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| सब कुछ सामान्य दिखता है… पर अंधेरा हमेशा खाली नहीं होता। |
सुबहें अक्सर एक जैसी होती हैं।
अलार्म बजता है।
आँख खुलती है।
मन नहीं करता, फिर भी उठना पड़ता है।
जीवन का अधिकांश हिस्सा इसी मजबूरी का नाम है।
मेरी सुबह भी वैसी ही थी।
मोबाइल का अलार्म तीसरी बार स्नूज़ करने के बाद आखिरकार मैं उठ बैठा। खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। बाहर सड़क पर दूधवाले की साइकिल की घंटी, पास के मंदिर की आरती, और नीचे गली में खेलते बच्चों की आवाज़ — सब कुछ सामान्य।
मैंने ब्रश किया, चाय बनाई, और आदतन खिड़की के पास खड़ा होकर सड़क देखने लगा।
हर दिन वही लोग।
वही रूटीन।
वही चेहरे।
ज़िंदगी चल रही थी… बिना किसी खास बात के।
मैं एक साधारण आदमी हूँ।
आदित्य कुमार
एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी है, शाम को घर, कभी-कभी दोस्तों से मुलाकात, और बाकी समय मोबाइल या किताबों में खो जाना।
ज़िंदगी… सीधी, शांत, व्यवस्थित।
या कम से कम… मुझे ऐसा ही लगता था।
उस दिन भी ऑफिस वैसा ही था।
ईमेल्स, मीटिंग्स, और बेवजह की चर्चाएँ। दोपहर तक दिमाग बोझिल हो चुका था।
“आज कुछ अजीब लग रहा है…”
मेरे सामने बैठे रवि ने अचानक कहा।
“क्या?”
“पता नहीं… बस अजीब-सा।”
मैं हँस पड़ा।
“सोमवार है। सबको अजीब लगता है।”
वह भी हल्का मुस्कुराया, लेकिन उसकी आँखों में बेचैनी थी।
तब मैंने ध्यान नहीं दिया।
हम अक्सर छोटी बातों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
और डर भी… अक्सर वहीं छुपा होता है।
उस शाम को मैं घर लौटा।
दरवाज़ा खोला।
लेकिन…
अंदर एक अजीब-सी खामोशी थी।
जैसे कमरे ने साँस रोक रखी हो।
मैंने पंखा चालू किया। टीवी ऑन किया। आवाज़ें लौट आईं।
"ओवरथिंक मत कर।"
मैंने खुद को समझाया।
दिन गुजरते गए।
सब सामान्य।
लेकिन कुछ बहुत सूक्ष्म बदलने लगा था।
ऐसी चीज़ें… जिन्हें शब्दों में पकड़ना मुश्किल होता है।
पहला बदलाव —
मैं अचानक रात में जागने लगा।
अचानक ही आँख खुल जाती।
जैसे किसी ने जगाया हो।
दूसरा बदलाव —
कभी-कभी कमरे में अकेला होते हुए भी लगता…
कोई है।
जैसे कोई मौजूद हो वहा।
तीसरा बदलाव —
खिड़की अक्सर हल्की-हल्की हिलती।
हवा नहीं होती।
फिर भी।
मैंने ध्यान नहीं दिया।
ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।
वही रूटीन।
लेकिन अब भीतर कहीं…
एक अदृश्य असहजता पनपने लगी थी।
फिर…
वह रात आई।
जिसने सब कुछ बदल दिया।
उस दिन ऑफिस से लौटते-लौटते देर हो गई थी।
शरीर थका हुआ। दिमाग खाली।
मैंने खाना खाया, लाइट बंद की, और बिस्तर पर लेट गया।
कमरे में हल्का अंधेरा था।
सड़क की रोशनी फर्श पर फैल रही थी।
घड़ी में १.५० बज रहे थे।
आँख अचानक खुली।
इस बार एहसास पहले से अलग था।
गहरा।
भारी।
कमरे में हवा असामान्य रूप से ठंडी थी।
और…
स्पष्ट।
बहुत स्पष्ट।
कोई था, मैंने महसूस किया
दिल की धड़कन तेज हो गई।
मैंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
अंधेरा था और सब तरफ खामोशी।
पर कुछ भी नहीं।
फिर…
“आदित्य”
एक आवाज़।
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| कुछ आवाज़ें सुनी नहीं जातीं… महसूस की जाती हैं। |
इतनी धीमी कि पहले लगा भ्रम है।
मैंने ध्यान से सुना।
खामोशी।
और फिर…
बहुत स्पष्ट।
बहुत पास से।
“आदित्य…”
मेरा नाम।
मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।
आवाज़ बाहर से नहीं आई थी।
कमरे से आई थी।
मैं झटके से उठ बैठा।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
लेकिन अब…
कमरे का माहौल बदल चुका था।
जैसे हवा भारी हो गई हो।
मैंने मोबाइल उठाया।
फ्लैशलाइट ऑन की।
रोशनी कमरे में घूमी।
कहीं कुछ नहीं था।
मैंने राहत की साँस ली।
"माइंड गेम। बस माइंड गेम।"
मोबाइल नीचे रखा।
लेटने ही वाला था कि…
फिर वही आवाज़।
इस बार…
मेरे बिल्कुल पीछे से।
“आदित्य…”
मेरी सांस अटक गई।
मोबाइल हाथ से गिर पड़ा।
फ्लैशलाइट घूमती हुई फर्श पर गिर गई।
अजीब टेढ़ी रोशनी कमरे में फैल गई।
धीरे-धीरे…
बहुत धीरे…
मैंने गर्दन घुमाई।
मेरी सांसें अटक गई
मेरे पीछे…
बिस्तर के ठीक पास…
अंधेरे में…
कुछ खड़ा था।
वह कोई स्पष्ट आकृति नहीं थी।
जैसे अंधेरा खुद आकार ले चुका हो।
मानव जैसा… लेकिन मानव नहीं।
मैं हिल नहीं पा रहा था।
शरीर जैसे पत्थर।
वह झुका।
बहुत धीरे।
उसका चेहरा मेरे चेहरे के करीब आया।
और उसने…
एक अजीब, ठंडी मुस्कान के साथ कहा —
“तुम सुन सकते हो…”
मेरे दिमाग में झटका।
"क्या?"
कमरे का अंधेरा गहरा होने लगा।
रोशनी सिकुड़ती हुई।
जैसे प्रकाश डर रहा हो।
“तुमने मुझे पहले भी सुना है…”
यादें हिलने लगीं।
पुरानी धुंधली सी
बचपन की
मेरा पुराना घर।
वह रातें, घर का वह
खाली कमरा।
जहाँ अक्सर लगता…
कोई नाम पुकार रहा है।
“मैं हमेशा था…”
अब उसकी आवाज़ हर तरफ थी।
दीवारों में।
हवा में।
मेरे भीतर।
“तुम बस बड़े हो गए…”
मुझे लगा कमरे की दीवारें करीब आ रही हैं।
मेरी सांस भारी हो गई थी।
“अब तुम फिर सुन रहे हो…”
और तभी…
मेरे ही गले से…
मेरी ही आवाज़…
निकली —
“आदित्य…”
मैं अंदर तक जम गया।
मैंने नहीं बोला था।
वह और मुस्कुराया।
“अब तुम्हारी आवाज़ भी मेरी है…”
अंधेरा अचानक पूरा कमरे पर गिर पड़ा।
पूर्ण।
दमघोंटू।
जीवित अंधेरा।
मुझे महसूस हुआ…
कोई मेरे भीतर उतर रहा है।
और फिर…
सब शांत।
सुबह हुई और
अलार्म बजा।
मैं उठा... खिड़की की तरफ देखा
वही सड़क की आवाज़ें।
मैं बिस्तर पर बैठा था।
थोड़ा थका हुआ था।
लेकिन… अजीब तरह से शांत।
मैं उठा और आईने में देखा।
मैं खुद को ही देखता रहा। मैं ठीक था
लेकिन…
मेरी मुस्कान…
थोड़ी अलग थी।
उस दिन ऑफिस गया।
रवि ने मुझे देखा तो
कुछ देर तक घूरता रहा।
“क्या हुआ?” मैने पूछा
वह धीमे बोला —
“तू… ठीक है ना?”
“हाँ। क्यों?”
वह असहज हुआ।
“पता नहीं… बस…”
मैं मुस्कुरा दिया।
उसने नज़रें फेर लीं।
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| डर तब शुरू होता है… जब आपका चेहरा आपका नहीं रहता। |
आज मेरी ज़िन्दगी वैसे ही चल रही है
जैसे पहले थी।
पर मुझे अब तक समझ नहीं आया
उस दिन आखिर क्या हुवा था।
क्या वह घटना सच में मेरे साथ हुई थी
या वह मेरा सिर्फ एक वहम था।


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