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| छत पर खड़ी लाल आँखों वाली रहस्यमयी परछाई। |
धुएँ का बोझ, धातु की बदबू और वाहनों का ज़हर हर सांस में घुला हुआ था। छह साल की आर्या, हमारी इकलौती बेटी, रोज़-रोज़ खाँसते-खाँसते थक चुकी थी।
डॉक्टर ने साफ़ कहा था— “अगर इसका अस्थमा काबू में रखना है… तो इसे इस शहर से निकालो।
वरना एक दिन सांस ही इसकी दुश्मन बन जाएगी।”
मेरे पति, करण, भारतीय सेना में थे।
उनके लिए पोस्टिंग बदलना मुमकिन नहीं था, लेकिन उन्होंने मेरा और आर्या का गाँव भेजने का फैसला लिया।
ये गाँव शहर से बस चालीस किलोमीटर दूर था—
हरी-भरी ज़मीन, मिट्टी की खुशबू, और वो ठंडी हवा… जो हमें किसी मरहम जैसी लगी।
गाँव पहुँचने के बाद, शुरुआत के कुछ हफ़्ते जैसे सपने जैसे थे।
आर्या की साँसें हल्की हो गईं, उसका चेहरा खिल उठा…
और मुझे लगा, शायद ज़िंदगी फिर से पटरी पर लौट आई है।
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पर मैंने महसूस कि...गाँव वालों की एक अजीब बात—
शाम ढलते ही गावं की गलियाँ खाली हो जातीं, दुकानें बंद हो जाती, चूल्हे बुझ जाते, और हर कोई अपने-अपने घर में जैसे छिप जाता। पहले दिन ही हमारी पड़ोसन, एक बुज़ुर्ग महिला, ने मुझे चेताया था— “की दिन में चाहें जो करलो,
लेकिन रात को… किसी भी हाल में…घर से बाहर मत निकलना।”
मैंने मुस्कुराकर वह बात टाल दि।
मेरे लिए ये महज़ एक अंधविश्वास था।
लेकिन उनकी आँखों में जो अजीब-सा डर था, जो मै देख सक्ती थी। वैसे मुझे कभी रात को घर से बाहर निकलने की जरूरत नहीं पडती थी पर
करीब दो महीने बाद
करण ड्यूटी पर थे, और मैं व आर्या घर की धीमी-सी रूटीन में खोए थे की वो रात आई।
सर्दियों की शुरुआत थी, हवा में हल्की नमी थी।
रात के करीब साढ़े दस बजे थे, आर्या अचानक ही ज़ोर-ज़ोर से खाँसने लगी। उसकी सांसें फँस रही थीं, उसे
मैंने इनहेलर दिया, पर उसका कोई असर नहीं हुआ।
गाँव का एकमात्र डॉक्टर आधे किलोमीटर दूर था।
मेरे पास सोचने का वक़्त नहीं था—
मोपेड उठाई, आर्या को अपनी ओढ़नी में लपेटा, और अंधेरी गली में निकल पड़ी।
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| बीमार बेटी को लेकर डॉक्टर के पास जाती माँ, सुनसान गाँव की रात में। |
विनम्र चहकने वाला गाँव रात में कुछ अलग सा लग रहा था—
सिर्फ अँधेरा ही नहीं… बल्कि ऐसा सन्नाटा, जो कानों को चुभे।
कोई कुत्ता भी नहीं दिख रहा था,
कोई झिंगुर नहीं गा रहा था…
यहाँ तक कि हवा भी थम-सी गई थी।
लेकिन…उस सन्नाटे के बीच, एक और अहसास था—
जैसे कोई मेरे पीछे चल रहा हो।
मैंने एक बार पीछे देखा—गली खाली थी।
पर दिल में एक ठंडी लहर उतर गई।
ऐसा लग रहा था… मैं अकेली नहीं हूँ।
मैं मोपेड तेज़ चलाते हुए डॉक्टर के घर पहुँची।
लकड़ी का पुराना दरवाज़ा, जिसके पीछे से हल्की-सी पीली रोशनी झांक रही थी।
मैंने ज़ोर-ज़ोर से खटखटाया —
“डॉक्टर साहब! दरवाज़ा खोलो… आर्या… साँस नहीं ले पा रही!”
अंदर से कदमों की आहट आई, पर दरवाज़ा नहीं खुला।
उसकी जगह… एक धीमी, हिचकिचाती आवाज़ —
“क… कौन है बाहर?”
“मैं हूँ, सीमा! गाँव के नए घर में रहती हूँ… जल्दी खोलो!”
कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर उसने और भी धीमी आवाज़ में कहा —
“रात में…तुम बाहर कैसे निकल गई?”
उसके लहजे में हैरानी से ज्यादा डर था।
जब मैंने बार-बार आग्रह किया, तो खिड़की का पल्ला धीरे से खुला।
पीली रोशनी में उसका चेहरा नज़र आया —
आंखें फैली हुई, माथे पर पसीना, जैसे उसने किसी खौफनाक चीज़ को देख लिया हो।
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मुझे ऊपर से नीचे तक घूरने के बाद ही उसने दरवाज़ा खोला, और आर्या को देखते ही फौरन अंदर खींच लिया...
उन्होने आर्या को जल्दी-जल्दी दवा दी, इनहेलर लगाया।
कुछ देर में उसकी सांसें सामान्य हुईं, पर डॉक्टर की आँखें बार-बार दरवाज़े की तरफ़ दौड़ रही थीं। वह “सीमा, आज की रात यहीं रुक जाओ, तिनी तुम्हारा बाहर जाना ठिक नहीं है।“अच्छा नहीं… मतलब?” मैंने पूछा।
वो चुप रहा, बस अपना होंठ काटते हुए सिर झुका लिया।
उसकी चुप्पी ही डरावनी थी।
लेकिन मेरे मन में सिर्फ एक ख्याल था —
मुझे घर पहुँचना है।
आर्या को गोद में लेकर मैं मोपेड पर बैठी और वही सुनसान रास्ता पकड़ लिया।
गली में अब अंधेरा पहले से ज्यादा गाढ़ा लग रहा था।
पुरानी हवेलियों की खिड़कियाँ जैसे काली आँखें बनकर मुझे देख रही थीं।
और तभी…
मेरी नजर बाईं ओर, एक टूटी हुई छत पर पड़ी। एक बड़ी, झुकी हुई परछाई — इंसानी शक्ल की, पर… इंसान नहीं।
उसकी आँखें चाँदनी में नहीं, बल्कि किसी भीतर से जलती सफ़ेद आग की तरह चमक रही थीं।
वो बिना हिले-डुले मुझे देख रहा था…
निगाहें इतनी गहरी, कि जैसे सीधे मेरे सीने के आर-पार जा रही हों। मेरे हाथ काँपने लगे, मोपेड का हैंडल डगमगा गया।
लेकिन मैंने नज़रें फेर लीं और जितना हो सकता था उतनी तेज़ी से घर की तरफ भागी।
पीछे से कदमों की आहट — तेज़, भारी, और असमान।
जैसे कोई लंगड़ाते हुए भी दौड़ सकता हो।
मैंने एक झलक देखने की गलती की —
वो परछाई अब छत पर नहीं थी…
बल्कि मेरे पीछे, सड़क के बीचोबीच दौड़ रही थी।
उसका चेहरा अब भी अंधेरे में था, पर उसकी रफ्तार…
वो हर पल करीब आ रहा था।
मैं एक गली मोड़ते ही घर पहुँची, मोपेड गिराई, और आर्या को गोद में उठाकर अंदर भागी।
दरवाज़ा धड़ाम से बंद किया, कुंडी चढ़ाई।
दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि कानों में उसका शोर गूंज रहा था।
मैं आर्या को लेकर बेडरूम में बैठ गई।
सोचा था, अब सब खत्म।
लेकिन…
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| माँ-बेटी को पीछा करती हुई परछाई, खुले दरवाज़े के बाहर खड़ी। |
आधी रात को, हल्की-सी खिड़की से बाहर झाँका…
वो अब भी था। आँगन में घूमता हुआ…
कभी दरवाज़े के पास आता, कभी खिड़की के…
जैसे घर में घुसने का रास्ता ढूंढ रहा हो।
उसकी परछाईं में… कुछ जानवर-सा था — लंबा मुंह, अजीब झुका हुआ कद, और हल्की गुर्राहट जैसी आवाज़।
सुबह होने तक मैं एक पल भी नहीं सोई।
और जब बाहर निकली…
पिछले हिस्से की गीली मिट्टी में, उसके पैरों के गहरे निशान साफ़-साफ़ बने थे — चार उंगलियों वाले, लंबे और तिरछे…
इंसान के नहीं।
उस दिन मैंने करण को फोन किया —और कहा कि “ये घर तुरंत बेच दो…हम वापस शहर चलते है।” उन्होंने पुछने की कोशीश की मैंने कहा "यहां आने के बाद बताऊगी" उन्होंने फिर वह घर बेच दिया और हम शहर वापस रहने आगये।
पर आज भी… जब कभी रात में खिड़
की से बाहर देखती हूँ, तो डर लगता है…कहीं वो परछाई… मेरा पीछा करते-करते… शहर तक न आ पहुँची हो।



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