कुछ गाँव ऐसे होते हैं जहाँ रात सिर्फ अंधेरा नहीं लाती…
वो अपने साथ कुछ ऐसा भी लाती है जो समझ से बाहर होता है।
राधापुर ऐसा ही एक गाँव था।
लेकिन
वहाँ रात को....
वो “बोलता” था।
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| रात के एक बजे, राधापुर की खामोशी को चीरती एक रहस्यमयी आवाज़ मनोज को दरवाज़े तक खींच लाती है। लेकिन गाँव वाले जानते हैं—उस आवाज़ का जवाब देना खतरनाक है। |
रात के लगभग 1 बजे थे।
राधापुर के बाहरी छोर पर बना एक पुराना घर…
जहाँ अभी-अभी शहर से आया एक लड़का — मनोज— सो रहा था।
थकान भारी थी, लेकिन नींद अधूरी थी।
तभी…
जंगल की तरफ से एक आवाज आई।
ऐसी आवाज…
जैसे कोई इंसान दर्द में तुट रहा हो।
धीमी… खिंचती हुई… और फिर अचानक कट जाने वाली आवाज।
मनोज की आँखें खुल गईं।
वो उठकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा । वह बढाही था कि पीछे से हाथ पड़ गया।
सुमन मौसी।
“दरवाज़ा मत खोलना।”
मनोज ने पूछा—
“क्यू कौन है बाहर? कोई घायल है क्या?”
सुमन कुछ पल चुप रही… फिर धीमे से बोली—
“अगर जवाब मिले भी… तो मत सुनना।”
और फिर…
उन्होंने उसे वापस सुला दिया।
सुबह राधापुर हमेशा की तरह शांत था।
लोग खेतों में, बच्चे गलियों में, और हवा तक धीमी…
लेकिन उस शांतता के नीचे कुछ दबा हुआ था।
मनोज अब तीन दिन से गाँव में था।
वह अपनी मौसी सुमन और उनके बेटे संदीप के साथ कुछ दिन रहने आया था।
संदीप मजबूत, शांत, और अजीब तरह से कम बोलने वाला लड़का था।
हर बार जब मनोज रात की आवाज़ के बारे में पूछता…
संदीप बस इतना कहता:
“रात को बाहर मत जाना।”
बस।
न कोई वजह…
न कोई कहानी।
बस एक चेतावनी।
अध्याय 3: जिज्ञासा
तीसरी रात मनोज से रहा नहीं गया।
“अगर सच में कुछ है… तो सब छुपा क्यों रहे हैं?”
रात के ठीक 1:07 बजे…
वो चुपचाप घर से बाहर निकल गया।
गाँव सो रहा था।
कुत्ते भी नहीं भौंक रहे थे।
जैसे पूरा राधापुर सांस रोककर बैठा हो।
वो धीरे-धीरे जंगल की तरफ बढ़ा।
और फिर…
वही आवाज़।
इस बार ज्यादा पास।
इतनी पास कि लग रहा था…
कोई उसके ठीक पीछे खड़ा है।
मनोj का शरीर ठंडा पड़ने लगा।
उसने टॉर्च जलाई।
कुछ नहीं।
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| जंगल की गहराइयों में बढ़ता हर कदम मनोज को सच के करीब ले जा रहा था। लेकिन उसे नहीं पता था कि अंधेरे में कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रखे हुए है।9 |
सिर्फ पेड़… और उनकी परछाइयाँ।
फिर अचानक…
आवाज रुकी।
और जंगल में एक अजीब सा सन्नाटा फैल गया।
ऐसा सन्नाटा…
जो कानों को नहीं, दिमाग को दबा देता है।
अध्याय 4: उल्टा अंधेरा
और फिर वो हुआ…
एक पेड़ की शाखा हिली।
धीरे-धीरे…
जैसे कोई हवा में नहीं…
नीचे उतर रहा हो।
मनोj की टॉर्च काँपने लगी।
और फिर उसने देखा—
एक आकृति।
काली…
लेकिन पूरी तरह इंसानी नहीं।
वो पेड़ से उल्टा उतर रही थी…
लेकिन उसके पैर जमीन को छूते ही सीधे हो गए।
जैसे गुरुत्वाकर्षण उसके लिए नियम नहीं था।
उसने सिर उठाया।
चेहरा नहीं था।
बस एक धुंधला, गहरा खालीपन…
और उसी खालीपन से आवाज़ आई—
“तुमने सुना क्यों?”
मनोj जड़ हो गया।
उसका शरीर जवाब दे चुका था।
वो भागना चाहता था…
लेकिन पैर जमीन में धंस चुके थे।
अध्याय 5: वापसी
अगले पल—
सब काला।
मनोज को होश आया तो वो घर के अंदर था।
मौसी उसके पास बैठी थीं।
संदीप दरवाजे पर खड़ा था… चुप।
मनोj पसीने से भीगा हुआ था।
उसने कांपते हुए पूछा—
“वो क्या था?”
सुमन ने लंबी सांस ली।
फिर बोली—
“राधापुर में जंगल नहीं है… राधापुर खुद उस जंगल का हिस्सा है।”
“और वो आवाज़… किसी को बुलाती नहीं…
जो सुन लेता है… उसे पहचान लेती है।”
संदीप ने पहली बार बोलते हुए कहा—
“तू बाहर गया था… इसलिए बच गया।”
मनोj ने हैरानी से देखा।
“बच गया??”
संदीप ने सिर्फ इतना कहा—
“जो उसे देख लेता है… वो हर रात उसे देखता है।”
अंत: राधापुर की फुसफुसाहट
मनोj को अगले दिन गाँव से भेज दिया गया।
वो वापस शहर चला गया।
लेकिन…
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हर रात 1 बजे…
उसे अब भी वही आवाज़ सुनाई देती है।
कभी दूर…
कभी बहुत पास…
और कभी…
उसके अपने कमरे के कोने से।
क्योंकि राधापुर की कहानी खत्म नहीं होती।
वो बस…
अगले सुनने वाले का इंतज़ार करती है।


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