खौफनाक शिकारी

 



फैक्ट्री की छुट्टी के बाद शाम के समय अपने बेटे के लिए किताब खरीदता हुआ मजदूर सुभाष।
अंधेरा होने से पहले हर कोई घर पहुंचना चाहता था, लेकिन सुभाष को अपने बेटे से किया वादा निभाना था।



शाम के छह बजते ही फैक्ट्री का सायरन गूंज उठा। मशीनों का शोर थम गया और सभी मजदूर जल्दी-जल्दी बाहर निकल पड़े। हर किसी के चेहरे पर घर पहुंचने की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। रात होने से पहले जो सामान लेना था, लोग फुर्ती से खरीद रहे थे और बिना रुके अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। इन दिनों अंधेरा होते ही बाहर रुकने से हर कोई डरता था। लेकिन सुभाष रुक गया। उसने अपने चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे से वादा किया था कि आज उसकी नई स्कूल की किताब जरूर लाएगा। दुकान पर भीड़ और देर के कारण उसका समय निकलता जा रहा था। वह बार-बार घड़ी देखता और मन ही मन झुंझला उठता। आखिर जैसे-तैसे किताब लेकर वह अपनी पुरानी साइकिल पर सवार हुआ। तब तक सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। दूर-दूर तक सन्नाटा फैलने लगा था। अंधेरा तेजी से उतर रहा था। जिस समय तक पूरा गांव अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर चुका था, उसी समय सुभाष अकेला सुनसान रास्ते पर घर लौट रहा था।

सुभाष साइकिल चलाते-चलाते खुद से ही बड़बड़ा रहा था। उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था। "थोड़ा पहले निकल जाता तो ये नौबत ही नहीं आती…" उसने होंठ भींचते हुए कहा। गांव जाने वाली कच्ची सड़क पर उसके अलावा कोई नहीं था। हर पैडल के साथ अंधेरा और गहरा होता जा रहा था। झींगुरों और कीड़ों की लगातार आती आवाजें सन्नाटे को और डरावना बना रही थीं। सड़क के दोनों ओर फैले खेतों में खड़े ऊंचे गन्ने हवा के साथ हिल रहे थे, मानो कोई उनमें छिपकर उसे देख रहा हो। हर छोटी-सी आहट पर सुभाष की नजरें घबराकर इधर-उधर दौड़ जातीं और उसका दिल तेजी से धड़कने लगता।

उसके डर की वजह भी थी। मार्च का महीना शुरू हो चुका था, और इसी समय वह लौटता है... वह आदमखोर। कोई नहीं जानता था कि वह इंसान था, जंगली जानवर या कोई और भयावह चीज़। क्योंकि जिसने भी उसे देखा, वह कभी जिंदा वापस नहीं आया। कुछ दिनों बाद जंगल में केवल उसकी बेरहमी से चीरी-फाड़ी हुई लाश मिलती थी। हां, उसकी रूह कंपा देने वाली चीख कई लोगों ने जरूर सुनी थी। हर साल वह कुछ दिनों तक आतंक मचाता, चार-पांच लोगों की जान लेता और फिर अचानक गायब हो जाता। यही कारण था कि गांव वाले दिन में चाहे जितना घूम लें, लेकिन रात ढलते ही अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। आज सुभाष उसी डर के बीच अकेला उस सुनसान रास्ते पर आगे बढ़ रहा था।


गांव की टिमटिमाती रोशनी अब दूर से दिखाई देने लगी थी। उसे देखकर सुभाष ने राहत की सांस ली, लेकिन मन का डर अभी भी कम नहीं हुआ था। तभी अचानक उसकी साइकिल की चेन उतर गई। वह झुंझलाकर बोला, "अभी ही निकलनी थी?" उसने जल्दी-जल्दी साइकिल पलटी और कांपते हाथों से चेन चढ़ाने लगा। तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ। हवा जैसे एकदम थम गई थी। मार्च का महीना होने के बावजूद ठंड अचानक बढ़ गई। चारों ओर ऐसा सन्नाटा छा गया कि झींगुरों और कीड़ों की आवाजें भी पूरी तरह गायब हो गईं। मानो प्रकृति ने खुद सांस रोक ली हो।

सुभाष का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे लगा जैसे यह किसी अनहोनी का संकेत हो... कोई उसके बहुत पास मौजूद था। उसने बिना समय गंवाए चेन चढ़ाई, साइकिल उठाई और तेजी से पैडल मारने लगा। तभी सामने वाले जंगल की दिशा से भेड़िए की लंबी, डरावनी हुआं-हुआं रात के सन्नाटे को चीरती हुई गूंज उठी। उसकी रफ्तार और बढ़ गई। तभी रास्ते के किनारे वाले खेत में अचानक जोर से सरसराहट हुई। सुभाष की सांस गले में अटक गई। वह कांपते हुए भगवान का नाम जपने लगा। अगले ही पल खेत से एक लोमड़ी छलांग लगाकर बाहर निकली। उसे देखकर सुभाष ने राहत की सांस ली। लेकिन उसी क्षण वह लोमड़ी जैसे किसी अनदेखी चीज़ से बुरी तरह डर गई और चीखती हुई उल्टी दिशा में पागलों की तरह भाग निकली। सुभाष का दिल फिर से बैठ गया।

सुभाष जैसे ही दोबारा साइकिल पर बैठकर आगे बढ़ने लगा, उसकी नजर सड़क के बीचों-बीच खड़ी एक विशाल काली आकृति पर पड़ी। वह लगभग आठ फुट ऊंची थी। उसके पूरे शरीर पर घने काले बाल थे और अंधेरे में उसकी लाल चमकती आंखें साफ दिखाई दे रही थीं। सुभाष का पूरा शरीर वहीं का वहीं जम गया। अगले ही पल उस जीव ने ऐसी भयावह दहाड़ मारी कि पूरा इलाका कांप उठा। पेड़ों पर बैठे पक्षी घबराकर उड़ गए और सुभाष के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए।

उसने बिना एक पल गंवाए साइकिल वहीं छोड़ दी और बगल के गन्ने के खेत में जान बचाकर भाग गया। वह जीव भी उसी रफ्तार से उसके पीछे दौड़ा। गन्नों के बीच घुसते ही सुभाष ने अपना मुंह कसकर दबा लिया। अब उसकी हल्की-सी सांस की आवाज भी उसकी मौत बन सकती थी। बाहर वह राक्षसी जीव लगातार गुर्रा रहा था। वह गन्ने जड़ से उखाड़कर फेंक रहा था और पागलों की तरह उसकी तलाश कर रहा था। उसकी हर गुर्राहट से सुभाष का पूरा शरीर कांप रहा था।

रात के समय गन्ने के खेत में एक रहस्यमयी काले जीव से छिपता हुआ सुभाष।
गन्नों के बीच छिपा सुभाष अपनी सांसें थामे बैठा था, जबकि खौफनाक शिकारी उसे ढूंढ रहा था।


कुछ देर तक छिपे रहने के बाद उस जीव को उसकी गंध मिल गई। लेकिन घने गन्नों के कारण वह पूरी रफ्तार से अंदर नहीं घुस पा रहा था। मौका मिलते ही सुभाष दूसरी दिशा में भाग निकला। वह जानता था कि खुले रास्ते पर गया तो बचना असंभव है। इसलिए वह खेतों के बीच छिपते, झुकते और दौड़ते हुए आगे बढ़ता रहा, जबकि वह खूंखार जीव उसके पीछे पागलों की तरह लगातार उसका पीछा कर रहा था।


देखते ही देखते भागता हुआ सुभाष खेत के बिल्कुल बीचों-बीच पहुंच गया। वहां एक पुराना कुआं था। उसके पास सोचने का भी समय नहीं था। वह समझ चुका था कि चाहे जितना दौड़ ले, खुले मैदान में उस भयानक जीव से बचना असंभव है। पीछे से उसकी गुर्राहट हर पल और करीब आती जा रही थी। बिना एक क्षण गंवाए सुभाष कुएं में कूद गया और पानी के भीतर पूरी तरह डूबकर खुद को छिपा लिया।

कुछ ही पलों बाद वह राक्षसी जीव भी वहां पहुंच गया। वह हिंसक जानवर की तरह कुएं के चारों ओर चक्कर काटने लगा। उसकी नथुने तेजी से फड़क रहे थे। वह हवा को सूंघकर सुभाष की गंध तलाश रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि शिकार यहीं कहीं है, लेकिन गंध अचानक गायब हो जाने से वह बुरी तरह उलझ गया था।

वह गुर्राता हुआ कुएं के बिल्कुल किनारे आया और अंदर झांकने लगा। नीचे उसे सिर्फ काला पानी दिखाई दिया। उसी पानी के भीतर सुभाष अपनी सांस रोके डूबा हुआ था। उसके फेफड़े जलने लगे थे। अब वह कुछ ही क्षण और सांस रोक सकता था। लेकिन अगर उसने सिर पानी से बाहर निकाला, तो अगले ही पल वह जीव उसे चीर-फाड़ देता।

तभी वह दानव अचानक भयानक दहाड़ मारकर पलटा, जैसे उसे कहीं और कोई आहट सुनाई दी हो। अगले ही पल वह बिजली की रफ्तार से दूसरी दिशा में दौड़ गया। पानी के भीतर डूबा सुभाष अभी भी हिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

गन्ने के खेत के बीच पुराने कुएं में छिपकर अपनी जान बचाने की कोशिश करता सुभाष।
पूरी रात ठंडे पानी में छिपा सुभाष सिर्फ एक प्रार्थना कर रहा था—सुबह होने तक वह जीव वापस न लौटे।


उसके बाद सुभाष में कुएं से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं बची। डर ने जैसे उसके शरीर की हर हड्डी जमा दी थी। वह जीव जा चुका था, लेकिन उसकी दहशत अब भी हर तरफ महसूस हो रही थी। सुभाष को बार-बार लगता, अगर वह अभी ऊपर निकला और वह दानव फिर लौट आया, तो इस बार बचना नामुमकिन होगा। इसी डर से वह पूरी रात ठंडे पानी में ही छिपा रहा। कांपते हुए वह लगातार भगवान का नाम जपता रहा और हर छोटी-सी आहट पर आंखें बंद कर लेता।

सुबह हुई, सूरज काफी ऊपर चढ़ आया, लेकिन फिर भी वह बाहर नहीं निकला। कुछ देर बाद खेत का मालिक वहां पहुंचा। कुएं में झांकते ही उसने सुभाष को देखा। गांव वालों की मदद से उसे बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला गया। उसकी हालत बेहद खराब थी। ठंड, डर और पूरी रात पानी में रहने से उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था। उसे तुरंत घर पहुंचाया गया। वहां उसकी पत्नी और छोटा बेटा रो-रोकर बेहाल थे। पूरी रात उन्होंने उसकी राह देखी थी।

कुछ ही देर में पूरे गांव में यह खबर फैल गई। हर कोई उसे देखने पहुंचा, क्योंकि वह पहला इंसान था जो उस रहस्यमय दानव के चंगुल से जिंदा बचकर लौटा था। उसे पूरी तरह संभलने में कई दिन लग गए। लेकिन उस घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत और बढ़ गई। अब फैक्ट्री की छुट्टी होते ही मजदूर बिना कहीं रुके सीधे अपने घर लौट आते। अंधेरा होने से पहले सड़कें पूरी तरह सूनी हो जाती थीं।

अभिशप्त खज़ाना

 



श्रीरामपुर गांव वैसे तो बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसकी पहचान दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह था गांव का लगभग सात सौ साल पुराना महादेव मंदिर। मंदिर के ठीक पास से बहने वाली दमोदर नदी पूरे वातावरण को एक रहस्यमय शांति देती थी। पुराने समय की पत्थर की नक्काशियाँ, घिसी हुई सीढ़ियाँ और टूटी हुई दीवारें आज भी इतिहास की गवाही देती थीं। यहां आने वाला हर व्यक्ति महसूस करता कि इस जगह में कोई अनकहा रहस्य छिपा है।


लेकिन मंदिर की सबसे रहस्यमयी चीज़ थी उसके गर्भगृह के भीतर बना एक प्राचीन पत्थर का दरवाज़ा। कहा जाता था कि उस दरवाज़े के पीछे बेशकीमती खज़ाना छिपा है, जिसे सदियों पहले सुरक्षित कर दिया गया था। आश्चर्य की बात यह थी कि आज तक कोई भी उस दरवाज़े को खोल नहीं पाया। गांव के बुज़ुर्गों के अनुसार उसके पीछे सिर्फ खज़ाना नहीं, बल्कि एक भयानक अभिशाप भी कैद है।


लोककथाओं में बताया जाता है कि जिसने भी उस दरवाज़े को खोलने की कोशिश की, उसकी कुछ ही समय बाद रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। अब तक दो लोगों के साथ ऐसा होने की बातें गांव में मशहूर थीं। हालांकि इन घटनाओं का सच क्या था और अफ़वाह क्या, इसका कोई पक्का प्रमाण किसी के पास नहीं था। लेकिन इतना ज़रूर था कि उस बंद दरवाज़े का नाम सुनते ही आज भी गांव के लोगों के चेहरे पर डर साफ़ दिखाई देता था।

वार्षिक मेले के दौरान 700 साल पुराने महादेव मंदिर की गुप्त रूप से शूटिंग करते रवि और मनोज।
आखिरकार उन्हें वह मिल गया जिसके लिए वे आए थे—सोना, हीरे, जवाहरात और अनगिनत दौलत... लेकिन इसकी कीमत अभी बाकी थी।


इन दिनों श्रीरामपुर गांव अपने वार्षिक मेले की रौनक में डूबा हुआ था। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस उत्सव में दूर-दूर से लोग उमड़ रहे थे। झूले, लोकनृत्य, मंदिर की पूजा और रंग-बिरंगी दुकानों से पूरा गांव जीवंत हो उठा था। इसी भीड़ में शहर से आया एक युवक, रवि, अपने दोस्त मनोज के साथ कैमरा लेकर हर पल की शूटिंग करता दिखाई देता था। उसने इस मेले के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, इसलिए यहां तीन दिन रुकने का फैसला किया। मिलनसार स्वभाव के कारण वह जल्दी ही गांव वालों से घुल-मिल गया और सबका चहेता बन गया। उधर मेला हर गुजरते दिन के साथ और भी भव्य होता जा रहा था।


पूजा का दिन अब बिल्कुल करीब था। पूरे गांव में तैयारियां जोरों पर चल रही थीं। दो दिन बाद भव्य शोभायात्रा निकलने वाली थी और उसी दिन महादेव मंदिर के शिखर पर नया कलश चढ़ाया जाना था। हर गली रंग-बिरंगी सजावट से सजी थी और मंदिर में सुबह से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती थी।

इसी बीच रवि और मनोज मौका देखकर चुपके से मंदिर के अंदर की शूटिंग करने लगे। कैमरा चलाते-चलाते वे उस हिस्से तक पहुंच गए, जहां सदियों पुराना रहस्यमय पत्थर का दरवाज़ा मौजूद था। दोनों उत्सुकता से उसे ध्यान से देखने लगे। दरवाज़े की बनावट, ताले और आसपास की दीवारों को वे ऐसे देख रहे थे, मानो हर छोटी-सी बात अपने दिमाग में दर्ज कर रहे हों। तभी किसी के आने की आहट सुनाई दी। दोनों तुरंत सामान्य होने का अभिनय करते हुए वहां से निकल गए और वापस मेले की भीड़ में जाकर बाकी कार्यक्रमों की शूटिंग करने लगे।


लेकिन उनकी असली पहचान किसी को नहीं पता थी। रवि और मनोज साधारण पर्यटक नहीं, बल्कि बेहद शातिर और हाई-टेक चोर थे। मंदिर के पीछे छिपे खजाने की कहानी सुनकर ही वे श्रीरामपुर आए थे। उनका पूरा प्लान तैयार था—कलश स्थापना और पूजा संपन्न होने के बाद, जब पूरा गांव उत्सव की थकान में सो जाएगा, उसी रात वे उस रहस्यमय दरवाज़े को खोलकर सदियों पुराने खजाने तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।


इस रात का इंतज़ार रवि और मनोज कई महीनों से कर रहे थे। उन्होंने बार-बार मंदिर के उस हिस्से की गुप्त रूप से रेकी की थी और हर रास्ता, हर कोना और हर संभावना अच्छी तरह समझ ली थी। अब उनके प्लान को अंजाम देने का समय आ चुका था।


उत्सव समाप्त होने के बाद पूरा गांव गहरी नींद में डूब चुका था। आधी रात के सन्नाटे में दोनों चुपचाप अपने ठिकाने से निकले और मंदिर की ओर बढ़ गए। उस रात का अंधेरा कुछ अलग ही था—हवा तक जैसे थम गई हो। विशाल महादेव मंदिर निस्तब्ध खड़ा था। भीतर अब भी कुछ दीपक टिमटिमा रहे थे। पुजारी गर्भगृह के बाहर वाले कक्ष में सो चुका था। दोनों ने सावधानी से ताला खोला और बिना कोई आवाज़ किए भीतर प्रवेश कर गए।


वे सीधे उस रहस्यमयी पत्थर के दरवाज़े के सामने पहुँचे। गांव वालों से मिली जानकारी के अनुसार, उसका गुप्त पत्थर वाला लॉक पास ही कहीं छिपा था। काफी खोजने के बाद उन्हें वह मिल भी गया। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद तंत्र खुल नहीं रहा था। शायद सदियों से बंद होने के कारण वह पूरी तरह जाम हो चुका था। आधा घंटा बीत गया। दोनों थक चुके थे और लगने लगा कि उनकी महीनों की योजना यहीं खत्म हो जाएगी। उन्होंने आख़िरी बार पूरी ताकत से कोशिश की… तभी अचानक बिना किसी आवाज़ के वह पत्थर का लॉक अपने आप खुल गया। दोनों एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगे।



अब सोचने का समय नहीं था। मौका हाथ से निकलने से पहले रवि और मनोज फुर्ती से उस दरवाज़े के भीतर चले गए। अंदर कदम रखते ही उनके सामने धूल, जाले और सदियों पुराना खंडहर दिखाई दिया। हवा इतनी बासी थी कि दोनों ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगे। चारों ओर एक जैसे संकरे रास्ते और टूटे हुए पत्थर के गलियारे थे। पूरा स्थान किसी रहस्यमयी भूलभुलैया जैसा लग रहा था। वहां ऐसा सन्नाटा था कि उनके कदमों की हल्की-सी आहट भी कई बार गूंजकर लौट रही थी।


दोनों ने अपने साथ लाई हुई मशाल जलाई और सावधानी से आगे बढ़ने लगे। वे एक-एक कोना, हर दीवार और हर रास्ता ध्यान से देखते रहे, लेकिन काफी देर तक उन्हें कुछ भी नहीं मिला। हर जगह सिर्फ खाली कमरे, टूटी दीवारें और बिखरे पत्थर ही दिखाई दे रहे थे।

थककर मनोज ने निराश होकर कहा, "इतनी मेहनत बेकार गई। लगता है खजाने की सारी कहानियां सिर्फ अफवाह थीं। यहां कुछ भी नहीं है।"


लेकिन रवि अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ना चाहता था। उसने आगे बढ़ने का फैसला किया। तभी उनकी नजर एक छोटे-से पत्थर के दरवाज़े पर पड़ी, जो बाकी दीवारों में लगभग छिपा हुआ था। बिना ज्यादा उम्मीद के उन्होंने उसे खोला... और अगले ही पल दोनों की आंखें हैरानी से फैल गईं। अंदर दूर तक चमचमाता हुआ सोना, गहने और अनगिनत खजाना मशाल की रोशनी में चमक रहा था।

भूमिगत खंडहर में सदियों पुराने खजाने को देखकर हैरान रवि और मनोज।
आखिरकार उन्हें वह मिल गया जिसके लिए वे आए थे—सोना, हीरे, जवाहरात और अनगिनत दौलत... लेकिन इसकी कीमत अभी बाकी थी।


खजाना देखकर रवि और मनोज खुशी से झूम उठे। उनकी आंखों के सामने सोने की ईंटें, कीमती गहने, प्राचीन मूर्तियां, हीरे, जवाहरात, मोती और न जाने कितनी अनमोल वस्तुएं बिखरी पड़ी थीं। ऐसा वैभव उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखा था। कुछ पल तक दोनों बिना कुछ बोले सिर्फ उस खजाने को छूते रहे, मानो यकीन ही न हो कि यह सब सच है।


फिर उन्हें होश आया। उन्होंने अपने साथ लाए बड़े बैग खोले और जितना संभव था, उतना खजाना उनमें भर लिया। बैग इतने भारी हो गए कि उन्हें उठाना भी मुश्किल हो रहा था, लेकिन लालच के आगे उन्हें उसका एहसास भी नहीं था।


अब दोनों तेजी से बाहर निकलने के लिए उसी रास्ते की ओर बढ़े, जहां से अंदर आए थे। लेकिन कुछ दूर चलने के बाद वे ठिठक गए। सामने कोई पहचान का रास्ता नहीं था। उन्होंने एक के बाद एक कई गलियारों में खोजा, मगर बाहर जाने वाला दरवाज़ा कहीं दिखाई नहीं दिया। जितना वे तलाश करते, भूलभुलैया उतनी ही उलझती जाती। दोनों के चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई देने लगी।


तभी अचानक पूरे खंडहर में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। न हवा की सरसराहट, न उनके कदमों की गूंज। उसी सन्नाटे में मनोज की नज़र एक गहरे अंधेरे कोने पर पड़ी... वहां दो चमकती हुई आंखें उन्हें घूर रही थीं। अगले ही पल वे आंखें धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगीं।


दोनों डर के मारे वहीं जड़ हो गए। धीरे-धीरे पीछे हटने लगे। तभी मशाल की लौ उस अंधेरे कोने तक पहुंची और वहां खड़ी आकृति साफ़ दिखाई देने लगी। उसे देखते ही दोनों की सांस जैसे थम गई। उनके सामने एक विशालकाय काला साँप फन फैलाए खड़ा था। उसकी आंखें अंगारों की तरह चमक रही थीं और उसकी गहरी, भयावह फुफकार पूरे खंडहर में गूंज रही थी।

विशाल काले नाग से जान बचाकर भूलभुलैया में भागते रवि और मनोज।
खज़ाना मिलते ही जाग उठा उसका असली रक्षक। अब दौलत नहीं, सिर्फ़ जान बचाना ही उनका लक्ष्य था।


अगले ही पल दोनों जोर से चीखे और जान बचाकर भाग खड़े हुए। लेकिन वह भयानक साँप भी बिजली की रफ्तार से उनके पीछे दौड़ पड़ा। उसकी फुफकार हर पल उनके और करीब आती जा रही थी। भूलभुलैया जैसे उनके खिलाफ हो गई थी। वे जिस रास्ते पर मुड़ते, साँप मानो पहले से वहीं उनका इंतज़ार कर रहा होता। ऐसा लग रहा था कि उससे बच निकलना असंभव है।


भाग-दौड़ की अफरातफरी में रवि और मनोज एक-दूसरे से बिछड़ गए। रवि घबराहट में बिना दिशा के दौड़ता रहा। तभी अचानक पूरे खंडहर में मनोज की एक दिल दहला देने वाली चीख गूंजी। वह चीख सुनकर रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका शरीर कांपने लगा। उसे लगा कि साँप ने मनोज को पकड़ लिया है। लेकिन उसके साथ आखिर हुआ क्या... यह सोचने की भी हिम्मत रवि में नहीं बची थी। मौत के डर से वह पागलों की तरह अंधेरे गलियारों में भागता रहा, बस किसी तरह बाहर निकलने का रास्ता खोजता हुआ।


चारों तरफ सिर्फ घना अंधेरा था... और उसके पीछे मौत। रवि कभी किसी टूटी दीवार के पीछे छिपता, तो कभी किसी संकरे गलियारे में भाग निकलता। हर दिशा से विशाल साँप की सरसराहट और उसकी भयानक फुफकार सुनाई दे रही थी। अब उसे समझ आ चुका था कि शायद वह ज़िंदा बाहर नहीं निकल पाएगा। डर से कांपते हुए वह बार-बार भगवान का नाम ले रहा था, अपनी गलती के लिए माफी मांग रहा था और जान बख्श देने की गुहार लगा रहा था।


भागते-भागते वह खंडहर के एक ऐसे हिस्से में पहुंचा, जहां ऊपर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियां बनी थीं। उसके मन में उम्मीद जगी कि शायद यही बाहर निकलने का रास्ता हो। वह पूरी ताकत से सीढ़ियां चढ़ गया, लेकिन ऊपर पहुंचते ही उसकी उम्मीद टूट गई। वहां एक विशाल प्राचीन पेड़ उगा हुआ था, जिसकी मोटी जड़ें पूरे खंडहर की दीवारों और फर्श में दूर-दूर तक फैली हुई थीं।


उसी समय पीछे से फिर साँप की तेज फुफकार गूंजी। रवि घबराकर पेड़ की ओर दौड़ा और छिपने की जगह तलाशने लगा। तभी उसकी नजर दीवार में बनी एक छोटी-सी खिड़की जैसी खुली जगह पर पड़ी। उसके भीतर फिर उम्मीद जाग उठी। साँप की आवाज़ अब बेहद करीब आ चुकी थी। बिना एक पल गंवाए उसने पेड़ से लटकती मोटी लता को पकड़ लिया, तेजी से ऊपर चढ़ा और उस संकरी खुली जगह से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करने लगा।


उसी क्षण वह विशाल साँप भी पेड़ की ओर लपका और लताओं के सहारे ऊपर चढ़ने लगा। रवि के हाथ-पांव घबराहट से कांप रहे थे। उसने पूरी ताकत लगाकर खुद को उस संकरी खुली जगह की ओर धकेला। जैसे ही साँप उसके बिल्कुल करीब पहुंचने वाला था, रवि किसी तरह बाहर निकल गया।

लेकिन वह विशालकाय साँप उस छोटे से रास्ते से बाहर नहीं आ सकता था। वह वहीं रुक गया और अपनी भयानक पीली आंखों से रवि को घूरने लगा। पहली बार रवि ने उसे इतने करीब से देखा था। उसका विशाल फन, काले चमकते शल्क और आंखों में जलती हुई पीली चमक किसी दुःस्वप्न से कम नहीं थी। एक पल के लिए रवि के मन में ख्याल आया—अगर उनके बीच वह पत्थर की दीवार न होती, तो शायद वह अब तक ज़िंदा नहीं बचता।


कुछ देर तक साँप उसे घूरता रहा, फिर धीरे-धीरे अंधेरे में वापस लौट गया। उधर रवि बिना पीछे देखे उस संकरे रास्ते से भाग निकला। वह रास्ता सीधे नदी के किनारे बाहर निकलता था। आश्चर्य की बात यह थी कि उस गुप्त मार्ग के बारे में आज तक गांव वालों को भी पता नहीं था।


जैसे ही उसे यकीन हुआ कि उसकी जान बच गई है, वह वहीं घुटनों के बल बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसका साथी मनोज अब शायद इस दुनिया में नहीं था। उसका पूरा शरीर अब भी डर से कांप रहा था। उसने कुछ ही घंटों में ऐसा भय देखा था, जिसे वह शायद जिंदगी भर कभी भूल नहीं पाएगा।

दमोदर नदी किनारे सोने का हार फेंकता हुआ दुखी और घायल रवि।
दोस्त खो दिया, लालच टूट गया... और अंत में रवि ने समझ लिया कि कुछ खज़ाने इंसानों के लिए नहीं होते।


सुबह होने से पहले, गांव के जागने से पहले ही रवि अपने ठिकाने पर गया, अपना सारा सामान उठाया और अंधेरे में श्रीरामपुर छोड़कर निकल गया। सूरज उगते-उगते वह गांव से काफी दूर पहुंच चुका था, लेकिन उसका मन अब भी उस भयावह रात में अटका हुआ था। तभी उसे अपनी पैंट की जेब में कुछ महसूस हुआ। उसने निकालकर देखा—वह सोने का एक कीमती हार था। खजाना देखकर खुशी में उसने अनजाने में उसे जेब में रख लिया था। कुछ पल वह उसे देखता रहा। फिर मनोज की याद आंखों के सामने तैर गई। उसकी सारी लालसा उसी पल खत्म हो गई। उसने वह हार दूर फेंक दिया और बिना पीछे देखे अपनी राह पर चल पड़ा।

रुद्रकोट की परछाइयाँ


   सह्याद्रि की ऊँची पहाड़ियों के बीच बसा था रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र। चारों ओर घना जंगल, सामने शांत झील और पीछे धुंध में खोई पहाड़ियाँ। वर्षों पहले यह जगह देश के सबसे प्रसिद्ध मानसिक चिकित्सालयों में गिनी जाती थी। दूर-दूर से लोग इलाज के लिए यहाँ आते थे। सुबह पक्षियों की आवाज़ें, गलियारों में डॉक्टरों की चहल-पहल और बगीचों में टहलते मरीज—यह सब कभी इस जगह की पहचान था। लेकिन एक ही रात के बाद सब कुछ बदल गया। कहा जाता है कि उस रात अस्पताल के पूरे एक विंग से अचानक चीखें उठीं और अगली सुबह वहाँ मौजूद कई लोग रहस्यमय परिस्थितियों में मृत मिले। सरकारी जाँच हुई, पर सच कभी सामने नहीं आया। अस्पताल हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। मुख्य फाटक पर बड़ा-सा बोर्ड लगा दिया गया—"प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित।" तब से वर्षों बीत गए। अब वहाँ केवल टूटी खिड़कियाँ, जंग लगे दरवाज़े, हवा में हिलते पेड़ और ऐसा सन्नाटा था जो किसी के भी भीतर बेचैनी भर देता था।

रुद्रकोट में स्थित सह्याद्रि के जंगलों के बीच बना वीरान मानसिक अस्पताल, बंद जंग लगा मुख्य गेट और "ENTRY STRICTLY PROHIBITED" का चेतावनी बोर्ड।
सह्याद्रि की पहाड़ियों में छिपा रुद्रकोट मानसिक अस्पताल... जहाँ वर्षों से कोई नहीं गया, क्योंकि कुछ दरवाज़े हमेशा के लिए बंद ही रहने चाहिए।


   आदित्य देवधर बिल्कुल अलग स्वभाव का था। ज़िंदगी को खुलकर जीने वाला, हर रहस्य को अपनी आँखों से देखने वाला और डर को केवल इंसान के दिमाग की उपज मानने वाला। पुराने किले, वीरान हवेलियाँ और बंद इमारतें उसकी सबसे बड़ी दिलचस्पी थीं। एक शाम दोस्तों के साथ बैठा था, तभी बातों-बातों में रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र का ज़िक्र छिड़ गया। कबीर ने गंभीर होकर कहा, "वहाँ जाने वाले कई लोग वापस नहीं लौटे।" रिया ने भी उसे रोकते हुए कहा कि सरकार ने आज तक वह जगह नहीं खोली, उसके पीछे कोई वजह होगी। लेकिन आदित्य हँस पड़ा। "डर इंसान पैदा करता है, जगह नहीं। लोग कहानियाँ बना-बनाकर अंधविश्वास फैलाते हैं।" दोस्तों ने बहुत समझाया, मगर उसने उसी समय मन बना लिया कि वह खुद वहाँ जाकर देखेगा। उसके लिए यह किसी भूत की तलाश नहीं, बल्कि अफवाहों की सच्चाई जानने की चुनौती थी।

   दो रात बाद आधी रात के करीब आदित्य बिना किसी को बताए अपनी बाइक लेकर रुद्रकोट पहुँच गया। दूर से ही जंग लगे लोहे का विशाल फाटक दिखाई दे रहा था। उस पर टंगा चेतावनी बोर्ड हवा के साथ चरमराकर हिल रहा था। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था कि अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। उसने टॉर्च जलाई, टूटी हुई दीवार के रास्ते अंदर घुस गया। लंबी अंधेरी गलियाँ, बिखरे हुए स्ट्रेचर, धूल से ढकी व्हीलचेयर और दीवारों पर उखड़ा हुआ पेंट—सब कुछ किसी भूले हुए समय की तरह खामोश पड़ा था। वह एक-एक कमरे में गया, तस्वीरें लीं और मुस्कुराते हुए बोला, "यही है लोगों का भूत?" लगभग दो घंटे तक वह पूरे परिसर में घूमता रहा। लौटने ही वाला था कि अस्पताल के पुराने महिला वार्ड के सामने उसके कदम अचानक रुक गए। बिना किसी वजह उसकी धड़कन तेज हो गई। उसे साफ महसूस हुआ कि कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है... उसकी चाल के साथ कोई और भी चल रहा है। उसने तुरंत पलटकर टॉर्च घुमाई। वहाँ कोई नहीं था। उसने खुद को समझाया, "बस वहम है," और वापस घर लौट आया।

आधी रात को रुद्रकोट मानसिक अस्पताल के अंधेरे गलियारे में टॉर्च लिए खड़ा आदित्य देवधर, दूर सफेद साड़ी में रहस्यमयी महिला की परछाईं दिखाई देती हुई।
आदित्य को पहली बार एहसास हुआ कि वह अस्पताल में अकेला नहीं था... कोई चुपचाप उसके हर कदम के साथ चल रहा था।


   अगली सुबह आदित्य ने पूरी बात दोस्तों को बताई। सबके चेहरों का रंग उड़ गया। कबीर गुस्से में बोला, "तू पागल है! अकेला चला गया?" लेकिन आदित्य हँसते हुए बोला, "कुछ नहीं था वहाँ। लोग बेवजह डरते हैं।" उसने मोबाइल में ली गई तस्वीरें भी दिखाईं। उनमें बस वीरानी थी। दोस्तों ने राहत की साँस ली, मगर रिया अब भी बेचैन थी। उसी रात आदित्य अपने कमरे में सो गया। आधी रात के बाद उसकी अचानक आँख खुली। ऐसा लगा जैसे नीचे हॉल में कोई धीरे-धीरे चल रहा हो। लकड़ी के फ़र्श पर कदमों की धीमी आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। उसने उठकर पूरा घर देखा। हर कमरा खाली था। वापस बिस्तर पर लेटा ही था कि इस बार किसी के फुसफुसाने जैसी बेहद हल्की आवाज़ उसके कानों तक पहुँची। वह घबरा गया, मगर आवाज़ अगले ही पल गायब हो गई। उसने खुद को समझाया कि शायद थकान की वजह से ऐसा लग रहा है। लेकिन उसके भीतर पहली बार एक अनजाना डर जन्म ले चुका था।

   अगले कुछ दिनों में सब कुछ बदलने लगा। कभी बिना हवा के दरवाज़ा अपने आप खुल जाता, कभी सीढ़ियों से किसी के उतरने की आहट आती। रात को लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर देर तक खड़ा है। एक शाम दफ़्तर से लौटते समय उसने अनायास घर की छत की ओर देखा। वहाँ सफेद साड़ी पहने एक औरत की धुँधली आकृति बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसने दोबारा देखा... छत खाली थी। उसने इसे भ्रम समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया। लेकिन उसी रात अचानक किसी आवाज़ से उसकी नींद खुली। कमरे के बाहर सीढ़ियों पर वही आकृति खड़ी थी। इस बार वह पहले से कहीं ज़्यादा साफ दिखाई दे रही थी। लंबे बिखरे बाल, झुका हुआ सिर और बिल्कुल अस्वाभाविक खामोशी। आदित्य का गला सूख गया। वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा... तभी वह आकृति बिना एक भी कदम उठाए उसकी ओर सरकने लगी।



आदित्य का शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। वह आकृति बिना कोई आवाज़ किए उसकी ओर बढ़ती चली आ रही थी। डर के मारे उसने पूरी ताकत से मुख्य दरवाज़ा खोला और घर से बाहर भाग निकला। उसे लग रहा था कि बस सड़क तक पहुँच जाए, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जहाँ भी वह मुड़ता, वही सफेद साया कुछ दूरी पर खड़ा दिखाई देता। कभी गली के मोड़ पर, कभी बिजली के खंभे के नीचे, तो कभी सामने वाली छत पर। उसने आँखें कसकर बंद कीं, फिर खोलीं... वह फिर वहीं थी। अगले कई दिनों तक आदित्य की ज़िंदगी एक डरावने सपने में बदल गई। वह ठीक से सो नहीं पाता, खाना छोड़ दिया और किसी से मिलना भी बंद कर दिया। उसने दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए। पड़ोसियों ने बताया कि रात में उसके घर से किसी औरत के धीमे रोने की आवाज़ें आती थीं, जबकि घर में वह अकेला रहता था। और फिर... एक सुबह सब कुछ अचानक शांत हो गया। आदित्य का फोन हमेशा के लिए बंद हो चुका था।

जब तीन दिन तक आदित्य का कोई पता नहीं चला, तो कबीर, रिया, निखिल और समीर उसके घर पहुँचे। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था। अंदर का नज़ारा देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। घर की सारी लाइटें जल रही थीं, लेकिन कहीं कोई नहीं था। कमरे अस्त-व्यस्त पड़े थे, कुर्सी उलटी गिरी थी और आदित्य का मोबाइल ज़मीन पर टूटा हुआ मिला। पूरे घर की तलाशी ली गई—छत, स्टोर रूम, पिछवाड़ा, हर कोना। लेकिन आदित्य जैसे हवा में गायब हो चुका था। उसी दिन पुलिस में शिकायत दर्ज हुई। पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी और आसपास के इलाकों की जाँच की। जंगल भी छान मारे गए, झील में खोज अभियान चला, मगर कोई सुराग नहीं मिला। दिन हफ्तों में बदल गए। धीरे-धीरे सबने ने मान लिया कि शायद आदित्य अब कभी वापस नहीं आएगा। 

---

रुद्रकोट मानसिक अस्पताल के महिला वार्ड में तूफानी रात के दौरान फर्श पर पड़े आदित्य देवधर का निर्जीव शरीर और दूर खड़ी सफेद साड़ी वाली रहस्यमयी आकृति।
जब लोग आदित्य को हर जगह खोज रहे थे, तब रुद्रकोट ने उसका सबसे भयावह सच अपने अंधेरे गलियारों में छिपा रखा था।


करीब दो हफ्तों बाद बरसात की एक अँधेरी रात थी। रुद्रकोट मानसिक आरोग्य केंद्र के आसपास फिर वही घना कोहरा छाया हुआ था। हवा टूटी खिड़कियों से गुजरते हुए सीटी जैसी आवाज़ पैदा कर रही थी। अस्पताल के महिला वार्ड के सामने वही पुराना गलियारा पूरी तरह अंधेरे में डूबा था—ठीक वही जगह जहाँ आदित्य ने पहली बार महसूस किया था कि कोई उसके साथ चल रहा है। बिजली चमकी। एक पल के लिए पूरा गलियारा सफेद रोशनी से भर गया... और फर्श पर एक इंसानी शरीर दिखाई दिया। अगले ही क्षण फिर अंधेरा छा गया। दूसरी बिजली चमकी तो चेहरा साफ दिखाई दिया—वह आदित्य देवधर था। उसकी निर्जीव आँखें छत की ओर खुली हुई थीं, मानो मरने से पहले उसने किसी ऐसी चीज़ को देखा हो जिसे शब्दों में बयान करना संभव नहीं था। उसके शरीर पर किसी हमले का कोई स्पष्ट निशान नहीं था। बस उसके चेहरे पर जमी हुई दहशत बता रही थी कि मौत आने से पहले उसने ऐसा भय देखा था, जो किसी इंसान की कल्पना से भी परे था।




समाप्त।

बारिश की वो रात

 

आज से कई दशक पहले...

जब गाँवों तक पक्की सड़कें भी नहीं पहुँची थीं...

तब ज़िंदगी बिल्कुल अलग हुआ करती थी।

उस समय न  कस्बे में अस्पताल होते थे...

न गाँव में डॉक्टर।

बच्चे का जन्म घर के एक  कमरे में होता था।

परिवार के लोग बाहर बेचैनी से इंतज़ार करते...

और भीतर...

एक ही औरत नई ज़िंदगी को इस दुनिया में लाने की ज़िम्मेदारी संभालती।

उसे लोग "दाई" कहते थे।

दाई सिर्फ़ बच्चे की डिलीवरी नहीं कराती थी...

वह पूरे गाँव का भरोसा होती थी।

उसके अनुभव पर लोगों को डॉक्टर से भी ज़्यादा विश्वास होता था।

आँधी-तूफ़ान हो...

या मूसलाधार बारिश...

अगर किसी घर से खबर आती कि प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है...

तो दाई बिना एक पल की देरी किए निकल पड़ती।

क्योंकि उस दौर में...

एक छोटी-सी देर...

माँ और बच्चे...

दोनों की जान ले सकती थी।

ऐसी ही एक दाई थी...

सुमन दाई।

पूरे इलाके में उसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था।

उम्र साठ के आसपास...

चेहरे पर झुर्रियाँ...

लेकिन आँखों में गज़ब का आत्मविश्वास।

" इलाके में जितने बच्चे दौड़ते-भागते दिखाई देते हैं... उनमें से आधे से ज़्यादा ने पहली साँस सुमन दाई की हथेलियों में ली है।"

पास के कई गाँवों से भी लोग उसे बुलाने आते थे।

कोई कभी भी  बुलाने आ जाता  

आधी रात को...

कई बार तेज़ बारिश में...

तो कभी घने जंगल पार करके भी।

लेकिन उसने कभी किसी को मना नहीं किया।

उसके लिए हर जन्म...

भगवान का काम था।

और शायद...

इसी फ़र्ज़ ने एक रात...

उसे ऐसी जगह पहुँचा दिया...

जहाँ जाने की हिम्मत कोई इंसान नहीं कर सकता..

Amavasya ki raat mein Suman Dai apni jhopdi ka darwaza kholkar rahasyamayi aadmi aur bailgadi ko dekhti hui.
आधी रात... मूसलाधार बारिश... और एक दस्तक जिसने सुमन दाई की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।


वह अमावस्या की रात थी।

काले बादलों ने पूरे आकाश को निगल लिया था।

बारिश लगातार बरस रही थी...

ऐसी कि छप्पर पर गिरती हर बूँद किसी ढोल की चोट जैसी सुनाई दे रही थी।

हवा इतनी तेज़ थी कि मिट्टी की झोपड़ियों के दरवाज़े अपने आप काँप उठते।

दूर कहीं बिजली चमकती...

और एक पल के लिए पूरा गाँव दूधिया रोशनी में नहा जाता।

फिर...

सब कुछ पहले से भी गहरे अँधेरे में डूब जाता।

ऐसा अँधेरा...

जिसमें अपने ही हाथ दिखाई न दें।

पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा था।

कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़..

भी नहीं आ रही थी..

मानो इस रात ने हर जीव की आवाज़ छीन ली हो।

सिर्फ़ बारिश...

और गरजते बादल।

उसी सन्नाटे को चीरती हुई...

ठक... ठक... ठक...

सुमन दाई की झोपड़ी का दरवाज़ा काँप उठा।

दस्तक इतनी अचानक थी...

कि गहरी नींद में सोई सुमन दाई भी घबराकर उठ बैठी।

उसने दीवार पर टंगी लालटेन जलाई।

पीली लौ काँप रही थी...

मानो उसे भी बाहर खड़ी चीज़ का डर हो।

दस्तक फिर हुई...

इस बार पहले से ज़्यादा ज़ोर से।

धड़... धड़... धड़...

सुमन धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँची।

एक पल के लिए उसके हाथ कुंडी पर ही रुक गए।

इतनी रात...

इस तूफ़ान में...

कौन हो सकता है?

उसने भगवान का नाम लिया...

और कुंडी खोल दी।

उसी क्षण...

आकाश में एक तेज़ बिजली चमकी।

उस एक पल की रोशनी में उसने सामने खड़े आदमी को देखा।

लंबा कद...

भारी शरीर...

घनी, नीचे की ओर झुकी हुई काली मूँछें...

सिर से पाँव तक भीगा हुआ।

उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था...

लेकिन अजीब बात यह थी...

इतनी तेज़ बारिश के बावजूद...

उसके पैरों के पास की मिट्टी पर एक भी पदचिह्न नहीं था।

"दाई..."

उसने भारी, थकी हुई आवाज़ में कहा,

"मेरी बहू की जान खतरे में है... दर्द शुरू हुए कई घंटे हो गए हैं।"

"जल्दी चलो... देर हुई तो दोनों नहीं बचेंगे।"

सुमन ने बिना देर किए अपना पुराना थैला उठाया।

फिर पूछा,

"कौन-से गाँव से आए हो बेटा?"

आदमी ने एक पल उसकी आँखों में देखा...

फिर धीरे से बोला—

"रामपुर..."

सुमन ने माथे पर हल्की शिकन डाली।

रामपुर...

उसने नाम तो सुना था...

लेकिन कभी वहाँ गई नहीं थी।

"इतनी दूर इस मौसम में कैसे आए?"

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस मुड़कर चलने लगा।

बाहर...

एक पुरानी बैलगाड़ी खड़ी थी।

दो सफेद बैल...

बारिश में बिल्कुल स्थिर।

न सिर हिला रहे थे...

न पूँछ।

बस अँधेरे में बिना पलक झपकाए सामने देख रहे थे।

सुमन का मन एक पल को जाने क्यों घबरा उठा...

लेकिन किसी प्रसूता की जान का सवाल था।

वह बैलगाड़ी में बैठ गई।

बैलगाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

पहले कच्चा रास्ता आया...

फिर खेत...

और कुछ ही देर में...

गाँव की आख़िरी झोपड़ी भी पीछे छूट गई।

अब चारों ओर सिर्फ़ घना जंगल था।

बरसात से भीगे पेड़ों की डालियाँ हवा में ऐसे झूल रही थीं जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें हिला रहा हो।

कभी बिजली चमकती...

तो सूखे तनों की परछाइयाँ इंसानों जैसी लगतीं।

फिर सब कुछ फिर से अँधेरे में डूब जाता।

सुमन दाई ने कई बार पूछा,

"बेटा... तुम्हारा गाँव अभी कितना दूर है?"

हर बार वही जवाब मिलता...

"बस... पहुँच गए।"

लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

उसका दिल अब धीरे-धीरे घबराने लगा।

करीब एक घंटे बाद बैलगाड़ी एक पुराने, जर्जर मकान के सामने रुकी।

चारों तरफ़ जंगल...

दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं।

बस बारिश...

और उस टूटे हुए मकान की चरमराती लकड़ियाँ।

घर के भीतर कदम रखते ही सुमन ठिठक गई।

कमरे में सीलन की ऐसी गंध थी...

मानो बरसों से वहाँ धूप ही न आई हो।

दीवारों का पलस्तर उखड़ा हुआ था।

छत से जगह-जगह पानी टपक रहा था।

एक कोने में मिट्टी का दिया टिमटिमा रहा था।

उसकी काँपती लौ से दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बन रही थीं।

सामने...

एक पुरानी खाट पर...

एक औरत प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी।

उसका चेहरा आधे घूँघट में छिपा था।

वह दर्द से कराह रही थी...

लेकिन उसकी आवाज़...

जाने क्यों...

कमरे में गूँजती नहीं थी।

जैसे कोई आवाज़...

दीवारें अपने भीतर ही निगल लेती हों।

सुमन अपने काम में लग गई।

समय बीतता गया।

बाहर बारिश लगातार बरसती रही।

कभी उसे लगा...

कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है।

वह पलटी...

कोई नहीं।

फिर लगा...

खिड़की से कई चेहरे उसे घूर रहे हैं।

बिजली चमकी...

खिड़की खाली थी।

उसने खुद को समझाया,

"डर मत सुमन... तू अपना काम कर।"

कई घंटों की कोशिश के बाद...

आख़िर बच्चे के रोने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।

Ghane jungle ke beech purane sunsaan ghar mein Suman Dai prasav karati hui aur andhere mein khada rahasyamayi aadmi.
जहाँ हर दीवार एक राज़ छुपाए बैठी थी... और हर परछाई किसी अनजानी मौजूदगी का एहसास करा रही थी।


पहली बार उस आदमी के चेहरे पर मुस्कान आई।

उसने बच्चे को दोनों हाथों से उठाया...

उसकी आँखें भर आईं।

धीरे से बोला,

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

सुमन ने राहत की साँस ली।

कुच डेर बच्चे का सब करने के बाद

सुमन दाई 

"अब चलती हूँ... मेहनताना दे दो।"

आदमी कुछ देर चुप रहा।

फिर बिना कुछ कहे अंदर चला गया।

थोड़ी देर बाद लौटा...

उसके हाथ में कोयले के कुछ काले टुकड़े थे।

"मेरे पास देने के लिए यही है।"

सुमन हैरान रह गई।

"अरे... इसका मैं क्या करूँ?"

आदमी बस मुस्कुराया।

"कभी-कभी...

जो कोयला दिखाई देता है...

वह कोयला नहीं होता।"

उसकी बात सुमन की समझ में नहीं आई।

वह उसे बैलगाड़ी में बैठाकर वापस छोड़ गया।

घर पहुँचते ही सुमन झुँझलाकर बोली,

"अजीब आदमी था...

रातभर जान खपा दी...

और बदले में मुट्ठीभर कोयले दे गया।"

उसने वे सारे कोयले घर के एक कोने में फेंक दिए...

और थककर सो गई।

सुबह...

बारिश थम चुकी थी।

सूरज की हल्की किरणें झोपड़ी में उतर रही थीं।

सुमन झाड़ू लगा रही थी कि अचानक...

टन...!

झाड़ू किसी धातु से टकराई।

उसने नीचे देखा।

मिट्टी में...

एक चमचमाता हुआ...

सोने का सिक्का।

वह हैरान रह गई।

कुछ कदम आगे...

दूसरा सिक्का।

फिर तीसरा...

फिर चौथा।

उसे अचानक रात वाले कोयले याद आए।

वह दौड़कर उसी कोने में पहुँची...

जहाँ उसने उन्हें फेंका था।

लेकिन वहाँ अब कोयले नहीं थे।

पूरा कोना...

सोने के पुराने सिक्कों से भरा पड़ा था।

सुमन की साँसें तेज़ हो गईं।

Subah Suman Dai mitti ke ghar mein koylon ki jagah chamakte sone ke sikke dekhkar hairan hoti hui
रात को मिले साधारण कोयले... सुबह बन चुके थे सोने के सिक्के। लेकिन क्या सचमुच यह किसी इनाम की शुरुआत थी... या एक भयावह रहस्य की?


उसी समय...

दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ लगाई।

"दाई... सुना है रात तुम रामपुर गई थीं?"

"हाँ..."

सुमन ने जवाब दिया।

सामने खड़ा बूढ़ा आदमी एकदम सन्न रह गया।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

काँपती आवाज़ में बोला...

"रामपुर...? .. रामपुर तो पच्चीस साल पहले भूस्खलन में पूरा दब गया था। वहाँ का एक भी आदमी ज़िंदा नहीं बचा था..."

सुमन के हाथ से सोने का सिक्का गिर पड़ा।

उसके कानों में रात वाले आदमी की आख़िरी बात गूँजने लगी—

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

उस दिन के बाद...

सुमन ने कभी उन सिक्कों को हाथ नहीं लगाया 

वह सोना आज भी उसके पुराने संदूक में रखा है।

और हर अमावस्या की बरसाती रात...

जब घड़ी में डेढ़ बजते हैं...

तो उसी जंगल की तरफ़ से...

बैलगाड़ी के पहियों की धीमी चरमराहट सुनाई देती है।

जैसे...

कोई फिर किसी दाई को लेने आया हो।

समाप्त।



जो भी हो जाए, बाहर मत उतरना

 

रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे थे।

आसमान पर काले बादलों की मोटी चादर फैली हुई थी। कहीं-कहीं दूर बिजली चमकती और फिर सब कुछ पहले से भी ज्यादा अंधेरे में डूब जाता।

रोहित अपनी कार चलाते हुए शहर लौट रहा था।

उसके मोबाइल का स्पीकर ऑन था।

"हाँ सुनो, बस दो-तीन घंटे और लगेंगे... फिर घर पहुँच जाऊँगा।"

दूसरी तरफ उसकी पत्नी ने कहा, "इतनी रात को मत चलो। किसी होटल में रुक जाओ।"

रोहित हँस पड़ा।

"अरे चिंता मत करो। बस रास्ता नया है तो क्या, जल्दी पाहुच जा

पत्नी ने कुछ और कहा, लेकिन तभी फोन कट गया।

नेटवर्क गायब हो चुका था।

रोहित ने चारों तरफ देखा।

सड़क के दोनों ओर घना जंगल था।

न कोई वाहन।

न कोई घर।

न कोई रोशनी।

बस उसकी कार की हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थीं।

उसे थोड़ा अजीब लग रहा था।

लेकिन वह चलता रहा।

तभी...

आधी रात में घने जंगल के बीच सफेद कार चलाता एक भारतीय व्यक्ति, सड़क किनारे खड़ी रहस्यमयी बूढ़ी औरत, भयावह वातावरण।
उस रात जंगल में मिली एक बूढ़ी औरत ने सिर्फ एक चेतावनी दी थी—"जो भी हो जाए, बाहर मत उतरना।"


हेडलाइट्स की रोशनी में सड़क के किनारे कोई आकृति दिखाई दी।

एक बूढ़ी औरत।

सफेद बाल।

पुरानी साड़ी।

हाथ में लकड़ी की लाठी।

वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

इतनी रात में...

इतने सुनसान जंगल में...

उसे देखकर रोहित के मन में अजीब-सा डर पैदा हुआ।

फिर उसने सोचा शायद किसी गाँव की होगी।

उसने कार रोक दी।

"माँजी, कहाँ जाना है?"

बूढ़ी औरत धीरे से मुस्कुराई।

"बेटा, आगे तक छोड़ देगा?"

रोहित ने दरवाजा खोल दिया।

वह पीछे की सीट पर बैठ गई।

कार फिर चल पड़ी।

कुछ मिनट तक खामोशी रही।

फिर बूढ़ी औरत ने पूछा,

"कहाँ जा रहे हो बेटा?"

"शहर... ।"

"अच्छा "

उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ममता थी।

जैसे कोई अपनी संतान से बात कर रहा हो।

कुछ देर बाद बूढ़ी औरत अचानक बोली,

"रास्ता भूल गए हो न?"

रोहित चौंका।

"हाँ... आपको कैसे पता?"

वह बस हल्का-सा मुस्कुराई।

कोई जवाब नहीं दिया।

कार आगे बढ़ती रही।

फिर लगभग पंद्रह मिनट बाद बूढ़ी औरत ने कहा,

"बस यहीं रोक दो।"

रोहित ने ब्रेक लगा दिए।

और अगले ही पल उसका दिल बैठ गया।

चारों तरफ घना जंगल था।

इतना घना कि हेडलाइट्स की रोशनी भी निगल ली जाए।

दूर-दूर तक कोई घर नहीं।

कोई रास्ता नहीं।

कुछ भी नहीं।

"माँजी... यहाँ?"

बूढ़ी औरत कार से उतर गई।

फिर खिड़की के पास आकर बोली,

"मेरी चिंता मत करो।"

रोहित कुछ समझ पाता, उससे पहले उसने अगली बात कही—

"लेकिन ध्यान से सुनो..."

उसकी आँखें अचानक बहुत गंभीर हो गईं।

"अब आगे चाहे कुछ भी दिखे... कोई भी आवाज़ दे... कोई भी मदद माँगे..."

वह एक पल रुकी।

"कार से बाहर मत उतरना।"

"क्यों?"

बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

बस दोबारा बोली—

"जो भी हो जाए... बाहर मत उतरना।"

फिर वह अंधेरे में चली गई।

और कुछ ही सेकंड में गायब हो गई।

रोहित देर तक उसे देखता रहा।

फिर सिर झटककर आगे बढ़ गया।

करीब दस मिनट बाद...

उसे सड़क के बीचोंबीच एक आदमी दिखाई दिया।

वह हाथ हिलाकर मदद माँग रहा था।

उसके कपड़े खून से सने हुए लग रहे थे।

रोहित का दिल पसीज गया।

उसने ब्रेक लगा दिए।

फिर अचानक उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

"कार से बाहर मत उतरना..."

उसने काँच के पार देखा।

वह आदमी सिर झुकाए खड़ा था।

फिर धीरे-धीरे उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

रोहित का खून जम गया।

उसकी आँखें नहीं थीं।

सिर्फ काले गहरे गड्ढे।

रोहित ने तुरंत एक्सीलेरेटर दबा दिया।

कार तेजी से आगे निकल गई।

सुनसान जंगल की सड़क पर कार के अंदर बैठा डरा हुआ व्यक्ति, सामने खड़ी भयानक प्रेतात्मा, चारों ओर घना अंधेरा और कोहरा।
बस एक पल के लिए उसने कार का दरवाजा खोलने का सोचा... लेकिन वही फैसला उसकी जान बचा गया।


उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं।

लेकिन असली डर अभी बाकी था।

कुछ देर बाद उसे पीछे से बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

एकदम साफ।

जैसे कोई छोटा बच्चा कार की डिक्की में बंद हो।

रोहित घबरा गया।

आवाज़ लगातार बढ़ रही थी।

"मम्मी... बचाओ..."

"मुझे बाहर निकालो..."

रोहित ने कार रोक दी।

उसका हाथ दरवाजे पर चला गया।

वह बाहर निकलकर डिक्की देखने ही वाला था।

उंगलियाँ लॉक तक पहुँच चुकी थीं।

तभी...

उसे बूढ़ी औरत की  याद आई।

"चाहे कुछ भी हो जाए..."

उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

वह फिर आगे बढ़ गया।

और तभी...

रोने की आवाज़ अचानक राक्षसी हँसी में बदल गई।

ऐसी हँसी...

जिसे सुनकर उसकी रीढ़ में बर्फ उतर गई।

रात और गहरी होती जा रही थी।

जंगल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।

फिर अचानक कार के सामने एक औरत दिखाई दी।

लंबे काले बाल।

सफेद कपड़े।

सड़क के बीचोंबीच खड़ी।

रोहित ने जोर से ब्रेक लगाए।

औरत धीरे-धीरे उसकी कार की ओर बढ़ने लगी।

उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।

फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

और अगले ही पल...

उसका चेहरा दिखाई दिया।

चेहरा नहीं...

सिर्फ सड़ा हुआ मांस।

काले दाँत।

खून से भरी आँखें।

रोहित चीख पड़ा।

उसने कार मोड़ी और पूरी रफ्तार से आगे निकल गया।

पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।

लगभग आधे घंटे बाद...

उसे दूर कहीं रोशनी दिखाई दी।

एक गाँव।

रोहित की जान में जान आई।

वह तेजी से वहाँ पहुँचा।

गाँव के किनारे एक पुराने घर का दरवाजा खटखटाया।

कुछ देर बाद एक अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला।

रोहित की हालत देखकर वह उसे तुरंत अंदर ले गया।

पानी दिया।

बैठाया।

जब रोहित सामान्य हुआ तो उसने पूरी कहानी सुना दी।

सब कुछ।

बूढ़ी औरत से लेकर जंगल की भयानक घटनाओं तक।

सुनकर उस आदमी का चेहरा गंभीर हो गया।

"तुम बहुत भाग्यशाली हो।"

"क्यों?"

"उस जंगल में रात को लोग नहीं जाते।"

"क्यों?"

"क्योंकि वहाँ जो दिखता है... वह इंसान नहीं होता।"

रोहित की रूह काँप गई।

"लेकिन मैं बच कैसे गया?"

आदमी कुछ पल चुप रहा।

फिर उसकी नजर दीवार पर लगी एक तस्वीर पर गई।

"शायद... इसकी वजह से।"

रोहित ने तस्वीर की तरफ देखा।

और उसकी साँस रुक गई।

वह कुर्सी से लगभग उछल पड़ा।

तस्वीर में वही बूढ़ी औरत थी।

वही चेहरा।

वही मुस्कान।

वही आँखें।

"ये... ये तो वही है!"

आदमी की आँखें भर आईं।

"ये मेरी माँ थीं।"

"क्या?"

"दो साल पहले इसी जंगल में लापता हो गई थीं। बहुत खोजा... लेकिन कभी नहीं मिलीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर आदमी धीमी आवाज़ में बोला—

"लेकिन गाँव वाले कहते हैं कि उनकी आत्मा आज भी उस जंगल में भटकती है।"

"भटकती है?"

"हाँ... मगर किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं।"

उसने तस्वीर की तरफ देखा।

गांव के घर में दीवार पर लगी बूढ़ी औरत की तस्वीर को हैरानी से देखता यात्री, पास खड़ा घर का मालिक रहस्य बताता हुआ।
जब उसने तस्वीर देखी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई—जिस बूढ़ी औरत ने उसकी जान बचाई थी, वह दो साल पहले मर चुकी थी।


"मुसीबत में फँसे लोगों को बचाने के लिए।"

रोहित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

अगली सुबह...

सूरज निकल चुका था।

रोहित ने उस आदमी का धन्यवाद किया और घर के लिए निकल पड़ा।

कुछ देर बाद जंगल खत्म हो गया।

सामने चौड़ा हाईवे था।

उसे लगा अब सब खत्म हो चुका है।

अब वह सुरक्षित है।

खौफनाक जिन्न

उसने राहत की लंबी साँस ली।

फिर आदतन रियर-व्यू मिरर में देखा।

और उसका दिल एक पल के लिए थम गया।

बहुत दूर...

जंगल की शुरुआत पर...

वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

सुबह की धूप में।

शांत मुस्कान के साथ।

वह उसे देख रही थी।

जैसे विदा दे रही हो।

रोहित की आँखें नम हो गईं।

उसने हल्का-सा सिर झुकाया।

और जब दोबारा आईने में देखा...

वहाँ कोई नहीं था।

सिर्फ खाली सड़क।

और दूर खड़ा वह रहस्यमय जंगल...

जहाँ शायद आज भी एक माँ की आत्मा, अजनबियों को अपना बेटा समझकर उनकी जान बचाती है।

समाप्त.