खौफनाक जिन्न

 


रात बिल्कुल साधारण थी…

 बाहर  हवा बस हल्की-सी बह रही थी। पेड़ों के पत्ते भी जैसे थक कर स्थिर हो गए थे। आसमान में चाँद पूरा नहीं था, पर इतना जरूर था कि जमीन पर फीकी सफेदी बिखेर दे।

रात में सुनसान गांव के रास्ते पर साइकिल चलाता एक आदमी, पास में पुराना कुआं और डरावना माहौल
एक साधारण सफर… जो शायद उतना साधारण नहीं था।


रमेश अपनी साइकिल धीरे-धीरे चलाते हुए रास्ता पार कर रहा था।

वह हर रोज इसी रास्ते से गुजरता था। शहर से देर तक काम करके लौटना उसकी आदत बन चुकी थी।

उसके लिए इस रास्ते से… हर रोज की बात थी।

पर वह रात… कुछ अलग होने वाली थी।

 उसने ध्यान नहीं दिया। पर

उस दिन हवा में एक अजीब-सी चुप्पी थी।

ऐसी चुप्पी 

जैसे कोई सुन रहा हो।

साइकिल की चेन की खट-खट भी उसे उस वक्त ज़्यादा साफ सुनाई देने लगी।

उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

 रास्ता… बिल्कुल ही सुनसान था पेड़… पौधे सब शांत थे, अंधेरा गहरा था।

वह आगे बढ़ गया।

थोड़ा आगे जाने पर रास्ते पर एक पुराना कुआं पड़ता था।

गांव के लोग अब उसका इस्तेमाल नहीं करते थे।

रमेश जैसे ही  उस कुएं के पास पहुंचा… उसकी साइकिल खुद-ब-खुद धीमी हो गई।

उसने ब्रेक नहीं लगाया था।

फिर भी… पहिये जैसे भारी हो गए थे।

उसने नीचे झुककर देखा…

कुछ भी नहीं फंसा था।

पर साइकिल चल नहीं रही थी।

आसपास एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था 

और तभी…

कुएं के अंदर से… एक हल्की-सी आवाज उसे सुनाई दी।

रमेश का जैसे गला ही सूख गया।

उसने  कुएं की तरफ देखा।

बहुत होत अंधेरा था।

गहरा… ठंडा अंधेरा।

कुछ दिख नहीं रहा था…

लेकिन एहसास हो रहा था…

कि नीचे कुछ है।

रात के अंधेरे में एक आदमी पुराने कुएं में झांकता हुआ, नीचे से आती रहस्यमयी रोशनी
कुछ चीजें देखनी नहीं चाहिए… फिर भी इंसान देखता है।


रमेश ने तुरंत अपनी साइकिल घुमाई और तेज चलाने लगा।

इस बार साइकिल चल रही थी।

बहुत आसानी से।

घर पहुंचने तक उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


घर में जाते रमेश ने दरवाजा बंद करते ही राहत की सांस ली।

घर में उसकी पत्नी सो रही थी।

सब कुछ सामान्य था।

पर अजीब सा सन्नाटा था।

वही… जो कुएं के पास था।


रात के करीब 2 बजे होंगे…

रमेश की नींद अचानक खुल गई।

कोई आवाज नहीं हुई थी।

फिर भी… उसे लगा… कोई है।

उसने आंखें खोलीं।

कमरा अंधेरे में डूबा था।

पर खिड़की से आती हल्की रोशनी में… उसे कुछ दिखा।

दरवाजे के पास…

कोई खड़ा था।

पहले तो उसे लगा—

“पत्नी होगी…”

पर उसकी पत्नी उसके पास ही सो रही थी।

उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

पत्नी वहीं थी।

और दरवाजे के पास खड़ा वो… अब भी वहीं था।

स्थिर।

बिल्कुल स्थिर।

रमेश का शरीर जड़ हो गया।

वह उठ नहीं पा रहा था।

सिर्फ देख पा रहा था।

कुछ सेकंड…

या शायद मिनट…

फिर वह चीज़… थोड़ा आगे बढ़ी।

उसकी चाल… इंसानी नहीं थी।

पैर जमीन को छू नहीं रहे थे…

बस खिसक रहे थे।

जैसे… उसे चलना याद नहीं।

अब उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखने लगा।

काला।

पूरी तरह काला।

पर आंखें…

आंखें सफेद थीं।

और… सीधा रमेश को देख रही थीं।

रमेश चिल्लाना चाहता था।

पर आवाज नहीं निकली।

उस चीज़ ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया और

कुछ फुसफुसाया।

पर शब्द समझ नहीं आए।

बस एक एहसास आया—

वह उसे पहचानता है।

अगले दिन सुबह…

रमेश उठा… नाश्ता किया…और काम पर चला गया।

उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

वही रास्ता  था।

कुआं भी… वही था।

पर इस बार…

उसने खुद साइकिल रोकी।

वह… कुएं के पास गया और

अंदर झांका।

नीचे…

कुछ नहीं था।

बस पानी था।

स्थिर… बिल्कुल शांत।

पर पानी में…

उसका प्रतिबिंब नहीं था।

उसकी जगह…

कोई और था।

काला।

सफेद आंखों वाला।

जो ऊपर देख रहा था।

रात में घर के बाहर खड़ा आदमी जिसकी जमीन पर दो परछाइयां दिख रही हैं, एक असामान्य
घर तक तो आ गया… पर अब वह अकेला नहीं है।


उस दिन के बाद…

गांव में लोगों ने नोटिस किया…

रमेश के अंदर का बदलाव।

वह कम बोलता था।

ज्यादा देर तक… खाली देखता रहता था।

और रात को…

उसके घर के बाहर…

कभी-कभी…

दो परछाइयाँ दिखती थीं।

एक… जो उसकी थी।

और दूसरी…

जो कभी हिलती ही नहीं थी।

बस… उसके साथ खड़ी रहती थी।

अब धीरे-धीरे…

लोगों ने उस रास्ते से जाना बंद कर दिया।

पर असली वजह… किसी को पता नहीं चली।

क्योंकि…

जो भी उस कुएं के पास रुकता है…

वह वापस तो आ जाता है…

पर…

वह अकेला नहीं आता।

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