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| गाँव पहुँचने से पहले ही उसे महसूस हो गया था कि आज की रात सामान्य नहीं है। |
मेरा नाम निखिल है।
मैं नागपुर में नौकरी करता हूँ, लेकिन मेरा गाँव चंद्रपुर जिले के अंदर एक छोटे से इलाके में है।
गाँव छोटा है, और वहाँ आज भी पुराने बड़े घर, खेत, और सुनसान रास्ते वैसे ही हैं जैसे बचपन में थे।
करीब 8 साल बाद मैं गाँव जा रहा था।
कारण भी थोड़ा अजीब था।
तीन दिन पहले मेरे मामा का फोन आया था।
हम लोग बहुत ज्यादा संपर्क में नहीं रहते थे, इसलिए उनका अचानक फोन आना ही अजीब लगा।
उन्होंने बस इतना कहा था —
“निखिल… अगर आ सके तो इस हफ्ते गाँव आ जा…
घर खाली नहीं रहना चाहिए।”
मैंने पूछा —
“क्यों? क्या हुआ?”
उन्होंने कहा —
“आकर बताऊँगा… फोन पर नहीं।”
उनकी आवाज सामान्य थी…
लेकिन बीच-बीच में रुक रही थी।
जैसे वो अकेले नहीं थे।
मैंने ज्यादा सोचा नहीं।
शनिवार की रात की बस पकड़ ली।
बस जब गाँव के रास्ते पर पहुँची तब रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे।
ड्राइवर ने कहा —
“आगे बस नहीं जाएगी… यहीं उतरना पड़ेगा।”
मैं उतर गया।
बस चली गई।
और जैसे ही बस की आवाज दूर गई…
मुझे महसूस हुआ…
यहाँ बहुत ज्यादा सन्नाटा है।
गाँव का रास्ता मुझे याद था,
लेकिन रात में सब कुछ अलग लग रहा था।
पेड़ ज्यादा काले लग रहे थे…
हवा ठंडी थी…
और अजीब बात — कहीं कोई कुत्ता भी नहीं भौंक रहा था।
मैं लगभग पंद्रह मिनट चला।
फिर मुझे मामा का घर दिखा।
पुराना बड़ा वाड़ा।
बचपन में मैं यहाँ कई बार रुका था।
लेकिन इस बार…
घर वैसा नहीं लग रहा था।
दीवारों पर काई चढ़ी थी…
खिड़कियाँ बंद थीं…
और दरवाज़ा आधा खुला था।
मैंने सोचा — शायद मामा बाहर होंगे।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया।
चरररर…
आवाज़ बहुत तेज गूँजी।
अंदर हल्की पीली रोशनी थी।
मैंने आवाज लगाई —
“मामा…?”
अंदर से जवाब आया —
“आ गया… निखिल…”
मेरे कदम रुक गए।
आवाज़ मामा की थी।
लेकिन…
कुछ अलग था।
मैं अंदर गया।
वो कुर्सी पर बैठे थे।
कमरे में एक ही बल्ब था, और वो भी उनके पीछे।
उनका चेहरा ठीक से दिख नहीं रहा था।
मैंने पूछा —
“फोन किया था ना आपने… क्या बात है?”
उन्होंने धीरे से कहा —
“आज घर खाली नहीं रहना चाहिए था…”
“इसलिए बुलाया…”
मैंने हँसते हुए पूछा —
“किससे डर रहे हो?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
बहुत देर तक।
फिर बोले —
“आज दरवाज़ा खुलता है…”
मैंने कहा —
“कौन सा दरवाज़ा?”
उन्होंने गलियारे की तरफ इशारा किया।
मैंने देखा।
वहाँ एक दरवाज़ा था।
मैं ठिठक गया।
वो दरवाज़ा पहले कभी नहीं था।
मैंने कहा —
“ये पहले नहीं था…”
मामा बोले —
“हर साल नहीं होता…”
“लेकिन कभी-कभी बन जाता है…”
मैंने पूछा —
“क्या है इसके अंदर?”
उन्होंने जवाब दिया —
“जिसे नहीं आना चाहिए…
वो आ जाए…
तो ये बनता है…”
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
तभी…
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| घर वैसा नहीं था जैसा बचपन में देखा था… और दरवाज़ा खुद खुला हुआ था। |
दरवाज़े के अंदर से आवाज आई।
टक…
टक…
टक…
जैसे कोई अंदर चल रहा हो।
मैंने कहा —
“कोई है अंदर?”
मामा जोर से बोले —
“मत खोलना!”
लेकिन…
दरवाज़ा खुद खुल गया।
अंदर अंधेरा।
पूरा काला।
और फिर…
अंदर से कोई बाहर आया।
धीरे…
बहुत धीरे…
और जैसे ही वो रोशनी में आया…
मेरी साँस रुक गई।
वो…
मैं था।
वही कपड़े।
वही चेहरा।
लेकिन आँखें…
पूरी काली।
मैं पीछे हट गया।
“ये क्या है…??”
मामा खड़े हो गए।
उन्होंने कहा —
“घर को कोई चाहिए…”
“हर बार…”
“एक अंदर जाता है…”
“एक बाहर आता है…”
मैं चिल्लाया —
“क्यों???”
उन्होंने धीरे से कहा —
“ताकि दरवाज़ा बाहर ना खुले…”
दूसरा मैं मुस्कुराया।
और मेरी तरफ बढ़ा।
मेरे पैर हिल नहीं रहे थे।
वो मेरे बिल्कुल सामने आकर रुका।
धीरे से बोला —
“अब तू आया है…”
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| उस दरवाज़े के अंदर जो था… वह इंसान नहीं था। |
“तो मैं जाऊँगा…”
उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।
और अगले ही पल…
मुझे लगा…
मैं पीछे गिर रहा हूँ…
अंधेरे में…
बहुत गहरे…
आखिरी चीज जो मैंने देखी —
दूसरा मैं…
मामा की कुर्सी पर बैठकर बोल रहा था —
“आ गए…?”
और दरवाज़ा…
फिर बंद हो गया।
उस रात के बाद…
गाँव में किसी ने मुझे नहीं देखा।
लेकिन मामा का घर…
आज भी खाली नहीं रहता।
क्योंकि…
कभी-कभी…
छठा दरवाज़ा फिर बन जाता है।
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