बारिश की वो रात

 

आज से कई दशक पहले...

जब गाँवों तक पक्की सड़कें भी नहीं पहुँची थीं...

तब ज़िंदगी बिल्कुल अलग हुआ करती थी।

उस समय न  कस्बे में अस्पताल होते थे...

न गाँव में डॉक्टर।

बच्चे का जन्म घर के एक  कमरे में होता था।

परिवार के लोग बाहर बेचैनी से इंतज़ार करते...

और भीतर...

एक ही औरत नई ज़िंदगी को इस दुनिया में लाने की ज़िम्मेदारी संभालती।

उसे लोग "दाई" कहते थे।

दाई सिर्फ़ बच्चे की डिलीवरी नहीं कराती थी...

वह पूरे गाँव का भरोसा होती थी।

उसके अनुभव पर लोगों को डॉक्टर से भी ज़्यादा विश्वास होता था।

आँधी-तूफ़ान हो...

या मूसलाधार बारिश...

अगर किसी घर से खबर आती कि प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है...

तो दाई बिना एक पल की देरी किए निकल पड़ती।

क्योंकि उस दौर में...

एक छोटी-सी देर...

माँ और बच्चे...

दोनों की जान ले सकती थी।

ऐसी ही एक दाई थी...

सुमन दाई।

पूरे इलाके में उसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था।

उम्र साठ के आसपास...

चेहरे पर झुर्रियाँ...

लेकिन आँखों में गज़ब का आत्मविश्वास।

" इलाके में जितने बच्चे दौड़ते-भागते दिखाई देते हैं... उनमें से आधे से ज़्यादा ने पहली साँस सुमन दाई की हथेलियों में ली है।"

पास के कई गाँवों से भी लोग उसे बुलाने आते थे।

कोई कभी भी  बुलाने आ जाता  

आधी रात को...

कई बार तेज़ बारिश में...

तो कभी घने जंगल पार करके भी।

लेकिन उसने कभी किसी को मना नहीं किया।

उसके लिए हर जन्म...

भगवान का काम था।

और शायद...

इसी फ़र्ज़ ने एक रात...

उसे ऐसी जगह पहुँचा दिया...

जहाँ जाने की हिम्मत कोई इंसान नहीं कर सकता..

Amavasya ki raat mein Suman Dai apni jhopdi ka darwaza kholkar rahasyamayi aadmi aur bailgadi ko dekhti hui.
आधी रात... मूसलाधार बारिश... और एक दस्तक जिसने सुमन दाई की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।


वह अमावस्या की रात थी।

काले बादलों ने पूरे आकाश को निगल लिया था।

बारिश लगातार बरस रही थी...

ऐसी कि छप्पर पर गिरती हर बूँद किसी ढोल की चोट जैसी सुनाई दे रही थी।

हवा इतनी तेज़ थी कि मिट्टी की झोपड़ियों के दरवाज़े अपने आप काँप उठते।

दूर कहीं बिजली चमकती...

और एक पल के लिए पूरा गाँव दूधिया रोशनी में नहा जाता।

फिर...

सब कुछ पहले से भी गहरे अँधेरे में डूब जाता।

ऐसा अँधेरा...

जिसमें अपने ही हाथ दिखाई न दें।

पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा था।

कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़..

भी नहीं आ रही थी..

मानो इस रात ने हर जीव की आवाज़ छीन ली हो।

सिर्फ़ बारिश...

और गरजते बादल।

उसी सन्नाटे को चीरती हुई...

ठक... ठक... ठक...

सुमन दाई की झोपड़ी का दरवाज़ा काँप उठा।

दस्तक इतनी अचानक थी...

कि गहरी नींद में सोई सुमन दाई भी घबराकर उठ बैठी।

उसने दीवार पर टंगी लालटेन जलाई।

पीली लौ काँप रही थी...

मानो उसे भी बाहर खड़ी चीज़ का डर हो।

दस्तक फिर हुई...

इस बार पहले से ज़्यादा ज़ोर से।

धड़... धड़... धड़...

सुमन धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँची।

एक पल के लिए उसके हाथ कुंडी पर ही रुक गए।

इतनी रात...

इस तूफ़ान में...

कौन हो सकता है?

उसने भगवान का नाम लिया...

और कुंडी खोल दी।

उसी क्षण...

आकाश में एक तेज़ बिजली चमकी।

उस एक पल की रोशनी में उसने सामने खड़े आदमी को देखा।

लंबा कद...

भारी शरीर...

घनी, नीचे की ओर झुकी हुई काली मूँछें...

सिर से पाँव तक भीगा हुआ।

उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था...

लेकिन अजीब बात यह थी...

इतनी तेज़ बारिश के बावजूद...

उसके पैरों के पास की मिट्टी पर एक भी पदचिह्न नहीं था।

"दाई..."

उसने भारी, थकी हुई आवाज़ में कहा,

"मेरी बहू की जान खतरे में है... दर्द शुरू हुए कई घंटे हो गए हैं।"

"जल्दी चलो... देर हुई तो दोनों नहीं बचेंगे।"

सुमन ने बिना देर किए अपना पुराना थैला उठाया।

फिर पूछा,

"कौन-से गाँव से आए हो बेटा?"

आदमी ने एक पल उसकी आँखों में देखा...

फिर धीरे से बोला—

"रामपुर..."

सुमन ने माथे पर हल्की शिकन डाली।

रामपुर...

उसने नाम तो सुना था...

लेकिन कभी वहाँ गई नहीं थी।

"इतनी दूर इस मौसम में कैसे आए?"

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस मुड़कर चलने लगा।

बाहर...

एक पुरानी बैलगाड़ी खड़ी थी।

दो सफेद बैल...

बारिश में बिल्कुल स्थिर।

न सिर हिला रहे थे...

न पूँछ।

बस अँधेरे में बिना पलक झपकाए सामने देख रहे थे।

सुमन का मन एक पल को जाने क्यों घबरा उठा...

लेकिन किसी प्रसूता की जान का सवाल था।

वह बैलगाड़ी में बैठ गई।

बैलगाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

पहले कच्चा रास्ता आया...

फिर खेत...

और कुछ ही देर में...

गाँव की आख़िरी झोपड़ी भी पीछे छूट गई।

अब चारों ओर सिर्फ़ घना जंगल था।

बरसात से भीगे पेड़ों की डालियाँ हवा में ऐसे झूल रही थीं जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें हिला रहा हो।

कभी बिजली चमकती...

तो सूखे तनों की परछाइयाँ इंसानों जैसी लगतीं।

फिर सब कुछ फिर से अँधेरे में डूब जाता।

सुमन दाई ने कई बार पूछा,

"बेटा... तुम्हारा गाँव अभी कितना दूर है?"

हर बार वही जवाब मिलता...

"बस... पहुँच गए।"

लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

उसका दिल अब धीरे-धीरे घबराने लगा।

करीब एक घंटे बाद बैलगाड़ी एक पुराने, जर्जर मकान के सामने रुकी।

चारों तरफ़ जंगल...

दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं।

बस बारिश...

और उस टूटे हुए मकान की चरमराती लकड़ियाँ।

घर के भीतर कदम रखते ही सुमन ठिठक गई।

कमरे में सीलन की ऐसी गंध थी...

मानो बरसों से वहाँ धूप ही न आई हो।

दीवारों का पलस्तर उखड़ा हुआ था।

छत से जगह-जगह पानी टपक रहा था।

एक कोने में मिट्टी का दिया टिमटिमा रहा था।

उसकी काँपती लौ से दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बन रही थीं।

सामने...

एक पुरानी खाट पर...

एक औरत प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी।

उसका चेहरा आधे घूँघट में छिपा था।

वह दर्द से कराह रही थी...

लेकिन उसकी आवाज़...

जाने क्यों...

कमरे में गूँजती नहीं थी।

जैसे कोई आवाज़...

दीवारें अपने भीतर ही निगल लेती हों।

सुमन अपने काम में लग गई।

समय बीतता गया।

बाहर बारिश लगातार बरसती रही।

कभी उसे लगा...

कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है।

वह पलटी...

कोई नहीं।

फिर लगा...

खिड़की से कई चेहरे उसे घूर रहे हैं।

बिजली चमकी...

खिड़की खाली थी।

उसने खुद को समझाया,

"डर मत सुमन... तू अपना काम कर।"

कई घंटों की कोशिश के बाद...

आख़िर बच्चे के रोने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।

Ghane jungle ke beech purane sunsaan ghar mein Suman Dai prasav karati hui aur andhere mein khada rahasyamayi aadmi.
जहाँ हर दीवार एक राज़ छुपाए बैठी थी... और हर परछाई किसी अनजानी मौजूदगी का एहसास करा रही थी।


पहली बार उस आदमी के चेहरे पर मुस्कान आई।

उसने बच्चे को दोनों हाथों से उठाया...

उसकी आँखें भर आईं।

धीरे से बोला,

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

सुमन ने राहत की साँस ली।

कुच डेर बच्चे का सब करने के बाद

सुमन दाई 

"अब चलती हूँ... मेहनताना दे दो।"

आदमी कुछ देर चुप रहा।

फिर बिना कुछ कहे अंदर चला गया।

थोड़ी देर बाद लौटा...

उसके हाथ में कोयले के कुछ काले टुकड़े थे।

"मेरे पास देने के लिए यही है।"

सुमन हैरान रह गई।

"अरे... इसका मैं क्या करूँ?"

आदमी बस मुस्कुराया।

"कभी-कभी...

जो कोयला दिखाई देता है...

वह कोयला नहीं होता।"

उसकी बात सुमन की समझ में नहीं आई।

वह उसे बैलगाड़ी में बैठाकर वापस छोड़ गया।

घर पहुँचते ही सुमन झुँझलाकर बोली,

"अजीब आदमी था...

रातभर जान खपा दी...

और बदले में मुट्ठीभर कोयले दे गया।"

उसने वे सारे कोयले घर के एक कोने में फेंक दिए...

और थककर सो गई।

सुबह...

बारिश थम चुकी थी।

सूरज की हल्की किरणें झोपड़ी में उतर रही थीं।

सुमन झाड़ू लगा रही थी कि अचानक...

टन...!

झाड़ू किसी धातु से टकराई।

उसने नीचे देखा।

मिट्टी में...

एक चमचमाता हुआ...

सोने का सिक्का।

वह हैरान रह गई।

कुछ कदम आगे...

दूसरा सिक्का।

फिर तीसरा...

फिर चौथा।

उसे अचानक रात वाले कोयले याद आए।

वह दौड़कर उसी कोने में पहुँची...

जहाँ उसने उन्हें फेंका था।

लेकिन वहाँ अब कोयले नहीं थे।

पूरा कोना...

सोने के पुराने सिक्कों से भरा पड़ा था।

सुमन की साँसें तेज़ हो गईं।

Subah Suman Dai mitti ke ghar mein koylon ki jagah chamakte sone ke sikke dekhkar hairan hoti hui
रात को मिले साधारण कोयले... सुबह बन चुके थे सोने के सिक्के। लेकिन क्या सचमुच यह किसी इनाम की शुरुआत थी... या एक भयावह रहस्य की?


उसी समय...

दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ लगाई।

"दाई... सुना है रात तुम रामपुर गई थीं?"

"हाँ..."

सुमन ने जवाब दिया।

सामने खड़ा बूढ़ा आदमी एकदम सन्न रह गया।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

काँपती आवाज़ में बोला...

"रामपुर...? .. रामपुर तो पच्चीस साल पहले भूस्खलन में पूरा दब गया था। वहाँ का एक भी आदमी ज़िंदा नहीं बचा था..."

सुमन के हाथ से सोने का सिक्का गिर पड़ा।

उसके कानों में रात वाले आदमी की आख़िरी बात गूँजने लगी—

"आज... मेरा घर फिर से बस गया।"

उस दिन के बाद...

सुमन ने कभी उन सिक्कों को हाथ नहीं लगाया 

वह सोना आज भी उसके पुराने संदूक में रखा है।

और हर अमावस्या की बरसाती रात...

जब घड़ी में डेढ़ बजते हैं...

तो उसी जंगल की तरफ़ से...

बैलगाड़ी के पहियों की धीमी चरमराहट सुनाई देती है।

जैसे...

कोई फिर किसी दाई को लेने आया हो।

समाप्त।



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