जो भी हो जाए, बाहर मत उतरना

 

रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे थे।

आसमान पर काले बादलों की मोटी चादर फैली हुई थी। कहीं-कहीं दूर बिजली चमकती और फिर सब कुछ पहले से भी ज्यादा अंधेरे में डूब जाता।

रोहित अपनी कार चलाते हुए शहर लौट रहा था।

उसके मोबाइल का स्पीकर ऑन था।

"हाँ सुनो, बस दो-तीन घंटे और लगेंगे... फिर घर पहुँच जाऊँगा।"

दूसरी तरफ उसकी पत्नी ने कहा, "इतनी रात को मत चलो। किसी होटल में रुक जाओ।"

रोहित हँस पड़ा।

"अरे चिंता मत करो। बस रास्ता नया है तो क्या, जल्दी पाहुच जा

पत्नी ने कुछ और कहा, लेकिन तभी फोन कट गया।

नेटवर्क गायब हो चुका था।

रोहित ने चारों तरफ देखा।

सड़क के दोनों ओर घना जंगल था।

न कोई वाहन।

न कोई घर।

न कोई रोशनी।

बस उसकी कार की हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थीं।

उसे थोड़ा अजीब लग रहा था।

लेकिन वह चलता रहा।

तभी...

आधी रात में घने जंगल के बीच सफेद कार चलाता एक भारतीय व्यक्ति, सड़क किनारे खड़ी रहस्यमयी बूढ़ी औरत, भयावह वातावरण।
उस रात जंगल में मिली एक बूढ़ी औरत ने सिर्फ एक चेतावनी दी थी—"जो भी हो जाए, बाहर मत उतरना।"


हेडलाइट्स की रोशनी में सड़क के किनारे कोई आकृति दिखाई दी।

एक बूढ़ी औरत।

सफेद बाल।

पुरानी साड़ी।

हाथ में लकड़ी की लाठी।

वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

इतनी रात में...

इतने सुनसान जंगल में...

उसे देखकर रोहित के मन में अजीब-सा डर पैदा हुआ।

फिर उसने सोचा शायद किसी गाँव की होगी।

उसने कार रोक दी।

"माँजी, कहाँ जाना है?"

बूढ़ी औरत धीरे से मुस्कुराई।

"बेटा, आगे तक छोड़ देगा?"

रोहित ने दरवाजा खोल दिया।

वह पीछे की सीट पर बैठ गई।

कार फिर चल पड़ी।

कुछ मिनट तक खामोशी रही।

फिर बूढ़ी औरत ने पूछा,

"कहाँ जा रहे हो बेटा?"

"शहर... ।"

"अच्छा "

उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ममता थी।

जैसे कोई अपनी संतान से बात कर रहा हो।

कुछ देर बाद बूढ़ी औरत अचानक बोली,

"रास्ता भूल गए हो न?"

रोहित चौंका।

"हाँ... आपको कैसे पता?"

वह बस हल्का-सा मुस्कुराई।

कोई जवाब नहीं दिया।

कार आगे बढ़ती रही।

फिर लगभग पंद्रह मिनट बाद बूढ़ी औरत ने कहा,

"बस यहीं रोक दो।"

रोहित ने ब्रेक लगा दिए।

और अगले ही पल उसका दिल बैठ गया।

चारों तरफ घना जंगल था।

इतना घना कि हेडलाइट्स की रोशनी भी निगल ली जाए।

दूर-दूर तक कोई घर नहीं।

कोई रास्ता नहीं।

कुछ भी नहीं।

"माँजी... यहाँ?"

बूढ़ी औरत कार से उतर गई।

फिर खिड़की के पास आकर बोली,

"मेरी चिंता मत करो।"

रोहित कुछ समझ पाता, उससे पहले उसने अगली बात कही—

"लेकिन ध्यान से सुनो..."

उसकी आँखें अचानक बहुत गंभीर हो गईं।

"अब आगे चाहे कुछ भी दिखे... कोई भी आवाज़ दे... कोई भी मदद माँगे..."

वह एक पल रुकी।

"कार से बाहर मत उतरना।"

"क्यों?"

बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

बस दोबारा बोली—

"जो भी हो जाए... बाहर मत उतरना।"

फिर वह अंधेरे में चली गई।

और कुछ ही सेकंड में गायब हो गई।

रोहित देर तक उसे देखता रहा।

फिर सिर झटककर आगे बढ़ गया।

करीब दस मिनट बाद...

उसे सड़क के बीचोंबीच एक आदमी दिखाई दिया।

वह हाथ हिलाकर मदद माँग रहा था।

उसके कपड़े खून से सने हुए लग रहे थे।

रोहित का दिल पसीज गया।

उसने ब्रेक लगा दिए।

फिर अचानक उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

"कार से बाहर मत उतरना..."

उसने काँच के पार देखा।

वह आदमी सिर झुकाए खड़ा था।

फिर धीरे-धीरे उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

रोहित का खून जम गया।

उसकी आँखें नहीं थीं।

सिर्फ काले गहरे गड्ढे।

रोहित ने तुरंत एक्सीलेरेटर दबा दिया।

कार तेजी से आगे निकल गई।

सुनसान जंगल की सड़क पर कार के अंदर बैठा डरा हुआ व्यक्ति, सामने खड़ी भयानक प्रेतात्मा, चारों ओर घना अंधेरा और कोहरा।
बस एक पल के लिए उसने कार का दरवाजा खोलने का सोचा... लेकिन वही फैसला उसकी जान बचा गया।


उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं।

लेकिन असली डर अभी बाकी था।

कुछ देर बाद उसे पीछे से बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

एकदम साफ।

जैसे कोई छोटा बच्चा कार की डिक्की में बंद हो।

रोहित घबरा गया।

आवाज़ लगातार बढ़ रही थी।

"मम्मी... बचाओ..."

"मुझे बाहर निकालो..."

रोहित ने कार रोक दी।

उसका हाथ दरवाजे पर चला गया।

वह बाहर निकलकर डिक्की देखने ही वाला था।

उंगलियाँ लॉक तक पहुँच चुकी थीं।

तभी...

उसे बूढ़ी औरत की  याद आई।

"चाहे कुछ भी हो जाए..."

उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

वह फिर आगे बढ़ गया।

और तभी...

रोने की आवाज़ अचानक राक्षसी हँसी में बदल गई।

ऐसी हँसी...

जिसे सुनकर उसकी रीढ़ में बर्फ उतर गई।

रात और गहरी होती जा रही थी।

जंगल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।

फिर अचानक कार के सामने एक औरत दिखाई दी।

लंबे काले बाल।

सफेद कपड़े।

सड़क के बीचोंबीच खड़ी।

रोहित ने जोर से ब्रेक लगाए।

औरत धीरे-धीरे उसकी कार की ओर बढ़ने लगी।

उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।

फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

और अगले ही पल...

उसका चेहरा दिखाई दिया।

चेहरा नहीं...

सिर्फ सड़ा हुआ मांस।

काले दाँत।

खून से भरी आँखें।

रोहित चीख पड़ा।

उसने कार मोड़ी और पूरी रफ्तार से आगे निकल गया।

पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।

लगभग आधे घंटे बाद...

उसे दूर कहीं रोशनी दिखाई दी।

एक गाँव।

रोहित की जान में जान आई।

वह तेजी से वहाँ पहुँचा।

गाँव के किनारे एक पुराने घर का दरवाजा खटखटाया।

कुछ देर बाद एक अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला।

रोहित की हालत देखकर वह उसे तुरंत अंदर ले गया।

पानी दिया।

बैठाया।

जब रोहित सामान्य हुआ तो उसने पूरी कहानी सुना दी।

सब कुछ।

बूढ़ी औरत से लेकर जंगल की भयानक घटनाओं तक।

सुनकर उस आदमी का चेहरा गंभीर हो गया।

"तुम बहुत भाग्यशाली हो।"

"क्यों?"

"उस जंगल में रात को लोग नहीं जाते।"

"क्यों?"

"क्योंकि वहाँ जो दिखता है... वह इंसान नहीं होता।"

रोहित की रूह काँप गई।

"लेकिन मैं बच कैसे गया?"

आदमी कुछ पल चुप रहा।

फिर उसकी नजर दीवार पर लगी एक तस्वीर पर गई।

"शायद... इसकी वजह से।"

रोहित ने तस्वीर की तरफ देखा।

और उसकी साँस रुक गई।

वह कुर्सी से लगभग उछल पड़ा।

तस्वीर में वही बूढ़ी औरत थी।

वही चेहरा।

वही मुस्कान।

वही आँखें।

"ये... ये तो वही है!"

आदमी की आँखें भर आईं।

"ये मेरी माँ थीं।"

"क्या?"

"दो साल पहले इसी जंगल में लापता हो गई थीं। बहुत खोजा... लेकिन कभी नहीं मिलीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर आदमी धीमी आवाज़ में बोला—

"लेकिन गाँव वाले कहते हैं कि उनकी आत्मा आज भी उस जंगल में भटकती है।"

"भटकती है?"

"हाँ... मगर किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं।"

उसने तस्वीर की तरफ देखा।

गांव के घर में दीवार पर लगी बूढ़ी औरत की तस्वीर को हैरानी से देखता यात्री, पास खड़ा घर का मालिक रहस्य बताता हुआ।
जब उसने तस्वीर देखी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई—जिस बूढ़ी औरत ने उसकी जान बचाई थी, वह दो साल पहले मर चुकी थी।


"मुसीबत में फँसे लोगों को बचाने के लिए।"

रोहित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

अगली सुबह...

सूरज निकल चुका था।

रोहित ने उस आदमी का धन्यवाद किया और घर के लिए निकल पड़ा।

कुछ देर बाद जंगल खत्म हो गया।

सामने चौड़ा हाईवे था।

उसे लगा अब सब खत्म हो चुका है।

अब वह सुरक्षित है।

खौफनाक जिन्न

उसने राहत की लंबी साँस ली।

फिर आदतन रियर-व्यू मिरर में देखा।

और उसका दिल एक पल के लिए थम गया।

बहुत दूर...

जंगल की शुरुआत पर...

वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

सुबह की धूप में।

शांत मुस्कान के साथ।

वह उसे देख रही थी।

जैसे विदा दे रही हो।

रोहित की आँखें नम हो गईं।

उसने हल्का-सा सिर झुकाया।

और जब दोबारा आईने में देखा...

वहाँ कोई नहीं था।

सिर्फ खाली सड़क।

और दूर खड़ा वह रहस्यमय जंगल...

जहाँ शायद आज भी एक माँ की आत्मा, अजनबियों को अपना बेटा समझकर उनकी जान बचाती है।

समाप्त.

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