रात काफी गहरी हो चुकी थी।
गाँव से बाहर जाने वाली सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। दोनों तरफ घने पेड़ खड़े थे और उनके बीच से आती ठंडी हवा सूखे पत्तों को सड़क पर घसीट रही थी।
सर्र... सर्र...
दूर कहीं झींगुर लगातार बोल रहे थे।
बाकी सब तरफ इतना सन्नाटा था कि साइकिल के पहिए की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी।
एक आदमी अकेला साइकिल चलाते हुए उस रास्ते से गुजर रहा था।
उसका नाम श्री था।
वह पास के कस्बे से काम खत्म करके अपने गाँव लौट रहा था। गाँव तक पहुँचने में अभी काफी रास्ता बाकी था, लेकिन यह रास्ता उसके लिए नया नहीं था। वह कई बार रात में इसी रास्ते से गुजर चुका था।
साइकिल की छोटी-सी घंटी हवा के साथ कभी-कभी अपने आप हिल जाती।
टिन...
श्री ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
सड़क खाली थी।
उसने फिर पैडल चलाना शुरू किया।
कुछ ही दूर गया था कि अचानक—
खड़ाक!
साइकिल का पैडल घूमना बंद हो गया।
श्री ने साइकिल रोककर नीचे देखा।
चेन उतर गई थी।
“अरे यार...”
उसने साइकिल सड़क के किनारे खड़ी की और नीचे बैठ गया।
अंधेरा काफी था। उसने जेब से मोबाइल निकाला और उसकी रोशनी में चेन देखने लगा।
तभी...
छन... छन...
श्री के हाथ रुक गए।
उसने सिर उठाया।
आवाज़ सड़क के दूसरी तरफ से आई थी।
जैसे किसी के पैरों में पायल हो।
वह कुछ क्षण चुपचाप सुनता रहा।
फिर...
छन... छन...
इस बार आवाज़ थोड़ी साफ थी।
श्री ने मोबाइल की रोशनी इधर-उधर घुमाई।
पेड़।
झाड़ियाँ।
खाली सड़क।
कोई नहीं।
उसने खुद को समझाया कि शायद हवा से किसी पेड़ की टहनी हिली होगी।
वह फिर चेन ठीक करने लगा।
लेकिन अब उसके हाथ जल्दी-जल्दी चल रहे थे।
चेन हाथ में तेल छोड़ रही थी।
उसने एक बार फिर पीछे देखा।
कुछ नहीं।
“बस हो गई...”
उसने चेन चढ़ाई, साइकिल उठाई और तुरंत वहाँ से निकल पड़ा।
कुछ दूर तक वह तेज पैडल मारता रहा।
फिर धीरे-धीरे उसकी बेचैनी कम होने लगी।
सड़क अब भी सुनसान थी।
तभी सामने उसे कोई दिखाई दिया।
पहले उसे लगा कोई गाँव की औरत होगी।
लेकिन जैसे-जैसे वह पास पहुँचा, उसकी रफ्तार अपने आप कम हो गई।
सड़क के किनारे एक जवान लड़की खड़ी थी।
उसने पुराने जमाने जैसी लंबी पोशाक पहन रखी थी।
कपड़े साफ थे, लेकिन उनका अंदाज आज के कपड़ों जैसा बिल्कुल नहीं था।
उसके लंबे बाल खुले हुए थे।
और चेहरा...
श्री कुछ पल के लिए उसे देखता ही रह गया।
इतनी रात में...
इतने सुनसान रास्ते पर...
![]() |
| सुनसान जंगल के रास्ते पर बाइक खराब होने के बाद एक युवक की मुलाकात एक रहस्यमयी खूबसूरत लड़की से होती है। |
इतनी खूबसूरत लड़की अकेली खड़ी थी।
लड़की ने उसकी तरफ देखा।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—
“भैया...”
श्री ने साइकिल रोक दी।
“जी?”
लड़की कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली,
“क्या आप मुझे थोड़ा आगे तक छोड़ देंगे?”
श्री ने चारों तरफ देखा।
“आप यहाँ अकेली क्या कर रही हैं?”
लड़की ने नजरें झुका लीं।
“मेरे पिता बहुत बीमार हैं। उन्हें अस्पताल लेकर गई थी।”
उसकी आवाज़ में घबराहट थी।
“अस्पताल से लौटते समय देर हो गई। अब घर तक अकेले जाने में डर लग रहा है।”
श्री को उस पर दया आ गई।
“आपका घर कितनी दूर है?”
लड़की ने सड़क के आगे की तरफ इशारा किया।
“बस... थोड़ी दूर।”
श्री ने साइकिल की तरफ देखा।
फिर लड़की की तरफ।
“ठीक है। आप आगे चलिए।”
लड़की हल्का-सा मुस्कुराई।
“धन्यवाद।”
वह आगे चलने लगी।
श्री साइकिल लेकर उसके पीछे हो लिया।
रस्ते के दोनों तरफ पेड़ थे।
श्री कभी लड़की को देखता, कभी रास्ते को।
कुछ देर बाद उसने पूछा,
“आपका गाँव कौन सा है?”
लड़की ने बिना पीछे देखे कहा,
“आगे।”
श्री ने फिर कुछ नहीं पूछा।
कुछ मिनट और बीत गए।
फिर उसे लगा कि वे काफी दूर आ चुके हैं।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
जहाँ से वे आए थे, वहाँ अब सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।
अंधेरा था।
सिर्फ पेड़।
उसने सामने देखा।
लड़की अब भी उसी रफ्तार से चल रही थी।
श्री ने साइकिल थोड़ा तेज की।
“सुनिए...”
लड़की रुकी नहीं।
“आपका घर अभी कितनी दूर है?”
“बस... थोड़ा आगे।”
वही जवाब।
श्री ने घड़ी देखी।
रात के दो बज चुके थे।
उसे बेचैनी होने लगी।
इतनी देर में तो वे काफी दूर आ चुके थे।
फिर भी घर क्यों नहीं आया?
वह कुछ और पूछने ही वाला था कि उसके कानों में फिर वही आवाज़ पड़ी—
छन... छन...
श्री ने गर्दन घुमाई।
इस बार आवाज़ लड़की के पैरों से आ रही थी।
लेकिन लड़की ने पायल पहनी ही नहीं थी।
वह वहीं रुक गया।
लड़की भी धीरे-धीरे रुक गई।
फिर उसने बिना मुड़े पूछा—
“क्या हुआ?”
श्री ने उसकी तरफ देखा।
कुछ कहना चाहा...
लेकिन शब्द गले में अटक गए।
क्योंकि अब उसे पहली बार एहसास हुआ था—
वे सड़क पर नहीं चल रहे थे।
उनके चारों तरफ सड़क नहीं...
घना जंगल था।
और जितनी दूर तक उसकी नजर जा रही थी...
सिर्फ पेड़ ही पेड़ दिखाई दे रहे थे।
श्री कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा।
उसकी नजर सामने खड़ी लड़की पर थी।
अब उसे साफ लग रहा था कि कुछ गड़बड़ है।
उसने साइकिल का हैंडल कसकर पकड़ लिया।
“आप... आप यहीं से चली जाइए।”
लड़की चुप रही।
श्री ने गला साफ किया।
“मैं खुद अपने घर जा रहा हूँ।”
कोई जवाब नहीं।
वह थोड़ा पीछे हुआ।
“मुझे देर हो रही है।”
कुछ क्षण बाद लड़की ने धीरे से कहा—
“इतनी जल्दी क्या है?”
श्री के कदम वहीं रुक गए।
आवाज़...
वही थी।
लेकिन अब उसमें पहले जैसी मिठास नहीं थी।
उस आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसे सुनकर उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
लड़की धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ी।
श्री की आँखें फैल गईं।
जिस खूबसूरत चेहरे को देखकर वह कुछ देर पहले उसकी मदद करने के लिए रुका था...
वह चेहरा अब वह नहीं था।
त्वचा जगह-जगह से काली पड़ चुकी थी।
आँखें अस्वाभाविक रूप से बड़ी और गहरी थीं।
होंठ फटे हुए थे।
और उसके मुँह से एक लंबी, काली जीभ बाहर निकलकर ठोड़ी तक लटक रही थी।
श्री के मुँह से चीख निकल गई।
“आऽऽऽ!”
वह पीछे की ओर लड़खड़ाया।
उसका पैर जड़ से टकराया और वह जमीन पर गिर पड़ा।
साइकिल उसके हाथ से छूटकर एक तरफ जा गिरी।
श्री किसी तरह उठा और जंगल के भीतर भागने लगा।
उसे अब रास्ते की कोई परवाह नहीं थी।
बस भागना था।
पीछे से फिर वही आवाज़ आई—
छन... छन... छन...
लेकिन अब वह आवाज़ किसी एक दिशा से नहीं आ रही थी।
कभी दाईं तरफ से...
कभी बाईं तरफ से...
कभी बिल्कुल उसके पीछे से।
श्री पूरी ताकत से भागता रहा।
काँटेदार झाड़ियों ने उसके कपड़े फाड़ दिए।
पेड़ों की शाखाएँ उसके चेहरे से टकराईं।
एक बार वह गिरते-गिरते बचा।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं था।
वह और तेज भागा।
लेकिन कुछ ही देर बाद उसके कदम रुक गए।
सामने वही पेड़ था जिसके तने पर उसने कुछ देर पहले हाथ मारा था।
वह गोल-गोल घूमकर फिर वहीं आ गया था।
उसने घबराकर दूसरी दिशा में दौड़ना शुरू किया।
कुछ कदम बाद...
वही पेड़।
वही मोटी जड़।
वही अंधेरा।
श्री की साँस फूलने लगी।
“नहीं...”
उसने चारों तरफ देखा।
“कोई है?”
जंगल ने कोई जवाब नहीं दिया।
सिर्फ झींगुरों की आवाज़।
फिर अचानक...
छन...
एक पायल बजी।
श्री सामने देखने लगा।
अंधेरे में दो चमकती हुई आँखें दिखाई दीं।
फिर वह चेहरा धीरे-धीरे पेड़ों के बीच से बाहर आया।
वही लड़की।
लेकिन अब उसका चेहरा पहले से भी ज्यादा भयानक था।
उसके बाल हवा में नहीं...
जैसे पानी के भीतर तैर रहे हों।
उसकी गर्दन एक तरफ झुकी हुई थी।
और वह बिना पैर उठाए धीरे-धीरे श्री की ओर बढ़ रही थी।
श्री पीछे हटता गया।
“नहीं... मेरे पास मत आना...”
वह मुस्कुराई।
उसके मुँह से फिर वही लंबी जीभ बाहर निकली।
उसने सिर थोड़ा झुकाया।
“तुम तो मुझे घर छोड़ने आए थे...”
श्री का शरीर काँपने लगा।
“तुम... कौन हो?”
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
बस एक कदम और आगे बढ़ी।
छन... छन...
फिर दूसरा।
छन... छन...
श्री अचानक मुड़ा और पूरी ताकत से भागने लगा।
लेकिन इस बार उसके सामने कोई रास्ता नहीं था।
सिर्फ एक गहरी खाई।
वह रुकते-रुकते बचा।
पीछे से पायल की आवाज़ बिल्कुल उसके कान के पास सुनाई दी।
छन...
श्री ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
वह उसके ठीक पीछे खड़ी थी।
उसका चेहरा श्री के चेहरे से कुछ इंच दूर था।
और उसकी काली आँखों में अब कोई इंसानी भाव नहीं था।
श्री चीख पड़ा।
उसकी चीख ने पूरे जंगल को हिला दिया।
पेड़ों पर बैठे पक्षी अचानक फड़फड़ाकर उड़ गए।
झाड़ियों में छिपे जानवर भागने लगे।
कुछ ही क्षणों में जंगल फिर शांत हो गया।
बहुत शांत।
जैसे वहाँ कुछ हुआ ही न हो।
सिर्फ जमीन पर पड़ी श्री की साइकिल...
और उसके पास पड़ा एक जूता...
अंधेरे में रह गए।
सुबह होने तक उस जंगल पर धुंध की हल्की चादर बिछी रही।
सूरज निकलने के बाद गाँव के लोग हमेशा की तरह अपने काम में लग गए।
किसी को पता नहीं था कि पिछली रात जंगल में क्या हुआ।
लेकिन सुबह करीब आठ बजे...
सड़क से गुजर रहे एक चरवाहे की नजर झाड़ियों में पड़ी।
वहाँ एक साइकिल पड़ी थी।
उसकी चेन फिर से उतर गई थी।
और उसके पास...
गीली मिट्टी पर पैरों के निशान बने थे।
एक आदमी के नहीं।
एक औरत के।
वे निशान जंगल से निकलकर सड़क तक आए थे...
और फिर अचानक वहीं खत्म हो गए।
...
श्री के गायब होने के बाद मदनापुर में डर का माहौल और गहरा गया था।
पिछले एक महीने में यह चौथी घटना थी।
चारों बार जवान आदमी रात के समय उसी रास्ते से गायब हुए थे।
श्री गाँव का ही रहने वाला था और पेशे से बढ़ई था। रोज शाम तक अपना काम निपटाकर वह घर लौट आता था, लेकिन उस दिन एक ग्राहक का काम ज्यादा देर तक चलता रहा। घर पहुँचने में देर हो गई और उसने हमेशा वाला रास्ता पकड़ लिया।
फिर वह वापस नहीं आया।
सुबह उसकी साइकिल जंगल के किनारे मिली
गाँव वालों ने जंगल का कोना-कोना छान डाला, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।
अब गाँव में तरह-तरह की बातें होने लगी थीं।
कोई कहता—
“जंगल में कोई खूंखार जानवर आ गया है।”
कोई कहता—
“जानवर होता तो शरीर मिलता।”
कुछ लोग इसे भूत-प्रेत का मामला बताते।
लेकिन किसी के पास कोई पक्का जवाब नहीं था।
बस एक बात सबको परेशान कर रही थी।
हर बार आदमी उसी सुनसान रास्ते से गायब हो रहा था।
मदनापुर की औरतों ने अपने बच्चों को शाम के बाद घर से बाहर निकलने देना बंद कर दिया था।
मर्द भी कोशिश करते कि अंधेरा होने से पहले घर लौट आएँ।
जिस रास्ते से पहले रात में भी लोग बेखौफ आते-जाते थे, अब सूरज डूबते ही सुनसान हो जाता।
लेकिन जिंदगी हमेशा डर के हिसाब से नहीं चलती।
उस रात भी एक जवान लड़का बाइक लेकर उसी रास्ते से गुजर रहा था।
उसे शायद पता नहीं था
कि जिस रास्ते से वह जा रहा है...
वहीं कुछ उसका इंतजार कर रहा था।
---
रात काफी हो चुकी थी।
आसमान में बादल छाए थे और चाँद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता।
बाइक की हेडलाइट सड़क का एक छोटा-सा हिस्सा रोशन कर रही थी।
बाकी सब तरफ घना अंधेरा था।
दूर पेड़ों के बीच से झींगुरों की आवाज़ लगातार आ रही थी।
झीं... झीं... झीं...
लड़का सावधानी से बाइक चला रहा था।
तभी अचानक बाइक झटके से बंद हो गई।
उसने दोबारा स्टार्ट करने की कोशिश की।
इंजन ने बस हल्की-सी आवाज़ की और फिर शांत हो गया।
लड़के ने बाइक सड़क के किनारे खड़ी की।
उसने नीचे झुककर देखने की कोशिश की कि खराबी कहाँ है।
तभी...
छन... छन...
उसके हाथ रुक गए।
वह सीधा खड़ा हुआ।
आवाज़ जंगल की तरफ से आई थी।
उसने उधर देखा।
अंधारे मे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर वही आवाज़।
छन... छन...
इस बार सड़क के दूसरी तरफ से।
लड़के ने कुछ क्षण ध्यान से सुना।
फिर उसकी नजर सामने पड़ी।
हेडलाइट की हल्की रोशनी से कुछ दूरी पर एक लड़की खड़ी थी।
पुराने जमाने के कपड़े...
लंबे खुले बाल...
और ऐसा चेहरा, जिसे देखकर कुछ पल के लिए आदमी अपनी परेशानी भूल जाए।
लडका बडा हैराण हो गया... इतनी सुनसान जगह वह भी रात मे .. वह उसके पास गया
“आप कोण है जो इतनी रात को अकेली या खडी हैं?”
लड़की ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे घर जाना है।”
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
लड़के ने पूछा,
कोई साथ नहीं
“कोई साथ नहीं हैं.."
"नाही"
घर कहाँ है आपका?”
लड़की ने सामने जंगल की तरफ इशारा किया।
“आगे।”
लड़के ने बाइक की तरफ देखा।
“मेरी बाइक खराब हो गई है। मैं भी यहीं फँस गया हूँ।”
लड़की कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली,
“आप मेरे साथ चलिए।”
लड़के ने उसे देखा।
“कहाँ?”
“मेरा घर पास ही है।”
लड़के ने आसपास देखा।
सड़क सुनसान थी।
उसने सोचा, शायद गाँव का कोई पुराना रास्ता होगा।
वह बाइक वहीं छोड़कर लड़की के पीछे चल पड़ा।
शुरुआत में रास्ता बिल्कुल सामान्य था।
दोनों कुछ दूर तक चुपचाप चलते रहे।
लड़का कभी लड़की को देखता, कभी सामने रास्ते को।
कुछ देर बाद उसने पूछा,
“आपके घर में कौन-कौन है?”
लड़की ने जवाब नहीं दिया।
लड़के ने दोबारा पूछा।
“आप सुन रही हैं?”
लड़की चलती रही।
कुछ कदम आगे जाकर वह रुकी।
फिर बिना पीछे देखे बोली—
“बस... थोड़ा आगे।”
लड़का उसके पीछे चलता रहा।
लेकिन अब उसे कुछ अजीब लगने लगा था।
रास्ता खत्म ही नहीं हो रहा था।
उसने पीछे देखा।
बाइक की हेडलाइट अब दिखाई नहीं दे रही थी।
चारों तरफ पेड़ थे।
लड़के के कदम धीमे पड़ गए।
“आपका घर आखिर है कहाँ?”
इस बार लड़की रुक गई।
कुछ देर तक पीठ उसकी तरफ किए खड़ी रही।
फिर धीरे-धीरे उसकी गर्दन घूमी।
लड़के की नजर उसके चेहरे पर पड़ी।
और अगले ही पल...
उसका पूरा शरीर जैसे जम गया।
वह खूबसूरत चेहरा गायब हो चुका था।
उसका चेहरा अब काला और सड़ा हुआ था।
आँखें गहरी, काली और अस्वाभाविक रूप से खुली हुई थीं।
उसके होंठों के बीच से एक लंबी, काली जीभ बाहर निकल आई।
लड़का बस उसे देखता रहा।
यक्षिणी ने अपना मुँह और फैलाया।
फिर एक ऐसी चीख मारी कि पूरा जंगल काँप उठा।
पेड़ों पर बैठे पक्षी अचानक उड़ गए।
झाड़ियों में हलचल मच गई।
लेकिन...
लड़का
वह वहीं खड़ा रहा।
यक्षिणी उसकी तरफ बढ़ी।
उसकी चाल अब इंसान जैसी नहीं थी।
शरीर एक अजीब लय में झूल रहा था।
जीभ बाहर लटक रही थी।
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| जंगल की गहराई में खूबसूरत लड़की का असली रूप सामने आता है, लेकिन युवक उसके सामने बिल्कुल शांत खड़ा रहता है। |
वह लड़के के बिल्कुल सामने आकर रुक गई।
उसकी आँखें शिकार को परख रही थीं।
जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देखकर आश्वस्त हो रहा हो कि अब उसके बचने का कोई रास्ता नहीं।
लेकिन तभी...
यक्षिणी के चेहरे पर बेचैनी दिखाई दी।
लड़का उसकी ओर एक कदम बढ़ा।
तभी वह तड़पने लगी।
उसका शरीर ऐंठने लगा।
वह जमीन पर बैठ गई और दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया।
लड़का उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।
उसके होंठ लगातार हिल रहे थे।
वह धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में मंत्र पढ़ रहा था।
यक्षिणी ने उसे देखा।
अब उसके चेहरे पर पहली बार डर था।
उसे समझ आ चुका था—
यह कोई साधारण लड़का नहीं था।
मंत्रों की आवाज़ बढ़ती गई।
यक्षिणी अचानक उठी और पीछे हटने लगी।
फिर एक झटके में वह अंधेरे में गायब हो गई।
जंगल फिर शांत हो गया।
लड़का वहीं खड़ा था।
उसने चारों तरफ देखा।
चारो तरफ सन्नाटा पसरा था.. घहरी शांती..
लडका बिल्कुल सतर्क रहा।
फिर उसने गहरी साँस ली।
लेकिन तभी...
पीछे से किसी ने उस पर हमला किया।
वह जोर से जमीन पर गिरा।
अगले ही पल यक्षिणी उसके ऊपर थी।
उसके हाथ ने लड़के का गला पकड़ लिया।
उसने उसे जमीन से उठाकर हवा में टांग दिया।
लड़के के पैर हवा में झूलने लगे।
यक्षिणी का चेहरा अब और भयानक हो चुका था।
वह धीरे-धीरे अपना चेहरा उसके बिल्कुल पास ले आई।
उसकी काली आँखें लड़के की आँखों में गड़ गईं।
लंबी जीभ उसके मुँह से बाहर निकली।
वह लड़के के चेहरे तक पहुँची।
और उसने उसे चाटा।
लड़के का चेहरा तन गया।
यक्षिणी उसे निगल जाने जैसी भूख से देख रही थी।
तभी लड़के ने अचानक अपना हाथ उठाया।
और अपनी उँगली यक्षिणी की आँख मे डाल दी।
यक्षिणी एक भयानक चीख के साथ पीछे हटी।
लड़का जमीन पर गिरा, लेकिन तुरंत उठ गया।
उसने अपनी उँगली से जमीन पर एक घेरा बनाना शुरू किया।
मिट्टी पर पहला चक्र बना।
फिर दूसरा।
फिर उसने उस घेरे के भीतर खड़े होकर मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया।
इस बार उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज्यादा तेज थी।
यक्षिणी उस घेरे की ओर झपटी।
लेकिन जैसे ही वह सीमा के पास पहुँची...
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| पवित्र मंत्रों और साधना से युवक यक्षिणी की शक्ति को रोक देता है और उसके आतंक का अंत करता है। |
वह पीछे फेंक दी गई।
उसने दूसरी दिशा से निकलने की कोशिश की।
फिर वही हुआ।
वह तड़पने लगी।
उसकी चीखें पूरे जंगल में गूँजने लगीं।
लड़का मंत्र पढ़ता रहा।
यक्षिणी का शरीर काँपने लगा।
उसकी त्वचा से धुआँ उठने लगा।
फिर धुआँ बढ़ता गया।
उसकी चीख धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
और देखते ही देखते...
उसका पूरा शरीर आग की लपटों में घिर गया।
कुछ ही क्षणों में वह राख बनकर जमीन पर गिर गई।
फिर...
सब शांत हो गया।
लड़का कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा।
उसने चारों तरफ देखा।
जंगल बिल्कुल शांत था
सिर्फ रात के झींगुर फिर से बोलने लगे थे।
झीं... झीं... झीं...
अगली सुबह मदनापुर में पहली बार लोगों के चेहरों पर डर की जगह राहत दिखाई दे रही थी।
जंगल में रात को जो हुआ था, उसकी खबर पूरे गाँव में फैल गई।
श्री और बाकी जवान पुरुषों की मौत के पीछे एक यक्षिणी थी। इस बात से वह हैरान थे...
और सबसे बड़ी बात...की
अब वह खत्म हो चुकी थी।
गाँव वाले उस जवान लड़के को घेरकर खड़े थे।
सब उसकी हिम्मत की तारीफ कर रहे थे।
तभी गाँव के मंदिर के पुजारी वहाँ पहुँचे।
उन्होंने लड़के को देखा और कुछ नहीं कहा।
बस उसके कंधे पर हाथ रखा।
अब गाँव वालों को समझ आया कि वह लड़का कौन था।
वह मदनापुर के पुजारी का बेटा था।
कई वर्षों से वह गाँव से बाहर एक गुरुकुल में रहकर वेद-मंत्र और प्राचीन साधनाओं की शिक्षा ले रहा था।
पिछले कुछ दिनों से गाँव में हो रही घटनाओं की खबर उसके पिता तक पहुँच रही थी।
पुजारी को पहले ही संदेह हो गया था कि यह किसी जानवर का काम नहीं है।
उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उन्हें डर था कि अगर गाँव में यक्षिणी की खबर फैल गई, तो लोग घबरा जायेंगे।
उन्होंने सिर्फ अपने बेटे को संदेश भेजा था।
और उसने भी आने का वाद किया था...और वह सिर्फ आया नहीं बल्की गाव को यक्षिणी से मुक्त किया था..
जब सुबह वह राख पड़े स्थान पर वापस गया...
तो उसे मिट्टी में कुछ दिखाई दिया।
राख के बीच एक छोटी-सी पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।
उसने उसे उठाया।
पायल को देखते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया।
क्योंकि उसके पिता ने गुरुकुल भेजने से बहुत पहले उसे एक पुरानी बात बताई थी—
मदनापुर के उस जंगल में कभी एक स्त्री रहती थी...
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