श्रीरामपुर गांव वैसे तो बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसकी पहचान दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह था गांव का लगभग सात सौ साल पुराना महादेव मंदिर। मंदिर के ठीक पास से बहने वाली दमोदर नदी पूरे वातावरण को एक रहस्यमय शांति देती थी। पुराने समय की पत्थर की नक्काशियाँ, घिसी हुई सीढ़ियाँ और टूटी हुई दीवारें आज भी इतिहास की गवाही देती थीं। यहां आने वाला हर व्यक्ति महसूस करता कि इस जगह में कोई अनकहा रहस्य छिपा है।
लेकिन मंदिर की सबसे रहस्यमयी चीज़ थी उसके गर्भगृह के भीतर बना एक प्राचीन पत्थर का दरवाज़ा। कहा जाता था कि उस दरवाज़े के पीछे बेशकीमती खज़ाना छिपा है, जिसे सदियों पहले सुरक्षित कर दिया गया था। आश्चर्य की बात यह थी कि आज तक कोई भी उस दरवाज़े को खोल नहीं पाया। गांव के बुज़ुर्गों के अनुसार उसके पीछे सिर्फ खज़ाना नहीं, बल्कि एक भयानक अभिशाप भी कैद है।
लोककथाओं में बताया जाता है कि जिसने भी उस दरवाज़े को खोलने की कोशिश की, उसकी कुछ ही समय बाद रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। अब तक दो लोगों के साथ ऐसा होने की बातें गांव में मशहूर थीं। हालांकि इन घटनाओं का सच क्या था और अफ़वाह क्या, इसका कोई पक्का प्रमाण किसी के पास नहीं था। लेकिन इतना ज़रूर था कि उस बंद दरवाज़े का नाम सुनते ही आज भी गांव के लोगों के चेहरे पर डर साफ़ दिखाई देता था।
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| आखिरकार उन्हें वह मिल गया जिसके लिए वे आए थे—सोना, हीरे, जवाहरात और अनगिनत दौलत... लेकिन इसकी कीमत अभी बाकी थी। |
इन दिनों श्रीरामपुर गांव अपने वार्षिक मेले की रौनक में डूबा हुआ था। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस उत्सव में दूर-दूर से लोग उमड़ रहे थे। झूले, लोकनृत्य, मंदिर की पूजा और रंग-बिरंगी दुकानों से पूरा गांव जीवंत हो उठा था। इसी भीड़ में शहर से आया एक युवक, रवि, अपने दोस्त मनोज के साथ कैमरा लेकर हर पल की शूटिंग करता दिखाई देता था। उसने इस मेले के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, इसलिए यहां तीन दिन रुकने का फैसला किया। मिलनसार स्वभाव के कारण वह जल्दी ही गांव वालों से घुल-मिल गया और सबका चहेता बन गया। उधर मेला हर गुजरते दिन के साथ और भी भव्य होता जा रहा था।
पूजा का दिन अब बिल्कुल करीब था। पूरे गांव में तैयारियां जोरों पर चल रही थीं। दो दिन बाद भव्य शोभायात्रा निकलने वाली थी और उसी दिन महादेव मंदिर के शिखर पर नया कलश चढ़ाया जाना था। हर गली रंग-बिरंगी सजावट से सजी थी और मंदिर में सुबह से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती थी।
इसी बीच रवि और मनोज मौका देखकर चुपके से मंदिर के अंदर की शूटिंग करने लगे। कैमरा चलाते-चलाते वे उस हिस्से तक पहुंच गए, जहां सदियों पुराना रहस्यमय पत्थर का दरवाज़ा मौजूद था। दोनों उत्सुकता से उसे ध्यान से देखने लगे। दरवाज़े की बनावट, ताले और आसपास की दीवारों को वे ऐसे देख रहे थे, मानो हर छोटी-सी बात अपने दिमाग में दर्ज कर रहे हों। तभी किसी के आने की आहट सुनाई दी। दोनों तुरंत सामान्य होने का अभिनय करते हुए वहां से निकल गए और वापस मेले की भीड़ में जाकर बाकी कार्यक्रमों की शूटिंग करने लगे।
लेकिन उनकी असली पहचान किसी को नहीं पता थी। रवि और मनोज साधारण पर्यटक नहीं, बल्कि बेहद शातिर और हाई-टेक चोर थे। मंदिर के पीछे छिपे खजाने की कहानी सुनकर ही वे श्रीरामपुर आए थे। उनका पूरा प्लान तैयार था—कलश स्थापना और पूजा संपन्न होने के बाद, जब पूरा गांव उत्सव की थकान में सो जाएगा, उसी रात वे उस रहस्यमय दरवाज़े को खोलकर सदियों पुराने खजाने तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।
इस रात का इंतज़ार रवि और मनोज कई महीनों से कर रहे थे। उन्होंने बार-बार मंदिर के उस हिस्से की गुप्त रूप से रेकी की थी और हर रास्ता, हर कोना और हर संभावना अच्छी तरह समझ ली थी। अब उनके प्लान को अंजाम देने का समय आ चुका था।
उत्सव समाप्त होने के बाद पूरा गांव गहरी नींद में डूब चुका था। आधी रात के सन्नाटे में दोनों चुपचाप अपने ठिकाने से निकले और मंदिर की ओर बढ़ गए। उस रात का अंधेरा कुछ अलग ही था—हवा तक जैसे थम गई हो। विशाल महादेव मंदिर निस्तब्ध खड़ा था। भीतर अब भी कुछ दीपक टिमटिमा रहे थे। पुजारी गर्भगृह के बाहर वाले कक्ष में सो चुका था। दोनों ने सावधानी से ताला खोला और बिना कोई आवाज़ किए भीतर प्रवेश कर गए।
वे सीधे उस रहस्यमयी पत्थर के दरवाज़े के सामने पहुँचे। गांव वालों से मिली जानकारी के अनुसार, उसका गुप्त पत्थर वाला लॉक पास ही कहीं छिपा था। काफी खोजने के बाद उन्हें वह मिल भी गया। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद तंत्र खुल नहीं रहा था। शायद सदियों से बंद होने के कारण वह पूरी तरह जाम हो चुका था। आधा घंटा बीत गया। दोनों थक चुके थे और लगने लगा कि उनकी महीनों की योजना यहीं खत्म हो जाएगी। उन्होंने आख़िरी बार पूरी ताकत से कोशिश की… तभी अचानक बिना किसी आवाज़ के वह पत्थर का लॉक अपने आप खुल गया। दोनों एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगे।
अब सोचने का समय नहीं था। मौका हाथ से निकलने से पहले रवि और मनोज फुर्ती से उस दरवाज़े के भीतर चले गए। अंदर कदम रखते ही उनके सामने धूल, जाले और सदियों पुराना खंडहर दिखाई दिया। हवा इतनी बासी थी कि दोनों ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगे। चारों ओर एक जैसे संकरे रास्ते और टूटे हुए पत्थर के गलियारे थे। पूरा स्थान किसी रहस्यमयी भूलभुलैया जैसा लग रहा था। वहां ऐसा सन्नाटा था कि उनके कदमों की हल्की-सी आहट भी कई बार गूंजकर लौट रही थी।
दोनों ने अपने साथ लाई हुई मशाल जलाई और सावधानी से आगे बढ़ने लगे। वे एक-एक कोना, हर दीवार और हर रास्ता ध्यान से देखते रहे, लेकिन काफी देर तक उन्हें कुछ भी नहीं मिला। हर जगह सिर्फ खाली कमरे, टूटी दीवारें और बिखरे पत्थर ही दिखाई दे रहे थे।
थककर मनोज ने निराश होकर कहा, "इतनी मेहनत बेकार गई। लगता है खजाने की सारी कहानियां सिर्फ अफवाह थीं। यहां कुछ भी नहीं है।"
लेकिन रवि अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ना चाहता था। उसने आगे बढ़ने का फैसला किया। तभी उनकी नजर एक छोटे-से पत्थर के दरवाज़े पर पड़ी, जो बाकी दीवारों में लगभग छिपा हुआ था। बिना ज्यादा उम्मीद के उन्होंने उसे खोला... और अगले ही पल दोनों की आंखें हैरानी से फैल गईं। अंदर दूर तक चमचमाता हुआ सोना, गहने और अनगिनत खजाना मशाल की रोशनी में चमक रहा था।
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| आखिरकार उन्हें वह मिल गया जिसके लिए वे आए थे—सोना, हीरे, जवाहरात और अनगिनत दौलत... लेकिन इसकी कीमत अभी बाकी थी। |
खजाना देखकर रवि और मनोज खुशी से झूम उठे। उनकी आंखों के सामने सोने की ईंटें, कीमती गहने, प्राचीन मूर्तियां, हीरे, जवाहरात, मोती और न जाने कितनी अनमोल वस्तुएं बिखरी पड़ी थीं। ऐसा वैभव उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखा था। कुछ पल तक दोनों बिना कुछ बोले सिर्फ उस खजाने को छूते रहे, मानो यकीन ही न हो कि यह सब सच है।
फिर उन्हें होश आया। उन्होंने अपने साथ लाए बड़े बैग खोले और जितना संभव था, उतना खजाना उनमें भर लिया। बैग इतने भारी हो गए कि उन्हें उठाना भी मुश्किल हो रहा था, लेकिन लालच के आगे उन्हें उसका एहसास भी नहीं था।
अब दोनों तेजी से बाहर निकलने के लिए उसी रास्ते की ओर बढ़े, जहां से अंदर आए थे। लेकिन कुछ दूर चलने के बाद वे ठिठक गए। सामने कोई पहचान का रास्ता नहीं था। उन्होंने एक के बाद एक कई गलियारों में खोजा, मगर बाहर जाने वाला दरवाज़ा कहीं दिखाई नहीं दिया। जितना वे तलाश करते, भूलभुलैया उतनी ही उलझती जाती। दोनों के चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई देने लगी।
तभी अचानक पूरे खंडहर में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। न हवा की सरसराहट, न उनके कदमों की गूंज। उसी सन्नाटे में मनोज की नज़र एक गहरे अंधेरे कोने पर पड़ी... वहां दो चमकती हुई आंखें उन्हें घूर रही थीं। अगले ही पल वे आंखें धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगीं।
दोनों डर के मारे वहीं जड़ हो गए। धीरे-धीरे पीछे हटने लगे। तभी मशाल की लौ उस अंधेरे कोने तक पहुंची और वहां खड़ी आकृति साफ़ दिखाई देने लगी। उसे देखते ही दोनों की सांस जैसे थम गई। उनके सामने एक विशालकाय काला साँप फन फैलाए खड़ा था। उसकी आंखें अंगारों की तरह चमक रही थीं और उसकी गहरी, भयावह फुफकार पूरे खंडहर में गूंज रही थी।
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| खज़ाना मिलते ही जाग उठा उसका असली रक्षक। अब दौलत नहीं, सिर्फ़ जान बचाना ही उनका लक्ष्य था। |
अगले ही पल दोनों जोर से चीखे और जान बचाकर भाग खड़े हुए। लेकिन वह भयानक साँप भी बिजली की रफ्तार से उनके पीछे दौड़ पड़ा। उसकी फुफकार हर पल उनके और करीब आती जा रही थी। भूलभुलैया जैसे उनके खिलाफ हो गई थी। वे जिस रास्ते पर मुड़ते, साँप मानो पहले से वहीं उनका इंतज़ार कर रहा होता। ऐसा लग रहा था कि उससे बच निकलना असंभव है।
भाग-दौड़ की अफरातफरी में रवि और मनोज एक-दूसरे से बिछड़ गए। रवि घबराहट में बिना दिशा के दौड़ता रहा। तभी अचानक पूरे खंडहर में मनोज की एक दिल दहला देने वाली चीख गूंजी। वह चीख सुनकर रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका शरीर कांपने लगा। उसे लगा कि साँप ने मनोज को पकड़ लिया है। लेकिन उसके साथ आखिर हुआ क्या... यह सोचने की भी हिम्मत रवि में नहीं बची थी। मौत के डर से वह पागलों की तरह अंधेरे गलियारों में भागता रहा, बस किसी तरह बाहर निकलने का रास्ता खोजता हुआ।
चारों तरफ सिर्फ घना अंधेरा था... और उसके पीछे मौत। रवि कभी किसी टूटी दीवार के पीछे छिपता, तो कभी किसी संकरे गलियारे में भाग निकलता। हर दिशा से विशाल साँप की सरसराहट और उसकी भयानक फुफकार सुनाई दे रही थी। अब उसे समझ आ चुका था कि शायद वह ज़िंदा बाहर नहीं निकल पाएगा। डर से कांपते हुए वह बार-बार भगवान का नाम ले रहा था, अपनी गलती के लिए माफी मांग रहा था और जान बख्श देने की गुहार लगा रहा था।
भागते-भागते वह खंडहर के एक ऐसे हिस्से में पहुंचा, जहां ऊपर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियां बनी थीं। उसके मन में उम्मीद जगी कि शायद यही बाहर निकलने का रास्ता हो। वह पूरी ताकत से सीढ़ियां चढ़ गया, लेकिन ऊपर पहुंचते ही उसकी उम्मीद टूट गई। वहां एक विशाल प्राचीन पेड़ उगा हुआ था, जिसकी मोटी जड़ें पूरे खंडहर की दीवारों और फर्श में दूर-दूर तक फैली हुई थीं।
उसी समय पीछे से फिर साँप की तेज फुफकार गूंजी। रवि घबराकर पेड़ की ओर दौड़ा और छिपने की जगह तलाशने लगा। तभी उसकी नजर दीवार में बनी एक छोटी-सी खिड़की जैसी खुली जगह पर पड़ी। उसके भीतर फिर उम्मीद जाग उठी। साँप की आवाज़ अब बेहद करीब आ चुकी थी। बिना एक पल गंवाए उसने पेड़ से लटकती मोटी लता को पकड़ लिया, तेजी से ऊपर चढ़ा और उस संकरी खुली जगह से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करने लगा।
उसी क्षण वह विशाल साँप भी पेड़ की ओर लपका और लताओं के सहारे ऊपर चढ़ने लगा। रवि के हाथ-पांव घबराहट से कांप रहे थे। उसने पूरी ताकत लगाकर खुद को उस संकरी खुली जगह की ओर धकेला। जैसे ही साँप उसके बिल्कुल करीब पहुंचने वाला था, रवि किसी तरह बाहर निकल गया।
लेकिन वह विशालकाय साँप उस छोटे से रास्ते से बाहर नहीं आ सकता था। वह वहीं रुक गया और अपनी भयानक पीली आंखों से रवि को घूरने लगा। पहली बार रवि ने उसे इतने करीब से देखा था। उसका विशाल फन, काले चमकते शल्क और आंखों में जलती हुई पीली चमक किसी दुःस्वप्न से कम नहीं थी। एक पल के लिए रवि के मन में ख्याल आया—अगर उनके बीच वह पत्थर की दीवार न होती, तो शायद वह अब तक ज़िंदा नहीं बचता।
कुछ देर तक साँप उसे घूरता रहा, फिर धीरे-धीरे अंधेरे में वापस लौट गया। उधर रवि बिना पीछे देखे उस संकरे रास्ते से भाग निकला। वह रास्ता सीधे नदी के किनारे बाहर निकलता था। आश्चर्य की बात यह थी कि उस गुप्त मार्ग के बारे में आज तक गांव वालों को भी पता नहीं था।
जैसे ही उसे यकीन हुआ कि उसकी जान बच गई है, वह वहीं घुटनों के बल बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसका साथी मनोज अब शायद इस दुनिया में नहीं था। उसका पूरा शरीर अब भी डर से कांप रहा था। उसने कुछ ही घंटों में ऐसा भय देखा था, जिसे वह शायद जिंदगी भर कभी भूल नहीं पाएगा।
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| दोस्त खो दिया, लालच टूट गया... और अंत में रवि ने समझ लिया कि कुछ खज़ाने इंसानों के लिए नहीं होते। |
सुबह होने से पहले, गांव के जागने से पहले ही रवि अपने ठिकाने पर गया, अपना सारा सामान उठाया और अंधेरे में श्रीरामपुर छोड़कर निकल गया। सूरज उगते-उगते वह गांव से काफी दूर पहुंच चुका था, लेकिन उसका मन अब भी उस भयावह रात में अटका हुआ था। तभी उसे अपनी पैंट की जेब में कुछ महसूस हुआ। उसने निकालकर देखा—वह सोने का एक कीमती हार था। खजाना देखकर खुशी में उसने अनजाने में उसे जेब में रख लिया था। कुछ पल वह उसे देखता रहा। फिर मनोज की याद आंखों के सामने तैर गई। उसकी सारी लालसा उसी पल खत्म हो गई। उसने वह हार दूर फेंक दिया और बिना पीछे देखे अपनी राह पर चल पड़ा।
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