कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ खामोशी सिर्फ खामोशी नहीं होती…
वो कुछ छुपा रही होती है।
रेगिस्तान… जहाँ सब कुछ खाली दिखता है…
लेकिन अगर ध्यान से सुनो…
तो तुम्हें महसूस होगा कि वहाँ कुछ और भी है…
कुछ… जो साँस ले रहा है।
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| एक सफर… जहाँ रास्ते खत्म होते हैं और डर शुरू होता है। |
दिन ढलने में अभी वक्त था… लेकिन आसमान का रंग पहले ही बदलने लगा था।
हल्का नारंगी… फिर फीका… और फिर जैसे किसी ने दूर कहीं धूल उड़ा दी हो।
अरविंद जीप चला रहा था।
रेगिस्तान में रास्ते वैसे भी रास्ते नहीं होते… बस टायर के निशान होते हैं, जो कभी भी खत्म हो सकते हैं।
वो पिछले तीन घंटे से चला रहा था… बिना किसी तय दिशा के।
उसने रेडियो ऑन किया…
बस खर्ररर… खर्ररर…
कोई आवाज़ नहीं।
उसने रेडियो बंद कर दिया।
अजीब सी खामोशी थी।
ऐसी खामोशी… जिसमें अपनी साँस भी अलग से सुनाई देती है।
कुछ दूर चलने के बाद… उसे एहसास हुआ—
वो बार-बार एक ही तरह के टीलों के पास से गुजर रहा है।
हर टीला… हर मोड़…
सब कुछ जैसे पहले भी देखा हुआ।
उसने गाड़ी रोकी।
नीचे उतरा।
चारों तरफ देखा…
बस रेत… और दूर तक फैली हुई खाली जगह।
लेकिन… पता नहीं क्यों…
उसे लगा कि वो अकेला नहीं है।
उसने जेब से पानी की बोतल निकाली… एक घूंट लिया…
और तभी—
“फूँ…”
जैसे किसी ने बहुत पास से धीरे से फूँक मारी हो।
वो तुरंत पलटा।
पीछे कुछ नहीं था।
सिर्फ रेत।
लेकिन रेत… एक जगह पर हल्की-सी हिल रही थी।
जैसे नीचे कुछ साँस ले रहा हो।
अरविंद ने खुद को समझाया—
“हवा होगी…”
लेकिन हवा चल ही नहीं रही थी।
उसने जल्दी से जीप स्टार्ट की… और आगे बढ़ गया।
सूरज अब लगभग डूब चुका था।
रोशनी कम हो रही थी… और रेत का रंग गहरा होने लगा था।
जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ रहा था…
रेगिस्तान बदल रहा था।
दिन का खुलापन… अब घुटन में बदल रहा था।
कुछ देर बाद… जीप अचानक बंद हो गई।
अरविंद ने दो-तीन बार स्टार्ट करने की कोशिश की—
कुछ नहीं।
वो बाहर उतरा।
इंजन चेक करने लगा…
लेकिन उसका ध्यान बार-बार भटक रहा था।
क्योंकि…
अब उसे साफ सुनाई दे रहा था—
कोई साँस ले रहा था।
धीमी… गहरी… और बहुत पास।
उसने धीरे से सिर उठाया।
सामने रेत का एक छोटा टीला था।
और उस टीले की सतह…
धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी।
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| क्या होगा अगर जमीन ही जिंदा हो जाए? |
जैसे कोई उसके नीचे लेटा हो… और सांस ले रहा हो।
अरविंद के पैर जैसे जमीन में धँस गए।
वो हिल नहीं पा रहा था।
उसने नजर हटाने की कोशिश की…
लेकिन आँखें उसी टीले पर अटक गईं।
फिर…
रेत का वो हिस्सा अचानक धँस गया।
और वहाँ एक गड्ढा बन गया।
गहरा… काला… बिल्कुल अंधेरा।
उस गड्ढे के अंदर से…
कुछ हिल रहा था।
अरविंद एक कदम पीछे हटा।
और तभी—
उसके पीछे… रेत पर किसी के चलने की आवाज़ आई।
धीरे… रुक-रुक कर…
जैसे कोई बिना जल्दी के… उसके पास आ रहा हो।
उसने पलटकर देखा—
कोई नहीं।
लेकिन रेत पर…
उसके अलावा भी निशान बन रहे थे।
ताज़ा।
गहरे।
और हर कदम… उसके करीब।
अब वो भागना चाहता था।
लेकिन जैसे ही उसने कदम उठाया…
उसका पैर रेत में धँस गया।
थोड़ा… फिर और ज्यादा।
जैसे नीचे से कोई उसे पकड़ रहा हो।
उसने पूरी ताकत से पैर खींचा—
लेकिन रेत अब सिर्फ रेत नहीं थी।
वो गीली लग रही थी।
चिपचिपी।
जैसे किसी ने नीचे से उसे पकड़ लिया हो।
और तभी—
उसके कान के पास… बिल्कुल पास…
एक धीमी आवाज़ आई—
“साँस… ले…”
अरविंद का शरीर जम गया।
उसने महसूस किया—
उसके आसपास की रेत…
धीरे-धीरे ऊपर उठ रही है।
और हर तरफ…
छोटे-छोटे उभार बन रहे हैं।
जैसे…
सैकड़ों लोग रेत के नीचे दबे हों… और एक साथ साँस ले रहे हों।
अब वो समझ गया—
ये जगह खाली नहीं है।
ये कभी खाली थी ही नहीं।
उसने आखिरी बार खुद को छुड़ाने की कोशिश की…
लेकिन रेत अब उसकी कमर तक आ चुकी थी।
उसके हाथ… भी धीरे-धीरे नीचे खिंच रहे थे।
और फिर…
रेत के अंदर से…
कई हाथ बाहर निकले।
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| कुछ जगहें… आपको कभी वापस नहीं आने देती। |
सूखे… फटे हुए… टेढ़े…
और सबने एक साथ उसे पकड़ लिया।
उसकी चीख… बाहर नहीं आई।
क्योंकि उसी पल—
रेत उसके मुँह के अंदर भर गई।
सब कुछ शांत हो गया।
फिर से वही सन्नाटा।
कुछ देर बाद…
रेत की सतह फिर से सीधी हो गई।
जैसे वहाँ कभी कुछ हुआ ही नहीं।
लेकिन…
अगर कोई ध्यान से देखे—
तो उस जगह की रेत…
अब भी बहुत हल्के-हल्के…
ऊपर-नीचे हो रही है।
जैसे…
वो अब भी साँस ले रही हो।


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