आधी रात का खौफ

 

दिसंबर का महीना था। सुबह की ठंड अब धीरे-धीरे हड्डियों तक उतरने लगी थी।


गोविंद ने आँगन में रखे लोटे से हाथ-मुँह धोया और अंदर चला आया। सरला चूल्हे के पास बैठी रोटियाँ सेंक रही थी। उसने बिना कुछ कहे एक कपड़े में दो रोटियाँ, थोड़ा अचार और गुड़ बाँधकर उसके थैले में रख दिया।


"शॉल रख ली?" उसने पूछा।


"हाँ, रख ली।"


"और सुनो, पहुँचकर खबर भिजवा देना।"


गोविंद ने सिर हिला दिया।


दो महीने पहले ही उसकी बेटी सुमन की शादी राजूरवाड़ी में हुई थी। कई दिनों से वह उसके पास आने के लिए कहलवा रही थी। खेती-बाड़ी के कामों में समय ही नहीं निकल पाया था। आखिर आज उसने जाने का मन बना लिया।

मामदापुर बस स्टैंड पर रहस्यमयी रिक्शावाला और किसान गोविंद
कुछ ही क्षण पहले यहाँ एक जीप खड़ी थी। अब चारों ओर सिर्फ धुंध, अंधेरा और ऐसा सन्नाटा था, जैसे उस जगह से सारी आवाज़ें गायब हो चुकी हों।


दरवाजे से निकलते हुए उसने अंदर एक नजर डाली। मोहन और राकेश अभी सो रहे थे।


"चलता हूँ।"


"हाँ, और देखना, देर मत करना।"


गोविंद हल्का-सा मुस्कुराया और घर से बाहर निकल आया।


राजूरवाड़ी उसके गाँव से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर था। वहाँ पहुँचने के लिए तीन बसें बदलनी पड़ती थीं।


सुबह की पहली बस उसे आसानी से मिल गई।

दोपहर होते-होते वह दूसरे कस्बे पहुँच गया। वहाँ दूसरी बस के लिए उसे लगभग चालीस मिनट इंतजार करना पड़ा। उसने सड़क किनारे बैठकर रोटी खाई और पानी पिया।


"कहाँ जाओगे काका?" पास बैठे एक आदमी ने पूछा।


"राजूरवाड़ी।"


"इतनी दूर? फिर तो रात हो जाएगी।"


गोविंद हँस दिया।


"हो जाए, बेटी के घर ही तो जाना है।"


दूसरी बस काफी पुरानी थी। खिड़कियाँ ठीक से बंद नहीं होती थीं। ठंडी हवा पूरे रास्ते अंदर आती रही। शाम ढलने लगी तो उसने शॉल निकालकर कंधों पर डाल ली।


करीब साढ़े सात बजे बस मामदापुर पहुँची।


"मामदापुर! मामदापुर!" कंडक्टर ने आवाज़ लगाई।


गोविंद ने थैला उठाया और नीचे उतर गया।


बस धूल उड़ाती हुई आगे निकल गई।


उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई।


मामदापुर एक छोटा-सा गाँव था। सड़क के किनारे कुछ दुकानें थीं, जिनमें से आधी बंद हो चुकी थीं। थोड़ी दूर पर एक चाय की दुकान खुली थी, जहाँ दो-तीन आदमी अंगीठी के पास बैठे हाथ सेंक रहे थे।


गोविंद सीधे उसी तरफ बढ़ गया।


"भैया, राजूरवाड़ी की बस कितने बजे आएगी?"


चाय वाले ने उसकी तरफ देखा।


"आपको किसी ने बताया नहीं?"


"क्या?"


"आज बस नहीं आएगी।"


गोविंद कुछ पल उसे देखता रहा।


"नहीं आएगी मतलब?"


"मतलब नहीं आएगी। दोपहर के बाद से उधर कोई बस नहीं गई।"


"तो अब?"


चाय वाले ने कंधे उचकाए।


"कल सुबह देख लेना।"


गोविंद ने तुरंत जेब से घड़ी निकाली।


सात बजकर चालीस मिनट।


उसने मन ही मन हिसाब लगाया। अगर अभी कोई गाड़ी मिल जाए, तो दस-साढ़े दस तक राजूरवाड़ी पहुँचा जा सकता था।


"और कोई साधन मिलेगा क्या?"


"इस समय?" चाय वाले ने अंगीठी में लकड़ी सरकाते हुए कहा, "मुश्किल है।"


गोविंद दुकान के बाहर आकर खड़ा हो गया।


ठंडी हवा अब पहले से तेज लग रही थी। उसने सड़क के दोनों ओर देखा। दूर-दूर तक कोई वाहन दिखाई नहीं दे रहा था।


उसी समय एक पुराना हरा रिक्शा धीरे-धीरे आकर उसके सामने रुका।


"कहाँ जाना है, चाचा?"


गोविंद ने उसकी तरफ देखा।


करीब पैंतालीस साल का आदमी था। हल्की दाढ़ी, सिर पर टोपी और चेहरे पर एक अजीब-सी गंभीरता।


"राजूरवाड़ी।"


आदमी कुछ क्षण चुप रहा।


"अकेले हो?"


"हाँ।"


"वहाँ कौन रहता है?"


"बेटी।"


उसने एक बार सिर हिलाया।


"बैठ जाओ।"


गोविंद के चेहरे पर राहत आ गई।


"अरे, भगवान तुम्हारा भला करे बेटा। मैं तो सोच रहा था कि आज यहीं अटक जाऊँगा।"


रिक्शा धीरे-धीरे सड़क पर आगे बढ़ने लगा।


कुछ मिनट तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।


फिर उस आदमी ने पूछा, "घर में और कौन-कौन है?"


"पत्नी है। दो लड़के हैं।"


"हूँ..."


इसके बाद वह फिर चुप हो गया।


गोविंद ने कई बार उससे उसका नाम पूछना चाहा, लेकिन पता नहीं क्यों, उसने पूछा नहीं।


करीब पंद्रह मिनट बाद रिक्शा अचानक रुक गया।


गोविंद ने सिर उठाकर देखा।


सामने खेतों के बीच से गुजरती एक संकरी सड़क अंधेरे में दूर तक चली गई थी।


"क्या हुआ?" उसने पूछा।


"उतर जाओ।"


गोविंद चौंक गया।


"क्यों?"


"मैं आगे नहीं जाऊँगा।"


"अरे, लेकिन अभी तो—"


"उतर जाओ, चाचा।"


इस बार उसकी आवाज़ पहले से ज्यादा सख्त थी।


गोविंद नीचे उतरा।


वह आदमी कुछ क्षण सामने फैले अंधेरे को देखता रहा। फिर बोला—


"ध्यान से सुनो।"


गोविंद चुप रहा।


"आज रात अगर कोई तुम्हें इस रास्ते से राजूरवाड़ी छोड़ने की बात करे... तो मत जाना।"


"क्यों?"


"बस मत जाना।"


"लेकिन मुझे तो वहीं—"


"मेरी बात याद रखना। चाहे वह आदमी तुम्हें मुफ्त में छोड़ने की बात करे... तब भी नहीं।"


गोविंद अब पूरी तरह उलझ चुका था।


"आखिर बात क्या है?"


पहली बार उस आदमी ने उसकी आँखों में देखा।


"कुछ रास्ते रात होने के बाद रास्ते नहीं रहते, चाचा।"


गोविंद उसके जवाब का मतलब समझ पाता, उससे पहले ही उसने रिक्शा मोड़ लिया।


और फिर वह अंधेरे में गायब हो गया।


गोविंद देर तक वहीं खड़ा रहा।


उसे समझ नहीं आ रहा था कि अभी जो हुआ, वह क्या था।


तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी—


"काका... राजूरवाड़ी जाना है क्या?"


गोविंद ने मुड़कर देखा।


सड़क के दूसरी ओर एक आदमी कंबल ओढ़े खड़ा था।


उसका चेहरा धुंध और अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था।


"हाँ..."


"तो चलो। मैं भी उधर ही जा रहा हूँ।"


गोविंद कुछ क्षण चुप खड़ा रहा।


दोनों बिना कुछ बोले कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ने लगे।


रास्ते के दोनों ओर ऊँची-ऊँची फसलें खड़ी थीं। ठंडी हवा उनके बीच से गुजरती हुई एक धीमी-सी सरसराहट पैदा कर रही थी।


"तुम राजूरवाड़ी में रहते हो?" गोविंद ने चलते-चलते पूछा।


"नहीं।"


"फिर?"


"काम से आया था।"


उसने इतना कहा और फिर चुप हो गया।


गोविंद ने दोबारा कुछ नहीं पूछा।


करीब दस मिनट बाद उन्हें सड़क किनारे एक पुरानी जीप खड़ी दिखाई दी।


"आ जाओ, काका। पैदल जाएँगे तो देर हो जाएगी।"


गोविंद जीप में बैठ गया। अंदर हल्की मिट्टी और पुराने डीजल की गंध थी। आदमी ने इंजन चालू किया और जीप धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।


गोविंद ने जेब से घड़ी निकाली।


नौ बजकर पच्चीस मिनट।


उसने खिड़की से बाहर देखा। अब सड़क पहले से कहीं ज्यादा सुनसान हो चुकी थी। कई मिनट बीत गए, लेकिन सामने से एक भी गाड़ी नहीं आई।


"और कितनी दूर है?" उसने पूछा।


"बस... थोड़ी।"


गोविंद ने गर्दन घुमाकर उसकी तरफ देखा।


अभी तक उसने उस आदमी का चेहरा ठीक से नहीं देखा था। कंबल उसके कंधों और आधे चेहरे को ढके हुए था।


कुछ देर बाद गोविंद को लघुशंका लगी।


"जरा गाड़ी रोकना बेटा।"


जीप धीरे से रुक गई।


"जल्दी आना।"


गोविंद सड़क से थोड़ा हटकर खेतों की तरफ चला गया।


ठंडी हवा अब पहले से ज्यादा तेज महसूस हो रही थी। उसने काम खत्म किया और शॉल को थोड़ा कसकर लपेट लिया।


उसे अचानक याद आया कि सुबह घर से निकलते समय सरला ने कहा था—"देर मत करना।"

वह हल्का-सा मुस्कुराया।


फिर मुड़कर वापस सड़क की तरफ देखा।


और उसी क्षण...


उसकी मुस्कुराहट गायब हो गई।


सड़क खाली थी।


जीप वहाँ नहीं थी।


वह आदमी भी नहीं था।


गोविंद कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा। उसे लगा शायद वह गलत दिशा में देख रहा है।


वह दो कदम आगे बढ़ा।


फिर चारों तरफ नजर दौड़ाई।


कुछ नहीं।


बस दूर-दूर तक फैला अंधेरा और खेत।


"अरे बेटा!"


उसने आवाज़ लगाई।


कोई जवाब नहीं मिला।


"ओ बेटा!"

आधी रात के अंधेरे में मंडराती अनजानी मौजूदगी
कुछ ही क्षण पहले यहाँ एक जीप खड़ी थी। अब चारों ओर सिर्फ धुंध, अंधेरा और ऐसा सन्नाटा था, जैसे उस जगह से सारी आवाज़ें गायब हो चुकी हों।


इस बार उसकी आवाज़ पहले से ऊँची थी।


लेकिन जवाब में सिर्फ उसकी अपनी आवाज़ लौटी, जो खेतों से टकराकर धीरे-धीरे खो गई।


गोविंद का गला सूखने लगा।


यह कैसे हो सकता है?


अभी मुश्किल से एक मिनट ही तो हुआ था।


वह जल्दी-जल्दी सड़क तक आया।


मिट्टी नरम थी।


फिर उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।


पहली बार उसे महसूस हुआ...


कि उसके आसपास का सन्नाटा सामान्य नहीं था।


इतनी देर में उसे किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुननी चाहिए थी।


कहीं कोई झींगुर।


लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था।


ऐसा लग रहा था, जैसे उस जगह से सारी आवाज़ें किसी ने खींचकर निकाल ली हों।


ठंडी हवा अचानक थम गई।


गोविंद ने अनजाने में अपने दोनों हाथ आपस में रगड़े।


तभी...


उसके बाईं ओर, खेतों के अंदर कहीं से किसी के चलने की आवाज़ आई।


चर्र...


चर्र...


जैसे कोई सूखी घास पर धीरे-धीरे कदम रख रहा हो।


गोविंद ने गर्दन घुमाई।


अंधेरे के अलावा वहाँ कुछ नहीं था।


आवाज फिर आई।


इस बार थोड़ी और पास से।


चर्र...


चर्र...


गोविंद का दिल अब पहले से तेज धड़कने लगा था।


"कौन है?" उसने हिम्मत करके पूछा।


आवाज अचानक बंद हो गई।


और फिर...


उसके दाईं ओर, सड़क के उस पार खड़े एक पेड़ के पीछे से किसी के बहुत धीमे-धीमे रोने की आवाज़ आने लगी।


फिर न जाने क्यों, उसे जाते-जाते उस रिक्शेवाले की आखिरी बात याद आ गई—


«"चाहे कोई मुफ्त में भी छोड़ने की बात करे... तब भी मत जाना।"»


लेकिन उस समय गोविंद को राजूरवाड़ी पहुँचने की जल्दी थी।


उसने थैले की पट्टी कंधे पर ठीक की...


...और उस आदमी के पीछे चल पड़ा।


गोविंद का पूरा शरीर जैसे एक पल के लिए जड़ हो गया।


रोने की आवाज़ बहुत धीमी थी।


जैसे कोई अपना रोना दबाने की कोशिश कर रहा हो।


उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की।


आवाज फिर आई।


इस बार थोड़ी लंबी।


गोविंद ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। उसके मन ने कई तर्क दिए—शायद कोई औरत होगी, शायद कोई राहगीर, शायद कोई मुसीबत में हो।


लेकिन उसके पैर वहीं जमे रहे।


रोने की आवाज़ अचानक बंद हो गई।


सन्नाटा।


इतना गहरा सन्नाटा कि उसे अपनी धड़कन तक सुनाई देने लगी।


धक...


धक...


धक...


गोविंद ने काँपते हाथों से जेब से घड़ी निकाली।


नौ बजकर छब्बीस मिनट।


उसने घड़ी वापस जेब में रखी और सड़क पर आगे बढ़ने लगा।


उसे बस किसी तरह मुख्य सड़क तक पहुँचना था।


वह मुश्किल से दस-पंद्रह कदम ही चला होगा कि पीछे से किसी के तेज़ी से खेतों के बीच दौड़ने की आवाज़ आई।


सरररर...


सरररर...


जैसे कोई चीज़ पूरी रफ्तार से उसकी दिशा में भाग रही हो।


गोविंद एकदम रुक गया।


आवाज अचानक उसके पीछे आकर थम गई।


उसने मुड़ने की हिम्मत नहीं की।


उसकी साँसें अब बेकाबू हो चुकी थीं।


धीरे-धीरे उसने भगवान का नाम लेना शुरू किया।


"राम... राम... राम..."


उसी समय उसे महसूस हुआ कि उसके ठीक पीछे कोई खड़ा है।


इतना पास...


कि अगर वह एक कदम पीछे हटे, तो शायद उससे टकरा जाए।


लेकिन वहाँ साँस लेने की कोई आवाज़ नहीं थी।


गोविंद की आँखों से आँसू निकलने लगे।


उसने काँपती आवाज़ में कहा—


"क... कौन है?"


कोई जवाब नहीं।


कुछ सेकंड बाद उसे अपने दाहिने कान के पास बहुत ठंडी हवा का एक झोंका महसूस हुआ।


जैसे किसी ने उसके बिल्कुल पास आकर धीरे से साँस छोड़ी हो।


अब उससे और सहा नहीं गया।


वह पूरी ताकत से सड़क पर भागने लगा।


थैला उसके कंधे से टकरा रहा था। शॉल आधी उतरकर पीछे लटक गई थी।


उसे नहीं पता था कि वह कहाँ भाग रहा है।


उसे सिर्फ इतना पता था—


कि उसके पीछे कुछ था।


और वह उसके साथ-साथ चल रहा था।


अचानक उसका पैर किसी पत्थर से टकराया और वह सड़क पर गिर पड़ा।


उसके हाथ छिल गए।


घुटनों में तेज दर्द उठा।


तभी...


उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।


घस्स...


घस्स...


घस्स...


जैसे कोई चीज़ मिट्टी पर रेंग रही हो।


आवाज खेतों के भीतर से आ रही थी।


धीरे-धीरे।


लेकिन लगातार उसकी तरफ बढ़ती हुई।


गोविंद ने काँपते हुए सिर उठाया।


खेतों के बीच खड़ी फसलें अपने आप दो हिस्सों में बँटती चली आ रही थीं।


जैसे उनके बीच से कुछ गुजर रहा हो।


घस्स...


घस्स...


घस्स...


गोविंद अब रो रहा था।


"हे राम... हे राम... मुझे बचा लो..."


आवाज अब सड़क तक पहुँच चुकी थी।


और फिर...


पहली बार उसने उसे देखा।


धुंध और अंधेरे के बीच...


कुछ मिट्टी पर रेंगता हुआ उसकी तरफ आ रहा था।


उसे उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।


बस लंबे उलझे हुए बाल...


कीचड़ से सने हाथ...


और ऐसी हरकतें, जो किसी इंसान की नहीं हो सकती थीं।


वह चीज़ अचानक रुक गई।


कुछ क्षण तक उसने अपना सिर नीचे झुकाए रखा।


फिर बहुत धीरे-धीरे...


उसने अपना सिर ऊपर उठाया।


गोविंद की चीख निकल गई।


उसी क्षण पीछे से एक आवाज़ गूँजी—


"आँखें बंद करो, चाचा!"


गोविंद ने मुड़कर देखा।


अंधेरे में वही रिक्शावाला खड़ा था।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वैसी शांति नहीं थी।


वह तेजी से गोविंद की तरफ बढ़ा और उसका हाथ पकड़कर खड़ा कर दिया।


"भागो!"


दोनों पूरी ताकत से सड़क पर दौड़ने लगे।


गोविंद ने एक बार पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की।


"पीछे मत देखो!" रिक्शावाले ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

आधी रात के अंधेरे में मंडराती अनजानी मौजूदगी
खेत अपने आप दो हिस्सों में बँट रहे थे। धुंध के पीछे कुछ था—कुछ ऐसा, जिसे गोविंद मरते दम तक शब्दों में बयां नहीं कर पाया।


कुछ देर बाद दूर उन्हें मुख्य सड़क दिखाई देने लगी।


और जैसे ही दोनों सड़क पर पहुँचे...


गोविंद ने महसूस किया कि उसके पीछे चल रही वह घिसटने की आवाज़ अचानक बंद हो गई थी।


वह हाँफता हुआ सड़क किनारे बैठ गया।


कई मिनट तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला।


आखिरकार गोविंद ने काँपती आवाज़ में पूछा—


"व... वह क्या था?"


रिक्शावाले ने उसकी तरफ देखा।


"जिसके बारे में मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी।"


"और... और वह आदमी?"


कुछ क्षणों तक वह चुप रहा।


फिर बोला—

"जिसके साथ तुम आए थे... उसे मैंने पंद्रह साल पहले इसी रास्ते पर दफन होते देखा था।"


गोविंद के हाथ से उसकी शॉल छूटकर जमीन पर गिर पड़ी।


उस रात के बाद वह कभी राजूरवाड़ी नहीं गया।


उसने अपनी बेटी से मिलने के लिए बाद में दूसरा रास्ता चुन लिया था।


लेकिन एक बात उसने मरते दम तक किसी को नहीं बताई—


उसने उस रात आखिर देखा क्या था।


बस, कभी-कभी सर्दियों की रात में, जब कोई उससे मामदापुर के पुराने रास्ते के बारे में पूछता...


तो उसके हाथ काँपने लगते।


और वह सिर्फ इतना कहता—


"अगर कोई तुम्हें मुफ्त में छोड़ने की बात करे...


तो मत जाना।"




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