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| रात 2:11 बजे एक voicemail बजता है… लेकिन अब वो फोन में नहीं, तुम्हारे कान में आएगा।" |
पूजा की मौत को दो साल हो चुके हैं।
सड़क हादसा — यही कहा गया था।
पर उसके भाई राहुल को सुकून कभी नहीं मिला।
कुछ तो अधूरा था... कुछ जो आज भी बाकी था।
कुछ हफ़्ते पहले उसे पूजा का पुराना मोबाइल मिला —
टूटी स्क्रीन, धूल से भरा हुआ... लेकिन चालू।
फोन ऑन हुआ तो एक अनदेखा voicemail दिखा:
17 फरवरी, रात 2:11 AM
यही वो रात थी... जब पूजा मरी थी।
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राहुल ने हिम्मत करके वो संदेश सुना।
"भ... भैया... कोई मेरा पीछा कर रहा है..."
"अगर कुछ हो जाए तो..."
और फिर एक डरावनी चीख…
लोहे के घिसटने की आवाज़ें… और सन्नाटा।
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उस रात राहुल ने फोन बंद कर दिया।
बैटरी निकाल दी।
2:11 का वक्त टाल दिया।
लेकिन डर वक्त से नहीं टलता।
अगली रात 2:11 पर,
राहुल के स्मार्टफोन पर एक नोटिफिकेशन आया:
"नया voicemail — Unknown से…"
फोन बंद था, नेटवर्क बंद था —
फिर ये कैसे?
- Read this; आखरी बस नहीं आई
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अब राहुल ने तय किया —
वो कुछ नहीं सुनेगा।
फोन को बंद कर के, कंबल ओढ़कर लेट गया।
लेकिन 2:11 बजते ही...
आवाज़ सीधी कान में आई।
"भैया..."
"फोन क्यों बंद किया?"
"अब मैं बाहर नहीं, तेरे अंदर हूं..."
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राहुल ने चीखने की कोशिश की…
पर जैसे कोई गला दबा रहा हो।
दीवारें फुसफुसा रही थीं…
हर कोना डर से काँप रहा था।
"अब voicemail नहीं आएगा..."
"अब तुझे ही चलना होगा..."
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Read this;
कमरा वैसा ही था —
फोन पड़ा था, बैटरी बाहर।
पर राहुल कहीं नहीं था।
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कहते हैं, उस रात के बाद वो कभी दिखा नहीं।
पर जो भी उस कमरे में रहता है,
रात 2:11 बजे...
वही voicemail फिर बजता है।
“आख़िरी कॉल – एक voicemail जो मरकर भी बजता है”
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