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| गांव के सुनसान रास्ते पर नीम की छांव तले एक डरावनी लाश धीरे-धीरे सरकती हुई — क्या आपने कभी ऐसी भयानक सच्चाई देखी है? |
हर कोई मानता है कि "मृत्यु के बाद सब खत्म हो जाता है।"
लेकिन क्या हो अगर किसी की मृत्यु अधूरी हो...?
मध्य भारत का एक छोटा सा गाँव "पळसपुर", जहाँ शाम होते ही दरवाज़े बंद हो जाते हैं। लोगों की निगाहें नीचे झुकी रहती हैं, और हर घर के भीतर एक डर बसा है—एक घूमती लाश का डर।
वो लाश किसी की नहीं, उसी लड़की की है जो चार साल पहले एक सुनसान कुएं के पास मरी पाई गई थी। मौत की वजह आज तक कोई नहीं जान पाया।
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मेरी पोस्टिंग एक सरकारी स्कूल में हुई थी—पळसपुर. मैं, एक 28 साल की शिक्षिका, अकेली आई थी। गाँव सुंदर था...खामोश और हरियाली से भरा। लेकिन वहाँ के लोग मुझे देखकर बात करते समय आँखें चुराते थे।
दूसरे दिन जब मैं स्कूल गई, एक छोटी बच्ची ने मुझसे धीरे से पूछा:
“मैडम... आपको रात को किसी लड़की की रोने की आवाज़ आती है क्या?”
मैं हँस दी। सोचा बच्ची डरावनी कहानियों का असर है। लेकिन वही रात....
स्कूल के क्वार्टर में अकेली थी। बाहर अंधेरा और हवा तेज़ थी। आधी रात को अचानक दरवाज़ा “ठक-ठक” करने की आवाज़ आई।
मैं घबरा गई... देखा तो बाहर कोई नहीं था।
फिर मेरी खिड़की के पास से एक छाया गुज़री। सफेद साड़ी, गीले बाल, और तेज़ साँसें।
मैं डर के मारे काँप गई। रोशनी जलाई... लेकिन कुछ नहीं।
अगले दिन हिम्मत कर गाँव के बुज़ुर्ग "हरिराम काका" से पूछ लिया।
काका ने आँखें झुका लीं... फिर बोले:
“चार साल पहले एक लड़की थी—सरिता। बहुत सुंदर। एक रात किसी ने उसके साथ ज़बरदस्ती की... और मारकर कुएं में फेंक दिया। पुलिस आई पर कुछ साबित नहीं हुआ। और तभी से... वो हर अमावस्या को गाँव में घूमती है... किसी को खोजती है... शायद इंसाफ।”
अमावस्या की रात...
उस दिन स्कूल जल्दी बंद हो गया। सबने कहा—आज मत निकलना।
पर मैं नहीं मानी। मोबाइल उठाया, और कुएं की ओर निकल पड़ी।
कुएं के पास हवा और भी सर्द थी। झाड़ियाँ हिल रही थीं। और तभी... किसी ने पीछे से मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने मुड़कर देखा..
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| कुएं के पास सन्नाटे में खड़ी भयभीत शिक्षिका और सामने खड़ी वो रहस्यमयी बच्ची... क्या ये सपना था या कोई आत्मा? |
सरिता!
उसी रूप में जैसा काका ने बताया था। लेकिन वो मुझे देख रही थी... गुस्से से नहीं, दर्द से।
उसकी आँखों से खून बह रहा था।
वो बोली नहीं... बस हाथ उठाया और एक दिशा की ओर इशारा किया।
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मैं डर के मारे वहीं बेहोश हो गई। अगली सुबह उसी दिशा में गाँव वालों को लेकर गई... और वहाँ एक पुराना झोपड़ा मिला।
उस झोपड़े से एक बंद संदूक निकला। और उसके भीतर था—सरिता का पुराना मोबाइल और उसके साथ हुए अत्याचार का वीडियो सबूत।
पूरा गाँव सन्न रह गया। पुलिस फिर आई, और सरिता के साथ हुए अपराध के दोषी पकड़े गए।
अंत:
उस रात सरिता फिर आई।
अब उसकी आँखों में दर्द नहीं था।
उसने मुस्कुराकर मुझे देखा... और हवा में जैसे घुल गई।
अब पळसपुर में कोई डर नहीं है। सरिता को इंसाफ मिला।
लेकिन हर अमावस्या की रात... कुएं से एक ठंडी हवा अब भी बहती है। शायद वो धन्यवाद कहने आती है।
कहानी का सार:
"कभी-कभी मरे हुए भी तब तक नहीं जाते... जब तक उन्हें न्याय न मिले।"



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