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| रात गहरी थी… सड़क खाली थी… और बस बिना रुके आगे बढ़ती जा रही थी। |
रात के लगभग साढ़े दस बजे होंगे।
बस की खिड़की से बाहर झांकते हुए
राहुल को बार-बार ऐसा लग रहा था जैसे सड़क आज कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गई है।
वह तीसरी बार उसी बोर्ड को देख चुका था —
“रामगढ़ 12 KM”
उसने घड़ी देखी।
10:32
उसने धीरे से बगल में बैठे आदमी से पूछा —
“भाईसाहब… ये रामगढ़ कब आएगा?”
आदमी ने उसकी तरफ देखा…
कुछ सेकंड तक देखता ही रहा…
फिर बोला —
“आना चाहिए था…”
उसके जवाब में कुछ अजीब था।
जैसे वह पक्का नहीं था।
बस के अंदर अजीब सन्नाटा था।
ना कोई बात कर रहा था…
ना कोई फोन पर था…
ना कोई खांस रहा था…
सिर्फ इंजन की आवाज।
और कभी-कभी खिड़की से आती हवा की सीटी।
राहुल ने पीछे मुड़कर देखा।
बस लगभग खाली थी।
जब वह चढ़ा था तब कम से कम 15-20 लोग थे।
अब मुश्किल से 6–7 लोग।
उसने सोचा —
शायद रास्ते में उतर गए होंगे…
लेकिन…
उसे याद नहीं था
बस कहीं रुकी हो।
उसने कंडक्टर को ढूंढने के लिए उठना चाहा…
तभी बस हल्का सा झटका खाकर रुक गई।
बिना किसी स्टॉप के।
बिना किसी आवाज के।
ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा।
दरवाज़ा खुद खुल गया।
बाहर घना अंधेरा।
इतना अंधेरा
कि सड़क भी साफ नहीं दिख रही थी।
एक आदमी धीरे-धीरे उठा…
और बिना कुछ बोले नीचे उतर गया।
राहुल ने खिड़की से बाहर देखा।
नीचे कोई बस स्टॉप नहीं था।
कोई घर नहीं।
कोई लाइट नहीं।
सिर्फ सड़क…
और धुंध।
बस फिर चल पड़ी।
अब राहुल के अंदर हल्की बेचैनी शुरू हो चुकी थी।
उसने मोबाइल निकाला।
नेटवर्क नहीं।
उसने खिड़की के बाहर देखा।
फिर वही बोर्ड।
रामगढ़ 12 KM
इस बार उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा…
अब बस में सिर्फ चार लोग बचे थे।
वो आदमी…
जो उसके बगल में बैठा था…
अब वहाँ नहीं था।
लेकिन…
राहुल को याद नहीं
वो कब उतरा।
बस के अंदर की लाइट अचानक हल्की-सी झपकी…
और फिर स्थिर हो गई।
तभी…
ड्राइवर ने पहली बार आवाज निकाली —
धीमी… भारी… थकी हुई…
“कोई है… जो पहली बार इस रास्ते से जा रहा है…?”
बस में बैठे तीनों लोग
धीरे-धीरे राहुल की तरफ देखने लगे।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ देखते रहे।
राहुल के गले में जैसे कुछ अटक गया।
उसने हिम्मत करके पूछा —
“क्यों…?”
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| बस के अंदर सब शांत बैठे थे… लेकिन राहुल को लग रहा था कि कुछ बहुत गलत है। |
ड्राइवर ने शीशे में से उसकी आँखों में देखा…
और बोला —
“फिर आज रात… बस रुकेगी नहीं…”
बस की स्पीड अचानक बढ़ गई।
बाहर का अंधेरा और गहरा हो गया।
और उसी समय…
राहुल ने देखा —
सड़क के किनारे
कोई खड़ा था।
सफेद कपड़ों में।
लेकिन…
बस उसके पास से निकल गई।
बिना रुके।
राहुल ने पीछे मुड़कर देखा —
वो आदमी अब बस के पीछे नहीं था…
बल्कि…
सड़क के आगे खड़ा था।
उसी जगह।
उसी तरह।
जैसे…
बस वहीं घूम रही हो।
राहुल के हाथ ठंडे पड़ चुके थे।
उसे पहली बार लगा —
शायद…
ये सफ़र
सामान्य नहीं है।
और शायद…
आज रात
ख़त्म नहीं होने वाली।
बस की रफ्तार बढ़ती जा रही थी।
राहुल की धड़कन अब साफ सुनाई दे रही थी…
उसे लग रहा था जैसे बस के अंदर की हवा भी भारी हो गई है।
उसने फिर बाहर देखा।
फिर वही बोर्ड।
रामगढ़ 12 KM
इस बार उसके हाथ काँप गए।
“ये… ये कैसे हो सकता है…”
उसने धीरे से कहा।
तभी पीछे बैठे बूढ़े आदमी ने पहली बार बोलना शुरू किया —
“पहली बार… सबको ऐसा ही लगता है…”
राहुल ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
बूढ़ा मुस्कुराया नहीं…
बस सीधा उसकी आँखों में देखते हुए बोला —
“जब तक याद नहीं आता…
बस चलती रहती है…”
राहुल का गला सूख गया।
“क्या याद…?”
कोई जवाब नहीं।
बस के अंदर फिर सन्नाटा।
अचानक…
बस ने जोर का ब्रेक मारा।
इस बार सच में।
बस सड़क के बीच रुक गई।
ड्राइवर धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
पहली बार राहुल ने उसका चेहरा साफ देखा।
चेहरा थका हुआ…
आँखें लाल…
और माथे पर पुराना जख्म।
ड्राइवर बोला —
“उतर जाओ…
यहीं उतरना था तुम्हें…”
राहुल घबरा गया।
“यहाँ…? यहाँ तो कुछ भी नहीं है…”
ड्राइवर ने कहा —
“तब भी…
यहीं उतरे थे…”
ये सुनते ही राहुल के कानों में जैसे आवाज गूंजने लगी।
“यहीं उतरे थे…”
“यहीं उतरे थे…”
“यहीं…”
उसके दिमाग में अचानक कुछ चमका।
सड़क…
रात…
बारिश…
ब्रेक…
चीख…
और…
खून।
उसकी सांस रुक गई।
उसने धीरे-धीरे बस के शीशे से बाहर देखा।
सड़क के किनारे टूटा हुआ बोर्ड पड़ा था।
उस पर लिखा था —
रामगढ़ 12 KM
और उसके पास…
जली हुई बस का ढांचा।
राहुल का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
उसके मुँह से खुद-ब-खुद निकला —
“ये… वही… बस है…”
पीछे से आवाज आई —
“हाँ…”
राहुल ने पीछे देखा।
अब बस में बैठे सारे लोग खड़े थे।
सब उसे ही देख रहे थे।
बूढ़ा आदमी बोला —
“उस रात…
ड्राइवर सो गया था…”
एक और आदमी बोला —
“बस पलटी…”
एक और आवाज —
“कोई नहीं बचा…”
राहुल की आँखों में डर फैल गया।
“नहीं… मैं… मैं तो…”
ड्राइवर धीरे-धीरे उसके पास आया।
उसकी आँखों में देखते हुए बोला —
“तुम सबसे आख़िरी में मरे थे…”
राहुल पीछे हटने लगा।
“नहीं… नहीं… मैं जिंदा हूँ… मैं घर जा रहा हूँ…”
ड्राइवर ने सिर हिलाया।
“हर रात…
तुम यही कहते हो…”
बस के अंदर की लाइट अचानक बुझ गई।
पूरा अंधेरा।
कुछ सेकंड बाद…
राहुल सड़क पर खड़ा था।
अकेला।
दूर से बस आती दिखाई दी।
धीरे-धीरे…
वही बस।
वही नंबर।
वही आवाज।
बस उसके सामने आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
अंदर से कंडक्टर बोला —
“रामगढ़… रामगढ़… चलो…”
राहुल कुछ सेकंड तक खड़ा रहा।
फिर…
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| उसे लगा सफर खत्म हो गया… लेकिन वही बस फिर उसके सामने खड़ी थी। |
जैसे उसे कुछ याद ही नहीं…
वह बस में चढ़ गया।
अंदर जाकर सीट पर बैठा।
बस चल पड़ी।
कुछ देर बाद उसने खिड़की से बाहर देखा।
बोर्ड दिखा —
रामगढ़ 12 KM
उसने बगल वाले आदमी से पूछा —
“भाईसाहब… ये रामगढ़ कब आएगा…?”
आदमी ने उसकी तरफ देखा…
कुछ सेकंड तक देखता रहा…
फिर बोला —
“आना चाहिए था…”
बस के अंदर सन्नाटा फैल गया।
ड्राइवर ने शीशे में देखा…
धीरे से बोला —
“कोई है…
जो पहली बार इस रास्ते से जा रहा है…?”
बस अंधेरे में गायब हो गई।
और…
रात फिर शुरू हो गई।
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