"मुझे बाहर निकालो" – एक गंध और रात का डर

 

"मुझे बाहर निकालो" – एक फ्लैट, एक गंध और तीसरी रात का डर

मैं पहली बार अकेले रहने निकला था।
शहर नया नहीं था, पर रातें अब पहले जैसी नहीं रहीं।
दफ्तर के पास ही एक पुराना फ्लैट मिला —
तीन मंज़िला इमारत, पतले रास्ते से अंदर जाना पड़ता था।
बाहर बरगद का एक पेड़ था…
जिसकी जड़ें नींव के नीचे तक फैली थीं।
मकान मालिक एक 60 साल का शांत बुज़ुर्ग था।
"बस साफ-सफाई रखना, और किराया टाइम पर देना,"
बस इतना ही कहा उसने।
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पहली रात...
मैं लेटा ही था कि बाथरूम से एक गंध आई।
थोड़ी सड़ी सी… जैसे कुछ पुराना गल रहा हो।
मैंने सोचा — सीवर की बदबू होगी।
खिड़की खोली, थोड़ा रूम फ्रेशनर छिड़का,
और नींद में चला गया।

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दूसरी रात...
वो गंध थोड़ी और पास आ गई थी।
अब बाथरूम से नहीं, मेरे तकिये से आ रही थी…
मैं चौंका। तकिया सूखा था।
पर उसमें कोई पुराना नम एहसास था —
जैसे किसी ने उस पर सिर रखा हो... बहुत देर तक।
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तीसरी रात...
अब गंध मेरे अंदर घुसने लगी थी।
नाक से नहीं — सांसों से।
और जब मैं सोया…
तो सपने में मैं खुद को नहीं था।
मैं किसी और के शरीर में था।
बाथरूम में घुसा हुआ… दीवार पर कुछ लिखते हुए।
जब मैं सुबह उठा,
तो मेरे बाएँ हाथ की उंगलियों पर कालिख लगी थी।
और बाथरूम की अंदरूनी दीवार पर...
साफ लिखा था —
"मुझे बाहर निकालो..."
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चौथी रात...
अब मैं खुद में नहीं रहा था।
मैं दफ़्तर से लौटा,
तो दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ मिला।
मैंने याद करने की कोशिश की —
क्या मैं बंद करना भूल गया?
अंदर अंधेरा था,
पर गंध पूरे कमरे में फैल चुकी थी।
अब वो नमी नहीं,
बल्कि कच्चे मांस जैसी थी।
जैसे कोई जिंदा चीज़ सड़ रही हो... धीरे-धीरे।
मैंने दरवाज़ा बंद किया,
और ध्यान से देखा…
फर्श पर किसी के गीले पाँव के निशान थे।
छोटे-छोटे…
जैसे कोई बच्चा अभी-अभी चला हो।

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पाँचवीं रात...
अब मैं बोलते-बोलते रुक जाता था।
आईने में खुद को देखता —
तो लगता, चेहरा कुछ और हो गया है।
मेरे होंठों के कोने नीले पड़े रहते…
आँखों के नीचे गहरे साए थे —
और नाखूनों के नीचे काली गंदगी।
मैंने मकान मालिक से पूछा —
"क्या इस फ्लैट में पहले कोई बच्चा रहता था?"
उसने चुपचाप मेरी ओर देखा…
फिर कहा —
"नहीं… यहाँ कभी कोई किराएदार ज़्यादा दिन रहा ही नहीं।"
"पता नहीं क्यों, सबको गंध की शिकायत थी..."
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फिर एक रात...
मेरी नींद खुली —
तो देखा, मैं बाथरूम में था।
मेरे हाथ में कोई पुराना खिलौना था —
लकड़ी का छोटा घोड़ा…
उस पर खून के धब्बे।
दीवार पर अब लिखा था:
"अब मैं बाहर आ गया हूँ…"
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मैंने बस दीवार को देखा...
कंधे से पसीना पोंछा, और बाथरूम का दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया।
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सुबह होते ही मैं फ्लैट खाली कर चुका था।
मकान मालिक ने कुछ नहीं पूछा,
और मैंने कुछ बताया भी नहीं।
पर जाते-जाते मैंने दरवाज़े के बाहर
बस एक चीज़ लिख छोड़ी थी…
"अगर यहाँ कभी गंध आये... तो रुको मत।"
कभी-कभी मैं सोचता हूँ,
अगर मैं एक और रात वहाँ रुक गया होता...
तो शायद मैं आज ये कहानी तुम्हें बता भी नहीं पा रहा होता।


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