रात की ड्यूटी

 

"सरकारी अस्पताल का खाली कॉरिडोर, टिमटिमाती लाइट और अजीब सन्नाटा।"
"जहाँ ज़िंदगी और मौत के बीच सिर्फ़ एक दरवाज़ा खड़ा था।"



रात के बारह बज चुके थे।

सरकारी अस्पताल की पुरानी दीवार-घड़ी की टिक-टिक पूरे कॉरिडोर में गूँज रही थी।


वार्ड के ज़्यादातर मरीज़ सो चुके थे। नर्सें धीरे-धीरे चलतीं, फिर एक-दूसरे को देख मुस्कुरातीं और फुसफुसाते हुए निकल जातीं।

पर इस शांति में भी एक अजीब-सी बेबसी और खामोशी थी, जो रघु को हर रात बेचैन कर देती थी।


रघु — वार्ड बॉय।

पच्चीस साल का, गरीब घर का लड़का। माँ बीमार, बहन स्कूल जाती थी, और खुद की ज़िंदगी बस इस अस्पताल की दीवारों में अटकी हुई थी।

उसे रात की ड्यूटी से सख़्त नफ़रत थी, पर मजबूरी ने उसे बाँध रखा था।


आज भी वो अपने हाथों में झाड़ू घुमाता हुआ कॉरिडोर साफ़ कर रहा था।

फर्श पर झाड़ू की सरसराहट और घड़ी की टिक-टिक ही बस सुनाई दे रही थी।



अचानक उसे लगा कि सामने किसी ने हल्की सी हँसी की आवाज़ की।

उसने सिर उठाकर देखा —

कॉरिडोर के कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

"अस्पताल के कॉरिडोर में खड़ा एक मासूम बच्चा, धुंधली रोशनी में मुस्कुराता हुआ।"
"वो मासूम दिखता था… लेकिन उसका होना ही डरावना था।"





सफ़ेद शर्ट, नीली निकर, नंगे पैर।

चेहरे पर ऐसी मासूम मुस्कान जैसे किसी फ़रिश्ते की हो।


रघु चौंक गया।

“इतनी रात को बच्चा यहाँ कैसे?” उसने सोचा।


वो धीरे-धीरे आगे बढ़ा —

“अरे बेटा… किसके साथ आए हो?”

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लेकिन बच्चा पलटा और अचानक भाग खड़ा हुआ।

उसकी चाल सामान्य नहीं थी — बहुत तेज़, बहुत अजीब।


रघु हड़बड़ाकर उसके पीछे भागा,

लेकिन कॉरिडोर का मोड़ पार करते ही बच्चा गायब।


सिर्फ़ ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया।



रघु की धड़कन तेज़ हो गई।

उसने नर्स को पूछा —

“यहाँ कोई बच्चा है क्या?”


नर्स ने हँसते हुए कहा —

“रात के बारह बजे? पागल हो गया है क्या?”


रघु चुप रह गया।

पर उसके दिल में हल्की-सी दहशत बैठ गई थी।

क्या उसने सच में बच्चा देखा था… या ये उसकी थकान का धोखा था?

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अगली रात फिर वही हुआ।

इस बार रघु वार्ड में दवाइयों के ट्रे रख रहा था।


तभी खिड़की के शीशे से झाँकती हुई छोटी आँखें दिखाई दीं।

उसने झट से बाहर देखा —

पर वहाँ कोई नहीं।


लेकिन शीशे पर हल्के-से गीले पैरों के निशान छप गए थे।


रघु का गला सूख गया।

उसने ट्रे ज़मीन पर रख दी, हाथ काँपने लगे।


कॉरिडोर में चलते हुए उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई पीछे-पीछे चल रहा हो।

हर कदम पर टप… टप… टप… की आहट।


वो मुड़ा —

खाली कॉरिडोर।

बस दीवार पर उसकी अपनी परछाईं… और उसके पीछे जैसे कोई और परछाईं भी हो।


तीसरी रात उसकी ड्यूटी लगी मुर्दाघर में।

ये अस्पताल का सबसे डरावना हिस्सा था।


बेसमेंट में उतरते ही बदबू की तेज़ लहर ने उसका दम घोंट दिया।

लोहे के बड़े-बड़े फ्रिज जैसे बक्से, जिनमें लाशें रखी थीं।

ऊपर टिमटिमाती ट्यूबलाइट।

ठंडी हवा।


रघु काँपते हुए रजिस्टर देखने लगा।

फिर उसने देखा —

एक लोहे का दरवाज़ा आधा खुला था।


वो पास गया, और जैसे ही अंदर झाँका…

उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।


अंदर एक बच्चे की लाश रखी थी।

सफ़ेद शर्ट, नीली निकर।

ठीक वैसा ही… जैसा उसने कॉरिडोर में देखा था।


रघु के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसका गला सूख गया।

“ये… ये कैसे हो सकता है…?”



अचानक कमरे का दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो गया।

लाइट फ्लिकर करने लगी।


और सन्नाटे में सुनाई दी —

छोटे-छोटे कदमों की आहट।

धीरे-धीरे पास आती हुई।


रघु का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

उसने टॉर्च जलाने की कोशिश की —

पर तभी किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


वो ठंडा था, बर्फ़ जैसा।


उसने टॉर्च घुमाई —

सामने वही बच्चा खड़ा था।

"मुर्दाघर के अँधेरे कमरे में खड़ा वार्ड बॉय रघु, सामने मासूम बच्चे की रहस्यमयी आकृति देखकर सहम गया।"
"उस पल रघु को यक़ीन हो गया… ये बच्चा ज़िंदा नहीं था।"


लेकिन अब उसका चेहरा मासूम नहीं था।

आँखें पूरी काली।

मुँह कान तक फटा हुआ।

और दाँत नुकीले, जैसे किसी जानवर के।



रघु चीख पड़ा और कॉरिडोर की ओर भागा।

पर दीवारों पर वही बच्चे की परछाईं उसका पीछा कर रही थी।


हर कमरे में, हर शीशे में, हर खिड़की में वही भयानक चेहरा।

कभी हँसता, कभी चिल्लाता, कभी सीधे झपटता।


उसके कानों में गूँज रही थी बच्चों की हँसी।

लेकिन वो हँसी मासूम नहीं,

बल्कि कब्र जैसी ठंडी और डरावनी।

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रघु सीढ़ियों तक पहुँचा।

उसने सोचा, बस बाहर निकलना है।


लेकिन ऊपर से वही बच्चा उतरता दिखा।

उसकी गर्दन तिरछी, आँखों से खून बहता हुआ।


उसने ठंडी आवाज़ में कहा —

“तूने मुझे क्यों नहीं रोका…?”


रघु के पैरों के नीचे परछाईं फैल गई।

और अगले ही पल… पूरा कॉरिडोर उसकी चीख से गूँज उठा।



 जब नर्सें वहां पहुँचीं,

तो वहां कोई नही था, मुर्दाघर का दर

वाज़ा खुला था।


रघु कहीं नहीं था।

सिर्फ़ ज़मीन पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान थे,

जो धीरे-धीरे गायब हो रहे थे।


🩸 समाप्त… या शायद नहीं।

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