मेरा नाम वृंदा है। आज मैं आपको जो बताने जा रही हूँ, वह कोई कहानी नहीं है। यह मेरे जीवन का एक ऐसा अनुभव है, जिसके बारे में सोचते ही आज भी मेरे हाथ ठंडे पड़ जाते हैं।
मैं यह नहीं कहूँगी कि जो मैंने देखा वह भूत था, क्योंकि सच कहूँ तो मैं आज तक नहीं जानती कि वह क्या था।
लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि उस रात, उस घर में, मैं और मेरी पाँच साल की बेटी अकेले नहीं थे।
यह घटना लगभग पाँच साल पुरानी है।
मेरे पति लोक निर्माण विभाग (PWD) में इंजीनियर हैं। उन दिनों उनका तबादला जळगाँव से नाशिक हो गया था। विभाग की तरफ़ से हमें एक सरकारी क्वार्टर मिला था, लेकिन वह शहर से काफ़ी दूर था और उसकी हालत भी अच्छी नहीं थी। इसलिए हमने किराए पर घर लेने का फैसला किया।
![]() |
| नाशिक पहुँचने के बाद यह घर पहली नज़र में सामान्य लगा, लेकिन न जाने क्यों इसे देखते ही मन में एक अजीब-सी घबराहट पैदा हुई। |
कई घर देखने के बाद हमें एक घर पसंद आ गया।
घर अच्छा था। किराया भी हमारी पहुँच में था और मेरे पति के ऑफिस से भी ज़्यादा दूर नहीं था। लेकिन न जाने क्यों, उस घर को देखते ही मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी हुई थी।
वह घर बाकी घरों से थोड़ा हटकर बना हुआ था। सामने एक संकरी गली थी, और पीछे एक खाली मैदान, जिसमें शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था। घर के दोनों तरफ़ मकान तो थे, लेकिन उसके आसपास हमेशा एक अजीब-सी ख़ामोशी महसूस होती थी।
घर के मालिक ने बस इतना कहा था, "दो साल से घर खाली पड़ा था। अब आप लोग आ रहे हैं, अच्छा लग रहा है।"
उस समय हमने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
शिफ्ट होने के शुरुआती कुछ दिन बिल्कुल सामान्य रहे।
मेरे पति सुबह ऑफिस चले जाते और मैं अपनी पाँच साल की बेटी के साथ घर पर रहती। धीरे-धीरे मेरी पहचान दो घर छोड़कर रहने वाली शोभा चाची से हो गई। वे बहुत अच्छी थीं। लेकिन एक बात मैंने कई बार नोटिस की—जब भी हमारे घर का ज़िक्र होता, उनके चेहरे पर एक पल के लिए अजीब-सा भाव आ जाता।
घर में आए लगभग एक हफ्ता हुआ होगा, जब मैंने कुछ अजीब बातें महसूस करनी शुरू कीं।
कई बार मैं रसोई में काम कर रही होती और अचानक देखती कि मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ है। जबकि मुझे पूरा यकीन होता था कि मैंने उसे अंदर से बंद किया था।
एक दिन मैं छत पर कपड़े सुखा रही थी। अचानक मुझे लगा कि कोई मेरे पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया है।
मुझे लगा की मेरे पती जल्दी आ गये है..
मैंने बिना पीछे देखे कहा, "इतनी जल्दी आ गए आज?"
लेकिन जब मैं पलटी...
वहाँ कोई नहीं था।
कुछ सेकंड तक मैं सीढ़ियों को देखती रही। हवा चल रही थी। कपड़े हिल रहे थे। लेकिन वहाँ मेरे अलावा कोई नहीं था।
उस शाम मैंने यह बात शोभा चाची को बताई।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, जैसे कुछ कहना चाहती हों।
लेकिन फिर मुस्कुराकर बोलीं, "नया घर है बेटी, थोड़ा समय लगेगा आदत होने में।"
उनकी आवाज़ सामान्य थी।
लेकिन उनकी आँखें नहीं।
दिन बीतते गए और घर का माहौल बदलने लगा।
कभी पंखा अपने आप बंद हो जाता।
कभी रात में रसोई से बर्तनों के खनकने की आवाज़ आती।
कभी ऐसा लगता कि कोई ड्रॉइंग रूम में टहल रहा है।
मैंने इन सब बातों को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। मैंने अपने पति को कुछ नहीं बताया। मुझे लगा, वे मेरी बात का मज़ाक उड़ा देंगे।
लेकिन फिर एक दिन ऐसा हुआ, जिसने पहली बार मुझे भीतर तक डरा दिया।
मैंने बेटी को दोपहर में सुला दिया था और रसोई में खाना बना रही थी।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा है।
यह सिर्फ़ एहसास नहीं था।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई लगातार मुझे देख रहा हो।
मेरे हाथ रुक गए।
मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
मैंने राहत की साँस ली ही थी कि उसी समय बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आने लगी।
बिल्कुल ऐसे...
जैसे कोई बाल्टी से पानी डालकर नहा रहा हो।
![]() |
| उस दोपहर पहली बार मुझे ऐसा महसूस हुआ कि घर में कोई मुझे लगातार देख रहा है—लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर वहाँ कोई नहीं था। |
मुझे आज भी याद है, उस समय मेरे हाथ काँपने लगे थे।
मैंने हिम्मत जुटाई और बाथरूम का दरवाज़ा खोला।
अंदर कोई नहीं था।
लेकिन फर्श गीला था।
उस रात मैंने पहली बार अपने पति को सब कुछ बताया।
उन्होंने मेरी बातें सुनीं और फिर हँसते हुए कहा, "तुम दिन भर अकेली रहती हो, इसलिए ज़्यादा सोचने लगी हो।"
मैं चुप हो गई।
लेकिन उस दिन के बाद मुझे लगने लगा था कि उस घर में कुछ तो था।
फिर वह रात आई...
जिसे मैं चाहकर भी कभी नहीं भूल सकती।
उस दिन मेरे पति को अचानक काम से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने फोन करके बताया कि वे रात को घर नहीं आएँगे।
यह सुनकर मेरा मन और भी बेचैन हो गया।
मैंने घर के सारे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर दीं। बेटी को अपने पास सुलाया ....कमरे की लाइट बंद करने की हिम्मत नहीं हुई।
मुझे पता था...
उस रात मुझे नींद नहीं आने वाली।
पता नहीं रात के कितने बजे होंगे कि अचानक कुछ आहट हुई।
कमरे में इतनी ख़ामोशी थी कि मुझे अपनी साँसों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।
मैंने मोबाइल उठाकर देखा।
रात के 12 बजकर 37 मिनट हो रहे थे।
तभी मुझे घर के बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दी।
और फिर...
ऐसा लगा जैसे कोई नंगे पैर घर में चल रहा हो।
मैंने खुद को समझाया कि यह मेरा वहम है।
लेकिन तभी मुझे ध्यान आया...
बेडरूम का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।
मुझे पूरा यकीन था कि मैंने उसे बंद किया था।
मेरा गला सूख चुका था।
मैं धीरे-धीरे उठी और दरवाज़े तक गई।
ड्रॉइंग रूम की लाइट अभी भी जल रही थी।
लेकिन रसोई की तरफ़ कुछ ऐसा था, जिसने मेरे शरीर का सारा खून जैसे जमा दिया।
पहले मुझे लगा, शायद कोई कपड़ा टँगा हुआ है।
फिर वह हल्का-सा हिला।
वह एक औरत थी।
लाल साड़ी में।
वह रसोई के बीचों-बीच खड़ी थी। उसके लंबे बाल उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे और उसका सिर नीचे झुका हुआ था।
मैं चाहकर भी अपनी नज़रें उससे नहीं हटा पा रही थी।
फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
आज भी मैं नहीं कह सकती कि मैंने उसका चेहरा साफ़ देखा था या नहीं।
लेकिन उसकी आँखें...
वे मुझे आज भी याद हैं।
वह सीधे मुझे देख रही थी।
और फिर मुझे एक बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी।
जैसे कोई रो रहा हो।
या शायद...
हँस रहा हो।
मैं आज तक नहीं समझ पाई।
![]() |
| रात के 12:37 बजे थे। मैं और मेरी बेटी अकेले थे... या कम-से-कम मुझे ऐसा ही लगता था। |
बस, उसके बाद मैं पूरी ताकत से भागी, बेटी को उठाया और बेडरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया।
कुछ ही सेकंड बाद...
ठक...
दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
ठक...
ठक...
ठक...
अब दस्तक लगातार होने लगी थी।
मेरी बेटी डर के मारे रोने लगी थी और मैं उसे सीने से लगाए भगवान का नाम ले रही थी।
फिर अचानक...
सब कुछ शांत हो गया।
इतनी शांति कि मेरे कानों में सिर्फ़ मेरे दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।
मैंने सोचा, शायद सब खत्म हो गया।
और तभी...
मेरी नज़र दरवाज़े के ऊपर बने छोटे से वेंटिलेशन पर गई।
आज भी काश मैं उस तरफ़ न देखती।
वहाँ कोई था।
मुझे सिर्फ़ दो आँखें दिखाई दे रही थीं।
वे बिना पलक झपकाए लगातार मुझे देख रही थीं।
उसके बाद मुझमें वहाँ एक पल भी रुकने की हिम्मत नहीं बची।
मैंने बेटी को उठाया, दरवाज़ा खोला और घर से बाहर भाग गई।
उस रात मैं सीधे शोभा चाची के घर पहुँची।
मैं इतनी बुरी तरह काँप रही थी कि मुझसे ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था।
उन्होंने मुझे पानी दिया और सारी रात मेरे पास बैठी रही।
उसके बाद हमने वह घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।
लेकिन जाने से पहले शोभा चाची ने मुझे एक ऐसी बात बताई, जिसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उन्होंने बताया कि दो साल पहले उसी घर में एक विवाहित महिला की मौत हुई थी।
लोगों से कहा गया था कि उसने आत्महत्या की थी।
लेकिन मोहल्ले में लोग दबे स्वर में कहते थे कि उसे उसके ससुराल वालों ने बहुत प्रताड़ित किया था, और उसकी मौत एक हादसा नहीं थी।
उसकी मौत के कुछ दिनों बाद उसकी सास सीढ़ियों से गिरकर मर गई।
ससुर को लकवा मार गया।
और उसका पति वह घर छोड़कर कहीं और चला गया।
तब से वह घर बंद पड़ा था।
शोभा चाची ने मुझसे कहा, "मैं तुम्हें कई बार बताना चाहती थी, लेकिन फिर लगा कि तुम लोग पढ़े-लिखे हो। शायद मेरी बात पर विश्वास नहीं करोगी।"
आज इस घटना को पाँच साल हो चुके हैं।
मैं नहीं जानती कि उस रात मैंने जो देखा, वह क्या था।
डर?
मेरा वहम?
या फिर...
.webp)
.webp)
.webp)



.webp)
.webp)
.webp)


.webp)


