“मुझे सिर्फ मैं ही दिख रहा था”




शुरुआत में मुझे लगा ये सिर्फ थकान है।

फिर लगा शायद आँखों का धोखा।

लेकिन जब पूरा शहर मेरे सामने से गायब होने लगा…

और हर जगह सिर्फ मैं ही नज़र आने लगा…

तब समझ आया — कुछ बहुत गलत हो चुका था।

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Lonely man standing on an empty Indian city street surrounded by eerie fog, psychological horror scene
भीड़ भरे शहर में… सिर्फ वो अकेला रह गया।

मेरा नाम समीर है। उम्र 32 साल। पेशे से मैं एक ग्राफिक डिज़ाइनर हूँ। मुंबई जैसे शहर में काम करता हूँ, जहाँ भीड़ इतनी होती है कि आदमी खुद को भी भूल जाए।

मेरी ज़िंदगी बेहद सामान्य थी — सुबह ऑफिस, रात तक स्क्रीन, वीकेंड पर थोड़ा आराम। डरावनी कहानियों या भूत-प्रेत में कभी खास दिलचस्पी नहीं रही। मैं हमेशा हर चीज़ को लॉजिकल तरीके से देखता था।

ये सब शुरू हुआ एक बेहद साधारण सोमवार से।

उस दिन ऑफिस में काम कुछ ज़्यादा ही था। लगातार 9–10 घंटे स्क्रीन के सामने बैठा रहा। शाम तक आँखें भारी हो चुकी थीं। घर लौटते वक्त लोकल ट्रेन में भीड़ थी, लेकिन मुझे एक अजीब सा एहसास हुआ।

ट्रेन में बैठे-बैठे मैं सामने देख रहा था।

और अचानक…

मुझे लगा सामने बैठे सारे लोगों के चेहरे धुंधले हो रहे हैं।

पहले सोचा — थकान है।

मैंने आँखें बंद कीं। पानी पिया। फिर देखा।

चेहरे साफ थे।

मैंने खुद पर हँस दिया।

“समीर, तू ज़्यादा काम कर रहा है,” मैंने मन ही मन कहा।

घर पहुँचा। खाना खाया। सो गया।

लेकिन अगले दिन…

अजीब बात फिर हुई।

ऑफिस के वॉशरूम में मैं शीशे के सामने खड़ा था।

चेहरा धोया।

ऊपर देखा।

और एक सेकंड के लिए…

मुझे लगा — शीशे में सिर्फ मैं ही हूँ।

पीछे कोई नहीं।

जबकि वॉशरूम में बाकी लोग थे।

मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

सब थे।

आवाज़ें, पानी की धारा, बातें।

फिर शीशे में देखा।

सब दिख रहे थे।

मैंने गहरी साँस ली।

“ओवरवर्क,” दिमाग ने तुरंत फैसला सुना दिया।

तीसरे दिन…

चीज़ें थोड़ी और अजीब हुईं।

मैं सड़क पर चल रहा था। भीड़ भरी सड़क। हॉर्न, लोग, ट्रैफिक।

लेकिन कुछ पल के लिए…

मुझे लगा — सब स्लो मोशन में चल रहे हैं।

और आवाज़ें… जैसे दूर से आ रही हों।

मैं रुक गया।

चारों तरफ देखा।

सब सामान्य।

लेकिन दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी।

उस रात मुझे पहली बार डर लगा।

नींद में बार-बार झटके से आँख खुल रही थी।

जैसे कोई देख रहा हो।

कमरे में कुछ नहीं था।

लेकिन एहसास… बहुत भारी था।

धीरे-धीरे ये अनुभव बढ़ने लगे।

सबसे पहले बदलाव आया आवाज़ों में।

कभी-कभी मुझे लगता कोई मेरा नाम पुकार रहा है।

“समीर…”

बहुत धीमी आवाज़।

जैसे कान के बिल्कुल पास।

मैं तुरंत पीछे देखता।

कोई नहीं।

शुरू में हफ्ते में एक-दो बार होता।

फिर लगभग रोज़।

फिर…

दिन में कई बार।

लेकिन सबसे डरावनी चीज़ आवाज़ नहीं थी।

सबसे डरावनी चीज़ थी — रिपीटेशन।

एक ही आवाज़।

एक ही टोन।

एक ही दूरी।

कभी बदलती नहीं।

एक शाम मैं ऑफिस में देर तक काम कर रहा था।

पूरा फ्लोर खाली हो चुका था।

मैं अकेला था।

सिर्फ कंप्यूटर की हल्की आवाज़।

और तभी…

पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

धीमी।

नियमित।

टक… टक… टक…

मैंने सोचा कोई सिक्योरिटी वाला होगा।

मैंने बिना मुड़े कहा,

“हाँ भाई, निकल रहा हूँ।”

आवाज़ बंद।

Terrified man staring into bathroom mirror where reflection is smiling unnaturally, psychological horror image
डर तब शुरू हुआ… जब प्रतिबिंब ने साथ देना छोड़ दिया।


मैं मुड़ा।

कोई नहीं।

पूरा फ्लोर खाली।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

मैंने खुद को समझाया —

“समीर, दिमाग खेल खेल रहा है।”

मैं वापस स्क्रीन की तरफ मुड़ा।

और तभी…

शीशे जैसी चमक वाली मॉनिटर स्क्रीन में…

मुझे पीछे कोई खड़ा दिखा।

मैं जम गया।

धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

कोई नहीं।

फिर स्क्रीन में देखा।

कुछ नहीं।


उस दिन मैं बिना काम खत्म किए घर चला गया।

अब एक नई चीज़ शुरू हुई।

चेहरे बदलने लगे।

सड़क पर चलते हुए…

मुझे लगता लोग मुझे ही देख रहे हैं।

सिर्फ देख नहीं रहे…

बल्कि — मेरे जैसे दिख रहे हैं।

पहले ये एहसास बहुत हल्का था।

जैसे कोई मिलता-जुलता चेहरा।

फिर…

जैसे बहुत समानता।

फिर…

एक दिन…

बस स्टॉप पर खड़े एक आदमी को देखकर…

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

वो बिल्कुल मेरे जैसा दिख रहा था।

चेहरा।

आँखें।

बाल।

यहाँ तक कि हावभाव।

मैंने दोबारा देखा।

सामान्य आदमी।

अलग चेहरा।

मैं काँप गया।

अब मैं हर चीज़ पर शक करने लगा था।

क्या ये स्ट्रेस है?

हेलुसिनेशन?

मैंने डॉक्टर से मिलने का सोचा।

लेकिन उसी दौरान…

सबसे डरावना अनुभव हुआ।

एक रविवार।

मैं घर पर था।

पूरा दिन आराम।

कोई काम नहीं।

कोई स्क्रीन नहीं।

शाम को मैंने सोचा थोड़ा टहल लूँ।

नीचे उतरा।

सड़क पर आया।

और…

मैं वहीं रुक गया।

सड़क खाली थी।

पूरी तरह।

मुंबई में।

खाली सड़क।

कोई गाड़ी नहीं।

कोई आदमी नहीं।

कोई आवाज़ नहीं।

मैंने सोचा — शायद कोई बंद या कुछ होगा।

लेकिन…

मुझे सबसे ज़्यादा झटका तब लगा…

जब मैंने सामने देखा।

सड़क के दूसरी तरफ…

मैं खड़ा था।

बिल्कुल मैं।

मेरे कपड़े।

मेरी शक्ल।

मेरी आँखें।

वो मुझे देख रहा था।

मैं साँस लेना भूल गया।

मैंने पलक झपकाई।

कुछ नहीं।

सड़क पर सामान्य लोग।

ट्रैफिक।

शोर।

मैं लगभग गिरते-गिरते बचा।

उस दिन के बाद…

हकीकत टूटने लगी।

अब ये पल-पल होने लगा।

भीड़ में चलते हुए…

अचानक सब गायब।

और सिर्फ मैं।

हर तरफ।

हर दिशा में।

जैसे दुनिया से बाकी सब मिटा दिए गए हों।

और सिर्फ मैं रह गया हूँ।

लेकिन असली झटका अभी बाकी था।

एक रात…

मैंने फोन उठाया।

माँ को कॉल किया।

फोन बजा।

कनेक्ट हुआ।

“हेलो?”

आवाज़ आई।

मैं जम गया।

वो मेरी ही आवाज़ थी।

मैंने धीरे से कहा,

“माँ?”

उधर से वही आवाज़…

“समीर…”

मेरी ही आवाज़।

मैंने फोन काट दिया।

हाथ काँप रहे थे।

दोबारा कॉल किया।

माँ की सामान्य आवाज़।

मैं पूरी तरह टूट चुका था।

अब डर सिर्फ दिखने या सुनने तक नहीं था।

अब डर था —

क्या असली है?

क्या नकली?

आखिरी घटना…

सब कुछ बदल देने वाली थी।

मैं वॉशरूम में था।

शीशे के सामने।

मैंने खुद को देखा।

लेकिन…

इस बार…

शीशे में मैं नहीं था।

वो मैं था…

लेकिन…

मुस्कुरा रहा था।

जबकि मैं नहीं मुस्कुरा रहा था।

मेरी रीढ़ में बर्फ उतर गई।

मैंने होंठ सख्त कर लिए।

शीशे वाला चेहरा…

धीरे-धीरे मुस्कुराता रहा।

फिर…

उसने होंठ हिलाए।

और बिना आवाज़ के कहा —

“अब सिर्फ मैं हूँ।”

मैं चीख पड़ा।

आँखें बंद कर लीं।

फिर देखा।

सामान्य प्रतिबिंब।

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Frightened man sitting on bed surrounded by multiple identical versions of himself, disturbing psychological horror scene
असल कौन था… और बाकी कौन?

उस रात मैं सो नहीं पाया।

मैंने सारे शीशे ढक दिए।

फोन बंद कर दिया।

लाइट ऑन रखी।

लेकिन…

आधी रात के आसपास…

कमरे में हल्की सी आवाज़ हुई।

टक…

टक…

टक…

जैसे कोई चल रहा हो।

मैंने हिम्मत जुटाई।

धीरे से सिर उठाया।

और…

मैं पूरी तरह सुन्न हो गया।

कमरे में…

चारों तरफ…

दीवारों पर…

खिड़की के पास…

बिस्तर के पास…

मैं ही खड़ा था।

दर्जनों।

सैकड़ों।

हर तरफ।

सभी मुझे देख रहे थे।

सभी मुस्कुरा रहे थे।

और उसी पल…

मुझे एहसास हुआ —

मैं उनमें से कौन हूँ?

और असली समीर…

कहाँ गया?

आज ये सब लिखते हुए…

मुझे अब भी डर लग रहा है।

क्योंकि…

लैपटॉप स्क्रीन में…

मुझे फिर वही मुस्कान दिख रही है।

और इस बार…

मैं मुस्कुरा नहीं रहा।


अगर तुम्हारे साथ ऐसा होता… तो तुम क्या करते?

क्या ये सिर्फ मानसिक थकान थी… या कुछ और?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या मैं अभी भी “मैं” हूँ?

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