मैंने उस तस्वीर में अपनी लाश देखी”

 

Shock mein bed ke kinare baitha aadmi, haath mein purani tasveer, realistic
Ek aam raat… ek aam tasveer… lekin jo usne dekha, woh aam nahi tha.



वह तस्वीर बिल्कुल सामान्य थी।

न कोई साया।

न कोई अजीब चेहरा।

न कुछ ऐसा जिसे देखकर तुरंत डर लगे।

फिर भी…

जब मैंने उसे थोड़ी देर तक ध्यान से देखा,

मेरी साँसें जैसे रुक सी गईं।

क्योंकि उस तस्वीर में…

ज़मीन पर पड़ी लाश

मेरी ही थी।

🔹 

हेल्लो, मेरा नाम है अमन कुमार दरभंगा बिहार से

यह घटना लगभग तीन साल पुरानी है।

काम के कारण मैं कुछ महीनों के लिए नागपुर के पास एक छोटे से गाँव में रहने चला गया था।

शहर की भागदौड़ और तनाव से दूर,

बस थोड़ी शांति चाहिए थी।

गाँव बिल्कुल सामान्य था।

सुबह दूध वाले की साइकिल।

दोपहर में सन्नाटा।

शाम को बच्चों का शोर।

रात को गहरी खामोशी।

कुछ भी असामान्य नहीं।

मैं जिस घर में रह रहा था,

वह एक पुराना मिट्टी का मकान था।

बहुत बड़ा नहीं,

पर रहने लायक ठीक-ठाक।

दीवारों पर पुरानी दरारें,

लकड़ी का दरवाज़ा,

और आँगन में एक पुराना पीपल का पेड़।

पहले दिन से ही सब कुछ बिल्कुल सामान्य लग रहा था।

और सच कहूँ…

मैं उन लोगों में से हूँ जो भूत-प्रेत जैसी बातों पर कभी विश्वास नहीं करते।


🔹रहस्यमयी गुफा

एक दिन घर की सफ़ाई करते समय

मुझे स्टोर रूम में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी मिली।

अलमारी के अंदर थे:

कुछ पुराने कपड़े

कुछ धूल भरे कागज़

और एक फोटो फ्रेम।

फ्रेम में एक ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीर लगी थी।

थोड़ी फीकी।

थोड़ी पुरानी।

तस्वीर में गाँव जैसा ही दृश्य था।

एक घर।

एक पेड़।

और ज़मीन पर कोई व्यक्ति पड़ा हुआ।

मैंने बिना ज़्यादा सोचे देखा।

सामान्य सी तस्वीर लगी।

मैंने फ्रेम वापस रख दिया।


रात को काम करते समय

अचानक वही तस्वीर मेरे दिमाग में आ गई।

बिना किसी कारण।

बस जैसे कोई याद दिला रहा हो।

मैं उठकर स्टोर रूम गया।

फ्रेम निकाला।

तस्वीर को ध्यान से देखा।

सब कुछ वही।

पर इस बार…

ज़मीन पर पड़ा व्यक्ति

मुझे थोड़ा परिचित सा लगा।

चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।

फिर भी…

एक हल्का सा असहज एहसास हुआ।


🔹 

Lakdi ki mez par rakhi purani printed photograph, paas mein chashma, disturbing blurred image, hyper-realistic scene
Kabhi-kabhi sabse darawni cheez woh hoti hai… jo saaf dikh rahi hoti hai.


अगली रात।

फिर वही।

काम करते-करते अचानक तस्वीर याद आना।

मैं फिर गया।

फिर देखा।

इस बार…

वह परिचितपन और गहरा था।

जैसे दिमाग पहचानने की कोशिश कर रहा हो

पर स्वीकार नहीं कर रहा हो।


🔹


मैंने खुद को समझाया:

“गाँव के लोग एक जैसे ही दिखते हैं।”

“कोई संयोग होगा।”

“कुछ नहीं है।”

फ्रेम वापस रख दिया।

🔹 छोटी-छोटी बेचैनियाँ

कुछ दिनों बाद…

घर में कोई बड़ी डरावनी घटना नहीं हुई।

बस…

कुछ छोटी-छोटी बातें।

👉 बिना वजह बेचैनी

👉 रात को अजीब सा भारीपन

👉 कभी-कभी ऐसा लगना कि कोई देख रहा है

पर सब कुछ इतना सामान्य था

कि उसे नज़रअंदाज़ करना आसान था।


🔹 


लगभग 10-12 दिन बाद

मैंने एक अजीब चीज़ नोटिस की।

तस्वीर में ज़मीन पर पड़े व्यक्ति का चेहरा

पहले से थोड़ा ज़्यादा स्पष्ट लग रहा था।

मैंने खुद से कहा:

“शायद भ्रम है।”

पर सच में…

डिटेल्स बढ़ती हुई महसूस हो रही थीं।


🔹 


अब स्थिति यह हो गई कि

मैं रोज़ तस्वीर देखने लगा।

कभी सुबह।

कभी रात।

और हर बार…

वह असहज परिचितपन

थोड़ा और गहरा होता गया।


🔹 


एक रात…

लगभग 2 बजे का समय था।

पूरा घर शांत।

हवा तक की आवाज़ नहीं।

अचानक मेरे मन में एक विचार आया:

“तस्वीर को बाहर ले जाओ।”

“चाँदनी में देखो।”

वह विचार मेरा नहीं लगा।

फिर भी…

मैं फ्रेम लेकर आँगन में चला गया।

कमज़ोर चाँदनी थी।

पर देखने लायक रोशनी थी।

और तभी…

सब कुछ जैसे थम गया।

तस्वीर में पड़ा हुआ व्यक्ति

अब पूरी तरह साफ़ दिख रहा था।

और वह…

मैं था।

मेरा चेहरा।

मेरी काया।

मेरी शर्ट।

ज़मीन पर पड़ी हुई।

निर्जीव।

उस पल डर नहीं लगा।

सिर्फ़ एक सुन्न कर देने वाला झटका।

जैसे शरीर ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया हो।

मैं तस्वीर और अपने हाथों को बारी-बारी से देख रहा था।

दिमाग मानने से इंकार कर रहा था।


🔹  मौत का दरवाजा

पर असली डर अभी शुरू हुआ।

तस्वीर का बैकग्राउंड…

मेरे घर का वही आँगन था।

वही पीपल का पेड़।

वही दीवार।

वही जगह।

और तस्वीर में मेरी लाश

ठीक उसी स्थान पर पड़ी थी

जहाँ मैं खड़ा था।

मेरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।


🔹 


मैं तुरंत अंदर भागा।

आईने के सामने खड़ा हुआ।

चेहरा देखा।

फिर तस्वीर।

फिर आईना।

कोई शक नहीं।

कोई समानता नहीं।

सटीक मिलान।


🔹 


अगली सुबह

मैं गाँव के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के पास गया।

मैंने उनसे पूछा:

“इस घर में पहले कौन रहता था?”

उनका चेहरा गंभीर हो गया।

उन्होंने धीरे से कहा:

“बहुत साल पहले एक लड़का रहता था।”

“एक दिन अचानक मर गया।”

मैंने पूछा:

“कैसे?”

उन्होंने कहा:

“सुबह लोग आए तो वह आँगन में पड़ा था।”

मैंने पूछा:

“यहीं?”

उन्होंने बस मेरे घर की ओर इशारा कर दिया।


🔹 


मैं कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाया।

फिर धीरे से पूछा:

“कोई वजह?”

उन्होंने कहा:

“कोई नहीं जान पाया।”


🔹 

Subah ki roshni mein khali bed, zameen par padi tasveer, aadha khula darwaza, unsettling Indian house interior
Raat khatam ho chuki thi… lekin kahani nahi.


घर लौटकर मैंने तस्वीर निकाली।

इस बार…

चेहरा थोड़ा अलग था।

पर फिर भी…

वह मैं ही था।

जैसे तस्वीर

धीरे-धीरे बदल रही हो।


🔹 आख़री बस नहीं आई


उस रात मैं घर में नहीं रुका।

अगले दिन ही मकान बदल दिया।

फ्रेम वहीं छोड़ दिया।

उसे छूने की भी हिम्मत नहीं हुई।

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

लगभग दो महीने बाद…

मेरे फोन पर एक अनजान इमेज आई।

कोई नंबर नहीं।

कोई नाम नहीं।

बस एक तस्वीर।

मैंने खोली।

और…

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

वह वही तस्वीर थी।

पर इस बार…

लाश का चेहरा

मेरे वर्तमान चेहरे जैसा था।

जैसा मैं उस समय दिखता था।

और सबसे भयावह बात…

तस्वीर के नीचे एक हल्का सा प्रतिबिंब था।

जैसे किसी ने मोबाइल स्क्रीन की फोटो ली हो।

और उस प्रतिबिंब में…

एक हाथ दिखाई दे रहा था।

मोबाइल पकड़े हुए।

और वह हाथ…

मेरा ही लग रहा था।


🔹 


आज तक मुझे समझ नहीं आया:

👉 क्या तस्वीर पहले से बनी हुई थी?

👉 या वह धीरे-धीरे बदल रही थी?

👉 क्या वह लड़का

किसी और को “replace” कर रहा था?

👉 या…

👉 क्या तस्वीर कभी मेरे फोन पर आई ही नहीं…

और मैंने खुद ही क्लिक की?

अगर तुम मेरी जगह होते तो क्या करते?


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