वो रास्ता जो सिर्फ रात में दिखाई देता था

 


रहस्यमयी जंगल, पीली रोशनी, रवि का हमशक्ल और पुराने ग्रामीण घर को दर्शाता हॉरर कहानी पोस्टर।
एक ऐसा रास्ता जो दिन में गायब हो जाता है... और रात में इंसान को उसके अपने ही घर तक ले जाता है। 



सितंबर की वह रात बाकी रातों जैसी ही थी।


गाँव के बाहर बने पुराने गोदाम में काम खत्म करते-करते रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे। आसमान में बादल थे और बीच-बीच में ठंडी हवा चल रही थी। गाँव की आखिरी बस्ती से आगे निकलते ही सड़क लगभग सुनसान हो जाती थी।


रवि ने गोदाम का ताला लगाया, जेब से मोबाइल निकाला और समय देखा।


10:37।


उसे घर पहुँचने में मुश्किल से पच्चीस मिनट लगते, लेकिन जैसे ही उसने बाइक स्टार्ट की, इंजन ने दो-तीन बार आवाज की और बंद हो गया।


उसने दोबारा कोशिश की।


कुछ नहीं हुवा।


रवि ने बाइक को सड़क के किनारे लगाया और टॉर्च की रोशनी में नीचे झुककर देखने लगा। पेट्रोल था। बैटरी भी ठीक लग रही थी। लेकिन बाइक स्टार्ट नहीं हो रही थी।


उसने मैकेनिक को फोन लगाया।


पर नेटवर्क नहीं था।


उसने मोबाइल ऊपर उठाकर देखा। एक पल के लिए एक लाइन आई और फिर गायब हो गई।


रवि ने गहरी सांस ली।


मुख्य सड़क से गाँव लगभग चार किलोमीटर दूर था। इतनी रात में किसी गाड़ी के मिलने की संभावना भी कम थी।


तभी उसकी नजर जंगल की तरफ जाने वाले कच्चे रास्ते पर पड़ी।


बचपन से वह उस रास्ते को जानता था। दिन में भी उस रास्ते से बहुत कम लोग जाते थे। रास्ता जंगल के किनारे से घूमते हुए सीधे गाँव के पीछे निकलता था।


लेकिन एक बात अजीब थी।


रात के घने जंगल में रवि रहस्यमयी पीली रोशनी वाले रास्ते पर चलता हुआ।
सुनसान जंगल, अंधेरी रात और पीली रोशनी में दिखाई देती एक ऐसी पगडंडी, जो दिन में कहीं मौजूद ही नहीं होती।



उसे याद था कि उस रास्ते पर लगभग आधे किलोमीटर तक जाने के बाद एक टूटा हुआ पुल आता था, और बारिश के मौसम में वहाँ से आगे जाना मुश्किल हो जाता था।


फिर भी उसने सोचा—


चार किलोमीटर सड़क पर अकेले चलने से अच्छा है, रास्ता छोटा है तो कोशिश कर लेता हूँ।


उसने बाइक वहीं लॉक की, मोबाइल की टॉर्च जलाई और कच्चे रास्ते पर चल पड़ा।


सूखे पत्तों के नीचे उसके जूतों की आवाज आ रही थी। कहीं दूर कोई कुत्ता भौंक रहा था। पेड़ों के बीच हवा सरसराती रही थी।


करीब दस मिनट चलने के बाद उसे अचानक लगा कि रास्ता पहले से ज्यादा चौड़ा हो गया है।


उसने मोबाइल की रोशनी आगे की तरफ की।


सामने मिट्टी की पगडंडी साफ दिखाई दे रही थी।


रवि थोड़ा हैरान हुआ।


उसे यह हिस्सा याद नहीं था।


वह कुछ कदम आगे बढ़ा।


तभी सामने एक बिजली का खंभा दिखाई दिया।


खंभा बिल्कुल नया नहीं था। सीमेंट जगह-जगह से टूटा हुआ था, ऊपर तार भी लटक रहे थे।


लेकिन उस पर लगा बल्ब जल रहा था।


पीली रोशनी में आसपास के पेड़ों की परछाइयाँ जमीन पर अजीब आकार बना रही थीं।


रवि रुक गया।


उसने ऊपर देखा।


फिर मोबाइल की टॉर्च बंद करके देखा।


बल्ब सच में जल रहा था।


उसे अजीब लगा, क्योंकि इस रास्ते पर बिजली की लाइन होने की बात उसने कभी नहीं सुनी थी।


फिर भी वह आगे बढ़ गया।


कुछ दूरी पर उसे एक और खंभा दिखाई दिया।


और हर खंभे के नीचे वही पीली रोशनी।


अब जंगल पीछे छूटता जा रहा था।


सामने कुछ घरों जैसी आकृतियाँ दिखाई देने लगीं।


रवि ने कदम धीमे कर दिए।


उसे लगा शायद वह गाँव के पीछे वाले हिस्से में पहुँच गया है।


लेकिन अगले ही पल उसके कदम वहीं रुक गए।


सामने जो घर था...

वह उसका अपना घर था।


वही नीले रंग का दरवाजा।


वही बरामदे की टूटी कुर्सी।


वही खिड़की, जिसके बाहर उसकी पत्नी अक्सर कपड़े सुखाने के लिए रस्सी लगाती थी।


रवि कुछ सेकंड तक सिर्फ देखता रहा।


उसका दिमाग समझने की कोशिश कर रहा था कि वह यहाँ कैसे पहुँच गया।


फिर उसकी नजर घर के बाहर गई।


वहाँ एक बाइक खड़ी थी।


बिल्कुल उसकी बाइक जैसी।


रवि ने अपनी जेब टटोली


बाइक की चाबी अभी भी उसके पास थी।


वह घर के और करीब गया।


तभी अंदर से हल्की रोशनी दिखाई दी।


खिड़की के पर्दे के पीछे कोई बैठा था।


रवि ने गर्दन आगे की।


अंदर एक आदमी कुर्सी पर बैठा हुआ था।


पीठ उसकी तरफ थी।


रवि ने आवाज लगाने के लिए मुँह खोला—


लेकिन आवाज निकलने से पहले ही उस आदमी ने अपना सिर धीरे से घुमाया।


और रवि के शरीर में जैसे अचानक जान ही नहीं रही।


क्योंकि खिड़की के अंदर बैठा आदमी...


रवि खुद था।


वही चेहरा।


वही कपड़े।


वही घड़ी।


और सबसे डरावनी बात—


खिड़की के अंदर बैठा वह दूसरा रवि भी उसी क्षण उसकी तरफ देख रहा था।


रात में ग्रामीण घर की खिड़की के बाहर खड़ा रवि अंदर बैठे अपने हमशक्ल को देखता हुआ।
खिड़की के उस पार बैठा था रवि का बिल्कुल हूबहू हमशक्ल... लेकिन वह वहाँ पहुँचा कैसे?


रवि खिड़की के सामने खड़ा रहा।


अंदर बैठा दूसरा रवि भी उसे देख रहा था।


दोनों के बीच सिर्फ काँच था।


अचानक अंदर वाले रवि ने अपना हाथ उठाया और खिड़की की तरफ इशारा किया।


रवि की नजर उसके हाथ पर गई।


उसने देखा कि अंदर वाला रवि कुछ लिख रहा था।


फिर उसने कागज खिड़की के पास उठा दिया।


उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—


“भागो मत... देर हो चुकी है।”


रवि पीछे हट गया।


उसी क्षण घर के अंदर से उसकी पत्नी की आवाज आई।


“रवि... इतनी देर क्यों हो गई?”


रवि के पैरों तले जमीन खिसक गई।


आवाज बिल्कुल उसकी पत्नी की थी।


वह दरवाजे की तरफ बढ़ा, लेकिन अंदर वाला रवि अचानक कुर्सी से उठा और खिड़की से गायब हो गया।


अंदर अंधेरा हो गया।



रवि ने दरवाजे का हैंडल पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।


लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ दरवाजे को छूने वाली थीं, उसके पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—


“इधर मत जाना।”


रवि पलटा।


पीछे कोई नहीं था।


बस वही पीली रोशनी वाला खंभा।


और उसके नीचे जमीन पर एक पुराना कागज पड़ा था।


रवि ने काँपते हाथों से उसे उठाया।


कागज पर कई नाम लिखे थे।


कुछ नाम पुराने थे।


कुछ के आगे तारीखें थीं।


और सबसे नीचे...


रवि का नाम लिखा था।


उसके नाम के सामने आज की तारीख थी।


रवि ने कागज हाथ से गिरा दिया।


तभी दूर कहीं से बाइक का हॉर्न सुनाई दिया।


फिर लगातार हॉर्न बजता रहा।


रवि अचानक जंगल की तरफ दौड़ पड़ा।


अब उसे न रास्ता दिखाई दे रहा था, न खंभे।


वह बस भागता रहा।


कुछ मिनट बाद पेड़ों के बीच से उसे सड़क की रोशनी दिखाई दी।


वह सड़क पर आ गया।


सामने एक ट्रक खड़ा था।


ड्राइवर ने उसे देखते ही आवाज लगाई—


“अरे भाई! इतनी रात में जंगल से कहाँ से आ रहे हो?”


रवि कुछ बोल नहीं पाया।


उसने सिर्फ अपनी बाइक की तरफ देखा।


वही बाइक सड़क के किनारे खड़ी थी।


उसने चाबी लगाई।


इस बार बाइक पहली ही कोशिश में स्टार्ट हो गई।


वह बिना पीछे देखे घर की तरफ निकल गया।


करीब बीस मिनट बाद वह अपने घर के सामने खड़ा था।


दरवाजा बंद था।


उसने घंटी बजाई।


कुछ सेकंड बाद उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला।


रवि उसे देखते ही कुछ पल चुप रहा।


पत्नी ने हैरानी से पूछा—


“क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो?”


रवि ने घर के अंदर देखा।


वही कमरा।


वही कुर्सी।


वही खिड़की।


लेकिन वहाँ कोई नहीं था।


उसने धीरे से पूछा—


“मैं... अभी घर पर आया हूँ ना?”


पत्नी हँस पड़ी।


“और कहाँ से आए होगे?”


रवि ने उस रात की पूरी बात नहीं बताई।


वह सीधे कमरे में गया और कपड़े बदलने लगा।


तभी उसकी नजर मेज पर पड़ी।


वहाँ एक गिलास रखा था।


गिलास के नीचे एक मुड़ा हुआ कागज दबा था।


उसने कागज उठाया।


उसके हाथ ठंडे पड़ गए।


वही कागज।


वही लिखावट।


लेकिन इस बार उस पर सिर्फ एक लाइन थी—


“आज तुम वापस आ गए... अगली बार तुम्हें वापस नहीं आने दुंगा।”


रवि ने कागज तुरंत फाड़ दिया।


उस रात वह सो नहीं पाया।


सुबह होते ही वह अपनी बाइक लेकर उस जगह वापस गया।


लेकिन जंगल के किनारे पहुँचकर उसे कोई कच्चा रास्ता नहीं मिला।


न बिजली के खंभे।


न पीली रोशनी।


न वह घर।


सिर्फ घना जंगल।


रवि ने वहाँ आसपास के लोगों से पूछा।


एक बुजुर्ग ने उसकी बात सुनकर कुछ देर उसे देखा।


फिर पूछा—


“तुमने वो रास्ता देखा था?”


रवि ने सिर हिलाया।


बुजुर्ग ने नजरें झुका लीं।


“वो रास्ता दिन में कभी नहीं होता।”


रवि चुप रहा।


सुबह धुंधले जंगल में रवि अपनी बाइक के पास खड़ा है और बुजुर्ग ग्रामीण से रहस्यमयी रास्ते के बारे में बात कर रहा है।
रात में जिस जगह पगडंडी और बिजली के खंभे दिखाई दिए थे, सुबह वहाँ सिर्फ घना जंगल था।



बुजुर्ग ने आगे कहा—


“बहुत साल पहले वहाँ सड़क बनाने का काम शुरू हुआ था। लेकिन एक रात काम कर रहे कुछ मजदूरों के साथ हादसा हुआ। उसके बाद वो रास्ता बंद कर दिया गया।”


“कितने साल पहले?”


बुजुर्ग ने जवाब दिया—


“लगभग पंद्रह साल।”


पंद्रह साल पहले...


वह इस गाँव में रहता भी नहीं था।


फिर बुजुर्ग ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा—


“तुम्हें वहाँ अपना घर दिखाई दिया था?”


रवि ने कुछ नहीं कहा।


बुजुर्ग समझ गया।


उसने बस इतना कहा—


“जिसे वो रास्ता अपना घर दिखाता है... वह अक्सर किसी और की जगह लेकर वापस आता है।”


रवि ने उस बात को कभी किसी से नहीं कहा।


समय बीतता गया।


उसने उस रास्ते की तरफ जाना भी छोड़ दिया।


लेकिन लगभग छह महीने बाद एक रात उसकी पत्नी ने उसे नींद से उठाया।


“रवि... बाहर कौन है?”


रवि ने उनींदी आँखों से पूछा—


“कौन?”


पत्नी ने खिड़की की तरफ इशारा किया।


रवि उठा।


खिड़की के बाहर अंधेरा था।


लेकिन उसी अंधेरे में...


एक पीली रोशनी जल रही थी।


वही पुराना बिजली का खंभा।


और उसके नीचे कोई आदमी खड़ा था।


रवि ने ध्यान से देखा।


वह आदमी धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठा रहा था।


चेहरा साफ दिखाई दिया।



वह खुद था।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।


वह मुस्कुरा रहा था।


और उसने खिड़की की तरफ देखकर अपने होंठ हिलाए—


“आज रास्ता यहीं तक आया है।”


अगली सुबह रवि घर में नहीं था।


दरवाजा अंदर से बंद था।


उसकी बाइक बरामदे में खड़ी थी।


और उसके कमरे की मेज पर सिर्फ एक पुराना कागज पड़ा था।


उस पर आज की तारीख लिखी थी।


नीचे एक नया नाम था।


उसकी पत्नी का।


उस दिन के बाद उस गाँव के लोगों ने रात में जंगल के किनारे से गुजरना पूरी तरह छोड़ दिया।


लेकिन कभी-कभी...


जब सितंबर की रात में बारिश के बाद हवा बिल्कुल शांत हो जाती है...


जंगल के अंदर से एक पीली रोशनी दिखाई देती है।


एक खंभा।


फिर दूसरा।


और उनके बीच एक पगडंडी...


जो दिन में वहाँ होती ही नहीं।


कहते हैं, अगर कोई उस रास्ते पर रात में चल पड़े...


तो रास्ता उसे कहीं बाहर नहीं ले जाता।


वह उसे उसी जगह ले जाता है जहाँ से किसी और की कहानी शुरू होनी होती है।

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