समंदर उस रात बिल्कुल शांत था।
इतना शांत कि उसकी खामोशी सुनाई दे रही थी।
राघव अपनी लकड़ी की नाव में बैठा दूर तक निकल आया था।
उसके पास जाल था, एक पुराना लालटेन, और एक छोटा सा बैग।
लेकिन आज वो मछली पकड़ने नहीं आया था।
आज वो बस भागकर आया था…
खुद से।
दिनभर लोगों के बीच रहने के बाद भी उसके अंदर एक खालीपन था, जो हर रात और गहरा हो जाता था।
घर में दीवारें उसे घूरती थीं… और नींद आते-आते कोई पुरानी याद उसे जगा देती थी।
समंदर उसे हमेशा सुकून देता था।
जैसे उसकी हर बात सुनता हो… बिना जवाब दिए।
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| एक शांत रात… और एक अकेला आदमी, जो समंदर की गहराई में अपने आप से मिलने निकला है। |
नाव लहरों के साथ धीरे-धीरे झूल रही थी।
राघव ने आसमान की तरफ देखा — आसमान आधा चाँद था ।
उसने लालटेन जलाई और जाल तैयार करने लगा।
सब कुछ सामान्य था।
बहुत साधारण।
बहुत शांत।
कुछ देर बाद उसने जाल पानी में डाल दिया।
रस्सी उसके हाथ में थी… और वो धीरे-धीरे खिंचाव महसूस कर रहा था।
लहरों का, पानी का… वही पुराना, जाना-पहचाना एहसास।
वो चुपचाप बैठा रहा।
समय का अंदाजा खत्म हो गया था।
सिर्फ पानी…
और उसकी सांसों की आवाज।
फिर…
रस्सी थोड़ी भारी लगने लगी।
राघव ने ध्यान दिया।
“कुछ फँसा है…” उसने सोचा।
उसने धीरे-धीरे रस्सी खींचनी शुरू की।
वजन बढ़ता जा रहा था।
पर ये मछलियों जैसा नहीं था।
कोई झटका नहीं…
कोई हलचल नहीं…
बस एक अजीब सा, स्थिर वजन।
जैसे कुछ खुद से ऊपर आना नहीं चाहता।
राघव ने जोर लगाया।
रस्सी गीली होकर उसके हाथों में फिसल रही थी।
आखिरकार जाल पानी के ऊपर आने लगा।
और जैसे ही जाल पूरी तरह बाहर आया…
राघव रुक गया।
जाल में मछलियां नहीं थीं।
बस…
एक पुरानी, फटी हुई कपड़े की गठरी।
काले, गीले कपड़े में लिपटी हुई।
उसने कुछ पल उसे देखा।
फिर धीरे से उसे नाव में खींच लिया।
गठरी भारी थी।
और ठंडी।
अजीब तरह से ठंडी।
जैसे उसमें से ठंड निकल रही हो।
राघव ने झुककर उसे खोला।
अंदर…
कुछ नहीं था।
बस गीला कपड़ा।
उसने भौंहें सिकोड़ लीं।
“इतना वजन… सिर्फ कपड़ा?”
उसे समझ नहीं आया।
उसने कपड़े को किनारे फेंक दिया।
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| जब साधारण शिकार की जगह कुछ अजीब फंस जाए… तभी असली डर शुरू होता है। |
राघव ने फिर से जाल डाल दिया…
पर अब उसका ध्यान बार-बार पीछे जा रहा था — उस फटे कपड़े की तरफ।
कुछ मिनट बीते।
फिर अचानक—
रस्सी फिर से भारी हो गई।
इस बार और ज्यादा।
राघव चौंका।
“इतनी जल्दी?” उसने सोचा।
उसने तुरंत खींचना शुरू किया।
वजन इस बार बहुत ज्यादा था।
उसकी सांस तेज हो गई।
माथे पर पसीना आ गया।
जैसे वो कुछ बड़ा खींच रहा हो।
बहुत बड़ा।
जाल धीरे-धीरे पानी से बाहर आया।
राघव की नजर जाल पर गई…
और उसकी सांस अटक गई।
जाल मे कुछ था।
कुछ ऐसा… जो हिल नहीं रहा था।
जो खुद को छिपा रहा था।
जाल पूरी तरह बाहर आया।
और राघव ने देखा—
एक इंसानी हाथ।
सफेद… सूजा हुआ… पानी में सड़ा हुआ।
उसकी उंगलियां जाल में उलझी हुई थीं।
राघव पीछे हट गया।
उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे खुद सुनाई दे रहा था।
“ये… ये क्या है…”
उसकी आवाज निकल नहीं रही थी।
और तभी…
उस हाथ की उंगलियां हल्की सी हिलीं।
बहुत धीरे।
राघव जम गया।
उसने अपनी आंखों पर जोर दिया —
“नहीं… ये नहीं हो सकता…”
पर वो हुआ।
उंगलियां फिर हिलीं।
इस बार थोड़ा ज्यादा।
अचानक—
जाल के अंदर से पूरा शरीर हिला।
पानी टपकता हुआ…
धीरे-धीरे उठता हुआ…
एक चेहरा।
गीला।
सूजा हुआ।
आंखें बंद।
राघव पीछे सरक गया।
नाव डगमगाने लगी।
और फिर…
उसकी आंखें खुलीं।
पूरी सफेद।
कोई पुतली नहीं।
बस सफेद।
राघव की सांस रुक गई।
वो कुछ बोल नहीं पाया।
बस देखता रहा।
जैसे शरीर ने काम करना बंद कर दिया हो।
वो चीज़ धीरे-धीरे जाल से खुद को निकालने लगी।
उसकी हर हरकत के साथ पानी की बूंदें गिर रही थीं।
और फिर…
वो नाव के अंदर आ गया।
राघव पीछे हटता गया…
जब तक कि उसकी पीठ नाव की किनारी से नहीं लग गई।
अब कहीं जाने की जगह नहीं थी।
वो चीज़ उसके सामने खड़ी थी।…
बस खामोशीसे।
फिर उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया।
और बहुत धीरे, बहुत गहरी आवाज में कहा—
“तू… ऊपर क्यों आया…”
राघव का दिमाग सुन्न हो गया।
“मैं… मैं तो…”
वो बोल नहीं पाया।
और तभी—
नाव के नीचे कुछ टकराया।
जोर से।
धड़ाम!
पूरा नाव हिल गया।
राघव गिर पड़ा।
उसने नीचे झांककर देखा—
और उसका खून जम गया।
पानी के अंदर…
दर्जनों चेहरे।
सब उसी जैसे।
सफेद आंखें।
खुले हुए मुंह।
और वो सब ऊपर देख रहे थे।
सीधे उसकी तरफ।
अचानक—
सारे हाथ ऊपर उठे।
और नाव को पकड़ लिया।
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| कभी-कभी समंदर सिर्फ पानी नहीं होता… उसके नीचे कुछ और भी जिंदा होता है। |
राघव चिल्लाया।
पर आवाज गले में ही अटक गई।
नाव धीरे-धीरे नीचे जाने लगी।
वो चीज़ जो नाव पर था…
अब उसके बिल्कुल पास झुका।
उसकी सांस ठंडी थी।
और उसने फुसफुसाया—
“नीचे… सब खाली है…”
अगले ही पल—
नाव पानी के अंदर खिंच गई।
सब कुछ अंधेरा।
शांत।
खामोश।
सुबह…
समंदर वैसे ही शांत था।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
बस पानी के नीचे…
थोड़ा और गहराई में…
अब एक और चेहरा था।
सफेद आंखों वाला।
स्थिर।
ऊपर देखता हुआ।
इंतज़ार करता हुआ।



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