शहर के पुराने हिस्से में एक तीन मंज़िला जर्जर इमारत खड़ी थी।
उस इमारत की तीसरी मंज़िल पर रहता था आदित्य।
उम्र लगभग तीस साल।
पेशा — फ्रीलांस राइटर।
आदित्य उन लोगों में से था जो भीड़ से दूर रहना पसंद करते हैं।
उसे शोर पसंद नहीं था।
दिन में वह शायद ही कभी घर से बाहर निकलता।
उसकी असली दुनिया रात के बाद शुरू होती थी।
रात के सन्नाटे में…
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| आधी रात के सन्नाटे में आदित्य अपने कमरे में फोन पर चैट कर रहा था, उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि यह चैट उसे एक भयानक रहस्य तक ले जाएगी। |
लैपटॉप की हल्की नीली रोशनी में…
और खिड़की के बाहर फैले अंधेरे के बीच।
उसके कमरे की खिड़की से ठीक सामने थोड़ा दूर एक पुराना कब्रिस्तान दिखाई देता था।
वह कब्रिस्तान शहर जितना ही पुराना था।
वहां से एक रास्ता गुजरता था जिससे अक्सर
लोगों का आना-जाना लगा रहता।
लेकिन रात होते ही वह जगह बिल्कुल अलग हो जाती।
पेड़ों की टेढ़ी शाखाएँ…
हवा में हिलती जंग लगी लोहे की बाड़…
और कब्रों के बीच पसरा हुआ सन्नाटा।
आदित्य कई बार रात को खिड़की से उस कब्रिस्तान को देर तक देखता रहता।
उसे पता नहीं था क्यों…
लेकिन उस जगह में एक अजीब खिंचाव था।
जैसे अंधेरा उसे पुकार रहा हो।
उस रात भी कुछ ऐसा ही था।
घड़ी में 1:37 बजे थे।
कमरे में बस लैपटॉप की हल्की रोशनी थी।
बाहर हवा चल रही थी।
आदित्य इंटरनेट पर एक पुरानी anonymous chat site पर था।
यह उसकी पुरानी आदत थी।
उसे रात को अजनबियों से बातें करना पसंद था…
लेकिन उस रात…
कुछ अलग होने वाला था।
उस रात जब वह लैपटॉप चैट कर रहा था
की अचानक एक नया मैसेज आया।
“Hi… क्या तुम जाग रहे हो?”
आदित्य ने भौंहें सिकोड़कर स्क्रीन को देखा।
उसने टाइप किया।
“हाँ… कौन?”
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।
कमरे में बस हवा की आवाज थी।
फिर स्क्रीन पर नया मैसेज उभरा।
“तुम अकेले हो ना?”
आदित्य हल्का मुस्कुराया।
ऐसे सवाल इंटरनेट पर आम थे।
उसने टाइप किया—
“हाँ… क्यों?”
जवाब तुरंत आया।
“अच्छा है… क्योंकि मैं भी अकेला हूँ।”
आदित्य ने कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुकते हुए पूछा—
“कहाँ से हो?”
कुछ सेकंड।
फिर जवाब आया।
“यहीं पास में…”
उसने मज़ाक में लिखा—
“पास में मतलब? कौन सा एरिया?”
कुछ पल तक स्क्रीन खाली रही।
फिर धीरे-धीरे शब्द उभरे।
“तुम्हारे घर के बिल्कुल पास से…
तुम्हारे खिड़की से कब्रिस्तान दिखता है ना"
आदित्य का दिल अचानक थोड़ा तेज धड़कने लगा।
उसने तुरंत खिड़की के बाहर देखा।
अंधेरा… बिल्कुल स्थिर अंधेरा।
उसने फिर स्क्रीन की तरफ देखा।
और टाइप किया—
“तुम मज़ाक कर रहे हो?”
कुछ सेकंड बाद जवाब आया।
“नहीं… मैं वहीं रहता हूँ।”
आदित्य ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“कब्रिस्तान में?”
कुछ पल की खामोशी।
फिर स्क्रीन पर एक लाइन उभरी—
“हाँ…
उसी पल…
खिड़की के बाहर से हल्की ठक-ठक की आवाज आई।
जैसे कोई शीशे को उँगलियों से छू रहा हो।
आदित्य धीरे-धीरे खिड़की की तरफ मुड़ा।
और फिर…
उसकी साँस अटक गई।
क्योंकि…
तीसरी मंज़िल की उस खिड़की के बाहर
कोई खड़ा था।
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| खिड़की से बाहर देखते हुए आदित्य को दूर कब्रिस्तान में एक अजीब परछाईं दिखाई दी… और उसी समय उसके फोन पर एक नया मैसेज आया। |
और उसी समय लैपटॉप स्क्रीन पर नया मैसेज आया—
“अब तुम मुझे देख सकते हो।”
फिर स्क्रीन पर अगला मैसेज आया।
“क्या तुम नीचे आ सकते हो?”
आदित्य कुछ पल तक चुप बैठा रहा।
डर और जिज्ञासा दोनों उसके अंदर लड़ रहे थे।
फिर अचानक उसने लैपटॉप बंद किया…
और कमरे से बाहर निकल गया।
पाँच मिनट बाद वह कब्रिस्तान के गेट के सामने खड़ा था।
गेट आधा खुला हुआ था।
हवा से वह धीरे-धीरे हिल रहा था।
अंदर पूरा कब्रिस्तान अंधेरे में डूबा था।
आदित्य धीरे-धीरे अंदर चला गया।
सूखे पत्तों पर उसके कदमों की आवाज गूँज रही थी।
वह उसी जगह पहुँचा जहाँ उसने आकृति देखी थी।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
बस एक पुरानी कब्र।
जिस पर काई जमी हुई थी।
आदित्य ने झुककर उस कब्र पर लिखे नाम को पढ़ने लगा।
और उसी पल उसकी रीढ़ में बर्फ सी ठंड उतर गई।
क्योंकि उस कब्र पर लिखा था—
“आदित्य शर्मा
मृत्यु — 12 नवंबर 1998”
आदित्य के हाथ काँपने लगे।
वह पीछे हट गया।
उसी समय…
उसकी जेब में रखा मोबाइल वाइब्रेट हुआ।
उसने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।
स्क्रीन पर वही चैट खुली हुई थी।
और उसमें नया मैसेज आया था।
“अब समझे?”
आदित्य की साँस तेज हो गई।
उसने टाइप किया—
“तुम कौन हो?”
कुछ सेकंड।
फिर जवाब आया।
“मैं तुम ही हूँ।”
आदित्य का दिल जैसे रुक गया।
अगला मैसेज आया—
“तुम्हें याद नहीं…
लेकिन 1998 में इसी जगह तुम्हारी मौत हो गई थी।”
आदित्य की आँखों के सामने जैसे अंधेरा छाने लगा सर घूमने लगा।
उसे समझ नहीं आ रहा था क्या हो रहा है।
और फिर अचानक उसके दिमाग में कुछ धुंधली यादें उभरने लगी—
एक दुर्घटना…
अंधेरा…
और ठंडी मिट्टी......
वह सर पकड़के बैठ गया।
उसी वक्त ..
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| जब आदित्य ने कब्र पर लिखा अपना ही नाम और तारीख देखी, तब उसे समझ आया कि जिस से वह चैट कर रहा था… वह शायद कोई ज़िंदा इंसान नहीं था। |
उसकी स्क्रीन पर आखिरी मैसेज आया—
“तुम कई सालों से इस दुनिया में भटक रहे हो…
लेकिन आज पहली बार तुमने खुद से बात की है।”
आदित्य के हाथ से मोबाइल गिर गया।
उसने धीरे-धीरे अपने चारों तरफ देखा।
पूरा कब्रिस्तान खामोश था।
लेकिन अब…
उसे ऐसा लग रहा था जैसे हर कब्र के पीछे
कोई खड़ा है।
और दूर उसकी तीसरी मंज़िल की खिड़की में…
लैपटॉप की नीली रोशनी अब भी जल रही थी।
जैसे…
कोई अब भी
चैट पर ऑनलाइन हो।


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