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| रात के सन्नाटे में बंद दरवाज़ा और भीतर से आती हल्की रोशनी, मन में बिना वजह बेचैनी पैदा कर देती है। |
नमस्ते दोस्तों,
स्वागत है आपका मेरे Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,
जहाँ हम ऐसी कहानियाँ साझा करते हैं
जो सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं…
बल्कि पढ़ने के बाद भी
कुछ देर तक आपके आसपास महसूस होती रहती हैं।
आज की कहानी
कोई मनगढ़ंत किस्सा नहीं है।
यह मुझे एक ऐसे व्यक्ति ने बताई थी
जो आज भी
रात में सोने से पहले
अपने घर का दरवाज़ा
दो बार चेक करता है।
आज मैं आपको वही कहानी सुनाने जा रहा हूँ।
लेकिन उससे पहले…
ज़रा एक बात सोचिए।
कि, आप गहरी नींद में हों,
और आधी रात को
कोई आपके दरवाज़े पर
आपका ही नाम लेकर
धीरे-धीरे आवाज़ दे…
तो आप क्या करेंगे?
दरवाज़ा खोलेंगे?
या बस चुपचाप
अंदर ही खड़े रहेंगे?
आज की कहानी भी
कुछ ऐसी ही है।
🌘
यह बात 2019 की है।
सर्दियों का महीना था —
जनवरी का आख़िरी हफ्ता।
यह कहानी राजेश नाम के व्यक्ति की है।
उम्र करीब 32 साल।
आदीलाबाद शहर से थोड़ा बाहर
एक पुराने से मोहल्ले में
अकेला रहता था।
राजेश की नौकरी
एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी में थी।
अक्सर उसे
घर से काम करना पड़ता था,
और कई बार
देर रात तक
लैपटॉप के सामने बैठना उसकी आदत बन चुकी थी।
उसका घर
एक मंज़िला था।
सामने छोटा-सा आंगन,
लोहे का गेट
और अंदर
मोटा लकड़ी का दरवाज़ा।
उसके पड़ोस में दो-तीन घर और थे,
🌑
उस दिन
राजेश ने देर से खाना खाया।
करीब 11:45 बजे
और सोने की तैयारी करने लगा।
बाहर
हल्की ठंड थी।
हवा नहीं चल रही थी,
फिर भी
कभी-कभी
पेड़ों की शाखाएँ
आपस में टकराने की आवाज़ आ जाती थी।
राजेश ने
दरवाज़ा बंद किया,
अंदर से कुंडी लगाई
और आदतन
एक बार और
दरवाज़े को धक्का देकर देखा।
सब ठीक था।
करीब 12:30 बजे
वह बिस्तर पर लेट गया।
🔔
कितनी देर बाद
उसे नींद आई —
यह उसे खुद नहीं पता।
लेकिन अचानक
उसे लगा
जैसे किसी ने
बहुत हल्के से
उसका दरवाज़ा खटखटाया हो।
ठक… ठक…
राजेश की आँख खुल गई।
उसने घड़ी देखी —
1:17 AM
पहला ख्याल यही आया —
“शायद वहम होगा।”
उसने करवट बदली
और आँख बंद करने की कोशिश की।
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| जब इंसान कमरे में अकेला होता है और सामने बंद दरवाज़ा हो, तब डर किसी आवाज़ का नहीं, इंतज़ार का होता है। |
कुछ सेकंड बाद
फिर वही आवाज़।
इस बार
थोड़ी साफ़।
ठक… ठक…
राजेश उठकर बैठ गया।
इतनी रात को
कौन आ सकता है?
पड़ोस में
किसी से
उसकी ज़्यादा जान-पहचान भी नहीं थी।
वह बिस्तर से उठा,
लेकिन दरवाज़े तक नहीं गया।
बस वहीं खड़ा होकर
सुनने लगा।
तभी....
दरवाज़े के बाहर से
एक धीमी आवाज़ आई—
“राजेश…”
उसका नाम।
बिल्कुल सही उच्चारण में।
राजेश का शरीर
एकदम सख़्त हो गया।
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसके दिमाग में
कई सवाल एक साथ आने लगे।
कौन हो सकता है?
इतनी रात को?
उसका गला सूखने लगा।
हथेलियों में पसीना आ गया।
वह दरवाज़े की तरफ
दो कदम बढ़ा…
फिर रुक गया।
आवाज़ फिर आई—
“दरवाज़ा खोलो… ठंड लग रही है।”
वह आवाज़
बस…
बिल्कुल सामान्य थी।
और यही बात
उसे सबसे ज़्यादा गलत लग रही थी।
राजेश ने खुद को समझाया—
“शायद कोई पड़ोसी मदद माँग रहा हो।”
लेकिन अगला ही ख्याल आया—
“किसी को मेरा नाम कैसे पता?”
उसने मोबाइल उठाया।
नेटवर्क था।
घड़ी चल रही थी।
सब कुछ
सामान्य था।
सिवाय
दरवाज़े के बाहर खड़ी
उस आवाज़ के।
दरवाज़े पर
अब दस्तक नहीं हो रही थी।
बस आवाज़—
“राजेश…
मुझे अंदर आने दो…”
इस बार
आवाज़
थोड़ी पास लग रही थी।
जैसे
मुंह
दरवाज़े से
लगाकर बोली जा रही हो।
राजेश ने
बिना आवाज़ किए
दरवाज़े के झरोखे से
बाहर झाँकने की कोशिश की।
लेकिन बाहर
अंधेरा था।
इतना गहरा
कि कुछ भी
आकार में नहीं दिख रहा था।
अब वह पूरी तरह
फँस चुका था।
अगर वह दरवाज़ा खोले—
तो क्या होगा?
और अगर नहीं खोले—
तो क्या वह आवाज़
खुद चली जाएगी?
उसके दिमाग में
एक पुरानी बात
अचानक घूम गई।
उसकी दादी
कहती थीं—
“रात को
अगर कोई नाम लेकर बुलाए,
तो दरवाज़ा मत खोलना।”
उस समय
यह सब
अंधविश्वास लगता था।
लेकिन उस रात…
दरवाज़े के नीचे से
अचानक
एक परछाईं
सरकती हुई दिखाई दी।
पूरी नहीं।
बस
जैसे किसी के पैर
वहाँ खड़े हों।
लेकिन
परछाईं
हिल नहीं रही थी।
बस…
मौजूद थी।
राजेश ने
पूरी ताकत से
अंदर की कुंडी पकड़ ली।
उसकी सांस
तेज़ हो गई।
और तभी—
आवाज़ अचानक
बंद हो गई।
ना दस्तक।
ना फुसफुसाहट।
बस
खामोशी।
इतनी गहरी
कि कानों में
सीटी बजने लगी।
सब कुछ जैसे शांत था अंदर और बाहर भी
उसके बाद आवाज आना भी बंद हो गया था
लेकीन राजेश कि हालत खराब ती
वह उस रात सो नहीं सका
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| कुछ निशान सवाल छोड़ जाते हैं—क्यों आए, और फिर बिना कुछ किए वापस क्यों नहीं गए। |
सुबह
करीब 6 बजे
राजेश की आँख खुली।
सब कुछ
सामान्य था।
दरवाज़ा वैसा ही बंद।
उसने हिम्मत करके
दरवाज़ा खोला।
और उसने देखा बाहर
दरवाज़े के ठीक सामने
मिट्टी पर
गीले पैरों के निशान थे।
जो
आकर
वहीं
खत्म हो जाते थे।
उस दिन के बाद
राजेश ने
रात में
हेडफोन लगाकर
काम करना छोड़ दिया।
सोते वक्त
लाइट बंद नहीं करता।
और अगर
कभी भी
रात में
कोई हल्की आवाज़ भी आए—
तो बस
एक ही बात
उसके दिमाग में आती है—
“रात को दरवाज़ा मत खोलना।”
🌑 समापन
दोस्तों,
यह कहानी यहीं समाप्त होती है…
लेकिन सवाल
आज भी वही है—
वह कौन था
जो दरवाजे के खडा था
और अगर
राजेश ने
दरवाज़ा खोल दिया होता…
तो?
आप क्या सोचते हैं?
यह सिर्फ डर था?
या सच में
कुछ ऐसा है
जो रात में
दरवाज़ों के बाहर
इंतज़ार करता है?
सोचिए…
अगर आज रात
आपके दरवाज़े पर
कोई नाम लेकर बुलाए…
तो आप
क्या करेंगे?
मिलते हैं दोस्तों,
अगली Mysterious Kahani में…
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