सुबह की पहली धूप अभी गाँव की कच्ची गलियों तक नहीं पहुँची थी।
गणपत ने दुकान का शटर आधा उठाया और नीचे बैठकर ताला खोलने लगा। सामने चबूतरे पर रात की बारिश का पानी जमा था। उसने हाथ बढ़ाकर उसमें पड़ा नीम का पत्ता हटाया और दुकान के भीतर रखी लकड़ी की पेटी बाहर खींच ली।
“आज फिर देर।”
पीछे से आवाज आई।
गणपत ने मुड़कर देखा। शेखर हाथ में दूध की बाल्टी लिए खड़ा था।
“देर कहाँ हुई? तू जल्दी आ गया।”
शेखर हँसा और बाल्टी दुकान के पास रख दी।
“चाय बना।”
गणपत ने चूल्हा जलाया।
गाँव में सुबह इसी तरह खुलती थी। कोई दूध लेकर निकलता, कोई खेत की तरफ। मंदिर की घंटी दूर से सुनाई देती और मस्जिद से आती अज़ान उसके साथ मिल जाती।
थोड़ी देर बाद रशीद साइकिल से आया। उम्र मुश्किल से सत्रह-अठारह साल। उसने साइकिल दुकान की दीवार से टिकाई।
“गणपत काका, कॉपी है?”
“तेरे पैसे?”
रशीद ने जेब टटोली।
“कल दे दूँगा।”
“कल तू यही बोलता है।”
गणपत ने फिर भी कॉपी निकालकर दे दी।
रशीद मुस्कुराया और स्कूल की तरफ निकल गया।
उधर सड़क के दूसरी तरफ सरस्वतीबाई अपने घर के बाहर झाड़ू लगा रही थीं। उनकी उम्र साठ के करीब थी। पति को गुजरे कई साल हो चुके थे। घर में वह अकेली रहती थीं, लेकिन गाँव में किसी के घर का बच्चा बीमार हो जाए तो सबसे पहले वही पहुँचती थीं।
“बाई!”
उन्होंने सिर उठाया।
रामू खड़ा था।
“आज खेत की तरफ मत जाना।”
“क्यों?”
“नाले में पानी बहुत है।”
रामू ने कंधे उचकाए।
“शाम तक उतर जाएगा।”
वह अपनी साइकिल लेकर आगे बढ़ गया।
रामू का काम खेतों के बीच बकरियाँ चराना था। गाँव में उसे कोई ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था, लेकिन रास्ते, खेत और आसपास का जंगल उससे बेहतर कोई नहीं जानता था।
उसी समय दत्तू पोस्टमन साइकिल पर आता दिखाई दिया।
उसने सरस्वतीबाई के घर के बाहर साइकिल रोकी।
“आपके नाम चिट्ठी है।”
सरस्वतीबाई ने चिट्ठी ली।
“किसकी?”
“पता नहीं। शहर से है।”
उन्होंने चिट्ठी उलट-पलटकर देखी और अंदर चली गईं।
दत्तू आगे बढ़ गया।
गाँव के आखिरी घर के पास माधव काका अपनी चारपाई पर बैठे बीड़ी सुलगा रहे थे। उम्र बहुत ज्यादा थी। आँखें कमजोर थीं, मगर आवाज अभी भी साफ थी।
“दत्तू!”
पोस्टमन रुक गया।
“हाँ?”
“आज स्कूल बंद है क्या?”
“नहीं तो।”
माधव काका ने स्कूल की तरफ देखा।
“आज वहाँ कोई नहीं जाएगा।”
दत्तू हँस पड़ा।
“आपको कैसे पता?”
माधव काका ने कोई जवाब नहीं दिया।
दत्तू आगे चला गया।
उसे क्या पता था कि शाम तक वही बात उसे याद आने वाली थी।
दोपहर में बारिश फिर शुरू हो गई।
रामू अपनी बकरियों को लेकर नाले के किनारे पहुँचा। पानी सचमुच बढ़ गया था। उसने रास्ता बदलने का फैसला किया।
तभी उसे दूसरी तरफ कोई दिखाई दिया।
एक लड़का।
पीठ उसकी तरफ थी।
रामू ने आवाज दी—
“कौन है?”
लड़का मुड़ा।
रशीद था।
“तू इधर क्या कर रहा है?”
रशीद ने कुछ नहीं कहा।
बस नाले की तरफ देखता रहा।
रामू ने सोचा शायद उसकी आवाज नहीं पहुँची।
वह पास गया।
“चल, गाँव चलते हैं।”
रशीद ने धीरे से सिर हिलाया।
दोनों वापस चल पड़े।
रास्ते में रामू ने पूछा—
“स्कूल नहीं गया?”
रशीद चुप रहा।
रामू ने फिर नहीं पूछा।
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| रात की बारिश के बाद मिट्टी पर दिखाई दिए ये सात पैरों के निशान सीधे घर के दरवाज़े तक जा रहे थे। अजीब बात यह थी कि आसपास कोई दिखाई नहीं दे रहा था। |
शाम को गणपत दुकान बंद कर रहा था, तभी रशीद वहाँ आया।
“काका, एक बिस्कुट का पैकेट।”
“सुबह कॉपी ले गया था।”
“कल पैसे दे दूँगा।”
“तेरा कल कब आएगा?”
रशीद हँस पड़ा।
गणपत ने पैकेट दे दिया।
रशीद चला गया।
गणपत ने दुकान बंद की।
घर पहुँचकर खाना खाया।
रात करीब दस बजे बाहर बारिश की आवाज तेज हो गई।
गणपत सोने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई।
एक बार।
फिर दूसरी बार।
उसने पूछा—
“कौन?”
कोई जवाब नहीं।
उसने दरवाजा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ बारिश।
दरवाजे के ठीक सामने मिट्टी में सात गीले पैरों के निशान थे।
गणपत कुछ क्षण उन्हें देखता रहा।
फिर उसने दरवाजा बंद कर लिया।
---
अगली सुबह गाँव में रशीद नहीं था।
उसकी माँ ने कहा कि वह रात में घर नहीं आया।
पहले किसी ने ज्यादा चिंता नहीं की।
लड़का कहीं दोस्तों के यहाँ रुक गया होगा।
दोपहर तक भी वह नहीं लौटा तो दत्तू ने कहा—
“स्कूल में पूछो।”
स्कूल में पता चला कि रशीद कल आया ही नहीं था।
गणपत को यह बात अजीब लगी।
उसे तो वह शाम को दुकान पर आया था।
उसने यह बात सबको बताई।
रामू ने भी कहा—
“मैंने उसे नाले के पास देखा था।”
सबकी नजरें उसकी तरफ उठीं।
“कब?”
“कल दोपहर।”
“फिर?”
“मेरे साथ गाँव तक आया था।”
लेकिन गाँव में किसी और ने उसे नहीं देखा था।
रामू कुछ देर चुप रहा।
“शायद मैं गलत समझा।”
मामला वहीं रुक गया।
लेकिन उसी रात दत्तू को अपने डाकखाने के बाहर एक पैकेट मिला।
उस पर नाम लिखा था—
रशीद।
पता वही गाँव का।
दत्तू ने पैकेट उठाया।
अंदर एक पुरानी घड़ी थी।
पीछे खुदा था—
“रशीद — 14 अगस्त”
दत्तू ने तारीख देखी।
आज 20 अगस्त था।
उसने घड़ी चलाने की कोशिश की।
घड़ी चलने लगी।
सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
दत्तू ने तुरंत उसे बंद कर दिया।
---
उधर सरस्वतीबाई ने वह चिट्ठी खोली जो दत्तू ने दो दिन पहले दी थी।
अंदर सिर्फ एक कागज था।
उस पर लिखा था—
“आपसे मिलने की बात अधूरी रह गई।”
नीचे नाम नहीं था।
सरस्वतीबाई को अचानक बेचैनी हुई।
उन्होंने चिट्ठी मोड़ी और संदूक में रख दी।
संदूक बंद करते समय उन्हें अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज सुनाई दी।
उन्होंने फिर खोला।
अंदर एक पुरानी फोटो थी।
फोटो में सात लोग खड़े थे।
गणपत।
दत्तू।
रामू।
सरस्वतीबाई।
माधव काका।
लक्ष्मण।
और रशीद।
सरस्वतीबाई ने फोटो हाथ में ले ली।
उन्हें फोटो याद नहीं थी।
फिर भी उसमें खड़े सातों लोग उन्हें ऐसे परिचित लगे जैसे रोज सामने बैठते हों।
फोटो के पीछे तारीख लिखी थी।
14 अगस्त।
उस शाम लक्ष्मण आया।
वह गाँव की किराने की दुकान पर काम करता था। गणपत की दुकान के सामने से गुजरते हुए उसने पूछा—
“रशीद मिला?”
“नहीं।”
“मुझे कल रात दिखाई दिया था।”
गणपत ने उसकी तरफ देखा।
“कहाँ?”
“स्कूल के पास।”
“कितने बजे?”
लक्ष्मण ने सोचकर कहा—
“शायद दस।”
“तू वहाँ क्या कर रहा था?”
“मुझे भी यही पूछना चाहिए।”
गणपत कुछ नहीं बोला।
लक्ष्मण चला गया।
उस रात गणपत ने दुकान जल्दी बंद कर दी।
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| सुनसान स्कूल के कमरे में सात कुर्सियाँ खाली थीं और ब्लैकबोर्ड पर सात नाम लिखे थे। लेकिन उन नामों के पीछे छिपा सच सामने आते ही पूरी कहानी बदलने वाली थी। |
अगली सुबह गाँव के बाहर एक आदमी की चप्पल मिली।
रामू ने पहचान ली।
“रशीद की है।”
पास ही मिट्टी में साइकिल का निशान था।
निशान नदी की तरफ जाता था।
गाँव के दस लोग नदी तक गए।
वहाँ पानी बहुत था।
लेकिन कोई शरीर नहीं मिला।
वापस आते समय माधव काका ने अचानक कहा—
“छह।”
गणपत ने पूछा—
“क्या?”
“हम कितने हैं?”
गणपत ने पीछे देखा।
माधव काका।
दत्तू।
रामू।
सरस्वतीबाई।
लक्ष्मण।
गणपत।
छह।
रशीद गायब था।
माधव काका कुछ देर चुप रहे।
“वह भी होना चाहिए।”
“कहाँ?”
“हमारे साथ।”
किसी ने उनकी बात का अर्थ नहीं समझा।
उस रात सातों की कहानी पहली बार एक जगह आकर जुड़ी।
गणपत दुकान बंद करके लौट रहा था।
रास्ते में उसे दत्तू मिला।
दत्तू के हाथ में वही घड़ी थी।
“चलो,” दत्तू ने कहा।
“कहाँ?”
“स्कूल।”
“इस वक्त?”
दत्तू ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे लगता है रशीद वहीं है।”
दोनों स्कूल पहुँचे।
अंदर अंधेरा था।
एक कमरे का दरवाजा खुला था।
अंदर सरस्वतीबाई पहले से बैठी थीं।
रामू खिड़की के पास खड़ा था।
लक्ष्मण जमीन पर बैठा था।
और माधव काका ब्लैकबोर्ड के सामने।
गणपत ने सबको देखा।
“तुम सब यहाँ क्यों हो?”
किसी के पास जवाब नहीं था।
माधव काका ने ब्लैकबोर्ड की तरफ इशारा किया।
वहाँ सात नाम लिखे थे।
गणपत
दत्तू
रामू
सरस्वती
माधव
लक्ष्मण
रशीद
नीचे तारीख थी।
14 अगस्त।
और उसके नीचे—
मृत।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
“ये किसने लिखा?”
किसी ने जवाब नहीं दिया।
अचानक पीछे से आवाज आई।
“मैंने।”
सभी मुड़े।
रशीद दरवाजे पर खड़ा था।
गणपत उसकी तरफ बढ़ा।
“तू कहाँ था?”
रशीद ने उसकी तरफ देखा।
“आपको याद नहीं?”
“क्या?”
रशीद की आँखें भर आईं।
“उस दिन क्या हुआ था?”
कोई बोल नहीं पाया।
फिर जैसे किसी ने भीतर बंद दरवाजा खोल दिया हो, एक साथ सबके चेहरे बदल गए।
बारिश।
तेज बहता नाला।
टूटा हुआ पुल।
सड़क पर फिसलती जीप।
चीख।
अंधेरा।
पानी।
गणपत को याद आया—वह अपनी दुकान से घर लौट रहा था।
दत्तू को याद आया—वह डाक लेकर उसी रास्ते से जा रहा था।
रामू अपनी बकरियों को लेकर लौट रहा था।
सरस्वतीबाई पड़ोस के घर से आ रही थीं।
लक्ष्मण बाजार से।
माधव काका मंदिर से।
और रशीद स्कूल से।
सातों एक ही रास्ते पर थे।
पुल अचानक टूटा था।
सातों पानी में बह गए थे।
उनकी लाशें अगले दिन मिली थीं।
गाँव ने उसी दिन उनका अंतिम संस्कार कर दिया था।
लेकिन उसके बाद से—
वे रोज सुबह उठते रहे।
दुकान खोलते रहे।
डाक बाँटते रहे।
बकरियाँ चराते रहे।
स्कूल जाते रहे।
चाय पीते रहे।
और किसी ने उनसे बात क्यों नहीं की—यह सवाल अब पहली बार उनके सामने था।
गणपत ने खिड़की से बाहर देखा।
गाँव की सड़क पर लोग खड़े थे।
सैकड़ों लोग।
सबकी नजरें स्कूल की तरफ थीं।
लेकिन कोई उन्हें देख नहीं रहा था।
एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—
“माँ, अंदर कौन है?”
माँ ने उसका हाथ खींच लिया।
“चल।”
“लेकिन वहाँ तो सात लोग—”
“वहाँ कोई नहीं है।”
गणपत पीछे हट गया।
उसने अपने हाथों को देखा।
उँगलियाँ हल्की पारदर्शी थीं।
दत्तू ने अपनी डाक की थैली खोली।
अंदर सिर्फ सात कागज थे।
सात मृत्यु प्रमाणपत्र।
रामू ने बाहर देखा।
उसकी बकरियाँ नहीं थीं।
सरस्वतीबाई ने अपने गले को छुआ।
उनकी नाड़ी नहीं चल रही थी।
लक्ष्मण ने जेब से बीड़ी निकाली।
उसने माचिस जलाई।
आग उसकी उँगलियों से होकर निकल गई।
वह डरकर पीछे हट गया।
माधव काका धीरे से मुस्कुराए।
“अब समझ आया।”
“क्या?”
“हम गाँव में लौटे ही नहीं थे।”
सब उनकी तरफ देखने लगे।
“हम हर दिन उसी रास्ते पर जाते रहे…”
उन्होंने खिड़की के बाहर देखा।
“…जहाँ हमारी मौत हुई थी।”
रशीद ने पूछा—
“फिर हम यहाँ क्यों आते रहे?”
माधव काका ने कोई जवाब नहीं दिया।
ब्लैकबोर्ड पर लिखे सात नामों के नीचे अपने आप एक और वाक्य उभरने लगा।
“क्योंकि इन्हें पता नहीं था कि इनकी कहानी खत्म हो चुकी है।”
कुछ क्षणों तक कोई हिला नहीं।
फिर स्कूल की घंटी अपने आप बज उठी।
सातवीं बार घंटी बजते ही कमरे में कोई नहीं था।
सिर्फ सात खाली कुर्सियाँ थीं।
और ब्लैकबोर्ड पर सात नाम।
इस बार उनके आगे एक ही शब्द नहीं था।
हर नाम के आगे अलग-अलग लिखा था—
गणपत — दुकान बंद।
दत्तू — आखिरी डाक।
रामू — रास्ता खत्म।
सरस्वती — घर खाली।
माधव — इंतजार खत्म।
लक्ष्मण — आखिरी बीड़ी।
और सबसे नीचे—
रशीद — स्कूल की छुट्टी।
सुबह गाँव के बच्चों ने स्कूल खोला तो किसी को कुछ असामान्य नहीं लगा।
बस ब्लैकबोर्ड पर लिखे सात नाम देखकर एक बच्चा कुछ देर खड़ा रहा।
फिर उसने चॉक उठाई और उन सातों नामों के ऊपर एक ही शब्द लिख दिया—
“याद।”



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