पुराना बंगला--एक अधूरे वादे की खौफनाक कहानी

 


रात के साढ़े दस बज रहे थे।


"बस, एक चाल और।" गंगाधर ने मुस्कुराते हुए शतरंज का घोड़ा आगे बढ़ाया।


"तू हर बार यही बोलता है। पिछली बार भी यही कहा था, फिर आधे घंटे तक हार नहीं मानी थी।" अविनाश ने चाय का कप उठाते हुए जवाब दिया।


बाहर हल्की बारिश हो रही थी। सड़क लगभग खाली हो चुकी थी। दुकान के बाहर लगी पीली बत्ती पर छोटे-छोटे कीड़े मंडरा रहे थे।


तभी बाहर किसी के दौड़ने की आवाज आई।


दोनों ने एक साथ दरवाजे की तरफ देखा।


एक आदमी बारिश में भीगा हुआ तेजी से उनकी दुकान की तरफ आ रहा था। उसकी सांसें बुरी तरह फूल रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह काफी दूर से भागता हुआ आया हो।

बरसात भरी रात में पहाड़ी पर स्थित 100 साल पुराने सावंत बंगले के सामने गंगाधर कांबले, अविनाश देशमुख और दीनू काका खड़े हैं।
आधी रात, घना कोहरा और 100 साल पुराना सावंत बंगला—यहीं से शुरू होती है एक ऐसे रहस्य की कहानी, जो हर 35 साल बाद लौटता है।


"गंगाधर बाबू...!" उसने दरवाजे पर पहुंचते ही कहा, "मुझे आपकी मदद चाहिए।"


अविनाश हंस पड़ा।


"अगर किसी ने उधार नहीं लौटाया है, तो उसके लिए हम कुछ नहीं कर सकते।"


लेकिन आदमी के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। उसके होंठ सूख चुके थे और आंखें बार-बार दरवाजे के बाहर देख रही थीं, जैसे उसे डर हो कि कोई उसके पीछे-पीछे यहां तक आ गया हो।


"मेरी बात मजाक नहीं है साहब..." उसने कांपती आवाज में कहा, "वो... वो फिर से आ गई है।"


गंगाधर ने शतरंज की बिसात से नजर हटाकर पहली बार उसे गौर से देखा।


"बैठ जाइए। पहले सांस तो ठीक कर लीजिए।"


आदमी कुर्सी पर बैठा, लेकिन उसकी नजरें अब भी बाहर सड़क पर टिकी हुई थीं।


अविनाश ने उसके सामने चाय का कप रख दिया।


"नाम?"


"दीनू... लोग दीनू काका कहते हैं।"


"और कौन आ गया है?" अविनाश ने पूछा।


दीनू काका ने चाय के कप को हाथ लगाया, लेकिन उसे उठाया नहीं।


"वो... सफेद कपड़ों वाली औरत।"


कुछ पल तक दुकान में सिर्फ बारिश की आवाज सुनाई देती रही।


अविनाश ने गंगाधर की तरफ देखा और धीरे से बोला, "लगता है आज शतरंज पूरी नहीं होगी।"


गंगाधर ने कोई जवाब नहीं दिया।


"कहां दिखाई देती है?" उसने पूछा।


"सावंत बंगले में।"


गंगाधर के हाथ वहीं रुक गए।


"पहाड़ी वाला बंगला?" अविनाश ने पूछा।


दीनू काका ने सिर हिला दिया।


"मैं वहां पिछले तीस साल से काम कर रहा था। पहले मालिक दीनानाथ सावंत के यहां... अब उनकी बहू और पोती के साथ रहता हूं।"


"और यह औरत सिर्फ तुम्हें दिखाई देती है?"


"नहीं साहब।"


दीनू काका की आवाज और धीमी हो गई।


"जानवी भी उसे देखती है।"


"जानवी?"


"मालिक की पोती। छह साल की है।"


बाहर अचानक बिजली चमकी। दुकान के अंदर एक पल के लिए तेज सफेद रोशनी फैल गई।


दीनू काका ने अपनी जेब से एक छोटी-सी गुलाबी चप्पल निकाली और मेज पर रख दी।


"यह उसकी है।"


गंगाधर ने चप्पल उठाकर देखी। उस पर मिट्टी लगी हुई थी। लेकिन मिट्टी के ऊपर कुछ और भी था।


जैसे किसी ने गीले हाथों से उसे पकड़ रखा हो।


"यह मुझे आज सुबह उसके बिस्तर के नीचे मिली।"


"तो?" अविनाश ने पूछा।


दीनू काका ने धीरे-धीरे उनकी तरफ देखा।


"कल रात जानवी अपने कमरे में सो रही थी। उसकी मां उसके बगल में थी। रात के बारह बजकर तेरह मिनट पर उसकी चीख सुनाई दी।"


दुकान के बाहर हवा तेज हो गई।


"जब हम कमरे में पहुंचे, तो खिड़की खुली हुई थी। जानवी बिस्तर पर बैठी रो रही थी।"


"उसने क्या कहा?"


दीनू काका के हाथ कांपने लगे।


"उसने कहा, 'दीनू काका, वो आंटी फिर आई थी। उसने कहा कि इस बार मैं छिप नहीं पाऊंगी।'"


अविनाश की मुस्कान गायब हो चुकी थी।


"बच्चे सपने भी देखते हैं।"


"मैं भी यही सोचता था साहब।"


दीनू काका ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।


तस्वीर में एक बड़ा बंगला था। सामने दीनानाथ सावंत अपने परिवार के साथ खड़े थे।


"यह देखिए।"


गंगाधर तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।


अचानक उसकी नजर तस्वीर के सबसे ऊपर, दूसरी मंजिल की खिड़की पर गई।


वहां कोई खड़ा था।


एक धुंधली-सी आकृति।


लंबे बाल।


सफेद कपड़े।


"यह कौन है?" उसने पूछा।


दीनू काका ने धीरे से सिर हिलाया।


"जब यह तस्वीर खींची गई थी... उस दिन दूसरी मंजिल पर कोई नहीं था।"


दुकान में सन्नाटा छा गया।


"और एक बात और है।"


"क्या?"


"पिछले दो साल में तीन लोग उस बंगले में गए थे।"


"फिर?"


"वापस नहीं आए।"


अविनाश ने गहरी सांस ली।


"पुलिस?"


"तीनों को ढूंढा गया। जंगल, कुएं, आसपास के गांव... सब जगह। लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला।"


तभी दुकान के बाहर से किसी बच्चे के हंसने की आवाज आई।


तीनों एकदम चुप हो गए।


आवाज फिर आई।


इस बार बिल्कुल दरवाजे के पास से।


अविनाश तुरंत उठकर बाहर गया।


सड़क खाली थी।


बारिश पहले की तरह गिर रही थी।


लेकिन दरवाजे के ठीक सामने, पानी से भीगी मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने हुए थे।


नंगे पैर।


वे निशान सड़क से दुकान तक आए थे।


और फिर...


वहीं से वापस मुड़ने के बजाय, दुकान की दीवार की तरफ चले गए थे।


अविनाश कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रहा।


"गंगाधर..."


"हूं?"


"मुझे लगता है, हमारी शतरंज सच में पूरी नहीं होगी।"


गंगाधर धीरे-धीरे दरवाजे तक आया।


उसने नीचे झुककर निशानों को देखा।


फिर बिना कुछ कहे दीनू काका की तरफ मुड़ा।


"सावंत बंगला यहां से कितनी दूर है?"


"करीब पैंतालीस मिनट।"


"ठीक है।"


"आप... आप चलेंगे?"


गंगाधर ने मेज पर पड़ी तस्वीर उठाई और दूसरी मंजिल की खिड़की में खड़ी उस धुंधली आकृति को एक बार फिर देखा।


"नहीं।"


दीनू काका का चेहरा उतर गया।


गंगाधर ने अपनी टॉर्च उठाई और मुस्कुराया।


"हम अभी चलेंगे।"


दीनू काका की पुरानी जीप पहाड़ी रास्ते पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।


रात अब पूरी तरह उतर चुकी थी।


बारिश रुक गई थी, लेकिन पेड़ों से गिरती बूंदें अब भी शीशे पर टकरा रही थीं। जीप की हेडलाइट्स के अलावा चारों तरफ सिर्फ अंधेरा था।


"एक बात पूछूं?" अविनाश ने पीछे बैठे दीनू काका से कहा।


"जी?"


"अगर बंगला इतना ही खतरनाक है, तो आप लोग वहां से चले क्यों नहीं जाते?"


दीनू काका कुछ क्षण चुप रहे।


"क्योंकि हम वहां नहीं रहते।"


"मतलब?"


"पैंतीस साल पहले मालिक ने नया बंगला बनवा लिया था। तब से पुराना बंगला खाली है।"


"तो फिर जानवी को उससे क्या लेना-देना?"


दीनू काका ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, "यही तो मैं समझ नहीं पा रहा हूं।"


करीब आधे घंटे बाद जीप एक लोहे के पुराने फाटक के सामने आकर रुक गई।


गंगाधर ने बाहर उतरकर टॉर्च जलाई।


उनके सामने खड़ा था—सावंत बंगला।


वह उम्मीद से कहीं बड़ा था।


दो मंजिला इमारत। जगह-जगह से उखड़ा हुआ प्लास्टर। बेलों ने दीवारों को लगभग निगल लिया था। दूसरी मंजिल की टूटी खिड़कियां हवा के साथ धीरे-धीरे हिल रही थीं।


और सबसे अजीब बात...


बंगले के ऊपर बैठे कुछ नौवे कौवे बैठे थे जो बिल्कुल बिल्कुल एकदम शांत थे।


"इतनी रात को कौवे?" अविनाश बुदबुदाया।


दीनू काका ने कोई जवाब नहीं दिया।


फाटक खोलते ही उसकी चरमराहट रात के सन्नाटे में बहुत दूर तक गूंज गई।


तीनों अंदर पहुंचे।


मुख्य दरवाजा आधा खुला हुआ था।


"तुमने इसे खुला छोड़ा था?" गंगाधर ने पूछा।


"नहीं साहब। मैं तो पिछले छह महीने से यहां आया भी नहीं।"


अविनाश ने हंसने की कोशिश की।


"अच्छा है। कम से कम हमें दरवाजा तोड़ने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।"


दरवाजा धक्का देते ही खुल गया।


अंदर बासी हवा का एक झोंका आया।


फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी। दीवारों पर अंग्रेजी जमाने की पेंटिंग्स टंगी थीं। एक कोने में खड़ी बड़ी घड़ी बंद पड़ी थी।


गंगाधर ने अपनी टॉर्च की रोशनी घुमाई।


"देख।"


अविनाश ने नीचे देखा।


धूल पर पैरों के निशान थे।


छोटे-छोटे।


जैसे किसी छह-सात साल के बच्चे ने अभी-अभी वहां से होकर गुजरा हो।


"यह मजाक अच्छा नहीं है, दीनू काका।"


"मैं कसम खाता हूं साहब, मैं यहां नहीं आया!"


गंगाधर उन निशानों के पीछे-पीछे चल पड़ा।


वे सीढ़ियों तक गए।


फिर दूसरी मंजिल की ओर मुड़ गए।


अचानक...


ऊपर से किसी चीज के गिरने की जोरदार आवाज आई।


धड़ाम!


दीनू काका डरकर पीछे हट गए।


"साहब, हमें वापस चलना चाहिए।"


"अभी तो आए हैं।" अविनाश ने कहा। "कम से कम मेजबान से मिल तो लें।"


तीनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।


दूसरी मंजिल पर पहुंचते ही गंगाधर रुक गया।


गलियारे के अंत में एक दरवाजा आधा खुला था।


उसके पीछे से हल्की पीली रोशनी बाहर आ रही थी।


"यह कैसे संभव है?" दीनू काका की आवाज कांप रही थी। "यहां तो बिजली भी नहीं है!"


कमरे तक पहुंचकर गंगाधर ने धीरे से दरवाजा खोला।


अंदर एक पुराना बच्चों का कमरा था।


लकड़ी का घोड़ा।


टूटी हुई गुड़िया।


और कमरे के बीचों-बीच एक लालटेन जल रही थी।


"किसी ने अभी इसे जलाया है।" गंगाधर ने कहा।


तभी अविनाश की नजर दीवार पर गई।


वहां दर्जनों तस्वीरें टंगी थीं।


हर तस्वीर में सावंत परिवार था।


लेकिन एक चीज हर तस्वीर में समान थी।


दूसरी मंजिल की खिड़की में खड़ी वही सफेद आकृति।


"गंगाधर..."


"हूं?"


"मुझे लगता है, यह औरत कैमरे की बहुत शौकीन थी।"


तभी...


पीछे से एक बच्ची की आवाज आई।


"आप लोग देर से आए।"


तीनों एक साथ मुड़े।


कमरे के कोने में करीब छह साल की एक बच्ची खड़ी थी।

एक पुराने बंगले के बच्चों के कमरे में जलती लालटेन, लकड़ी का घोड़ा और एक रहस्यमयी बच्ची को देखकर गंगाधर, अविनाश और दीनू काका स्तब्ध खड़े हैं।
दूसरी मंजिल पर मौजूद यह कमरा वर्षों से बंद था, लेकिन उस रात वहां कोई उनका इंतजार कर रहा था।



गीले बाल।


गुलाबी फ्रॉक।


और हाथ में वही चप्पल, जो दीनू काका अपनी जेब में लेकर आए थे।


दीनू काका के मुंह से चीख निकल गई।


"ज... जानवी!"


बच्ची ने धीरे-धीरे सिर टेढ़ा किया।


"मैं जानवी नहीं हूं।"


कमरे की लालटेन अचानक बुझ गई।


पूरा बंगला अंधेरे में डूब गया।


और उसी अंधेरे में किसी औरत की धीमी हंसी गूंजने लगी।


"अब... कोई वापस नहीं जाएगा।"



गंगाधर ने तुरंत टॉर्च जलाई।


कमरा खाली था।


न बच्ची।


न लालटेन।


सिर्फ दीवार पर उंगली से लिखा एक वाक्य—


«"35 साल बाद तुम वापस आ ही गए, गंगाधर।"»


अविनाश ने वह पढ़ा और धीरे से पूछा, "तूने पहले कभी इस जगह के बारे में मुझसे कुछ छिपाया है?"


गंगाधर जवाब देने ही वाला था कि दीनू काका अचानक जमीन पर बैठ गए।


उनकी नजर कमरे के एक पुराने संदूक पर टिक गई थी।


"नहीं..." वह बुदबुदाए, "यह यहां नहीं हो सकता..."


संदूक के ऊपर एक पुरानी तस्वीर रखी थी।


तस्वीर लगभग सत्तर साल पुरानी लग रही थी।


उसमें सावंत बंगले के सामने पांच लोग खड़े थे।


दीनानाथ सावंत।


उनकी पत्नी।


दो नौकर।


और उनके बीच खड़ा एक दस-बारह साल का लड़का।


अविनाश ने तस्वीर उठाई।


"यह बच्चा कौन है?"


दीनू काका की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।


"मुझे नहीं पता..."


"लेकिन इसके नीचे नाम तो लिखा है।"


अविनाश ने तस्वीर के नीचे जमी धूल साफ की।


और जैसे ही उसने नाम पढ़ा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।


तस्वीर के नीचे लिखा था—


«"गंगाधर कांबले - 1951"»


कमरे में कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।


फिर...


गंगाधर ने पहली बार तस्वीर को ध्यान से देखा।


और बहुत धीरे से कहा—


«"यह संभव नहीं है... क्योंकि मेरा जन्म 1978 में हुआ था।"»


उसी समय पूरे बंगले में एक साथ सभी दरवाजे बंद होने की आवाज गूंज उठी।


और दूसरी मंजिल के गलियारे से किसी बच्चे की आवाज आई—


«"दादाजी... आपने आने में बहुत देर कर दी।"»

आवाज गलियारे के बिल्कुल अंत से आई थी।


दीनू काका का शरीर कांप रहा था। अविनाश ने धीरे-से टॉर्च उस तरफ घुमाई।


वहां वही बच्ची खड़ी थी।


गुलाबी फ्रॉक।


गीले बाल।


लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।


वह जानवी नहीं थी।


उसकी आंखें पूरी तरह सफेद थीं।


"मैंने कहा था न..." उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम लोग बहुत देर से आए हो।"


गंगाधर कुछ कदम आगे बढ़ा।


"तुम कौन हो?"


बच्ची की मुस्कान और चौड़ी हो गई।


"तुम मुझे भूल गए?"


इतना कहकर उसने अपना हाथ उठाया और गलियारे के आखिर में लगी सबसे बड़ी पेंटिंग की तरफ इशारा किया।


गंगाधर ने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली।


पेंटिंग में सावंत बंगला बना हुआ था। सामने अंग्रेजी कपड़ों में एक आदमी खड़ा था और उसके बगल में एक छोटी बच्ची।


पेंटिंग के नीचे अंग्रेजी में कुछ लिखा था।


"एलिजा मॉर्गन और उसके पिता - 1926"


"1926..." अविनाश बुदबुदाया, "यानी पूरे सौ साल पहले।"


"करीब-करीब।" पीछे से एक भारी आवाज आई।


तीनों ने पलटकर देखा।


दीनू काका संदूक के पास बैठे थे। उनके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।


"यह दीनानाथ साहब की डायरी है।"


उन्होंने कांपते हाथों से पन्ने पलटे।


«"1926... इस बंगले में अंग्रेज अफसर एडवर्ड मॉर्गन अपनी बेटी एलिजा के साथ रहता था। एक रात एलिजा अचानक गायब हो गई। तीन दिन बाद उसकी लाश बंगले के पीछे वाले पुराने कुएं से मिली।"»


गलियारे में अचानक किसी बच्ची के रोने की आवाज गूंजने लगी।


दीनू काका ने आगे पढ़ा।


«"लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एलिजा की मौत के बाद बंगले में बच्चों के गायब होने का सिलसिला शुरू हो गया। हर पैंतीस साल बाद, वह एक बच्चे को अपने साथ ले जाती थी।"»


अविनाश ने तुरंत गिनती की।


"1926... फिर 1961... फिर 1996..."


"और अब 2031 से पहले उसे अगला बच्चा चाहिए।" गंगाधर ने धीरे से कहा।


"जानवी..." दीनू काका के मुंह से निकला।


तभी बच्ची फिर हंसने लगी।


"जानवी मेरी है। जैसे तुम मेरे थे।"


पूरा गलियारा एकदम शांत हो गया।


गंगाधर ने पहली बार अपना सिर उठाकर उसकी तरफ देखा।


"मैं?"


बच्ची धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी।


"1951 में तुम भी यहां आए थे। तुम्हारी उम्र दस साल थी। तुम कुएं के पास खेल रहे थे। मैंने तुम्हें बुलाया था।"


अचानक गंगाधर के सिर में तेज दर्द उठने लगा।


कुछ धुंधली तस्वीरें उसकी आंखों के सामने आने लगीं।


एक बड़ा कुआं।


बारिश।


एक छोटी लड़की उसका हाथ पकड़े हुए।


और फिर...


एक आदमी उसे गोद में उठाकर भाग रहा था।


"नहीं..." गंगाधर लड़खड़ा गया।


दीनू काका ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला।


«"15 अगस्त 1951। आज मैंने एक बच्चे को बचा लिया। उसका नाम गंगाधर कांबले है। लेकिन एलिजा उसे कभी नहीं छोड़ेगी। जिस दिन वह वापस बंगले में कदम रखेगा, वह अपना अधूरा वादा पूरा करने आएगी।"»


अविनाश ने धीरे-धीरे दीनू काका की तरफ देखा।


"यह किसने लिखा है?"


दीनू काका की आंखों में आंसू आ गए।


"मेरे पिता ने।"


"क्या?"


"वह उस समय इस बंगले में नौकर थे। उन्होंने ही गंगाधर को यहां से बाहर निकाला था।"


गंगाधर अब भी पेंटिंग को घूर रहा था।


उसे सब याद आने लगा था।


वह सचमुच यहां आया था।


और एलिजा ने सचमुच उसका हाथ पकड़ा था।


"तुमने मुझसे झूठ बोला।" एलिजा की आवाज अब पूरे बंगले में गूंज रही थी। "तुमने कहा था कि तुम मेरे साथ खेलोगे... हमेशा।"


अचानक दूसरी मंजिल की सारी खिड़कियां एक साथ खुल गईं।


बाहर तूफान शुरू हो चुका था।


नीचे आंगन में खड़े सभी कौवे एक साथ जोर-जोर से कांव-कांव करने लगे।


"गंगाधर!" अविनाश चिल्लाया। "हमें अभी यहां से निकलना होगा!"


लेकिन गंगाधर वहीं खड़ा रहा।


उसने बहुत धीरे से पूछा—


"अगर मैं तुम्हारे साथ चलूं... तो क्या तुम जानवी को छोड़ दोगी?"


पूरा बंगला शांत हो गया।


कुछ सेकंड बाद...


"हां।"


"नहीं!" अविनाश चीख पड़ा। "तू पागल हो गया है क्या?"


गंगाधर मुस्कुराया।


"तुझे याद है? तू हमेशा कहता था कि मैं शतरंज में आखिरी चाल सबसे देर से चलता हूं।"


उसने अपनी टॉर्च अविनाश के हाथ में थमा दी।


"इस बार भी वही कर रहा हूं।"


एलिजा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।


गंगाधर ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।


उसी क्षण पूरे बंगले में इतनी तेज रोशनी फैली कि अविनाश को अपनी आंखें बंद करनी पड़ीं।


और जब उसने आंखें खोलीं...


गलियारा खाली था।


गंगाधर जा चुका था।


तूफानी रात में प्राचीन बंगले के गलियारे में गंगाधर कांबले एलिजा मॉर्गन का हाथ थामे खड़ा है, जबकि अविनाश और दीनू काका भयभीत होकर यह दृश्य देख रहे हैं।
कुछ वादे समय से बड़े होते हैं। और कुछ आत्माएं... उन्हें पूरा होने तक इंतजार करती हैं।



तीन दिन बाद।


जानवी ने आधी रात को चीखना बंद कर दिया।


उसने फिर कभी उस सफेद कपड़ों वाली औरत का नाम नहीं लिया।


और सावंत बंगले के ऊपर मंडराते कौवे भी अचानक गायब हो गए।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।


एक महीने बाद, अविनाश अकेले अपनी दुकान में बैठा था।


उसने आदत से मजबूर होकर सामने वाली कुर्सी पर दूसरा चाय का कप रख दिया।


फिर खुद ही हल्का-सा मुस्कुरा दिया।


उसी समय उसकी नजर शतरंज की बिसात पर पड़ी।


गंगाधर का घोड़ा अपनी जगह से हिला हुआ था।


अविनाश का चेहरा सख्त हो गया।


वह धीरे-धीरे उठा।


दुकान का दरवाजा अंदर से बंद था।


वह वापस बिसात के पास आया।


घोड़े के नीचे एक छोटा-सा कागज रखा था।


उस पर सिर्फ पांच शब्द लिखे थे—


«"मैं हारा नहीं हूं, दोस्त।"»


और उसी पल...


दुकान के बाहर, बारिश में खड़ा एक आदमी दिखाई दिया।


उसने पुराना कोट पहन रखा था।


चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।


लेकिन उसकी आवाज अविनाश अच्छी तरह पहचानता था।


«"अवि... एक नई पहेली हमारा इंतजार कर रही है।"»


जब तक वह दरवाजे तक पहुंचा...


बाहर कोई नहीं था।




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