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| अंधेरा होने से पहले हर कोई घर पहुंचना चाहता था, लेकिन सुभाष को अपने बेटे से किया वादा निभाना था। |
शाम के छह बजते ही फैक्ट्री का सायरन गूंज उठा। मशीनों का शोर थम गया और सभी मजदूर जल्दी-जल्दी बाहर निकल पड़े। हर किसी के चेहरे पर घर पहुंचने की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। रात होने से पहले जो सामान लेना था, लोग फुर्ती से खरीद रहे थे और बिना रुके अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। इन दिनों अंधेरा होते ही बाहर रुकने से हर कोई डरता था। लेकिन सुभाष रुक गया। उसने अपने चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे से वादा किया था कि आज उसकी नई स्कूल की किताब जरूर लाएगा। दुकान पर भीड़ और देर के कारण उसका समय निकलता जा रहा था। वह बार-बार घड़ी देखता और मन ही मन झुंझला उठता। आखिर जैसे-तैसे किताब लेकर वह अपनी पुरानी साइकिल पर सवार हुआ। तब तक सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। दूर-दूर तक सन्नाटा फैलने लगा था। अंधेरा तेजी से उतर रहा था। जिस समय तक पूरा गांव अपने-अपने घरों के दरवाजे बंद कर चुका था, उसी समय सुभाष अकेला सुनसान रास्ते पर घर लौट रहा था।
सुभाष साइकिल चलाते-चलाते खुद से ही बड़बड़ा रहा था। उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था। "थोड़ा पहले निकल जाता तो ये नौबत ही नहीं आती…" उसने होंठ भींचते हुए कहा। गांव जाने वाली कच्ची सड़क पर उसके अलावा कोई नहीं था। हर पैडल के साथ अंधेरा और गहरा होता जा रहा था। झींगुरों और कीड़ों की लगातार आती आवाजें सन्नाटे को और डरावना बना रही थीं। सड़क के दोनों ओर फैले खेतों में खड़े ऊंचे गन्ने हवा के साथ हिल रहे थे, मानो कोई उनमें छिपकर उसे देख रहा हो। हर छोटी-सी आहट पर सुभाष की नजरें घबराकर इधर-उधर दौड़ जातीं और उसका दिल तेजी से धड़कने लगता।
उसके डर की वजह भी थी। मार्च का महीना शुरू हो चुका था, और इसी समय वह लौटता है... वह आदमखोर। कोई नहीं जानता था कि वह इंसान था, जंगली जानवर या कोई और भयावह चीज़। क्योंकि जिसने भी उसे देखा, वह कभी जिंदा वापस नहीं आया। कुछ दिनों बाद जंगल में केवल उसकी बेरहमी से चीरी-फाड़ी हुई लाश मिलती थी। हां, उसकी रूह कंपा देने वाली चीख कई लोगों ने जरूर सुनी थी। हर साल वह कुछ दिनों तक आतंक मचाता, चार-पांच लोगों की जान लेता और फिर अचानक गायब हो जाता। यही कारण था कि गांव वाले दिन में चाहे जितना घूम लें, लेकिन रात ढलते ही अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। आज सुभाष उसी डर के बीच अकेला उस सुनसान रास्ते पर आगे बढ़ रहा था।
गांव की टिमटिमाती रोशनी अब दूर से दिखाई देने लगी थी। उसे देखकर सुभाष ने राहत की सांस ली, लेकिन मन का डर अभी भी कम नहीं हुआ था। तभी अचानक उसकी साइकिल की चेन उतर गई। वह झुंझलाकर बोला, "अभी ही निकलनी थी?" उसने जल्दी-जल्दी साइकिल पलटी और कांपते हाथों से चेन चढ़ाने लगा। तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ। हवा जैसे एकदम थम गई थी। मार्च का महीना होने के बावजूद ठंड अचानक बढ़ गई। चारों ओर ऐसा सन्नाटा छा गया कि झींगुरों और कीड़ों की आवाजें भी पूरी तरह गायब हो गईं। मानो प्रकृति ने खुद सांस रोक ली हो।
सुभाष का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे लगा जैसे यह किसी अनहोनी का संकेत हो... कोई उसके बहुत पास मौजूद था। उसने बिना समय गंवाए चेन चढ़ाई, साइकिल उठाई और तेजी से पैडल मारने लगा। तभी सामने वाले जंगल की दिशा से भेड़िए की लंबी, डरावनी हुआं-हुआं रात के सन्नाटे को चीरती हुई गूंज उठी। उसकी रफ्तार और बढ़ गई। तभी रास्ते के किनारे वाले खेत में अचानक जोर से सरसराहट हुई। सुभाष की सांस गले में अटक गई। वह कांपते हुए भगवान का नाम जपने लगा। अगले ही पल खेत से एक लोमड़ी छलांग लगाकर बाहर निकली। उसे देखकर सुभाष ने राहत की सांस ली। लेकिन उसी क्षण वह लोमड़ी जैसे किसी अनदेखी चीज़ से बुरी तरह डर गई और चीखती हुई उल्टी दिशा में पागलों की तरह भाग निकली। सुभाष का दिल फिर से बैठ गया।
सुभाष जैसे ही दोबारा साइकिल पर बैठकर आगे बढ़ने लगा, उसकी नजर सड़क के बीचों-बीच खड़ी एक विशाल काली आकृति पर पड़ी। वह लगभग आठ फुट ऊंची थी। उसके पूरे शरीर पर घने काले बाल थे और अंधेरे में उसकी लाल चमकती आंखें साफ दिखाई दे रही थीं। सुभाष का पूरा शरीर वहीं का वहीं जम गया। अगले ही पल उस जीव ने ऐसी भयावह दहाड़ मारी कि पूरा इलाका कांप उठा। पेड़ों पर बैठे पक्षी घबराकर उड़ गए और सुभाष के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए।
उसने बिना एक पल गंवाए साइकिल वहीं छोड़ दी और बगल के गन्ने के खेत में जान बचाकर भाग गया। वह जीव भी उसी रफ्तार से उसके पीछे दौड़ा। गन्नों के बीच घुसते ही सुभाष ने अपना मुंह कसकर दबा लिया। अब उसकी हल्की-सी सांस की आवाज भी उसकी मौत बन सकती थी। बाहर वह राक्षसी जीव लगातार गुर्रा रहा था। वह गन्ने जड़ से उखाड़कर फेंक रहा था और पागलों की तरह उसकी तलाश कर रहा था। उसकी हर गुर्राहट से सुभाष का पूरा शरीर कांप रहा था।
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| गन्नों के बीच छिपा सुभाष अपनी सांसें थामे बैठा था, जबकि खौफनाक शिकारी उसे ढूंढ रहा था। |
कुछ देर तक छिपे रहने के बाद उस जीव को उसकी गंध मिल गई। लेकिन घने गन्नों के कारण वह पूरी रफ्तार से अंदर नहीं घुस पा रहा था। मौका मिलते ही सुभाष दूसरी दिशा में भाग निकला। वह जानता था कि खुले रास्ते पर गया तो बचना असंभव है। इसलिए वह खेतों के बीच छिपते, झुकते और दौड़ते हुए आगे बढ़ता रहा, जबकि वह खूंखार जीव उसके पीछे पागलों की तरह लगातार उसका पीछा कर रहा था।
देखते ही देखते भागता हुआ सुभाष खेत के बिल्कुल बीचों-बीच पहुंच गया। वहां एक पुराना कुआं था। उसके पास सोचने का भी समय नहीं था। वह समझ चुका था कि चाहे जितना दौड़ ले, खुले मैदान में उस भयानक जीव से बचना असंभव है। पीछे से उसकी गुर्राहट हर पल और करीब आती जा रही थी। बिना एक क्षण गंवाए सुभाष कुएं में कूद गया और पानी के भीतर पूरी तरह डूबकर खुद को छिपा लिया।
कुछ ही पलों बाद वह राक्षसी जीव भी वहां पहुंच गया। वह हिंसक जानवर की तरह कुएं के चारों ओर चक्कर काटने लगा। उसकी नथुने तेजी से फड़क रहे थे। वह हवा को सूंघकर सुभाष की गंध तलाश रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि शिकार यहीं कहीं है, लेकिन गंध अचानक गायब हो जाने से वह बुरी तरह उलझ गया था।
वह गुर्राता हुआ कुएं के बिल्कुल किनारे आया और अंदर झांकने लगा। नीचे उसे सिर्फ काला पानी दिखाई दिया। उसी पानी के भीतर सुभाष अपनी सांस रोके डूबा हुआ था। उसके फेफड़े जलने लगे थे। अब वह कुछ ही क्षण और सांस रोक सकता था। लेकिन अगर उसने सिर पानी से बाहर निकाला, तो अगले ही पल वह जीव उसे चीर-फाड़ देता।
तभी वह दानव अचानक भयानक दहाड़ मारकर पलटा, जैसे उसे कहीं और कोई आहट सुनाई दी हो। अगले ही पल वह बिजली की रफ्तार से दूसरी दिशा में दौड़ गया। पानी के भीतर डूबा सुभाष अभी भी हिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
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| पूरी रात ठंडे पानी में छिपा सुभाष सिर्फ एक प्रार्थना कर रहा था—सुबह होने तक वह जीव वापस न लौटे। |
उसके बाद सुभाष में कुएं से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं बची। डर ने जैसे उसके शरीर की हर हड्डी जमा दी थी। वह जीव जा चुका था, लेकिन उसकी दहशत अब भी हर तरफ महसूस हो रही थी। सुभाष को बार-बार लगता, अगर वह अभी ऊपर निकला और वह दानव फिर लौट आया, तो इस बार बचना नामुमकिन होगा। इसी डर से वह पूरी रात ठंडे पानी में ही छिपा रहा। कांपते हुए वह लगातार भगवान का नाम जपता रहा और हर छोटी-सी आहट पर आंखें बंद कर लेता।
सुबह हुई, सूरज काफी ऊपर चढ़ आया, लेकिन फिर भी वह बाहर नहीं निकला। कुछ देर बाद खेत का मालिक वहां पहुंचा। कुएं में झांकते ही उसने सुभाष को देखा। गांव वालों की मदद से उसे बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला गया। उसकी हालत बेहद खराब थी। ठंड, डर और पूरी रात पानी में रहने से उसका शरीर बुरी तरह कांप रहा था। उसे तुरंत घर पहुंचाया गया। वहां उसकी पत्नी और छोटा बेटा रो-रोकर बेहाल थे। पूरी रात उन्होंने उसकी राह देखी थी।
कुछ ही देर में पूरे गांव में यह खबर फैल गई। हर कोई उसे देखने पहुंचा, क्योंकि वह पहला इंसान था जो उस रहस्यमय दानव के चंगुल से जिंदा बचकर लौटा था। उसे पूरी तरह संभलने में कई दिन लग गए। लेकिन उस घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत और बढ़ गई। अब फैक्ट्री की छुट्टी होते ही मजदूर बिना कहीं रुके सीधे अपने घर लौट आते। अंधेरा होने से पहले सड़कें पूरी तरह सूनी हो जाती थीं।



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