काली रात – उस रात वो मेरे साथ थी

 


नवंबर का महीना था। रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।

राजेश दिनभर काम करने के बाद अपनी मोटरसाइकिल से घर लौट रहा था। रास्ता सुनसान था। दोनों तरफ ऊँचे-ऊँचे गन्ने के खेत और बीच-बीच में पुराने पेड़ों की कतारें थीं।

आधी रात को सुनसान गाँव की सड़क पर बरगद के पेड़ के नीचे सफेद साड़ी पहने खड़ी रहस्यमयी भूतिया औरत और मोटरसाइकिल के पास खड़ा डरा हुआ युवक।
 रात के अंधेरे में मिली वह अजनबी औरत कोई इंसान नहीं थी। राजेश की सबसे बड़ी गलती थी उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाना।


आसमान में बादल छाए हुए थे। दूर कहीं बिजली चमक रही थी।

गाँव अभी सात किलोमीटर दूर था।

अचानक उसकी मोटरसाइकिल बंद हो गई।

उसने दो-तीन बार किक मारी, लेकिन गाड़ी चालू नहीं हुई।

"आज ही खराब होना था इसे!"

वह गुस्से में मोटरसाइकिल से उतरा और उसे सड़क के किनारे खड़ा कर दिया।

कुछ दूर जाने के बाद राजेश ने पूछा,

"आपका गाँव कहाँ है?"

कोई जवाब नहीं आया।

उसने दोबारा पूछा।

इस बार औरत धीरे से बोली,

"आपके ही गाँव में।"

राजेश ने शीशे में उसकी तरफ देखा।

उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी।

राजेश ने फिर सड़क की तरफ ध्यान दिया।

लेकिन कुछ ही मिनटों में उसे महसूस हुआ कि पीछे से बहुत ठंडी हवा आ रही है। उसके हाथ सुन्न होने लगे।

उसने शीशे में देखा।

पीछे बैठी औरत गायब थी!

पानी में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

लेकिन उसके पीछे वही औरत खड़ी मुस्करा रही थी।

राजेश ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

उसने दोबारा पानी में देखा।

पुराने भारतीय मंदिर के पास बनी अंधेरी पत्थर की बावड़ी में झाँकता हुआ डरा हुआ युवक और पानी से बाहर निकलता भूतिया हाथ।
बावड़ी के पानी में दिखाई देने वाला चेहरा राजेश का नहीं था। वहाँ कोई उसका इंतजार कर रहा था।


इस बार औरत का चेहरा पानी के बिल्कुल करीब था।

अचानक पानी से एक लंबा काला हाथ बाहर निकला और राजेश के पैर पकड़ने की कोशिश करने लगा।

वह चीखकर पीछे गिर पड़ा।

तभी मंदिर के अंदर से घंटी बजने लगी।

"वही सफेद साड़ी वाली औरत। तीस साल पहले इसी बावड़ी में गिरकर उसकी मौत हुई थी। तब से वह रात में इस रास्ते से गुजरने वालों को अपने साथ ले जाती है।"

राजेश के चेहरे का रंग उड़ गया।

"लेकिन अब मैं घर कैसे जाऊँ?"

पुजारी ने उसे सुबह तक मंदिर में रुकने के लिए कहा।

राजेश पूरी रात वहीं बैठा रहा।

सुबह हुई। पक्षियों की आवाजें आने लगीं। राजेश ने पुजारी को धन्यवाद देने के लिए पीछे देखा।

लेकिन मंदिर में कोई नहीं था।

सिर्फ जमीन पर धूल में एक वाक्य लिखा था।

"उसे अपने साथ लाने के लिए धन्यवाद।"

राजेश के पैरों तले जमीन खिसक गई।

वह तुरंत बाहर आया। उसकी मोटरसाइकिल वहीं खड़ी थी।

वह गाड़ी लेकर गाँव की तरफ निकल पड़ा।

घर पहुँचते ही उसकी माँ ने दरवाजा खोला।

उसे देखते ही माँ रोने लगी।

बाहर से आवाज आई,

"इस बार मैं तुम्हें घर छोड़ने आई हूँ।"

राजेश डरकर माँ की तरफ देखने लगा।

लेकिन माँ के चेहरे पर डर नहीं था।

वह धीरे से बोली,

"बेटा... ये तो तेरी पत्नी है ना?"

राजेश की साँस रुक गई।

उसकी शादी तो कभी हुई ही नहीं थी!

तभी घर में लगे पुराने आईने में उसे अपने पीछे वही औरत दिखाई दी।

उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में राजेश खुद था।

पुराने भारतीय घर में प्राचीन आईने के सामने खड़ा भयभीत युवक, आईने में उसके पीछे दिखाई देती सफेद साड़ी वाली डरावनी औरत और कोने में सहमी हुई उसकी माँ।
राजेश को लगा था कि वह उस भूत से बचकर घर पहुँच गया है, लेकिन असली डर तो उसके अपने घर में उसका इंतजार कर रहा था। 


लेकिन तस्वीर पर लिखी तारीख देखकर उसके होश उड़ गए।

17 नवंबर 1996।

और तस्वीर के नीचे लिखा था:

मृत्यु की तारीख — 17 नवंबर 1996।

राजेश की आँखों से आँसू निकलने लगे।

तभी आईने में उस औरत ने अपना चेहरा उसके कान के पास लाकर कहा—

"अब याद आया राजेश... उस रात हम दोनों की मौत हुई थी।"

और अचानक पूरे घर की बिजली चली गई।

सुबह जब गाँव वाले घर पहुँचे, तो राजेश अपनी चारपाई पर मृत पड़ा था।

उसकी माँ दरवाजे के पास बेहोश थी।

लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि घर के बाहर  पैरों के निशान थे।

दो लोगों के।

एक के पैर सीधे थे...

और दूसरे के उल्टे।

समाप्त।

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