हम उन्हें इत्तेफ़ाक़ कहते हैं, लेकिन कई बार वही इत्तेफ़ाक़ किसी गहरे रहस्य की ओर इशारा करते हैं।
और जब इंसान उस रहस्य को छूने की कोशिश करता है, तो उसे सिर्फ़ सवाल मिलते हैं – जवाब कभी नहीं।
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| "हर सुबह एक नई शुरुआत है — रणजन की तरह हम भी आत्मविश्वास और जिम्मेदारी के साथ अपनी राह पर बढ़ सकते हैं।" |
रंजन की उम्र 29 साल थी। वह अपने माता पिता की एकमात्र संतान था, पढ़ाई में भी होशियार और मेहनती। गाँव से निकलकर शहर में उसने बड़ी नौकरी पा ली थी। तनख्वाह अच्छी, ऑफिस अच्छा, और अब तो उसके वहां पर कुछ दोस्त भी बन गए थे। ऊपरी तौर पर सबकुछ बिल्कुल ठीक था। लेकिन… भीतर कुछ ठीक नहीं था। वह अस्वस्थ था,
कभी-कभी बिना वजह उसका दिल बेचैन हो उठता।
रात को नींद टूट जाती, और ऐसा लगता मानो कोई अदृश्य परछाई उसके आसपास है। डाॅक्टर को दिखाया तो
डॉक्टर ने कहा – “काम का तनाव है, आराम करो।”
लेकिन ये बेचैनी किसी तनाव से कहीं ज़्यादा गहरी थी।
उस रात घड़ी में दो बजे थे। रंजन की आँख अचानक ही खुल गई। दिल की धड़कनें तेज़ थीं, साँसें भारी।
वो बिस्तर से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर ठंडी हवा बह रही थी।
उसका फ्लैट तीसरी मंज़िल पर था। जहांसे खिड़की से सामने का चौक साफ़ दिखाई देता था – चारों तरफ़ से मिलने वाली सड़कें, दिनभर शोर-गुल से भरी रहतीं, लेकिन इस वक्त सुनसान और ख़ामोश थीं। बस स्ट्रीटलाइट की पीली रौशनी तिरछी परछाइयाँ बना रही थी।
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| रात के सन्नाटे में चौराहे पर घसीटता ताबूत — रहस्य की पहली झलक।" |
तभी उसकी नज़र पड़ी। दूर से एक बूढ़ा आदमी आ रहा था।
उसके कंधे पर मोटी रस्सी टंगी थी। रस्सी का दूसरा सिरा एक… कॉफ़िन से बंधा था। वो बूढ़ा उस कॉफ़िन को घसीटता हुआ आगे बढ़ रहा था। उसके चेहरे पर थकान और गहरी उदासी साफ़ झलक रही थी। वह धिरे धिरे चौराहे पर आता रहा और चौराहे के बीच आकर रुक गया। उसने चारों तरफ़ देखा… जैसे समझ नहीं पा रहा हो कि किस रास्ते पर जाए।
उसका हाथ काँप रहा था, कॉफ़िन बार-बार खिसक रहा था।
फिर अचानक उसकी नज़र सीधी ऊपर उठी – और वो सीधे रंजन की खिड़की की तरफ़ देखने लगा।
रंजन का दिल ज़ोर से धड़क उठा। वो बूढ़ा कुछ देर तक उसे घूरता रहा… और फिर एक रास्ता पकड़कर, उस भारी कॉफ़िन को खींचते हुए अँधेरे में गुम हो गया। रंजन देर तक खिड़की के पास खड़ा सोचता रहा –
“ये आदमी कौन था? रात के दो बजे कॉफ़िन लेकर कहाँ जा रहा था?”
लेकिन जवाब नहीं मिला।
आख़िरकार वो बिस्तर पर लौट आया और किसी तरह नींद आ गई।
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| "कुछ दिन बाद वही बूढ़ा लिफ़्टमैन बनकर सामने आया।" |
अगले कुछ दिन रंजन काफी बिजी रहा, वो घटना उसके मन से धीरे-धीरे मिटने लगी। उसके ऑफिस का काम बढ़ गया था, दोस्ती-यारियाँ भी ध्यान भटकाने लगीं। माँ का फ़ोन आया तो उसने इस बार वादा किया कि जल्दी गाँव आएगा।
सबकुछ सामान्य लग रहा था।
लेकिन किस्मत ने कुछ और सोच रखा था।
उस दिन रंजन हमेशा की तरह ऑफिस पहुँचा था।
उसका ऑफिस पाँचवीं मंज़िल पर था। वो लिफ़्ट की ओर बढ़ रहा था, तभी उसकी नज़र लिफ़्ट के पास खड़े आदमी पर पड़ी
वो वही बूढ़ा था। वही चेहरा, वही उदासी, वही नज़र।
जिसे उसने उस रात कॉफ़िन घसीटते हुए देखा था। रंजन ठिठक गया।
“ये यहाँ कैसे…? क्या ये वही है? या मैंने गलत देखा?”
लोगों से पता चला – उस दिन नियमित लिफ़्टमैन नहीं आया था, उसकी जगह इस बूढ़े को रखा गया है।
लेकिन किसी को ये नहीं पता कि वो कहाँ से आया।
रंजन और बूढ़ा लिफ़्ट में साथ चढ़ गए।
गज़ब की बात ये थी कि रोज भिड़ रहनेवाली लिफ्ट मे उस दिन दोनों के अलावा और कोई नहीं था। बंद लोहे के डिब्बे में बस वही दो लोग थे।
लिफ़्ट ऊपर बढ़ने लगी, रंजन की आँखें बार-बार बूढ़े पर जा रही थीं। उसके चेहरे पर वही गहरी उदासी।
वो कुछ कह नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें… जैसे भीतर तक झाँक रही थीं। अचानक लिफ़्ट हिलने लगी।
पहले धीरे, फिर ज़ोर-ज़ोर से और अगले ही पल –
धड़ाम!
लिफ़्ट नीचे गिरने लगी। रंजन चीख भी नहीं पाया।
कुछ ही सेकंड में सब ख़ामोश हो गया।
नीचे लोग देखने के लिए दौड़े। थोड़ी देर बाद लिफ्ट का
दरवाज़ा तोड़ा गया।
भीतर का दृश्य देख सबके होश उड़ गए।
रंजन और बूढ़ा – दोनों खून में लथपथ पड़े थे।
कोई भी ज़िंदा नहीं था। लेकिन सबसे अजीब बात ये थी –
बूढ़े के हाथ में वही रस्सी थी।
और ज़मीन पर खून से भीगी हुई लकड़ी के टुकड़े… मानो किसी कॉफ़िन के हों।
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| "एक हादसा जिसने सबको गहरे रहस्य में डाल दिया।" |
रहस्य
ऑफिस में लोग कई दिन तक उस हादसे की चर्चा करते रहे।
किसी ने कहा – “ये तो लिफ़्ट की खराबी थी।”
किसी ने कहा – “वो बूढ़ा कौन था, किसी को नहीं पता।”
फाइलों में ये हादसा बस एक और एक्सीडेंट बनकर रह गया।
लेकिन सच्चाई कौन जानता था?
रंजन ने उस रात जो देखा… क्या वो कोई भ्रम था? या कोई चेतावनी? क्या वो बूढ़ा वाकई इंसान था? या वो उसी कॉफ़िन से निकला कोई अज्ञात रहस्य… जिसे रंजन ने अपनी आँखों से देख लिया था? कोई नहीं जान पाया।
कहानी वहीं खत्म हो गई –
पर उस चौराहे पर, आज भी कभी-कभी लोग कहते हैं,
रात के सन्नाटे में एक बूढ़ा दिखता है…
रस्सी घसीटते हुए, और पीछे लुढ़कता हुआ कॉफ़िन।




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