कुछ-कुछ जगहें होती हैं, जो हमें सावधान रहने के लिए कहती है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हवा, अँधेरा और सन्नाटा बस सामान्य हैं, लेकिन कुछ आवाज़ें और हल्की-सी हलचल
भी हमें डरा देती है।
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| रहस्यमयी सन्नाटे में डूबी पुरानी रेल की पटरी, जहाँ हवा भी डर का संदेश लेकर बह रही है। |
ऐसी ही एक कहानी गाँव के पीछे फैली पुरानी रेलवे पटरी जो सामान्य-सी लगती है, लेकिन रात में — जहां अजीब सा सन्नाटा फैल जाता है जो बताता है की यहाँ कुछ छिपा हुआ है,
वसुदेव — सब उसे वसु कहते थे — गाँव का लड़का था: हल्का-सा कद, घनी पट्टीदार मूँछें, और चेहरे पर मेहनत की एक सूखी परत। शहर में सेल्समैन की नौकरी ने उसकी आदतें बदल दी थीं — सुबह उठकर घंटे भर की भागदौड़ के बाद वह शहर चला जाता फिर नए-नए ग्राहक, शाम तक वह तक जाता। वसु की आँखों में एक तरह की सख्ती और अकेलेपन का मेल था; वह कम बोलता, पर सब देखता था — लोगों की चाल, बाजार की सुस्ती।
वह गाँव के जिस रास्तेसे शहर जाता था, वही से एक पुरानी रेलवे पटरी गुज़रती थी। झाड़ियों के बीच पड़ी रेत, जंग लगी पटरी, कुछ उखड़े हुए प्लेटफॉर्म के निशान सब सामान्य। लेकिन गाँव वालों का कहना था रात मे कभी वहां नही जाना चाहीए, वहां कुछ है.. जो कभी कभी दिख जाता है— कोई आवाज़, कोई रोशनी, कोई साया जो बिना हवा के सरसराहट करता है। वसु ने बचपन में कई बार सुना था की वहां नही जाना चाहीए पर वह इन सब चीजों पर विश्वास नहीं करता था।
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ऐसी ही एक रात वसु काम खत्म कर वह घर की तरफ निकला पर देर होने की वजह से उसकी आखरी बस छूट गई। आख़िरी बस चली गई तो स्टेशन पर खड़े हुए वसु को चिंता हो गई। गर्दन पर पेंदी हुई शर्ट, हाथ में फोड़ा सा बैग और मन में एक खालीपन — अब ज़्यादा देर रुकना उसके मतलब में नहीं था। पास में ही कुछ लोग जो उसी तरफ जा रहे थे — दूसरे गाँव के थे — तो वसु उनके साथ चल पडा, उनके साथ हंसी ठीठोली करते आखीर वह गांव से कुछ दुर पहुचा, और फिर सबके रास्ते अलग हो गये। वे सब लोग अब अपनी गांव की तरफ चले गये और वसु अकेला रह गया।
वसु के मन में अचानक सन्नाटा उतर आया: "एकदम शहर से निकल कर ये सन्नाटा — जैसे सांसें भी छोटी पड़ गई हों।" उसने अपने भीतर एक तरह की घबराहट महसूस की; वह गांव के कुछ दुरी पर पटरी के पास पहूंचा था, उसने सोचा क्यूं ना पटरी से चलता हुआ जाऊ, गांव जल्दी पहुंच जाऊंगा और फिर वह बिना सोचे पटरीसे चलने लग गया।
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सड़क सीधा होते हुए भी, वसु ने उस पुरानी रेलवे पटरी से गाव जाना ठीक समझा जो उसकी बड़ी ग़लती साबीर हुई। वहां की मिट्टी से उठती धूल, जंग की खुशबू, और लोहे की सूखी सी सरसराहट हर कदम पर उसे कुछ अनजाना अहसास दिला रही थी। हवा में बूँद-बूँद रहस्यमयी ठंडक थी, और पेड़ों की छाँवें युद्ध की तरह ऊपर छायी हुईं थीं।
उसकी आंतरिक आवाज़ बार-बार उसे चेतावनी दे रही थी — "वापस जा, वसू।" पर लापरवाही ने उसे आगे बढ़ा दिया। रास्ता जितना काला होता गया, उसके कदम उतने ही धीमे हुए। वह खुद से झगड़ रहा था — "तुम डर क्यों रहे हो? बस कुछ पंक्तियाँ, कुछ पुरानी पटरी, खामोशी ही तो है।"
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पर कुछ दुर जाने के बाद वसु ने वहां की रेत पर किसी के कदम के निशान देखे, ताज़ा से लग रहे थे, जैसे अभी के...पर आसपास कोई नहीं था और फिर तभी सरसराहट की आवाजें, फुसफुसाहट, वसु सहम गया।
उसने ठहरकर अपनी साँसें गिनी — पाँच की गिनती में वो खुद को शांत करने की कोशिश कर रहा था, पर आवाज़ें भीतर तक घुसती जा रही थीं। हवा में धीमी-धीमी हँसी का चिंतित संगीत था — पुरानी, सूखी और कुछ-कुछ मरने जैसी।
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वसु की छाया पटरी पर चलते हुए धुंध में खो जाती है, जैसे अंधेरा उसे अपने भीतर खींच रहा हो।
वसु आगे बढ़ता रहा पर वह महसूस कर रहा था कि पटरी पर कुछ चल रहा है — एक मोटी धुंध में किसी ने हल्का-सा काला सिल्हूट बनाया था। जब वह उसके पास पहुँचा, उसने देखा — काली, पुरानी साड़ी या चुनरी में लिपटी एक औरत, बिल्कुल जैसे किसी पुराने ज़माने की लड़की हो, उसके कपड़े घिसे हुए, किनारों पर धूल और जंग के दाग। चेहरे का कोई रूप साफ़ नहीं था; बस दो लाल-सी चमकती आँखें और एक खाली, थकी हुई मुस्कान।
वसु की गर्दन पर ठंडक दौड़ी। उसके दिल की ठोकरे तेज हो गईं। उस औरत ने ज़मीन के पास से उठकर उसकी ओर देखा, और एक धीमी, ऐसी फुसफुसाहट निकली जैसे पत्थरों से निकली हो: "क्यों आए हो? मेरा रास्ता है…" उसकी आवाज़ हवा में घुलकर मिट्टी की तरह सीधी वसु की रूह में समा गई।
वसु ने जैसे ही उसे देखा उसकी डर से हालत खराब हो गई, उसने पलटकर भागना चाहा, पर पैरों में जैसे जकड़न आगई थी। वही पुरानी पटरी अचानक गूँज उठी — मानो किसी ने नीचे से हाथ बढ़ाया हो। वसु ने देखा — पटरी के बीच से एक सूखा, बेमज़ा हाथ निकलकर उसके जूते को पकड़ लिया। हाथ ठंडा, पतला और पत्थर जैसा था।
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उस समय वसु का मन पुरानी यादों की तरह उड़ गया — माँ की डाँट, पिता की कठोर चाल, और गाँव की बाते। पर हर याद के साथ डर भी बढ़ता गया: "ये क्या वास्तविक है? क्या मैं पागल हो रहा हूँ? क्या शहर की थकान मेरे दिमाग़ को भ्रमीत कर रही है" उसका दिमाग़ तर्क की चाह में पिस रहा था, लेकिन दिल ने उसे दूसरी तरफ खींचा — कहीं भीतर से कोई आवाज़ फिर कहती — "बाहर निकल, यहाँ नहीं ठहरना।"
वसु ने एक अंतिम जोर लगाया और अपने पैरों को छुआ; वह खुद को खिंचता हुआ बाहर निकला। उसकी हथेली पर रोंगटे खड़े हो गए; हवा में जैसे किसी ने अचानक स्याही उड़ेल दी हो — पूरी दुनिया कुछ क्षणों के लिए उसे काली-पतली लग रही थी। वह काला साया उसकी तरफ बढ़ रहा था, वसु चीख पड़ा।
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ठीक उसी वक़्त, पटरी के किनारे से दूर से रोशनी झिलमिलाई — कुछ आवाज़ें सुनाई दी। गाँव के कुछ लोग — उसी वक्त पटरी के पास से गुजर रहे थे — उन्होने वसु की चीख़ सुनी... वे वहां दौड़े चले आए। कुछ ने लकड़ी की मशालें जलाई, कुछ ने पुकारा, तो एकदम से वह काली छाया पीछे हटते हुए गायब हो गई।
गाँव वालों को देखते ही वसु की जान में जान आई। वसु गीली रेत पर गिर पड़ा, साँसें भारी और आँखें नम। उन लोगों ने उसे खींचा, सीना पकड़कर पूछा, और उसकी हथेलियों पर लगे ठंडे निशान देख कर वे कुछ देर के लिए चौंक गए।
वसु जब उठा तो पीला-सा और थका हुआ था। उसने देखा कि काली छाया अब वहा नही थी — पर उसकी आँखों में अभी भी वही लाल चमक कहीं-न-कहीं बची थी। गाँव वाले धीरे से बोले: "हमने तुम्हें पुकारते सुना। तुम ठीक हो?" वसु ने बस कुछ अस्पष्ट शब्द कहे और अपने अंदर की छीलन को महसूस किया — कुछ टूट चुका था, कुछ हमेशा के लिए बदला था।
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वसु गाँव पहुँच कर घर गया, पर उसकी आँखों में अब वही डर था। एक ठंडी समझदारी कि कुछ चीज़ें बस कहानियाँ नहीं होतीं। गाँव वालों ने उसे बचाया था, पर उसने भी महसूस किया कि बचाव हमेशा स्थायी नहीं होता।
आज भी रात की हवा में, पटरी के पास, कहीं दूर एक सूखी हँसी गूँजती है — इतनी नरम कि कोई शोर भी नहीं करता पर इतनी ठंडी कि रग-रग में उतर जाए। गाँव वाले कहते हैं कि जो भी उस रास्तेसे से गुज़रता है, उसकी रूह के किसी न किसी हिस्से में वो चपेट छोड़ जाती है—और कभी-कभी, चंदियों के नीचे, काली चुनरी के किनारे फिर झिलमिलाहट दिखती है।
वसु अब रात में बाहर निकलता तो बहुत कम; पर जब भी वह पटरी की ओर देखता है, उसकी आँखों के पास एक छोटी-सी चेतावनी रहती है — और उसके अंदर की आवाज़, जो अब और तेज़ है, बार-बार कहती है: "हर रास्ता सुरक्षित नहीं होता, और हर जल्दी तुम्हें घर नहीं पहुँचाती।"
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