रात के दो बज चुके थे।
पूरा शहर सो रहा था।
मुख्य सड़कें खाली थीं। दुकानों के शटर बंद थे और इक्का-दुक्का स्ट्रीट लाइट के नीचे सड़क का एक छोटा-सा हिस्सा दिखाई दे रहा था।
पुलिस की जीप धीरे-धीरे शहर के पुराने औद्योगिक इलाके से गुजर रही थी।
जीप में इंस्पेक्टर काले आगे बैठे थे। पीछे दो कॉन्स्टेबल थे।
काले ने खिड़की से बाहर देखा।
“आगे वाला रास्ता देखना।”
ड्राइवर ने जीप की रफ्तार थोड़ी कम कर दी।
कुछ दूर जाने के बाद अचानक काले की नजर सड़क के किनारे खड़ी एक कार पर पड़ी।
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| रात के सन्नाटे में काली कार की डिक्की से मिली राजन की सिर कटी लाश ने पूरे मामले को रहस्य में बदल दिया। |
काली कार।
इंजन बंद।
हेडलाइट बंद।
और सबसे अजीब बात—
उस इलाके में उस समय कोई होना ही नहीं चाहिए था।
“रुको।”
जीप कार से कुछ दूरी पर जाकर रुक गई।
काले नीचे उतरे।
दोनों कॉन्स्टेबल भी उतर आए।
चारों तरफ देखा गया।
कोई नहीं।
न कोई आदमी।
न कोई दूसरी गाड़ी।
न आसपास कोई खुली दुकान।
सिर्फ दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज आ रही थी।
काले कार के पास गए।
उन्होंने पहले नंबर प्लेट देखी।
फिर अंदर झांककर देखा।
ड्राइविंग सीट खाली थी।
सामने की सीट भी खाली।
उन्होंने शीशे पर हाथ रखकर अंदर देखने की कोशिश की।
कुछ खास नजर नहीं आया।
“कार लॉक है?” उन्होंने पूछा।
एक कॉन्स्टेबल ने दरवाजा खींचकर देखा।
“हाँ, साहब।”
काले ने सड़क की तरफ देखा।
“इतनी रात को यहाँ कार कौन छोड़कर गया?”
कोई जवाब नहीं था।
उन्होंने कार के चारों तरफ चक्कर लगाया।
टायर ठीक थे।
कोई एक्सीडेंट के निशान नहीं।
कार पर बाहर से कोई खास नुकसान भी नहीं था।
काले ने फिर ड्राइवर की सीट की तरफ देखा।
“अंदर कोई सामान?”
कॉन्स्टेबल ने शीशे से देखकर कहा,
“कुछ खास नहीं, साहब।”
काले ने हाथ से इशारा किया।
“चेक करो।”
एक कॉन्स्टेबल कार के अगले हिस्से की तलाशी लेने लगा।
दूसरा पीछे चला गया।
कार की पिछली सीट पर एक पुराना बैग पड़ा था।
बैग खाली था।
दरवाजे के नीचे भी कुछ नहीं था।
काले ने घड़ी देखी।
2:17।
“मालिक को ढूंढो।”
एक कॉन्स्टेबल ने आसपास नजर दौड़ाई।
“साहब, अगर मालिक यहीं कहीं गया होगा तो—”
वाक्य पूरा होने से पहले पीछे खड़े कॉन्स्टेबल ने आवाज दी।
“साहब।”
काले उसकी तरफ मुड़े।
कॉन्स्टेबल कार की डिक्की के पास खड़ा था।
“क्या हुआ?”
“डिक्की लॉक है।”
काले उसके पास गए।
“तो?”
“साहब... इसे भी देख लेते हैं।”
काले ने कुछ पल डिक्की को देखा।
फिर बोले,
“खोलो।”
कॉन्स्टेबल ने चाबी से लॉक खोलने की कोशिश की।
लॉक नहीं खुला।
दूसरी चाबी आजमाई गई।
फिर भी नहीं।
काले ने कहा,
“तोड़ दो।”
कॉन्स्टेबल ने लोहे की रॉड निकाली।
रात की खामोशी में पहला वार हुआ।
ठक!
दूसरा वार।
ठक!
तीसरे वार के बाद लॉक टूट गया।
डिक्की का ढक्कन थोड़ा ऊपर उठा।
कॉन्स्टेबल ने हाथ लगाकर उसे पूरा खोल दिया।
और उसी पल उसके हाथ वहीं रुक गए।
चेहरे का रंग बदल गया।
काले ने पूछा,
“क्या हुआ?”
कॉन्स्टेबल पीछे हट गया।
काले आगे बढ़े।
टॉर्च की रोशनी डिक्की के अंदर गई।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
डिक्की में एक आदमी पड़ा था।
उसके हाथ पीछे की तरफ बंधे थे।
पैर रस्सी से बंधे थे।
कपड़े धूल से लगभग साफ थे।
और—
उसका सिर नहीं था।
काले की नजर कुछ क्षण उस शरीर पर टिकी रही।
फिर उन्होंने धीरे से कहा,
“किसी को हाथ मत लगाने देना।”
एक कॉन्स्टेबल ने तुरंत वायरलेस उठाया।
“कंट्रोल... यहाँ एक संदिग्ध वाहन मिला है। डिक्की में एक शव है।”
काले ने शव से नजर नहीं हटाई।
उन्हें अभी एक बात समझ नहीं आ रही थी।
अगर किसी ने हत्या करके शव यहाँ छोड़ा था...
तो वह इतनी सुनसान जगह पर कार छोड़कर गया क्यों?
और अगर कार सिर्फ शव छोड़ने के लिए लाई गई थी...
तो कार का मालिक कहाँ था?
काले ने चारों तरफ देखा।
सड़क खाली थी।
जैसे इस जगह ने रात की उस घटना को अपने भीतर छिपा लिया हो।
उन्हें तब पता नहीं था कि इस डिक्की में पड़ा शव अगले कई दिनों तक पुलिस को सिर्फ एक सवाल का जवाब ढूंढने पर मजबूर करने वाला था—
यह आदमी आखिर था कौन?
सुबह के साढ़े चार बज रहे थे।
अपराध स्थल पर अब पुलिस की गाड़ियाँ बढ़ चुकी थीं।
कार के चारों तरफ बैरिकेड लगा दिया गया था। फॉरेंसिक टीम तस्वीरें ले रही थी। सड़क के दोनों तरफ पुलिसकर्मी खड़े थे।
इंस्पेक्टर काले अब तक वहीं थे।
रात की घटना ने उन्हें परेशान कर रखा था।
तभी पीछे से एक सफेद कार आकर रुकी।
दरवाजा खुला।
एक लंबा, चौड़े कंधों वाला आदमी बाहर उतरा।
साधारण कपड़े।
हाथ में कोई फाइल नहीं।
चेहरे पर न जल्दबाजी, न नींद।
वह कुछ कदम आगे बढ़ा और बिना किसी से कुछ पूछे सीधे कार की तरफ देखने लगा।
अरुण राणे।
क्राइम ब्रांच।
काले ने आगे बढ़कर सलाम किया।
“सर।”
अरुण ने जवाब में सिर्फ सिर हिलाया।
उसकी नजर पहले कार पर गई।
फिर सड़क पर।
फिर कार के टायरों पर।
फिर डिक्की पर।
काले ने कहा,
“सर, रात करीब दो बजे कार मिली। अंदर कोई नहीं था। डिक्की खोलने पर शव मिला।”
अरुण ने पूछा,
“कार किसकी है?”
“अभी पता नहीं चला।”
“चाबी?”
“कार के अंदर नहीं मिली।”
अरुण चुप रहा।
वह कार के चारों तरफ घूमने लगा।
काले उसके पीछे-पीछे चल रहे थे।
अरुण झुका।
सड़क की मिट्टी को देखा।
फिर कार के पिछले टायर को।
“इसे यहाँ कितनी देर से खड़ा होना चाहिए?”
काले ने कहा,
“पता नहीं सर।”
अरुण ने टायर की तरफ इशारा किया।
“कम से कम इतना तो पता है कि कार यहाँ चलाकर लाई गई है।”
काले ने कहा,
“जी।”
अरुण डिक्की के पास गया।
अंदर पड़े शव को कुछ क्षण देखा।
“शव को किसी ने घसीटा नहीं है।”
काले ने चौंककर पूछा,
“आपको कैसे पता?”
अरुण ने रस्सी की तरफ इशारा किया।
“अगर इसे जमीन पर घसीटकर डिक्की तक लाया गया होता, तो कपड़ों के नीचे और पीठ पर मिट्टी होती।”
काले नीचे झुके।
वास्तव में कपड़े लगभग साफ थे।
अरुण ने कहा,
“जिसने इसे यहाँ रखा है, उसने इसे उठाकर रखा है।”
काले ने पूछा,
“एक आदमी ने?”
अरुण ने शव को देखा।
“शायद दो।”
फिर उसकी नजर बंधे हुए हाथों पर गई।
रस्सी को छुआ नहीं।
सिर्फ देखा।
“इसे बाँधने वाला जल्दी में नहीं था।”
काले ने पूछा,
“क्यों?”
अरुण ने कहा,
“गांठ देखो।”
काले ने टॉर्च पास की।
गांठ साफ और मजबूत थी।
अरुण ने कहा,
“घबराया हुआ आदमी ऐसी गांठ नहीं लगाता।”
फिर वह सीधा खड़ा हो गया।
कुछ सेकंड तक वह चुप रहा।
“पोस्टमार्टम जल्दी करवाओ।”
“जी।”
“और कार को अभी थाने मत ले जाना।”
काले ने पूछा,
“क्यों?”
अरुण ने सड़क की तरफ देखा।
“क्योंकि कार हमें यहाँ तक लाई है।”
फिर उसने धीरे से कहा—
“लेकिन जरूरी नहीं कि कातिल भी इसी रास्ते आया हो।”
काले उसकी तरफ देखने लगे।
अरुण ने आसपास नजर दौड़ाई।
“इस सड़क पर रात में आने-जाने वाले हर वाहन का पता करो।”
“जी सर।”
“और एक बात।”
“जी?”
अरुण ने कार की डिक्की की तरफ देखा।
“जिसने इस आदमी का सिर काटा है…”
वह कुछ पल रुका।
“…वह सिर्फ हत्या नहीं छिपाना चाहता था।”
काले ने पूछा,
“तो क्या चाहता था?”
अरुण की नजर शव पर टिक गई।
“पहचान।”
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| अरुण राणे के सामने सवाल सिर्फ हत्या का नहीं था—राजन की मौत से पहले के उन तीन दिनों में आखिर हुआ क्या था? |
सुबह तक खबर पूरे शहर में फैल चुकी थी।
सिर कटी लाश।
पुलिस ने मृतक की पहचान के बारे में कुछ नहीं बताया।
अरुण ने उसी दिन से जांच शुरू कर दी।
शहर के सभी थानों में पिछले एक सप्ताह की गुमशुदगी की रिपोर्ट मंगाई गई।
लेकिन कोई ऐसा नाम नहीं मिला जो इस शव से निश्चित रूप से जुड़ सके।
चार दिन हुये।
कुछ नहीं।
लाश की पहचान नहीं हुई।
फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई।
अरुण ने रिपोर्ट पढ़ी।
उसकी आंखें एक जगह रुक गईं।
मृतक की उम्र लगभग 25 वर्ष।
लेकिन अगली लाइन ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
मृत्यु से पहले शरीर में जहरीला पदार्थ पाया गया था।
अरुण ने रिपोर्ट मेज पर रख दी।
अभिजीत काले सामने बैठा था।
“पहले जहर…”
अरुण ने कहा।
“फिर सिर काटा गया।”
अभिजीत ने पूछा,
“मतलब?”
अरुण ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“मतलब जिसने उसे मारा, उसने उसे कमजोर करने के बाद मारा।”
“क्यों?”
“यही पता करना है।”
उसी शाम एक और खबर आई।
जंगल में एक चरवाहे को इंसानी सिर मिला था।
फॉरेंसिक जांच के बाद पुष्टि हुई—
वह उसी लाश का सिर था।
अब अरुण के पास एक मृत आदमी था।
एक सिर था।
एक कार थी।
लेकिन आदमी की पहचान अभी भी नहीं थी।
फिर अचानक—
25 जुलाई की एक मिसिंग कंप्लेंट सामने आई।
नाम था—
राजन।
उम्र—
25 साल।
अरुण ने फाइल खोली।
और पहली बार इस केस में उसके चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान आई।
“अभिजीत…”
“जी सर?”
“अब हमारे पास एक नाम है।”
उसने फाइल बंद की।
“लेकिन नाम मिलना मतलब केस सुलझना नहीं होता।”
अरुण उठ खड़ा हुआ।
“अब पता लगाओ…”
वह दरवाजे तक गया।
“अब पता लगाओ…”
वह पलटा।
“राजन की मौत के बाद उसके साथ तीन दिन तक क्या हुआ था।”
अभिजीत काले ने उसकी तरफ देखा।
“सर… मौत के बाद?”
अरुण ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“लेकिन पोस्टमार्टम में तो—”
“पोस्टमार्टम हमें यह बताएगा कि वह कैसे मरा।”
अरुण ने मेज पर पड़ी राजन की फाइल उठाई।
“मुझे यह जानना है कि मरने से पहले तीन दिन वह कहाँ था।”
---
राजन की झोपड़ी में पुलिस पहुँची तो वहाँ ऐसा कुछ नहीं मिला जो किसी बड़े रहस्य की ओर इशारा करता।
एक पुराना पंखा।
दो जोड़ी कपड़े।
एक टूटा हुआ मोबाइल चार्जर।
और बिस्तर के नीचे रखा लोहे का छोटा-सा बक्सा।
बक्से में सिर्फ कुछ कागज थे।
अभिजीत ने एक-एक करके उन्हें देखा।
अधिकतर बेकार थे।
पुरानी नौकरी के कागज।
कंपनी का पहचान-पत्र।
कुछ रसीदें।
लेकिन सबसे नीचे एक छोटी-सी पर्ची थी।
उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—
“गोदाम नंबर 17।”
अरुण ने पर्ची हाथ में ली।
“यह कहाँ है?”
अभिजीत ने तुरंत फोन किया।
कुछ देर बाद जवाब मिला।
“देवधर इंडस्ट्रीज का पुराना गोदाम।”
अरुण ने पर्ची मोड़कर जेब में रख ली।
“चलो।”
---
गोदाम नंबर 17 शहर के पुराने औद्योगिक इलाके में था।
कई साल से बंद पड़ा था।
दरवाजा बाहर से बंद था,
अरुण वहीं रुक गया।
उसने ताले को देखा।
फिर जमीन को।
दरवाजे के नीचे धूल में जूते के हल्के निशान थे।
अभिजीत ने कहा,
“कोई हाल में अंदर गया है।”
अरुण ने जवाब नहीं दिया।
ताला खुलवाया गया।
अंदर अंधेरा था।
पुराने लकड़ी के बक्से दीवार के पास रखे थे।
एक कोने में टूटी मशीनें थीं।
और बीच में एक मेज।
मेज पर धूल जमी थी।
लेकिन धूल के बीच एक जगह साफ थी।
जैसे वहाँ हाल ही में कोई चीज रखी गई हो।
अरुण ने मेज की दराज खोली।
अंदर एक छोटी डायरी मिली।
राजन की।
पहले कुछ पन्ने खाली थे।
फिर तारीखें लिखी थीं।
22 जुलाई।
एक लाइन।
“कुछ गड़बड़ है।”
23 जुलाई—
“जिसे माल समझ रहे हैं, वह माल नहीं है।”
24 जुलाई—
सिर्फ एक शब्द।
“नाम मिल गया।”
और 25 जुलाई के पन्ने पर कुछ नहीं था।
अरुण ने डायरी बंद कर दी।
अभिजीत ने पूछा,
“सर, राजन कंपनी में क्या खोज रहा था?”
अरुण ने कहा,
“यही पता करना है।”
देवधर इंडस्ट्रीज के रिकॉर्ड निकाले गए।
राजन वहाँ छह महीने तक स्टोर सेक्शन में काम कर चुका था।
उसका काम साधारण था।
माल की एंट्री।
बिलों की जांच।
गोदामों का हिसाब।
लेकिन पिछले महीने उसने अचानक नौकरी छोड़ दी थी।
कारण लिखा था—
व्यक्तिगत समस्या।
अरुण ने कंपनी के अकाउंट विभाग से पिछले तीन महीनों के रिकॉर्ड मंगवाए।
कुछ घंटों बाद एक अजीब बात सामने आई।
गोदाम नंबर 17 में दर्ज माल और वास्तविक माल की मात्रा में अंतर था।
छोटी रकम नहीं।
करोड़ों रुपये का माल गायब था।
लेकिन रिकॉर्ड में सब ठीक था।
अभिजीत ने कहा,
“सर, राजन को यह पता चला होगा।”
अरुण ने सिर हिलाया।
“शायद।”
“तो उसने किसी को बताया?”
“अगर बताया होता तो वह जिंदा होता?”
अभिजीत चुप हो गया।
अरुण ने फिर रिकॉर्ड देखा।
“यह चोरी सिर्फ माल की नहीं है।”
“फिर?”
“देखो तारीख।”
अभिजीत ने तारीखें मिलाईं।
माल हर बार कंपनी के रिकॉर्ड में बाहर भेजा गया था।
लेकिन जिस वाहन से माल भेजा गया था…
वे वाहन उस दिन कंपनी से निकले ही नहीं थे।
अरुण की आँखें सिकुड़ गईं।
“नकली बिल।”
![]() |
| गोदाम नंबर 17 में मिली राजन की डायरी ने हत्या के पीछे छिपे तीन दिनों के रहस्य की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सामने ला दी। |
अब करण देवधर से दोबारा पूछताछ जरूरी थी।
करण ने सब सुनने के बाद कहा,
“मुझे इन रिकॉर्ड्स के बारे में कुछ नहीं पता।”
अरुण ने पूछा,
“आप कंपनी के मालिक हैं।”
“हर विभाग की जानकारी मालिक को नहीं होती।”
“राजन को होती थी?”
करण चुप रहा।
“उसने गोदाम नंबर 17 में क्या देखा था?”
करण ने कोई जवाब नहीं दिया।
अरुण ने उसकी ओर देखा।
“आप डर रहे हैं।”
करण ने धीरे से कहा,
“मैं अपने परिवार के लिए डर रहा हूँ।”
“किससे?"
करण ने सामने रखे कागजों की तरफ देखा।
“जिस खेल में राजन फँसा था… उसमें मैं भी पूरी तरह बाहर नहीं था।”
अभिजीत चौकन्ना हो गया।
करण ने आखिरकार बताया कि कंपनी के कुछ वरिष्ठ लोग वर्षों से नकली बिलों के जरिए माल बाहर भेज रहे थे।
करण को शक था।
लेकिन उसने कभी सीधे हस्तक्षेप नहीं किया।
क्योंकि उन लोगों में कंपनी के ऐसे लोग शामिल थे जिन पर वह वर्षों से भरोसा करता आया था।
राजन ने यह खेल पकड़ लिया था।
और उसने सबूत जमा करने शुरू कर दिए।
अरुण ने पूछा,
“क्या राजन आपको ब्लैकमेल कर रहा था?”
करण ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
अरुण रुक गया।
यह जवाब बहुत जल्दी आया था।
“फिर वह आपसे क्या चाहता था?”
करण ने कहा,
“सच।”
“किसके बारे में?”
करण ने नजरें झुका लीं।
“वह जानना चाहता था कि कंपनी के अंदर यह सब कौन चला रहा है।”
---
अरुण ने राजन के फोन की पूरी कॉल हिस्ट्री निकलवाई।
22 से 25 जुलाई के बीच राजन ने कई बार एक ही नंबर पर फोन किया था।
नंबर कंपनी के किसी कर्मचारी के नाम पर नहीं था।
सिम किसी दूसरे आदमी के नाम पर था।
लेकिन लोकेशन हर बार देवधर इंडस्ट्रीज के आसपास की थी।
अरुण ने नंबर ट्रेस करवाया।
कुछ देर बाद नाम सामने आया—
रवि मेहरा।
कंपनी का ड्राइवर।
रवि को बुलाया गया।
उसने राजन को पहचानने से इनकार कर दिया।
“मैं उसे जानता ही नहीं।”
अरुण ने सामने उसका फोटो रखा।
“तुम्हारी गाड़ी 23 जुलाई को गोदाम नंबर 17 के बाहर क्यों थी?”
रवि चुप।
“24 जुलाई?”
चुप।
“25 जुलाई?”
इस बार रवि के चेहरे का रंग बदल गया।
अरुण ने फाइल बंद कर दी।
“ठीक है।”
रवि ने राहत की सांस ली।
अरुण उठ गया।
दरवाजे तक गया।
फिर बिना पीछे देखे बोला—
“वैसे राजन ने मरने से पहले तुम्हारा नाम लिखा था।”
रवि तुरंत बोल पड़ा—
“झूठ!”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अरुण धीरे-धीरे पलटा।
“मैंने कहा ही नहीं था कि राजन ने मरने से पहले कुछ लिखा था।”
रवि समझ चुका था।
वह फँस गया।
---
रवि ने आखिरकार बताया कि वह राजन को 23 जुलाई से मिल रहा था।
राजन ने उससे कंपनी के कुछ पुराने माल की तस्वीरें और वाहन रिकॉर्ड हासिल करने में मदद मांगी थी।
बदले में पैसे देने का वादा किया था।
लेकिन 24 जुलाई को राजन को कुछ और मिल गया।
एक पुराना दस्तावेज।
उस दस्तावेज में एक ऐसे व्यक्ति का नाम था जो नकली बिलों के पूरे नेटवर्क को चला रहा था।
रवि ने कहा—
“राजन ने नाम देखकर कहा था… अब यह आदमी उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”
अरुण ने पूछा,
“नाम क्या था?”
रवि ने सिर झुका लिया।
“मुझे नहीं पता।”
“झूठ।”
“सच कह रहा हूँ।”
अरुण ने कुछ नहीं कहा।
रवि को जाने दिया गया।
अभिजीत ने पूछा,
“सर, उसे छोड़ क्यों दिया?”
अरुण ने कहा,
“क्योंकि वह डर रहा है।”
“किससे?”
अरुण ने जवाब नहीं दिया।
वह सिर्फ राजन की डायरी देख रहा था।
24 जुलाई।
“नाम मिल गया।”
---
25 जुलाई की रात।
राजन की आखिरी लोकेशन देवधर इंडस्ट्रीज नहीं थी।
वह शहर के दूसरे हिस्से में थी।
एक पुराने होटल के पास।
अरुण वहाँ पहुँचा।
होटल के सीसीटीवी रिकॉर्ड में राजन दिखाई दिया।
वह अकेला नहीं था।
उसके सामने एक आदमी बैठा था।
चेहरा कैमरे से साफ नहीं था।
लेकिन बातचीत लगभग चालीस मिनट चली।
फिर राजन उठा।
उस आदमी ने उसका हाथ पकड़ा।
राजन ने हाथ छुड़ाया।
और बाहर चला गया।
अरुण ने फुटेज आगे बढ़ाया।
होटल के बाहर एक कार खड़ी थी।
काली कार।
वही मॉडल…
जिसकी डिक्की से राजन की लाश मिली थी।
अभिजीत ने कहा,
“सर…”
अरुण ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
वह फुटेज को पीछे ले गया।
फिर आगे।
फिर पीछे।
“कार 25 जुलाई को होटल के बाहर थी।”
“जी।”
“लेकिन हमें मिली 28 जुलाई की रात।”
अरुण स्क्रीन को देखता रहा।
फिर धीरे से बोला—
“तो इन तीन दिनों में कार कहाँ थी?”
---
कार की पूरी यात्रा निकाली गई।
25 जुलाई—
होटल।
26 जुलाई—
कोई रिकॉर्ड नहीं।
27 जुलाई—
एक टोल प्लाजा पर कैमरे में दिखाई दी।
28 जुलाई—
अपराध स्थल।
अरुण ने नक्शा सामने फैलाया।
होटल से टोल प्लाजा तक का रास्ता देखा।
फिर टोल प्लाजा से अपराध स्थल तक।
बीच में एक जगह थी।
देवधर इंडस्ट्रीज का पुराना गोदाम नंबर 17।
अरुण कुछ देर चुप रहा।
“तीन दिन…”
अभिजीत ने कहा,
“सर?”
“राजन की लाश तीन दिन तक गोदाम में थी।”
“लेकिन वहाँ तो सिर्फ खून मिला था।”
अरुण ने उसकी तरफ देखा।
“खून मिला था।”
“लाश नहीं।”
“यही तो।”
---
फॉरेंसिक टीम ने गोदाम नंबर 17 फिर से खंगाला।
बहुत देर खंगालने के बाद एक बड़े लोहे के कंटेनर के नीचे से कपड़े का छोटा टुकड़ा मिला।
डीएनए जांच हुई।
राजन का।
लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण चीज कंटेनर के नीचे मिली—
एक बहुत पतली प्लास्टिक शीट।
उस पर जमे खून के निशान थे।
अरुण ने उसे देखा।
फिर कार की डिक्की की तस्वीर देखी।
उसकी आँखें अचानक रुक गईं।
“अभिजीत।”
“जी?”
“डिक्की में खून इतना कम क्यों था?”
अभिजीत ने तस्वीर देखी।
“क्योंकि लाश पहले कहीं और थी।”
अरुण ने सिर हिलाया।
“और जब लाश कार में रखी गई…”
वह रुका।
“उसे धोया गया था।”
अब तीन दिन का पहला हिस्सा साफ था।
राजन 25 जुलाई को गोदाम नंबर 17 में पहुँचा।
वहाँ उसे जहर दिया गया।
वह तुरंत नहीं मरा।
उसे वहीं बंद करके रखा गया।
अगले दिन उसकी हालत बिगड़ी।
27 जुलाई को उसकी मौत हुई।
और 28 जुलाई की रात उसकी लाश कार में डालकर सड़क किनारे छोड़ दी गई।
लेकिन अभी भी एक सवाल था।
जहर किसने दिया?
और…
राजन का सिर किसने काटा?
---
अरुण ने होटल की फुटेज फिर देखी।
इस बार उसने राजन को नहीं देखा।
उसने सामने बैठे आदमी के हाथ देखे।
बाएँ हाथ में एक अंगूठी थी।
काली पत्थर वाली।
अरुण ने कंपनी के वरिष्ठ कर्मचारियों की तस्वीरें निकलवाईं।
एक-एक करके देखता गया।
फिर अचानक एक तस्वीर पर उंगली रख दी।
करण देवधर का निजी सचिव — नितिन देशमुख।
उसकी उंगली में वही अंगूठी थी।
अभिजीत ने तुरंत कहा—
“सर, यही आदमी?”
अरुण ने कहा,
“अभी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर यह इतना आसान होता तो राजन तीन दिन तक जिंदा नहीं रहता।”
---
नितिन को बुलाया गया।
उसने होटल जाने से इनकार किया।
अरुण ने उससे सिर्फ एक सवाल पूछा—
“राजन ने 24 जुलाई को तुम्हें क्या बताया था?”
नितिन की आँखें बदल गईं।
बस एक पल के लिए।
लेकिन अरुण ने देख लिया।
“मैं राजन से नहीं मिला।”
अरुण मुस्कुराया।
“ठीक है।”
उसने फाइल बंद की।
“तुम जा सकते हो।”
नितिन उठकर चला गया।
अभिजीत ने पूछा,
“सर, फिर?”
अरुण ने कहा,
“वह राजन को जानता है।”
“आपको कैसे पता?”
“जिस आदमी को किसी बात की जानकारी नहीं होती, वह सवाल सुनकर सोचता है।”
“नितिन?”
“उसने जवाब देने से पहले डर को छिपाया।”
---
उसी रात अरुण को एक फोन आया।
रवि मेहरा गायब था।
उसका शव शहर के बाहर उसकी कार में मिला।
उसे भी जहर दिया गया था।
लेकिन इस बार अरुण को कोई संदेह नहीं था।
कोई सबूत मिटा रहा था।
और अब वह आदमी घबरा चुका था।
---
अरुण ने करण को फिर बुलाया।
“आपके पास एक आखिरी मौका है।”
करण ने थकी आवाज में पूछा,
“क्या जानना चाहते हैं?”
“आपकी कंपनी में नकली बिलों का खेल कौन चला रहा था?”
करण ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ देर बाद बोला—
“नितिन।”
अभिजीत ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
करण ने कहा—
“मैंने उसे कभी रोकने की कोशिश नहीं की। वह मेरे पुराने साझेदार का आदमी था। धीरे-धीरे उसने कंपनी के कई लोगों को अपने साथ मिला लिया।”
“राजन को यह पता चला?”
“हाँ।”
“और आपने उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”
करण की आवाज टूट गई।
“मैं डर गया था।”
अरुण ने पूछा,
“25 जुलाई को राजन कहाँ था?”
करण ने जवाब दिया—
“नितिन ने उसे गोदाम में बुलाया था।”
अब सब जुड़ने लगा था।
राजन को वहाँ बुलाया गया।
उसे जहर दिया गया।
लेकिन नितिन ने उसका सिर क्यों काटा?
अरुण ने नितिन के घर की तलाशी का आदेश दिया।
घर से एक पुराना बैग मिला।
बैग के अंदर राजन की डायरी थी।
लेकिन डायरी के बीच से एक पन्ना गायब था।
वही पन्ना…
25 जुलाई वाला।
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नितिन को गिरफ्तार किया गया।
लेकिन उसने हत्या कबूल नहीं की।
“मैंने उसे जहर नहीं दिया।”
अरुण ने कहा,
“तो किसने दिया?”
नितिन चुप।
“राजन के सिर का क्या किया?”
चुप।
“तीन दिन तक लाश कहाँ थी?”
चुप।
अरुण ने मेज पर एक फोटो रखी।
राजन की डायरी का आखिरी पन्ना।
असल में वह पन्ना पुलिस को गोदाम से मिला था।
उस पर सिर्फ एक वाक्य था—
“अगर मुझे कुछ हुआ, तो असली नाम नितिन नहीं है।”
नितिन के चेहरे से रंग उड़ गया।
अरुण पीछे हट गया।
“अब तुम बताओ।”
काफी देर बाद नितिन बोला—
“मैंने उसे नहीं मारा।”
“फिर?”
“मैं सिर्फ उसे वहाँ लेकर गया था।”
“किसके कहने पर?”
नितिन ने सिर उठाया।
और पहली बार उसके चेहरे पर ऐसा डर था जो अरुण ने पहले नहीं देखा था।
“करण के।”
अभिजीत चौंक गया।
लेकिन अरुण शांत रहा।
“करण ने तुम्हें राजन को बुलाने को कहा?”
“हाँ।”
“जहर?”
“करण ने कहा था उसे डराना है।”
“और फिर?”
नितिन ने आँखें बंद कर लीं।
“राजन ने जहर खुद नहीं लिया था।”
अरुण ने धीरे से पूछा—
“किसने मिलाया?”
नितिन ने जवाब नहीं दिया।
अरुण ने उसके सामने होटल की तस्वीर रखी।
“तुम्हारे हाथ में अंगूठी थी।”
नितिन ने कहा—
“मैं वहाँ था।”
“फिर?”
“राजन ने मुझे पहचान लिया।”
“किस रूप में?”
नितिन चुप रहा।
अरुण समझ गया।
नितिन सिर्फ सचिव नहीं था।
वह उस पूरे नेटवर्क का असली संचालक था।
लेकिन फिर भी जहर उसने नहीं दिया था।
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अरुण ने करण की बेटी को बुलाया।
इस बार सवाल राजन के बारे में नहीं था।
सवाल था—
“तुम्हारे होने वाले पति को नितिन कब से जानता है?”
लड़की ने हैरानी से कहा—
“वे एक-दूसरे को जानते ही नहीं।”
अरुण ने उसकी तरफ देखा।
“पक्का?”
“हाँ।”
अरुण ने सामने एक तस्वीर रखी।
उसके होने वाले पति की।
फिर दूसरी।
नितिन के पुराने व्यापारिक साझेदार की।
चेहरे अलग थे।
लेकिन एक बात समान थी—
दोनों के पास एक ही दुर्लभ घड़ी थी।
अरुण ने कहा—
“तुम्हारा होने वाला पति असल में नितिन का साझेदार है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
लेकिन यह भी पूरा सच नहीं था।
नितिन सिर्फ उसका आदमी था।
असली आदमी…
करण की बेटी का होने वाला पति।
उसने राजन को जहर दिया था।
क्योंकि राजन ने उसकी असली पहचान ही नहीं…
बल्कि उसके पूरे अपराधी नेटवर्क का सबूत भी खोज लिया था।
लेकिन वह अकेला नहीं था।
करण सब जानता था।
फिर भी उसने पुलिस को क्यों नहीं बताया?
क्योंकि शादी से सिर्फ एक दिन पहले उसे पता चला कि उसकी बेटी का होने वाला पति वही आदमी है जिसने वर्षों पहले करण के परिवार को बर्बाद करने वाले पुराने साझेदार को धोखा देकर उसकी कंपनी में प्रवेश किया था।
करण अपनी बेटी को बचाना चाहता था।
और इसी डर में उसने सबसे बड़ी गलती की—
राजन की मौत छिपा दी।
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अब सिर्फ सिर का रहस्य बचा था।
अरुण ने नितिन से पूछा—
“राजन का सिर किसने काटा?”
नितिन ने धीरे से कहा—
“मैंने।”
“क्यों?”
“क्योंकि…”
वह रुक गया।
“क्योंकि उसका चेहरा हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा था।”
अरुण ने उसकी तरफ देखा।
नितिन ने कहा—
“राजन के फोन में उस आदमी की तस्वीर थी।”
“किसकी?”
नितिन चुप रहा।
अरुण ने जवाब खुद दिया—
“करण की बेटी के होने वाले पति की।”
नितिन ने सिर झुका दिया।
“अगर राजन की पहचान हो जाती और उसका फोन पुलिस के हाथ लग जाता, तो सब खत्म हो जाता।”
अब अरुण को समझ आ गया।
राजन का सिर इसलिए नहीं काटा गया था कि पहचान हमेशा के लिए छिप जाए।
बल्कि इसलिए कि पहचान देर से हो।
तीन दिन का समय चाहिए था।
इतना समय…
जिसमें फोन से डेटा मिटाया जा सके।
गवाहों को डराया जा सके।
रिकॉर्ड बदले जा सकें।
और राजन की मौत को एक अनजान लाश बना दिया जाए।
लेकिन एक चीज वे भूल गए थे।
राजन ने अपना सबसे महत्वपूर्ण सबूत फोन में नहीं रखा था।
उसने वह सबूत अपनी डायरी में लिखा था।
और उसी डायरी ने अरुण को तीन दिनों तक पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया।
करण की बेटी का होने वाला पति गिरफ्तार हुआ।
उसके खिलाफ राजन की हत्या, अवैध वित्तीय नेटवर्क और कई पुराने मामलों के सबूत मिले।
नितिन और कुछ अन्य लोग भी गिरफ्तार हुए।
करण पर हत्या का आरोप नहीं लगा।
लेकिन सबूत छिपाने और पुलिस को गुमराह करने के आरोप में उसके खिलाफ मामला दर्ज हुआ।
उसकी बेटी की शादी नहीं हुई।
और तीन दिन तक चलने वाला वह रहस्य आखिर खत्म हो गया।
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कुछ दिन बाद अभिजीत अरुण के ऑफिस में बैठा था।
उसने पूछा,
“सर, एक बात अभी भी समझ नहीं आई।”
अरुण ने फाइल से नजर उठाई।
“क्या?”
“आपको कब समझ आया कि राजन की हत्या 25 जुलाई को नहीं हुई थी?”
अरुण मुस्कुराया।
“जब मैंने कार के टायर देखे थे।”
“टायर?”
“हाँ।”
“उससे?”
अरुण ने कहा—
“कार सड़क पर 28 जुलाई की रात लाई गई थी। लेकिन शव के कपड़ों पर तीन दिन पुराने गोदाम की धूल और तेल के निशान थे।”
“तो?”
“मतलब लाश कार में बाद में आई।”
अभिजीत कुछ देर सोचता रहा।
“और फिर आपने तीन दिन पर ध्यान दिया।”
अरुण ने सिर हिलाया।
“इस केस में सबसे बड़ा सुराग खून नहीं था।”
“फिर?”
अरुण ने फाइल बंद की।
“समय।”
वह खिड़की के बाहर देखने लगा।
“हत्या छिपाई जा सकती है।”
“सबूत मिटाए जा सकते हैं।”
“लाश भी छिपाई जा सकती है।”
फिर उसने धीरे से कहा—
“लेकिन बीते हुए तीन दिन…”
वह मुस्कुराया।
“उन्हें कोई नहीं छिपा सकता।”
केस बंद।



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