भाग 1 : सोने का सिक्का
रात के करीब नौ बजे होंगे।
बारिश अभी-अभी रुकी थी। सड़क किनारे बनी छोटी-सी चाय की टपरी पर चार आदमी चुपचाप बैठे थे। उनके कपड़ों पर सीमेंट और मिट्टी लगी हुई थी। दिनभर की मजदूरी के बाद हर चेहरे पर वही थकान थी, जो सालों से उनके साथ घर जाती थी।
"आज कितने मिले?" रघु ने चाय का आखिरी घूंट लेते हुए पूछा।
"चार सौ।"
"मेरे साढ़े तीन सौ।"
"और मेरे तीन सौ पचहत्तर।"
कुछ पल के लिए फिर सन्नाटा छा गया।
टपरी के बाहर बारिश का पानी अभी भी टप-टप करके टीन की छत से गिर रहा था। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।
कोड़ा बस सामने फैले अंधेरे को देखे जा रहा था।
"क्या हुआ?" बबलू ने पूछा।
कोड़ा ने बिना उसकी ओर देखे कहा, "अगर मैं कहूं कि हम चारों कल सुबह तक अमीर हो सकते हैं?"
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| जंगल के किनारे खड़ा वह बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था। उसकी एक मुस्कान ने चार जिंदगियों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। |
तीनों एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।
फिर मंग्या हंस पड़ा।
"पहले भी तू दो बार अमीर बन चुका है। एक बार लॉटरी से और दूसरी बार सपने में।"
इस बार कोड़ा नहीं हंसा।
उसने धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला और मेज पर एक छोटी-सी चीज रख दी।
वह एक पुराना सोने का सिक्का था।
टपरी के ऊपर लटकता बल्ब अचानक एक बार टिमटिमाया।
तीनों की नजरें सिक्के पर टिक गईं।
"ये नकली होगा," रघु बोला।
"मैं भी यही सोच रहा था।" कोड़ा की आवाज धीमी थी, "लेकिन शहर के सुनार ने इसके बदले पंद्रह हजार रुपये देने की बात कही है।"
मंग्या के चेहरे की हंसी गायब हो गई।
"कहां मिला?"
कोड़ा कुछ पल चुप रहा। उसकी आंखें सड़क के उस पार अंधेरे में टिकी थीं।
"अगर बताऊं... तो शायद तुम लोग आज रात सो नहीं पाओगे।"
अब वहां बैठे चारों आदमियों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज थी।
"तीन रात पहले मैं काम से लौट रहा था। रास्ते में एक बूढ़ा मिला। मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।"
"कैसा बूढ़ा?"
"दुबला-पतला। सफेद धोती। हाथ में लालटेन।"
"फिर?"
"उसने मुझे नाम लेकर बुलाया।"
तीनों चौंक गए।
"नाम लेकर?"
कोड़ा ने सिर हिलाया।
"उसने कहा—'कोड़ा, बहुत मेहनत कर ली। अब वक्त है कि किस्मत तेरे दरवाजे पर आए।'"
"तू उसके साथ चला गया?" बबलू ने पूछा।
"नहीं। पहले तो मुझे लगा कि कोई पागल है। लेकिन फिर उसने ये सिक्का मेरी हथेली पर रख दिया।"
कोड़ा ने सिक्के की ओर इशारा किया।
"और जाने से पहले उसने एक बात कही..."
"क्या?"
कोड़ा की आवाज लगभग फुसफुसाहट में बदल गई।
«"कुछ खजाने जमीन में इसलिए नहीं दबाए जाते कि लोग उन्हें ढूंढ़ लें... बल्कि इसलिए कि वे लोगों को अपने पास बुला सकें।"»
मंग्या ने हंसने की कोशिश की, लेकिन उसकी हंसी गले में ही अटक गई।
"फिर?"
"अगली रात मैं वापस गया।"
"अकेला?"
"हां।"
"और?"
कोड़ा ने गहरी सांस ली।
"मैंने उसे फिर देखा। वह जंगल के किनारे खड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा। बस उंगली से अंदर जाने का इशारा किया।"
अब टपरी वाला भी उनकी बातें सुन रहा था।
"मैं उसके पीछे-पीछे गया। करीब दस मिनट बाद वह अचानक गायब हो गया। जैसे था ही नहीं।"
"झूठ।" रघु बोला, लेकिन उसकी आवाज में पहले जैसा भरोसा नहीं था।
"काश, झूठ होता।"
कोड़ा ने आगे कहा, "और फिर मैंने उसे देखा।"
"किसे?"
"जमीन को।"
"क्या मतलब?"
"जंगल के बीचों-बीच... मिट्टी के नीचे से सुनहरी रोशनी निकल रही थी। बिल्कुल ऐसे, जैसे किसी ने धरती के नीचे सूरज छिपा दिया हो।"
एक पल के लिए किसी ने कुछ नहीं कहा।
गरीबी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है। यहां तक कि वह उन बातों पर भी विश्वास करने लगता है, जिन पर कभी हंसता था।
"अगर वहां और सिक्के हुए तो?" बबलू ने धीरे से पूछा।
कोड़ा ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।
"इसीलिए तो मैं तुम लोगों को बता रहा हूं।"
रघु उठकर खड़ा हो गया।
"मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा।"
"ठीक?" कोड़ा हंसा। "क्या हमारी जिंदगी ठीक है? सुबह से शाम तक मरते हैं और महीने के आखिर में जेब में पांच सौ भी नहीं बचते।"
किसी के पास इसका जवाब नहीं था।
कुछ देर बाद मंग्या बोला, "अगर जाना है... तो आज ही चलते हैं।"
"आज?"
"हां। जितनी देर करेंगे, उतना दिमाग हमें रोकेगा।"
रघु ने मना करने की कोशिश की, लेकिन बाकी तीनों का फैसला हो चुका था।
रात के ग्यारह बजे, चारों हाथों में टॉर्च और फावड़े लिए जंगल की ओर निकल पड़े।
जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, हवा ठंडी होती जा रही थी।
जंगल का रास्ता कीचड़ से भरा था। ऊपर बादल चांद को बार-बार ढक रहे थे।
तभी...
चारों एक साथ रुक गए।
जंगल के ठीक किनारे, एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा था।
उसके हाथ में लालटेन थी।
टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।
वह वही बूढ़ा आदमी था।
लेकिन इस बार...
उसकी आंखों में काली पुतलियां नहीं थीं।
वे पूरी तरह सफेद थीं।
और वह मुस्कुरा रहा था।
भाग 2 : जंगल की फुसफुसाहट
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। बूढ़ा पेड़ के नीचे बिल्कुल स्थिर खड़ा था। उसकी सफेद आंखें चारों को ऐसे देख रही थीं, जैसे वह उनके आने का इंतजार कर रहा हो।
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| जंगल के किनारे खड़ा वह बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था। उसकी एक मुस्कान ने चार जिंदगियों की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। |
"मैंने कहा था न... यही है वो।" कोड़ा की आवाज कांप रही थी।
"चलो यहां से!" रघु लगभग चिल्ला पड़ा।
लेकिन तभी बूढ़ा मुड़ा और बिना कुछ कहे जंगल के अंदर चलने लगा।
उसकी लालटेन की पीली रोशनी अंधेरे में धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी।
"वह हमें बुला रहा है।" बबलू ने कहा।
"और अगर जाल में फंसा रहा हो तो?" रघु ने जवाब दिया।
कोड़ा ने अपनी मुट्ठी में सोने का सिक्का कस लिया।
"अगर वह हमें मारना चाहता, तो तीन दिन पहले ही मार देता।"
यह तर्क कमजोर था, लेकिन लालच अक्सर कमजोर तर्कों को भी मजबूत बना देता है।
कुछ क्षण बाद चारों उसके पीछे चल पड़े।
जंगल के अंदर हवा और ठंडी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे हर कदम के साथ वे किसी और ही दुनिया में प्रवेश कर रहे हों।
चलते-चलते मंग्या अचानक रुक गया।
"ये देखो।"
एक पेड़ के तने पर किसी ने गहरे निशान बनाए हुए थे। वे किसी भाषा के अक्षर नहीं थे, लेकिन उन्हें देखकर अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।
"शायद किसी ने मजाक किया होगा।" बबलू बोला।
तभी उन्हें एहसास हुआ कि बूढ़ा काफी आगे निकल चुका था।
वे जल्दी-जल्दी उसके पीछे बढ़े।
करीब बीस मिनट तक चलने के बाद वे एक पुराने कुएं के पास पहुंचे।
कुएं के चारों ओर घास उगी हुई थी। उसके पत्थरों पर काई जमी थी।
बूढ़ा कुएं के पास खड़ा था।
फिर पहली बार उसने कुछ कहा।
"नीचे मत देखना।"
उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि लगा जैसे हवा बोल रही हो।
"क्यों?" कोड़ा के मुंह से निकल गया।
बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।
और फिर...
वह आगे बढ़ गया।
चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद बबलू खुद को रोक नहीं पाया।
उसने पलटकर कुएं के अंदर झांका।
अगले ही पल उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
"क्या हुआ?" मंग्या ने उसका कंधा पकड़कर पूछा।
बबलू के होंठ कांप रहे थे।
"नीचे... नीचे कोई खड़ा है।"
तीनों ने एक साथ कुएं में देखा।
अंदर सिर्फ अंधेरा था।
"वहां कोई नहीं है।"
"था!" बबलू लगभग रोने लगा। "मैंने देखा। उसने ऊपर देखकर मुस्कुराया था।"
रघु ने उसका हाथ पकड़ा।
"बस! बहुत हो गया। हम वापस जा रहे हैं।"
लेकिन उसी समय उन्हें फिर वह लालटेन दिखाई दी।
बूढ़ा अब कुछ दूर एक खंडहर के सामने खड़ा था।
वह एक पुराना मंदिर था।
उसकी आधी छत गिर चुकी थी। टूटी हुई मूर्तियां मिट्टी में दबी थीं। मंदिर के सामने की जमीन बाकी जगहों से अलग दिख रही थी, जैसे उसे कई बार खोदा गया हो।
बूढ़े ने धीरे से अपनी उंगली उस जमीन की ओर कर दी।
"यहीं है।"
"क्या?" कोड़ा ने पूछा।
बूढ़ा मुस्कुराया।
"जिसकी तलाश तुम्हें यहां खींच लाई।"
अचानक लालटेन बुझ गई।
और जब कोड़ा ने टॉर्च की रोशनी आगे की...
वह गायब हो चुका था।
अब वहां सिर्फ चार आदमी और उनके दिलों की धड़कनें थीं।
"हमें जाना चाहिए।" रघु बोला।
लेकिन तभी मंग्या घुटनों के बल बैठ गया और मिट्टी खोदने लगा।
"इतनी दूर आए हैं। खाली हाथ नहीं लौटूंगा।"
कुछ क्षण बाद बाकी तीनों ने भी फावड़े उठा लिए।
पहले दस मिनट तक कुछ नहीं मिला।
फिर...
"टन!"
रघु का फावड़ा किसी कठोर चीज से टकराया।
उसने मिट्टी हटाई।
वह एक सोने का सिक्का था।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
कुछ ही देर में उनके पैरों के पास सिक्कों का छोटा-सा ढेर लग गया।
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| संदूक में सोना नहीं, बल्कि सदियों पुराना श्राप उनका इंतजार कर रहा था। उस रात खजाने ने अपना नया रखवाला चुन लिया। |
"हम सचमुच अमीर हो गए!" मंग्या खुशी से चिल्लाया।
और तभी...
जंगल में फैली हर आवाज अचानक बंद हो गई।
न हवा।
न झींगुर।
न बारिश।
सिर्फ सन्नाटा।
कोड़ा के कान के पास किसी ने बहुत धीरे से फुसफुसाया—
«"और गहरा खोदो..."»
उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं था।
"तुमने कुछ कहा?" उसने पूछा।
तीनों ने ना में सिर हिलाया।
फिर वही आवाज आई।
इस बार थोड़ी तेज।
«"और... गहरा... खोदो..."»
अब चारों ने उसे सुना था।
बबलू के हाथ से फावड़ा छूट गया।
"मैं जा रहा हूं।"
लेकिन तभी जमीन के नीचे से कुछ हिलने लगा।
रघु ने कांपते हुए मिट्टी हटाई।
पहले उसे लगा कि यह कोई जड़ है।
फिर वह जड़ मुड़ी।
और उसकी उंगलियां दिखाई दीं।
वह इंसानी हाथ था।
अचानक उस हाथ ने मिट्टी से बाहर आकर कोड़ा की कलाई कसकर पकड़ ली।
जंगल में पहली बार किसी की चीख गूंजी।
और उसी पल...
मंदिर के पीछे से किसी के हंसने की आवाज आई।
भाग 3 : आखिरी रखवाला
कोड़ा दर्द से चीख उठा।
उसने पूरी ताकत से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी से निकला वह हाथ किसी इंसान का नहीं लग रहा था। उसकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी।
"खींचो उसे!" रघु चिल्लाया।
मंग्या और बबलू ने कोड़ा को पीछे खींचना शुरू किया।
कुछ सेकंड बाद वह हाथ अचानक ढीला पड़ गया और वापस मिट्टी के अंदर चला गया।
चारों हांफ रहे थे।
"बस! अब बहुत हो गया!" रघु बोला। "हम अभी के अभी यहां से जा रहे हैं!"
लेकिन कोड़ा की नजर अभी भी जमीन पर बिखरे सोने के सिक्कों पर थी।
"इतना सोना..." उसने फुसफुसाते हुए कहा, "इतना सोना छोड़कर?"
"तुझे अपनी जान प्यारी नहीं है?"
कोड़ा ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी...
धरती हल्के-हल्के कांपने लगी।
मंदिर की टूटी हुई दीवारों से धूल गिरने लगी। कुएं के अंदर से किसी के रोने की आवाज आने लगी।
और फिर, उनके सामने की जमीन धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।
चारों पीछे हट गए।
मिट्टी फट रही थी।
उसके बीचों-बीच एक विशाल लकड़ी का संदूक बाहर आने लगा। उस पर लोहे की जंग लगी पट्टियां थीं और ऐसा लग रहा था, जैसे वह सैकड़ों सालों से जमीन के नीचे दबा हुआ हो।
संदूक के ऊपर किसी ने नुकीली चीज से कुछ लिखा था।
रघु ने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली।
«"जो इसे खोलेगा... वह इसकी रखवाली करेगा।"»
"अब भी नहीं समझे?" बबलू लगभग रोते हुए बोला। "यह खजाना नहीं है!"
लेकिन कोड़ा जैसे उनकी बातें सुन ही नहीं रहा था।
वह धीरे-धीरे संदूक की ओर बढ़ने लगा।
"कोड़ा, रुक जा!"
"पूरी जिंदगी गरीबी में काट दी!" वह पहली बार जोर से चिल्लाया। "भगवान ने पहली बार कुछ दिया है और मैं उसे छोड़ दूं?"
उसने संदूक पर हाथ रखा।
एक पल के लिए हवा पूरी तरह थम गई।
फिर उसने उसे खोल दिया।
चारों ने अंदर देखा।
और उनकी सांसें रुक गईं।
अंदर सोना नहीं था।
सिर्फ खोपड़ियां थीं।
एक...
दो...
तीन...
कुल चौदह।
हर खोपड़ी के माथे पर किसी का नाम खुदा हुआ था।
और सबसे नीचे...
पंद्रहवीं जगह खाली थी।
कोड़ा की टॉर्च कांप रही थी।
"ये... ये क्या है?"
तभी एक खोपड़ी की आंखों के खाली गड्ढों से काला धुआं निकलने लगा।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
कुछ ही सेकंड में पूरा संदूक काले धुएं से भर गया।
और फिर...
सभी खोपड़ियों के जबड़े एक साथ हिले।
«"हमने भी यही सोचा था..."»
«"बस एक रात..."»
«"बस एक खजाना..."»
«"बस एक मौका..."»
कोड़ा पीछे हट गया।
अचानक उसे कुछ याद आया।
"बूढ़ा..."
वह तेजी से मुड़ा।
वही बूढ़ा मंदिर के दरवाजे पर खड़ा था।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।
"तू कौन है?" कोड़ा चिल्लाया।
बूढ़े ने धीरे से कहा—
«"मैं चौदहवां रखवाला हूं।"»
कोड़ा का शरीर कांप उठा।
"और अब..."
बूढ़े ने अपनी सफेद आंखों से उसकी ओर देखा।
«"तुम पंद्रहवें हो।"»
अगले ही पल, जमीन के नीचे से दर्जनों सड़े हुए हाथ निकले।
उन्होंने कोड़ा के पैर पकड़ लिए।
"नहीं! मुझे बचाओ!"
रघु ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन देर हो चुकी थी।
कुछ ही सेकंड में कोड़ा मिट्टी के अंदर समा चुका था।
और जैसे ही वह गायब हुआ...
संदूक में सबसे नीचे वाली खाली जगह पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभरने लगा।
"कोड़ा"
रघु, मंग्या और बबलू बिना पीछे देखे भागते रहे।
उन्होंने कभी उस रात के बारे में किसी से बात नहीं की।
समय बीत गया।
छह महीने बाद...
एक सुनसान सड़क पर एक ट्रक खराब हो गया।
ड्राइवर और उसका हेल्पर मदद की तलाश में पैदल चलने लगे।
कुछ दूर उन्हें एक आदमी दिखाई दिया।
सफेद धोती।
हाथ में लालटेन।
"भैया, यहां आसपास कोई गांव है?" ड्राइवर ने पूछा।
आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ मुड़ा।
उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं।
उसने मुस्कुराकर अपनी जेब से एक पुराना सोने का सिक्का निकाला और कहा—
«"गांव तो है... लेकिन पहले ये बताओ।"»
«"क्या तुम लोग जल्दी अमीर बनना चाहते हो?"»
और उस रात...
खजाने ने अपना सोलहवां रखवाला चुन लिया।
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