इस कहानी को लिखते समय मेरे हाथ काँप रहे हैं।
आज भी जब घड़ी में रात 2:17 बजते हैं, मेरी साँसें अपने-आप तेज़ हो जाती हैं।
मुझे नहीं पता यह सब सच था या मेरे मन का वहम।
लेकिन जो कुछ भी था…
उस रात के बाद मैं फिर कभी अकेला नहीं रहा।
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| कुछ जगहें पहली नज़र में ही बता देती हैं कि यहाँ कुछ ठीक नहीं है। |
मैं उस शहर में नया-नया आया था।
नौकरी के कारण एक पुरानी सी इमारत में सस्ता कमरा मिल गया।
कमरा ठीक-ठाक था, लेकिन इमारत में एक अजीब-सी उदासी भरी रहती थी।
दीवारों पर सीलन थी।
सीढ़ियों में हमेशा एक अजीब बदबू।
और रात को ऐसी ख़ामोशी, जैसे पूरी दुनिया साँस रोककर बैठी हो।
पहली रात सब सामान्य था।
दूसरी रात…
नींद के बीच मुझे लगा जैसे किसी ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया हो।
टक… टक…
मैं चौंककर उठ बैठा।
घड़ी देखी — 2:17 AM।
दरवाज़ा बंद था।
मैंने सोचा, शायद ऊपर वाले कमरे से आवाज़ आई होगी।
लेकिन यही बात रोज़ होने लगी।
हर रात।
सिर्फ़ 2:17 बजे।
कभी दरवाज़े से,
कभी खिड़की से,
और कभी ऐसा लगता जैसे कोई मेरे कान के पास खड़ा साँस ले रहा हो।
एक हफ्ते बाद मैं लगातार थका-सा रहने लगा।
बिना वजह सिर दर्द।
आँखों के नीचे गहरे काले घेरे।
सपने भी बदलने लगे।
हर सपने में मैं अपने ही कमरे में होता…
और कमरे के एक कोने में कोई खड़ा मुझे देख रहा होता।
उसका चेहरा साफ़ नहीं दिखता था।
बस एक एहसास —
जैसे वह मुझे अच्छी तरह जानता हो।
पहला सबूत
एक रात मैंने तय किया —
आज पूरी रात जागकर देखूँगा।
लाइट बंद।
मोबाइल साइलेंट।
नज़रें घड़ी पर टिकी हुई।
2:16…
2:17…
टक…
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| जब एहसास होता है कि कमरे में कोई और भी है… तब डर असली रूप लेता है। |
इस बार आवाज़ बहुत पास से आई।
दरवाज़े का हैंडल हल्का-सा हिला।
मेरी साँस रुक गई।
मैं बिस्तर पर बैठा रहा।
फिर दरवाज़ा अपने-आप आधा खुल गया।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।
इतनी ठंडी, जैसे किसी ने फ्रिज खोल दिया हो।
और तभी मैंने देखा —
दीवार पर एक अतिरिक्त परछाईं।
वह मेरी नहीं थी।
अगली सुबह मैंने पड़ोसी से पूछा।
वह बूढ़ा आदमी कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“तुम उसी कमरे में रहते हो न… जहाँ पहले राघव रहता था?”
“कौन राघव?” मैंने पूछा।
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“नाइट शिफ्ट करता था…
एक रात ठीक 2:17 बजे…
उसका कमरा अंदर से बंद था।”
पुलिस ने कहा — हार्ट अटैक।
लेकिन जो सफ़ाई करने गया था, उसने बताया…
राघव का चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसकी साँस खींच ली हो।
उस रात मैं कमरा छोड़कर भाग जाना चाहता था।
लेकिन मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।
2:17 AM।
दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।
इस बार वह सामने था।
वही परछाईं…
अब कुछ-कुछ इंसानी आकार में।
आँखें नहीं थीं,
लेकिन मैं महसूस कर सकता था —
वह मुझे देख रहा था।
उसकी आवाज़ सीधे मेरे दिमाग में गूँजी:
“तुम मेरी जगह हो…”
मेरा सिर फटने लगा।
कमरा घूमने लगा।
फिर अंधेरा।
होश आने पर मैं अस्पताल में था।
डॉक्टर ने कहा — अत्यधिक तनाव और भ्रम।
मैं उसी दिन वह कमरा छोड़कर चला आया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
आज भी…
चाहे मैं किसी भी शहर में होऊँ…
किसी भी कमरे में…
रात 2:17 बजे
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| कहानी खत्म हो चुकी थी… लेकिन डर अब भी जाग रहा था। |
मेरा मोबाइल अपने-आप जल उठता है।
और लॉक-स्क्रीन पर लिखा होता है —
“तुम मेरी जगह हो।”
मैंने घड़ी पहनना छोड़ दिया है।
लेकिन समय…
समय आज भी मुझे ढूँढ लेता है।
एक सवाल
क्या यह मेरा वहम था..अगर यह सिर्फ़ मेरा वहम था…
तो फिर हर बार 2:17 ही क्यों?
👉 कमेंट में ज़रूर लिखिए।
क्योंकि कुछ चीज़ें पढ़ी नहीं जातीं…
महसूस की जाती हैं। 😈



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