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| सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगता है… डर अभी दूर है। |
नमस्ते दोस्तों…
आपका स्वागत है Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,
जहाँ डर अचानक नहीं आता…
वो धीरे-धीरे आपके भीतर उतरता है।
यहाँ हम उन अनुभवों की बात करते हैं
जो कहानी लगते हैं…
लेकिन कभी न कभी
किसी के साथ सच में हो सकते हैं।
दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहा हूँ,
जो सुनने में शायद काल्पनिक फिक्शन लगे…
लेकिन अगर आप कभी
अकेले रात में, किसी सुनसान रास्ते से गुज़रे होंगे,
तो यकीन मानिए —
आपको भी लगेगा कि…
“ये मेरे साथ भी हो सकता है।”
कभी-कभी किसी जगह हमें बिना किसी वजह
अजीब सा डर महसूस होने लगता है।
दिल तेज़ धड़कता है,
हम बार-बार पीछे मुड़कर देखते है,
और दिमाग बार-बार समझाता है —
“कुछ नहीं है…
बस वहम है…
लेकिन कुछ डर ऐसे होते हैं दोस्तों…
जो दिमाग से नहीं आते,
वो सीधे महसूस होते हैं।
ये डर हमारे अंदर
बेचैनी और अकेलेपन का एहसास भर देता है।
ऐसा लगता है जैसे
शरीर तो चल रहा है…
लेकिन मन कहीं पीछे छूट गया हो।
और अब…
मैं आपको ऐसी ही एक कहानी बताने जा रहा हूँ
जो आपको ऐसे ही एक डर का एहसास करा देगी।
तो चलीए अब उस कहानी पर
जो रोहन नाम का व्यक्ति खुद आपको बतायेगा।
मेरा नाम रोहन है।
मैं 29 साल का हूं।
और एक प्राइवेट कंपनी में नाइट-शिफ्ट काम करता हूँ।
नाइट-शिफ्ट के कारण
मैं अक्सर देर से ही घर जाता हूं।
यह हमेशा का था
रोज़ की तरह उस दिन भी
मैं रात करीब 11:45 बजे
ऑफिस से निकलकर
सीधे घर जा रहा था।
लेकिन उस रात ने
सब कुछ बदल दिया।
ऑफिस से घर जाने का एक छोटा रास्ता था,
जो एक पुराने, सुनसान मैदान के किनारे से गुजरता था।
मैं रोज़ वही रास्ते से घर जाता था।
समय था करीब 12:10 बजे।
हल्की ठंडी हवा चल रही थी।
आस-पास कोई दुकान, कोई घर नहीं…
बस अंधेरा और सन्नाटा।
सब कुछ… बिल्कुल सुनसान।
मैं चलते हुए
फोन पर समय देख रहा था।
जूतों की आवाज़
खामोश ज़मीन पर साफ सुनाई दे रही थी।
दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।
स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी
आगे-पीछे फैल रही थी।
फिर अचानक…
हवा जैसे रुक सी गई।
जूतों की आवाज़ अब
मुझे थोड़ी भारी लगने लगी।
हर कदम के साथ
दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी।
मुझे लगा
जैसे मेरे पीछे
कोई और भी चल रहा है।
लेकिन जब मैंने रुककर सुना —
सिर्फ मेरी साँसों की आवाज़ थी।
मैंने खुद को समझाया —
“रात है…
दिमाग ज़्यादा सोच रहा है।”
मैं फिर चलने लगा।
लेकिन तभी…
मुझे अपनी चाल के साथ
एक और चाल सुनाई दी।
मैं रुका।
वो आवाज़ भी रुक गई।
मेरे शरीर में
अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
अब माहौल जैसे बदल चुका था।
सन्नाटा चुभने लगा था।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था,
हथेलियाँ ठंडी पड़ गई थीं।
मुझे साफ महसूस हो रहा था —
कोई है…
जो मेरी हर हरकत
कॉपी कर रहा है।
मैं तेज़ चलने लगा।
तो पीछे की आवाज़ भी
तेज़ हो गई।
अचानक
स्ट्रीट लाइट की रोशनी में
मैंने ज़मीन पर
दो परछाइयाँ देखीं।
एक मेरी थी।
दूसरी…
थोड़ी टेढ़ी,
अस्वाभाविक। मैं सहम गया,
मैंने सिर उठाया।
सिर्फ एक पल के लिए
मुझे सामने
किसी का चेहरा दिखा…
आँखें…
बिल्कुल खाली।
और फिर —
सब अंधेरा।
मैं इस कदर डर गया कि
बिना सोचे
बस भागने लगा।
मेरी साँसें टूट रही थीं,
पैर भारी हो गए थे।
मेरे पीछे से किसी के
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| जब कदम तेज़ हों… और परछाईं एक से ज़्यादा। |
घिसटने की आवाज़ लगातार आ रही थी।
जैसे कोई मेरे पिछे ही हो।
मैं गिरते-पड़ते
मैदान पार करके
जैसे तैसे सीधे सड़क पर पहुँचा।
वहा काफ़ी रोशनी थी…
और वो आवाज़ आनी
एकदम बंद हो गई थी।
मैदान की तरफ गहरा
अंधेरा फैला हुआ था।
उसके बाद मैं घर पहुँचा
मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।
कपड़े पसीने से भीग चुके थे।
मेरे घरवाले भी मेरी हालत
देख कर परेशान हो गये थे।
वह पूरी रात
मुझे नींद नहीं आई।
अगले दिन मैं काम पर
नहीं गया
मेरे अंदर कुछ टूटा हुआ था।
आज भी…
जब मैं उस रास्ते से गुजरता हूँ,
किसी को
साथ लेकर जाता हूं
और अपनी परछाईं
बार बार देखता हूँ।
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| कहानी शायद खत्म हो गई… लेकिन एहसास अब भी यहीं है। |
दोस्तो रोहन की कहानी तो यहीं खत्म होती है…
लेकिन डर नहीं।
क्योंकि कभी-कभी…
परछाईं
हमारी नहीं होती।



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