अठारहवीं सदी का उत्तर भारत उस समय एक बदलते हुए दौर से गुजर रहा था।
अवध की सत्ता अपने स्थान पर थी, लेकिन उसके चारों ओर राजनीति बदल रही थी। ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार से आगे बढ़कर सैनिक ताकत और राजनीतिक समझौतों के सहारे उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। ऐसे समय में लंबी यात्राएँ केवल दूरी तय करना नहीं थीं—हर रास्ता अपने साथ अनिश्चितता लेकर चलता था।
सड़कें कम थीं और जहाँ रास्ते थे, वहाँ भी उनका कोई भरोसा नहीं था।
दिन में जो रास्ते सामान्य लगते थे, सूरज ढलते ही वही रास्ते अजनबी हो जाते।
उस दिन तीन अंग्रेज सैनिक घोड़ों पर सवार होकर अवध के भीतर एक जरूरी संदेश लेकर जा रहे थे।
उनके पास ईस्ट इंडिया कंपनी के एक महत्वपूर्ण अधिकारी, कैप्टन एडवर्ड हार्डिंग, के लिए कुछ गोपनीय दस्तावेज थे। हार्डिंग बाराबंकी के पास तैनात कंपनी की चौकी और अवध दरबार के बीच होने वाली एक बेहद संवेदनशील सैन्य बातचीत की निगरानी कर रहा था।
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| घने जंगल में रास्ता भटके तीन ब्रिटिश सैनिकों के सामने अचानक एक रहस्यमय घुड़सवार दिखाई दिया। |
दस्तावेजों में सैनिकों की तैनाती और अगले दिन होने वाली कार्रवाई से जुड़ी जानकारी थी।
उन्हें वह संदेश अगली सुबह से पहले पहुँचाना था।
देरी का मतलब था पूरी योजना के बिगड़ने का खतरा।
इसीलिए तीनों सुबह से लगातार घोड़े दौड़ा रहे थे।
आगे जंगल था।
और जंगल के बाद बाराबंकी की तरफ जाने वाला खुला रास्ता।
लेकिन जंगल पार करने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं था।
सूरज तेजी से नीचे जा रहा था।
आगे चल रहा लेफ्टिनेंट विलियम कार्टर बार-बार आसमान की तरफ देख रहा था। पीछे सार्जेंट थॉमस मिलर और कॉर्पोरल जेम्स विल्सन अपने घोड़ों को संभालते हुए उसके पीछे आ रहे थे।
कार्टर ने पीछे देखा।
"हमें रफ्तार बढ़ानी होगी।"
तीनों ने घोड़ों को एड़ी लगाई।
सूखी जमीन पर तीन जोड़ी खुरों की आवाज फैल गई—
ठक... ठक... ठक...
कुछ दूर तक रास्ता खुला रहा।
फिर पेड़ शुरू हो गए।
पहले इक्का-दुक्का।
फिर घने।
और कुछ ही देर में रास्ता जंगल के भीतर खो गया।
जंगल के भीतर आते ही बाहर की दुनिया जैसे पीछे छूट गई। पेड़ों की घनी छाया में शाम जल्दी उतरने लगी थी और घोड़ों की टापें उस सुनसान रास्ते पर असामान्य रूप से साफ सुनाई दे रही थीं।
कार्टर ने घोड़े की रफ्तार कम कर दी।
उसने जेब से छोटा-सा नक्शा निकाला।
मिलर उसके पास आ गया।
"रास्ता सही है?"
कार्टर ने नक्शे पर नजर दौड़ाई।
"हाँ। आगे एक मोड़ आएगा। उसके बाद रास्ता सीधा है।"
विल्सन ने पीछे देखते हुए कहा,
"कितना समय लगेगा?"
"अगर घोड़े साथ रहे तो एक घंटे से ज्यादा नहीं।"
विल्सन ने आसमान की तरफ देखा।
"अंधेरा उससे पहले हो जाएगा।"
कार्टर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसे भी यही चिंता थी।
तीनों फिर आगे बढ़े।
कुछ देर तक केवल टापों की आवाज उनके साथ चलती रही।
फिर रास्ता अचानक दो हिस्सों में बँट गया।
कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।
वह नीचे उतरा और मिट्टी पर बने निशानों को देखने लगा।
दोनों रास्तों पर घोड़ों के पुराने खुरों के निशान थे।
मिलर ने पूछा,
"कौन-सा?"
कार्टर ने नक्शा देखा।
"दायाँ।"
वह वापस घोड़े पर चढ़ गया।
तीनों दाईं तरफ मुड़ गए।
करीब दस मिनट बाद विल्सन ने पीछे से कहा,
"रुकिए।"
कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।
"क्या हुआ?"
विल्सन अपने घोड़े से नीचे उतरा।
वह सड़क के किनारे झुका और मिट्टी को देखने लगा।
"ये निशान नए हैं।"
मिलर भी नीचे उतरा।
वहाँ घोड़े के खुरों के कई निशान थे।
ताजे।
जैसे कोई घुड़सवार कुछ ही देर पहले इसी रास्ते से गया हो।
कार्टर ने आसपास देखा।
"तो हम अकेले नहीं हैं।"
मिलर ने कहा,
"शायद कोई आगे जा रहा है।"
कार्टर ने निशानों को एक बार फिर देखा।
फिर बोला,
"चलो।"
तीनों आगे बढ़ गए।
शाम अब और गहरी हो चुकी थी।
कार्टर ने पहली बार घोड़े की चाल तेज करने के बजाय उसे संभालकर चलाया।
उसे पता था कि अंधेरे में तेज रफ्तार ज्यादा खतरनाक हो सकती है।
कुछ दूर जाने के बाद हवा का रुख बदला।
पेड़ों के बीच से ठंडी हवा आई और कार्टर के चेहरे से टकराई।
उसने कोट का कॉलर ऊपर कर लिया।
तभी उसके घोड़े ने अचानक कान खड़े कर दिए।
कार्टर ने लगाम खींची।
"क्या हुआ?"
मिलर और विल्सन रुक गए।
कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर—
बहुत दूर से घोड़े की टाप सुनाई दी।
ठक...
फिर थोड़ी देर बाद—
ठक... ठक...
तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
आवाज आगे से आ रही थी।
मिलर ने कहा,
"वही सवार होगा।"
कार्टर ने कोई जवाब नहीं दिया।
टापों की आवाज धीरे-धीरे करीब आने लगी।
ठक... ठक... ठक...
विल्सन ने अपना हाथ पिस्तौल पर रख लिया।
पेड़ों के बीच अंधेरे में कुछ हलचल हुई।
फिर एक घोड़ा दिखाई दिया।
उस पर एक आदमी बैठा था।
वह बहुत धीरे-धीरे उनकी तरफ आ रहा था।
कुछ ही क्षण बाद वह इतना पास आ गया कि उसका चेहरा दिखाई देने लगा।
कार्टर ने हाथ उठाकर उसे रोकने का संकेत किया।
घुड़सवार रुक गया।
तीनों सैनिक उसे देखने लगे।
उसके कपड़े पुराने थे—इतने पुराने कि वे उस इलाके के किसी सामान्य यात्री जैसे नहीं लग रहे थे।
कार्टर ने पूछा,
"कहाँ जा रहे हो?"
घुड़सवार ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह बस उन्हें देखता रहा।
फिर उसने अपना हाथ उठाया।
पीछे की तरफ इशारा किया।
जिस रास्ते से वे आए थे।
मिलर ने धीमे स्वर में कहा,
"क्या यह हमें वापस जाने को कह रहा है?"
कार्टर ने घुड़सवार की ओर देखा।
"क्यों?"
इस बार भी कोई उत्तर नहीं मिला।
घुड़सवार ने फिर पीछे की ओर इशारा किया।
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
कार्टर ने लगाम सीधी की।
"हमारे पास रुकने का समय नहीं है।"
वह आगे बढ़ने लगा।
मिलर उसके पीछे चल पड़ा।
विल्सन कुछ पल वहीं रुका रहा।
उसे घुड़सवार की आँखों में कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।
फिर उसने घोड़े को एड़ी लगाई।
तीनों आगे निकल गए।
कुछ दूर जाने के बाद मिलर ने पीछे मुड़कर देखा।
घुड़सवार अब भी उसी जगह खड़ा था।
लेकिन अगले ही क्षण…
वह वहाँ नहीं था।
मिलर ने घोड़ा रोक दिया।
कार्टर ने पूछा,
"क्या हुआ?"
मिलर ने पीछे देखा।
"वह आदमी…"
वह वाक्य पूरा नहीं कर पाया।
जहाँ कुछ क्षण पहले घोड़ा और सवार खड़े थे, वहाँ अब केवल खाली रास्ता था।
कार्टर ने घोड़ा मोड़ा।
तीनों वापस उसी जगह पहुँचे।
मिट्टी पर उनके अपने घोड़ों के निशान साफ थे।
लेकिन उस अजनबी घोड़े के…
एक भी निशान नहीं था।
कार्टर कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने जंगल की ओर देखा।
दूर कहीं से एक बार फिर टाप सुनाई दी।
ठक... ठक...
इस बार आवाज उनके पीछे से आई थी।
कार्टर ने धीरे-धीरे घोड़ा पीछे मोड़ा।
मिलर और विल्सन भी उसके साथ मुड़ गए।
तीनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।
जंगल फिर शांत था।
अभी जो आवाज सुनाई दी थी, उसका कोई निशान नहीं था।
कार्टर ने चारों तरफ देखा।
"चलो।"
वह आगे बढ़ा।
लेकिन इस बार घोड़ों की चाल पहले जैसी नहीं थी।
तीनों घोड़े बार-बार पीछे देखने लगे।
कुछ दूर जाने के बाद टाप फिर सुनाई दी।
ठक... ठक... ठक...
मिलर ने पीछे देखा।
आवाज फिर बंद।
कार्टर ने घोड़ा नहीं रोका।
कुछ ही देर बाद वही टाप दोबारा सुनाई दी।
इस बार बिल्कुल उनके पीछे।
मिलर ने पिस्तौल निकाल ली।
"वह हमारा पीछा कर रहा है।"
कार्टर ने कहा,
"देखो मत। चलते रहो।"
वे आगे बढ़ते रहे।
लेकिन टापों की आवाज भी उनके साथ चलती रही।
वे जितना आगे जाते—
आवाज उतनी ही पीछे रहती।
कभी दूर।
कभी इतनी पास कि लगता जैसे कोई घोड़ा उनके बिल्कुल पीछे दौड़ रहा हो।
फिर अचानक सब शांत हो गया।
विल्सन ने राहत की सांस ली।
"शायद चला गया।"
कार्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसी समय सामने पेड़ों के बीच हल्की रोशनी दिखाई दी।
मिलर ने कहा,
"आग?"
कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।
दूर एक खुली जगह थी।
वहाँ किसी ने छोटा-सा अलाव जलाया हुआ था।
और उसके पास एक घोड़ा बंधा था।
तीनों ने एक-दूसरे को देखा।
कार्टर ने सावधानी से आगे बढ़ने का फैसला किया।
वे खुले स्थान तक पहुँचे।
अलाव जल रहा था।
लेकिन वहाँ कोई आदमी नहीं था।
मिलर घोड़े के पास गया।
उसने उसे देखा और अचानक पीछे हट गया।
"कार्टर..."
कार्टर आगे आया।
घोड़ा शांत खड़ा था।
उसकी पीठ पर पुरानी काठी बंधी थी।
काठी के चमड़े पर कुछ धब्बे थे।
गहरे भूरे।
कार्टर ने हाथ लगाया।
सूखा हुआ खून।
विल्सन ने तुरंत पीछे देखा।
"यह किसका घोड़ा है?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
अलाव के पास मिट्टी में कुछ पड़ा था।
एक पुरानी धातु की चीज।
कार्टर ने उसे उठाया।
वह एक सैनिक की छोटी-सी पहचान-पट्टी जैसी थी।
उस पर कुछ अक्षर खुदे थे।
कार्टर ने मशाल की रोशनी में उन्हें पढ़ने की कोशिश की।
अचानक मिलर ने कहा,
"यह अंग्रेजी नाम है।"
कार्टर ने फिर देखा।
धातु पर नाम था—
WILLIAM CARTER
कार्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने पट्टी हाथ से गिरा दी।
मिलर और विल्सन उसे देखते रह गए।
"लेकिन..." विल्सन की आवाज काँप गई।
"आपका नाम भी यही है।"
कार्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने अपनी जेब से अपनी पहचान-पट्टी निकाली।
दोनों को पास रखकर देखा।
नाम वही था।
लेकिन पुरानी पट्टी पर नीचे एक तारीख खुदी थी।
कार्टर ने मशाल करीब की।
वह तारीख…
सैंतीस वर्ष पुरानी थी।
अचानक जंगल में घोड़े की तेज हिनहिनाहट गूँजी।
तीनों चौंककर पीछे मुड़े।
वही घोड़ा, जो कुछ क्षण पहले अलाव के पास खड़ा था—
अब वहाँ नहीं था।
रस्सी जमीन पर पड़ी थी।
कार्टर ने तुरंत कहा,
"चलो। अभी।"
तीनों घोड़ों पर सवार हुए।
अब उन्हें बाराबंकी पहुँचना जरूरी नहीं लग रहा था।
अब उन्हें केवल उस जंगल से बाहर निकलना था।
वे पूरी गति से आगे बढ़े।
कुछ मिनट बाद रास्ता फिर दो हिस्सों में बँट गया।
कार्टर ने दाईं तरफ मोड़ लिया।
कुछ देर बाद विल्सन ने कहा,
"सर..."
कार्टर ने उसकी ओर देखा।
"यह वही जगह है।"
कार्टर ने आसपास देखा।
एक पेड़ की जड़ के पास पत्थर पड़ा था।
उस पर चाकू से बनाया गया वही निशान था जो उन्होंने करीब आधे घंटे पहले देखा था।
वे घूमकर फिर उसी जगह आ गए थे।
मिलर ने घबराकर कहा,
"यह संभव नहीं है।"
कार्टर ने घोड़ा रोक दिया।
उसने नक्शा निकाला।
नक्शे में रास्ता सीधा था।
लेकिन उनके सामने वही दो रास्ते थे।
और तभी…
पीछे से घोड़े की टाप सुनाई दी।
ठक... ठक... ठक...
इस बार आवाज
सीधे उनके पीछे से आई
तीनों ने एक साथ पीछे देखा।
पेड़ों के बीच वही घुड़सवार खड़ा था।
लेकिन अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।
वह आदमी…
कार्टर को घूर रहा था।
कार्टर ने पिस्तौल निकाल ली।
"तुम कौन हो?"
घुड़सवार ने पहली बार अपना मुँह खोला।
उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
"तुम्हें… यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
कार्टर का चेहरा बदल गया।
क्योंकि वह आवाज…
उसे पहले भी सुनाई दे चुकी थी।
सालों पहले।
जब वह बच्चा था।
अपने पिता के पुराने सैन्य संदूक में उसे एक डायरी मिली थी।
उस डायरी में एक सैनिक का वर्णन था जो इसी इलाके में जंगल के भीतर गायब हो गया था।
उस सैनिक का नाम था—
विलियम कार्टर।
कार्टर ने घुड़सवार की तरफ देखा।
उसके हाथ से पिस्तौल लगभग छूट गई।
"तुम..."
घुड़सवार ने धीरे से सिर उठाया।
अब उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जिसे देखकर मिलर और विल्सन पीछे हट गए।
उसका चेहरा बिल्कुल कार्टर जैसा था—न उम्र में कोई फर्क था, न चेहरे में; वही वर्दी और वही निशान भी उसके चेहरे पर मौजूद था।
जो कार्टर के अपने चेहरे पर था।
घुड़सवार ने कहा—
"मैंने भी यही रास्ता चुना था।"
फिर उसने जंगल की तरफ देखा।
"और मैं भी… अंधेरा होने से पहले बाहर निकलना चाहता था।"
अचानक हवा तेज हो गई।
अलाव की बुझी हुई गंध उनके चारों ओर फैल गई।
कार्टर ने एक कदम पीछे लिया।
"तुम मर चुके हो।"
घुड़सवार ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
कुछ पल खामोशी रही।
फिर उसने हाथ उठाकर जंगल के भीतर इशारा किया।
"लेकिन मैं अकेला नहीं मरा था।"
उसके पीछे पेड़ों के बीच…
एक-एक करके तीन और घोड़ों की आकृतियाँ दिखाई देने लगीं।
उन पर बैठे तीन सैनिक।
और उन तीनों के चेहरे…
मृत थे।
विल्सन चीख पड़ा।
घोड़े बेकाबू हो गए।
कार्टर ने लगाम खींची।
उसी क्षण सामने खड़ा घुड़सवार धुंध में घुलने लगा।
उसकी आखिरी आवाज जंगल में गूँजी—
"बाराबंकी जाने वाला रास्ता उधर नहीं है..."
कार्टर ने सामने देखा।
जहाँ कुछ क्षण पहले रास्ता था…
वहाँ अब केवल घना जंगल था।
और दूसरी तरफ—
एक पुराना रास्ता दिखाई दे रहा था।
वही रास्ता…
जिस पर उन्होंने शुरुआत में जाने से इनकार किया था।
कार्टर ने कुछ नहीं सोचा।
उसने घोड़े को उसी दिशा में दौड़ा दिया।
मिलर और विल्सन उसके पीछे थे।
पीछे से फिर टापें सुनाई दीं।
लेकिन इस बार…
वे उनका पीछा नहीं कर रही थीं।
वे उनके साथ दौड़ रही थीं।
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| बाराबंकी पहुँचने के बाद एक पुरानी डायरी ने उस रहस्यमय घुड़सवार से जुड़ा अठारह साल पुराना राज खोल दिया। |
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| बाराबंकी पहुँचने के बाद एक पुरानी डायरी ने उस रहस्यमय घुड़सवार से जुड़ा अठारह साल पुराना राज खोल दिया। |







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