पुराना कब्रिस्तान

 रात के साढ़े बारह बजे थे।

आसमान में चाँद पूरा नहीं था, लेकिन उसकी फीकी रोशनी बादलों के पीछे से छनकर जमीन पर गिर रही थी। गाँव के बाहर फैला पुराना कब्रिस्तान उसी रोशनी में धुँधला-सा चमक रहा था। टूटी हुई पत्थर की चहारदीवारी, लोहे का जंग लगा फाटक जो वर्षों से आधा खुला और आधा टेढ़ा लटका हुआ था। भीतर पुरानी कब्रों की अनगिनत कतारें — कुछ पर नाम मिट चुके, कुछ पर तारीखें आधी घिसी हुई।

रात में ग्रामीण इलाके का पुराना सुनसान कब्रिस्तान, टूटी और तिरछी कब्रें, जंग लगा फाटक और जमीन पर फैला धुंध।
गाँव के बाहर खामोश खड़ा यह कब्रिस्तान सिर्फ मिट्टी और पत्थर नहीं… यहाँ की जमीन में दबी हैं अधूरी कहानियाँ।


यह कब्रिस्तान अंग्रेज़ों के समय का बताया जाता था। करीब तीस साल पहले यहाँ ज़मीन धँसने की घटना हुई थी। बरसात की एक रात कई पुरानी कब्रें भीतर से खाली मिली थीं, जैसे मिट्टी अंदर की तरफ खिसक गई हो। उसी साल गाँव के चार लोग रहस्यमय तरीके से गायब हुए। बाद में उनकी लाशें कब्रिस्तान की अलग-अलग जगहों पर मिलीं — बिना किसी चोट के, पर चेहरे पर असहनीय भय के निशान। पुलिस ने मामला “प्राकृतिक कारण” कहकर बंद कर दिया। लेकिन तब से हर कुछ समय बाद कोई न कोई इस जगह से जुड़ा हादसा सामने आता रहा।

मोहन।

छोटी मोटी चोरिया करनेवाला लालच से भरा इंसान। उसे खबर मिली थी कि गाँव के बड़े सेठ का घर दो रात खाली रहेगा। अंदर लाखों का माल था। अगर हाथ लगा तो यह उसका आख़िरी हाथ हो सकता था। उसने ठान लिया की रात को ही हाथ साफ कर लेगा और कहीं दुर चला जायेगा।

रात गहरी हुई तो वह उस घर की पिछली दीवार फांदकर भीतर घुसा। ताले पहले से देखे हुए थे। उसने अलमारी खोली और सारी नकदी, जेवर, छोटे बक्से। सब बैग में भर लिए।

पर तभी बाहर जीप के ब्रेक की आवाज़ आई।

गश्त पर पुलिस थी।

टॉर्च की किरणें खिड़कियों से भीतर फिसलने लगीं। किसी पड़ोसी ने शक में फोन कर दिया था। उन्होने पहले दरवाजे पर दस्तक दी , फिर ज़ोर से धक्का दिया।

मोहन पिछली तरफ भागा। दीवार कूदकर अँधेरी गली में उतरा। पीछे सीटी और चिल्लाहट। “रुको!”

और वह भागता गया। कंधे पर भारी बैग। वह दो बार फिसला। घुटने छिल गए। पीछे टॉर्च की रोशनी कभी पास आती, तो कभी दूर जाती।

भागते-भागते उसे सामने पुरानी दीवार दिखी।

कब्रिस्तान की।

उसने बिना सोचे दीवार पकड़कर खुद को ऊपर खींचा और भीतर कूद गया।

अंदर उतरते ही बाहर की हलचल जैसे दीवार के उस पार ही रह गई हो और अंदर गहरी, भारी चुप्पी।

वह झुककर एक बड़ी, झुकी हुई कब्र के पीछे छिप गया। कुछ देर बाद पुलिस की रोशनी दीवार तक आई, फिर लौट गई। कदमों की आहट दूर चली गई।

एक आदमी टूटी कब्र के पीछे छिपा हुआ है जबकि बाहर पुलिस टॉर्च की रोशनी से अंधेरे में तलाश कर रही है।
पुलिस दीवार के उस पार थी…
लेकिन मोहन को नहीं पता था कि असली खतरा दीवार के अंदर इंतज़ार कर रहा है।


मोहन ने राहत की साँस ली।

लेकिन वह ज़्यादा देर नहीं रुका। उसे लगा, यहाँ रुकना सही नहीं। जैसे ही वह फाटक की दिशा में बढ़ा, उसे अजीब बात महसूस हुई — जिस तरफ से वह कूदा था, वहाँ वैसी दीवार दिख ही नहीं रही थी। सामने सिर्फ कब्रों की अंतहीन कतार।

उसने दिशा बदली। चलते-चलते अचानक उसका पैर धँसी हुई मिट्टी में चला गया। वह गिर पड़ा। हाथ मिट्टी में धँस गए।

मिट्टी ठंडी थी… असामान्य रूप से ठंडी।

वह उठकर आगे बढ़ा। हर दो कदम पर उसे लगता जैसे जमीन हल्की-सी नीचे खिसक रही हो। कुछ पुरानी कब्रों के पत्थर तिरछे हो चुके थे। एक जगह उसने देखा — मिट्टी हल्की-हल्की काँप रही थी, जैसे भीतर कुछ हिल रहा हो।

उसने खुद को समझाया कि यह डर है।

वह तेज़ कदमों से दीवार खोजने लगा। अचानक उसे लगा पीछे से किसी ने दौड़कर कदम बढ़ाए हों। वह मुड़ा — कुछ नहीं। फिर सामने देखा — दो कब्रों के बीच का रास्ता, जो अभी खुला था, अब तंग लग रहा था।

उसने दौड़ना शुरू किया।

दौड़ते-दौड़ते उसका बैग एक पत्थर से अटककर गिर गया। जेवर मिट्टी में बिखर गए। वह झुका उठाने, तभी उसकी नज़र पड़ी — मिट्टी पर सिर्फ उसके ही नहीं, और भी पैरों के निशान थे।

नंगे पैर।

छोटे-बड़े।

ताज़ा।

वे निशान उसके चारों तरफ गोल घेरा बनाते जा रहे थे।

मोहन का गला सूख गया। उसने बैग वहीं छोड़ा और भागा।

अचानक उसके सामने दीवार दिखी। उसने राहत की साँस ली और चढ़ने को हाथ बढ़ाया — पर उँगलियाँ पत्थर में धँस गईं। जैसे दीवार ठोस नहीं, गीली मिट्टी हो। उसका संतुलन बिगड़ा और वह पीछे गिर पड़ा।

गिरते ही उसे साफ़ महसूस हुआ — किसी ने उसके टखने को पकड़ लिया है।

पकड़ इतनी ठंडी कि जैसे बर्फ।

उसने लात मारी, छूट गया। वह घिसटकर दूर हुआ। चारों तरफ देखा — जमीन पर उभरे हुए उभार, जैसे कई जगहों से मिट्टी अंदर से धकेली जा रही हो।

एक कब्र का पत्थर धीरे-धीरे एक तरफ खिसका।

मिट्टी ऊपर उठी।

उसने उठकर आख़िरी बार दौड़ लगाने की कोशिश की। लेकिन हर दिशा में वही — कब्रें, धँसी हुई ज़मीन, बदलती कतारें। साँस उखड़ चुकी थी। सीना फटने को था।

अचानक उसके सामने जमीन पूरी तरह धँस गई।

वह घुटनों के बल गिरा। नीचे खोखलापन था। जैसे खाली गड्ढा।

उसने उठने की कोशिश की, पर पीछे से जोर का खिंचाव हुआ। उसका शरीर पीछे की तरफ गिरा और आधा धँस गया। उसने मिट्टी पकड़ने की कोशिश की, पर मिट्टी मुट्ठी में रुकती नहीं थी — जैसे भीतर खिंचती जा रही हो।

कुछ ही सेकंड में उसका शरीर कमर तक जमीन में समा गया।

उसकी आँखें फैल गईं।

आख़िरी बार उसने ऊपर देखा — धुँधला चाँद, टेढ़े पेड़, और चारों तरफ मिट्टी के उभरे हुए गोल घेरे।

फिर सब शांत।

सुबह गाँव वालों ने देखा — कब्रिस्तान के बीच एक नई धँसी हुई जगह थी।

रात के अंधेरे में पुरानी कब्र के पास आधा जमीन में धँसा हुआ डरा हुआ आदमी, आसपास धुंध और टूटी कब्रें।
सुबह उसकी लाश मिली।
कोई घाव नहीं… बस धँसी हुई मिट्टी और टखनों पर काले निशान।


मोहान की लाश आधी मिट्टी के ऊपर पड़ी थी। चेहरा ऊपर, आँखें पूरी खुली। शरीर पर कोई गहरा घाव नहीं। सिर्फ टखनों के पास काली उँगलियों जैसे निशान।

पास में बिखरे जेवर मिट्टी में आधे दबे हुए थे।

और उसके चारों तरफ गीली जमीन पर दर्जनों नंगे पैरों के निशान थे — जो कुछ दूर जाकर अचानक खत्म हो जाते थे।

पुलिस ने रिपोर्ट में लिखा — “संभवतः घबराहट में गिरकर दम घुटने से मृत्यु।”

पर गाव वालो को सब पता था।

कब्रिस्तान उसे निगल गया था।

और बरसात की रातों में, उस जगह की मिट्टी अब भी  धँसती रहती है।

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