रात के साढ़े ग्यारह बजे का समय था।
पुराने स्कूल की इमारत हमेशा की तरह सुनसान थी। टूटी खिड़कियाँ, छत से लटकती जालियाँ और बरामदे में टिमटिमाता बल्ब… सब मिलकर माहौल को और भी भारी बना रहे थे।
चौकीदार रघुनाथ रोज़ की तरह ताले चेक कर रहा था। तभी उसने धीमी आवाज़ सुनी—जैसे कोई बच्चा अंग्रेज़ी की किताब पढ़ रहा हो।
“A… B… C…”
रघु का गला सूख गया। इतनी रात को बच्चा? और वो भी बंद स्कूल में?
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| "जहाँ दिन में बच्चों की आवाज़ गूँजती थी, वहाँ अब सन्नाटा राज करता था।" |
क्लासरूम के भीतर
वो धीरे-धीरे चौथी क्लास के कमरे तक पहुँचा।
दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
अंदर… एक बच्चा बेंच पर बैठा था।
सर झुकाए कॉपी में कुछ लिख रहा था।
रघु ने हिम्मत करके पूछा –
“अरे बेटा, तू यहाँ क्या कर रहा है?”
बच्चे ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी मासूम सी मुस्कान थी, पर आँखें अजीब लग रही थीं… गहरी और खाली।
उसकी कॉपी पर सिर्फ़ यही बार-बार लिखा था –
“सर, आपने क्यों नहीं लौटे?”
सच का एहसास
रघु की नज़र ब्लैकबोर्ड पर पड़ी।
वहाँ मोटे अक्षरों में लिखा था –
“सर, मैं अब भी इंतज़ार कर रहा हूँ।”
उसका बदन काँप उठा।
उसने पीछे देखा—बच्चा वहीं था, पर उसकी परछाईं बोर्ड के पास खड़ी होकर रघु को देख रही थी।
पढीए;
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| "रघु ने जैसे ही बच्चे को देखा… उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।" |
बाहर जाने की कोशिश
डर के मारे रघु कमरे से भागा और बरामदे में आ गया।
उसका मन हो रहा था कि मुख्य गेट तक पहुँचे, पर गेट पर खड़े होते ही उसके पैर जैसे ज़मीन में धँस गए।
वो बार-बार हनुमान चालीसा याद करने लगा, भगवान का नाम लेने लगा, पर उसका डर कम नहीं हुआ।
खिड़की का खेल
रात का बाकी वक्त उसके लिए किसी यातना से कम नहीं था।
हर बार जब उसने पीछे मुड़कर देखा, बच्चा क्लास की खिड़की से झाँक रहा था।
कभी हँसता…
कभी हाथ हिलाकर पास बुलाता…
कभी बस आँखें गड़ाकर घूरता रहता।
रघु की साँसें तेज़ हो चुकी थीं, पर वो कहीं जा नहीं पा रहा था।
पढीए;
सुबह का सच
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| "रात के डर की आखिरी गूँज सुबह के सवाल में बदल गई।" |
जब सुबह की पहली किरण पड़ी, स्कूल के दरवाज़े खुले।
रघु थरथराते हुए गेट से बाहर निकला।
लोगों ने पूछा – “क्या हुआ?”
वो बस काँपती आवाज़ में यही कह पाया –
“क्लास मत खोलना… वहाँ बच्चा है। वो… अभी भी इंतज़ार कर रहा है।”
सब अंदर गए।
कमरा खाली था।
पर ब्लैकबोर्ड पर कुछ नए शब्द लिखे थे—
“सर, सवाल तो मैंने पूरे कर लिए… अब जवाब कौन देगा?”

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