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| जब पूरा स्टेशन खाली हो… और सिर्फ सन्नाटा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हो। |
रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे का समय था।
स्टेशन लगभग खाली हो चुका था।
हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी… और ऊपर लगे पीले बल्ब बीच-बीच में टिमटिमा रहे थे।
घड़ी की टिक-टिक… और कहीं दूर से आती कुत्तों की भौंकने की आवाज़…
बस यही दो आवाज़ें थीं, जो उस सन्नाटे को और गहरा कर रही थीं।
राघव प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर खड़ा था।
उसे इस वक्त यहाँ नहीं होना चाहिए था।
पर काम ऐसा था कि देर हो गई… और अब यही आख़िरी ट्रेन बची थी, जो उसे शहर से उसके गांव तक ले जा सकती थी।
उसने एक बार चारों तरफ नज़र दौड़ाई।
पूरा स्टेशन जैसे किसी ने छोड़ दिया हो।
टिकट खिड़की बंद… चाय की दुकान आधी खुली, पर अंदर कोई नहीं…
एक बेंच पर अखबार पड़ा था, जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो।
राघव ने मोबाइल निकाला।
नेटवर्क कमजोर था… घड़ी में 11:37।
“ट्रेन 11:40 पर है…” उसने मन ही मन दोहराया।
धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म के किनारे खड़े-खड़े उसे महसूस हुआ कि…
कुछ ठीक नहीं है।
हवा पहले जैसी नहीं रही थी।
अब उसमें हल्की सी बासीपन की गंध थी… जैसे किसी बंद कमरे की हवा।
उसने नाक सिकोड़ते हुए इधर-उधर देखा।
कुछ नहीं।
तभी दूर से ट्रेन की हल्की सी आवाज़ सुनाई दी।
पहले बहुत धीमी…
फिर धीरे-धीरे बढ़ती हुई।
राघव थोड़ा सीधा होकर खड़ा हो गया।
अंधेरे में दूर से आती हेडलाइट दिखाई दी।
पर अजीब बात ये थी…
उस रोशनी में कोई गर्माहट नहीं थी।
थोड़ी फीकी… जैसे धुंध के पीछे से आ रही हो।
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।
पर जैसे ही वो रुकी…
राघव के शरीर में हल्की सी सिहरन दौड़ गई।
कोई आवाज़ नहीं हुई।
न ब्रेक की चीख…
न पहियों की रगड़…
बस… वो आकर खड़ी हो गई।
चुपचाप।
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| ट्रेन आई… पर उसके आने की कोई आवाज़ नहीं थी। |
उसने दरवाज़े की तरफ देखा।
दरवाज़ा खुला था।
पर अंदर अंधेरा था।
“शायद लाइट खराब है…” उसने खुद को समझाया।
उसने एक गहरी सांस ली और ट्रेन में चढ़ गया।
अंदर कदम रखते ही उसे ठंड का एहसास हुआ।
बाहर जितनी ठंड थी…
अंदर उससे ज्यादा।
जैसे किसी ने AC बहुत नीचे कर दिया हो…
या जैसे ये जगह बहुत समय से बंद हो।
उसने सीट ढूंढी और बैठ गया।
पूरा डिब्बा खाली था।
एक भी आदमी नहीं।
ट्रेन चल पड़ी।
धीरे-धीरे।
राघव ने खिड़की से बाहर देखा।
स्टेशन पीछे छूट रहा था…
पर अजीब बात ये थी कि बाहर का दृश्य साफ नहीं दिख रहा था।
जैसे धुंध हो… या कांच के बाहर कुछ जमा हो।
उसने हाथ बढ़ाकर कांच छुआ।
ठंडा।
बहुत ज्यादा ठंडा।
कुछ मिनट बीते।
फिर उसे महसूस हुआ…
कोई है।
उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
खाली।
सामने देखा।
खाली।
पूरा डिब्बा वैसा ही… सुनसान।
“दिमाग का वहम है…” उसने खुद को समझाया।
पर दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई थी।
ट्रेन की आवाज़ भी अजीब थी।
पहियों की खट-खट नहीं…
बस एक धीमी सी घिसटने की आवाज़…
जैसे ट्रेन पटरी पर नहीं…
किसी और चीज़ पर चल रही हो।
राघव ने सीट से थोड़ा उठकर दूसरे डिब्बे की तरफ देखा।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर अंधेरा।
पर…
उसे लगा जैसे अंदर कोई खड़ा है।
बहुत हल्की… एक परछाई।
उसने ध्यान से देखने की कोशिश की।
परछाई हिली नहीं।
बस खड़ी रही।
राघव का गला सूख गया।
“कोई और भी है…”
ये सोचकर उसे थोड़ी राहत मिली।
वो धीरे-धीरे उस दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
हर कदम के साथ ट्रेन की आवाज़ थोड़ी और धीमी होती जा रही थी।
जैसे…
ट्रेन खुद भी उसकी हरकत सुन रही हो।
वो दरवाज़े तक पहुंचा।
अंदर झांका।
कुछ नहीं।
पूरा डिब्बा खाली।
वो वहीं कुछ सेकंड खड़ा रहा।
फिर धीरे से पीछे मुड़ा…
और वहीं जम गया।
जिस डिब्बे में वो अभी बैठा था…
उसकी खिड़की के पास…
कोई बैठा था।
वो धीरे-धीरे वापस उसी तरफ चला।
दिल अब जोर से धड़क रहा था।
जैसे हर धड़कन उस सन्नाटे में गूंज रही हो।
वो पास पहुंचा।
सीट खाली थी।
पर…
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| तुम अकेले नहीं हो… बस तुम्हें अभी दिख नहीं रहा। |
सीट पर गड्ढा बना हुआ था।
जैसे अभी-अभी कोई बैठा हो।
राघव ने तुरंत पीछे हटना चाहा।
तभी…
उसके कान के बिल्कुल पास…
बहुत धीमी आवाज़ आई—
“देर हो गई…”
उसका शरीर जैसे सुन्न हो गया।
उसने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
कोई नहीं।
ट्रेन अब रुक रही थी।
पर बाहर कोई स्टेशन नहीं था।
सिर्फ अंधेरा।
गहरा… पूरा अंधेरा।
दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।
राघव वहीं खड़ा रहा।
हिल नहीं पा रहा था।
फिर उसे महसूस हुआ…
कोई उसके पीछे खड़ा है।
बहुत करीब।
इतना करीब कि उसकी सांस गर्दन को छू रही थी।
वो भागना चाहता था।
पर शरीर ने जवाब दे दिया।
धीरे-धीरे…
एक ठंडी उंगली उसके कंधे पर रखी गई।
और वही आवाज़ फिर आई—
“ये… आख़िरी ट्रेन है…”
अगली सुबह…
स्टेशन मास्टर ने प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर एक रिपोर्ट दर्ज की।
रात की आख़िरी ट्रेन…
उस रूट पर सालों पहले बंद हो चुकी थी।
और…
प्लेटफॉर्म के किनारे…
एक पुराना, जंग लगा डिब्बा खड़ा था।
दरवाज़ा खुला हुआ।
अंदर…
एक सीट पर धूल जमी थी।
पर उस धूल में…
एक ताज़ा बैठने का निशान था।



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