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| रात का वो स्टेशन, जहाँ सन्नाटा इतना भारी था कि हर परछाईं डराने लगी। |
मेरा नाम अमित देशमुख है।
उस समय मेरी उम्र 32 साल थी और मैं नागपुर की एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में साइट सुपरवाइज़र के तौर पर काम करता था।
काम की वजह से मुझे अक्सर छोटे शहरों और कस्बों में जाना पड़ता था,
जहाँ ट्रेनें कम रुकती हैं और सुविधाएँ उससे भी कम होती हैं।
ये घटना उसी दौर की है,
जब एक साइट मीटिंग के लिए
मुझे अकेले रात में सफ़र करना पड़ा
और एक अनजान रेलवे स्टेशन पर रुकना मेरी मजबूरी बन गई।
उस दिन मुझे भंडारा ज़िले के पास एक छोटे कस्बे में पहुँचना था।
सीधी ट्रेन नहीं थी,
बीच में एक स्टेशन पर उतरकर
सुबह की पैसेंजर ट्रेन पकड़नी थी।
मेरी ट्रेन रात 12:20 पर उस स्टेशन पर रुकी।
स्टेशन छोटा था,
नाम का बोर्ड आधा टूटा हुआ,
और चारों तरफ़ अजीब-सी ख़ामोशी।
प्लेटफॉर्म पर
दो कुली सो रहे थे,
एक चाय की दुकान बंद पड़ी थी,
और स्टेशन मास्टर का कमरा ही रोशन दिख रहा था।
मैंने स्टेशन मास्टर से कहा,
“सुबह की ट्रेन यहीं से पकड़नी है,
रुकने की कोई जगह होगी क्या?”
वो कुछ सेकंड मुझे देखता रहा,
फिर बोला,
“Waiting room तो सालों से बंद है…
पर एक पुराना कमरा है।
अगर चाहो तो वहीं बैठ सकते हो।”
उसके बोलने के लहजे में
एक झिझक थी।
मैं थका हुआ था।
सुबह की मीटिंग दिमाग़ में घूम रही थी।
मैंने ज़्यादा सवाल नहीं किए।
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| प्लेटफॉर्म के आख़िर में मौजूद वो कमरा, जिसे रात में कोई खोलने की हिम्मत नहीं करता। |
वो कमरा
प्लेटफॉर्म के बिलकुल आख़िरी सिरे पर था।
वहाँ पहुँचते ही लगा
जैसे स्टेशन वहीं खत्म हो जाता हो।
दरवाज़ा खोलते ही
सीलन और पुराने लकड़ी की गंध आई।
अंदर —
एक लंबी लकड़ी की बेंच
दीवार पर पीले दाग
एक पंखा, जो सालों से नहीं चला होगा
और एक बल्ब, जिसकी रोशनी डर को छुपाने के लिए काफी नहीं थी
स्टेशन मास्टर ने कहा,
“अंदर से कुंडी लगा लेना।”
मैंने दरवाज़ा बंद किया।
कुंडी पहले से लगी हुई थी।
मैंने सोचा —
शायद पहले किसी ने लगा दी होगी।
करीब 1:10 बजे
मैं बेंच पर लेटा था।
तभी
मुझे लगा जैसे
दीवार के अंदर से
कोई बहुत धीमी आवाज़ आ रही हो।
ठक… ठक… ठक…
ऐसी आवाज़
जैसे कोई
बंद जगह में
कुछ कहने की कोशिश कर रहा हो।
मैं उठा।
दीवार पर कान लगाया।
आवाज़ रुक गई।
मैंने खुद को समझाया —
पुरानी बिल्डिंग है,
रात में आवाज़ें आती हैं।
पर कुछ देर बाद
वही आवाज़
फिर उसी जगह से।
🔸
करीब 2 बजे
पंखा अचानक चल पड़ा।
मैं झटके से उठा।
स्विच OFF था।
पंखा कुछ सेकंड चला
फिर रुक गया।
उसी पल
बाहर से
किसी के सीटी बजाने की आवाज़ आई।
ट्रेन नहीं थी।
कोई प्लेटफॉर्म पर नहीं था।
अब बेचैनी साफ़ थी।
🔸
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| वो परछाईं… जो किसी इंसान की नहीं थी, लेकिन साफ़ दिखाई दे रही थी। |
जब मैं वापस अंदर आया
तो दीवार पर
एक परछाईं दिखी।
मैं हिला।
परछाईं नहीं हिली।
मैंने लाइट जलाई।
परछाईं गायब।
लाइट बंद की।
परछाईं फिर वहीं।
अब ये भ्रम नहीं लग रहा था।
🔹
सुबह 4 बजे
मैं बाहर निकला।
प्लेटफॉर्म पर
एक बुज़ुर्ग कुली बैठा था — रामू काका।
मैंने पूछा,
“काका, ये कमरा रात को इस्तेमाल क्यों नहीं होता?”
उसने मेरी तरफ़ देखा,
फिर कमरे की तरफ़।
धीरे बोला,
“तू रात वहीं था?”
मैंने हाँ कहा।
उसने जेब से
एक पुरानी, मुड़ी-तुड़ी फोटो निकाली।
“बीस साल पहले
इसी कमरे में
एक कर्मचारी
नाइट ड्यूटी में
बंद हो गया था।”
“दरवाज़ा बाहर से बंद था।
आग लग गई।”
“सुबह
जब खोला गया
तो…
दीवारों पर
नाखूनों के निशान थे।”
फोटो में
वही निशान साफ़ दिख रहे थे।
मैं ट्रेन में बैठ गया।
घर पहुँचकर
फोन चेक किया।
रात की एक audio recording
अपने-आप सेव हो गई थी।
उसमें
मेरी साँसों के बीच
एक आवाज़ थी —
“दरवाज़ा… बाहर से बंद था…”
आज भी
मैं छोटे स्टेशनों पर
रात रुकने से बचता हूँ।
क्योंकि कुछ जगहें
सिर्फ़ इमारत नहीं होतीं —
वो यादें सँभाल कर रखती हैं।
❓अब सवाल
अगर तुम अमित की जगह होते,
तो क्या उस कमरे में रुकते?
या तुम भी मानते हो
कि ये सब सिर्फ़ संयोग था?












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