Hello dosto,
मेरा नाम अरविंद है… और जो मैं आज आपको सुनाने जा रहा हूँ, वो मैं किसी को कभी से बोल भी नहीं पाया। क्योंकि लोग मज़ाक उड़ा देते… पर अगर आपने कभी रात में किसी अस्पताल में अकेले वक़्त बिताया है, तो आप समझेंगे कि वहाँ का सन्नाटा भी ज़िंदा चीज़ की तरह महसूस होता है।
ये घटना 2017 की है, जब मेरे छोटे भाई को ब्रेन इन्फेक्शन की वजह से ICU में भर्ती करना पड़ा। हालत बहुत गंभीर थी। डॉक्टरों ने कहा था कि रात भर किसी को मरीज के पास रहना होगा, क्योंकि कभी भी कुछ भी हो सकता है।
घरवाले सब बुरी तरह टूट चुके थे, इसलिए रात की ड्यूटी मैंने ले ली।
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| “जहाँ इलाज की जगहें होती हैं… वहीं सबसे गहरी डर की परछाइयाँ भी रहती हैं।” |
सबके जाने के बाद पूरा फ्लोर खाली हो गया था।
लाइट्स धुंधली थीं, जैसे बिजली बचाने के लिए आधी बंद कर दी गई हों।
ICU के बाहर एक लंबा, ठंडा कॉरिडोर था… जहाँ बस ECG की दूर से आती “बीप… बीप…” आवाज़ सुनाई देती थी।
मैं कुर्सी पर बैठा था, half-sleepy और half-scared.
तभी अचानक—
काँच के ICU दरवाज़े के पार एक सफेद साया गुज़रा।
पहले लगा कोई नर्स होगी।
पर नर्सों के जूते की “टक-टक” नहीं सुनाई दी।
बस खामोशी।
मेरे भाई को Bed No. 9 मिला था।
उसके ठीक सामने Bed No. 7 था—खाली पड़ा हुआ।
मैंने अचानक नोटिस किया कि Bed No. 7 का पर्दा हल्का-हल्का हिल रहा था, जबकि ICU के अंदर कोई नहीं गया था।
AC भी बंद था, सिर्फ पंखे चल रहे थे… वो भी कॉरिडोर में।
मैं धीरे-धीरे उठकर ICU के काँच वाले दरवाज़े तक गया, अंदर झांका…
और यकीन मानो—
किसी का धुंधला-सा चेहरा Bed No. 7 की तरफ झुका हुआ था।
जैसे कोई वहाँ बैठकर किसी मरीज को देख रहा हो।
मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।
मैं हिम्मत करके नर्स स्टेशन गया और पूछा:
“माफ़ करना, ICU में अभी कोई गया था क्या? Bed 7 के पास कोई है?”
नर्स फाइलें देखते हुए बोली—
“Bed 7?
वो तो आज शाम को खाली हुआ है।
मरीज नहीं बचा था।”
मैंने धीरे से पूछा,
“अंदर अभी कोई है क्या?”
वो चौंक गई—
“अभी? अभी तो मैं ही बाहर हूँ!
अंदर कोई नहीं जाता रात में बिना duty doctor के।”
फिर उसने CCTV देखने की कोशिश की, पर ICU का कैमरा maintenance में था।
मैं वापस कुर्सी पर आ गया… दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
ICU के अंदर शांति थी…
इतनी कि खुद की साँस भी भारी लग रही थी।
मैं बस staring कर रहा था Bed 7 की ओर…
तभी ICU का दरवाज़ा
धीरे-धीरे…
अपने-आप…
क्रीईईक…
आधा खुल गया।
मैं जम गया।
दरवाज़े के पीछे कोई नहीं था…
लेकिन Bed 7 का पर्दा अब पूरी तरह उठा हुआ था
और वहाँ एक आदमी खड़ा था।
सफेद कपड़े…
हल्के झुके कंधे…
और खाली, पूरी तरह स्थिर आंखें।
वो मेरी तरफ नहीं,
Bed No. 9… यानी मेरे भाई
की ओर देख रहा था।
मैं चिल्लाना चाहता था, पर आवाज़ ही नहीं निकली।
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| “कभी-कभी एक ही बेड पूरी ज़िंदगी की सबसे डरावनी याद बन जाता है।” |
अचानक वो आदमी एकदम सीधा खड़ा हो गया।
और पहली बार उसने सीधे मेरी ओर देखा।
ऊपर की ट्यूबलाइट अचानक फ्लिकर हुई
और एक सेकंड के लिए उसकी पूरी शक्ल दिखाई दी—
वो उसी Bed No. 7 के मरीज की शक्ल थी…
जिसके बारे में नर्स ने कहा था कि वो शाम को मर चुका है।
सिर्फ एक सेकंड।
फिर रोशनी normal हुई—
और वो वहाँ नहीं था।
पर्दा नीचे था।
दरवाज़ा बंद था।
जैसे वो कभी था ही नहीं।
शिफ्ट बदलने वाले डॉक्टर ने casually पूछा—
“रात ठीक से गुज़री?
कोई परेशानी?”
मैं हँसने की कोशिश करते हुए बोला—
“ICU में Bed 7 के पास कोई आता-जाता है क्या रात को?”
डॉक्टर ने भौंहें चढ़ाईं—
“Bed 7?
उस बेड पर पिछले 3 महीनों में जिन भी patients को रखा गया…
उनमें से कोई भी ज़्यादा देर नहीं बच पाया।”
फिर वो थोड़ा रुककर बोला—
“नर्सें कहती हैं…
रात को वहाँ कोई आता है।
पर हम लोग ऐसे बातों पर यकीन नहीं करते।”
मैंने बस उसकी तरफ देखा और कुछ नहीं बोला।
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| “कुछ कमरे सिर्फ बीमारी के नहीं… परछाइयों के भी घर होते हैं।” |
मैं सबसे पहले Bed No. 7 को याद करता हूँ।**
मेरा भाई तो बच गया…
पर जिस रात ICU में वो साया अपने bed से निकलकर मेरे भाई को देख रहा था—
मुझे आज भी लगता है…
क्या वो लेने आया था?
और क्या मैं उसके बीच में खड़ा था?
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