब दिया।

सामने खड़ा बूढ़ा आदमी एकदम सन्न रह गया।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

काँपती आवाज़ में बोला...

"रामपुर...? .. रामपुर तो पच्चीस साल पहले भूस्खलन में पूरा दब गया था। वहाँ का एक भी आदमी ज़िंदा नहीं बचा था..."

सुमन के हाथ से सोने का सिक्का गिर पड़ा।

उसके कानों में रात वाले आदमी की आख़िरी बात गूँजने लगी—

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

उस दिन के बाद...

सुमन ने कभी उन सिक्कों को हाथ नहीं लगाया 

वह सोना आज भी उसके पुराने संदूक में रखा है।

और हर अमावस्या की बरसाती रात...

जब घड़ी में डेढ़ बजते हैं...

तो उसी जंगल की तरफ़ से...

बैलगाड़ी के पहियों की धीमी चरमराहट सुनाई देती है।

जैसे...

कोई फिर किसी दाई को लेने आया हो।

समाप्त।