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| “कभी-कभी भीड़ में भी डर छुपा होता है — बस देखने वाली नज़र चाहिए।” |
उत्तर प्रदेश के सोनपुर गाँव की पहचान उसका मेला है —
सदियों पुराना, जहाँ दूर-दूर से लोग आते हैं।
ढोल की थाप, मिठाई की खुशबू, और झूलों की चीख़ —
सब कुछ उतना ही पुराना है जितनी उस गाँव की एक भुला दी गई कहानी।
कहते हैं, मेले की रात जब बरगद वाले चौक के पास दीये बुझने लगते हैं,
तो हवा में किसी के रोने की आवाज़ घुल जाती है।
कोई नहीं जानता कौन है वो,
पर हर साल मेला शुरू होते ही गाँव में डर फैल जाता है —
क्योंकि हर साल, किसी न किसी का नाम गुमशुदा लोगों की सूची में जुड़ जाता है।
लोग कहते हैं —
“बरगद के पेड़ के नीचे मत जाना... वहाँ डायन रहती है।”
कहते हैं, उसका श्राप अब भी उस ज़मीन में धड़कता है।
और ठीक इसी साल, पंद्रह बरस बाद आर्या लौटी अपने दादाजी के गाँव —
वही सोनपुर जहाँ उसका बचपन बीता था।
अब शहर की पढ़ी-लिखी, समझदार लड़की थी वो —
भूत-प्रेत की बातों पर हँसने वाली।
पर कुछ रातें ऐसी होती हैं, जब हँसी गले में अटक जाती है।
जब हवा सिर्फ चलती नहीं, बोलती लगती है।
और जब किसी पुराने पेड़ की छाँव, छाँव नहीं — खतरा बन जाती है।
उस साल, सोनपुर का मेला वैसे तो पहले जैसा ही था —
पर उसके भीतर कुछ था…
कुछ जो दिखता नहीं था, पर देख रहा था।
और जब आर्या उस रात बरगद के पास पहुँची —
उसे एहसास हुआ कि कुछ कहानियाँ सिर्फ सुनने के लिए नहीं होतीं…
कुछ कहानियाँ जीने के लिए होती हैं।
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मेले की रात में हवा ज़रा ठंडी और ज़रा नम थी — जैसे धरती की रगों में कोई लंबी साँस भर रही हो।
धौलपुर-राहत से आने वाली पटरियों पर लगी झूले, चीख-फुुको की दुकानें, और दूर से आती झांकी की ढोल-ढमाके की थाप। भीड़ मस्त, बच्चे चिल्ला रहे थे, चाट की खुशबू नाक में चुभ रही थी। लेकिन बरगद के उस पुराने तने के पास — वहीँ जहाँ हर साल मेले की शुरुआत होती, और हर साल कुछ की कहानी समाप्त होती — कुछ और था: सन्नाटा जैसा एक घना घेहरा जो उजाले के बीच भी दिखता था।
आर्या अपने कैमरे की पट्टी मटमैली रोशनी में कसते हुए झूले की कतार के पास से गुज़री। पंद्रह साल की तरह हर साल वह यहाँ आती— बचपन के कुछ फ्रेम संजोए — पर इस बार फर्क था; वह पहली बार अकेली आई थी, खोजने और रिकॉर्ड करने के लिए। उसे लोककथाओं की ज़्यादा शौक़ नहीं थी, पर काम के नाम पर, दादी की कही एक लाइन उसे बार-बार खींच ला रही थी: “बटबृक्ष के नीचे जो खोता है, वह वापस नहीं आता।”
मेले का अँधा-धुँधला उजाला पेड़ तक पहुँचा — जटाओं की दूरी पर रोटियों की गंध, और उसी के सतह पर कुछ भी नहीं। आर्या ने अपने कैमरे का गॉड्स-लाइट चालू किया और पेड़ की ओर चल पड़ी। झिलमिलाती लाइट पेड़ की मोटी जड़ों पर पड़ी और एक पुराना लाल धागा, पीले धूल-रेत में उलझा खड़ा दिखा — किसी ने बरसों से उसे वहाँ छोड़ दिया था। उड़ती धूल में वह धागा हिल रहा था, मानो सांस ले रहा हो।
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| “हर पुराने पेड़ की जड़ें सिर्फ मिट्टी में नहीं, कुछ कहानियों में भी दबी होती हैं।” |
ऊँचे तने की ओर से कही से भीगी-सी हँसी आई — न बच्चे जैसी, न बूढ़े की — एक गूँज, जिसकी लय में बुनकर कुछ पुराना दर्द घुला था। आर्या की त्वचा पर ठंडी-सी रुनझुन सी टपकने लगी। कैमरा ऑन था, पर उसकी उंगलियाँ अचानक काँप गईं। उसने खुद को बताया — “यहाँ तो मेले की हँसी है, रिकॉर्ड कर ले।” और वह क़दम बढ़ाती रही।
पहली अजीब घटना छोटी— पर अटपटी— तब हुई जब वह पेड़ की छाया से गुज़री। उसकी एड़ी अचानक अटकी, और जैसे-जैसे उसने पीछे देखा, मिट्टी से एक पतली-सी जड़ उठकर उसकी पांव की उँगलियों के बीच लिपट गई। उसने ज़ोर से खींचा — जड़ छोड़ गयी, पर उसकी जूतों पर छोटे-छोटे गहरे निशान रह गए — जैसे किसी ने नाखून घुसा दिए हों। आर्या ने उन्हें कैमरे में झटका-सा कैद किया और खुद को हँसते हुए समझाया— “टूटे झूले की कँची-सी।”
पर रात ने अपने रंग घना किए। मेले की रोशनी टिमटिम से देर तक बनी रही— और फिर पेड़ की जटाओं के बीच जैसे कोई दूसरी रोशनी जगी — एक सफेद-सा दाना, दूर और पास दोनों। आर्या ने थोड़ा आगे बढ़कर देखा— एक सिल्हूट, बिल्कुल सटीक, एक लंबी औरत जिसका सिर झुका हुआ था, बाल नीचे फैले— मानो जटाओं की कुछ लटें उसकी बनावटी ओझल पर गिर रही हों। वह स्थिर खड़ी थी, पर जो शांति उसमें थी वह किसी और की नहीं— एक वक्त में जीवन और मौत दोनों का मेल।
आर्या ने कैमरा पास करके उस पर ज़ूम किया — पर ज़ूम करते ही सिल्हूट गायब हो गया। केवल पेड़ की जड़ों पर उलझा लाल धागा ही बस अपनी जगह पर लहरा रहा था। उसने बटबृक्ष की जड़ों को छुआ — धागा थोड़ा गर्म-पसीना-सा बरस रहा था। वह महसूस कर सकती थी कि पेड़ के पास एक पुराना-सा गूँजता संगीत है, किसी के गुनगुनाने का जिसे कोई शब्द नहीं मिला।
घर लौटी तो फोन पर गांव वाले से कुछ बातें हुईं — पुराने ममेरे चाचा ने कहा, “बच कर रहना बेटा, पेड़ को रात के पास मत जाना।” आर्या हँसी, पर मन में एक सन्नाटा बच गया। उसने रात के फुटेज देखे — पर कैमरा में कुछ अजीब ढंग से कुदकुद की तरह छोटे-छोटे इंटरफेरेंस दिख रहे थे, और एक फ्रेम में उसके कैमरे के पिक्सल बदलते- बदलते अचानक एक मुखड़ा सा बनता है— किसी औरत का चेहरा, धीरज से झुका हुआ, आँखें कुछ अधूरी सूँघी हुई।
अगली रात वह जाने का निर्णय कर चुकी थी— काम के लिए। मेले के अंतिम दिन की रात थी— भीड़ कम, दुकानें सुलझती, पर बरगद के पास कुछ और भीड़— सब दूरी रखकर खड़े। किसी ने कहा, “पिछले साल जो लड़की खो गयी थी— उसके फोन यही मिला था।” किसी ने और जोड़ा— “उसका लाल दुपट्टा यही फंसा था। फिर वह गायब हो गयी।” लोग मामूली से सुर में बात करते रहे जैसे यह रोज़मर्रा की खबर हो — पर आर्या जानती थी कि ज़हरीली खबरें अक्सर सस्पेंस का वह आधार बनती हैं जिस पर असल कहानियाँ लटकती हैं।
रात को बारह बजते ही, जब मेले की थाप मद्धम पड़ गई, आर्या तट के किनारे अकेली वापस आई। हवा एकदम घुटन खोलने वाली थी — वह चल नहीं पा रही थी। टॉर्च उसे सिर्फ़ कुछ मीटर आगे दिखा रहा था; बाकी कुछ नहीं। उसने सुना — पाँवों के नीचे कोई धीमी सरसराहट, और पीछे से कोई हल्की-सी हँसी। उसने पीछे देखा— पर वहाँ सिर्फ़ परछाइयाँ खेल रही थीं।
फिर, अचानक, उसका कैमरा अपने आप झट से झुक कर गिरा और रिकॉर्डिंग चालू हो गयी। स्क्रीन पर दिखा: आर्या रूट के पास खड़ी है; हवा में एक-एक करके लाल रिबन की परछाइयाँ उभर रही हैं; फिर एक मिट्टी में चीख — काँच की तरह पान धो कर फटने-सा। आर्या साहस के थपेड़े से झट से कैमरा उठाती है— और तब देखा— जड़ों के बीच कुछ हलचल है — कुछ रंगों का— गुलाबी कपड़ा, फिर एक नन्हा पैर— फिर अचानक सिल्हूट ने ऊपर उठकर उसे देखा। आँखें— काली, गहरी और खाली— और फिर ऊपर की ओर एक हाथ— जड़ की तरह लम्बा, जो उसकी एड़ी की तरफ़ इतना नज़दीक आ गया कि उसने महसूस किया— कुछ ठंडा उसके पांव के ऊपरी हिस्से को छू रहा है।
वह चीखी— आवाज़ उसकी ही थी, पर अजीब— ऐसा लगा जैसे हवा ने उसका स्वर लिया हो और उसे कहीं और गूँजाया। जड़ें अब हिलने लगीं— पतले- पतले तंतु उसकी टखनों को घेर रहे थे। उसने ज़ोर लगाया और हाथ से पैदल को पकड़ा, पर मिट्टी ने कसकर पकड़ रखी थी— मानो जमीन ने उसका घर निर्धारित कर लिया हो। उसने हांफते हुए दोनों हथेलियाँ जड़ में फँसी— और अचानक ऊपर से एक वस्तु टपकी — एक गुड़िया — वो वही गुड़िया जिसे बचपन में उसने छोड़ा था, अब नंगी, आँखों में सूत की सिलाई, होंठों पर मिट्टी। गुड़िया की आँखें उसकी तरफ़ खुलीं और वह अजीब सी मुस्कान करते हुए धीरे से अपनी सूईदार आँखों से झनझना उठाती है।
यह वह पल था जब उसको यह महसूस हुआ कि यह प्रत्यक्ष भौतिकता नहीं— यह किसी कहानी की सच्चाई थी जो जिंदा होकर पकड़ रखे थी। उसके भीतर का वैज्ञानिक, कामीय पत्रकार सब धड़क रहे थे — पर एक गुणा चीख ने उसके गले से निकलने की कोशिश की। फिर कुछ और गहरा हुआ: पेड़ के ऊपर से, जड़ों के बीचों-बीच, वह साया झुका और उसके मुँह से निकला— “तू फिर आई…” — आवाज़ तमाम हवाओं के मेल की तरह सुनी गई।
आर्या ने एकातेर भाव में कैमरा बंद किया और भागने की कोशिश की। पर हर कदम पर जड़ें उसके पैर को खींचतीं, मानो चाहती हों इसे उसी लंबी-सी रात में स्थिर कर दें। उसने जोर लगाया— एक, दो, तीन— पर जमीन ने उसे अपने भीतर खींचना शुरू कर दिया। उसका नाखून जमीन में फँस गया, और लड़खड़ाते हुए वह गिर पड़ी। नीचे की मिट्टी नम और चिपचिपी थी— सम्भव था कि वह कुछ सेकंड में उसी में सिमट जाएगी।
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| “डर वही होता है जो दिखता नहीं, पर महसूस हर धड़कन में होता है।” |
तभी, भीड़ से एक पुरानी महिला — नानी उम्र की— दिख पड़ी जो मेले के पार से दौड़ती आ रही थी। उसने कुछ कहा — शब्द समझ में नहीं आए पर स्वर में तेज़पन था। और फिर से नज़र आई कोई और भी— गाँव के कुछ बुजुर्ग जिनके हाथ में पीले तेल के दीये थे। उन्होंने झट से एक वृत्त बनाया और जिन्दगी-सी दहकते नारंगी लौ के बीच खड़े हो कर कुछ चीज़ें बोलीं— मंत्रनुमा, धीमी और पुरानी बोलियाँ — “चंपा… ले जा नहीं…” उनकी आवाज़ ठंडी हवा में गूँज उठी।
अचानक बटबृक्ष का सारा स्वर बदल गया — जड़ें थम गईं— मानो किसी ने रुकवा दिया हो। आर्या ने अपनी आखों से देखा कि जड़ों की पकड़ ढीली हुई— जैसे किसी ने रस्सी खोल दी हो। उसी क्षण वह बूढ़ी औरत उस वृत्त में आई— उसके हाथ में थैला था। उसने पास आकर एक तरह से गुड़िया को उठाया— वह गुड़िया, अब आर्या के पैरों से चिपकी हुई— और अपने थैले में रख ली। फिर उसने आर्या की ओर झुक कर कहा— “नाम ले — नाम लो उसे।”
आर्या गहमा-गहमी में समझी नहीं पर न जाने क्यों उसने वही शब्द बोला जो उसकी नानी ने पुरानी डायरी में लिखा हुआ पढ़ा था— एक लोरी की पंक्ति जो हमेशा दादी उसे सुनाया करती थीं:
“चंपा… चंपा… नाम ले लो, नींद खुल जाएगी।”
जैसे ही उसने नाम लिया, वह हवा का एक झोंका आया— तेज और ताज़ा। गुड़िया का चेहरा एक सफ़ेद धुंध में बदलता दिखा — और फिर एक कराह के साथ वह पूरी तरह से मिट्टी के ऊपर से उठा और काँपते हुए वृत्त के बाहर फेंका गया गया — और बुजुर्गों ने दीये की लौ तेज कर दी। दीयों की रोशनी में पेड़ का डर अब एक तमाशा बन गया।
बटबृक्ष के नीचे जो सन्नाटा था, वह धीरे-धीरे कटता गया। जड़ें अपने आप फिर ज्यों की त्यों हो गईं और आर्या का हाथ धीरे-धीरे छूट कर वह खुद उठ खड़ी हुई। उसके गाल नम थे और खून रिश्तेदारों की नजरों में मटमैला था, पर वह ज़िंदा थी— उस रात का सन्नाटा जैसे कहीं और चली गया हो। बुजुर्गों ने कहा— “नाम लेना ही देता है उसे फुरसत— नाम बिना उससे बंधते रखते हैं।”
सुबह तक मेले में फिर हलचल लौट आई, पर कुछ बदल चुका था। लोग अनायास फिर बरगद के पास नहीं रोते थे; उसके तने पर अब और लाल धागे नहीं थे। आर्या ने अपनी रिकॉर्डिंग चेक की— कैमरे में वही आखिरी फ्रेम था जहाँ उसने नाम लिया और बुजुर्गों की दीयों ने गोलाई बनाकर गुड़िया को थैले में डाला। उस पर कुछ और नहीं दिखा था— पर आर्या के अंदर गूँज अब दीर्घकालिक थी— एक राहत, पर एक ठंडी समझ भी कि कोई चीज़ पूरी तरह नहीं मिटती— केवल उसकी गति बदली जाती है।
गाँव के बुजुर्ग उसे अगले कुछ दिनों तक साथ रखते रहे। उन्होंने उसे बताया कि बरसों से यह परंपरा चली आ रही है— हर साल मेले में कोई चीज़ उभर आती थी— किसी ने उसे ‘चंपा’ का बदला कहा, किसी ने उसे ‘बटबृक्ष की आत्मा’ कहा— पर असल बात यह थी कि जो नाम नहीं लिया जा सका, वह चक्र चालू रहा। नाम लेना, याद करना, और उस याद में दया भरना— यही तरीका था जो लोगों ने सदियों में खोज निकाला था।
आर्या ने तब जाना कि डर का सामना सिर्फ़ भागने से नहीं होता— कभी-कभी उसे पहचान कर, नाम दे कर, और उसका सामना कर के भी खत्म किया जा सकता है। उसने बुजुर्गों के साथ मिलकर वह पुरानी प्रमुक्ति (रिवाज़) रिकॉर्ड की, कैमरे में वह पुराना लोरी गुनगुनायी, और रिकॉर्डिंग में खुद वह रात— जड़ें, गुड़िया, दीयों का वृत्त— सब संजो कर रख लिया।
वह मेले से वापस जाने लगी— पर जाने से पहले उसने बरगद के तने पर हाथ रख कर कहा— “मैं लौटूंगी पर सही मतलब के साथ।” पेड़ अपनी पुरानी जड़ों में शांत खड़ा रहा — एक श्राप की तरह जाइश में, पर अब थोड़ी ढीली, थोड़ी मानवीय।
कुछ महीनों बाद, जब आर्या की डॉक्यूमेंट्री रिलीज़ हुई, तो उस मेले के बारे में, उस गुड़िया के बारे में, और उन बुजुर्गों की लोरी के बारे में दुनिया ने सुना— पर गाँव में लोग चुप रहे; वे जानते थे कि कुछ बातें बाहर की दुनिया के लिए दर्शनीय बनती हैं, पर असल हलके-बजुले काम गाँव के अंदर रह कर ही ठीक होती हैं।
आर्या ज़िंदा रही, पर लौट कर जाने वाली वह छाया कभी पूरी तरह गई नहीं— उसका कैमरे का आखिरी फुटेज, रात की हवा में गूँजती एक गूँज, और दीयों की रोशनी में चमकते बुजुर्गों के चेहरे — ये सब उसकी यादों में रह गए। पर सबसे बड़ी चीज़ वह समझ थी— डर का सामना बहादुरी से होता है, पर दया और नाम से भी।
फाइनल सीन में, कुछ महीनों बाद, जब वह फिर से मेले से गुजरती है, बटबृक्ष के पास अब एक छोटा-सा चौकोर समर्पण ठिकाना बना हुआ दिखता है— लाल धागा नहीं, एक साफ कपड़ा बँधा हुआ और एक छोटा सा थैला जिस पर चंपा का नाम चिर-लिखा है। आर्या कैमरा बंद करती है, और बिना शब्द बोले, दादी की पुरानी लोरी गुनगुनाती है — पर अब उसकी आवाज़ डर से नहीं, बल्कि ठीक होने के हलके-से स्वर से भरपूर रहती है।
और पेड़? पेड़ वैसे ही वहाँ है— जड़ें गहरी, पर अब जब भी हवा चलती है, उसकी शाखाओं के बीच से कभी-कभी एक हल्की-सी संगीत जैसी आवाज़ आती है— पर वह अब किसी को खींच कर नहीं ले जाती। वह सिर्फ़ याद दिलाती है— किसी चीज़ को
नाम देना ज़रूरी होता है, वरना वह छाया बन कर लौट आती है।
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