पुराना रेलवे ब्रिज


पुराने रेलवे ब्रिज पर घने कोहरे में दूर खड़ी परछाईं को घूरता हुआ रुका हुआ रिक्शा, भयावना रात का माहौल।
“कोहरे में छिपी वह परछाईं… जिसने हुसैन की रफ़्तार को रोक दिया।”



 नमस्ते दोस्तों…

स्वागत है आपका Mysterious Kahaniyan ब्लॉग में,

एक और नई डरावनी कहानी के साथ।


आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ…

जो एक सामान्य रात जैसी लगती है,

लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी…

आपको महसूस होगा कि इसमें कुछ ऐसा छुपा है

जो किसी को भी भीतर तक डरा सकता है।


सोचिए… अगर आपके साथ भी ऐसा हो…

आप रात के सन्नाटे में अकेले चल रहे हों…

और अचानक हवा भारी होने लगे…

साँस हल्की-सी रुक जाए…

और फिर अचानक…


आज की कहानी कुछ ऐसी ही है…

जो बताती है कि असली ख़तरा अक्सर वहीं होता है,

जहाँ हम सोचते भी नहीं।

इस कहानी का मुख्य किरदार है — हुसैन।

उम्र 45 साल का, एक रिक्शा चालक।

हुसैन बहुत मेहनती, सीधा-सादा, और शांत स्वभाव का इंसान था।

रोज़ सुबह 7 बजे घर से निकलता,

और रात तक रिक्शा चलाकर कमाई इकट्ठी करता,

ताकि अपनी बीमार माँ, पत्नी, और तीन बच्चों का पेट पाल सके।

उसकी ज़िंदगी मुश्किल थी…

लेकिन वह हमेशा हिम्मत रखकर मेहनत करता था।


उस रात करीब 11 बज रहे थे,

ठंड का मौसम था, ठंडी हवा और लगभग सुनसान सड़क के बीच,

हुसैन एक आखिरी सवारी छोड़कर

अपने घर लौट रहा था।

पर जल्दबाज़ी में उस दिन

वह गलती से भंडारा शहर के

पुराने रेलवे ब्रिज की ओर मुड़ गया —

एक ऐसा पुल

जिसके बारे में काफी अफवाहें थीं। लोगों का कहना था

कि वहाँ रात को कुछ अजीब होता है।

हुसैन भी इन बातों को जानता था,

इसीलिए वह मन ही मन बोला कि—

“बस यहां से जल्दी निकलना है… रुकना नहीं है।”


इसलिए वह जल्दी से वहां से निकलने लगा, शुरुआत में सब ठीक था।

रात में वह पुल किसी भयान हवेली की तरहां दिख रहा था, बस हल्की हवा चल रही थी।

दूर-दूर तक सन्नाटा फैला था,

लेकिन माहौल सामान्य लग रहा था।

तभी....

धीरे-धीरे हवा में एक अजीब-सी ठंडक घुलने लगी।

साँस लेते हुए हल्की घुटन महसूस होने लगी।

हुसैन के दिल में एक अनजानी बेचैनी उठी,

जैसे कोई उसे दूर से देख रहा हो…

पर नज़र घुमाने पर

कुछ भी नहीं दिख रहा था।

हुसैन ने रिक्शा और तेज़ कर दी।

फिर ...

अचानक पीछे कहीं से

कदमों की धीमी-धीमी आवाज़ सुनाई दी।

जैसे कोई उसकी चाल से मेल खाता

साथ चल रहा हो।

उसने तेजी से मुड़कर देखा—

कुछ नहीं।

पुल की लाइट एक पल के लिए

झटके से टिमटिमाई,

फिर शांत हो गई।

हवा अचानक रुक सी गई।

सन्नाटा इतना गहरा हो गया

कि अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।

हुसैन को लगा

कि शायद वह रास्ता गलत था।

पर अब लौटने का मौका भी नहीं था।

जैसे ही वह पुल के बीचोंबीच पहुँचा,

उसे बायीं तरफ

एक धुंधली सी हिलती परछाई दिखी।

धुंध में जैसे

मानव आकृति बनने की कोशिश कर रही हो…

लेकिन पूरी नहीं बन पा रही।

हुसैन की उंगलियाँ रिक्शे की हैंडल पर जम गईं।

पेट में ठंडा डर उतर गया।


और तभी—

सिर्फ एक सेकंड के लिए,

रिक्शा की हल्की हेडलाइट में

कुछ चमका।

एक सफ़ेद, लंबा-सा चेहरा।

मरी हुई-सी आँखें…

जो सीधे उसी की तरफ घूर रही थीं।

चेहरा उतनी ही तेजी से गायब हो गया

जितनी जल्दी वह उभरा था।

हुसैन की सांसें अटक गईं।

उसे समझ नहीं आया

कि वह जाग रहा है

या सपना देख रहा है।


अगले ही पल

पूरे पुल के दोनों तरफ से

चीख जैसी आवाज़ें गूंजने लगीं।

हुसैन का खून जम गया।

फिर…

वही सफ़ेद चेहरा

अब उसकी रिक्शा के सामने

स्पष्ट दिखाई देने लगा।

चेहरा धीरे-धीरे

उसकी तरफ झुकता गया।

हुसैन को लगा

मानो कोई ठंडी साँस

उसके चेहरे को छू रही हो।

डर से उसकी टांगें सुन्न हो गईं।

पर हिम्मत जुटाकर

उसने रिक्शा को मोड़ा

और पूरी ताकत से

पुल से दूर भागने लगा।

उसके पीछे

कदमों और फुसफुसाहटों की आवाजें

लंबे समय तक पीछा करती रहीं।

आखिरकार जब वह पुल से काफी दूर पहुँचा,

हवा फिर सामान्य हो गई।

सन्नाटा खत्म होने लगा।

हुसैन अंदर तक हिला हुआ था।

उसने बस एक बार पीछे मुड़कर देखा 

शायद अब ख़तरा टल गया है।

शायद…


दोस्तों…

कहानी तो यहीं खत्म होती है…

लेकिन एक सवाल अभी 

भी बाकी है…

क्या सच में सब समाप्त हो गया?

या वह सफ़ेद चेहरा…

अब भी कभी-कभी

हुसैन के पीछे कदमताल करता है…?

आपको क्या लगता है…?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें