गली का आखिरी मोड

 

रात में सुनसान गाँव की पुरानी गली, टूटी-फूटी दीवारें और वीरान माहौल।
गाँव की वो कुख्यात गली, जहाँ रात होते ही सन्नाटा और डर का साया छा जाता है।

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भैरवपुर में एक पुराना, संकरा गलीयारा है। दिन में यह आम गलियों जैसा लगता है—टूटी-फूटी दीवारें, उखड़े हुए ईंट-पत्थर, और झाड़ियाँ दीवारों से लिपटी हुई। लेकिन रात होते ही यह गली एकदम वीरान हो जाती है। गाँव वाले कहते हैं—

 "रात में जो भी वहाँ गया, वो कभी वापस नहीं आया।"

पिछले कई सालों से कोई भी उस तरफ नहीं जाता, यहाँ तक कि उसके आसपास से भी गुजरने में लोग डरते हैं।

कहा जाता है, सालों पहले इस गली में एक पति-पत्नी रहते थे। पति शराबी था और पत्नी से रोज मारपीट करता था। पड़ोसियों ने कई बार बीच-बचाव किया, लेकिन उसका गुस्सा कभी कम नहीं हुआ।

      एक रात, जब पति ने फिर से उसे बुरी तरह पीटा, तो वह औरत टूट चुकी थी। उसने चुपचाप अपने कमरे में तेल डाला… और खुद को आग के हवाले कर दिया। उसके चीखने की आवाज दूर-दूर तक सुनी गई, लेकिन जब तक लोग पहुँचे, बस जलता हुआ शरीर बचा था। कुछ दिनों बाद, उसका पति भी रहस्यमयी तरीके से मर गया।

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तब से, उस गली में अजीब घटनाएँ होने लगीं—लोगों के कदम भारी हो जाना, अचानक अंधेरा छा जाना, और किसी का धीमे-धीमे पीछा करना। धीरे-धीरे गाँव वालों ने उस रास्ते से जाना पूरी तरह छोड़ दिया।

हाल की ही घटना – कुछ दिन पहले, गाँव का ही एक आदमी रमेश (जिसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं) काम से देर रात लौटा। थोड़ी शराब भी पी रखी थी। शायद ध्यान नहीं रहा, और उसने उसी गली से घर का शॉर्टकट लेने की गलती कर दी।

    पहले तो सब सामान्य था, लेकिन थोड़ी दूर जाने पर उसे अजीब लगा—गली लंबी होती जा रही थी और उसे अपना घर का रास्ता कहीं दिख ही नहीं रहा था।

रात में धुंधले माहौल में गली के अंत पर खड़ी जली हुई चेहरा वाली भूतिया औरत का साया।
गली के आखिर में खड़ा वो डरावना साया, जिसकी नज़रें किसी की रूह तक काँप देती हैं।


वह मुड़-मुड़कर अलग-अलग गलियों में गया, पर उसे अपना घर कहीं नहीं मिलता पर गली के अंत में एक साया जरूर दिखता—लंबा, दुबला, और हर गली मे उसके और करीब आ रहा था। वह लगातार उसके पास आते दिख रहा था। रमेश का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह किसी के घर के दरवाज़े पर दस्तक देता, आवाज़ लगाता—

"अरे… कोई है?" 

पर वहां पूरी खामोशी… मानो कोई रहता ही न हो...ऐसे भटकते हूए जब वह एक गली में आया, तो साया इतना पास आ चूका था कि रमेश उसे साफ देख सकता था—वो एक औरत थी। उसका चेहरा आधा पिघला और जला हुआ था, आँखें पूरी तरह सफ़ेद, और होंठ ऐसे जैसे किसी को नोच खाए हों। वह बिना पलक झपकाए उसे घूर रही थी।

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वो अपने हाथ उसकी ओर बढ़ाने लगी। रमेश का दम घुटने लगा था। पर तभी अचानक पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई

"अरे रमेश! तू यहाँ क्या कर रहा है?"

रमेश ने पीछे देखा—गाँव के दामोदर काका थे। जैसे ही रमेश उनकी तरफ भागा, उसे लगा मानो किसी ने उसकी पीठ पकड़ने की कोशिश की हो।

रात के समय एक बुजुर्ग व्यक्ति, डरे हुए आदमी को वीरान गली से बाहर खींचते हुए।
दामोदर काका की समय पर मदद, जिसने रमेेश को उस भूतिया साये से बचा लिया।


उस रात काका संयोग से उधर से गुजर रहे थे और उन्होंने रमेश को गोल-गोल उसी जगह भटकते देखा उन्होंने कई बार उसे आवाज लगाई पर वह सून‌ ही नहीं रहा था। वह साया उसे वहां से बाहर जाने ही नहीं दे रहा था। दामोदर काका सारा माजरा समझ गये और फिर उसे खींचते हुए वहा से घर ले गए।

उस रात रमेश दामोदर काका की वजह से बच गया पर उसके बाद कई हफ्तों तक बीमार रहा। आज भी जब वो उस गली के नाम तक सुनता है, तो उसका चेहरा पीला पड़ जाता है।

    ये कहानी सच है या नहीं, कोई नहीं जानता… पर भैरवपुर में बुज़ुर्ग आज भी कहते हैं—

"रात में उस गली से मत गुजरना, वरना हो सकता है अगली सुबह कोई तुम्हें याद भी न करे।"

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