रात...
एक ऐसी चीज़ जिसे हम सिर्फ अंधेरा समझते हैं।
लेकिन कुछ रातें ऐसी होती हैं...
जो अंधेरे से नहीं...
यादों से भरी होती हैं।
ऐसी यादें...
जो मरने के बाद भी मिटती नहीं।
भारत के पश्चिमी हिस्से में एक शहर है...
या यूँ कहिए...
उसके अवशेष हैं।
नाम है...
देवगढ़।
आज वहाँ सिर्फ खंडहर हैं।
टूटी हुई हवेलियाँ...
धूल से ढकी गलियाँ...
और सैकड़ों साल पुरानी दीवारें...
जो अब भी कुछ छिपा रही हैं।
लोग कहते हैं...
दिन के उजाले में भी वहाँ जाने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती।
क्योंकि देवगढ़ सिर्फ एक उजड़ा हुआ शहर नहीं...
एक जिंदा कब्र है।
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| तीन सौ साल से वीरान पड़ा देवगढ़... जहाँ हर गली एक रहस्य छुपाए बैठी है और हर साया किसी अनकही कहानी का गवाह है। |
रात के साढ़े ग्यारह बजे।
आसमान पर बादल ऐसे छाए थे मानो चाँद को किसी ने कैद कर लिया हो।
नए देवगढ़ शहर की सड़कें बारिश से चमक रही थीं।
पुलिस कंट्रोल रूम में अचानक वायरलेस चीखा—
"सर... पुरानी ज्वेलरी दुकान में बड़ी चोरी हुई है... चार आदमी... हथियारबंद... शहर से बाहर भाग रहे हैं!"
इंस्पेक्टर देवधर कांबले ने अपनी कुर्सी से उठते हुए सिर्फ एक बात कही—
"भाग सकते हैं... बच नहीं सकते।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
देवधर का नाम सुनकर बड़े-बड़े अपराधियों के चेहरे का रंग उड़ जाता था।
वह सिर्फ पुलिस अफसर नहीं था...
शिकार पर निकला हुआ शिकारी था।
बारिश तेज हो चुकी थी।
चोरी करने वाले चारों अपराधी जीप छोड़कर भाग रहे थे।
उनके पीछे पुलिस की गाड़ियाँ थीं।
अचानक उनमें से एक चिल्लाया—
"उधर चलो!"
सबकी नजर सामने गई।
दूर अंधेरे में टूटी हुई हवेलियों और काले खंडहरों का विशाल जंगल दिखाई दे रहा था।
पुराना देवगढ़।
तीनों के कदम वहीं रुक गए।
एक ने कांपते हुए कहा—
"पागल हो गया है क्या? वहाँ नहीं जाते..."
दूसरा फुसफुसाया—
"मेरे दादा कहते थे... वहाँ रात में इंसान नहीं रहते..."
पीछे पुलिस की सायरन गूंज रही थी।
उनके पास कोई और रास्ता नहीं था।
और वे दौड़ पड़े...
सीधे उस मृत शहर की तरफ।
देवधर ने जब उन्हें उस ओर भागते देखा तो उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
पुराना देवगढ़।
सैकड़ों साल पुराना शहर।
कभी मुगलों के दौर का सबसे रौनकदार ठिकाना।
रातें यहाँ सोने से नहीं...
शराब, संगीत और तवायफों के नाच से जगमगाती थीं।
दूर-दूर के नवाब...
व्यापारी...
सरदार...
यहाँ आते थे।
लेकिन तीन सौ साल पहले...
एक रात...
कुछ ऐसा हुआ कि पूरा शहर धीरे-धीरे उजड़ गया।
लोग गायब होने लगे।
मौतें होने लगीं।
और फिर...
शहर मर गया।
देवधर ने जीप रोकी।
सामने टूटा हुआ पत्थर का फाटक खड़ा था।
उस पर धूल जमी थी।
लिखा था—
"देवगढ़"
जैसे ही उसने भीतर कदम रखा...
एक अजीब ठंडी हवा उसके शरीर से टकराई।
उसके रोंगटे खड़े हो गए।
दिल ने पहली बार कहा—
"वापस लौट जाओ..."
लेकिन देवधर लौटने वालों में से नहीं था।
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| चोरों का पीछा करते-करते देवधर उस शहर में प्रवेश कर चुका था, जहाँ लोग दिन के उजाले में भी जाने से डरते थे। |
शहर के भीतर अजीब खामोशी थी।
इतनी गहरी कि अपनी साँस भी डरावनी लग रही थी।
टूटी हुई हवेलियाँ...
काले पड़े दरवाजे...
खाली खिड़कियाँ...
ऐसा लगता था जैसे हर खिड़की के पीछे कोई खड़ा उसे देख रहा हो।
बारिश की बूंदें गिर रही थीं।
लेकिन...
देवधर को अचानक एहसास हुआ—
बूंदों की आवाज गायब हो गई है।
पूरा शहर मौन था।
पूरी तरह।
तभी...
कहीं दूर से घुंघरुओं की आवाज आई।
छन्न... छन्न... छन्न...
देवधर रुक गया।
उसने टॉर्च घुमाई।
कोई नहीं।
आवाज बंद।
फिर शुरू।
और इस बार थोड़ा पास।
छन्न...
छन्न...
छन्न...
उसके साथ आए दो कांस्टेबल घबराने लगे।
एक बोला—
"सर... वापस चलते हैं..."
तभी...
सामने वाली हवेली की दूसरी मंजिल पर एक औरत दिखाई दी।
सफेद लिबास।
लंबे बाल।
और लाल आँखें।
पलक झपकते ही...
वह गायब।
कांस्टेबल चीख पड़ा।
देवधर दौड़कर ऊपर पहुँचा।
लेकिन वहाँ सिर्फ धूल थी।
और फर्श पर पड़े थे...
ताजे पैरों के निशान।
नंगे पैर।
जैसे कोई अभी-अभी वहाँ खड़ा था।
देवधर को पुराने शहर के बीचोंबीच एक विशाल कोठा मिला।
टूटा हुआ।
लेकिन अजीब तरह से बाकी जगहों से बेहतर हालत में।
दरवाजे पर उर्दू में कुछ लिखा था।
धूल हटाने पर शब्द उभरे—
"जमनाबाई महल"
देवधर भीतर गया।
और अचानक...
उसे लगा जैसे समय पीछे घूम गया हो।
उसके सामने पूरा कोठा जीवित हो उठा।
हजारों दीये जल रहे थे।
संगीत बज रहा था।
शराब की महक थी।
हँसी थी।
शोर था।
नवाब बैठे थे।
सरदार बैठे थे।
और फिर...
सीढ़ियों से एक स्त्री उतरी।
जमनाबाई।
इतनी सुंदर कि जैसे चाँद ने इंसानी रूप ले लिया हो।
बड़ी आँखें।
माथे पर झूमर।
लाल लहंगा।
पायल।
घुंघरू।
और मुस्कान...
जिसमें कोई गहरा दर्द छुपा था।
देवधर समझ गया।
वह अतीत देख रहा था।
तीन सौ साल पुराना अतीत।
देवधर ने देखा...
जमनाबाई सिर्फ तवायफ नहीं थी।
वह एक गुप्त प्रेम कहानी की नायिका थी।
वह एक युवा सैनिक से प्रेम करती थी।
नाम था—
वीरेंद्र।
दोनों भागकर शादी करना चाहते थे।
लेकिन देवगढ़ के लालची सरदारों को यह मंजूर नहीं था।
क्योंकि जमनाबाई उनकी सबसे कीमती संपत्ति थी।
एक रात...
जमनाबाई और वीरेंद्र भागने वाले थे।
लेकिन विश्वासघात हुआ।
उनके ही किसी करीबी ने उन्हें धोखा दिया।
कोठे के तहखाने में...
वीरेंद्र को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया।
और जमनाबाई...
उसका गला काटकर मार दी गई।
फिर उन दोनों की मौत जैसें उस कहर बन गई
उस रात के बाद...
देवगढ़ पर मौत का साया छा गया।
जैसे ही देवधर को सच पता चला...
पूरा कोठा कांप उठा।
दीवारें हिलने लगीं।
अंधेरे से चीखें आने लगीं।
सैकड़ों भूतिया चेहरे दिखाई देने लगे।
उसी समय चोरी करने वाले चारों अपराधी बाहर आ गए।
वे डर के मारे रो रहे थे।
तभी...
जमनाबाई का असली रूप प्रकट हुआ।
लंबे बिखरे बाल।
खून से सना चेहरा।
कटी हुई गर्दन।
जलती आँखें।
पूरा महल उसकी चीख से गूंज उठा।
देवधर भी डर गया पर वह भागा नहीं।
फिर जमनाबाई का चेहरा बदल गया।
भयानक रूप गायब हो गया।
वह फिर वैसी ही सुंदर दिखाई दी जैसी कभी थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसकी आवाज हवा में घुल गई।
और फिर...
वह प्रकाश बनकर आसमान में विलीन हो गई।
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| वह भूत नहीं थी... वह तीन सौ साल पुरानी एक अधूरी दास्तान थी, जो अब भी अपने सच के उजागर होने का इंतज़ार कर रही थी। |
सुबह होने लगी।
पुराने देवगढ़ पर पहली बार सूरज की किरणें अलग लग रही थीं।
मानो किसी भारी बोझ से मुक्ति मिली हो।
देवधर चोरी के आरोपियों को लेकर शहर लौटा।
उसकी बहादुरी की चर्चा पूरे राज्य में होने लगी।
लोग, मीडिया ने उसकी बड़ी तारीफ की।
लेकिन देवधर जानता था...
उस रात जो हुआ...
उसे कोई कभी नहीं समझ पाएगा।
कुछ महीनों बाद...
पुराने देवगढ़ में खुदाई हुई।
जींस में जमनाबाई और वीरेंद्र की कहानी का सच सामने आया।
और उसी रात...
जब देवधर अपनी बालकनी में खड़ा था...
हवा का एक झोंका आया।
बहुत हल्की...
बहुत दूर से...
घुंघरुओं की आवाज सुनाई दी।
छन्न...
छन्न...
छन्न...
लेकिन उस आवाज में अब कोई डर नहीं था।
सिर्फ विदाई थी।
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