अंधा कुआँ: जहाँ उजाला भी दम तोड़ देता है

  

एक उजाला और अंधेरे के बीच खड़ा आदमी, अंधार कुएं के किनारे — तनावमुक्त और आत्मचिंतन में लीन
 "अंधार कुआँ: जहाँ उजाला भी डरता है झाँकने से — एक अकेला इंसान, भीतर की खामोशी से सामना करता हुआ।"




उत्तराखंड के एक छोटे से गांव नैनपुर के आखिरी सिरे पर एक पुराना पत्थर का कुआं था। लोग उसे "अंधा कुआं" कहते थे, क्योंकि उसमें झांकने की गलती जो करता… वह कभी खुद को पहचान नहीं पाता।


गांव में एक कड़ा नियम था —

"सूर्यास्त के बाद उस रास्ते से मत गुजरो, और अगर कोई तुम्हें नाम लेकर पुकारे… तो पलटकर मत देखना!"


अनुराग, एक दिल्ली का फोटोग्राफर, जो गांव की लोककथाएं और रहस्यमयी जगहें खोजता रहता था, रिसर्च के लिए नैनपुर आया। गांव वालों ने उसे चेतावनी दी, पर वह हँसते हुए बोला,

 "अरे ये सब तो कहानियां होती हैं, असल में कुछ नहीं होता।"


उसी रात, वो कैमरा लेकर गांव की सीमा तक पहुंचा — ठीक उस कुएं के पास।


कुएं के पास आते ही उसे एक ठंडी सी हवा महसूस हुई। सन्नाटा था… केवल झींगुरों की आवाज़।

और तभी —

एक धीमा स्वर उसके कानों में गूंजा…


 “अनु...रा...ग...”


वो रुका।

सिर में हलकी झनझनाहट हुई।


“शायद कोई गांव का बच्चा है,” उसने सोचा, और पलटकर देखा।


पर वहां... कोई नहीं था।

उसके ठीक पीछे, केवल कुआं... और उसके ऊपर एक सूखी नीम की टेढ़ी डाली।

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डर को नजरअंदाज करते हुए उसने कैमरा ऑन किया और कुएं की तस्वीरें लेने लगा।

तभी कैमरे की स्क्रीन पर एक झलक दिखाई दी — एक स्त्री की आकृति, उलझे बाल, झुका चेहरा, और सफेद साड़ी।


उसने तुरंत कैमरे से देखा — कोई नहीं।

स्क्रीन — फिर वही आकृति।


वो घबरा गया, कैमरा बंद किया और गांव की तरफ भागा।


सुबह होते ही वो गांव छोड़ने को तैयार था। पर गांव के बुज़ुर्ग ने उसे रोका,


 “बेटा, अब कुछ नहीं हो सकता... तुमने पलटकर देख लिया... अब वो तुम्हारा चेहरा जानती है।”


अनुराग ने सोचा, "ये सब बस डराने की बातें हैं।"


दिल्ली लौटते ही उसके साथ अजीब घटनाएं होने लगीं।


आईने में उसे कभी अपने पीछे कोई परछाई दिखती।


नींद में वो हर रात उस कुएं के पास खड़ा होता।

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कभी मोबाइल पर खुद की तस्वीरें आ जातीं, जिनमें वो सो रहा होता… और पीछे वही स्त्री।


एक रात उसके फ्लैट से जोर की चीख़ सुनाई दी।

दरवाज़ा भीतर से बंद था।

पुलिस आई, दरवाज़ा तोड़ा गया।


अनुराग का शव मिला – मुंह पूरी तरह खुले में जमे हुए, आँखें बाहर को निकलीं... और सामने के आईने पर सिर्फ़ तीन शब्द खून से लिखे थे –

“मैंने

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