बरसात का मौसम था।
रात के लगभग ग्यारह बजे थे।
राजापुर गांव के बाहर फैले खेतों पर धुंध की पतली चादर बिछी हुई थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें अंधेरे को और भयावह बना रही थीं। आसमान में बादल इस तरह छाए थे कि चांद का नामोनिशान नहीं था।
गांव के बीचोंबीच एक विशाल पुराना वाड़ा खड़ा था।
सौ साल पुराना।
ऊंची दीवारें... लकड़ी के भारी दरवाजे... और अनगिनत रहस्य अपने भीतर दबाए हुए।
उस वाड़े में देशमुख परिवार रहता था।
बड़ा परिवार था। घर में बुजुर्ग, बेटे, बहुएं, बच्चे—सब साथ रहते थे।
लेकिन अब पिछले कुछ महीनों से उस घर में कुछ ऐसा हो रहा था जिसने सबकी नींद छीन ली थी।
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| जिसे पंद्रह साल पहले दफना दिया गया था... वह फिर लौट आया। राजापुर की सबसे भयावह रात की शुरुआत। |
शुरूवात आवाजों से हुईं थीं।
एक रात ऊपर वाली मंजिल से किसी के चलने की आवाज आई।
ठक...
ठक...
ठक...
जैसे कोई नंगे पैर लकड़ी के फर्श पर टहल रहा हो।
लेकिन जब कोई वहां देखने गया...
तो वहां कोई नहीं था।
फिर कभी रसोई में रखे बर्तन अपने आप गिरने लगे।
कभी पानी के नल खुल जाते।
कभी घर का मुख्य दरवाजा रात में अपने आप खुला मिल जाता।
इस बात से महिलाएं सबसे ज्यादा डर गई थीं।
खासकर बड़ी बहू, सविता।
उसे कई बार ऐसा लगता कि कोई उसे देख रहा है।
किसी की निगाहें उसके पीछे हैं।
लेकिन पीछे मुड़ने पर हमेशा उसे खाली अंधेरा मिलता था।
एक रात सविता रसोई में पानी पिने गई थी।
घर के बाकी लोग ऊपर सो रहे थे।
घड़ी में साढ़े बारह बज रहे थे।
अचानक उसे महसूस हुआ कि आंगन में कोई खड़ा है।
उसने खिड़की से बाहर झांका।
और उसके शरीर का खून जम गया।
आंगन के बीचोंबीच...
एक आदमी खड़ा था।
उसके कपड़े मिट्टी से सने हुए थे।
चेहरा सड़ा हुआ।
आंखें...
खून जैसी लाल।
वह बिना पलक झपकाए सविता को देख रहा था।
उसके होंठ धीरे-धीरे फैलने लगे।
एक भयानक मुस्कान।
सविता चीख भी नहीं पाई।
उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया।
और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी।
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| एक नजर... और उसकी दुनिया बदल गई। खिड़की के बाहर खड़ा वह चेहरा किसी जीवित इंसान का नहीं था। |
अगले दिन पूरे गांव में खबर फैल गई।
एक पुजारी बुलाया गया।
घर में हवन किया गया।
पुरे घर में गंगाजल छिड़का गया।
उसके कुछ दिन तक तो सब सामान्य रहा।
सबको लगा समस्या खत्म अब हो गई।
लेकिन असली भय तो अभी शुरू हुआ था।
एक रात में बच्चों के कमरे से खिलौनों के चलने की आवाजें आने लगीं।
दीवारों पर खरोंचों के निशान दिखाई दिए।
एक दिन परिवार की बुजुर्ग रिश्तेदार...
गोदावरी काकी...
कई वर्षों बाद घर आईं।
उनकी उम्र अस्सी साल के आसपास थी।
उन्होंने जीवन में बहुत कुछ देखा था।
उन्हें अंधविश्वासों पर विश्वास नहीं था।
लेकिन उस शाम जब वह आंगन में बैठी थीं...
उन्होंने उसे देखा।
बस एक पल के लिए।
बरगद के पेड़ के पीछे।
एक आदमी।
सड़ा हुआ चेहरा।
खूनी आंखें।
और गर्दन अजीब तरह से एक ओर झुकी हुई।
गोदावरी काकी का चेहरा पीला पड़ गया।
उन्होंने कांपते हुए कहा—
"ये... ये तो मोहन है..."
पूरा परिवार सन्न रह गया।
मोहन।
यह नाम वर्षों से किसी ने नहीं लिया था।
करीब पंद्रह साल पहले मोहन देशमुख
परिवार का सबसे छोटा भाई।
जिद्दी लेकिन दिल का अच्छा।
खानदानी जमीन के विवाद को लेकर एक दिन घर में भयंकर झगड़ा हुआ था।
झगड़ा इतना बढ़ गया कि फिर हाथापाई हो गई।
और उसी दौरान...
मोहन सीढ़ियों से गिर पड़ा।
उसका सिर पत्थर से टकराया।
और उसकी मौत वहीं हो गई।
यह सब अचानक हो गया था।
लेकिन...
परिवार की बदनामी के डर से सब चुप रहे, सच छिपा दिया गया।
अचानक तबीयत खराब होने की वजह से
उसकी प्राकृतिक मृत्यु हुई है।
ऐसा कहा गया।
सच्चाई दफना दी गई।
और मोहन भी।
अब सब समझ आने लगा था।
मोहन की आत्मा वापस आ चुकी थी।
और वह शांत नहीं थी।
उस रात पूरे घर ने वह दृश्य देखा जिसे कोई कभी नहीं भूल सका।
आधी रात को
अचानक घर की सारी लाइटें बुझ गईं थीं।
बच्चों के रोने की आवाजें आने लगीं।
दीवारों पर किसी ने खून से लिखा—
"झूठ..."
फिर दूसरी दीवार पर—
"हत्यारे..."
और फिर पूरे घर में एक ही आवाज गूंजने लगी।
भारी।
टूटी हुई।
गुस्से से भरी।
"मैं... किसी... को... नहीं... छोड़ूंगा..."
महिलाएं रोने लगीं।
पुरुषों की भी हिम्मत जवाब देने लगी।
उस दिन के बाद कई तांत्रिक बुलाए गए।
कई पुजारी आए।
पर कोई टिक नहीं पाया।
एक तांत्रिक तो आधी रात को भाग गया।
उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—
"ये साधारण आत्मा नहीं है... ये क्रोध में जल रही है..."
हर बीतते दिन के साथ मोहन अब और शक्तिशाली होता जा रहा था।
आखिरकार परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य ने निर्णय लिया।
और वह दूर पहाड़ों में रहने वाले प्रसिद्ध तांत्रिक...
भैरवनाथ को लेकर आए।
कहा जाता था कि उन्होंने कई खतरनाक आत्माओं को बांधा था।
अमावस्या की रात चुनी गई।
पूरे वाड़े में मंत्रों की गूंज फैल गई।
आंगन में अग्निकुंड जलाया गया।
घड़ी ने बारह बजाए।
और तभी...
तापमान अचानक गिर गया।
सभी की सांसें धुएं जैसी दिखाई देने लगीं।
बरगद का पेड़ जोर-जोर से हिलने लगा।
और उसके नीचे...
मोहन प्रकट हुआ।
पहले से भी ज्यादा भयानक।
उसकी आंखों से खून बह रहा था।
उसकी चीख सुनकर बच्चों ने कान बंद कर लिए।
तांत्रिक और मोहन के बीच घंटों संघर्ष चला।
पर अंत में...
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| मंत्रों की गूंज, आग की लपटें और बदले से भरी आत्मा... फैसला होना था कि उस रात कौन बचेगा और कौन हमेशा के लिए कैद होगा। |
भैरवनाथ ने अपनी शक्ती और अनुभव से एक प्राचीन तांबे के कलश में उस आत्मा को कैद कर दिया।
मोहन की अंतिम चीख पूरे गांव में गूंज उठी।
फिर...
सब शांत हो गया।
उपसंहार
कुछ महीनों बाद देशमुख परिवार की जिंदगी सामान्य हो गई।
डर खत्म हो गया।
लोग फिर हंसने लगे।
कलश को गांव से दूर एक प्राचीन मंदिर में दफना दिया गया।
सबको लगा...
कहानी समाप्त हो चुकी है।
लेकिन...
एक बरसाती रात...
मंदिर का वृद्ध पुजारी वहां से गुजर रहा था।
उसे जमीन के नीचे से...
ठक...
ठक...
ठक...
की आवाज सुनाई दी।
जैसे कोई अंदर से कलश पर दस्तक दे रहा हो।
पुजारी का चेहरा सफेद पड़ गया।
और तभी...
अंधेरे में दो लाल आंखें चमकीं।
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