शहर की रात रंगीन थी।
रात के नौ बजे भी इंडिया गेट के आसपास भीड़ लगी हुई थी। लोग आइसक्रीम खा रहे थे, हँसी-ठिठोली कर रहे थे, और कैमरों की फ्लैश चमक रही थी।
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| "सबकुछ सामान्य लग रहा था… लेकिन नौ बजे के बाद सबकुछ बदलने वाला था।" |
रीमा भी वहीं पहुँची थी।
आज उसका प्लान था कि अपनी सबसे करीबी दोस्त सोनिया से मिले। हफ़्तों से दोनों ठीक से बैठकर बात नहीं कर पाई थीं, तो तय हुआ था कि आज रात इंडिया गेट पर मिलेंगे।
रीमा घड़ी देखती रही। नौ बजकर पंद्रह मिनट हो गए, पर सोनिया नहीं आई।
उसने कॉल लगाया।
कई बार ट्राय करने के बाद कॉल रिसीव हुई।
"हेलो, सोनिया? तू कहाँ है? मैं पहुँच गई हूँ," रीमा बोली।
फोन के दूसरी तरफ़ कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर सोनिया की धीमी आवाज़ आई—
"रीमा… मैं नहीं आ पाऊँगी।"
"क्या? क्यों? तूने ही तो बोला था मिलने का!"
सोनिया की आवाज़ कुछ अजीब थी। जैसे बहुत धीमे बोल रही हो, और हर शब्द में खिंचाव हो।
"बस… अब तू यहीं से मेरे फ्लैट पर आ जा। मुझे तुझसे… बात करनी है।"
रीमा चौंकी।
"इतनी रात को? तू ठीक तो है?"
"हाँ…" दूसरी तरफ़ हल्की-सी हँसी आई, पर वह हँसी बिलकुल अनजानी लगी।
"बस तू आ जा। दरवाज़ा खुला रहेगा।"
कॉल कट गई।
रीमा कुछ देर वहीं खड़ी रही। भीड़ के बीच भी उसे अजीब-सी बेचैनी महसूस हुई।
पर दोस्ती और जिज्ञासा दोनों ने उसे सोनिया के फ्लैट की तरफ़ खींच लिया।
सोनिया का फ्लैट पुराने शहर की एक तंग गली में था।
रीमा जब वहाँ पहुँची, तो चारों ओर सन्नाटा था।
एक-आध कुत्तों की आवाज़ और बिजली के खंभे पर झूलता बल्ब।
फ्लैट की बिल्डिंग देखते ही रीमा के कदम भारी हो गए।
पुरानी, सीलन भरी दीवारें और टूटी-फूटी सीढ़ियाँ।
फिर भी, उसने हिम्मत जुटाई और भीतर चली गई।
जैसे ही उसने कदम रखा, पीछे दरवाज़ा अपने आप चर्र की आवाज़ के साथ बंद हो गया।
हॉल में अंधेरा था।
सिर्फ़ एक बल्ब टिमटिमा रहा था।
"सोनिया?" रीमा ने आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं आया।
वह कॉरिडोर की तरफ़ बढ़ी।
हर कदम पर उसे अपने पैरों की गूँज सुनाई देती, और उसके साथ-साथ कोई और भी चल रहा हो ऐसा अहसास होता।
अचानक कानों में बहुत धीमी फुसफुसाहट गूँजी—
"रीमा…"
वह पलटकर देखने लगी, पर कॉरिडोर खाली था।
कॉरिडोर के आखिर में एक दरवाज़ा आधा खुला था।
रीमा ने धीरे-धीरे उसे खोला।
कमरे में अंधेरा फैला हुआ था।
खिड़की से आती हल्की रोशनी में एक लंबी परछाईं दिखाई दी—दीवार पर बिल्कुल इंसान जैसी।
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| हर कदम पर ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके पीछे चल रहा हो…" |
रीमा का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने टॉर्च ऑन की।
कमरा खाली था।
लेकिन दीवार पर परछाईं अब भी थी… बिना किसी इंसान के।
रीमा पीछे हटने ही वाली थी कि दरवाज़ा धमाक से बंद हो गया।
हवा अचानक बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।
टॉर्च काँपते हाथों से घूमी और एक कोने में जाकर ठिठक गई।
वहाँ… एक चेहरा था।
सफेद, खोखली आँखों वाला चेहरा।
मुँह इतना बड़ा जैसे पूरा अंधेरा निगल जाए।
वह चेहरा धीरे-धीरे उसकी ओर झुकने लगा।
रीमा के गले से चीख निकली।
अचानक उसके कंधे पर हाथ पड़ा।
रीमा पलटकर देखी—सोनिया खड़ी थी।
"अरे, तू इतनी डरी हुई क्यों है?" सोनिया हँसी।
रीमा काँपती आवाज़ में बोली, "यहाँ… अभी कोई था!"
सोनिया ने कमरे में चारों ओर देखा।
"यहाँ तो कुछ नहीं है। तू डर गई होगी।"
रीमा ने दोबारा कोने की तरफ़ देखा।
खाली।
उसने राहत की साँस ली, मगर तभी गौर किया—
सोनिया के शरीर की कोई परछाईं ही नहीं पड़ रही थी।
रीमा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
सोनिया की मुस्कान चौड़ी होती चली गई।
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| "दोस्ती और डर के बीच सिर्फ़ एक दरवाज़े का फ़ासला था।" |
और अचानक वही सफेद चेहरा फिर से उसके पीछे उभर आया।
दोनों आकृतियाँ एक-साथ हिलने लगीं—मानो एक ही हों।
रीमा ने पूरी ताकत से दरवाज़े पर धक्का मारा।
दरवाज़ा खुल गया और वह कॉरिडोर में गिर पड़ी।
कॉरिडोर शांत था।
सब कुछ सामान्य।
वह भागती हुई नीचे उतरी और बिल्डिंग से बाहर निकल गई।
मोबाइल वाइब्रेट हुआ।
स्क्रीन पर सोनिया का मैसेज था—
"सॉरी रीमा, मैं आज फ्लैट पर नहीं हूँ। मम्मी के पास गई हूँ। कल मिलते हैं।"
रीमा के हाथ काँपने लगे।
तो फिर… ऊपर वह किससे मिली थी?
समाप्त… या शायद नहीं।

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