उदयगिरी का पहाड़…
दिन में भी काला दिखाई देता था।
उस पहाड़ के पीछे फैला था — “काली घाटी का जंगल।”
इतना घना कि सूरज की रोशनी भी अंदर जाने से डरती थी। पेड़ों की शाखाएँ आपस में ऐसे उलझी थीं जैसे किसी ने जानबूझकर आसमान को बंद कर दिया हो। हवा वहां अलग चलती थी… भारी… सड़ी हुई… और अजीब फुसफुसाहटों से भरी।
गांव के बूढ़े कहते थे—
“अमावस की रात… जंगल जिंदा हो जाता है।”
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| अमावस से पहले की वह शाम… जब दीनू और उसके पिता ने काली घारी जंगल में कदम रखा, बिना यह जाने कि जंगल उन्हें देख रहा था। 🌲🌑 |
कई लोग गायब हुए थे।
कुछ कभी लौटे नहीं…
और जो लौटे… वो पहले जैसे नहीं रहते।
किसी की आँखें सफेद हो गई थीं।
किसी ने बोलना छोड़ दिया था।
एक आदमी तो लौटकर सिर्फ एक ही बात बोलता रहा—
“जंगल बुला रहा है…”
फिर उसने कुएं में कूदकर जान दे दी।
उसके बाद गांववालों ने जंगल के पास जाना छोड़ दिया।
लेकिन गरीबी… डर से बड़ी होती है।
और यही बात सबसे अच्छे से समझता था — दीनू ।
दीनू पंद्रह साल का दुबला-पतला लड़का था। आंखों में जिद और चेहरे पर वही मजबूरी… जो गरीब बच्चों को जल्दी बड़ा बना देती है।
उसके पिता, रामू, हर साल एक महीने के लिए उस जंगल में जाते थे। वहां एक खास जंगली फल उगता था — काले रंग का, अंदर से लाल।
उसे लोग “रक्तफल” कहते थे।
उस फल के अच्छे दाम मिलते थे क्योंकि कोई भी उस जंगल में जाने की हिम्मत नहीं करता था।
दीनू बचपन से अपने पिता के साथ जाता आया था।
हर बार उसकी मां रोती…
“जंगल में जाने से रामू को रोकती थी…”
लेकिन खाली बर्तन डर से नहीं भरते।
उस साल बारिश कुछ ज्यादा हुई थी।
अगले दिन अमावस थी
रात से ही गांव में बेचैनी थी।
कुत्ते लगातार रो रहे थे।
मुर्गियां दड़बे से बाहर नहीं निकल रही थीं।
दीनू की मां ने सुबह ही हाथ जोड़ दिए।
“आज मत जाओ रामू… आज अमावस है…”
रामू ने पुराने थैले में रस्सी और हंसिया रखते हुए कहा—
“इतने साल से जा रहा हूं। आज तक कुछ नहीं हुआ।”
“पर लोग कहते हैं—”
“लोगों का काम है कहना।”
दीनू तुरंत बोला—
“मैं भी चलूंगा बाबा।”
“नहीं।”
“हर साल जाता हूं।”
रामू कुछ पल उसे देखता रहा… फिर चुपचाप चल पड़ा।
दीनू मुस्कुराया और उसके पीछे दौड़ गया।
लेकिन उसकी मां की आंखों में उस दिन कुछ अलग डर था।
ऐसा डर… जो अक्सर सच हो जाता है।
दोपहर ढलते-ढलते दोनों उदयगिरी के नीचे पहुंच गए।
जंगल सामने था।
आज वो अलग दिख रहा था।
अजीब… शांत… जैसे कोई बहुत बड़ी चीज सांस रोककर बैठी हो।
ना पक्षियों की आवाज।
ना हवा की सरसराहट।
सिर्फ… सन्नाटा।
दीनू ने धीरे से पूछा—
“बाबा… आज इतना शांत क्यों है?”
रामू ने जवाब नहीं दिया।
वो खुद बेचैन था।
दोनों अंदर बढ़ने लगे।
पेड़ों की टेढ़ी जड़ें जमीन से ऐसे निकली थीं जैसे किसी की उंगलियां उन्हें पकड़ने बाहर आ रही हों। हर तरफ गीली मिट्टी और सड़ांध की गंध थी।
कुछ दूर जाने पर रामू अचानक रुका।
उसकी आंखें चमक उठीं।
“वो रहा…”
एक विशाल पेड़ पर रक्तफल लटक रहे थे।
दर्जनों।
दीनू जल्दी-जल्दी थैले में फल भरने लगा।
रामू बार-बार पीछे देख रहा था।
“जल्दी कर… जल्दी…”
तभी…
ठक…
दोनों रुक गए।
जंगल के अंदर कहीं से आवाज आई थी।
जैसे कोई भारी चीज पेड़ से टकराई हो।
दीनू ने डरकर पूछा—
“क… कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर…
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज और करीब थी।
रामू का चेहरा उतर गया।
“बस… निकल यहां से…”
दोनों तेजी से आगे बढ़े।
लेकिन तभी उन्हें महसूस हुआ…
कोई उनके पीछे चल रहा था।
धीरे…
घिसटते हुए…
दीनू ने पीछे देखने की कोशिश की।
रामू ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“पीछे मत देख।”
“लेकिन बाबा—”
“मत देख!”
अब आवाज बिल्कुल पास थी।
घिस्स…
घिस्स…
घिस्स…
दीनू की सांसें तेज हो गईं।
दोनों एक बड़े पेड़ के पीछे छिप गए।
रामू ने कांपते हाथों से दीनू का मुंह दबा दिया।
आवाज अब ठीक सामने थी।
और फिर…
उन्होंने उसे देखा।
दीनू की आंखें फट गईं।
पेड़ों के बीच… अंधेरे में… एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।
उसका शरीर इंसानों जैसा था… मगर असामान्य रूप से लंबा। हाथ जमीन तक लटक रहे थे। त्वचा पूरी तरह काली… जैसे कोयले पर तेल चढ़ा हो।
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| जंगल के भीतर कुछ था… कुछ ऐसा जो अंधेरे में खड़ा उन्हें देख रहा था। 👁️🌫️ |
लेकिन सबसे भयानक था उसका चेहरा।
चेहरा था ही नहीं।
सिर्फ एक बहुत बड़ा चीरा…
जो मुस्कुराहट जैसा दिखता था।
और उस चीरे के अंदर… सैकड़ों छोटे-छोटे दांत।
वो चीज हवा को सूंघ रही थी।
जैसे शिकार ढूंढ रही हो।
दीनू के शरीर से पसीना बहने लगा।
तभी…
उसके पैर के नीचे सूखी टहनी टूट गई।
टक!
वो आकृति अचानक रुक गई।
धीरे-धीरे उसका सिर दीनू की तरफ घूम गया।
फिर…
एक भयानक चीख पूरे जंगल में गूंज उठी।
“भाग!!!”
रामू चिल्लाया।
दोनों दौड़ पड़े।
पीछे से पेड़ों के टूटने की आवाज आने लगी।
वो चीज इंसान नहीं थी।
वो पेड़ों पर चढ़ रही थी… छलांग लगा रही थी… और हर छलांग के साथ और करीब आती जा रही थी।
दीनू रोते हुए भाग रहा था।
“बाबा!! वो आ रहा है!!”
अचानक सामने से काली आकृति हवा में उछली—
और रामू पर टूट पड़ी।
दोनों जमीन पर गिर पड़े।
दीनू चीख उठा।
उस चीज ने रामू को गर्दन से पकड़कर हवा में उठा लिया।
रामू दर्द से तड़प रहा था।
लेकिन अगले ही पल उसने दीनू की तरफ देखा—
“भाग दीनू!!! भाग!!!”
“नहीं बाबा!!”
रामू पूरी ताकत से चिल्लाया—
“भाग!!!”
वो आकृति अब रामू को घसीटते हुए जंगल के अंदर ले जाने लगी।
दीनू की आंखों से आंसू बह रहे थे।
लेकिन तभी उसे पास पड़ा लोहे का हंसिया दिखाई दिया।
उसने बिना सोचे उठा लिया।
और पूरी ताकत से उस चीज की पीठ पर मार दिया।
चीईईईईईईईख!!!
जंगल कांप उठा।
काली आकृति तड़पकर पीछे हटी।
रामू नीचे गिर पड़ा।
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| उस रात जंगल सिर्फ डरावना नहीं था… वह उन्हें वापस अपने अंदर खींच लेना चाहता था। 🌑🍂 |
“बाबा उठो!!”
दीनू ने किसी तरह पिता को कंधे पर उठाया और भागने लगा।
पीछे से वो चीज फिर चीख रही थी।
पेड़ों के ऊपर दौड़ती हुई।
कभी दाएं… कभी बाएं…
जैसे खेल रही हो।
जंगल खत्म होने ही वाला था।
दूर गांव की रोशनी दिखने लगी।
तभी पीछे से अचानक एक लंबा काला हाथ निकला—
और दीनू के पैर को पकड़ लिया।
वो गिर पड़ा।
रामू दर्द में चिल्लाया।
दीनू पूरी ताकत से मिट्टी पकड़कर आगे खिसकने लगा।
जंगल जैसे उसे वापस खींच रहा था।
और फिर…
अचानक गांव के मंदिर की घंटी बज उठी।
टनननननन…!
काली आकृति रुक गई।
उसने पहली बार डरकर मंदिर की दिशा में देखा।
फिर धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
लेकिन जाते-जाते…
उसने दीनू को देखा।
उस बिना चेहरे वाली मुस्कान के साथ।
जैसे कह रही हो—
“मैं फिर आऊंगा…”
और अगले ही पल वो अंधेरे में गायब हो गई।
गांव वालों ने दोनों को अधमरी हालत में पाया।
रामू कई दिनों तक बोल नहीं पाया।
उसकी गर्दन पर आज भी काले हाथों के निशान थे।
लेकिन सबसे ज्यादा बदला था — दीनू।
वो अब रात को सो नहीं पाता था।
क्योंकि हर अमावस की रात…
उसे अपने घर के पीछे जंगल की तरफ से वही आवाज सुनाई देती—
घिस्स…
घिस्स…
घिस्स…
और कभी-कभी…
खिड़की के बाहर दो सफेद आंखें दिखाई देतीं।
जैसे काली घारी का जंगल…
अब उसे पहचान चुका था।
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