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| सतपुड़ा के घने जंगल में स्थित भैरवगढ़ चौकी… जहाँ तीन लोगों का सामना ऐसी परछाई से होता है, जो इंसान की शक्ल और आवाज़ दोनों अपना सकती है। |
मध्य प्रदेश के सतपुड़ा क्षेत्र में एक जंगल था—कालापानी वन क्षेत्र।
सरकारी नक्शे में उसका नाम बस एक साधारण वन-खंड के रूप में दर्ज था। लेकिन जंगल के भीतर रहने वाले पुराने लोग उसे एक दूसरे नाम से जानते थे—
कालीधार।
कालीधार किसी नक्शे पर नहीं था।
न कोई सड़क वहाँ तक जाती थी, न कोई आधिकारिक रास्ता।
जंगल के पुराने लोग बस इतना जानते थे कि एक जगह ऐसी है जहाँ पेड़ बहुत पुराने हैं, जमीन हमेशा नम रहती है और शाम बाकी जंगल से कुछ पहले उतरती है।
और पिछले कई वर्षों में वहाँ से कुछ लोग गायब हुए थे।
लेकिन अजीब बात यह थी कि किसी का शरीर कभी नहीं मिला।
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अक्टूबर का आखिरी सप्ताह था।
दोपहर ढलने लगी थी जब अर्जुन राठौर की जीप आखिरी पक्की सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते पर उतर गई।
जीप के आगे लाल मिट्टी की संकरी पट्टी थी, जिसके दोनों ओर ऊँची घास और साल के पेड़ खड़े थे।
शुरुआत में जंगल खुला था।
धूप पेड़ों के बीच से जमीन तक पहुँच रही थी।
कहीं-कहीं बंदर पेड़ों की डालियों पर बैठे थे। कुछ चीतल झाड़ियों के पास दिखाई दे रहे थे। दूर से किसी पक्षी की आवाज़ आती और फिर दूसरी दिशा से उसका जवाब मिलता।
लेकिन लगभग आधे घंटे बाद जंगल बदलने लगा।
पेड़ घने होते गए।
आसमान ऊपर से दिखाई देना कम हो गया।
जीप के शीशे पर कभी-कभी सूखी टहनियाँ रगड़ खातीं और एक खुरदरी आवाज़ पैदा करतीं।
अर्जुन ड्राइव कर रहा था।
उसके साथ मीरा सेन बैठी थी। मीरा वन्यजीव फोटोग्राफर थी और पिछले कई महीनों से इस क्षेत्र में कैमरा-ट्रैप से जानवरों की गतिविधियाँ रिकॉर्ड कर रही थी।
पीछली सीट पर रघु बैठा था।
लगभग पचपन साल का।
पतला शरीर, धूप से काली पड़ी त्वचा और आँखें जो जंगल को अर्जुन और मीरा से अलग तरीके से देख रही थीं।
उसे जैसे रास्ता याद था।
एक मोड़ पर उसने अचानक कहा—
“बस अब ज्यादा दूर नहीं।”
अर्जुन ने सामने देखा।
उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।
सिर्फ पेड़ों की एक लंबी दीवार।
फिर कुछ मिनट बाद पेड़ों के बीच से जंग लगा लोहे का बोर्ड दिखाई दिया।
वन विभाग — भैरवगढ़ चौकी
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| सतपुड़ा के घने जंगल में मौजूद भैरवगढ़ चौकी… जहाँ शाम ढलते ही जंगल का सन्नाटा कुछ अनजाना सा महसूस होने लगता है। |
बोर्ड आधा झुका हुआ था।
उसके पीछे एक छोटी-सी पुरानी इमारत थी।
सीमेंट की दीवारें।
टूटी खिड़कियाँ।
टीन की छत।
और सामने लकड़ी का बरामदा।
चौकी के पीछे जंगल अचानक गहरा हो जाता था।
अर्जुन ने जीप रोक दी।
तीनों कुछ क्षण वहीं बैठे रहे।
रघु सबसे पहले नीचे उतरा।
उसने चौकी का दरवाजा खोला।
दरवाजा खोलते ही अंदर से बंद हवा और पुराने लकड़ी के सामान की गंध बाहर आई।
एक कमरा सोने के लिए था।
दूसरे में पुरानी मेज, कुर्सी और कुछ सरकारी रजिस्टर पड़े थे।
बिजली थी, लेकिन बहुत कमजोर।
बल्ब जलता तो था, मगर उसकी रोशनी कमरे से ज्यादा अंधेरे को उजागर करती थी।
मीरा ने अपना बैग नीचे रखा और बाहर आकर खड़ी हो गई।
सामने जंगल था।
दोपहर की रोशनी अब पेड़ों की चोटियों पर अटक गई थी।
नीचे जमीन पर पहले से अंधेरा जमा होने लगा था।
पेड़ों के बीच इतनी गहराई थी कि कुछ जगह देखने पर ऐसा लगता था जैसे जंगल कुछ मीटर बाद खत्म हो जाता है।
लेकिन वह खत्म नहीं होता था।
वहाँ सिर्फ रोशनी खत्म होती थी।
मीरा ने कैमरा उठाया और सामने की तरफ देखा।
“यहाँ से जंगल काफी डरावना दिखता है।”
रघु ने उसकी तरफ देखा।
“रात को और अच्छा लगेगा।”
मीरा मुस्कुराई।
उन्होंने सामान व्यवस्थित किया।
अर्जुन ने कैमरा-ट्रैप की बैटरियाँ और मेमोरी कार्ड निकाले।
मीरा ने खाना बनाने का सामान निकाला।
रघु चौकी के बाहर खड़ा होकर लगातार जंगल की तरफ देखता रहा।
सूरज धीरे-धीरे पेड़ों के पीछे चला गया।
जंगल की आवाज़ें बदल गईं।
दिन में जो पक्षी लगातार बोल रहे थे, वे अचानक शांत हो गए।
उनकी जगह झींगुरों की आवाज़ ने ले ली।
दूर कहीं कोई रात का पक्षी बोला।
फिर कुछ देर बाद दूसरी दिशा से वैसी ही आवाज़ आई।
अर्जुन ने खाना खाते हुए पूछा,
“रघु, यहाँ रात को जानवर ज्यादा आते हैं?”
रघु ने खाना खाते-खाते जंगल की तरफ देखा।
“जानवर आते हैं।”
“बाघ?”
“कभी-कभी।”
“और कुछ?”
रघु ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने दोबारा नहीं पूछा।
रात पूरी तरह उतर चुकी थी।
चौकी से बाहर निकलने पर कुछ दिखाई नहीं देता था।
सिर्फ पेड़ों की काली आकृतियाँ।
और उनके बीच ऐसा अंधेरा, जिसमें आँखें कुछ देर बाद भी अभ्यस्त नहीं हो पा रही थीं।
करीब दस बजे उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया।
रघु ने कुंडी दो बार जाँची।
मीरा ने यह देखा।
“इतना मजबूत तो है नहीं।”
रघु ने कहा,
“दरवाजा मजबूत होने से कोई फायदा नहीं अगर खोलने वाला अंदर का हो।”
मीरा कुछ कहती, उससे पहले रघु अपने बिस्तर पर लेट चुका था।
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| आधी रात के सन्नाटे में बाहर से किसी ने अर्जुन का नाम पुकारा… लेकिन आवाज़ बिल्कुल अर्जुन की अपनी थी। |
करीब साढ़े ग्यारह बजे तक अर्जुन जागता रहा।
मीरा दूसरी तरफ सो चुकी थी।
रघु की साँसें धीमी और भारी थीं।
अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी में कुछ तस्वीरें देखीं।
बाहर हवा चल रही थी।
टीन की छत पर सूखी पत्तियाँ सरक रही थीं।
कभी कोई टहनी छत से टकराती।
फिर शांत हो जाती।
करीब डेढ़ बजे अर्जुन की आँख लग गई।
उसे पता नहीं चला कि कितनी देर सोया।
अचानक उसकी नींद खुली।
कमरे में अंधेरा था।
पहले उसे समझ नहीं आया कि किस चीज़ ने उसे जगाया।
पर उसने सुनी ।
भारी कदमों की आवाज़।
बहुत धीमी।
सूखी पत्तियों पर।
चौकी के सामने।
अर्जुन उठकर बैठ गया।
उसने मीरा की तरफ देखा।
मीरा भी जाग चुकी थी।
रघु आँखें बंद किए पड़ा था।
कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए।
कुछ सेकंड बीते।
फिर बाहर से बहुत धीमी आवाज़ आई—
“अर्जुन…”
अर्जुन के शरीर में जैसे अचानक ठंड उतर गई।
आवाज़ पहचानने में उसे एक क्षण भी नहीं लगा।
वह उसकी अपनी आवाज़ थी।
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
अर्जुन ने होंठों पर उंगली रख दी।
बाहर फिर सन्नाटा हो गया।
कुछ देर बाद वही आवाज़ आई।
इस बार थोड़ी साफ़।
“अर्जुन… दरवाजा खोलो।”
रघु उठ बैठा।
उसने अर्जुन की तरफ देखा और सिर हिला दिया।
नहीं।
अर्जुन की नजर दरवाजे पर थी।
दरवाजे के नीचे लगभग एक इंच की खाली जगह थी।
बाहर अंधेरा था।
कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर उस खाली जगह के सामने कुछ आकर रुक गया।
जैसे कोई व्यक्ति दरवाजे के ठीक बाहर खड़ा हो।
मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
काफी देर तक कोई आवाज़ नहीं आई।
करीब दो बजे के आसपास बाहर से एक बार फिर कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
इस बार वे दरवाजे से दूर जा रहे थे।
रघु ने पूरी रात किसी को बोलने नहीं दिया।
अर्जुन की आँखों में नींद लौटती रही, लेकिन वह सोने से डर रहा था।
मीरा भी करवट बदलती रही।
कभी बाहर हवा चलती।
कभी पेड़ों से पत्तियाँ गिरतीं।
कभी लगता जैसे कोई चौकी के चारों तरफ घूम रहा है।
रात का बाकी हिस्सा इसी तरह बीता।
सुबह से थोड़ी पहले शायद अर्जुन की आँख लग गई।
सुबह
पहली रोशनी कमरे की टूटी खिड़की से अंदर आई।
अर्जुन की आँख खुली तो कुछ क्षण तक उसे समझ नहीं आया कि रात सच में हुई थी या सपना था।
फिर उसने मीरा को देखा।
वह पहले से जागी हुई थी।
रघु दरवाजे के पास खड़ा था।
कुंडी खोलने से पहले उसने दोनों की तरफ देखा।
“कोई बाहर नहीं जाएगा।”
फिर उसने धीरे से दरवाजा खोला।
सुबह का जंगल रात से बिल्कुल अलग था।
पेड़ों की पत्तियों पर नमी थी।
हवा ठंडी थी।
दूर पक्षियों की आवाज़ फिर लौट आई थी।
कुछ बंदर पेड़ों पर दौड़ रहे थे।
सब कुछ सामान्य लग रहा था।
फिर रघु नीचे देखने लगा।
दरवाजे के सामने पैरों के निशान थे।
नंगे पैर।
एक व्यक्ति चौकी की तरफ आया था।
निशान सीधे दरवाजे तक आते थे।
लेकिन वापस जाने के कोई निशान नहीं थे।
अर्जुन कुछ देर उन निशानों को देखता रहा।
उसने सूखी मिट्टी उठाकर उन निशानों पर डाल दी।
“यहाँ से अब आगे जाना पड़ेगा।”
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दोपहर तक उन्हें चौकी से लगभग दो किलोमीटर दूर एक पुराना अस्थायी कैंप मिला।
यहीं से वनकर्मी देवेंद्र सिंह गायब हुआ था।
उसका बैग अभी भी वहीं था।
एक जंग लगी बंदूक।
पानी की आधी बोतल।
एक जोड़ी जूते।
और लकड़ी के बक्से में रखी डायरी।
अर्जुन ने डायरी खोली।
पहले कुछ पन्नों पर जानवरों के निशान और तारीखें थीं।
फिर लिखावट बदल गई।
एक पन्ने पर केवल एक वाक्य था—
“जानवर इस हिस्से से भाग रहे है।”
अगले पन्ने पर—
“वे किसी चीज से दर रहे हैं।”
और उसके नीचे—
“कल रात उसने मेरी आवाज़ में मुझे बुलाया।”
मीरा ने धीरे से पूछा,
“किसने?”
रघु डायरी से नजर नहीं हटा रहा था।
“पता नहीं।”
लेकिन उसके चेहरे पर साफ था कि वह जानता था।
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अगले दिन वे जंगल के उस हिस्से में पहुँचे जहाँ पेड़ अचानक और घने हो गए थे।
रघु ने कहा,
“यहीं से कालीधार शुरू होता है।”
कोई बोर्ड नहीं था।
कोई ठीक रास्ता भी नहीं था।
बस पेड़ों के बीच एक पुरानी पगडंडी थी।
वे आगे बढ़े।
करीब आधे घंटे बाद अर्जुन ने एक पेड़ देखा।
उसकी छाल पर कई नाम खुदे हुए थे।
नामों के साथ तारीखें भी थीं।
कुछ बहुत पुराने।
कुछ केवल कुछ साल पुराने।
मीरा ने कैमरा निकाला।
तभी उसे जमीन पर कुछ पड़ा दिखाई दिया।
एक पुरानी घड़ी।
उसके पास चाकू।
एक टूटी चप्पल।
फिर थोड़ा आगे एक पुराना कैमरा।
रघु ने किसी चीज़ को छुआ तक नहीं।
अर्जुन ने पूछा,
“ये सब किसके हैं?”
जवाब क्लिक पास नाही था..
फिर आगे बढ़ते हुए मीरा अचानक रुक गई।
उसे किसी ने पुकारा था।
“मीरा…”
वह आवाज़ बहुत पास से आई थी।
मीरा ने पीछे देखा।
कोई नहीं था।
फिर आवाज़ आई—
“मीरा…”
इस बार बिल्कुल उसकी अपनी आवाज़ में।
रघु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“पीछे मत देखो।”
कुछ क्षण बाद आवाज़ बंद हो गई।
वे आगे बढ़ते रहे।
शाम होने से पहले उन्हें देवेंद्र का दूसरा कैंप मिला।
वहाँ एक छोटा टिन का डिब्बा था।
उसमें कागजों का एक बंडल।
अर्जुन ने एक कागज खोला।
लिखा था—
“वहरूप धारन करता है।”
नीचे दूसरी लाइन—
“पहले आवाज़ सीखता है।”
उसके नीचे—
“फिर चाल।”
और आखिरी लाइन—
“जब यह तुम्हारी परछाई बनाना सीख जाए, तब बहुत देर हो चुकी होती है।”
अर्जुन ने कागज नीचे रख दिया।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
शाम होते-होते उन्हें एक छोटा-सा पत्थर का चबूतरा मिला।
उसके पास पुराना लोहे का बक्सा पड़ा था।
अंदर कुछ सरकारी कागज और एक फोटो थी।
फोटो लगभग पच्चीस साल पुरानी थी।
रघु ने फोटो हाथ में ली।
उसका चेहरा बदल गया।
फोटो में चार लोग खड़े थे।
एक युवा रघु।
उसका भाई नरेश।
एक वनकर्मी।
और उनके बीच एक बच्चा।
अर्जुन ने फोटो को ध्यान से देखा।
बच्चे के कपड़े अजीब तरह से परिचित थे।
उसने फोटो पलटी।
पीछे लिखा था—
“कालीधार — आखिरी रात।”
अर्जुन ने पूछा,
“ये बच्चा कौन है?”
रघु ने तुरंत फोटो वापस ले ली।
“चलो।”
“रघु, कौन है?”
रघु ने जवाब नहीं दिया।
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उस रात वे वापस भैरवगढ़ चौकी पहुँचे।
इस बार तीनों के भीतर रात को लेकर पहले जैसी सहजता नहीं थी।
दरवाजा बंद हुआ।
लालटेन जलाई गई।
बाहर हवा चल रही थी।
करीब बारह बजे
जंगल में कहीं दूर से एक पक्षी चीखा।
कुछ देर बाद दूसरी तरफ से वही आवाज़ आई।
फिर अचानक सब शांत हो गया।
करीब ढाई बजे अर्जुन की आँख खुली।
उसने देखा—
मीरा सो रही थी।
रघु भी।
वह उठकर पानी पीने लगा।
तभी बाहर से आवाज़ आई।
“अर्जुन…”
इस बार आवाज़ उसकी नहीं थी।
रघु की थी।
अर्जुन ने रघु की तरफ देखा।
रघु गहरी नींद में था।
बाहर फिर आवाज़ आई—
“अर्जुन… बाहर आ।”
रघु अचानक जाग गया।
उसने आवाज़ सुनी।
उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
फिर दरवाजे के नीचे कुछ दिखाई दिया।
एक हाथ।
लेकिन वह हाथ सामान्य नहीं था।
उंगलियाँ…
छह थीं।
अर्जुन पीछे हट गया।
मीरा ने चीख दबा ली।
हाथ कुछ क्षण दरवाजे के नीचे रहा।
फिर धीरे-धीरे पीछे चला गया।
उसके बाद पूरी रात कोई आवाज़ नहीं आई।
सुबह दरवाजे के बाहर पेड़ की छाल पर किसी ने कुछ खरोंचा था।
तीन शब्द—
“अब पहचान लिय
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| कमरे में सिर्फ तीन लोग थे… फिर फर्श पर चार परछाइयाँ किसकी थीं? |
रघु ने उसी सुबह कहा—
“हमें कालीधार वापस जाना होगा।”
अर्जुन ने पूछा,
“क्यों?”
रघु ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।
“क्योंकि अब वह तुम्हें पहचानता है।”
वे तीनों दोबारा जंगल में गए।
दोपहर तक वे उस पुराने जले हुए हिस्से तक पहुँचे।
चारों ओर बड़े पेड़ों के बीच एक गोल खाली जगह थी।
जमीन काली थी।
कुछ पुराने जले हुए तने अभी भी खड़े थे।
रघु काफी देर तक चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“पच्चीस साल पहले यहाँ आग लगी थी।”
अर्जुन ने पुरानी तस्वीर याद की।
रघु आगे बोला—
“उस रात मेरा भाई नरेश गायब हुआ था।”
“तीन दिन बाद वापस आया।”
“जिंदा।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“फिर?”
रघु की आवाज़ धीमी हो गई।
“उसने कहा था… जंगल में उसके साथ एक आदमी चल रहा था।”
“कौन?”
“वह।”
“कौन वह?”
रघु ने जवाब नहीं दिया।
उसने बस सामने की तरफ देखा।
अर्जुन ने भी देखा।
कुछ नहीं था।
फिर झाड़ियों के पीछे एक आकृति दिखाई दी।
कोई आदमी खड़ा था।
धीरे-धीरे वह आगे आया।
अर्जुन के पैर जैसे जमीन में जम गए।
वह आदमी…
अर्जुन जैसा दिखता था।
वही चेहरा।
वही कपड़े।
वही कद।
मीरा ने कैमरा उठाया।
रघु ने उसका हाथ रोकना चाहा।
लेकिन देर हो चुकी थी।
कैमरे की स्क्रीन पर कुछ और दिखाई दे रहा था।
उस आदमी के पीछे जंगल में दर्जनों आकृतियाँ खड़ी थीं।
वे लोग थे।
पुराने कपड़ों में।
कुछ झुके हुए।
कुछ सीधे।
एक चेहरा देवेंद्र का था।
अर्जुन ने स्क्रीन से नजर हटाकर जंगल की तरफ देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर उसने कैमरे में देखा।
वे अभी भी वहाँ थे।
और उसके सामने खड़ा दूसरा अर्जुन…
मुस्कुरा रहा था।
सूरज ढल रहा था।
अर्जुन पीछे हटने लगा।
तभी उसने नीचे देखा।
उसकी अपनी परछाई जमीन पर थी।
लेकिन वह उसके पैरों के साथ नहीं थी।
वह थोड़ी आगे खिसकी हुई थी।
अर्जुन ने पैर पीछे किया।
परछाई वहीं रही।
फिर धीरे-धीरे…
उसकी परछाई उठी।
ऐसा लगा जैसे जमीन पर पड़ा कोई काला आकार इंसान की तरह खड़ा हो रहा हो।
मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
रघु ने अपनी जेब से माचिस निकाली।
उसने सूखी घास में आग लगा दी।
आग फैलने लगी।
सामने खड़ा दूसरा अर्जुन पहली बार पीछे हटा।
जंगल में खड़ी आकृतियाँ भी पीछे हटने लगीं।
लेकिन वे आग से नहीं डर रही थीं।
वे अपनी परछाइयों से डर रही थीं।
जहाँ आग की रोशनी पड़ती, वहाँ उनके नीचे काली आकृतियाँ दिखाई देतीं।
और उन परछाइयों के भीतर कुछ हिल रहा था।
जैसे वे परछाइयाँ जीवित हों।
रघु चिल्लाया—
“भागो!”
तीनों जंगल की तरफ दौड़ पड़े।
पीछे से कदमों की आवाज़ आने लगी।
लेकिन किसी को पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।
वे रात होने से पहले चौकी पहुँच गए।
दरवाजा बंद किया।
अंदर तीनों हाँफ रहे थे।
काफी देर तक कोई नहीं बोला।
मीरा ने कैमरा निकाला।
उसने तस्वीरें देखनी शुरू कीं।
एक तस्वीर पर उसकी उंगली रुक गई।
उसमें दो अर्जुन खड़े थे।
एक सामने।
दूसरा थोड़ा पीछे।
दोनों बिल्कुल एक जैसे।
लेकिन रोशनी एक ही दिशा से आ रही थी।
फिर भी…
दोनों की परछाइयाँ दो अलग दिशाओं में जा रही थीं।
मीरा ने तस्वीर ज़ूम की।
दूसरे अर्जुन की परछाई के भीतर कुछ था।
दो छोटे सफेद बिंदु।
जैसे…
आँखें।
उसी समय अर्जुन का फोन बजा।
कमरे में किसी ने फोन की उम्मीद नहीं की थी।
अर्जुन ने स्क्रीन देखी।
कॉल उसी के नंबर से आ रही थी।
उसने फोन उठाया।
दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।
फिर उसकी अपनी आवाज़ आई—
“तुमने तस्वीर देख ली?”
अर्जुन ने धीरे-धीरे फोन नीचे किया।
मीरा उसकी तरफ देख रही थी।
रघु भी।
और तभी मीरा की नजर फर्श पर गई।
कमरे में लालटेन की रोशनी पड़ रही थी।
अर्जुन खड़ा था।
उसकी परछाई भी उसके पैरों के नीचे थी।
सब सामान्य था।
फिर…
परछाई ने अपना सिर उठाया।
अर्जुन ने सिर नहीं उठाया था।
मीरा पीछे हट गई।
फोन अभी भी अर्जुन के हाथ में था।
दूसरी तरफ से आवाज़ आई—
“अब तुम समझ गई हो…”
कुछ क्षण का सन्नाटा।
अर्जुन ने अपनी परछाई की तरफ देखा।
वह अब बिल्कुल स्थिर थी।
लेकिन उसकी आँखें…
अर्जुन की आँखों से नहीं मिल रही थीं।
वे मीरा को देख रही थीं।
बाहर जंगल में हवा चल रही थी।
पेड़ों की शाखाएँ चौकी की दीवार से टकरा रही थीं।
और उसी क्षण चौकी के बाहर किसी ने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी।
ठक।
तीनों जम गए।
कुछ सेकंड बाद फिर—
ठक।
फिर बाहर से आवाज़ आई।
बहुत परिचित आवाज़।
मीरा की अपनी आवाज़।
“दरवाजा खोलो…”
अंदर खड़े तीनों लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
क्योंकि मीरा…
अभी उनके बीच खड़ी थी।
और उस रात भैरवगढ़ चौकी के फर्श पर—
तीन लोगों के लिए चार परछाइयाँ थीं।




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