मुंबई का दहिसर-पश्चिम इलाका, जहाँ दिनभर चहल-पहल रहती है, पर रात के बाद कुछ गालियाँ इतनी सुनसान हो जाती हैं कि परिंदे भी पर न मारें।
स्ट्रीट लाइट्स टिमटिमाती हैं, कहीं आधी बुझी हुई, कहीं झिलमिलाती हुई, और बारिश के बाद की नमी से ज़मीन पर धुंध-सी जम जाती है।
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| "उस रात बस के अंदर हर सीट जैसे अजनबी डर से भरी थी।" |
इसी इलाके में रघुनाथ पाटिल नाम का आदमी रहता था।
उम्र करीब 45 साल, पेशे से बस ड्राइवर।
पिछले 15 साल से वो BEST की लाल बस चलाता आ रहा था।
हर कोई उसे रघु भाई कहकर बुलाता।
स्वभाव से सीधा-सादा, अपने काम से मतलब रखने वाला इंसान।
पर उसके भीतर हमेशा एक डर भी छुपा रहता था –
अंधेरे से उसे कभी भी चैन नहीं मिलता।
उस रात रघु की नाइट शिफ्ट लगी थी।
आख़िरी बस पकड़नी थी, और उसे डिपो से मालाड तक चलाकर वापस छोड़ना था।
वो सोच रहा था –
“बस आज ये आख़िरी फेरा खत्म कर लूँ, फिर छुट्टी लेकर गाँव चला जाऊँगा।”
रात के 11 बजे की बस थी, भीड़-भाड़ लगभग खत्म हो चुकी थी।
कुछ ऑफिस वाले थके-हारे चढ़े, दो-चार नींद में डूबे यात्री बीच में उतर गए।
धीरे-धीरे सीटें खाली होने लगीं।
अब बस में सिर्फ रघु और दो यात्री बचे थे।
घड़ी 11:40 का समय दिखा रही थी।
दहिसर चेक नाका पार करने के बाद बस स्टॉप पर उसने देखा —
सड़क किनारे एक अकेली औरत खड़ी सिर पर पल्लू, चेहरा ढका हुआ।
हवा में हल्की नमी थी, फिर भी वो नंगे पाँव खड़ी थी।
रघु ने सोचा –
“इतनी रात को कौन खड़ा होगा यहाँ? ऊपर से अकेली…”
उसने ब्रेक मारी।
दरवाज़ा खुला।
औरत चढ़ी।
पर अजीब बात ये थी — वो कुछ बोली नहीं, सीधे पीछे की आख़िरी सीट पर जाकर बैठ गई।
रघु ने पीछे शीशे से झाँका।
उस समय बस में बाकी दोनों यात्री पहले ही उतर चुके थे।
अब बस में सिर्फ़ रघु और वही औरत थी।
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| "जब बस रुकी… वो औरत जैसे पहले से वहीं इंतज़ार कर रही थी।" |
रघु ने बस आगे बढ़ाई।
सड़क सुनसान थी, सिर्फ़ स्ट्रीट लाइट्स की पीली रौशनी और बीच-बीच में कुत्तों का भौंकना।
हर ड्राइवर की आदत होती है, पीछे आईने से देखना।
रघु ने भी झाँका।
वो औरत… एकदम स्थिर बैठी थी।
ना हिली, ना बोली।
बस उसका घूँघट इतना गहरा था कि चेहरा बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था।
कुछ देर बाद रघु ने पूछा –
“कहाँ उतरना है, बहन?”
कोई जवाब नहीं।
उसने फिर ज़ोर से कहा –
“अरे सुनती हो? कहाँ जाना है तुम्हें?”
फिर भी ख़ामोशी।
सिर्फ़ बस के इंजन की घर्र-घर्र और बाहर से आती हवा की सिटी बजाती आवाज़।
रघु के गले में जैसे काँटा अटक गया।
उसका मन हुआ गाड़ी रोक दे, पर रात का वक्त…
जगह सुनसान…
अगर सच में कोई परेशानी में फँसी औरत हो तो?
ज़िम्मेदारी भी थी।
उसने सोचा – “चलो, आगे के स्टॉप पर देखता हूँ।”
जैसे ही बस आकाशवाणी के पास वाले मोड़ से गुज़री, रघु ने अचानक महसूस किया—
बस के पीछे की तरफ़ से हल्की-सी हँसी सुनाई दी।
वो रुक-रुक कर, दबे स्वर में हँस रही थी।
उस हँसी में कुछ ऐसा था जो इंसानी नहीं लगता था।
ना स्त्री की, ना बच्चे की… बल्कि जैसे कई आवाज़ें मिलकर हँस रही हों।
रघु का शरीर पसीने से भीग गया।
उसने तुरंत शीशे में देखा—
वो औरत अब भी वहीं बैठी थी।
पर उसका सिर धीरे-धीरे बाईं तरफ़ घूम रहा था…
इतना कि इंसान की गर्दन जितनी घूम सकती है, उससे कहीं ज़्यादा।
रघु ने घबराकर जल्दी से शीशा सीधा कर लिया।
कुछ ही देर बाद बस खाली रोड पर “संजय गांधी नेशनल पार्क” के पास पहुँची।
वो जगह दिन में भी घनी और डरावनी लगती है, और रात को तो बिल्कुल काली सुरंग जैसी।
रघु ने हल्के से पीछे देखा—
सीट खाली थी।
औरत कहीं दिखाई नहीं दी।
उसका दिल जैसे उछलकर गले में अटक गया।
उसने तुरंत बस रोक दी।
खाली गाड़ी… दरवाज़ा बंद… वो औरत कहाँ गायब हो सकती है?
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| "वो अब भी खड़ी थी… जैसे उसे कहीं जाने ही न देना चाहती हो।" |
रघु ने जैसे ही सीट पर सर टिकाया, कुछ ठंडी हवा उसकी गर्दन से गुजर गई — ऐसा लगा मानो किसी ने हल्का सा हाथ उसकी ठोड़ी पर रखा हो। उसने पीछे देखा — खाली सीट। वह खुद से बोला, “हवा होगी… थकान होगी।” पर आवाज़ उसके भीतरी हिस्से में गूंज रही थी: कोई उसे देख रहा था।
बस के अंदर की लाइटें कभी-कभी झपक जातीं, और उसी झपक में कहीं-न-कहीं तर्क टूट जाता था। रेडियो पर एक पुराना गाना चलने लगा — ऐसा गाना जो रघु बचपन में सुनता था, माँ की साड़ी की खुशबू के साथ जुड़ा हुआ। पर उस गाने की धुन अचानक बीच में रुककर दोहराई गई, जैसे कोई चाबी बार-बार हवा में फँसी हो।
रघु ने आख़िरी बार पीछे देखा। उस घूँघट के नीचे से हल्की-सी साँस की आहट आ रही थी — मानो कोई धीरे-धीरे मँडरा रहा हो। उसी पल, खिड़की के शीशे पर अचानक छोटे-छोटे नमी के दाग बन गए — ठीक उस जगह पर जहाँ औरत बैठी थी। दाग फैलते-फैलते किसी अक्षर की शक्ल लेने लगे — रघु को लगा उसने चार हर्फ़ पढ़ लिए--“लौ”, पर पूरा शब्द बनकर मिट गया। रघु की छाती सिकुड़ी।
कुछ मिनट बाद बस ने फिर गति पकड़ी। बाहर रात का अँधेरा और गहरी छाँवें थीं। अचानक औरत ने बिना मोड़े पीछे से तीन बार आहिस्ता से थपकी दी — धक-धक-धक — जैसे किसी ने किताब के पन्ने पलट दिए हों। रघु के हाथ की मांसपेशियाँ खिंच गईं। उसने जुबान से भगवान का नाम लिया और कुर्सी से उठकर आगे की तरफ़ देखा — सामने की सीट पर कोई नहीं, खिड़की में उसकी अपनी परछाईं टिमटिला रही थी। पर परछाईं अजीब थी — उसे कुछ और-सा लगा, जैसे उसकी परछाईं ही थोड़ा-सा देर से हिले।
बस जब रेलवे ओवरब्रिज के नीचे आई, रेडियो अचानक एक व्यापक भीड़ की चिल्लाहट के क्लिप पर कूद गया — मानो कोई भयानक खबर रिपोर्ट हो रही हो — पर अगला पल फिर वही धुंधला पुराना गाना। रघु का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने टॉर्च का बटन दबाया — बैटरी कम थी, रोशनी हिचकोले खा रही थी। उसने टॉर्च की रोशनी भीतर झपकाकर पीछे देखा — औरत की साड़ी की कढ़ाई की सिलाई में कुछ चिंगारी सी चमक उठी — पर फिर अँधेरा।
रघु ने खुद को समझा-समझा कर कहा, “बस थोड़ी देर और… बस डिपो के पास।” पर जैसे ही बस ने एक खाली मोड़ लिया, औरत ने धीरे से कहा — बस के अंदर, बिल्कुल पास में, उसकी आवाज़ कान के पास फुसफुसाई, पर शब्द इतने धीमे थे कि रघु को बार-बार झुककर सुनना पड़ा — “उसी रात… लौट आना…”
रघु ने हकलाकर कहा, “कौन? तुम… क्या चाहती हो?” पर जवाब न आया। बस के बाहर की सड़क पर हल्की बारिश की टपकन-सी आवाज़ मिलने लगी — पर बाहर न बूंदें थीं, न बादल। सीट पर रखी उसकी चप्पल के पास अचानक नमी के छोटे-छोटे निशान बन गए, जैसे किसी ने भीगती साड़ी को किनारे पर फिका-सा रखा हो।
घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। रघु ने अचानक अपने मोबाइल देखा — स्क्रीन पर किसी ने रिक्त नंबर से कॉल की कोशिश की थी, मिस्ड कॉल, वक्त उस रात की ही — पर मिस्ड कॉल का समय दिखा 11:47। उसी पल वह एहसास हुआ कि औरत ने कभी शब्दों में न कहा, पर उसके हरकते और संकेत एक ही बात दोहरा रहे थे — वहाँ कुछ अधूरा है।
बस डिपो के पास पहुँची तो जैसे-जैसे सामने की रोशनी बढ़ी, औरत की सूरत और भी पारदर्शी होती चली गई — बस की सीट पर कपड़े की बनावट अब धुंधला रही थी, घूँघट हवा में घुलने लगा — औरत हौले से मुस्कुराई, पर इस मुस्कान में कुछ भयावह शांत था, कोई दर्द जो शब्दों से परे था। उसने एक बार सिर झुकाया — और रोशनी की तेज़ किरण से पहले, बस की सीटी फट से बज गई और अगले पल औरत वहाँ नहीं थी।
रघु ने झट से सीट की जाँच की — कहीं कोई निशान, कोई आदमी, कुछ भी नहीं। बस थी–रुकी हुई, खाली। बाहर बारिश नहीं, न कोई भीड़। सिर्फ़ चंद लोग अपनी दूकानों की ओर बढ़ रहे थे। रघु ने गहरी साँस ली, पर शरीर-पांव जैसे जकड़ गए थे। उसने उन चप्पलों को देखा — जो पहले नमी से भीगे हुए थे — अब सूखे थे, पर जूता बॉक्स में एक छोटा-सा धागा फँसा मिला — लाल रेशमी धागा, ठीक उस सिलाई वाले धागे जैसा जिससे साड़ी की कढ़ाई होती है।
अगले दिन, रघु ऑफिस में बैठा था पर नींद नहीं। रात की घटनाएँ उसकी आँखों के सामने बार-बार फ़िल्म की तरह चल रही थीं — धागे, थपकी, फुसफुसाहट। उसने उन बूढ़े सफरियों से बात करने की कोशिश की जिनके साथ वो आख़िरी कुछ स्टॉप पर मिलता था — पर किसी ने कुछ नहीं देखा, किसी ने कुछ नहीं सुना; सब ने उसे सिर्फ़ हैरानी भरी नज़रों से देखा।
पर सबसे अजीब बात तब हुई जब एक दिहाड़ी मजदूर ने उसे बताया — “बात ये है भाई, उधर जो औरत दिखती है, वही पिछली साल मर चुकी थी। घरवाले बताते हैं कि उसके बेटे की शादी के लिए उसने खुद साड़ी सिलवाई थी — पर रात में अचानक किसी ने आकर उसे छेड़ दिया, और उसकी जान चली गई। उसके बाद से लोग कहते हैं, वो साड़ी कभी पूरी नहीं हुई।”
रघु के हाथ ठंडे हो गए। याद आया उस लाल-रेशमी धागे की एक कतरा… औरत ने किन्हीं शब्दों में जो कहा था — “लौ…” — शायद वही शब्द था जो शीशे पर बनकर मिट गया था।
उस रात के बाद रघु ने अपनी बस की शिफ्ट बदली ली। वह अब रात के 11:30 के बाद उस सड़क से गुज़रना ही टालता है। कई बार उसे लगता है कि मंज़िल पास ही है, पर रास्ते की उस मोड़ को देखते ही दिल धक-धक करने लगता है, और उसकी साँसें थम-सी जाती हैं।
और जब कभी वह अचानक उस पार से गुजरता है — शाम की देर में — तो वह शीशे में झाँक कर देखता है कि कहीं कोई हल्की-सी परछाईं तो नहीं झलक रही। पर अक्सर शीशा खाली ही होता है — पर उसकी उंगलियाँ झट से कमर के पास लाल-रेशमी धागे को छुआ पहचानने सी कर लेती हैं।
अंत — प्रश्न (सस्पेंस)
वह औरत सचमुच मदद चाहती थी या किसी अधूरे काम की फसी हुई परछाईं थी?
रघु आज भी उस रास्ते से डरता है — और तुम क्या सोचते हो: वो औरत असल में कौन थी?
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