एक भूतिया घर


    शहर की पुरानी गलियों में अक्सर वो घर मिलते हैं जिन्हें लोग देखते ही नज़रें फेर लेते हैं। टूटी छतें, धँसी हुई दीवारें, और खामोशी जिसमें अजीब-सी कराहट छुपी रहती है।

ऐसी ही एक हवेली से जुड़ी है दर्ज़ी शंकर की कहानी — एक साधारण आदमी, जिसकी ज़िंदगी उस दिन से कभी पहले जैसी नहीं रही।

पुराने जमाने की छोटी दर्ज़ी की दुकान, शाम का समय और सिलाई मशीन पर शंकर बैठा अधूरे कपड़े।"
"यहीं से शुरू हुई थी वो कहानी… जब घूँघट वाली औरत पहली बार आई।"
बिल्कुल हो


      शंकर कोई बड़ा कारीगर नहीं था। बस एक छोटा-सा टेलरिंग शॉप चलाता था।

उसकी दुकान बाज़ार की भीड़ से थोड़ी हटकर थी। छोटी-सी जगह, जिसमें एक पुरानी सिलाई मशीन, कुछ कुर्सियाँ और टंगे हुए कपड़े लटकते रहते।

शंकर अपने काम में ईमानदार था। लोगों की शादियों के कपड़े हो या रोज़मर्रा के पहनावे — सब वही हँसते-हँसते तैयार करता।

लोग कहते — “शंकर के हाथों में जादू है।”

लेकिन शंकर की ज़िंदगी साधारण थी — सुबह दुकान खोलना, दिनभर कपड़े सीना और रात को घर लौट जाना।

     एक शाम, जब शंकर अपनी दुकान बंद करने ही वाला था, तभी दरवाज़े की घंटी “टनन-टनन” बजी।

वो चौंका। क्योंकि उस वक़्त तक ग्राहक आना बंद कर देते थे।

दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी। लंबा घूँघट, सफ़ेद साड़ी। उसकी चाल धीमी, और पूरे कमरे में हल्की-सी अगरबत्ती जैसी गंध फैल गई।

शंकर ने कुर्सी खींची और कहा —

“आइए… बैठिए।”

औरत ने बिना बैठे धीरे से पैकेट रखा और बोली —

“ये कपड़ा सिल देना… कल तक।”

उसकी आवाज़ न तो साफ़ थी, न पूरी तरह दबाई हुई — जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।

शंकर ने पूछा — “नाम… और पता?”

औरत ने रजिस्टर में उंगलियों से धीरे-धीरे लिखा — “चौधरी हवेली, पुरानी क़स्बा गली।”

फिर बिना कुछ और कहे बाहर निकल गई।


रात को जब शंकर ने उस रजिस्टर का पन्ना देखा, तो अक्षर बड़े अजीब लगे। जैसे किसी बूढ़े हाथ से लिखे हों, काँपते-काँपते।

उसके मन में हल्का-सा डर आया, मगर उसने सोचा — “क्या बेवकूफ़ी कर रहा हूँ, बस एक ग्राहक है।”

अगले दिन उसने कपड़ा तैयार किया। मगर वो औरत लौटकर नहीं आई।

फिर दूसरा दिन… फिर तीसरा दिन… हफ़्ते भर तक कोई नहीं आया।

     एक शाम शंकर ने सोचा — “इतना महँगा कपड़ा है… ऐसे कैसे छोड़ सकती है? चलो, खुद ही हवेली तक चलकर दे आता हूँ।”

कपड़े का पैकेट हाथ में लेकर वो पुरानी क़स्बा गली पहुँचा। गली सुनसान थी, जैसे वहाँ ज़िंदगी ही थम गई हो।

और फिर सामने थी चौधरी हवेली —

ऊँचा लोहे का गेट, जंग खाया हुआ। दीवारों पर बेलें लिपटीं, टूटी हुई खिड़कियाँ। ऐसा लगता था जैसे सालों से वहाँ कोई रहता ही नहीं।

"अंधेरे में खड़ी टूटी-फूटी हवेली, खिड़कियों से झाँकता सन्नाटा और टेढ़े दरवाज़े।"
"जहाँ हर दीवार जैसे कोई भूली दास्तां सुना रही थी।"



शंकर ने गेट खोला। “चीईईईईं…” की आवाज़ से पूरा सन्नाटा काँप गया।

अंदर कदम रखते ही अजीब-सी ठंडक ने उसे घेर लिया। हवा में नमी और सीलन की गंध।

उसके पैर जैसे भारी हो गए।

अंदर झाँकते हुए उसने पुकारा —

“कोई है…? कपड़ा लेना है…”

जवाब में बस उसकी अपनी आवाज़ की गूँज लौटी।


फिर अचानक पीछे से पायल की धीमी छनछनाहट सुनाई दी।

शंकर पलटा — और वहीं, दरवाज़े पर वही औरत खड़ी थी। वही सफ़ेद साड़ी, वही लंबा घूँघट।

उसकी आवाज़ ठंडी थी —

“कपड़ा… तैयार हो गया?”

शंकर के हाथ काँप उठे। उसने पैकेट आगे बढ़ाया। और जैसे ही औरत ने उसे छुआ — उसकी उंगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।

शंकर का दिल तेजी से धड़कने लगा।

अचानक सीढ़ियों के ऊपर से दरवाज़ा अपने आप चर्रर्रर्र… की आवाज़ से बंद हो गया।

शंकर के पाँव काँप गए। उसने किसी तरह हिम्मत जुटाई और भागा।

"अँधेरे घर के दरवाज़े पर खड़ी घूँघट में लिपटी औरत, जिसके चेहरे का भाव साफ़ नहीं दिखता।"
"शंकर जब मुड़ा… वो औरत अब भी दरवाज़े पर खड़ी थी।"

बाहर का गेट इस बार अपने आप खुला।

शंकर हाँफते हुए बाहर निकला। मगर पीछे पलटकर देखा तो…

वही औरत हवेली के दरवाज़े पर खड़ी थी। स्थिर, न हिली, न कुछ बोली। बस घूँघट में।


    अगले दिन शंकर ने मोहल्लेवालों से पूछा तो उन्होंने कहा —

“अरे, चौधरी हवेली तो बरसों से वीरान पड़ी है। वहाँ तो कोई रहता ही नहीं…! चौधरी परिवार के लोग तो बहुत पहले ही मर गए।”

आज तक शंकर सो

चता है —

“क्या वो औरत असली थी… या उस हवेली की आत्मा?”

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