👻 भूतिया महल

 




आज हमें उस पुराने महल में जाना था।

सुबह ऑफिस पहुँचा तो मालिक ने बुलाया।

मैं और रवि दोनों साइट का काम देखते थे, इसलिए ऐसे काम अक्सर हमें ही मिलते थे।

मेरा नाम अमन है, और मैं नागपुर की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में सुपरवाइज़र हूँ।

रवि मेरा दोस्त भी है और पिछले पाँच साल से साथ काम कर रहा है।

हमने कई पुराने मकान तोड़े, कई खाली फैक्टरियाँ देखीं, कई बार रात में भी साइट पर रुकना पड़ा…

लेकिन आज का काम थोड़ा अलग था।

मालिक ने फाइल सामने रखी।

“शहर से बाहर एक पुराना महल है… सरकार ने उसे गिराने का ऑर्डर दिया है।

पहले जाकर हालत देखो… फिर काम शुरू करेंगे।”

मैंने पूछा —

“मजदूर नहीं भेज रहे?”

मालिक ने हल्की आवाज में कहा —

“कोई जाना नहीं चाहता।”

रवि हँस पड़ा —

दो दोस्त एक टूटे हुए गेट से पुराने भूतिया महल के अंदर जाते हुए, हाथ में टॉर्च, शाम का समय, डरावना माहौल
सरकारी काम समझकर हम उस पुराने महल में घुस गए…
लेकिन उस दिन हमें नहीं पता था कि यह सिर्फ एक खंडहर नहीं, बल्कि किसी का इंतज़ार करता हुआ भूतिया घर है।

“क्यों… भूत है क्या?”

मालिक ने जवाब नहीं दिया।

बस बोला —

“जाकर देखो… और शाम तक लौट आना।”

उसकी आखिरी बात पर ध्यान गया —

शाम तक लौट आना।

लेकिन हमने ज्यादा सोचा नहीं।

दोपहर के बाद हम बाइक लेकर निकले।

शहर खत्म हुआ…

सड़क पतली हुई…

फिर कच्चा रास्ता…

दोनों तरफ पेड़…

रवि बोला —

“यार जगह तो फिल्म जैसी लग रही है।”

मैं बोला —

“तू हर जगह डर जाता है।”

थोड़ी देर बाद एक छोटा सा गाँव आया।

हमने रास्ता पूछा।

एक बूढ़ा आदमी हमें देखने लगा।

“महाल जा रहे हो?”

मैंने कहा — “हाँ।”

वह बोला —

“काम करके जल्दी लौट आना।”

मैंने मजाक में कहा —

“क्यों… वहाँ कोई रहता है क्या?”

वह बोला —

“रहता नहीं…

रुकने नहीं देता।”

हम हँसकर आगे बढ़ गए।

लेकिन अब मन थोड़ा शांत नहीं था।


पेड़ों के बीच से अचानक वो दिखा।

बहुत बड़ा…

पुराना…

काला पड़ा हुआ महल।

टूटी खिड़कियाँ…

ऊपर बैठे कौवे…

आँगन में सूखे पेड़…

हवा चल रही थी…

लेकिन महल के अंदर कुछ हिल नहीं रहा था।

हम दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।

फिर मैंने कहा —

“चल… जल्दी देखते हैं।”

गेट आधा खुला था।

मैंने धक्का दिया।

क्रीईई…

गेट खुल गया।

जैसे ही अंदर गए…

मुझे लगा जैसे बाहर की आवाज बंद हो गई।

मैंने पीछे देखा।

सब ठीक था।

फिर भी…

कुछ अलग था।


आँगन बड़ा था।

बीच में सूखा कुआँ।

चारों तरफ कमरे।

मैंने नक्शा निकाला।

“यहाँ से तोड़ना शुरू होगा… पहले पूरा देख लेते हैं।”

हम एक-एक कमरा देखने लगे।

पहला कमरा — खाली

दूसरा — टूटा फर्नीचर

तीसरा — धूल

सब normal था।

रवि बोला —

“लोग बेकार में डरते हैं।”

मैं बोला —

“हाँ… कुछ नहीं है यहाँ।”

हम ऊपर गए।

लकड़ी की सीढ़ियाँ…

चर्र…

चर्र…

लंबा गलियारा।

दीवार पर पुराने फोटो लगे थे।

हम रुक गए।

मैंने टॉर्च मारी।

एक फोटो में पूरा परिवार था।

अंधेरे कमरे में दो आदमी गिरी हुई पुरानी फोटो को टॉर्च से देखते हुए, फोटो में चेहरे खुरचे हुए, डरावना कमरा
कमरे में कुछ भी नहीं था…
बस एक पुरानी तस्वीर…
और जैसे ही वो गिरी, हमें समझ आ गया कि इस महल में हम अकेले नहीं हैं।

रवि बोला —

“अच्छा महल रहा होगा कभी।”

मैंने फोटो उठाया।

सब ठीक था।

कोई खुरच नहीं।

कोई डर नहीं।

हम आगे बढ़ गए।


ऊपर के आखिरी कमरे में गए।

अंदर बहुत ठंड थी।

रवि बोला —

“AC लगा है क्या?”

हम हँसे।

कमरे में कुछ नहीं था।

बस एक कुर्सी।

और दीवार पर एक फोटो।

मैंने टॉर्च मारी।

इस बार फोटो में एक बूढ़ी औरत थी।

अकेली।

नीचे कुछ लिखा था…

पर धूल थी।

मैंने हाथ से साफ किया।

लिखा था —

“रखवाली”

मैंने पढ़कर हँस दिया।

“चौकीदार होगी।”

हम बाहर आ गए।

सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे…

तभी आवाज आई।

टक…

जैसे कुछ गिरा हो।

हम रुक गए।

रवि बोला —

“ऊपर से आया।”

हम वापस गए।

वही फोटो… जो हमने देखी थी…

अब जमीन पर पड़ी थी।

मैंने कहा —

“हवा से गिरी होगी।”

रवि बोला —

“यहाँ हवा नहीं चल रही।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस फोटो उठाकर दीवार से टिकाई।

इस बार देखा…

फोटो में औरत का चेहरा थोड़ा अलग लग रहा था।

मैंने ध्यान से देखा…

फिर हँस दिया।

“दिमाग चल रहा है।”

हम नीचे आ गए।

 

आँगन में आए तो लगा…

जगह पहले से बड़ी है।

मैंने रवि से पूछा —

“तुझे याद है कुआँ कहाँ था?”

वह बोला —

“बीच में था…”

लेकिन बीच में कुछ नहीं था।

हम दोनों चुप।

फिर देखा —

कुआँ थोड़ा साइड में था।

हमने सोचा —

शायद ध्यान नहीं गया।

लेकिन अब मन शांत नहीं था।

 

हम बाहर जाने लगे।

गेट की तरफ गए।

गेट बंद था।

हमने खोला।

नहीं खुला।

रवि बोला —

“अभी तो खुला था…”

मैंने जोर लगाया।

तभी पीछे से आवाज आई —

धीरे…

खाँसने की।

हम दोनों मुड़े।

कोई नहीं।

फिर ऊपर देखा।

सीढ़ियों पर…

वही बूढ़ी औरत की फोटो…

अब दीवार पर नहीं थी।

सीढ़ियों के पास रखी थी।

मैं बोला —

“तू रखकर आया क्या?”

रवि बोला —

“पागल है क्या?”

अचानक ऊपर से आवाज आई —

“तोड़ने आए हो…?”

हम दोनों जम गए।

आवाज औरत की थी।

धीरे-धीरे सीढ़ियों पर कुछ हिला।

और…

वह दिखी।

सफेद कपड़े…

लंबे बाल…

आँखें सफेद…

वही औरत।

फोटो वाली।

वह बोली —

“यह महल नहीं…

मेरा घर है…”

रवि पीछे हटते-हटते गिर गया।

मैं भागा।

गेट खुला था।

मैं बाहर निकल गया।

पीछे देखा —

महल था।

फिर नहीं था।

सिर्फ जंगल।

भूतिया महल के अंदर सीढ़ियों पर खड़ी सफेद कपड़ों में डरावनी औरत, दो आदमी डरकर पीछे हटते हुए
दरवाज़ा अपने आप बंद हुआ…
आवाज़ आई…
और जब हमने पीछे मुड़कर देखा —
सीढ़ियों पर खड़ी वो औरत हमें जाने नहीं देना चाहती थी।


अगले दिन मालिक के साथ गया।

वहाँ कुछ नहीं था।

गाँव वाले बोले —

“महाल तो सालों पहले जल गया।”

मैंने पूछा —

“रखवाली करने वाली औरत…?”

वो बोला —

“वो मरने के बाद भी वहीं है।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि…

रवि आज तक नहीं मिला।

और कभी-कभी…

रात को…

मेरे फोन में एक फोटो आता है।

उस महल का।

और उसमें…

हम दोनों खड़े होते हैं।

लेकिन…

पीछे सीढ़ियों पर…

वह भी खड़ी होती है। 👻

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