“अँधेरी रात और जंगल की परछाईं”

 कभी-कभी इंसान अपनी हँसी और शरारत में ये भूल जाता है कि कुछ दरवाज़े ऐसे होते हैं जिन्हें खोलना ही नहीं चाहिए…

ये कहानी भी ऐसी ही है — तीन दोस्तों की, जिनके लिए डर सिर्फ़ मज़ाक था।

लेकिन उस रात, डर ने उन्हें अपना असली चेहरा दिखा दिया।

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कहानी...

राहुल, विक्रम और सूरज—ये तीनों बचपन से ही बदमाश किस्म के लड़के थे।

कॉलेज की कैंटीन हो या मोहल्ले की गली, जहाँ ये पहुँचते, वहाँ शोर-शराबा और मस्ती शुरू हो जाती।

"तीन दोस्त अलाव जलाकर जंगल में हँसते-खेलते बैठे हैं।"
"जिन्हें लगा ये जंगल बस मज़ाक है… उन्हें पता नहीं था कि अँधेरा सब सुन रहा है।"



राहुल सबसे ज़्यादा शरारती था। वो अक्सर कहता,

“ज़िंदगी का मज़ा तभी है जब सबको परेशान करो।”


विक्रम, थोड़ा चालाक और तेज दिमाग वाला था।

उसकी आदत थी दूसरों को challenge देने की।

और सूरज—तीनों में सबसे मुँहफट।

उसे डर का नाम तक सुनना बर्दाश्त नहीं था।


कई बार मोहल्ले वाले उन्हें डाँटते—

“तुम्हें किसी चीज़ का डर नहीं है क्या?”

तो सूरज हँसकर जवाब देता,

“अगर भूत मिला भी, तो पहले उसी को डराएँगे!”


उस साल की गर्मियों की छुट्टियाँ थीं। तीनों दोस्त मिले तो नया एडवेंचर सोचने लगे।

राहुल ने कहा—

“यार, हर बार वही बाइक राइड, वही मॉल, वही पिकनिक… कुछ अलग करते हैं।”


विक्रम की आँखों में शरारत चमकी—

“सोगढ़ गाँव का नाम सुना है? वहाँ का जंगल भूतिया कहलाता है। कहते हैं रात को वहाँ कोई नहीं जाता।”


सूरज हँसते-हँसते लोटपोट हो गया।

“बस, यही करेंगे! चलो गाँव चलते हैं। देखेंगे, इस भूत-प्रेत के चक्कर में लोग कितने बेवकूफ हैं।”


तीनों ने तय किया कि उसी हफ्ते निकलेंगे। बैग में टॉर्च, गिटार, कुछ खाने-पीने का सामान और तंबू रख लिया।

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शाम ढलने से पहले वे सोगढ़ गाँव पहुँच गए। गाँव छोटा-सा था—मिट्टी की झोपड़ियाँ, कच्ची गलियाँ और चारों तरफ़ फैले खेत।

गाँववालों ने तीनों को देखते ही पहचान लिया कि ये बाहर के लड़के हैं।


एक बूढ़ा किसान उनके पास आया और बोला—

“कहाँ जा रहे हो बेटा?”


“जंगल में,” राहुल ने बड़े आराम से जवाब दिया।


बूढ़े की आँखों में डर उतर आया।

“नहीं… रात को उस जंगल में मत जाना। बहुत लोग गए, कभी लौटकर नहीं आए। वहाँ कुछ है… जो इंसानों को अपने साथ ले जाता है।”


तीनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और फिर ज़ोर से हँस पड़े।

सूरज ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा—

“बाबा, आप भी न… इतना डरते क्यों हो? हम हैं न, कल सुबह तक भूत पकड़कर आपके घर ले आएँगे।”


गाँव की औरतों ने फुसफुसाकर बच्चों को घर के भीतर बुला लिया।

कुछ नौजवानों ने सिर हिलाकर कहा—

“ये लोग नहीं मानेंगे… भगवान ही इनकी रक्षा करे।”


लेकिन तीनों दोस्तों के लिए ये सब एडवेंचर की शुरुआत थी।


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शाम का सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।

आसमान पर लालिमा फैल चुकी थी, और पेड़ों की लंबी परछाइयाँ धरती पर ऐसे फैल रही थीं जैसे किसी ने काली चादर बिछा दी हो।


तीनों दोस्त बैग कंधे पर डालकर हँसते-गाते जंगल में दाख़िल हुए।

सूरज गिटार बजाते हुए बोला—

“देखना यार, ये जंगल हमें डराने से पहले ही बोर कर देगा।”


राहुल ने पेड़ पर चाकू से अपना नाम खोदा और कहा—

“अब देखो, अगर सच में यहाँ भूत है तो ज़रूर जवाब देगा।”


विक्रम ने भी शरारत में साथ दिया—

“हाँ, लिख दो—भूत अंकल, यहाँ आकर पकड़ लो हमें!”

और तीनों ज़ोर से ठहाके मारकर हँस पड़े।



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उन्होंने एक खुली जगह चुनी और तंबू गाड़ लिया।

सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके अलाव जलाया।

गिटार की धुन, कोल्ड ड्रिंक की बोतलें और दोस्तों की हँसी… सबकुछ बिल्कुल पिकनिक जैसा लग रहा था।


राहुल ने नाटकीय अंदाज़ में कहा—

“कल्पना करो… अभी सफ़ेद साड़ी वाली डायन पेड़ से कूदेगी और कहेगी, भैया, ज़रा लाइटर दो!”

तीनों हँसते-हँसते लोटपोट हो गए।


विक्रम बोला—

“अरे अगर भूत सच में हैं, तो इतने सालों से बेरोज़गार बैठे क्यों हैं? कभी हमें पकड़कर मज़ाक नहीं किया?”


उनकी आवाज़ें जंगल के सन्नाटे को चीरती जा रही थीं।

मगर कहीं गहराई में, वही आवाज़ें गूँजकर लौट रही थीं… और उनमें कुछ अजीब-सी खालीपन वाली ध्वनि घुली हुई थी।

इसे पढीए;

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रात गहराने लगी।

अलाव की लौ तेज़ से धीमी होने लगी।

ठंडी हवा में पेड़ों की शाखें हिल रही थीं।


अचानक सूरज ने कानों पर हाथ रखा।

“ओए… सुना तुम लोगों ने?”


राहुल और विक्रम चौंके—

“क्या?”


“जैसे कोई फुसफुसाया हो… मेरे नाम से।”


तीनों ने ध्यान लगाया, लेकिन फिर सिर्फ़ सन्नाटा था।

राहुल ने हँसकर माहौल हल्का करने की कोशिश की—

“भूत भी शायद तुझे ही चुनेगा भाई, तेरी शक्ल देखकर।”


लेकिन सूरज की आँखों में हल्का डर चमक उठा था।


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अलाव की आख़िरी लकड़ियाँ भी राख में बदलने लगीं।

अब चारों ओर घुप्प अँधेरा था—सिर्फ़ तंबू की टॉर्च की हल्की रोशनी बची थी।


सूरज ने अचानक कहा—

“यार, ये आग अपने-आप इतनी जल्दी कैसे बुझ गई? मैंने तो और लकड़ी डाली थी।”


विक्रम ने हँसकर जवाब दिया—

“क्यों? लगता है भूत अंकल ने तेरा लाइटर उधार ले लिया होगा।”


तीनों फिर से ठहाका लगाते हैं, लेकिन अब उनकी हँसी उतनी स्वाभाविक नहीं थी।

मानो हर हँसी के बाद सन्नाटा और गहरा हो जाता था।


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"पेड़ों के बीच काली परछाईं, टॉर्च की रोशनी में धुंधली दिखाई देती हुई।"
"जिस पर हँसे थे वही परछाईं अब उनका पीछा करने लगी थी।"




राहुल ने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की और चारों ओर घुमाई।

अचानक उसकी नज़र एक पेड़ के पीछे पड़ी।


“रुको… वहाँ कुछ हिला था।”


विक्रम बोला—

“कुछ नहीं, शायद जंगली बिल्ली होगी।”


लेकिन जब रोशनी उस पेड़ के तने पर गई…

तो एक काली परछाईं ऐसे सरककर गायब हो गई जैसे ज़मीन ने उसे निगल लिया हो।


राहुल का हाथ काँपने लगा।

“तुम दोनों ने देखा न?”


सूरज और विक्रम ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा, और पहली बार उनके चेहरों से हँसी ग़ायब हो चुकी थी।



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कुछ देर बाद अचानक, चारों तरफ़ से एक साथ सरसराहट उठी।

मानो सौ लोग पत्तों के बीच से होकर गुज़र रहे हों।

लेकिन दिखा—कुछ नहीं।


और फिर…

वो आवाज़ आई—

“क्यों आए हो…?”


तीनों के दिल की धड़कनें मानो कानों से बाहर फूटने लगीं।

आवाज़ न ज़ोरदार थी, न साफ़… मगर इतनी गहरी कि आत्मा तक चुभ गई।


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तीनों ने डर को हल्के में लेने की कोशिश की।

“चलो यार, सो जाते हैं, सुबह उठकर गाँववालों को बताएँगे कि जंगल में सिर्फ़ हवा और जानवर हैं,”

विक्रम ने कहा और तंबू में घुस गया।


राहुल और सूरज भी उसके पीछे-पीछे गए।

पर जैसे ही उन्होंने टॉर्च बंद की…

अँधेरे में एकदम साफ़ सुनाई दिया—

कदमों की आहट।


धीमी… खिसकती हुई…

जैसे कोई इंसान तंबू के चारों ओर घूम रहा हो।

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राहुल ने काँपते हाथों से टॉर्च ऑन की और ज़िप खोलकर बाहर झाँका।

पर सामने—कुछ भी नहीं था।


बस पेड़… हवा में हिलती शाखाएँ… और गाढ़ा अंधेरा।


वो बाहर आया ही था कि विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया—

“पागल है क्या? अकेले बाहर मत जा।”


और तभी!

पीछे से तंबू पर तेज़ खरोंचने की आवाज़ आई—

जैसे किसी ने लंबे नाखूनों से कपड़े को चीरने की कोशिश की हो।


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"सुबह की धूप में तीनों दोस्त गाँव की ओर लौटते हुए, पर एक की परछाईं उल्टी दिशा में जा रही है।"
"सुबह आई… मगर परछाईं ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।"


तीनों अब बाहर खड़े थे।

उनकी साँसें तेज़, दिल की धड़कनें कानों में गूंज रहीं।


अचानक सूरज की नज़र पेड़ों की लाइन पर पड़ी।

वहाँ…

तीन परछाइयाँ खड़ी थीं।


पर अजीब बात—

उनमें से एक की हरकतें उनसे मेल खा रही थीं।

जब सूरज ने हाथ उठाया—वो भी हाथ उठाती।

जब राहुल पीछे हटा—वो भी पीछे हटी।


विक्रम बड़बड़ाया—

“ये… ये हमारी परछाईं नहीं है।”


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घबराकर उन्होंने तंबू, बैग सब छोड़ दिए और जंगल के अंदर भाग निकले।

पेड़ों की जड़ों से ठोकर खाते, सांस फूलती…

मगर पीछे से वही आहट—

धीमी, लेकिन लगातार।

जैसे कोई उनके कदम गिन रहा हो।


एक बार राहुल ने पीछे मुड़कर देखा—

और उसके मुँह से चीख निकल गई।


काली परछाईं अब बच्चे के आकार की हो चुकी थी।

पर चेहरा—बिल्कुल धुंधला, सिर्फ़ गहरी काली आँखें।


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रात जाने का नाम नहीं ले रही थी।

तीनों थककर ज़मीन पर गिर पड़े।

“अब नहीं भाग सकता,” विक्रम हाँफते हुए बोला।


और तभी, दूर से ढोल-नगाड़ों की आवाज़ आने लगी।

गाँववाले मशालें लेकर जंगल में दाख़िल हो रहे थे।

उनकी ओर बढ़ते ही परछाईं एकदम धुएँ की तरह गायब हो गई।


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गाँववाले तीनों को घेरकर मंदिर ले आए।

वहाँ पुजारी ने कहा—

“तुम्हारी जान इसलिए बच गई क्योंकि जंगल ने आज तुम्हें छोड़ दिया।

पर याद रखो… जिसने उसकी परछाईं देख ली, वो कभी पूरी तरह आज़ाद नहीं होता।”


तीनों चुप थे।

उनकी आँखों में अभी भी वो

 धुंधला, काला चेहरा घूम रहा था।


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सुबह गाँव से निकलते वक़्त, सूरज ने अपनी परछाईं ज़मीन पर देखी।

वो मुस्कुराया—“देखो, सब ठीक है।”


लेकिन राहुल और विक्रम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया—

क्योंकि सूरज की परछाईं…

उससे उल्टी दिशा में चल रही थी।

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