उस घर में रहने का फैसला मैंने किसी मजबूरी में नहीं किया था।
ऑफिस से घर काफी दूर पड़ता था और कुछ दिनों के लिए मेरा काम उसी इलाके में लगा था। एक परिचित ने बताया कि उसका पुराना मकान खाली पड़ा है। किराया भी कम था, इसलिए मैंने ज्यादा सोचा नहीं।
मकान शहर से थोड़ा बाहर था।
एक मंजिल का पुराना मकान। दीवारों पर सीलन के निशान थे और पीछे नीम के कुछ बड़े पेड़ थे। सामने एक सँकरी सड़क थी, जो आगे जाकर मुख्य सड़क से मिलती थी।
ऑफिस से घर आने-जाने में पंद्रह-बीस मिनट लगते थे।
रास्ते में एक पुराना कब्रिस्तान पड़ता था।
दिन में वहाँ से निकलने में कोई परेशानी नहीं थी। आसपास लोग आते-जाते रहते थे। लेकिन शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर अजीब-सी खामोशी हो जाती थी। कब्रिस्तान की टूटी दीवार के पीछे बड़े पेड़ थे और रात में वहाँ कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था।
पास में एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। ऑफिस से लौटते समय मैं अक्सर वहीं रुक जाता था।
पहले कुछ दिन बिल्कुल सामान्य रहे।
सुबह ऑफिस, शाम को चाय, फिर घर। रात को खाना खाकर मोबाइल देखता और सो जाता।
एक शाम चाय की दुकान पर मैं कुछ ज्यादा देर बैठ गया। जब निकला तो अंधेरा हो चुका था।
कब्रिस्तान के पास पहुँचते ही मुझे लगा जैसे मेरे पीछे कोई चल रहा है।
कदमों की आवाज बहुत धीमी थी।
मैंने बाइक धीमी की।
आवाज भी धीमी हो गई।
मैंने पीछे देखा।
सड़क खाली थी।
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| तेज बारिश के बीच कब्रिस्तान की दीवार के पास खड़ी वह रहस्यमयी आकृति आखिर किसकी थी? |
कुछ सेकंड रुका रहा, फिर मुझे लगा शायद मेरी ही बाइक की आवाज दीवार से टकराकर वापस आ रही होगी।
मैं घर चला गया।
उस बात को मैंने वहीं छोड़ दिया।
अगले दिन ऑफिस में काम ज्यादा था।
शाम को निकलते-निकलते देर हो गई। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। मैंने सोचा था कि रास्ते में चाय पीकर निकल जाऊँगा, लेकिन दुकान बंद करने वाला था, इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया।
कब्रिस्तान के पास पहुँचते-पहुँचते बारिश तेज हो गई।
सड़क लगभग खाली थी।
मैंने बाइक धीमी कर दी। बारिश इतनी तेज थी कि सामने मुश्किल से कुछ दिखाई दे रहा था। कब्रिस्तान की टूटी दीवार के पीछे पेड़ों की परछाइयाँ हिल रही थीं।
उसी समय मेरी बाइक की हेडलाइट एक पल के लिए बुझ गई।
मैंने ब्रेक लगाया।
दो-तीन बार स्विच दबाया।
फिर हेडलाइट जल गई।
मैंने सामने देखा।
सड़क खाली थी।
लेकिन सड़क के किनारे, कब्रिस्तान की दीवार के पास, मुझे लगा जैसे कोई खड़ा है।
बारिश के बीच बस एक धुंधली-सी आकृति।
मैंने बाइक रोकने की सोची, फिर जाने क्यों मन बदल गया।
मैं सीधे घर चला आया।
घर पहुँचते-पहुँचते बिजली भी चली गई थी।
मैंने मोबाइल की रोशनी में कपड़े बदले। कुछ खाने का मन नहीं था, इसलिए बस पानी पिया और बिस्तर पर लेट गया।
बाहर बारिश लगातार हो रही थी।
कुछ देर तक मैं छत पर गिरती बूंदों की आवाज सुनता रहा।
फिर पता नहीं कब नींद आ गई।
आधी रात के बाद मेरी आँख खुली।
बारिश बंद हो चुकी थी।
कमरे में अंधेरा था।
कुछ देर तक मैं वैसे ही पड़ा रहा।
फिर मुझे लगा...
बाहर कोई धीरे-धीरे चल रहा है।
मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की।
एक कदम।
फिर कुछ सेकंड का अंतर।
फिर दूसरा।
आवाज दरवाजे के ठीक सामने आकर रुक गई।
मैं उठकर बैठ गया।
कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
मैंने मोबाइल उठाया और स्क्रीन जलाई।
उसी क्षण बाहर से बहुत हल्की-सी आवाज आई।
जैसे किसी ने दरवाजे पर अपना हाथ रखा हो।
चर्र...
मैं कुछ सेकंड तक दरवाजे को देखता रहा।
फिर आवाज बंद हो गई।
मैंने दरवाजा नहीं खोला।
उस वक्त मुझे यह भी नहीं लगा कि बाहर कोई भूत या ऐसी कोई चीज हो सकती है।
मुझे बस इतना लगा कि शायद कोई आदमी रास्ता भटककर यहाँ तक आ गया होगा।
मैं वापस लेट गया।
लेकिन उस रात सोने से पहले एक बात मेरे दिमाग में अटक गई थी—
बारिश में मैंने जो आकृति कब्रिस्तान के पास देखी थी...
वह सड़क की तरफ मुँह करके खड़ी थी।
और जब मैं वहाँ से निकला था...
उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं था।
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| आधी रात कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई, लेकिन दरवाजे के बाहर कोई दिखाई नहीं दिया। |
अगली सुबह मैं उठकर ऑफिस चला गया।
दिन भर उस बात के बारे में ज्यादा नहीं सोचा।
शाम को दोस्त के साथ चाय पी और देर से घर पहुँचा।
दरवाजा खोलते समय मेरी नजर अपने आप बाहर चली गई।
कुछ नहीं था।
अंदर आया, खाना खाया और सो गया।
उस रात करीब दो बजे मेरी नींद फिर खुली।
इस बार कोई आवाज नहीं थी।
बस ऐसा लग रहा था जैसे कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई हो।
मैंने मोबाइल देखा।
फिर पानी पीने के लिए उठ गया।
गिलास रखते ही बाहर से कुछ घिसटने की आवाज आई।
बहुत हल्की।
मैं कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।
फिर आवाज बंद हो गई।
मैं दरवाजे तक गया।
कुंडी लगी हुई थी।
मैंने हाथ नहीं लगाया।
कुछ देर बाद वापस बिस्तर पर आ गया।
सुबह दरवाजा खोलते समय मैंने फर्श देखा।
दरवाजे के ठीक बाहर गीली मिट्टी का एक छोटा-सा निशान था।
बस इतना।
मैंने सोचा रात में बारिश के कारण किसी के जूते से मिट्टी लगी होगी।
ऑफिस चला गया।
उसके बाद दो-तीन दिन कुछ नहीं हुआ।
और शायद यही वजह थी कि मैंने उस बात को लगभग भूल ही दिया।
फिर एक रात मैं देर से घर लौटा।
उस दिन ऑफिस में एक जरूरी काम था। घर पहुँचते-पहुँचते करीब ग्यारह बज गए।
मैंने खाना गर्म किया और अकेले बैठकर खाया।
सोने से पहले बाहर का दरवाजा बंद करने गया।
कुंडी लगाकर जैसे ही मुड़ा, बाहर से बहुत हल्की-सी आवाज आई।
जैसे कोई सड़क पर धीरे से खाँसा हो।
मैंने दरवाजे के अंदर से ही सुनने की कोशिश की।
कुछ नहीं।
मैंने सोचा कोई राहगीर होगा।
लाइट बंद की और सो गया।
रात में मेरी नींद अचानक खुली।
इस बार मुझे साफ लगा कि बाहर कोई खड़ा है।
कोई आवाज नहीं थी।
बस दरवाजे के नीचे की पतली-सी जगह में अंधेरा बाकी फर्श से थोड़ा अलग दिखाई दे रहा था।
जैसे बाहर कोई दरवाजे के बिल्कुल सामने खड़ा हो।
मैं उठकर बैठ गया।
काफी देर तक उसी जगह देखता रहा।
फिर मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
रोशनी दरवाजे के नीचे गई।
वहाँ कुछ नहीं था।
मैंने राहत की साँस ली।
लेकिन उसी वक्त बाहर से फर्श पर कुछ घिसटने की आवाज आई।
बहुत पास से।
मैंने दरवाजा नहीं खोला।
उस रात मैं सो नहीं पाया।
सुबह बाहर निकला तो दरवाजे से गेट तक गीले पैरों के हल्के निशान थे।
मैंने नीचे झुककर देखा।
पैर जैसे लग रहे थे।
निशान गेट से मेरे दरवाजे की तरफ आ रहे थे।
मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।
फिर ऑफिस चला गया।
उस दिन पहली बार मैंने अपने दोस्त को फोन करके कहा कि शायद मैं कमरा बदल दूँगा।
उसने मजाक में पूछा—
“क्यों? भूत दिख गया क्या?”
मैंने बस कहा—
“नहीं। बस यहाँ रात को ठीक नहीं लगता।”
उसने ज्यादा पूछा नहीं।
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उसके बाद मैंने कोशिश की कि रात में जल्दी घर पहुँचूँ।
दिन में सब सामान्य था।
यही बात सबसे अजीब थी।
सुबह घर से निकलते समय मुझे कुछ नहीं लगता था।
ऑफिस में पूरा दिन आराम से निकलता।
लेकिन शाम होते ही मेरे मन में एक बात आने लगती—
आज रात क्या होगा?
एक शाम मैं घर पहुँचा तो बाहर का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
मैंने सोचा शायद मैंने सुबह ठीक से बंद नहीं किया होगा।
अंदर गया।
सब सामान अपनी जगह था।
चोरी जैसी कोई बात नहीं थी।
मैंने दरवाजा बंद किया और कमरे में चला गया।
रात को सोने से पहले अचानक बाहर से बहुत धीमी आवाज आई।
“खोलो।”
मैं बिस्तर पर सीधा बैठ गया।
कुछ सेकंड तक मुझे समझ ही नहीं आया कि आवाज सच में आई थी या नींद में मुझे लगा।
मैं दरवाजे के पास गया।
बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।
मैंने कान दरवाजे के पास लगाया।
मैं वापस आने लगा।
तभी दरवाजे की कुंडी बहुत हल्के से नीचे हुई।
मैं रुक गया।
फिर ऊपर।
फिर नीचे।
जैसे बाहर से कोई उसे समझने की कोशिश कर रहा हो।
मैंने पहली बार दरवाजे से दूर हटकर खड़ा होना पसंद किया।
करीब एक मिनट तक कुंडी नहीं हिली।
फिर सब शांत हो गया।
मैंने उस रात दरवाजा नहीं खोला।
सुबह जब बाहर निकला तो वहाँ कोई निशान नहीं था।
लेकिन दरवाजे की कुंडी पर मिट्टी लगी हुई थी।
मैंने उसे कपड़े से साफ कर दिया।
बस।
कुछ दिनों तक फिर कुछ नहीं हुआ।
मैंने सोचा शायद सच में कोई आदमी आसपास घूमता होगा।
नशे में।
शायद कोई भिखारी।
मैं खुद को यही समझाता रहा।
फिर एक रात बारिश के बाद मैं जल्दी सो गया।
आधी रात को मेरी नींद खुली।
कमरे में अंधेरा था।
इस बार बाहर से कोई आवाज नहीं थी।
मैं उठकर पानी लेने गया।
वापस आते समय मेरी नजर दरवाजे पर पड़ी।
कुंडी लगी थी।
मैंने उसे देखा और वापस मुड़ गया।
तभी...
दरवाजे के दूसरी तरफ से बहुत हल्की-सी साँस लेने की आवाज आई।
मैं रुक गया।
सिर्फ साँस।
धीमी।
भारी।
मैं दरवाजे के पास नहीं गया।
कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।
मैंने पूरी रात बत्ती जलाकर रखी।
सुबह दरवाजा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन दरवाजे के ठीक सामने फर्श गीला था।
जैसे कोई काफी देर वहाँ खड़ा रहा हो।
उस दिन मैंने फैसला कर लिया कि अब ज्यादा दिन नहीं रुकूँगा।
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मुझे छुट्टी मिली तो मैंने सामान बाँधना शुरू कर दिया।
दोपहर तक ज्यादातर सामान निकल चुका था।
कमरे में सिर्फ मेरा बैग और कुछ कपड़े बचे थे।
शाम होने लगी थी।
मैंने सोचा अंधेरा होने से पहले निकल जाऊँ।
बैग उठाया और दरवाजे की तरफ गया।
कुंडी खोली।
दरवाजा खोलने से पहले मैं कुछ पल रुका।
पता नहीं क्यों।
फिर मैंने दरवाजा खोल दिया।
बाहर कोई नहीं था।
सीढ़ियाँ खाली थीं।
मैं नीचे उतरने लगा।
आधा रास्ता ही गया था कि ऊपर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।
धड़ाम।
मैं रुक गया।
मैंने ऊपर देखा।
मेरा कमरा दिखाई दे रहा था।
दरवाजा बंद था।
कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा।
फिर वापस ऊपर गया।
दरवाजा खोला।
कमरा खाली था।
मैंने बैग उठाया और नीचे आने लगा।
मैंने पीछे नहीं देखा।
बाहर निकलकर गेट बंद किया।
सड़क पर पहुँचा तो एक बार अनजाने में कब्रिस्तान की तरफ नजर चली गई।
वही टूटी दीवार।
वही पेड़।
लेकिन इस बार वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया।
मैं सीधा आगे बढ़ गया।
उस रात मैं दोस्त के घर रुका।
सुबह उसने मुझसे पूछा—
“कल रात तू इतनी देर तक दरवाजे के पास क्या कर रहा था?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“मैं तो सो रहा था।”
वह बोला—
“मुझे रात में दो-तीन बार लगा जैसे कोई बाहर से तुझे बुला रहा था।”
मैंने उससे कुछ नहीं कहा।
मैंने उसी दिन उस घर से अपना बाकी का सामान भी मँगवा लिया।
उसके बाद मैं कभी वहाँ नहीं गया।
काफी समय तक मैंने इस घटना के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।
मेरे पास कोई जवाब नहीं है इस्का।
मैंने कोई चेहरा नहीं देखा।
मैंने किसी को नहीं देखा।
बस इतना जानता हूँ कि रात को कोई चीज मेरे दरवाजे के बाहर खड़ी रहती थी।
और वह अंदर आना चाहती थी।
मुझे यह बात उस समय समझ नहीं आई थी।
लेकिन अब पीछे मुड़कर सोचता हूँ तो एक चीज सबसे ज्यादा डराती है।
हर बार...
वह मेरा इंतजार करती रही।
कि शायद किसी रात...
मैं खुद कुंडी खोल दूँ।
और अगर उस रात मैंने वह दरवाजा खोल दिया होता...
तो शायद आज मैं यह कहानी सुनाने के लिए यहाँ नहीं होता।
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