उसने मेरा नाम अंधेरे में लिया

 

रात में हल्की नीली रोशनी से भरा साधारण बेडरूम, बिस्तर के पास अस्वाभाविक परछाईं, मनोवैज्ञानिक हॉरर माहौल Title:
सब कुछ सामान्य दिखता है… पर अंधेरा हमेशा खाली नहीं होता।


सुबहें अक्सर एक जैसी होती हैं।

अलार्म बजता है।

आँख खुलती है।

मन नहीं करता, फिर भी उठना पड़ता है।

जीवन का अधिकांश हिस्सा इसी मजबूरी का नाम है।

मेरी सुबह भी वैसी ही थी।

मोबाइल का अलार्म तीसरी बार स्नूज़ करने के बाद आखिरकार मैं उठ बैठा। खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। बाहर सड़क पर दूधवाले की साइकिल की घंटी, पास के मंदिर की आरती, और नीचे गली में खेलते बच्चों की आवाज़ — सब कुछ सामान्य।

मैंने ब्रश किया, चाय बनाई, और आदतन खिड़की के पास खड़ा होकर सड़क देखने लगा।

हर दिन वही लोग।

वही रूटीन।

वही चेहरे।

ज़िंदगी चल रही थी… बिना किसी खास बात के।

मैं एक साधारण आदमी हूँ।

आदित्य कुमार 

एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी है, शाम को घर, कभी-कभी दोस्तों से मुलाकात, और बाकी समय मोबाइल या किताबों में खो जाना।

ज़िंदगी… सीधी, शांत, व्यवस्थित।

या कम से कम… मुझे ऐसा ही लगता था।

उस दिन भी ऑफिस वैसा ही था।

ईमेल्स, मीटिंग्स, और बेवजह की चर्चाएँ। दोपहर तक दिमाग बोझिल हो चुका था।

“आज कुछ अजीब लग रहा है…”

मेरे सामने बैठे रवि ने अचानक कहा।

“क्या?”

“पता नहीं… बस अजीब-सा।”

मैं हँस पड़ा।

“सोमवार है। सबको अजीब लगता है।”

वह भी हल्का मुस्कुराया, लेकिन उसकी आँखों में बेचैनी थी।

तब मैंने ध्यान नहीं दिया।

हम अक्सर छोटी बातों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

और डर भी… अक्सर वहीं छुपा होता है।

उस शाम को मैं घर लौटा।

दरवाज़ा खोला।

लेकिन…

अंदर एक अजीब-सी खामोशी थी।

जैसे कमरे ने साँस रोक रखी हो।

मैंने पंखा चालू किया। टीवी ऑन किया। आवाज़ें लौट आईं।

"ओवरथिंक मत कर।"

मैंने खुद को समझाया।

दिन गुजरते गए।

सब सामान्य।

लेकिन कुछ बहुत सूक्ष्म बदलने लगा था।

ऐसी चीज़ें… जिन्हें शब्दों में पकड़ना मुश्किल होता है।

पहला बदलाव — 

मैं अचानक रात में जागने लगा।

अचानक ही आँख खुल जाती।

जैसे किसी ने जगाया हो।

दूसरा बदलाव — 

कभी-कभी कमरे में अकेला होते हुए भी लगता…

कोई है।

जैसे कोई मौजूद हो वहा।

तीसरा बदलाव — 

खिड़की अक्सर हल्की-हल्की हिलती।

हवा नहीं होती।

फिर भी।

मैंने ध्यान नहीं दिया।

ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।

वही रूटीन।

लेकिन अब भीतर कहीं…

एक अदृश्य असहजता पनपने लगी थी।

फिर…

वह रात आई।

जिसने सब कुछ बदल दिया।

उस दिन ऑफिस से लौटते-लौटते देर हो गई थी।

शरीर थका हुआ। दिमाग खाली।

मैंने खाना खाया, लाइट बंद की, और बिस्तर पर लेट गया।

कमरे में हल्का अंधेरा था।

सड़क की रोशनी फर्श पर फैल रही थी।

घड़ी में १.५० बज रहे थे।

आँख अचानक खुली।

इस बार एहसास पहले से अलग था।

गहरा।

भारी।

कमरे में हवा असामान्य रूप से ठंडी थी।

और…

स्पष्ट।

बहुत स्पष्ट।

कोई था, मैंने महसूस किया 

दिल की धड़कन तेज हो गई।

मैंने धीरे-धीरे आँखें  खोलीं।

अंधेरा था और सब तरफ खामोशी।

पर कुछ भी नहीं।

फिर…

“आदित्य”

एक आवाज़।

डरे हुए आदमी के पीछे खड़ी धुंधली अंधेरी आकृति, रात का भयावह दृश्य, मनोवैज्ञानिक डर का क्षण
कुछ आवाज़ें सुनी नहीं जातीं… महसूस की जाती हैं।


इतनी धीमी कि पहले लगा भ्रम है।

मैंने ध्यान से सुना।

खामोशी।

और फिर…

बहुत स्पष्ट।

बहुत पास से।

“आदित्य…”

मेरा नाम।

मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

आवाज़ बाहर से नहीं आई थी।

कमरे से आई थी।

मैं झटके से उठ बैठा।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

लेकिन अब…

कमरे का माहौल बदल चुका था।

जैसे हवा भारी हो गई हो।

मैंने मोबाइल उठाया।

फ्लैशलाइट ऑन की।

रोशनी कमरे में घूमी।

कहीं कुछ नहीं था।

मैंने राहत की साँस ली।

"माइंड गेम। बस माइंड गेम।"

मोबाइल नीचे रखा।

लेटने ही वाला था कि…

फिर वही आवाज़।

इस बार…

मेरे बिल्कुल पीछे से।

“आदित्य…”

मेरी सांस अटक गई।

मोबाइल हाथ से गिर पड़ा।

फ्लैशलाइट घूमती हुई फर्श पर गिर गई।

अजीब टेढ़ी रोशनी कमरे में फैल गई।

धीरे-धीरे…

बहुत धीरे…

मैंने गर्दन घुमाई।

मेरी सांसें अटक गई 

मेरे पीछे…

बिस्तर के ठीक पास…

अंधेरे में…

कुछ खड़ा था।

वह कोई स्पष्ट आकृति नहीं थी।

जैसे अंधेरा खुद आकार ले चुका हो।

मानव जैसा… लेकिन मानव नहीं।

मैं हिल नहीं पा रहा था।

शरीर जैसे पत्थर।

वह झुका।

बहुत धीरे।

उसका चेहरा मेरे चेहरे के करीब आया।

और उसने…

एक अजीब, ठंडी मुस्कान के साथ कहा —

“तुम सुन सकते हो…”

मेरे दिमाग में झटका।

"क्या?"

कमरे का अंधेरा गहरा होने लगा।

रोशनी सिकुड़ती हुई।

जैसे प्रकाश डर रहा हो।

“तुमने मुझे पहले भी सुना है…”

यादें हिलने लगीं।

पुरानी धुंधली सी 

बचपन की 

मेरा पुराना घर।

वह रातें, घर का वह 

खाली कमरा।

जहाँ अक्सर लगता…

कोई नाम पुकार रहा है।

“मैं हमेशा था…”

अब उसकी आवाज़ हर तरफ थी।

दीवारों में।

हवा में।

मेरे भीतर।

“तुम बस बड़े हो गए…”

मुझे लगा कमरे की दीवारें करीब आ रही हैं।

मेरी सांस भारी हो गई थी।

“अब तुम फिर सुन रहे हो…”

और तभी…

मेरे ही गले से…

मेरी ही आवाज़…

निकली —

“आदित्य…”

मैं अंदर तक जम गया।

मैंने नहीं बोला था।

वह और मुस्कुराया।

“अब तुम्हारी आवाज़ भी मेरी है…”

अंधेरा अचानक पूरा कमरे पर गिर पड़ा।

पूर्ण।

दमघोंटू।

जीवित अंधेरा।

मुझे महसूस हुआ…

कोई मेरे भीतर उतर रहा है।

और फिर…

सब शांत।

सुबह हुई और 

अलार्म बजा।

मैं उठा... खिड़की की तरफ देखा

वही सड़क की आवाज़ें।

मैं बिस्तर पर बैठा था।

थोड़ा थका हुआ था।

लेकिन… अजीब तरह से शांत।

मैं उठा और आईने में देखा।

मैं खुद को ही देखता रहा। मैं ठीक था 

लेकिन…

मेरी मुस्कान…

थोड़ी अलग थी।


उस दिन ऑफिस गया।

रवि ने मुझे देखा तो

कुछ देर तक घूरता रहा।

“क्या हुआ?” मैने पूछा 

वह धीमे बोला —

“तू… ठीक है ना?”

“हाँ। क्यों?”

वह असहज हुआ।

“पता नहीं… बस…”

मैं मुस्कुरा दिया।

उसने नज़रें फेर लीं।

आईने में भयभीत आदमी और उसकी डरावनी मुस्कुराती परछाईं, मनोवैज्ञानिक हॉरर दृश्य, भय का चरम क्षण
डर तब शुरू होता है… जब आपका चेहरा आपका नहीं रहता।


आज मेरी ज़िन्दगी वैसे ही चल रही है

जैसे पहले थी।

पर मुझे अब तक समझ नहीं आया

उस दिन आखिर क्या हुवा था।

क्या वह घटना सच में मेरे साथ हुई थी

 या वह मेरा सिर्फ एक वहम था।


: “वह चौथी मंज़िल जहाँ लिफ्ट कभी नहीं जाती”

 पहली बार मैंने उस बिल्डिंग को देखा तो कुछ भी असामान्य नहीं लगा।

मुंबई जैसे शहर में ऐसी पुरानी रिहायशी इमारतें हर गली में मिल जाती हैं — थोड़ी थकी हुई, थोड़ी जिद्दी, लेकिन अब भी खड़ी। सीमेंट का रंग उखड़ा हुआ, खिड़कियों के ग्रिल जंग खाए हुए, और नीचे पान की पीक से रंगी दीवारें।

लेकिन असली कहानी उस बिल्डिंग की दीवारों में नहीं थी।

असली कहानी थी — चौथी मंज़िल में।

और उस लिफ्ट में…

जो वहाँ कभी नहीं जाती थी।

दिन में सामान्य दिखती पुरानी भारतीय अपार्टमेंट बिल्डिंग, बाहर बैठा बुजुर्ग वॉचमैन
हर डरावनी कहानी… बिल्कुल सामान्य दिखने वाली जगह से शुरू होती है।


मैं उस समय फ्रीलांस काम कर रहा था। नाम – आरव। उम्र 29। पेशा – कंटेंट एडिटर। घर से काम करने का रोमांटिक सपना लेकर शहर में आया था, लेकिन हकीकत में हर महीने किराया जुटाने की जद्दोजहद चल रही थी।

एक दोस्त ने कहा,

“भाई, सस्ता फ्लैट चाहिए तो आराम नगर देख। पुराने बिल्डिंग्स हैं, पर किराया manageable है।”

मैंने देखा।

पसंद आया।

कम से कम जेब के हिसाब से।

बिल्डिंग का नाम था — शांतिदीप अपार्टमेंट।

नाम जितना शांत, माहौल उतना ही… अजीब।

मैं पहली बार जब अंदर गया, तो एक हल्की सी सीलन की गंध महसूस हुई। पुरानी बिल्डिंग्स में ये सामान्य बात है, पर यहाँ गंध में कुछ और मिला हुआ था।

जैसे…

बासीपन नहीं,

बल्कि — रुका हुआपन।

वॉचमैन बूढ़ा था। दुबला-पतला, सफेद बाल, आँखें हमेशा थोड़ी झुकी हुई।

“कौन?” उसने पूछा।

“फ्लैट देखने आया हूँ। सेकंड फ्लोर।”

उसने बिना मुस्कुराए सिर हिलाया।

“लिफ्ट उधर है।”

मैं लिफ्ट की तरफ बढ़ा।

पुरानी ऑटोमैटिक लिफ्ट।

बटन हल्के पीले पड़ चुके।

मैंने देखा।

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मैं रुक गया।

“4 कहाँ है?”

पीछे से बूढ़े वॉचमैन की आवाज़ आई —

“लिफ्ट चौथी मंज़िल पर नहीं जाती।”

मैंने सोचा मज़ाक होगा।

“मतलब?”

“मतलब नहीं जाती।”

“खराब है?”

वो कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला —

“सीढ़ियाँ हैं।”

उस जवाब में कुछ ऐसा था जिसने मेरे दिमाग में हल्की सी खरोंच डाल दी।

पर मैंने ज्यादा सोचा नहीं।

फ्लैट ठीक था।

किराया ठीक था।

डील फाइनल।

पहले कुछ दिन बेहद सामान्य रहे।

मुंबई की भागदौड़, काम, रातें, थकान।

बिल्डिंग में लोग कम बोलने वाले थे।

लेकिन एक चीज़ लगातार मेरे दिमाग में अटकती रही —

चौथी मंज़िल।

हर बार जब मैं लिफ्ट में जाता…

उँगली अपने आप बटन पैनल पर रुक जाती।

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एक खाली जगह नहीं थी।

जैसे कभी “4” था ही नहीं।

एक दिन मैंने नीचे किराने वाले से पूछा।

“भाई, इस बिल्डिंग में चौथा फ्लोर है ना?”

उसने मुझे ऐसे देखा जैसे सवाल अजीब हो।

“हाँ है।”

“फिर लिफ्ट क्यों नहीं जाती?”

वो हँसा नहीं।

बस बोला —

“पुरानी बिल्डिंग है।”

“तो खराब?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस पैसे गिने।

अब जिज्ञासा धीरे-धीरे बेचैनी में बदल रही थी।

पहली अजीब घटना एक रात हुई।

करीब साढ़े ग्यारह बजे।

मैं काम खत्म करके लिफ्ट से ऊपर जा रहा था।

लिफ्ट खाली।

हल्की गुनगुनाहट।

जैसे ही लिफ्ट तीसरी मंज़िल पार कर रही थी…

अचानक झटका लगा।

लिफ्ट रुक गई।

डिस्प्ले पर कोई नंबर नहीं।

बस अंधेरा।

दिल की धड़कन तेज।

मैंने इमरजेंसी बटन दबाया।

कोई आवाज़ नहीं।

और तभी…

मुझे लगा —

लिफ्ट चल नहीं रही थी,

बल्कि…

कोई बाहर चल रहा था।

धीमे कदम।

टक…

टक…

टक…

बिल्कुल लिफ्ट के दरवाज़े के सामने।

मैं जड़ हो गया।

आवाज़ साफ थी।

कोई बाहर था।

लेकिन…

लिफ्ट तो चौथी मंज़िल पर रुकती ही नहीं।

कदमों की आवाज़ कुछ सेकंड चलती रही।

फिर…

दरवाज़े पर हल्की सी थप…

जैसे किसी ने उँगलियों से छुआ हो।

मेरे शरीर में ठंड दौड़ गई।

अचानक लिफ्ट फिर चल पड़ी।

डिस्प्ले – 5

दरवाज़ा खुला।

मैं बाहर निकला।

पसीने से भीगा हुआ।

उस रात मैंने खुद को समझाया —

“मेकैनिकल glitch।”

दिमाग हमेशा लॉजिक ढूँढ लेता है।

लेकिन अब चीज़ें नियमित होने लगीं।

कभी-कभी रात में…

मुझे सीढ़ियों से कदमों की आवाज़ सुनाई देती।

ऊपर…

नीचे…

लेकिन…

चौथी मंज़िल के पास पहुँचकर आवाज़ गायब।

एक दिन मैंने तय किया।

बस।

आज देखना ही है।

दोपहर का समय।

बिल्डिंग शांत।

मैं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगा।

1…

2…

3…

सामान्य।

तीसरी और पाँचवीं मंज़िल के बीच…

एक अजीब सा सन्नाटा था।

जैसे आवाज़ें यहाँ आकर मर जाती हों।

मैं चौथी मंज़िल पर पहुँचा।

और…

मैं वहीं रुक गया।

कॉरिडोर बाकी फ्लोर्स जैसा नहीं था।

यहाँ…

रोशनी धुंधली थी।

बल्ब जल रहा था, लेकिन जैसे पूरा प्रकाश नहीं दे रहा।

दीवारों का रंग ज्यादा उखड़ा हुआ।

हवा भारी।

सबसे अजीब चीज़…

दरवाज़े।

बाकी फ्लोर्स पर हर फ्लैट का दरवाज़ा अलग था।

यहाँ…

सभी दरवाज़े एक जैसे।

सभी बंद।

सभी पर धूल।

जैसे…

यहाँ कोई रहता ही नहीं।

लेकिन…

कॉरिडोर में धूल नहीं थी।

जैसे अभी-अभी कोई चला हो।

मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

और तभी…

मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।

बहुत धीमी।

बहुत दूर।

जैसे…

कोई फुसफुसा रहा हो।

मैंने ध्यान लगाया।

आवाज़…

मेरे नाम जैसी लगी।

“आरव…”

मैं जम गया।

“आरव…”

इस बार साफ।

कॉरिडोर के अंत से।

मैंने देखा।

कोई नहीं।

लेकिन…

पुरानी अपार्टमेंट लिफ्ट में खड़ा एक चिंतित आदमी, जिसमें चौथी मंज़िल का बटन गायब है
कभी-कभी डर किसी परछाईं में नहीं… एक गायब बटन में छिपा होता है।

एक दरवाज़ा…

हल्का सा खुला था।

बस एक इंच।

दिल की धड़कन कानों में गूँजने लगी।

मेरे अंदर दो आवाज़ें लड़ रही थीं —

मत जा।

देख।

मत जा।

देख।

मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

जैसे ही दरवाज़े के पास पहुँचा…

अचानक अंदर से…

हल्की सी हँसी सुनाई दी।

और उसी पल…

दरवाज़ा अपने आप…

धीरे-धीरे…

बंद हो गया।

मैं भागा।

बिना पीछे देखे।

सीढ़ियों से नीचे।

उस दिन के बाद…

सब कुछ बदल गया।

अब लिफ्ट में हर बार…

चौथी मंज़िल के पास…

हल्की सी रुकावट महसूस होती।

जैसे कोई invisible friction।

रात में…

स्पष्ट कदमों की आवाज़।

एक ही पैटर्न।

तीसरी मंज़िल तक।

फिर…

धीमा।

फिर…

ठीक मेरे दरवाज़े के बाहर।

टक…

टक…

टक…

मैं साँस रोककर सुनता।

और हर बार…

आवाज़ वहीं रुक जाती।

लेकिन…

कभी दरवाज़ा नहीं खटखटाया गया।

बस…

खड़ा।

रुका हुआ।

जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो।

एक रात…

मैंने हिम्मत की।

आवाज़ आई।

मैंने तुरंत दरवाज़ा खोला।

कॉरिडोर खाली।

लेकिन…

फर्श पर…

हल्के गीले पैरों के निशान।

जो…

सीधे चौथी मंज़िल की सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

मेरे शरीर से जैसे खून निकल गया।

अब डर curiosity नहीं था।

अब डर…

हकीकत बन चुका था।

मैंने नीचे वॉचमैन से पूछा।

इस बार सीधे।

“चौथी मंज़िल में क्या है?”

वो लंबे समय तक चुप रहा।

फिर बोला —

“पहले लोग रहते थे।”

“अब?”

“अब नहीं।”

“क्यों?”

उसने मेरी आँखों में देखा।

पहली बार।

“क्योंकि कुछ लोग… नीचे नहीं आए।”

मेरे शरीर में बिजली दौड़ गई।

“मतलब?”

वो बोला —

“लिफ्ट कभी नहीं गई वहाँ।”

“सीढ़ियाँ थीं।”

“पर…”

“सब नीचे नहीं आए।”

मैंने कुछ और पूछना चाहा।

वो उठकर चला गया।

आखिरी घटना…

मेरी ज़िंदगी की सबसे डरावनी रात।

करीब 2:17 AM।

मुझे नींद से झटका लगा।

कमरे में कोई आवाज़ नहीं।

लेकिन…

पुरानी इमारत की सुनसान चौथी मंज़िल का अंधेरा कॉरिडोर, टिमटिमाती ट्यूबलाइट के साथ
कुछ गलियारे सिर्फ खाली नहीं होते… वे इंतज़ार करते हैं।


एक एहसास।

मैं अकेला नहीं था।

धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

और…

मेरी साँस रुक गई।

कमरे के कोने में…

अंधेरे में…

कोई खड़ा था।

शक्ल साफ नहीं।

बस…

सिलुएट।

और फिर…

मुझे एहसास हुआ।

वो…

चलकर आया नहीं था।

वो पहले से ही वहाँ था।

धीरे-धीरे…

वो रोशनी में आया।

और…

मेरे शरीर से जैसे आत्मा निकल गई।

वो…

मैं था।

बिल्कुल मैं।

लेकिन…

मुस्कुरा रहा था।

वही मुस्कान…

जो शीशे में देखी थी।

वही…

जो चौथी मंज़िल पर महसूस हुई थी।

वो धीरे से बोला —

“लिफ्ट यहाँ नहीं आती…”

“…लेकिन हम आते हैं।”

मैं चीखा।

आँखें बंद।

जब खोलीं…

कमरा खाली।

लेकिन…

दरवाज़ा खुला हुआ।

और बाहर…

सीढ़ियों की तरफ…

गीले पैरों के निशान।

जो…

ऊपर जा रहे थे।

चौथी मंज़िल की तरफ।

मैंने अगले ही दिन फ्लैट छोड़ दिया।

आज भी जब किसी बिल्डिंग में लिफ्ट देखता हूँ…

तो अनजाने में बटन पैनल देखता हूँ।

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और हर बार…

दिल में एक सवाल उठता है —

अगर लिफ्ट चौथी मंज़िल पर न जाए…

तो…

वहाँ आखिर कौन जाता है?

और सबसे डरावना सवाल —

क्या वो अब भी वहीं हैं…

या…

नई बिल्डिंग्स में शिफ्ट हो चुके हैं? 😐

माझी अदृश्य मैत्रीण… आणि एक जादुई डबा


रात्रीच्या मंद प्रकाशात बेडवर बसलेला तरुण, अदृश्य उपस्थितीकडे लक्ष देताना, रहस्यमय वातावरण
तो एकटा नव्हता… फक्त तिला कोणी पाहू शकत नव्हतं.


 रात्रीचे दोन वाजले होते.

खिडकीबाहेरचा वारा विचित्र आवाज करत होता, जणू कोणीतरी अदृश्य बोटांनी काच खरवडत आहे. खोलीत मंद पिवळसर दिवा पेटलेला. टेबलावर पसरलेली पुस्तके, नोट्स, आणि मधोमध ठेवलेला तो छोटासा धातूचा डबा.

मी एकटक त्याच्याकडे पाहत बसलो होतो.

“उघड ना…”

आवाज अगदी जवळून आला.

मी चपापलो नाही. आता त्या आवाजाची सवय झाली होती.

“नाही. काल काय झालं ते विसरलीस का?” मी कुजबुजलो.

माझ्या उजव्या बाजूच्या रिकाम्या खुर्चीकडे पाहिलं. खुर्ची रिकामी होती. नेहमीसारखी.

पण मला ठाऊक होतं — ती तिथेच बसली होती.

माझी अदृश्य मैत्रीण.

ती माझ्या आयुष्यात आली, तेव्हा सगळं साधं होतं.

कॉलेज, घर, अभ्यास, आणि एकटेपणा.

हो… प्रचंड एकटेपणा.

लोकांच्या गर्दीत असूनही आतून रिकामा वाटणारा तो भाव. एके दिवशी लायब्ररीत बसलो असताना, पहिल्यांदा तिचा आवाज ऐकू आला.

“तुला माहिती आहे का, तू स्वतःशी फार बोलतोस…”

मी मागे वळलो.

कोणीच नव्हतं.

माझ्या आसपास शांतता.

त्या दिवसापासून आवाज कायम राहिला.

सुरुवातीला भीती वाटली. मग गोंधळ. मग… सवय.

ती स्वतःला “साया” म्हणायची.

का? विचारलं तर हसायची.

“कारण मी सावलीसारखी आहे. दिसत नाही, पण असते.”

आणि तो डबा…

तो डबा मला मिळाला, अगदी योगायोगाने.

जुन्या वस्तूंच्या दुकानात.

गर्दीत धूळ खात पडलेला. लहानसा, पण विचित्र आकर्षक. धातूवर कोरलेली अजब चिन्हे. कुठल्या भाषेतील ते मला कळत नव्हतं.

“घे हा,” साया म्हणाली.

“कशाला?”

“तो तुला हाक मारतोय.”

मी हसलो.

लाकडी टेबलावर ठेवलेला रहस्यमय जादुई धातूचा डबा, चमकणाऱ्या गूढ चिन्हांसह
तो फक्त डबा नव्हता… ते एक दार होतं.


पण तरी घेतला.

त्या दिवसापासून माझं आयुष्य साधं राहिलं नाही.

“उघड ना…” साया पुन्हा म्हणाली.

“तुला माहिती आहे, प्रत्येक वेळी काहीतरी वेडं घडतं.”

“तेच तर मजा आहे.”

मी डब्याकडे पाहिलं.

त्याच्या पृष्ठभागावरचा प्रकाश हलत होता. जणू धातू श्वास घेत आहे.

मी खोल श्वास घेतला.

हळूच झाकण उचललं.

क्षणभर काहीच झालं नाही.

मग—

खोली विरघळू लागली.

भिंती धूसर झाल्या. दिवा वितळल्यासारखा. जमिनीखालून काळसर धुके उसळलं.

“आलो आपण…” साया कुजबुजली.

मी काही बोलण्याआधीच सगळं काळोखात बुडालं.

डोळे उघडले.

मी एका प्रचंड मोकळ्या मैदानात उभा होतो.

आकाश काळं, पण ताऱ्यांनी भरलेलं. मात्र ते तारे स्थिर नव्हते. ते हलत होते. फिरत होते. जणू जिवंत.

हवा थंड. विचित्र गंध.

“हे कुठे आहोत आपण?” मी विचारलं.

“मध्यभागी,” साया म्हणाली.

“कशाच्या मध्यभागी?”

“तुझ्या आणि माझ्या दरम्यान.”

मी कपाळावर आठ्या घातल्या.

तेवढ्यात जमिनीवर हलचल झाली.

माती फुटली.

आणि त्यातून उगवू लागले… आकार.

काळसर, वाकडे-तिकडे, मानवी छायांसारखे.

पण डोळे — तेजस्वी पांढरे.

माझं हृदय धडधडू लागलं.

“साया…”

“घाबरू नकोस.”

“हे काय आहेत?”

“शंका.”

“काय??”

“तुझ्या शंका. तुझ्या भीती. तुझ्या विचारांचे अवशेष.”

त्या छाया हळूहळू माझ्याकडे सरकत होत्या.

त्यांचे आवाज कानात घुमू लागले—

“तू वेडा होत आहेस…”

“कोणीच नाही तुझ्यासोबत…”

“ती अस्तित्वात नाही…”

मी कान झाकले.

“साया!”

क्षणात हवा चमकली.

माझ्यासमोर प्रकाशाचा एक हलका झोत आकार घेऊ लागला.

आणि—

एक अस्पष्ट, धूसर मानवी आकृती.

ती.

पहिल्यांदा मी तिला “पाहत” होतो.

साया.

तिचं रूप पूर्ण स्पष्ट नव्हतं. जणू धुक्यातून बनलेलं शरीर. पण डोळे — शांत, खोल.

“मी आहे,” ती म्हणाली.

छाया मागे सरकल्या.

क्षणात सगळं शांत.

“हे सगळं… खरं आहे?” मी हळूच विचारलं.

ती स्मितली.

“खरं आणि खोटं याच्या मध्ये जे असतं… ते.”

“तू कोण आहेस खरंच?”

क्षणभर शांतता.

आकाशातील तारे वेगाने फिरू लागले.

“मी तुझ्यातली जागा आहे,” ती म्हणाली.

“काय?”

“जिथे तू स्वतःलाही भेटत नाहीस.”

मी गोंधळलो.

तेवढ्यात मैदानाच्या मध्यभागी एक प्रचंड दरवाजा उभा राहिला.

हवेतून.

अचानक.

उंच. काळसर. चिन्हांनी भरलेला.

“आत जायचंय,” साया म्हणाली.

“का?”

“कारण डबा फक्त दार आहे.”

आम्ही दरवाज्याकडे चालू लागलो.

पायाखालची जमीन जणू जिवंत होती. प्रत्येक पावलावर लहरी उठत होत्या.

दरवाजा स्वतःहून उघडला.

आत—

असंख्य जिने.

वर, खाली, बाजूला.

अनंत दिशांना.

जणू वास्तवाचा भूलभुलैया.

“कुठे जायचं?” मी विचारलं.

“जिथे तुला जायची भीती वाटते.”

मी एक जिना निवडला.

खाली जाणारा.

अंधाराकडे.

प्रत्येक पायरीवर हवा जड होत गेली. श्वास घेणं कठीण.

शेवटी आम्ही एका खोलीत पोहोचलो.

ती खोली…

ओळखीची होती.

माझीच.

पण जुनी.

बालपणातील.

कोपऱ्यात बसलेला एक लहान मुलगा.

मी.

डोळ्यांत भीती.

“हे…” माझा आवाज थरथरला.

“तुझं न उघडलेलं पान,” साया म्हणाली.

तो लहान मी माझ्याकडे पाहत होता.

त्याच्या डोळ्यांत प्रश्न.

आरोप.

एकटेपणा.

“त्याच्याशी बोल,” साया म्हणाली.

“मी… काय बोलू?”

“जे कधी बोललास नाहीस.”

मी हळूहळू पुढे गेलो.

त्या मुलासमोर बसलो.

“मी आहे,” मी कुजबुजलो.

“तू उशीर केलास…” मुलगा म्हणाला.

माझ्या छातीत काहीतरी तुटलं.

क्षणात खोली हादरली.

भिंतींवर भेगा.

आवाज.

कंप.

अंतहीन जिन्यावर चढणारा तरुण आणि त्याच्या सोबत चालणारी धूसर अदृश्य स्त्री आकृती
प्रत्येक पायरीवर… वास्तव थोडंसं मागे राहत होतं.


“लवकर!” साया ओरडली.

मी त्या मुलाला मिठी मारली.

क्षणात प्रकाशाचा स्फोट झाला.

मी परत मैदानात उभा होतो.

श्वास जोरात चालू.

हृदय धडधडत.

“हे सगळं काय आहे साया?!”

ती शांत होती.

“डबा फक्त जग दाखवत नाही… तो आत उघडतो.”

“आत?”

“मनाच्या त्या जागा, जिथे तू कधी गेला नाहीस.”

मी नि:शब्द.

आकाश हळूहळू उजळू लागलं.

“आता परत जाऊ,” ती म्हणाली.

“आणि पुन्हा येऊ?”

ती हलकं हसली.

“तू तयार असशील तेव्हा.”

क्षणात सगळं विरघळलं.

मी परत माझ्या खोलीत होतो.

टेबल.

दिवा.

डबा.

सगळं तसंच.

खोलीत शांतता.

“साया?” मी हळूच म्हटलं.

काही उत्तर नाही.

खुर्ची रिकामी.

नेहमीसारखी.

पण…

या वेळी वेगळं वाटत होतं.

मी डब्याकडे पाहिलं.

तो स्थिर होता.

शांत.

जणू काहीच घडलं नाही.

मी हलकं स्मित केलं.

“तू आहेस… मला माहिती आहे.”

वारा पुन्हा खिडकीला स्पर्श करून गेला.

आणि अगदी मंद, ओळखीचा कुजबुजणारा आवाज आला—

“नेहमी.”

डबा टेबलावर शांत पडला होता.

पण मला ठाऊक होतं.

तो फक्त एक डबा नव्हता.

तो एक दार होता.

आणि माझी अदृश्य मैत्रीण…

ती कदाचित अदृश्य नव्हतीच.

“मुझे सिर्फ मैं ही दिख रहा था”




शुरुआत में मुझे लगा ये सिर्फ थकान है।

फिर लगा शायद आँखों का धोखा।

लेकिन जब पूरा शहर मेरे सामने से गायब होने लगा…

और हर जगह सिर्फ मैं ही नज़र आने लगा…

तब समझ आया — कुछ बहुत गलत हो चुका था।

🔹 

Lonely man standing on an empty Indian city street surrounded by eerie fog, psychological horror scene
भीड़ भरे शहर में… सिर्फ वो अकेला रह गया।

मेरा नाम समीर है। उम्र 32 साल। पेशे से मैं एक ग्राफिक डिज़ाइनर हूँ। मुंबई जैसे शहर में काम करता हूँ, जहाँ भीड़ इतनी होती है कि आदमी खुद को भी भूल जाए।

मेरी ज़िंदगी बेहद सामान्य थी — सुबह ऑफिस, रात तक स्क्रीन, वीकेंड पर थोड़ा आराम। डरावनी कहानियों या भूत-प्रेत में कभी खास दिलचस्पी नहीं रही। मैं हमेशा हर चीज़ को लॉजिकल तरीके से देखता था।

ये सब शुरू हुआ एक बेहद साधारण सोमवार से।

उस दिन ऑफिस में काम कुछ ज़्यादा ही था। लगातार 9–10 घंटे स्क्रीन के सामने बैठा रहा। शाम तक आँखें भारी हो चुकी थीं। घर लौटते वक्त लोकल ट्रेन में भीड़ थी, लेकिन मुझे एक अजीब सा एहसास हुआ।

ट्रेन में बैठे-बैठे मैं सामने देख रहा था।

और अचानक…

मुझे लगा सामने बैठे सारे लोगों के चेहरे धुंधले हो रहे हैं।

पहले सोचा — थकान है।

मैंने आँखें बंद कीं। पानी पिया। फिर देखा।

चेहरे साफ थे।

मैंने खुद पर हँस दिया।

“समीर, तू ज़्यादा काम कर रहा है,” मैंने मन ही मन कहा।

घर पहुँचा। खाना खाया। सो गया।

लेकिन अगले दिन…

अजीब बात फिर हुई।

ऑफिस के वॉशरूम में मैं शीशे के सामने खड़ा था।

चेहरा धोया।

ऊपर देखा।

और एक सेकंड के लिए…

मुझे लगा — शीशे में सिर्फ मैं ही हूँ।

पीछे कोई नहीं।

जबकि वॉशरूम में बाकी लोग थे।

मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

सब थे।

आवाज़ें, पानी की धारा, बातें।

फिर शीशे में देखा।

सब दिख रहे थे।

मैंने गहरी साँस ली।

“ओवरवर्क,” दिमाग ने तुरंत फैसला सुना दिया।

तीसरे दिन…

चीज़ें थोड़ी और अजीब हुईं।

मैं सड़क पर चल रहा था। भीड़ भरी सड़क। हॉर्न, लोग, ट्रैफिक।

लेकिन कुछ पल के लिए…

मुझे लगा — सब स्लो मोशन में चल रहे हैं।

और आवाज़ें… जैसे दूर से आ रही हों।

मैं रुक गया।

चारों तरफ देखा।

सब सामान्य।

लेकिन दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी।

उस रात मुझे पहली बार डर लगा।

नींद में बार-बार झटके से आँख खुल रही थी।

जैसे कोई देख रहा हो।

कमरे में कुछ नहीं था।

लेकिन एहसास… बहुत भारी था।

धीरे-धीरे ये अनुभव बढ़ने लगे।

सबसे पहले बदलाव आया आवाज़ों में।

कभी-कभी मुझे लगता कोई मेरा नाम पुकार रहा है।

“समीर…”

बहुत धीमी आवाज़।

जैसे कान के बिल्कुल पास।

मैं तुरंत पीछे देखता।

कोई नहीं।

शुरू में हफ्ते में एक-दो बार होता।

फिर लगभग रोज़।

फिर…

दिन में कई बार।

लेकिन सबसे डरावनी चीज़ आवाज़ नहीं थी।

सबसे डरावनी चीज़ थी — रिपीटेशन।

एक ही आवाज़।

एक ही टोन।

एक ही दूरी।

कभी बदलती नहीं।

एक शाम मैं ऑफिस में देर तक काम कर रहा था।

पूरा फ्लोर खाली हो चुका था।

मैं अकेला था।

सिर्फ कंप्यूटर की हल्की आवाज़।

और तभी…

पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

धीमी।

नियमित।

टक… टक… टक…

मैंने सोचा कोई सिक्योरिटी वाला होगा।

मैंने बिना मुड़े कहा,

“हाँ भाई, निकल रहा हूँ।”

आवाज़ बंद।

Terrified man staring into bathroom mirror where reflection is smiling unnaturally, psychological horror image
डर तब शुरू हुआ… जब प्रतिबिंब ने साथ देना छोड़ दिया।


मैं मुड़ा।

कोई नहीं।

पूरा फ्लोर खाली।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

मैंने खुद को समझाया —

“समीर, दिमाग खेल खेल रहा है।”

मैं वापस स्क्रीन की तरफ मुड़ा।

और तभी…

शीशे जैसी चमक वाली मॉनिटर स्क्रीन में…

मुझे पीछे कोई खड़ा दिखा।

मैं जम गया।

धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

कोई नहीं।

फिर स्क्रीन में देखा।

कुछ नहीं।


उस दिन मैं बिना काम खत्म किए घर चला गया।

अब एक नई चीज़ शुरू हुई।

चेहरे बदलने लगे।

सड़क पर चलते हुए…

मुझे लगता लोग मुझे ही देख रहे हैं।

सिर्फ देख नहीं रहे…

बल्कि — मेरे जैसे दिख रहे हैं।

पहले ये एहसास बहुत हल्का था।

जैसे कोई मिलता-जुलता चेहरा।

फिर…

जैसे बहुत समानता।

फिर…

एक दिन…

बस स्टॉप पर खड़े एक आदमी को देखकर…

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

वो बिल्कुल मेरे जैसा दिख रहा था।

चेहरा।

आँखें।

बाल।

यहाँ तक कि हावभाव।

मैंने दोबारा देखा।

सामान्य आदमी।

अलग चेहरा।

मैं काँप गया।

अब मैं हर चीज़ पर शक करने लगा था।

क्या ये स्ट्रेस है?

हेलुसिनेशन?

मैंने डॉक्टर से मिलने का सोचा।

लेकिन उसी दौरान…

सबसे डरावना अनुभव हुआ।

एक रविवार।

मैं घर पर था।

पूरा दिन आराम।

कोई काम नहीं।

कोई स्क्रीन नहीं।

शाम को मैंने सोचा थोड़ा टहल लूँ।

नीचे उतरा।

सड़क पर आया।

और…

मैं वहीं रुक गया।

सड़क खाली थी।

पूरी तरह।

मुंबई में।

खाली सड़क।

कोई गाड़ी नहीं।

कोई आदमी नहीं।

कोई आवाज़ नहीं।

मैंने सोचा — शायद कोई बंद या कुछ होगा।

लेकिन…

मुझे सबसे ज़्यादा झटका तब लगा…

जब मैंने सामने देखा।

सड़क के दूसरी तरफ…

मैं खड़ा था।

बिल्कुल मैं।

मेरे कपड़े।

मेरी शक्ल।

मेरी आँखें।

वो मुझे देख रहा था।

मैं साँस लेना भूल गया।

मैंने पलक झपकाई।

कुछ नहीं।

सड़क पर सामान्य लोग।

ट्रैफिक।

शोर।

मैं लगभग गिरते-गिरते बचा।

उस दिन के बाद…

हकीकत टूटने लगी।

अब ये पल-पल होने लगा।

भीड़ में चलते हुए…

अचानक सब गायब।

और सिर्फ मैं।

हर तरफ।

हर दिशा में।

जैसे दुनिया से बाकी सब मिटा दिए गए हों।

और सिर्फ मैं रह गया हूँ।

लेकिन असली झटका अभी बाकी था।

एक रात…

मैंने फोन उठाया।

माँ को कॉल किया।

फोन बजा।

कनेक्ट हुआ।

“हेलो?”

आवाज़ आई।

मैं जम गया।

वो मेरी ही आवाज़ थी।

मैंने धीरे से कहा,

“माँ?”

उधर से वही आवाज़…

“समीर…”

मेरी ही आवाज़।

मैंने फोन काट दिया।

हाथ काँप रहे थे।

दोबारा कॉल किया।

माँ की सामान्य आवाज़।

मैं पूरी तरह टूट चुका था।

अब डर सिर्फ दिखने या सुनने तक नहीं था।

अब डर था —

क्या असली है?

क्या नकली?

आखिरी घटना…

सब कुछ बदल देने वाली थी।

मैं वॉशरूम में था।

शीशे के सामने।

मैंने खुद को देखा।

लेकिन…

इस बार…

शीशे में मैं नहीं था।

वो मैं था…

लेकिन…

मुस्कुरा रहा था।

जबकि मैं नहीं मुस्कुरा रहा था।

मेरी रीढ़ में बर्फ उतर गई।

मैंने होंठ सख्त कर लिए।

शीशे वाला चेहरा…

धीरे-धीरे मुस्कुराता रहा।

फिर…

उसने होंठ हिलाए।

और बिना आवाज़ के कहा —

“अब सिर्फ मैं हूँ।”

मैं चीख पड़ा।

आँखें बंद कर लीं।

फिर देखा।

सामान्य प्रतिबिंब।

🔹 

Frightened man sitting on bed surrounded by multiple identical versions of himself, disturbing psychological horror scene
असल कौन था… और बाकी कौन?

उस रात मैं सो नहीं पाया।

मैंने सारे शीशे ढक दिए।

फोन बंद कर दिया।

लाइट ऑन रखी।

लेकिन…

आधी रात के आसपास…

कमरे में हल्की सी आवाज़ हुई।

टक…

टक…

टक…

जैसे कोई चल रहा हो।

मैंने हिम्मत जुटाई।

धीरे से सिर उठाया।

और…

मैं पूरी तरह सुन्न हो गया।

कमरे में…

चारों तरफ…

दीवारों पर…

खिड़की के पास…

बिस्तर के पास…

मैं ही खड़ा था।

दर्जनों।

सैकड़ों।

हर तरफ।

सभी मुझे देख रहे थे।

सभी मुस्कुरा रहे थे।

और उसी पल…

मुझे एहसास हुआ —

मैं उनमें से कौन हूँ?

और असली समीर…

कहाँ गया?

आज ये सब लिखते हुए…

मुझे अब भी डर लग रहा है।

क्योंकि…

लैपटॉप स्क्रीन में…

मुझे फिर वही मुस्कान दिख रही है।

और इस बार…

मैं मुस्कुरा नहीं रहा।


अगर तुम्हारे साथ ऐसा होता… तो तुम क्या करते?

क्या ये सिर्फ मानसिक थकान थी… या कुछ और?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या मैं अभी भी “मैं” हूँ?

“धुक्याच्या पलीकडचा खजिना” एक रहस्य कथा

 

 

कधी कधी काही कथा या फक्त कथा नसतात…

त्या अनुभव असतात.

त्या जाणिवा असतात.

त्या एका अशा दुनियेचं दार असतात,

जिथे वास्तव आणि कल्पना यांची सीमा विरघळते…

तर चला मित्रांनो…

आज तुमच्यासाठी घेऊन आलो आहे एक खास कथा…

ज्यात रहस्य आहे…

रोमांच आहे…

आणि एक अद्भुत प्रवास आहे…

जी तुम्हाला हळूहळू एका वेगळ्याच दुनियेत घेऊन जाईल…

तर चला मग… 🌫️✨


सह्याद्रीच्या कुशीत एक छोटंसं गाव होतं —

शांत… निरागस… जणू काळाने विसरलेलं.

त्या गावात वेद नावाचा मुलगा राहत होता.

वेद थोडासा वेगळाच.

इतर मुलं खेळण्यात रमायची,

पण वेदला जंगल, टेकड्या, जुने भग्नवाडे,

धुक्याने भरलेल्या गूढ जंगलात उघडलेले रहस्यमय दार आणि त्याच्यासमोर उभा असलेला तरुण
धुक्यात लपलेलं दार… आणि एका अद्भुत प्रवासाची सुरुवात…

आणि गूढ जागा यांचं आकर्षण होतं.

त्याला नेहमी वाटायचं —

“या जगात दिसतं त्यापेक्षा खूप काही लपलेलं आहे…”

एक अनोखा दिवस

एके दिवशी सकाळी, गावावर विचित्र धुकं पसरलं होतं.

हे साधं धुकं नव्हतं.

ते दाट होतं.

पांढरं होतं.

आणि थोडंसं… चमकत होतं.

जंगलाच्या दिशेने ते धुकं जास्त गडद दिसत होतं.

वेदच्या मनात कुतूहल जागं झालं.

“आज काहीतरी वेगळं आहे…”

तो हळूच जंगलाच्या दिशेने निघाला.


जंगलात शिरताच वातावरण बदललं.

पक्ष्यांचे आवाज शांत झाले.

वारा थांबला.

सगळीकडे फक्त धुकं…

अचानक…

धुक्यात काहीतरी चमकलं.

जणू हवेत एक वर्तुळ तयार झालं होतं.

धुक्याचं दार.

ते हलकेच फिरत होतं.

वेदचा श्वास अडकला.

भीती होती…

पण त्याहून मोठं होतं आकर्षण.

तो पुढे गेला.

हात पुढे केला.

आणि…


क्षणात सगळं बदललं.

धुकं विरलं.

वेद एका पूर्ण वेगळ्या जागी उभा होता.

आकाश जांभळं.

झाडं चांदीसारखी चमकणारी.

हवा मंद, सुगंधित.

जमिनीवर प्रकाशाच्या रेषा वाहत होत्या.

“हे… कुठे आहे मी?”


“तू इथे कसा आलास?”

वेदने वळून पाहिलं.

त्याच्या समोर एक मुलगी उभी होती.

तिचे डोळे खोल, निळे.

केस जणू प्रकाशाच्या धाग्यांनी विणलेले.

ती साधी नव्हती.

ती त्या जगाची होती.

“मी… मला माहित नाही. धुक्यातून आलो.”

ती हलकेच हसली.

“मग तू निवडलेला आहेस.”

घनदाट धुक्यात हरवलेल्या अंधाऱ्या जंगलात जिज्ञासेने पुढे चालत जाणारा तरुण
भीतीपेक्षा जास्त शक्तिशाली होती त्याची जिज्ञासा…


ती त्याला एका प्राचीन संरचनेकडे घेऊन गेली.

ते मंदिरासारखं होतं…

पण जिवंत वाटत होतं.

भिंती हलकेच धडधडत होत्या.

मध्यभागी एक प्रकाशमान गोळा.

“हा खजिना आहे,” ती म्हणाली.

वेद गोंधळला.

“पण हे सोने नाही… हिरे नाही…”

ती गंभीर झाली.

“कारण हा खजिना आहे इच्छांचा.”


“ज्याला खरंच काही हवं असतं…

ज्याच्या मनात खऱ्या अर्थाने शोध असतो…

फक्त त्यालाच हे दार दिसतं.”

“तू काय शोधतोस, वेद?”

तो शांत झाला.

“मला… मला जाणून घ्यायचं आहे.”

“काय?”

“या जगाच्या पलीकडे काय आहे…”

ती हलकेच स्मितली.

“म्हणूनच तू इथे आहेस.”


“स्पर्श कर.”

वेदने हात पुढे केला.

प्रकाशाने त्याला वेढलं.

क्षणात…

त्याच्या डोळ्यांसमोर असंख्य दृश्यं उमटली.

भूतकाळ.

भविष्य.

अनंत जग.

वेदने विश्व पाहिलं.


प्रकाश शांत झाला.

“हे सगळं… खरं आहे?”

ती म्हणाली,

“जग एकच नाही.”

जंगलात उघडलेला तेजस्वी प्रकाशाने उजळलेला रहस्यमय खजिन्याचा पेटारा आणि आश्चर्यचकित तरुण
काही खजिने सोने नसतात… ते सत्य असतात…


“तुला परत जावं लागेल.”

“मी पुन्हा येऊ शकतो?”

ती हलकेच म्हणाली —

“जर तुझा शोध कधी संपला नाही…”

क्षणात…

वेद पुन्हा जंगलात उभा होता.

साधं धुकं.

साधं जंगल.

पण वेद आता तसाच नव्हता.


काही खजिने हे सोने–नाण्यांचे नसतात…

ते असतात शोधाचे.

ते असतात जाणिवांचे.

ते असतात त्या धुक्याच्या पलीकडच्या सत्याचे…

कदाचित…

आपण सगळेच आयुष्यात एखादं दार शोधत असतो…

जे उघडलं की जग बदलून जातं…

कारण खजिना बाहेर नसतो…

तो आपल्या शोधात दडलेला असतो… 🌫️✨